Baba

by श्री जे. बगरहुट्टा et al.

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Baba
श्री जे. बगरहुट्टा et al.
श्री जे. बगरहद्रा, श्री रामचन्द्र शर्मा, श्री हरिशंकर शर्मा एवम्
घने पत्तों, गुथी टहनियों और आई-तिरछी डालोंवालों वह 'शासित-निकेतन' था ही ऐसा कि हर तरह के लोग आ-आकर उसका आश्रय लेते।
खुशी में पागल आदमी यहाँ आता और आगे के लिए योजनाओं के सुनहले लड़ा बनाया करता। विपती का पहाड़ जिसकी गरदन तोड़ रहा होता, वह बेचारा भी यहाँ आता और दृढ़ता के सबक लेता। प्रेमी आता, प्रेमिका आती। रात के अँधेरे में चोर आया करते। रपयों की उमस से परेशान कंजूस, सासों की खुराफातों से परेशान बहुँर्स, गणित के सवालों से परेशान स्कूली लड़के, साइडार की साजिशों से परेशान गृहस्थ, महाजन की बेईमानियों से ऊबे हुए गरीब किसान, कुर्को का समन पाकर बौंछलायी हुई विधवा, प्रायश्ति के पछड़ में पड़कर धर्म-शास्त्री, पण्डित से डरा हुआ अछूत, गारिजेन की निगरानीयों से तंग आया हुआ नटखट छोकर... कौन नहीं आता बटेसर बाबा के पास, और कौन नहीं यहाँ आकर अपने को ताँजा महसूस करता ?
खाना खाकर जैकिसुन यादव सीधे इस बरगद के तले आ बैठा।
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๖-๖-๖-๖...
कहीं से कोयल की आवाज आयी। जवाब मे किसी और कोयल की कूक तो नहीं सुनायी पड़ी, अलबटा पड़ोंसे की अमराई से ड्रिंगुरों की हल्की झंकार आरम्भ हुई। कोयल दुबारा नहीं बोली, मगर ड्रिंगुरों की पलटन अधिक-से-अधिक मुखर होती गयी—श्री ईं ईं ईं ईं ऐं...
क्षण-भर चुप रह लेने के बाद बरगद बाबा ने फिर अपना मुँह खोला—
"द्वीगुर एक तुच्छ कीड़ा होता है। सैकड़ों-हजारों की तादाद में जब ये एक-खर होकर आवाज़ करने लगते हैं तो एक अजीब समाँ बँध जाता है। डींगुरीों की यह अखण्ड ड्रिंकार कई-कई पहर तक चलती रहती है। सामूहिक खर की इस एकाग्र मिहमा के आगे मेरा मस्तक सदैव नत होता रहा है और होता रहेगा। शहनाई बजानेवालों में दो ऐसे लोग हुआ करते हैं जो केवल खर भरते जाते हैं—दम रुपुली की नयी पीढ़ी के लोग गांववालों का अपना लेखा-जोखा करते वक्त आम तौर पर उन उच्च शिशित बाबुओं की शुमार इसी में नहीं करते थे। हाँ, पड़ोस के गांव का कोई कभी शिशितों का प्रसंग छेड़ बैठता फिर तो रपुललीवाले भेद-भाव की आपसी कटुता को परे हटाकर अपनी बस्ति के मौजूदा रलों की पूरी सूची पेश करते।
तो फिर ? तो फिर जैकिसुन ने सिर हिलाकर स्वीकार किया कि घर के अंदर भी ड्रींगुर हुआ करते हैं और वह उनसे अच्छी तरह वाकिफ है। लेकिन अब बरगद बाबा के मुँह से पुराने जमाने की बातें सुनना चाहता था वह। दुनाई पाठक और जैनरायन के बारे में बाबा ने अभी जो-कुछ बतलाया था, उसका अधिकांश सचमुच जैकिसुन को मालूम नहीं था।
पता नहीं, कितनी बातें बाबा को मालूम होगी ! पता नहीं, पिछले सौ वर्षों में इस इलाके पर क्या-क्या गुजरा होगा ! पता नहीं, जैकिसुन के परदादा और दादा किस तरह अपने जीवन बिता गये हैं !
इस प्रकार की बहुत सारी बातें उस तरण के दिशाग मे चककर काट रही थीं। ड्रींगुरों की एकरस-एकतार आवाज की तरफ उसका ध्यान था ही नहीं। उसका सारा ध्यान तो जिशासा पी गयी थीं...
बाबा ने जैक्सीन के दिल की बात ताड़ ली। वह बोला—
"अब मैं तुझे अपनी कहानी सुनाऊँगा। आपकी भी तो जगबीती का ही एक अंश होता है न ? तो, ले, सुन ध्यान लगाकर ! ..."
"मेरी आयु एक सौ तीन वर्षों की हो गयी है। हमारी जाति की वनस्पतियों के लिए यह कोई अधिक आयु थोड़ है बेटा ? बिलकुल नहीं ! पंडितों को कहते सुना है कि किलकाल सबकी आयु पी गया है। पी गया होगा किलकाल चर-अचर सबकी आयु, परन्तु बरगद की उम्र अब भी सैकड़ों साल की हुआ करती है। पांच-पांच सौ वर्षों की आयुवाले वट वृक्षों की चर्चारी मैनें संतों के मुखकमल में सुनी है। दाई-सौ तीन-सौ वर्षों के बरगद तो तुझे अपने इस तिरहुत देश मे भी कई जगह मिल जायँगे। पारा-डीह के बूढ़ बटेश्र का जिक्र में करे ही चुका हूँ । ..."
"यहाँ से दो कोस पर दक्षिण की ओर शिवाजी का एक पुराना मन्दिर था। सुना है कि उसी मन्दिर के पास पीछे नया मन्दिर किसी शब्दालु विधवा ने बनवा दिया है। पुराना मन्दिर तो अच्छी तरह याद है। बाहर-बाहर उसका सुखी-चूना झड़ गया था। बेटा, उन दिनों सीमेपट नहीं हुआ करता था : पक्की इंटो का चूरन बना लेते थे। उसमें चूना और बातु मिलाकर गारा-लेबा तैयार होता था। उसी से इटों पर इटं बंधाया करते थे राज लोग। अब भी अपने देहातो में सुखी-चूने का गारा काम में आता था। सीमेपट हासिल करने में पचास शब्दों में पड़ती है। तेरा बाप तो कच्ची इंटो की भींती खड़ी कर गया है। है न ?"
जॉर्जिसुन ने पलकों उठाकर समर्थन किया।
"उस मंदिर का बाहरी गारा झड़ गया था। अंदर का पलस्तर अभी बदस्तर कायम था : पीछे नुककड पर मन्दिर में मामूली-सी दरार पड़ गयी थी। एक बार हथिया-नक्षत्र लगातार सात दिन, सात रात हल्के-हल्के बरसता रहा। कभी पुरवैया, कभी दोरस बयार—कभी हवा बन्द भी हो जाती थी। मतलब यह कि पानी की बारीक किनयों के झोंके मन्दिर की उस दरार के अंदर पहुँच गये और तह की फटी जोड़ों में मौजूद सुख्ति-चूने को भली-भली भक्ति भिगो आये।
और तब, दस रोज बाद में पैदा हुआ।"
जैकिसान की आँखों के कोयले फैल गये—आश्रय के मारे उसकी टकटकी बँध गयी।
बाबा ने कहा—
"मंड्र से जरा हटकर बरगद का एक भारी पेड़ था। उसके बरोज धरती को कब के छू चुके थे और बाकी-पतली डालों में विकसित होकर फिर से ऊपर उठ गये थे। वह वृक्षराज इस तरह अपनी बीसियों बरोज धरती मे धँसकर अविराम रस ग्रहण कर रहा था। मंदिर बनते समय वही कई देकियाँ खड़ी की गयी होगी और मजदूरीनो ने उन्हीं से चूर-चूरकर इटों का चूरन तैयार किया होगा। कई वर्षों तक यह सिलसिला चला होगा, मंदिर के निर्माण में निश्रय ही कई वर्ष लगे होंगे। इटों के चूरन की सुखीं देरों पर बरगद की फिलिया पक- पककर गिरती होगी। गारा-लेबा तैयार करते वक्त दो-एक वट-बीज नुककड़ की उन इटों के जोड़ में आ गये। न जाने मेरा जीव उस कँद मे कब तक पड़ा रहा। यदि दरार न फटती और हस्न-नक्षत्र की सुदीर्घ वर्ष गारे की तह को न भिगोती तो मैं आज कहाँ होता ?"
क्षण-भर के लिए अपने-आपमे डूब गया बरगद बाबा। फिर लम्बी सांस ली। गोरैया के बच्चे ने पंख फड़फड़ाया। बाबा ने स्नेहमय हथेली उस क्षुद प्राणी पर फेरी और कहा—
"यह रही मेरी जातक-कथा ! समझा ?"
अब जैकिसुन का विस्मय हट चुका था। उनकी दृष्टि स्वाभाविक सी लगती थी। कहानी का जादू अपना असर डालने जा रहा था अब...
बाबा बोला—"संयोग की बात थी यह। दूसरी तरह भी में पैदा हो सकता था न ? मगर मुझे जरा भी तकलीफ नहीं हुई। दरार के अंदर प्रकाश भी पहुँचता था, हवा भी पहुँचती थी। पानी की ही कमी थी, सो भगवान की ऐसी दया हुई उस बार कि कुछ मत पूछ! ...
"दाईं-तीन महीने मे तो में दो विते का हो गया। बीज से निकला तो सफेद धागे का जौ-भर का छोर-सा था। यो तो दरार क्या थी, वह मेरे लिए पूरी जेल थी। सब ओर घेरा, सभी ओर अवरोध। लेकिन एक बार जब मैं बीज के खोल से निकल आया, फिर भला या ही हार मान लेता किसी से ? रकावटें थी, विचन थे। ठीक है, पर राह भी तो निकल आयी थी आखिर ! उन दिनों द्वारखंड की खानों का पत्थर-कोयला यहाँ तक नहीं पहुँचा था। अंदर मोटे-मोटे लककड़ डालकर कच्ची इर्ति का भुटा चिनेत थे लोग। काठ की आग से ही इर्ति पकती थी। मेरा जीवन जिस गारे के हवाले था, वह मामूली आंच की अध-पकी इर्ति के चूरन का तैयार किया हुआ था। यह तो मेरा सौभाग्य था, वरना कही कड़ी आंच मे पकी इर्ति के चूरन के पल्ले पड़ता तो मैं गर्भ के अंदर ही खुलस चुका होता, या कि मंदिर के भीतरी भागों मे कही पड़ा होता तो भी न जाने बाहर आने के लिए कितने युगों की प्रतिक्षा करनी पड़ती !
"परन्तु मेरे अच्छे दिन तो अभी आगे आनेवाले थे। तेरे परदादा को में अपना सबसे बड़ा प्रतिपालक समझता हूँ। उसने मुझे इतनी अच्छी जगह न दी होती तो उसी जीर्ण-शीर्ण मंदिर की फती कमर से में चिकका रह जाता; डिगना-दूठा कुबड़ा-बोना ढाचा लिए विधाता को कोसता रहता…
"तो वर्ष-भर मुझे उस खोह मे तपस्या करनी पड़ी। तब तक मेरा शरीर दो तनों मे विभाजित हो चुका था। छड़ी की तरह पतले-पतले और हल्का पैलापन लिये हुए सफेद चिकनी मिट्टी की सूरत वाले दो तने, बस। पत्तों के लिए भला उस दिर्द दरा मे अवकाश ही कहा था ! मुश्किल से तीन-चार पत्थे अपने लिए वहाँ जगह बना सके थे; बीमार और सिमटी-सिकुड़ी रणोंवाले भेद पते ! छि : ! आज उनकी याद तक नागवार मालूम होती है ! पौधा ही ठहरा न ! बढ़ा तो मुझे था ही ! लेकिन अनेक प्रकार की रुकावटों से मजबूर होकर उन आरम्भिक दिनों मे मेरी जीवन-शक्ति एकमुखी बन गयी। यानी शरीर पतला व बेहद लम्बा होता गया। शुरू-शुक्त में दो तने थे। आगे आकर एक टेढ़ा हो गया क्योंकि ऊँचाई हुई एक कुबड़ी इंट ने उसे बुरी तरह दबाये रखा।
लम्बा होता गया। शुरू-शुरू में दो तने थे। आगे आकार एक टेढ़ा हो गया क्योंकि ऊँचाई हुई एक कुबड़ी इंट ने उसे बुरी तरह दबाये रखा।
"अगले साल ऐसा हुआ कि मंदिर की मलकाइन से बैजनाथ-धाम का एक पंदा मिलने आया। परिकमा के समय मन्दिर की पिछली दीवार के कोने पर उसने यह दरार देखी तो मुँह से खेदपूर्वक निकला—
"शिव ! शिव ! शिव !! शिव !!" अवश्य पड़े ने जाकर विधवा जर्मीदारின் से कहा होगा। तभी तो चार-छ दिन बाद दो राज मंदिर की मरममत करने आये थे। उनकी राय हुई कि भीतर से इंटे हटाकर ही दीवार को पुरखा किया जा सकता है, ऊपर से गारा-चूना डालकर थोप-थाप करेंगे तो फिर दार हो जायगी। ब्राह्मणी की शब्दा उमड़ आयी और दीवार को पुरखा कर दिया गया। साथ ही मुझे भी उस केंद से छुटकारा मिला। "तेरा परदादा शिवजी का भारी भक्त था। वह हर सोमवार को यहाँ से चलकर उस मन्दिर तक पहुँचता। जीवन मे दूसरी तरह के उलट-फेर उसे बरदाशत थे मगर हपते में एक रोज, और वह भी सोमवार को, बाबा बालेश्रनाथ पर लोटा-भर जल दारने के नियम में किसी प्रकार का व्यतिक्रम उसको सह्य नहीं था। सुना है, छबीस वर्ष की आयु के पशत् उसने यह संकलप लिया था और जीवन-पयंगत इस पर डटा रहा।
"तेरा परदादा भंसों का बड़ा शौकीन था। मैं यहाँ लाया गया तो उसकी उग्र तीस साल की थी। उन दिनों वह चार भंसों का मालिक था। कहते थे, एक बार गुज़राती नस्ल की उसकी एक प्यारी भंस बीमार पड़ गयी। मरने-मरने को हो गयी। ओझा-गुनी आये। दवा-दौरों होता रहा। बड़ी दौड़-थूप हुई, खर्चா भी काफी किया। मगर गुजराती का हाल नहीं सुधरा।
"बाकी सब तरफ से निराश होकर तेरा परदादा बाबा बालेश्वरनाथ के सामने जाकर लम्बा पड़ गया। रोनी-भर्याी आवाज में गुहर मचायी—"दुहाई बम्भोलेनाथ की ! अब तेरा ही एक आसरा है। जब तक
गुजराती निरोग नहीं होगी, तब तक में तेरे सामने से नहीं हटूगा !!!"
"मंदिर के बाहर, शिवजी के सामने वह पूरे आठ पहर तक उसी तरह लेटा रहा और रोता-सिसकता रहा। अन्त मे घड़ी-दो-घड़ी की खातिर नींद-सी आयी तो सपने मे भभूत रमाये हुए जटाधारी शिवशंकर दिखायी पड़े। लगा कि बम्भोलेनाथ ने दाहिने पैर से उसके सिर मे ठोकर मारी और कड़ककर कहा—जा, भाग ! भँस तेरी चरने निकल गयी है..."
"वह चट से उठकर खड़ा हुआ और पुजारी से सपने की बातें बतलाईं।
"पुजारी ने शिवजी के ऊपर का धतुरे का एक फूल उठाकर उसे दिया और पीठ पर हाथ फेरते हुए बोला—'जाओ राउत, भोलानाथ तुम पर प्रसन्न है। ऐसा सपना यहाँ दस-बीस वर्षों में कोई एक-आधि ही बड़भागी देखता है ! जाओ, तुम्हारा मनोरथ पूर्ण हुआ..."
"बात ठीक ही थी। भँस चरने तो नहीं निकली थी मगर दालान के आगे आकर खड़ी-खड़ी पागुर कर रही थी।"
"वह खुशी के मारे गुज़राती के गले से लगकर देर तक रोता रहा।
"सुना है, तभी से तेरा परदादा हर सोमवार को बालेश्वरनाथ पर जल दारने जाता था।
"वह बहुत दिनों से बरगद का एक बिराखा खोज रहा था। मुझ पर उसकी दृढ़ी अवश्य थी, किन्तु शिवजी के मंदिर का एक अंग समझकर मेरी ओर से वह निरीह-निरपेक्ष हो गया था। जीणोंद्रार होने लगा तो कीरगारों ने मेरे दुभियाँ के प्रति गहरी संवेदना प्रकट की। और तो वे कर ही क्या सकते थे, मंदिर के पिछवाड़ खुली जगह में छोटा-सा एक गदा खोदकर उसमे उन्होंने मुझे लगा दिया। दरार के अंदर दूर तक मेरी रोगों पहुँच गयी थी। मुझे स्वयं ही विसमय हो रहा था कि नीरस-निचाट उस खोद मे आखिर वह कौनसी संजीवनी समायी हुई थी जिसकी वजह से मैँ निष्फाण नहीं हो पाया ! वहाँ गारा-चूना ही नहीं, इंट तक मेरी नैस के घेरे में आ गयी थी। बड़ी मुश्किल से मुझे उनसे छुड़ाया गया था।
"तेरे परदादा ने एक बार डरते-डरते पुजारी से मेरे बारे में बातें की थीं।
"हुआ यह कि पुजारी का खसी एक बार मेरे ট्रूसों को चंबा गया। दिन-भर पुनगी से दृधिया रस बहता रहा, समझ ले कि आँसुओं की झड़ी लग गयी। खसी पुजारी का दुलारा था, मुझे वहाँ कोई नहीं पूछता था। बाबा बालेशरनाथ के दरवार मे पास-पास पांच बरगद थे, दस पीपल थे और पाकड़ थे दो-तीन। दो-तीन बड़े-बड़े पेड़ आम के भी थे। पंचवित्यों की उस गुलजार दुनिया मे फिर मुझ-जैसे अदना बिरवा की किसीको क्यों परवाह रहती ? बार-बार जी में आता कि किसी तरह सूख-साख जाऊँ तो हमेशा के लिए छुटकारा मिले। अपमान और गलानि के जीवन की अपेक्षा मृत्यु का कहीं अधिक शेय है... परन्तु चार ही दिनों में फिर अपना कायाकल्प देखकर आप ही में चिकित रह जाता। वाह, क्या खूब ! दीपिशखा के समान लाल-लाल टूसों से मेरे शरीर की सिधियाँ उल्लिसित हो उठती और रग्ग में जीवन की लालसा बिजली भरने लगती। तेरे परदादा ने आखिर मेरे चारों ओर ऊँची बाड़ लगा दी। साफ था कि उसके हृदय में मेरे लिए ममता घर बना चुकी थी। खुलकर एक दिन उसने पुजारी से कहा—'महाराज, यह बिरवा मुझे दे दो। मैं इसकी सेवा जी-जान से कर्णा...'
"दही-वही तो राउत तुमने बहुत दिनों से इधर नहीं खिलाया !"—एक-पर-एक दबे होठों को सिकोड़कर पुजारी ने कहा; आँखें नचा ली।
"हाथ जोड़कर तेरा परदादा बोला—'लो महाराज, कल ही आ जायगा।"
" 'तो फिर कल ही अपना बिरवा तुम ले जाना राउत !' पुजारी ने हँसकर कहा।
" 'नहीं जी, महुरत अच्छा पड़ेगा तब ले जाऊँगा,' प्रसन्ता के भावी को दबाकर राउत बोला।
"मिद्वी के नये बर्तन मे तीन-एक सेर दही और अलग सेर-भर घी अगले ही रोज पुजारी की सेवा में पहुँच गया।
"तीन दिन बाद शुभ महर्त निकल आया और राउत मुझे यहाँ से लाये। थाला काटकर खाने में रखा गया, रस्सी के सहारे बाँस में लटकाकर दो जवानों ने मुझे ढोया था। राउत खाली हाथ पीछे-पीछे आये थे।
"पहले ले जाकर में तेरे दालान की ओरियानी में रखा गया। बैठक के बरामदे मे छपर की छॉाह थी। भादों की धूप कैसी करारी होती है ! मेरे बारे मे राउत को डर था कि धूप में रखा रहूगा तो कुमहला जाऊँगा।
"तैरी परदादि ने घड़-भर दूध से मुझे नहलाया, अपने हाथों से। पीछे, मेरे तने पर भिगोये चावलों की पीसी हुई पीठी की थापें पड़ी। अधेड महीला के हाथ की हुलास-भरी हथेली का वह प्रथम स्पर्श में अब तक नहीं भूल सका हूँ। उस परस में मां का नेह-छोह था, बड़ी बहिन की ममता थी, दादी और नानी के आशीर्वाद थे। अरे, क्या नहीं था उसमे ! सब-कुछ था बेटा !
"और पीठी की थापॉं पर तेरी परदादि ने थोड़ा-थोड़ा सिंदूर भी लगा दिया। तब राउत ने तीरा और मधुरी के चटकिले फूलों की लम्बी माला मेरे गले से लपेट दी। मेरा तना छड़ी-सा पतला था। वह माला इस गले में बीसियों लपेट खा गयी थी… मेरी रग-रग एक अनोखी तरावट महसूस कर रही थी।
"इस गाँव में उन दिनों एक भारी पंडित थे। उम्र नखे साल की हो चुकी थी। अपने जमाने के पचासों विद्वानों को उन्होंने शास्त्रों में पछाड़ा था। नगद और दुशाले दे-देकर बीसियो राजा-महाराजा उनका सम्मान कर चुके थे। वादविवाद का पूर्वपक्ष हो या उत्तरपश्चा, प्रतिदृष्टी विद्वान् देर तक उनके सामने नहीं टिक पाता। समकालीन पण्डित-मण्डली उनसे बेहद आतंकित रहती थी। यह आतंक पीछे शब्दों में बदल गया
था शायद। विद्वानों की परिषद ने आखिर एकमत होकर नैयायिकप्रवर चन्द्रमाणे मिश्र को 'तर्क-पंचानन' की उपாधि दी थी। तर्क-पंचानन महाशय अब कहीं जाते-आते नहीं थे। दौहत्र था जो कि हथुआ के महाराज का राजपण्डित था। दूर-दूर से राजा-महाराजा और धनी-मानी लोग यदा-कदा अब उनके दर्शनाथ आया करते। कई दरबारों की तरफ से पण्डितजी के नाम पर दान-दक्षिणा की छोटी-मोटी रकमें बँधी थी। आसपास के पचास कोस के इलाकों में फैले हुए विद्वान् लोग तर्क-पंचानन से परमार्श ले जाते। तेरा परदादा छोटा था, तभी से उनका भगत रहा। मुझे पीछे मालूम हुआ कि राउत ने दस वर्ष तक पण्डितजी की सेवाटहल में बिताये थे। वह अब भी घड़ी-आध घड़ी रोज उनके पास जाता और देह-हाथ-जांघ चாँप-चूप आता… राउत अब तक निपूता था, सन्तान के बारे में वह निराश हो चुका था। बरगद का बिराव लगाकर अपना नाम जीवित रखने की उसकी लालसा इसी कारण दिन-दिन प्रबल होती आयी थी। राउत के मन की व्यथा से बूढ़ पण्डितजी विक्रफ थे। उसने पण्डितजी से प्रार्थना कर रखी थी—"सरकार ! मैं बरगद का जो बिरवा लगाऊँगा, उसे आप छूकर आशीर्वाद दीजियेगा; यही समझ लीजियेगा कि अपने बुधन के बेटा के कानों में आप मन मे आये…" राजत को तर्क-पंचानन अपने ही संवतों की तरह सगा समझते थे। उसकी यह प्रार्थना उन्होंने मान ली थी।
"सो उस रोज तिपहरीया की ढलती बेला में तेरा परदादा तर्क-पंचानन महाराज को खटोले पर उठवा लाया।
"आँगन में खट्टोला रखा गया। पिण्डितजी उस पर जैसे बैठे आये थे, उसी तरह बैठे रहे। मैं जिस खाँचे में था, उसे उठाकर खट्टोले के बिलकुल करीब रख दिया गया। टोले-मुहल्ले के सभी उम्र के औरत-मर्द हमें घेरकर खड़े हो गये।
"राउत दोनों हाथ जोड़े, धोती का अढ़ा गले मे डाले, विहूल मुद्रा में खड़ा था—ठीक उसी तरह जिस तरह बकरे की बिल के वक्त दक्षिणी दुर्गों के सामने यजमान खड़ा रहता है...
"पण्डितजी ने फुनगीवाली मेरी टहनी दाहिने हाथ की उँगलियों से पकड़कर झुका ली :
"फिर उनके हॉट हिलने लगे। बिना दाँतों के मुँह मे आहितसे-आहितसे चलती-फिरती जीभ बता रही थी कि तर्क-पंचानन कुछ मन्य या श्लोक-जैसी पिक्सेलों का पारायण कर रहे हैं। मुझे लगा कि उस महावृद्ध की काँपती हुई उर्गिलियों मे से होकर लम्बी आयु और स्वास्थ्य मेरे अंदर प्रवेश कर रहे हैं। मृदु और मधुर कममनों से मेरा एक-एक पता चंचल हो उठा। रग-रग मे नवजीवन की उछलती ताज़गी भर गयी।
"पण्डितजी की भाँहों के बाल पक-पककर न जाने कब के पीले पड़ चुके थे। गाल बेहद पोपले थे। धर्सी-धर्सी आँखों के अंदर पुतिलियाँ देखकर बिल मे पड़ी कौड़ी याद आती थी। लगातार सुघनी लेते रहने के कारण मूहों का बिचला हिस्सा और नाक के पूर्ण का छोर भूरा पड़ गया था। गंजी-पोली चॉँद मानो चिढ़कर चोटी के चन्द बालों को बिलकुल चर गयी थी। बदन का दाँचा ही कुछ ऐसा हो गया था कि गोशत की सता लुप्तप्राय थी। गेहुआ चम से मही हिडुयों का वह ठूहर मृत्यु के देवाधिदेव यमराज के लिए खुली ललकार था मानो।
"उनके गले में सफेद मलमल की हल्की चादर पड़ी थी, पहनावे मे पीले रंग की धोती थी।
"तर्क-पंचानन का समूचा माथा हिलता-डुलता रहता था। स्वर भी काँपा करते थे।
"कॉपती हुई आवाज़ मे पण्डितजी ने राउत से कहा—'ले जा, अब इसे रोप आ बुधन !"
" 'जी मालिक!' पुलिकित धविन मे तेरा परदादा बोला और लोग मुझे अलग ले गये।
"राउत ने बूढ़ पण्डित के पैरों पर माथा टेक दिया।
"उनके सिर पर तर्क-पंचानन के कॉपते हाथ की अضिर हथेली फिर गयी। कानों में कमित स्तर गूज गये—'नाहक मन छोटा करता है ं? तीस-बतीस-वर्षों की तो तेरी आयु है… तू अवश्य पुत्र-पौत्र का मुख देखेगा… और यह बरगद भी अलायु नहीं, बल्कि शतजीव-चिरजीव होगा।…'
राउत अब भी मथा टेके हुए था। पण्डित ने तुईी पकड़कर उनके चेहरे को ऊपर उठने के लिए बाध्य किया।
तेरा परदादा ऑसू बहाये जा रहा था—निपूता होने का पछतावा पानी-पानी होकर आँखों के रास्ते निकला जा रहा था या कि कुछ और बात थी, भगवान जाने ! राउत की यह विहूलता मुझे भी भीतर-भीतर रूला रही थी। तब राउत घर के अंदर गया और गाढ़ी धोतियों का पैला जोड़ा लेता आया। धोतियां तह नहीं की हुई थी, पल्लो में चुब्टे डालकर नफ़ासत से मरोड़ी हुई थी। दोनों धोतियां महापण्डित के चरणों में निवेदित करके वह एक ओर खड़ा रहा।
'इनकी क्या ज़ऱरत थी रे?' उन्होंने रखड़ी से कहा तो तेरा परदादा दोनों हाथ जोड़कर बेहद झुक गया और होठों की उसकी हदबन्दी को तोड़कर मुशिकल से ये शब्द बाहर निकले—'मालिक, ढाका-राजशाही की पीताम्बरी और नागपुर की रेशमी धोतियों का अम्बर लगा है आपके घर में, मेरी भला क्या औकात है कि हुजूर के पैरों पर अपना माथा भी रख सकू ? मगर कहावत है कि 'बम्भोला को आकधतुर !' जिसकी मोल कोड़ी भी नहीं, मदार और धचूर का वही फूल शंकरजी को पसंद आता है; कमल, चम्या, जुही, केवड़ा और हरिसंगार के फूल शिवजी के लिए जरा भी आकर्षण नहीं रखते। मालिक, इन्हें आप ज़रूस खौरकार करें…'
राउत की इस भावुकता के आगे तक-पंचानन सर्वथा मौन हो गये।
उधर उनका खट्टेला उठा और इधर मेरा खाँचा उठा। सूयंसत होने से पहले ही नयी जगह में बिरवा लगाने का मुहूर्त था न !
यहाँ, रजबாँध के किनारे इस मैदान में गदा खोदकर पहले ही से तैयार था। खाँचा-समेत मेरी जड़ों का थाला उसमें डाल दिया गया। पूरी ताकत लगाकर राउत ने अपनी बाँहों में मुझे उठा लिया, तब गढ़े में डाला था। औरों ने भी हाथ लगा रखे थे। हरे-हरे दो बाँस काट लाये गये थे। एक-एक बाँस को चीर-फाड़कर आठ-आठ लंबी लचीली पितृयां निकाल ली गयी थीं। उन्हीं पितृयां से टटर्ब बुना गया था—गोल टृद्र, बाहर से हरा और अंदर से सफेद। ऐसी हावादर और नफ़िस बाड़ के अन्दर रहने का सौभाग्य कभी प्राप्त होगा, अपने राम ने सपने में भी इस सुन्दर सुरक्षा का ख्याल नहीं किया।
यह लम्बा-चौड़ा रास्ता राजा की सवारी के लिए कभी बनाया था, इसीलिए इसका नाम पड़ गया रजबாँध... समझा न?"
हॉ"—जैकिसुन का माथा (हिला।
बटैसरनाथ ने कहा—"बेटा, घबरा तो नहीं रहा है?"
तरण श्रोता ने इशारे से बतलाया—"नहीं !"
"निद आ रही होगी"—बुजुर् ने हुई में उंगली लगाकर पूछा— "दिन-भर का थाका है न !"
जॉर्कसुन का माथा फिर निषेध की मुद्रा में हिला। उसकी धकावट और नींद आज न जाने कहाँ उड़ गयी थी। बस्सी रपुली में खूब सोनेवाले चार-छ: बहादुर जो थे, उनमें एक जैक्सुन की भी शुमार होती थी। माँ या बहिन या दुलहिन या कोई दूसरा झकझोर-झकझोर-कर उसे उठाते, तभी उसकी आँखें खुलती। झकझोरकर नींद से जगाने-वाला कोई न होता सो सोलह-सोलह घंटे खींच ले जाता जैक्सुन। यों दिन-दोपहर का खाना खाकर तीन घण्टे और रात को सात घण्टे वह सोता ही… और आज तो दिन-भर जैक्सुन इतना ज्यादा भटका था,
सड़कों की इतनी अधिक धूल फांकी थी आज कि तन-मन दोनों ही काबू से बाहर आ गये थे। मगर इस वक्त बाबा बटैसरनाथ के सामने वह अपने को बिलकुल ताँजा-दम महसूस कर रहा था।
बाबा कहने लगा :
"पहले यह बॉँध खूब चौड़ा था, अठाहह हाथ या नौ गज कम नहीं हुआ करते ! अब आधा रह गया है। किनारे-किनारे जिनकी जमीनें पड़ती हैं, कुदालधारी उन चतुरर किसानों की कृपा से इस पुराने राज-मार्ग का कलेवर दिन-पर-दिन कृश होता आया है। छोटा खेतिहर होता एक-आध तो उसकी आँख में उँगली डालकर कोई बता भी देता, और वह मान भी लेता अपना कसूर। लेकिन बड़े किसानों को कौन नाराज़ करे ? क्यों साँप के बिल में कोई अपना हाथ डालेगा ? और बड़े किसान एक-दूसरे की पोल जानते हैं, इसीलिए वे एक-दूसरे के लोभ-लाभ के प्रति काफ़ी हद तक सहनशीलता को पकड़े रहते हैं।
राजा की सवारी किसी जमाने में इस रास्ते गुजरती होगी। आज-कल तो बुरा हाल है बेचेरा का। रपुली से लेकर धर्मियापृती तक, कोस-भर कच्चा—समझ ले डेढ़ मिल ! बस ! उत्तर की ओर फिर भी यह रास्ता-जैसा लगता है, मगर दिक्छन की ओर तो आगे चलकर पतला होता गया है, धर्मियापृती के करीब जाकर इस रजबாँध ने बिल-कुल एक मेड़ की शकल अखिथार कर ली है… ज्ञाने का जादू है यह भी बाबू!
रजबாँध से पूर्व डेढ़ कोस का सपाट मैदान यह देख ही रहा है तू ! बड़ी उपजाऊ है यह सारी जमीन। बीचो-बीच निचली सतह के जो खेत हैं, बरसात के मौसम में वहाँ आज से पचास वर्ष पहले ड्रील लहराया करती थी। बाहर वाले उसे 'बुडिया टाल' कहा करते थे।
भादों का महीना था। वर्ष काफ़ी हो चुकी थी। खेतों में धान के पौधे लहरा रहे थे। मुझे अब ऐसी जगह मिली थी जहाँ में खुलकर साँस ले सकता था। आम-पास कोई बड़ा पेड़ नहीं था। हाँ, गूलर का
एक कुब्जा दरखत मुझसे जरा उत्तर की ओर ज़रूर था। वह पुराना भी काफ़ी था… उसे नजदीक पाकर मुझे खूब तसல்லी हुई थी। एक से दो भला ! मगर बार-बार पूछे जाने पर कभी कुछ नहीं बोला वह ! इससे मैं झुंझला-झुझला उठता था। बाद को पता चला कि यह उसकी लाचारी थी।
पुर्व की ओर इंिल लहरा रही थी। पश्चिम कुछ खेतों में पाट के पीथे लहलहा रहे थे। ऊँची सतह के खेत ही उस और थे जिनमें चीना, सावों और महुआ की फसलें खड़ी थी। दिक्छन मे दूर तक धान के निरोग पौधों की घनी खेती छा रही थी और धर्मियापहरी के लिपी-पुती भीतोंवाले घर जगमगा रहे थे। उत्तर की ओर तो यह तेरी बस्ती रप-उली अब भी नजदीक है और तब भी नजदीक थी। गाँव के बीच-बीच मे बाँसों के झुरमुट, आम-इमली-जামुन और पाकड़-पीपल के चिटपुट पेड़ अपनी इस तिरहुत-भूमि की एक बड़ी विशेषता है।
मैने जो पहली रात यहाँ बितायी, काले पारख की तेरस थी। आस-मान खूब साफ था। कुदरत के उस नीले चंदोवे मे तारों के नफ़्रिस मोती टँके हुए थे।
उस रात में अपने अंदर हरारत महसूस कर रहा था। नींद आ रही थी। पतों की मेरी डठलें सुसत पड़ रही थी और थकावट के मारे नस-नस मे सूनापन-सा छा रहा था।
हवा मे दूध की गंध पाकर इतने में एक गीदड़ आ पहुँचा। बाड़ के बाहर कई चवकर लगाकर बेचारा लौट गया...
भँस की पीठ पर बैठकर किसी चरवाह ने रात के आखिरी पहर मे तान छेड़ी। उस गले मे गजब की मिठास थी बेटा ! उस गीत के कुछ पद मुझे अब तक याद हैं; सुनेगा ?"
जैकिसन का माता होला।
बाबा गुनगुनाने लगा —
"उमर बीत गयी
बाल पकने लग गये पिछले बारह वर्षों से इस आधार में गाँठ बाँध रखी है मैन आने का लेता है तो भी नहीं नाम निठुर मेरा दुसाध...
राजा सलहेस प्रीतम मेरे ! तेरे नाम पर गाँठ बाँध रखी है अपने आँचल से मैने ओ निठुर ! निमोही !!"
गीत के ये पद जैकसुन ने आज तक नहीं सुने थे। यह तो उसे मालूम था कि सलहेस दुसाधों का वीर पुरुष था, महाराज। कुसुमा दोना उसकी प्रेयसी थी। लेकिन सलहेस के बारे मे गाये जानेवाले पद इतने मार्मिक हो सकते हैं, जैकसून को इसकी कोई कल्पना नहीं थी।
उसके चेहरे पर हुलास की रोशनी छा गयी। बाबा उन पदों का यह असर देखकर स्वयं भी पुलिकित हुआ और बोलने लगा :
"फिर मैंने लाख चाहा कि दुबारा कोई ये पद सुना जाय, लेकिन वह लालसा कभी पूरी नहीं हुई बच्चा ! कभी नहीं !! कभी नहीं !!! पता नहीं, उस जवान चरवाह का क्या हुआ ? दूसरी बार फिर उसे कहाँ देख सका ! कुछ दिनों बाद सुना कि बड़े घराने की एक बाल-विधवा उस पर अपना तन-मन निछावर कर चुकी थी। पकड़े जाने पर वह कल कर दिया गया और अगले ही रोज वह लड़की तलाबा में बेजान तिरती पायी गयी।
हम उम्र साथियों की कमी मेरी छोट-छोटी उम्र के चरवाहों से पूरी होने लगी।
अपने बारे में खुद में भी उतना उसुक नहीं रहता जितने कि चर-वोह। वे मुझे दिन-भर घेरे रहते। उचक-उचककर बाड़ के अंदर झाँका" करते। जो बेचारे उचककर भी ऊपर से मुझे नहीं झाँका पाते, बाड़वाले टृदर की सूर्यांशों में अपनी छोटी-छोटी आँखें सटाकर वे देर-देर तक अंदर मेरी शकल-सूरत निहारते रहते। भँसें चराने के लिए लड़के ही आते, लेकिन गाय और बैल चराने के लिए जब-तब लड़कियाँ भी आतीं।
"चौदह-चौदह, सोलह-सोलह साल की लड़कियाँ उचक-उचककर बाड़ के अंदर हाथ डालतीं। अपनी खुरदरी हथेलियाँ वह मेरे तन पर फेरा करतीं, कड़ी उँगलियों से पते हलराती और छूति। घार और ममता-भरी उनकी वह कड़ी परस मेरे लिए संजीवनी सुधा थी। नया दूसरा फूट निकलता तो मुझे खुद उतनी खुशी नहीं होती जितनी कि बस्ति रुपुली की उन अल्हड़ चरवाहिनों को।
"मैला-चींकट, दمیयों पैवन्द-लगा, घुटनों तक का कपड़ा इन छोकियों का पहनावा हुआ करता। सिर पर बालो के सूखे गुच्छे घोसलों-जैसे लगते। गले में नीले काँच के बारीक दानों की एक-आध लड़ी। बाँहों में, घुटनों पर, हाथों पर और पेंट पर गुदना—किसीके न भी होता… अब तो खैर गुदना की रिवाज नाम-भर को रह गयी है, लेकिन उन दिनों यह एक आम रिवाज थी। तेरी परदादी का तो समूचा बदन गुदनों से भरा था !"
बटேसरनाथ कहने लगे :
जेठ की पूर्णमा का चन्दमा आकाश में काफी ऊपर उठ आया था। निचली सतह के खेतों में धान के अंकुर निकल आये थे। चॉँदनी रात में वे ऐसे लग रहे थे मानो सादे मैदान में ब्लू-ब्लेक की स्याही दूर-दूर तक फैला दी गयी हो या कि न दिखायी पड़नेवाले मेघों की छाया पड़ रही हो...
था तो आजकल यह आमों का मौसम, लेकिन प्रकृति देवी अब की नाराजू थी। कसम खाने को भी इस बार आम के पेड़ों में फल नहीं लगे थे। यहाँ-वहाँ चिट-पुट तौर पर दस-पाँच झाड़ों में बोरें निकली भी तो बेकार। चैत की आधियां उन थोड़ो-कुछ अभियों को चौपट कर गयी थी; अचार और चटनी तक आमों की दुर्लभ थी अब की...
आमों का जोर होता तो जैकिसुन कहीं इस तरह बरगद के तले यह रात गुजारता ?
उसके दादा ने मीठे आमों के दस पेड़ लगाये थे। उनमें से छ: अब भी मौजूद थे। पिछले साल उनकी डालें फलों के बोझ से झुक आयी थी। इोपड़ीवाला मकान खड़ा किया था जैकिसुन ने। लाही, टॉर्च और तिकिया-कम्बल लेकर शाम को वह रोज निकल जाता बागा को और। आमों की रखवाली का यह सिलसिला डेढ़-दो महीने तक चला था। आमों के मौसम मे कौन गृहस्थ अपने बाग की रखवाली नहीं करता ?
और, संयोग की बात कहिये या कुछ भी कहिये, अब की आमों की प्रसव-शक्ति एकदम गायब हो गयी थी। लीचीयों के बाद अब बच्चे आमों के नाम जपा करते और उनकी यह बेताबी माँ-बाप के दिल दुखा जाती।
जैकसुन आज दर्भंगा के टावर-चौक से रुपये के दस बड़े आम ले आया था—'बन्दी' आम। लाया तो था बच्चों के नाम पर, लेकिन माँ ने नहीं माना। बोली—"ले ! तू कहाँ का भीखम पितामह है ! तेरे बेटे आम खायेगे तो मेरा बेटा नहीं खायेगा ?" बालती में पड़े थे, उठाकर दो बड़े आम बुढ़िया ने जैकसुन की थाली में डाल दिये…
अहीरों का यह खानदान पिछली पांच पीड़ियों से इकलौता ही चला आया। जैकिसुन अपनी मां का बेटा भी था, बेटी भी था; जेठा- मँझला और छोटा सब-कुछ अकेला वही था। हाँ, अब आकर इस पीड़ी में दैव की दया से दो बच्चे हुए थे और एक फिर होनेवाला था।
"ऐसे नहीं अம்मा, खाकर देख !" जैकिसुन आँखें फैलाकर बोला तो उसने कहा—"तो छोड़ थोड़ दूगी इन्हें ? एक बहु खायेगी, एक मैं... भला, कहाँ के हैं ये आम ?" हाथ-मुँह धोकर आया तो फिर जैक्सीन ने मां से कहा—"दरभंगा में महाराज के खास बाग हैं कई। यह वही के आम हैं। जर्मनी दीं तो अब सरकार ले रही है। इन बागों के फल पहले कभी नहीं बिके, दरबारियों और बड़े अफसरों के यहाँ सीगात की तौर पर पहुँचते थे। अब महाराज को दिखलावे की उतनी परवाह नहीं है जितनी कि स्टेट की ज्यादा-से-ज्यादा चीज-बस्त ओने-पौने दाम पर बेचकर नगद रकम बना लेने की है… यह आम भी शायद इसीलिए बाजार में मिल गया है अम्मा !"
सो, अब तक जैकिसुन के दाहिने हाथ से 'बम्बई' की खुشबू आ रही थी। उसका जी हुआ कि बाबा को अपना हाथ सूचा दे।
बाबा देर तक उसके दाहिने हाथ से 'बम्बई' आम की सुगन्ध लेता रहा और नथने फड़काता रहा। अपना भारी माथा हिलाकर बटेसरनाथ बोला :
"आम की ऐसी बिढ़िया खुشबू तो मेरे लिए बिक्लुल नयी बात है बेटा ! अपन तो सीधे-सादे ढंग के देहाती बरागद ठहरे ! क्या पता कि कैसा दिव्य फल आज तूने खाया… इतना तो मालूम हो गया कि यह बम्बडिया किसम का कलमी आम रहा होगा कोई; जेठ महीने की अमावस सुहागिन औरतों के लिये त्यौहार की तिथि हुआ करती है। उस दिन वे हमारी पूजा करती हैं। बड़े घरानों की सधवा सिर्या थालों में 'बबई'-आम के कतरे सजाकर न जाने कितना नैवेध प्रतिवर्ष मेरे सामने रखती आयी हैं ! परन्तु तेरे हाथ से जो सुगन्ध आरही है वह तो गजब की है ?"
जैकिसुन मसोसकर रह गया कि होठ खुले और वह बतलाये इस आम के बारे में !
क्षण-भर बाद बाबा खुद ही कहने लगा :
"सुना है, दर्भणा और मधुबनी के बाजारों में अब उन बागों के फल बिकने आते हैं, साधारण लोगों तक जिनकी हवा तक कभी नहीं पहुँची। पहरेदारों की कड़ी निगरानी के कारण गोरिया तक जिसमे कभी चोंच न डाल सकीं, उन पोखरों की रपहली मछलियाँ अब तराजू पर सरे-आम तुलती हैं। जाते-जाते भी ये राजा, जर्मीदार, भूस्वामी, सामन्त चाँदी काट रहे हैं। घोड़े की कीमत पर वे हाथी हटा रहे हैं, बछड़े की कीमत पर घोड़ा; और बछड़ा ?
"बछड़ा बिलली की कीमत पर !
"दरी की कीमत पर शामियाना बिक रहा है, रमाल की कीमत पर दरी बिक रही है !
"तांबा, पीतल और कांसा के दस-दस बीस-बीस मन वज़नोंवाले बर्तन रातों-रात ठोरेों के यहाँ पहुँचाये जा रहे हैं !
"और तेरी यह आज़ाद सरकार इन सामन्ती श्रीमन्तो को ज्यादा-से-ज्यादा हरजाना देने की तिकड़ में भिड़ा रही है। व्यक्तिगत सम्पति के वाजिब हकों का दायरा बेहद बढ़ाकर जर्मीदारी प्रधा का यह जो नकली श्राद्ध कोग्रेसी लोग कर रहे हैं, क्या नतीजा निकलेगा इसका ?"
জীকিসুন গর্দন ঊঁষী করকে বাবা কে চেহরে কী আর দেখনে লগা। ইনই কিতনী বাতে মালুম হে ! উসকে বিস্ময় ক আই অন্ত নহী থা। লেকিন অধী জীকিসুন অনেে মুছ সে পুরানে জমানে কে বোর্বে মে সুমননা কাহতা খা। মৌজুদ সভালো কী অন্ডিয়াঁ তো হত যুবদ খী রোজ उधेड़ा करता। बस्ती रपउली के अंदर आधा दर्जन ऐसे जवान थे जो शासन की वर्तमान व्यवस्था के निदुर आलोचक थे। मगर ठीक-ठिकाने मे पिछली बातें बतानेवाला वहाँ कोई नहीं था।
"அஹ்மெரீ ஷெ முஈஸல ஐிதணீ மேடீதி ஷே ஞயீ ஞிபா। ணீஷெ கி ஞிண தஷனியோ கெ ஞாஞத ெ ஞிஷ ஞவாஷ ஞஷ ஞஞ ஞஞ ஞஞ ஞஞ
"अब मेरी चार-पाँच डाले हो गयी थीं। टहनियाँ तो बीसियों थीं। पते बड़े-बड़े, जिनकी चिकनी हरियाली आँखों वाली को जुड़ाती थीं; नये-नये पते अपनी गदारी मूरत के कारण उगते सूरज और दहकती आग के अंदर दाह पैदा कर देते।
"जो हाथी के पोड़ दाँतों की मूरत होती है, उन दिनों मेरी छालों की वही मूरत थी। भीनी-भीनी-सी पगेली खुशबू उन छालों की एक गन्ध गूधी थी। जो भी करीब आता, नथने फैलाकर गहरी साँस खर्चा करता। घर लौटने के बाद मवेशी की ओर लौटनेवाले डोर-डंगर मुझे जस्र सूचते जाते।
"उस वर्ष पहली बार मेरी तहिनयों में फिलियाँ लगी थीं। पकने पर जंगली गूलर के फलों-जैसी लाल-सुख और उतनी ही बड़ी दिखायी देती थी।
"राउत ने देखा तो बोले—'मस्से भींग रही है इसके तो अब !"
"यह सुनकर शर्म-सी लगी मुझे ! नये पतों की लाली फैलकर मानो कन्धों तक आ पहुँची।
" 'अरे, किसी ने सुन तो नहीं लिया राउत ने जो कुछ कहा ?' मैने देखा, आस-पास कोई नहीं था। उधर, एक तरफ को वही बुढ़ा-बोना गूलर अपना इसख मार रहा था।
"अगले ही दिन राउत ने मौलिसरी के ताँजा फूलों की माला डाल दी मेरे गले मे।
"लेकिन वह माला दो ही रोज मेरे सीने पर झूल पायी बेटा !
जैकिसुन ने प्रश्नूचक दृष्टि से बाबा की तरफ देखा। बटेसरनाथ के चेहरे पर कुढ़न या परेशानी नहीं, बल्कि अन्नेसा निखर आया था… वह अन्नेसा जो कमिसन छोकरों की तरफ बुजुगों मे देखा जाता है।
बाबा जरा-सा डिठके, फिर बोलने लगे : "इससे पहले कोई जवान औरत इस कदर मेरे करीब कहाँ आयी थी ! नहीं बेटा, नहीं आयी थी ऐे ! फिर व्या हुआ ?"
"हुआ यह कि तरण नारी-देह की विलक्षण गन्ध पाकर मेरी रग-रग स्पिंदत हो उठी, पते जल्द-जल्दी हिलने लगे और टूसों की कोखे दहकने लगी।
"बिलकुल पास आयी तो मेरे कन्धे पर दाहिना हाथ डाला और कुछ सोचने लगी। मुझे महसूस हुआ कि ज्यादा देर तक अगर इसने अपना हाथ मेरे कन्धे पर रखा तो छालें पानी-पानी होकर बह जायेगी…
"जल्दी-जल्दी में उसने वह माला उतार ली। उत्तर क्या ली ? जहाँ उसमे धागे की गाँठ थी, वहाँ से उसे तोड़ डाला। तकलीफ तो मुझे ज़रूर हुई। आखिर राउत ने उतने घार से मौलिसरी के फूलों की वह माला मेरे लिए बनवायी थी और खुद अपने हाथों से इस गले में डाला थी ! मगर यह सोचकर कि चलो, बेचारी अपने प्रीतम को रिखायेगी इस माला के जरिये, अपने-आपको तसல்லी दे ली।
"मेरे गले से माला नदारद देखकर तेरे परदादा को बेहद रंज हुआ था।
"उसी वर्ष, मंचार के महीने में तेरा दादा पैदा हुआ। बूढ़ पंडितराज का आशीर्वाद चार साल बाद लोगों के सामने था।
"फसल उस बार ऐसी अच्छी आयी थी कि किसानों के रोएं-रोएं से खुशी का फखारा छूटता था। ऐसा लगता था कि कम-स-कम गाल-भर तो अब के लक्ष्मी महारानी का पवासन इसी इलाके में रहेगा। राजा खुश था। जर्मीदार खुश थे। गृहस्थ खुश थे। बिनहार और मजदूर खुश थे। अधिक भिश्मा की आशा मे भिखमंगों की भी खुशियों का ठीकाना नहीं था। तीर्थों के पण्डे और मंदिर के पुजारी उससाह में भर उठे थे, उनकी श्रूद्रा-भक्ति गहरी हो आयी थी।
उस ज्माने में तेरी बस्ति की आबादी इतनी ज्यादा नहीं थी। कुल मिलाकर सतर परिवार थे। बच्चे-बूढे-जवन-अधेड़ सभी औरत-मदों की तादاد तीन सौ से ऊपर नहीं थी। लोग मजबूत काठी के हुआ करते थे। बीमारियों की यह किचिर-किचिर हमेशा नहीं लगी रहती थी। आजकल की अपेक्षा रहन-सहन उन दिनों कहीं ज्यादा सादा था। मिजई, दुपलिया टोपी, चमरोधा जूता और पतले बाँस की नकुली छड़ी, जिसका सिर चாँदी के पत्थर से मदा होता—मझली और ऊँची हैसियतवालों का यही बाना था। राजा, बाबू-बबुआन, जर्मनार, दीवान और राज-पुरोहित-राजपिडित लोग छोटे लाट की दरवारदारी मे जाते तो चुस्त पाजामा, शेरवानी, पेचदार पगड़ी और दिल्लीवाले जूतों में हुआ करते।
"पूस-माघ मे उस वर्ष धान जब खलीहान मे तोला गया, तो मालूम हुआ कि तीन गुनी उपज हुई थी। लोगों ने अनाज बेच-बेचकर कर्ज की पिछली रकमें चुकायी और शादी-ब्याह, मूड़न-छेदन, जनेऊ-उपनयन, तीर्थ-व्रत वैरैरह कामों में खुलकर खर्च किया।
"राउत की खेती-गिरिसरी खूब साफ-सुथरी थी। शायद ही उसे कभी कर्ज लेना पड़ा हो। बेर-कुबेर के लिए वह चार पैसे सँभालकर रखता था। कभी मैंने तेरे परदादा को हाय-हाय करते नहीं पायी। उस साल रुपये का चार मन धान बिका था। राउत चाहता तो सौ मन बेच लेता, लेकिन नहीं। क्या ज़रूरत थी रपयो की ! सुखा-सुखकर सौ मन धान तेरी परदादि ने कोठार मे डाल ली। "अभी रेल नहीं खुली थी। जाने-आने के लिए हाथी, घोड़ा, ऊँट, बैलगाड़ी, पालकी-तामदान, सगड़ या इकका और खटेला वंगैरह की मदद ली जाती थी। इस साल चैत में वासणी का परब आया तो राउत पाँव-पैदल गंगा नहीं आये—सिमरिया घाट जाकर। गंगाजल और गमामाटी लाये थे साथ। चुल्लू-भर गंगाजल उन्होंने मुझ पर भी चिड़क दिया और तनिक-सी गंगामाटी सीनै में लगा दी। वह अकेले नहीं गये थे, गंगा, गाँव के दस-बारह आदमी जोट बाँधकर गये थे—बोलते-बित्याते और हँसते-गतो। चावल-दाल, नमक-मिच, घी-तेल... सीधा का सारा सामान था। वर्तन भी साथ थे—तसला, बटलोई, कड़ाही, कलछी, थाली-बाटी, लोटा-गिलास। जमात मे दो औरतें थीं, इससे रसोंई-पानी का बड़ा आराम रहा। दो दिन जाने में, दो दिन आने मे। दो रोज घाट पर गंगा मइया की गोदी मे। महीनों इसी का बखान चलता रहा। जो नहीं जा सके थे वे मुँह वा-वाकर सुना करते; जो लोग हो आये थे, यात्रा की चर्च करते-करते उनकी जीभ थकना मानो जानती ही नहीं थी।
"राउत ने अब मेरी जड़ों में गोल-मोल-सा एक छोटा चबूतरा बना दिया।
"हर सोमवार की सबेरे आकर तेरी परदादि मेरी जड़ों में लोटा-भर जल ढालने लगी तो इससे मैं बहुत खुश हुआ।
"अगले वैशाख में राजा के मँडले कुमार की शादी हुई। शुकल पक्ष की दशमी थी। बारात इसी रास्ते गुज़री थी। नौकर-चिकार मिलाकर सौ आदमी रहे होंगे। कन्धों पर बाँस रखकर सोलह बेगार भारी-सी एक तखतापेश दोये जा रहे थे, उस पर दरी और राजाजम बिछी थी। मय साज-बाज के एक रंडी उस तखतापेश पर नारि श्री थी—तबला-डुगि, सारंगि, मंजिरा सब साथ दे रहे थे… वैसा अद्रुत दृश्य मैने फिर कभी नहीं देखा बेटा ! न, कभी नहीं !!"
जॉर्जसुन को अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ...बारात मे साथ चलते वेगारों के कन्धे ! कन्धों पर बाँस और बाँसों पर तछतापोश ! तछतापोश पर साज-बाज समेत एक बाईजी नाच रही हैं और राजा का बेटा व्याह करने जा रहा है...
कैसी अजीब बात सुना रहे हैं बाबा—जैकसुन ने सोचा और उसके रोगटे खड़े हो गये।
दम मारकर बाबा कहने लगा :
"आज तो इन बातों पर सहसा विश्वास नहीं करेगा कोई, किन्तु सौ वर्ष पहले दर-असल अपने इन इलाकों में जर्मीदार सर्वसर्वा हुआ करता था। रिआया से बेठ-बेगार लेना उसका सहज अधिकार था… वह रोब ! वह दबदबा ! वह अकड़ ! वह शान ! वह तानाशाही ! वह जोर ! वह जुलम ! क्या बताऊँ, बेटा ?
"छोटी ओकात के और नीची जात के लोगों को तो खैर वह कीड़-मकोड़ समझता ही था, अच्छी-अच्छी हैसियत के भले-खासे व्यक्तियों से वक्त-बेवक्त नाक रगड़वाता था ज़मीदार।
"औसत हैसियत का एक गृहस्थ था शत्रुमर्दन राय। अरे, इसी जीवनाथ का दादा..."
जैकिसुन ने सोये हुए एक जवान की ओर निशाह फेरी—जीवनாथ ! अजी, यह जीवनाथ तो उसका साथी था। दर्जि आठ तक पढ़ा-লিखा और अब मेहनती किसान... दुनाइ पाठक और जैनरायन की आँखों का काँटा... तो, इसके दादा के साथ जर्मीदार ने कोई बदसलूकी की होगी—
"गाढ़ी नींद सो रहा है जीवनाथ। बड़ा मेहनती और इमानदार लड़का है। इसकी सूड-समझ भी काफी पैनी है ऐं" "हाँ बाबा!"—मन-ही-मन जैकिसुन बोला, "यही तो हमारा लीडर है..."
"बस्ती रपउली मे आम लोगों के दुःख-सुख की जैसी चिन्ता यह पट्टा रखता है, उसका दसवाँ हिस्सा भी अभी तेरे अंदर मैं नहीं पाता हूँ। क्यों, है न ठीक ?"
बाबा ने कहा:
"शत्रुमंदन राय सीधा-साधा महनती खेतिहर था। उसके बाप ने राजावहादुर रमादतसिंह से तीस रुपये सूद पर लिये थे। वाप कर्जों की वह रकम नहीं चुका सका। कर्जों की रकम सूद-दर-सूद का पैसा-अध्छा पी-पीकर मोटी होती गयी। अपनी ईमानदारी और पैनी सूड-बूझ के कारण शत्रुमंदन राय गेंवंई पंचायत का बेजोब्जा मुखिया समझा जाता था।
"पिडित चन्द्रमणि का छोटा घेवता अपने नाना और भाई के बल पर लुच्चों का सरगना हो उठा था। गाँव की बहु-बेटियों की आवसर उत्तरना, भरे तालाब की निकास का रास्ता खोलकर रातों-रात मछलियाँ भगा देना, बाग के नये पेड़ कटवा डालना, मैस और बैल लापता कर देना, किसीके खिलाफ झूठ-मूठ जर्मीदार के कान भरना... कोई भी कुकर्म उससे छूटा नहीं था।
"गाँव की पंचायत ने एक बार उसे मामूली सजा दी—सजा क्या दी, दो रुपये का जुरमाना होक दिया। बाकी पंच दुविधा मे थे, लेकिन श्रुमर्दन राय ने साफ-साफ कहा—चाहे कुछ हो, हमें बंगेर किसी हरियायन के इस वलिभद्र से कैफ्रियत तलब करनी चाहिए..." बलि-भद्र रायजी पर वड़ा गुम्मा हुआ और उठकर चला गया। रायजी ने जोर डाला तो पंचायत ने मुजिरम पर दो रुपये का जुरमाना होका।
"राजावाहदुर का छोटा भाई विलभ्रद को खूब मानता था। इस तरह, उसके लिए शत्रुमदन राय के खिलाफ मालिक के कान भरना-भरवाना बाएँ हाथ का मेल था।
"आखिर राजावहादुर के कान रायजी के खिलाफ खूब भरे गये।
"राजावहादुर के दरवार मे दस भोजपुरीया लठेत 'घादा' के नाम पर पलते थे।
"एक रोज सबेरे एक घादा राज्यजी के घर आ धमका—तलवी है बाबू शत्रुमदन राय की !"
বিচ্ছু কে ডক-সী কড়ি মুষ্ঠে, সিল-সা সপাচ সীনা...ছোট-ছোটি আঁষ্ঠে, ছোট-ছোট বাল, তণড়ি ঈিল আঁর কছাতর ঈিল ! সাড়ে চার হাথ কি ঝঁষী লহ সঁধালে—সরসো কা তেল যুড়ি-যুড়িকর পীতি হুই লুহ ! কিসীন সহমতে-সহমতে পুঁচ দিয়া—"ক্যা নাম নে আপক সিপার্থী জী ?"
"हवलदार पांडे...' अकड़ी हुई आवाज लोगों के कानों से टकरा गयी। डेढ़ सेर चावल, पावभर दाल, दो सेर की ताजी हरी लौकी और ऊपर से एक अधला... सिंपाही जी को आसामी की तरफ से सीधा मिला और जवाब मिला—"कल हाजिर होऊँगा।"
"रायजी समझ तो गये ही कि क्या होनेवाला है और इसके पीछे कौनसा सूत्र काम कर रहा है !
"वह दिन-भर परेशान रहे कि कहीं से चालीस रुपये जैसे भी मिल जायें, लेकिन कोई सूरत नहीं निकली। बेटा, वह रपयों का जमाना तो था ही नहीं, जिनसों और मालों का जमाना था। रुपये मे तीन-तीन चार-चार मन तक धान मिलते थे; दो-दो डाई-डाई मन चावल ! सात सैर, छ: सैर धी लाता था, डेढ़-दो मन गुड़। कोडियाँ पैसों की जगह इस्तेमाल होती थी ! नोट का चलन बिलकुल नहीं हुआ था... आज तो एक बीधा उपजाऊ जमीन डाई-दाई तीन-तीन हजार रुपये पर उठती है ! उन दिनों पच्चीस रुपये मिलते थे एक बीधा धनहर खेत के। आज तेरी बस्ती के पचासों आदमी बाहर रुपये कमा रहे हैं। यहाँ के किसान हर-साल अनाज बेचकर हजारों की खड़ी रकम बनाते हैं !
"जी कड़ा करके अगले दिन सबेरे वह राजावहादुर के सामने हाजির हुआ। हाथ जोड़कर बोला—'हुजूर ! गरीवेनवाज ! उतनी रकम के बदले जमीन कवालों का लीजिये ! दुहाई सरकार की ! या फिर, दो महीने की मुहलत मिले…"
"गदन-समेत माथा हिलाकर राजावाहदुर ने कहा—'हूँ ऊँ"
"करीब ही खड़ा था मुंशी तुरन्तलाल दास। वह राजावहादुर का महामन्यी था। उसका वाप मुंशी कृष्णालल दास राजावहादुर के पिता गौरौदत सिंह का दीवान था। पुश्तेनी राज-भक्ति पक चुकी थी।
"दासजी ने राजावहादुर के राजसी ख्याल पर शान चढ़ाने की नीयत से कहा - 'हुजूर, मुहलत तो कई बार यह ले चुके हैं।"
"हाँ ऊँ ऊँ"—राजावाहदुर ने पतली मूछों पर बाएं हाथ की दो उंगलियों से दुतरफा ताव देते हुए कहा। रायजी बेचारे उसी तरह हाथ जोड़ खड़े रहे। क्षण-भर बाद मालिक ने आँखें तिरछी करके दीवानजी को इशारा किया कि असमी को यहाँ से ले जाओ...
"बेटा, यह सामने से हटाने-भर का इशारா नहीं था। यह आशा थी श्रुमर्दन राय पर वर्णरा बरतने की !
"सदर दरवार की बाई ओरवालா दरवाजा पार करके एक पुराना पकका मकान था। तख्तों की बनी बड़ी-बड़ी सन्दूकें पिहियों पर खड़ी रखी थी बरामदों में। आँगन का चौक खाली था।
"शत्रुमदन राय को बीच आँगन में खड़ा कर दिया गया।
"लघु लिये हुए चार सिंपाही सामने मुस्तेद थे।
"बाँहाँ को माथे के ऊपर खड़ा करके एक सिपाही ने बाँध दिया। दो गज के फ्रासले पर दो इंट डाल दी गयी। एक इंट पर एक पैर, दूसरी पर दूसरा पैर। इस तरह रायजी खड़े किये गये। यमदूत-सी मूछोंवाला एक अधेड़ भोजपुरिया जमादार कोड़ा लिये नजदीक आया। दूसरी ओर से एक और आदमी आया, जिसके हाथ में मुँह-बन्द हाँडी थी।
"जर्मनीदार का इशारा पाकर वह श्रुमर्दन के बिलकुल करीव पहुँचा और हॉर्डी का मुँह खोलकर लाल चீटों का छना निकाल लिया। छन्ते मे डोरी तंगी थी। उसने खाली हाँडी नीचे जमीन पर रख दी और बिलबिलाते लाल चीटोंवाला आम के अधसूखे पतों का वह घोंसला राज्यजी के माथे पर टिकाया; ऊपर डोरी पकड़े रहा...
"चिटें ह�ारों की तादाद में शत्रुमदन राय की देह पर फैल गये।
"माथा हिलाकर बेचारे न बंदे हाथों को ऊपर-ऊपर झटकने की कोशिश की कि पीठ पर कोड़े पड़े—सपाक्-सपाक् ! चार बार !!
"खवरदार !" जमादार गरज पड़ा, 'अपनी खैर चाहते हो तो वैसे-के-वैसे खड़े रहो, वरना…" "आँख, नाक, कान, मुँह, होठ, गदन, कपार—और बाकी समूचे बदन से चिपक गये लाल चीटे ! थोड़ी देर तक श्रुमर्दन राय हाय-हाय होय-होय हुई-हुई करता रहा। एक साथ हजारों की संख्या में चलती-फिरती भूखी-यासी जहरीली सुडयों ने लाचार आदमी पर हमला कर दिया था।
"वह असल राजपूत था बेटा ! इतना कुछ गुजरा उस पर, लेकिन 'माफी' की बात मुँह से नहीं निकली। बलिभद्र भी उस वक्त वहीं अंदर महल में था। यही सोचकर तो वह दुष्ट उस वक्त वहाँ मौजूद था कि रायजी कहीं नाक रागड़ने लग जायें, माफी माँगने लगें तो कर्ज की कुल रकम बलिभद्र जमा कर देगा।
"लेकिन दुष्ट के मनसूबे पूरे नहीं हुए।
"श्रुमर्दन राय अपना बदन लाल चीटों से बिधवाता रहा। छट-पटाता रहा और दाँतों-पर-दाँत बैठाकर चुभन व जलन पचाता रहा। हिलता-डुलता रहा और कोड़े खाता रहा...
"आखिर वह बेहोश होकर गिर पड़ा।
"और जिस समय श्रुमर्दन पर यह वर्णता ढायी जा रही थी, ठीक उसी वक्त महलों में राधाकृष्ण की युगल-जोड़ी के सामने मीठी आवाज-वाले एक पुराणपाठी महानुभाव राजमाता सांहिता को श्रीमद्वागवत की रास-पज्चाध्यायी सुना रहे थे।
"इस घटना के चार-छह दिन बाद एक शाम को राउत अपने दो-तीन भीतों से यह सब सुन रहे थे...तब से जर्मीदारों के प्रति मुझे घोर घृणा हो गयी बेटा!"
"करते। जो बेचारे उचककर भी ऊपर से मुझे नहीं झாँक पाते, बाड़वाले टृदर की सूरखों में अपनी छोटी-छोटी आँखें सटाकर वे देर-देर तक अंदर मेरी शकल-सूरत निहारते रहते। भँसं चराने के लिए लड़के ही आते, लेकिन गाय और बैल चराने के लिए जब-तब लड़कियां भी आतीं।
"चौदह-चौदह, सोलह-सोलह साल की लड़कियाँ उचक-उचककर बाड़ के अंदर हाथ डालतीं। अपनी खुरदरी हथेलियाँ वह मेरे तन पर फेरा करतीं, कड़ी उँगलियों से पते हलराती और छूती। घार और ममता-भरी उनकी वह कड़ी परस मेरे लिए संजीवनी सुधा थी। नया दूसरा फूट निकलता तो मुझे खुद उतनी खुशी नहीं होती जितनी कि बस्ति रपुली की उन अलहड़ चरवाहिनों को।
"मैला-चींकट, दمیयों पैवन्द-लगा, घुटनों तक का कपड़ा इन छोकियों का पहनावा हुआ करता। सिर पर बालो के सूखे गुच्छे घोसलों-जैसे लगते। गले में नीले कांच के बारिक दानों की एक-आध लड़ी। बाँहों में, घुटनों पर, हाथों पर और पेंट पर गुदना—किसीके न भी होता… अब तो खैर गुदना की रिवाज नाम-भर को रह गयी है, लेकिन उन दिनों यह एक आम रिवाज थी। तेरी परदादी का तो समूचा बदन गुदनों से भरा था !"
बटेलसरनाथ कहने लगे :
जेठ की पूर्णमा का चन्दमा आकाश में काफी ऊपर उठ आया था। निचली सतह के खेतों में धान के अंकुर निकल आये थे। चॉँदनी रात में वे ऐसे लग रहे थे मानो सादे मैदान में ब्लू-ब्लेक की स्याही दूर-दूर तक फैला दी गयी हों या कि न दिखायी पड़नेवाले मेघों की छाया पड़ रही हों...
था तो आजकल यह आमों का मौसम, लेकिन प्रकृति देवी अब की नाराजू थी। कसम खाने को भी इस बार आम के पेड़ों में फल नहीं लगे थे। यहाँ-वहाँ छिट-पुट तौर पर दस-पाँच झाड़ों में बोरें निकली भी तो बेकार। चैत की आधियां उन थोड़ो-कुछ अभियों को चौपट कर गयी थी; अचार और चटनी तक आमों की दुर्लभ थी अब की...
आमों का जोर होता तो जैकिसुन कहीं इस तरह बरगद के तले यह रात गुजारता ?
उसके दादा ने मीठे आमों के दस पेड़ लगाये थे। उनमें से छ: अब भी मौजूद थे। पिछले साल उनकी डालें फलों के बोझ से झुक आयी थी। इोपड़ीवाला मकान खड़ा किया था जैकिसुन ने। लाही, टॉर्च और तिकिया-कम्बल लेकर शाम को वह रोज निकल जाता बागा को और। आमों की रखवाली का यह सिलसिला डेढ़-दो महीने तक चला था। आमों के मौसम मे कौन गृहस्थ अपने बाग की रखवाली नहीं करता ?
और, संयोग की बात कहिये या कुछ भी कहिये, अब की आमों की प्रसव-शक्ति एकदम गायब हो गयी थी। लीचीयों के बाद अब बच्चे आमों के नाम जपा करते और उनकी यह बेताबी माँ-बाप के दिल दुखा जाती।
जैकसुन आज दर्भंगा के टावर-चौक से रुपये के दस बड़े आम ले आया था—'बन्दी' आम। लाया तो था बच्चों के नाम पर, लेकिन माँ ने नहीं माना। बोली—"ले ! तू कहाँ का भीखम पितामह है ! तेरे बेटे आम खायेगे तो मेरा बेटा नहीं खायेगा ?" बालती में पड़े थे, उठाकर दो बड़े आम बुढ़िया ने जैकसुन की थाली में डाल दिये…
अहीरों का यह खानदान पिछली पांच पीड़ियों से इकलौता ही चला आया। जैकिसुन अपनी मां का बेटा भी था, बेटी भी था; जेठा- मँझला और छोटा सब-कुछ अकेला वही था। हाँ, अब आकर इस पीड़ी में दैव की दया से दो बच्चे हुए थे और एक फिर होनेवाला था।
"ऐसे नहीं अம்मा, खाकर देख !" जैकिसुन आँखें फैलाकर बोला तो उसने कहा—"तो छोड़ थोड़ दूगी इन्हें ? एक बहु खायेगी, एक मैं... भला, कहाँ के हैं ये आम ?" हाथ-पूँह धोकर आया तो फिर जैक्सीन ने मां से कहा—"दरभगा में महाराज के खास बाग हैं कई। यह वही के आम हैं। जर्मीदारी तो अब सरकार ले रही है। इन बागों के फल पहले कभी नहीं बिके, दरबारियों और बड़े अफसरों के यहाँ सीगात की तौर पर पहुँचते थे। अब महाराज को दिखलावे की उतनी परवाह नहीं है जितनी कि स्टेट की ज्यादा-से-जाया चीज-बस्त ओने-पौने दाम पर बेचकर नगद रकम बना लेने की है… यह आम भी शायद इसीलिए बाजार में मिल गया है अम्मा !"
सो, अब तक जैकिसुन के दाहिने हाथ से 'बम्बई' की खुशबू आ रही थी। उसका जी हुआ कि बाबा को अपना हाथ सूचा दे।
बाबा देर तक उसके दाहिने हाथ से 'बम्बई' आम की सुगन्ध लेता रहा और नथने फड़काता रहा। अपना भारी माथा हिलाकर बटेसरनाथ बोला :
"आम की ऐसी बिढ़िया खुشबू तो मेरे लिए बिक्लुल नयी बात है बेटा ! अपन तो सीधे-सादे ढंग के देहाती बरागद ठहरे ! क्या पता कि कैसा दिव्य फल आज तूने खाया… इतना तो मालूम हो गया कि यह बम्बडिया किसम का कलमी आम रहा होगा कोई; जेठ महीने की अमावस सुहागिन औरतों के लिये त्यौहार की तिथि हुआ करती है। उस दिन वे हमारी पूजा करती हैं। बड़े घरानों की सधवा सिर्या थालों में 'बबई'-आम के कतरे सजाकर न जाने कितना नैवेध प्रतिवर्ष मेरे सामने रखती आयी हैं ! परन्तु तेरे हाथ से जो सुगन्ध आरही है वह तो गजब की है ?"
जैकिसुन मसोसकर रह गया कि होठ खुले और वह बतलाये इस आम के बारे में !
क्षण-भर बाद बाबा खुद ही कहने लगा :
"सुना है, दर्भंगा और मधुबनी के बाजारों में अब उन बागों के फल बिकने आते हैं, साधारण लोगों तक जिनकी हवा तक कभी नहीं पहुँची। पहरेदारों की कड़ी निगरानी के कारण गोरिया तक जिसमे कभी चोंच न डाल सकीं, उन पोखरों की रपहली मछलियाँ अब तराजू पर सरे-आम तुलती हैं। जाते-जाते भी ये राजा, जर्मीदार, भूस्वामी, सामन्त चाँदी काट रहे हैं। घोड़े की कीमत पर वे हाथी हटा रहे हैं, बछड़े की कीमत पर घोड़ा; और बछड़ा ?
"बछड़ा बिलली की कीमत पर !
"दरी की कीमत पर शामियाना बिक रहा है, रमाल की कीमत पर दरी बिक रही है !
"तांबा, पीतल और कांसा के दस-दस बीस-बीस मन वज़नोंवाले बर्तन रातों-रात ठोरेों के यहाँ पहुँचाये जा रहे हैं !
"और तेरी यह आज़ाद सरकार इन सामन्ती श्रीमन्ति को ज्यादा-से-जाया हरजाना देने की तिकड़ में भिड़ा रही है। व्यक्तिगत सम्पति के विजिब हकों का दायरा बेहद बढ़ाकर जर्मीदारी प्रथा का यह जो नकली शब्द कार्गेसी लोग कर रहे हैं, क्या नतीजा निकलेगा इसका ?"
जॉर्जसुन गदन ऊँची करके बादा के चेहरे की ओर देखने लगा। इन्हें कितनी बातें मालूम है ! उसके विस्मय का कोई अन्त नहीं था। लेकिन अभी जॉर्जसुन उनके मुँह से पुराने जमाने के बारे मे सुनना चाहता था। मौजूदता सवालों की अंतिड्याँ तो वह खुद भी रोज उधेड़ा करता। बस्ती रपउली के अंदर आधा दर्जन ऐसे जवान थे जो शासन की वर्तमान व्यवस्था के निदुर आलोचक थे। मगर ठीक-ठिकाने मे पिछली बातें बतानेवाला वहाँ कोई नहीं था।
"அஹ் ஹீ ஷஹ ஹஷ ஹஷ
"अब मेरी चार-पाँच डाले हो गयी थीं। टहनियाँ तो बीसियों थीं। पते बड़-बड़, जिनकी चिकनी हरियाली आँखों वाली को जुड़ाती थीं; नये-नये पते अपनी गदारी मूरत के कारण उगते सूरज और दहकती आग के अंदर दाह पैदा कर देते।
"जो हाथी के पोड़ दाँतों की मूरत होती है, उन दिनों मेरी छालों की वही मूरत थी। भीनी-भीनी-सी पगेली खुशबू उन छालों की एक गन्ध गूधी थी। जो भी करीब आता, नथने फैलाकर गहरी साँस खींचा करता। घर लौटने के बाद मवेशी की ओर लौटनेवाले डोर-डंगर मुझे जस्त्र सूचते जाते।"
ज़रुर सूचते जाते हैं।
"उस वर्ष पहली बार मेरी तहिनयों में फिलियाँ लगी थीं। पकने पर जंगली गूलर के फलों-जैसी लाल-सुख और उतनी ही बड़ी दिखायी देती थी।
"राउत ने देखा तो बोले—'मस्से भींग रही है इसके तो अब !"
"यह सुनकर शर्मा-सी लगी मुझे ! नये पतों की लाली फैलकर मानो कन्धों तक आ पहुँची।
"अरे, किसी ने सुन तो नहीं लिया राउत ने जो कुछ कहा ? मैने देखा, आस-पास कोई नहीं था। उधर, एक तरफ को वही बुढ़ा-बोना गूलर अपना झख मार रहा था।
"अगले ही दिन राउत ने मौलिसरी के ताजा फूलों की माला डाल दी मेरे गले मे।
"लेकिन वह माला दो ही रोज मेरे सीने पर झूल पायी बेटा !
जॉर्जसुन ने प्रश्नसूचक दृष्टि से बाबा की तरफ देखा। बटेसरनाथ के चेहरे पर कुढ़न या परेशानी नहीं, बल्कि अन्नेसा निखर आया था… वह अन्नेसा जो कमिसन छोकरों की तरफ बुजुगों मे देखा जाता है।
बाबा जरा-सा डिठके, फिर बोलने लगे : "इससे पहले कोई जवान औरत इस कदर मेरे करीब कहां आयी थी ! नहीं बेटा, नहीं आयी थी रे ! फिर व्या हुआ ?"
"हुआ यह कि तरण नारी-देह की विलक्षण गन्ध पाकर मेरी रग-रग स्पन्दित हो उठी, पते जल्द-जल्दी हिलने लगे और दूसरों की कोखे दहकने लगी।
"बिलकुल पास आयी तो मेरे कन्धे पर दाहिना हाथ डाला और कुछ सोचने लगी। मुझे महसूस हुआ कि ज्यादा देर तक अगर इसने अपना हाथ मेरे कन्धे पर रखा तो छालें पानी-पानी होकर वह जायेगी…
"जल्दी-जल्दी में उसने वह माला उतार ली। उत्तर क्या ली ? जहाँ उसमे धागे की गाँठ थी, वहाँ से उसे तोड़ डाला। तकलीफ तो मुझे ज़रूर हुई। आखिर राउत ने उतने घार से मौलिसरी के फूलों की वह माला मेरे लिए बनवायी थी और खुद अपने हाथों से इस गले में डाला थी ! मगर यह सोचकर कि चलो, बेचारी अपने प्रीतम को रिखायेगी इस माला के जरिये, अपने-आपको तसல்லी दे ली।
"मेरे गले से माला नदारद देखकर तेरे परदादा को बेहद रंज हुआ था।
"उसी वर्ष, मवारं के महीने में तेरा दादा पैदा हुआ। बूढ़ पंडितराज का आशीर्वाद चार साल बाद लोगों के सामने था।
"फसल उस बार ऐसी अच्छी आयी थी कि किसानों के रोएं-रोएं से खुशी का फखारा छूटता था। ऐसा लगता था कि कम-स-कम गाल-भर तो अब के लक्ष्मी महारानी का पवासन इसी इलाके में रहेगा। राजा खुश था। जर्मीदार खुश थे। गृहस्थ खुश थे। बिनहार और मजदूर खुश थे। अधिक मिशा की आशा मे भिखमंगों की भी खुशियों का टिकाना नहीं था। तीथों के पण्डों और मन्दिर के पुजारी उससाह में भर उठे थे, उनकी शब्दता-भक्ति गहरी हो आयी थी।
उस ज्माने में तेरी बस्ति की आबादी उत्तरी ज्यादा नहीं थी। कुल मिलाकर सत्त्व परिवार थे। बच्चे-बूढे-जवान-अथड़। सभी औरत-मदों की तादार तीन सौ से ऊपर नहीं थी। लोग मजबूत काही के हुआ करते थे। बीमारियों की यह किंचर-किंचर हमेशा नहीं लगी रहती थी। आजकल की अपेक्षा रहन-सहन उन दिनों कहीं ज्यादा सादा था। मिर्जई, दुपलिया टोपी, चमरोधा जूता और पतले बाँस की नकुली छड़ी, जिसका सिर चாँदी के पत्थर से मदा होता—मझली और ऊँची हैसियतवालों का यही बाना था। राजा, बाबू-बबुआन, जर्मीदार, दीवान और राज-पुरोहित-राजपण्डित लोग छोटे लाट की दरवारदारी में जाते तो चुस्त पाजामा, शेरवानी, पेचदार पगड़ी और दिल्लीवाले जूतों में हुआ करते।
"पूस-माध मे उस वर्ष धान जब खलीहान मे तोला गया, तो मालूम हुआ कि तीन गुनी उपज हुई थी। लोगों ने अनाज बेच-बेचकर कर्ज की पिछली रकमें चुकायी और शादी-व्याह, मूइन-छेदन, जनेऊ-उपनयन, तीथ-व्रत वंगैरह कामों में खुलकर खर्च किया।
"राउत की खेती-गिरिसरी खूब साफ-सुथरी थी। शायद ही उसे कभी कर्ज लेना पड़ा हो। बेर-कुबेर के लिए वह चार पैसे संभालकर रखता था। कभी मैंने तेरे परदादा को हाय-हाय करते नहीं पायी। उस साल रुपये का चार मन धान बिका था। राउत चाहता तो सो मन बेच लेता, लेकिन नहीं। क्या ज़रूरत थी रपयो की ! सुखा-मुझूकर सौ मन धान तेरी परदादि ने कोठार में डाल ली। "अभी रेल नहीं खुली थी। जाने-आने के लिए हाथी, घोड़ा, ऊँट, बैलगाड़ी, पालकी-तामदान, सगड़ या इकका और खटोला ग्रीरह की मदद ली जाती थी। इस साल चैत में वारणी का परव आया तो राजत पाँव-पैदल गंगा नहीं आये-सिमरिया घाट जाकर। गंगाजल और गगामाटी लाये थे साथ। चुल्लू-भर गंगाजल उन्होंने मुझ पर भी छिड़क दिया और तनिक-सी गंगामाटी सीने में लगा दी। वह अकेले नहीं गये थे, गंगा, गाँव के दस-बारह आदमी जोट बाँधकर गये थे—बोलते-बितयाते और हँसते-गाले। चावल-दाल, नमक-मिंच, घी-तेल… सीधा का सारा सामान था। बर्तन भी साथ थे—तसला, बटलोई, कड़ाही, कलछी, थाली-घाटी, लोटा-गिलास। जमात मे दो औरतें थीं, इससे रसोंई-पानी का बड़ा आराम रहा। दो दिन जाने में, दो दिन आने मे। दो रेजू घाट पर गंगा मइया की गोदी मे। महीनों इसी का बखान चलता रहा। जो नहीं जा सके थे वे मुँह वा-वाकर सुना करते; जो लोग हो आये थे, यात्रा की चर्च करते-करते उनकी जीभ थकना मानो जानती ही नहीं थी।
"राउत ने अब मेरी जड़ों में गोल-मोल-सा एक छोटा चबूतरा बना दिया।
"हर सोमवार की सबेरे आकर तेरी परदादि मेरी जड़ों में लोटा-भर जल ढालने लगी तो इससे मैं बहुत खुश हुआ।
"अगले वैशाख में राजा के मझले कुमार की शादी हुई। शुकल पक्ष की दशमी थी। बारत इसी रास्ते गुजरी थी। नौकर-चापर मिलाकर सौ आदमी रहे होंगे। कन्धों पर बाँस रखकर सोलह वेगार भारी-सी एक तखतापोश दोये जा रहे थे, उस पर दरी और राजाजम बिछी थी। मय साज-बाज के एक रंडी उस तखतापोश पर नारह रही थी—तवला-डुगी, सारंगी, मंजौरा सब साथ दे रहे थे… वैसा अद्रुत दृश्य मैने फिर कभी नहीं देखा बेटा ! न, कभी नहीं !!"
जैकिसुन को अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ...बारात में साथ चलते वेगारों के कन्धे ! कन्धों पर बाँस और बाँसों पर तछतापोश ! तछतापोश पर साज-बाज समेत एक बाईजी नाच रही हैं और राजा का बेटा व्याह करने जा रहा है...
कैसी अजीब बात सुना रहे हैं बाबा—जैकिसुन ने सोचा और उसके रोगटे खड़े हो गये।
दम मारकर बाबा कहने लगा :
"आज तो इन बातों पर सहसा विश्वास नहीं करेगा कोई, किन्तु सौ वर्ष पहले दर-असल अपने इन इलाकों में जर्मी दार सर्वसर्वा हुआ करता था। रिआया से बेठ-बेगार लेना उसका सहज अधिकार था…वह रोब ! वह दबदबा ! वह अकड़ ! वह शान ! वह तानाशाही ! वह जोर ! वह जुलम ! क्या बताऊँ, बेटा ?
"छोटी ओकात के और नीची जात के लोगों को तो खैर वह कीड़-मकोड़ समझता ही था, अच्छी-अच्छी हैसियत के भले-खासे व्यक्तियों से वक्त-बेवक्त नाक रगड़वाता था ज़मीदार।
"औसत हैसियत का एक गृहस्थ था शत्रुमर्दन राय। अरे, इसी जीवनाथ का दादा..."
जैकिसुन ने सोये हुए एक जवान की ओर निशाह फेरी—जीवनாथ ! अजी, यह जीवनाथ तो उसका साथी था। दर्जि आठ तक पढ़ा-লিखा और अब मेहनती किसान... दुनाइ पाठक और जैनरायन की आँखों का काँटा...तो, इसके दादा के साथ जर्मीदार ने कोई बदसलूकी की होगी—
"गाढ़ी नींद सो रहा है जीवनाथ। बड़ा मेहनती और इमानदार लड़का है। इसकी सूड-समझ भी काफी पैनी है ऐं! "हाँ बाबा!"—मन-ही-मन जैकिसुन बोला, "यही तो हमारा लीडर है..."
'बसती रपुली में आम लोगों के दु:ख-सुख की जैसी चिन्ता यह पहुा रखता है, उसका दसवाँ हिस्सा भी अभी तेरे अंदर मैं नहीं पाता हूँ। क्यों, है न ठीक?'
बाबा ने कहा:
"शत्रुमदन राय सीधा-साधा मोहनती खेतिहर था। उसके बाप ने राजाबाहदुर रमादतिंशह से तीस रुपये सूद पर लिये थे। बाप कर्ज की वह रकम नहीं चुका सका। कर्ज की रकम सूद-दर-सूद का पैसा-अधना पी-पीकर मोटी होती गयी। अपनी इमानदारी और पैनी सूड-बूझ के कारण शत्रुमदन राय गर्व इ पंचायत का बेज़ाबता मुखिया समझा जाता था।
"पिडित चन्द्रमणि का छोटा घेवता अपने नाना और भाई के बल पर लुच्चों का सरगना हो उठा था। गाँव की बहु-बेियों की आवसर उत्तरना, भरे तालाब की निकास का रास्ता खोलकर रातों-रात मछलियाँ भगा देना, बाग के नये पेड़ कटवा डालना, मैस और बैल लापता कर देना, किसीके खिलाफ झूठ-मूठ जर्मीदार के कान भरना… कोई भी कुकर्म उससे छूटा नहीं था।
"गाँव की पंचायत ने एक बार उसे मामूली सजा दी—सजा क्या दी, दो रुपये का जुरमाना ठोक दिया। बाकी पंच दुविधा में थे, लेकिन श्रुमर्दन राय ने साफ-साफ कहा—चाहे कुछ हो, हमें बैगर किसी हरियायन के इस बलिभ्रद से कैफ्रियत तलब करनी चाहिए..." बिलिभ्रद रायजी पर बड़ा गुम्मा हुआ और उठकर चला गया। रायजी ने जोर डाला तो पंचायत ने मुजिरम पर दो रुपये का जुरमाना ठोका।
"राजाबाहदुर का छोटा भाई बलिभद्र को खूब मानता था। इस तरह, उसके लिए शत्रुमदन राय के खिलाफ मालिक के कान भरना-भरवाना बाएँ हाथ का मेल था।
"आखिर राजाबाहदुर के कान रायजी के खिलाफ खूब भरे गये।
"राजाबाहदुर के दरबार में दस भोजपुरीया लठेत 'धादा' के नाम पर पलते थे।
"एक रोज सबेरे एक प्यादा रायजी के घर आ धमका—'तलबी है बाबू शत्रुमदन राय की !"
বিচ্ছু কে ডক-সী কড়ি মুক্তি, সিল-সা সপাচ সীনা... চোঁটি-চোঁটি আঁষ্ঠে, চোঁট-চোঁটে বাল, তণড়ি ঈিল আঁর কছার দীল ! সাড়ে চার হাথ কি ঝঁষী লড়ু সর্বালে—সরসো ক তেল যুপড়-যুপড়কর পীতি হুই লড়ু ! কিসীন সহমত-সহমতে পুঁথ দিয়া—"ক্যা নাম হে আপকা সিপার্থী জী ?"
"हवलदार पांडे…' अकड़ी हुई आवाज लोगों के कानों से टकरा गयी। डेढ़ सेर चावल, पावभर दाल, दो सेर की ताजी हरी लौकी और ऊपर से एक अधन्ा… सिंपाही जी को आसामी की तरफ से सीधा मिला और जवाब मिला—"कल हाजिर होऊँगा।"
"रायजी समझ तो गये ही कि व्या होनेवाला है और इसके पीछे कौनसा सूत्र काम कर रहा है !
"वह दिन-भर परेशान रहे कि कहीं से चालीस रुपये जैसे भी मिल जायें, लेकिन कोई सूरत नहीं निकली। बेटा, वह रपयों का जम्माना तो था ही नहीं, जिसमें और मालों का जम्माना था। रुपये में तीन-तीन चार-चार मन तक धान मिलते थे; दो-दो डार्ड-डाई मन चावल ! सात सेर, छः सेर घी आता था, डेढ़-दो मन गुड़। कोडिया पैसों की जगह इस्तेमाल होती थी ! नोट का चलन बिलकुल नहीं हुआ था… आज तो एक बींचा उपजाऊ ज़मीन डाई-दाई तीन-तीन हजार रुपये पर उठती है ! उन दिनों पच्चीस रुपये मिलते थे एक बींचा धनहर खेत के। आज तेरी बस्ती के पचासों आदमी बाहर रुपये कमा रहे हैं। यहाँ के किसान हर-साल अनाज बेचकर हजारों की खड़ी रकम बनाते हैं !
"जी कड़ा करके अगले दिन सबेरे वह राजाबादुर के सामने हाजির हुआ। हाथ जोड़कर बोला—"हुजूर ! गरीबनेवाज ! उतनी रकम के बदले जमीन कवालों का लीजिये ! दुहाई सरकार की ! या फिर, दो महीने की मुहलत मिले…"
"गदन-समेत माथा हिलाकर राजाबाहदुर ने कहा—'हूँ ऊँ'
"करीब ही खड़ा था मुंशी तुरन्तलाल दास। वह राजाबाहदुर का महामन्यी था। उसका बाप मुंशी कृष्णालल दास राजाबाहदुर के पिता गौरौदत सिंह का दीवान था। पृश्तेनी राज-भक्ति पक चुकी थी।
"दासजी ने राजाबाहदुर के राजसी ख्याल पर शान चढ़ाने की नीयत से कहा—'हुजूर, मुहलत तो कई बार यह ले चुके हैं।"
" 'हूँ ऊँ '—राजाबाहदुर ने पतली मूछों पर बाएं हाथ की दो उंगिलियों से दुतरफा ताव देते हुए कहा। रायजी बेचारे उसी तरह हाथ जोड़ खड़े रहे। क्षण-भर बाद मालिक ने आँखें तिरछी करके दीवानजी को इशारा किया कि असमी को यहाँ से ले जाओ...
"बेटा, यह सामने से हटाने-भर का इशारா नहीं था। यह आशा थी श्रुमदन राय पर बर्बेता बरतने की !
"सदर दरबार की बाई ओरवालா दरवाஜा पार करके एक पुराना पकका मकान था। तख्तों की बनी बड़ी-बड़ी सन्दूके पिहयों पर खड़ी रखी थी बरामदों में। आँगन का चौक खाली था।
"शत्रुमदन राय को बीच आँगन में खड़ा कर दिया गया।
"लघु लिये हुए चार सिंपाही सामने मुस्टेद थे।
"बॉँहों को माथे के ऊपर खड़ा करके एक सिंपाही ने बाँध दिया। दो गज के फ्रासले पर दो इटें डाल दी गयी। एक इट पर एक पैर, दूसरी पर दूसरा पैर। इस तरह रायजी खड़े किये गये। यमदूत-सी मूहोंवाला एक अधेड़ भोजपुरिया जमादार कोड़ा लिये नजदीक आया। दूसरी ओर से एक और आदमी आया, जिसके हाथ में मुँह-बंद हाँडी थी।
"जर्मनीदार का इशारा पाकर वह श्रुमर्दन के बिलकुल करीब पहुँचा और हॉर्डी का मुँह खोलकर लाल चीटों का छना निकाल लिया। छने में डोरी तंगी थी। उसने खाली हाँडी नीचे जमीन पर रख दी और बिलबिलाते लाल चीटोंवाला आम के अधसूखे पतों का वह घोंसला राज्यजी के माथे पर टिकाया; ऊपर डोरी पकड़े रहा…
"चिटें हजारों की तादाद में शश्रुमदन राय की देह पर फैल गये।
"माथा हिलाकर बेचारे ने बंदे हाथों को ऊपर-ऊपर झटकने की कोशिश की कि पीठ पर कोड़े पड़े—सपाक्-सपाक्! चार बार !!
"खबरदार!' जमादार गरज पड़ा, 'अपनी खैर चाहते हो तो वैसे-के-वैसे खड़े रहो, वरना..." "आँख, नाक, कान, मुँह, होठ, गदन, कपार—और बाकी समूचे बदन से चिपक गये लाल चीट! थोड़ी देर तक श्रुमर्दन राय हाय-हाय होय-होय हुई-हुई करता रहा। एक साथ हजारों की संख्या में चलती-फिरती भूखी-यासी जहरीली सुडयों ने लाचार आदमी पर हमला कर दिया था।
"वह असल राजपूत था बेटा ! इतना कुछ गुजरा उस पर, लेकिन 'माफ़ी' की बात मुँह से नहीं निकली। बलिभद्र भी उस वक्त वहीं अंदर महल में था। यही सोचकर तो वह दुष्ट उस वक्त वहाँ मौजूद था कि रायजी कहीं नाक रागड़ने लग जायें, माफ़ी माँगने लगें तो कर्ज की कुल रकम बलिभद्र जमा कर देगा।
"लेकिन दुष्ट के मनसूबे पूरे नहीं हुए।
"शनुमदन राय अपना बदन लाल चीटों से बिधवाता रहा। छट-पटाता रहा और दाँतों-पर-दाँत बैठाकर चुभन व जलन पचाता रहा। हिलता-डुलता रहा और कोड़े खाता रहा...
"आखिर वह बेहोश होकर गिर पड़ा।
"और जिस समय श्रुमर्दन पर यह बर्बरता दायी जा रही थी, ठीक उसी वक्त महाला में राधाकृष्ण की युगल-जोड़ी के सामने मीठी आवाज-वाले एक पुराणपाठी महानुभाव राजमाता साहिब्रा को श्रीमृद्रागवत की रास-पञ्चाध्यायी सुना रहे थे।
"इस घटना के चार-छह दिन बाद एक शाम का रात अपने दो-तीन भागों से यह सब सुन रहे थे… तब से जर्ममादारों के प्रति मुझे घोर घृणा हो गयी बेटा!"
जैकिसन ने गहरी साँस ली।
उसकी मुखमुद्रा पर विषाद की गहरी छाया घिर आयी थी। उसे उन बुढ़ों का ख्याल आ गया जो मौका-बेमौका बीते युगों के गुण गाते रहते हैं। उसे पगडधारी उन पंडितों की याद आ गयी, जर्मीदारों की प्रशंसा करते-करते जिनकी जीभ चंदन-चोआ उगलने लगती है। उसका चेहरा कठोर हो आया।
बाबा बटेसरनाथ ने कहा :
"तेरा चेहरा क्यों उत्तर आया है बेटा ? बोड़म कहीं का ! क्या सोचता है कि वह जालिम जमाना फिर वापस आ जायगा लौटकर ! ह: ह: ह: ह: !!!
"नहीं ऐ, नहीं ! तू जिस युग में पैदा हुआ है वह राजाओं-जर्मनी-दारों और सेठों-साहुकारों का युग नहीं, बल्कि तेरे-जैसे आम नौजवानों का जमाना है..."
बाबा ने जैक्सीन की तुёदी में उंगली लगा दी और कहा :
"में बूढ़ा ज़स्त्र हो आया हूँ लेकिन बीते युगों की सड़ांध का समर्थन किसी भी कीमत पर नहीं कर सकूणा। भविष्य तेरे-जैसे तरणों के हाथों में है। राजाबादुर रमादत सिंह की मौजूद आलाद आज क्या कूवत अपने अंदर रखती है, देखे ही रहा है तू!
"आज के ये राजाबाहदुर सार्वजनिक उपयोग की भूमि, पोखर, चरागाह, शमशान वगैरह चोरों की तरह चुपके-चुपके बेच रहे हैं। इतना बड़ा अन्याय अब दुनिया यों ही बदर्शत कर लेगी बेटा ! नहीं रे, हरगिज नहीं !" जैकिसुन का दिमाग आश्रासन के ये बोल पाकर हल्का हो उठा। अब उसके तरण होठों पर गुलाबी मुसकान खेल गयी; आँखों के कोयले चमकने लगे।
रात आधी बीत चुकी थी। प्रकृति बिलकुल नीरव और नि:सन्द लगती थी। पूर्णमा की प्रौढ़ चाँदनी समग्र संसार को अपने स्नेहपाश मे ले चुकी थी। चन्द्रमंडल मध्य-आकाश के नील-सागर में दमक रहा था।
"तुझे घास लगी होगी ! और, ऊब तो नहीं उठा है तू?"
हॉ, जैकिसुन को घास ज़स्सर लगी थी, मगर बाबा की बातों से ऊबा तो वह बिलकुल नहीं था।
बाबा उठा और दोने में पानी ले आया।
वह अनोखा लगा जैकिसुन को। पहले सोचा उसने कि बाबा को बार-बार जाकर दोने में पानी लाना पड़ेगा, लेकिन पीकर मालूम हुआ कि अब और पानी उसे नहीं चाहिए। स्वाद इस जल का बेशक कैसेला था, परन्तु बड़ी तृपि मिली थी पीकर।
तब तक बाबा बैठ चुका था।
कुछ देर वह चन्द्रमाण्डल की तरफ देखता रहा, फिर जैकिसुन के प्रति मुख्यितब होकर कहने लगा :
"एक-एक व्यक्ति अपने बारे मे अन्तहीन आख्यान-उपाख्यान सजोये हुए है। एक-एक दिन की घटना अगर मैं तुझे ब्योरेवार सुनाने लगू तो महीनों नहीं, वर्षों लग जायेगी। उतना कौन सुनेगा और कौन सुनायेगा ? किसी बीहड़ जंगल में अगर मैं होता और मनुष्यों के जीवन की बातें बिलकुल न जानता होता तो फिर इस प्रकार का अवसर ही भला कैसे आता ?
"राउत पचपन साल की आयु में ही चल बसे थे। तेरी परदादि पन्द्रह वर्ष और जिन्दा रही। हर सोमवार को वह मेरी जड़ों में लोटा-भरपवित्र जल दालती थी। यह नियम उसका कभी नहीं टूटा।
"हिजरी सन् १२९० में भारी अकाल पड़ा था। वैसा अकाल सैकड़ों वर्ष के अरसे में एक-आध्र बार ही पड़ता है बेटा !
"बात यों हुई कि पिछले कुछ-एक वर्षों से फसल मामूली आ रही थी। साल-भर का लेवा-खर्च लोगों का अपना यों भी तो पूरा नहीं पड़ता था। उस बार की धान की मुख्य अगहनी फसल बिलकुल चौपट हो गयी थी। चैत बीतते-बीतते बड़े-बड़े गृहस्थ तक जी-चने की रोटियों पर उतर आये थे। चावल ही जिन इलाकों का खास भोजन हो, वहाँ जी-चन के टिककड़ खुशी-खुशी तो कोई खायेगा नहीं। मरता क्या नहीं करता !
"मामूली हैसियत के किसान शकरकंद बनाम अलहुआ की शरण ले चुके थे। खेत-मज्दूर और जन-बनिहार आम की सूखी गुठिलियाँ चूर-चूरकर मडुआ का जग-सा आटा उसमे मिलाकर टिककड़ बनाते और उसी से भूख की आंच को शान्त करते।
"उस वर्ष रबी की फसल भी दगा दे गयी थी ! आम भी नहीं फले थे। वैशाख गया, जेठ गया और आषाढ़ भी बीता, लेकिन इन्द्रदेव का दिल नहीं पसीजा—नहीं पसीजा ! नहीं पसीजा !!
"मेरी छाया में बैठकर तेरी इस बस्ती रपउली के ब्राह्मणों ने मिह्री के ग्यारह लाख शिवलिंग बनाये और उनकी सामूहिक पूजा की उन्होंने; फिर भी मेघ की कृपा नहीं हुई—नहीं हुई ! नहीं हुई !! नहीं हुई !!! "गालों, अहीरों और धानुकें ने यही चार दिनों तक भुडयां महा-राज का पूजन किया, दस भेड़ बिल चढ़ायी और दो जवान भाव खेलते-मेलते लहूलहान होकर गिर पड़े थे; फिर भी राजा इन्द खुश नहीं हुआ—नहीं हुआ ! नहीं हुआ !! नहीं हुआ !!!
"एक रात मई जब से गये तो गाँव-भर की औरतें दस-पन्द्रह गुटों में बेंट गयी। तालाब से मेढक पकड़ लाये गये, उन्हें ओखलियों मे मूसलों से कुचला गया। गीतों में बादल को बुलाती रहीं वे, देर तक बुलाती रहीं; लेकिन मेघ नहीं आया—नहीं आया ! नहीं आया !!
"पंडितों ने महीनों तक चंडी-पाठ किये, साधकों ने एक-एक मन्च को लाखों जपा... सब व्यथ ! वरण को दया नहीं आयी।"
जॉर्कसुन मानो सांस रोककर बाबा की बातें सुन रहा था। सांस को दिल की धड़कन के प्रति इर्षार् हो रही थी कि बातें उसी के पल्ले ज्यादा पड़ रही हैं !
क्षण-भर चुप रहकर बाबा ने फिर आरम्भ किया :
"तालाबाँ में पानी घटने लगा तो लोग मछलियों और कछुओं पर टूट पड़े। मछलियाँ भूनकर बिना नमक के ही उन्हें वे पेंट के हवाले कर देते। जो गृहस्थ तालाबाँ के हकदार थे, उनकी कड़ाई बढ़ी तो जन-साधारण चोरी-चोरी से महलियाँ पकड़ने लगे।
"भूख की भुही में सोचने और समझने की ताकत जल-भुनकर खाक हो जाती है बबुआ ! लोग पिछले वर्ष की पकी इंट் उड़ा-उड़ाकर लाने लगे। मंदिर बनाने की नीयत से रामजी गुसॉई ने कई वर्ष तक रकम इकही की थी और दस-बारह महीने पहले इटों का भुदा लगवाया था। राजमाता ने मुप्त की लकड़ी दिलवा दी थी तब भुदा पका था। अब की समय साल खराब देखकर गुसॉई ने मन्दिर खड़ा करने का अपना विचार स्थगित कर रखा। पेंट जलने लगा तो वही इंट் उठा-उठाकर लोग लाने लगे। बताؤँ, क्या करते हैं ये इंटों का ?"
जोंकेसुन ने संकेत से हामी भर दी। ८० साल वाले उस दुभिक्ष का जिक तो बूढ़ों के मुँह से उसने जब-तब सुना था, लेकिन इस बारे में तफसील की कोई बात जैकसुन को कहा मालूम थी।
वह बटेसरनाथ की ओर गौर से देखता रहा। लम्बी दाढ़ी की घनी छॉह में गोरैया का चूजा दिखायी नहीं पड़ता था। घुटनों तक पहुँचती धोती का मटमैलापन धवल चिन्द्रिका के आतंक से सहमा-सहमा-सा लगता था। उर्गिलियों के नखों की सफेद गिदियाँ उस उज्जल प्रकाश में अच्छी तरह जगमगा रही थी।
"बताऊँ, व्या करते थे उन इति का ?
"एक इट का वजन उन दिनों कम-से-कम तीन सेर होता था। जो इटें हल्की आंच मे पकी होती, लोग उन्हे ही उठाते। घर में औरते इंट का चूरन बनाती पहले, पीछे उस चूरन का महीन पिसान तैयार कर लेती। आम, जामुन, अमरदद, इमली वंगैरह की पितियाँ उबालकर पीस ली जातीं। पांच जने अगर खानेवाले हुआ करते तो इंट का एक सेर पिसान दो सेर उबली पितियों में मिलाया जाता; कही यह पिसान पितियों में एक-चौथाई-भर डाला जाता। आम की गुठिलियों का पिसान भी इसी तरह बरता जाता।
"घासों का कहीं पता नहीं था। दूब बिलकुल सूख गयी थी। मामूली पौधों का भी यही हाल था।"दूबों की जड़े खुरपी से खोद लाते लोग, उबाल-उबालकर उन्हें चबा जाते।"इन सबके बाद पेड़ों की छाल का नम्बर आया।
"में कफी छतनार हो आया था। जवानी के दिन थे। कन्धों पर मोटी-मोटी तीन शाखाएँ खड़ी थी। डालों, डालियों और टहिनियों की शुमार ही क्या ! अब ऐठ दुपहिरिया के वक्त भी में अपनी छाँह से दो-ढाई कह दायरा धरती का अनायास ही घेर लिया करता। धूप, वर्ष और ओस-पाला से बचने के लिए अब मनुष्य ही नहीं, दूसरे भी कई प्राणी मेरे नीचे आते। हर साल दो-चार वार पंचायत भी बैठने लगी। चरवाहों और चरवाहिनों के लिए तो मैं घर से भी ज्यादा प्यारा अहुब बन गया ! आसपास खेतों में काम करने वाले मजदूर मेरी छाँह में आकर बैठते और मालिक-गृहस्थ के यहाँ से आया हुआ रुखा-सूखा कलेवा पाते। दाईं पहर की चिलचिलाती धूप में हलों से खुलते ही बैल दौड़कर यहाँ आ जाते। भैसे घंटों बैठकर यहाँ जुगाली करती रहती। कैसी भी जल्दी में क्यां न होते, बटोही बिना सुस्ताये यहाँ से आगे नहीं बढ़ते।
"राउत का स्वर्गवास हो चुका था। अब तेरा दादा मेरी देखभाल करता था। और, अब मैं नावालिंग थोड़े था कि किसी की निगरानी का मोहताज रहता ? दरअसल मैं इस लायक हो चुका था कि बस्ती रपउली के बाशिंदों की खोज-खबर रख सकू...
"अकाल की भीषण घटनाओं का मुझे अच्छी तरह पता था। आस-पास के इलाकों में उपज का जैसा बुरा हाल था, वह क्या मुझसे छिपा था ? भूखे चरवाह मेरी डालों पर देर-देर तक आड़-तिरेखे खड़े रहते और कच्ची-तुई फिलिया चबया करते। पीछे उन्होंने दूसों पर भी हाथ साफ करना शुरू किया। मेरे पतों में, छालों में, टूसों में, कच्ची फिलियों में लासों की थोड़ी-बहुत मात्रा होती है। इस लासा के कारण बेचारों की जीभ और तालू अधिक देर तक चालू नहीं रह पाते थे; लिहाजा चरवाहों से मुझे जल्द ही छुटकारा मिल जाता था।
"लेकिन इन छुटकारों से में खुश थोड़े होता रहा ? मुझे अपने पर खीझ उठती; बेहद परितप होता ! क्यों लासा दिया विधाता ने मेरे रग्गि-रेस्सों में ? हाय, मैं भूखे पेटों की जलन जी-भर मिटा पाता ! काश, कोई आकर मुझ पर तेल छिड़क जाता !
"मुसीबत में अगर किसी के काम न आया तो वह जीवन बेकार है बेटा ! भूख ने लोगों की अंतिडयों का रस सोख लिया और मैं बेहया हरा-भरा यह सब देखा करता ! बेचीनियों का तूफान उठा करता मेरे अन्दर; धरती पर काफ़ी गुस्सा आता कि मेरी जड़ों को तो वह अब भी रस पहुँचाया करती है परन्तु अकाल-ग्रस्त मानव-समाज की घोर उपेक्षा कर रही है…
"यह स्थिति मेरे लिए ही असह्य हो उठी आखिर !
"वह महारानी विकटोरिया का जमाना था। जिले का कलक्टर गोरा था, पुलिस-सुपिर्टेंडट गोरा था। सब-डिवीजनल अफसर गोरे थे। अदालत का बड़ा हिकम गोरा था। ऊपर बड़ा लाट और छोटा लाट सब गोरे साहब। सूबार् दप्तर और हाईकोर्ट कलकने में थे। इन देहातों में एक तरफ तो जमीदारों का दबदबा था, दूसरी तरफ कही-कही नील के कारखानेदार अंग्रेज जमे बैठे थे। बाजारों और शहरो में इधर तब तक मारवाड़ी बिनये नहीं आये थे; खरीद-फरोखत और जमा-पूजी का सारा कारोबार देखवाली सौदागरों के जिम्मे था—तेली, सूडी, कलवार, अगरवालா, रोनियार, बरनवाल, हलवाई वंगेरह थे। सूद पर कर्ज देने का व्यवसाय जर्मीदार और सुखी किसान भी करते थे। ब्राह्मण, राजपूत, भुईहार आदि कुछ जातियों के जवानों को फ़ौज मे जगह मिलने लगी थी।
"कलकता जाकर इन देहातों का एक-आध आदमी टिक जाता था तो उसे दरवानी या चपरासीगिरी मिलती थी। उस युग में अंग्रेजी पढ़ा-लिखा एक भी आदमी अपने गाँव मे नहीं था। धाना-कचहरी के काम कैथी और फारसी लिपियों में चलते थे।
"अखंबार कलकते से दो-चार निकलते थे सो भी मामूली किसम के; अंग्रेज अधिकारियों, गोरे व्यापारियों, फौजी अपफसरों और राजा-महा-राजाओं की खबरों व सरकारी इश्तेहारों से उनके पर्वे भरे रहते थे। देहाती जनता के दुख-दर्दों की आवाज नीचे-ही-नीचे घुटती रहती थी... आज तो तू उन दिनों की स्थिति के बारे मे अटकल ही लगा सकता है बेटा ! आजकल पटना से नो देैनिक निकल रहे हैं। दूर-देहात मे कही कुछ होता है तो उसकी खबर बिहार-भर मे फैल जाती है। मान लिया सिर्फ खबरे छप जाने से कुछ नहीं होता। बातों से ही कलेजे की पीर नहीं मिटेगी किसी के, ठीक है। लेकिन, बाबू, सही घटनाओं को लाखो दीमागो के अंदर डाल देना कोई मामूली बात है ऐ?
"बस्ती-भर में तीन ही परिवार ऐसे थे जिन्हें एक जून अन्त तक चावल नसीब होता रहा। एक था तर्कपानन का परिवार। दूसरा परिवार था राजाबाहदुर के पुरोहित का। तीसरा था एक राजपूत काशतकार का घर। बाकी दस-एक घर ऐसे थे जिनमें सिर्फ बच्चों को भात मिलता था, सो भी मचलने पर—सयाने जुनही, मकई, अरहर और चनों पर निभेर थे। महीने मे एक-आधार पतली खिचड़ी मिल जाती। बीस-पच्चीस परिवार ज़मीन बेच-बेचकर शकरकन्द से पेंट की आग बुझाते थे...मध्यवर्ग का यही सिलिसिला था। जो बिचले तबके के भी निचले स्तर पर थे, उन्हें शकरकन्द भी एक ही जून मिल पाती थी।
"तैरी दादि चतुर खेतिहर की बेटी थी। उपज का हाल खस्ता देख्-कर पूस में ही उसने अपनी दो भौंसे बेच डाली थी। अब एक थी। जो, मटर, मसुर, चने-जैसे अनाज काफ़ी भर रखे थे। पाँच कटुदा खेत मे शकरकन्द की बेलें फैला दी। सो, पन्द्रह मन भलुआ उपजाथा। और यह सब तेरी दादी ने कातिक और फागुन के दरम्यान ही कर लिया था। माघ का महीना आया तो तीन कटुदावाली दूसरी जमीन मे भी वह अलुआ रोपवा चुकी थी। तेरा दादा सुघंग आदमी था। वह हँसता रहा अपनी घरवाली पर—'जैसी जिसकी खानदान, वैसे उसके लच्छन। मेरे बाप-दादे भोगिदर थे और तेरे पुरखा दिलदर; सो, बिना अलुाका के भला रपुउली में जी लगेगा तेरा ?"
"इस पर तेरी दादी निसाँस छोड़कर बोली थी—'देखते हो न ? इस बार फागुन मे ही कैसी मनहूसमी छा गयी है ! रात को काला कोआ चीखता रहता है करें-करं। दिन के समय गीदड़ हुआँ-हुआँ करता है… अब की भारी अकाल पड़ेगा, देख लेना ! घर मे शकरकन्द पड़ा रहेगा तो अकाल से ले जायँगे किसी तरह…'
"और सचमुच, शकरकन्द ने तेरे दादा और दादि की बड़ी मदद की थी अकाल के उन दिनों में। एक जून वे लोग शकरकन्द उबाल-उबाल कर खाते थे, दूसरे जून मकई की लक्ष्यी या और कुछ।
"दूसरे के खेतों में महत्वमजूदरी करके जीविका चलानेवालों का बुरा हाल था। जंगली साग-सब्जी, घास-जड़ और पेड़ों की पतियों नौच-नौचकर वे खा गये थे। अब छाल की बारी थी।
"एक रात तीन-चार जने बसूला लेकर आये और मेरे कन्धों पर चढ़ गये। ऊपर की डालों पर छाल उतनी कड़ी नहीं थी, जड़ की ओर के तवे की छाल भी अभी उतनी कड़ी नहीं हुई थी।
"रात को वे इसलिए आये थे कि कोई देख न ले। तेरा दादा मेरा काफ़ी ख्याल रखता था। एक पता भी मेरा कोई तोड़ता तो उसकी आँखें लाल हो आती और गालियाँ बकने लगता। वह मुझे अपना बड़ा भाई समझता था। दो-चार दिनों के लिए कहीं बाहर जाता तो हाथ जोड़कर मेरी तरफ मुँह करके तब आगे बढ़ता।
"सो उस रात उन लोगों ने मेरी डालो पर से काफ़ी छाल उथेड़ ली और घर ले गये। दर्द तो मुझे बेहद हुआ लेकिन खुशी भी कम नहीं हुई कि चलो, मैं एक हद तक भुवखड़ों के काम आया। अकाल के उन दिनों में धरती तो जल ही रही थी, लोगों का कलेजा तक सूखकर सोठ बन गया था। वैसी स्थिति में अपनी छाल किसी के पेट की जलन मिटा सकी, आज तक इसका मुझे अभिमान है बेटा!
"अगली सुबह वही हुआ जो होना था।
"तेरा दादा मेरी उछड़ी डाले देखकर पागल हो गया। दिन-भर वह गालियाँ बकता रहा और रात को चारपाई डालकर यहीं लेट गया। तब से लगातार चार महीने तक वह यहीं सोया। बड़ी कड़ी निगरानी थी बेटा !
"इस तरह भला कब तक पेंट चलता ? खेत-मजदूर आखिर गाँव छोड़कर भागने लगे।
"दरभंगा से दलसिंहसराय सतह-अठारह कोस है। अंग्रेज-बहादुर ने उतनी दूर रेल-लाइन बनवायी थी उन्हीं दिनों। हजारों आदमी काम पर लगाये गये थे। मजदूरी के कई रेट थे : दो पैसे, एक आना और हद-से-हद दो आना… अपनी रपुली के दो जनों किसी तरह उसमें काम पा गये थे। "पता है तुझे, यह रेल-वेल सरकार ने किस नीयत से बिछायी थी ?"
जैकिसुन बाबा की ओर देखने लगा। अंग्रेज़ी ने इस इलाके मे किस नीयत से रेल चलायी थी, सो बेचारा जैकिसुन क्या जाने ! उसकी आँखों में प्रश्न और कौतूहल के भाव जगमगा रहे थे। उसकी जिशासा तीव्र हो उठी और चेहरा गम्भीर बन गया।
बाबा ने दाढ़ी पर हाथ फेरा और कहना शुरू किया :
"अकाल के उन सत्यानाशी दिनों में सरकार की ओर से प्रचार यह किया गया कि रिलीफ के तौर पर अधिकारियों को कुछ-न-कुछ करना तो था ही, इसी से पहले उस अंचल में रेल-पथ-निर्माण ही आरम्भ हुआ। राजराजेश्वरी महारानी विकटोरिया अपनी प्रजा की इस दुर्देशा से इतनी द्रवित हुई कि…"
बाबा को हंसी आ गयी। जैकिसुन की समझ में नहीं आया कि वयो हैंस रहे है बरगद बाबा।
कुछ क्षण बाद बाबा बोलने लगे :
"बिनियों की रानी द्रवित हुई तो क्या हुआ ?
"हुआ यही कि डाँडीमारो ने बटखरे का वजन अपने हक् में बढ़ा लिया। यानी, हमारे इलाकों मे सरकार ने रेल चलायी तो उसके अंदर जनता के हित की कोई भावना नहीं थी। भावना थी एकमात्र यह कि उसके अपने लाड़ले सौदागर कच्चा माल आसानी से दो ले जा सके और 'लाभ-शुभ' की अपनी सड़कों को चौगुना लम्बा-चौड़ा कर लें।
"चாவल-धान, अरहर-खेसारी, उड़द-मूंग, चना-मसूर, लाल मिर्च और तम्बाकू, लड़ाई चिछने पर बकरों की तरह कटने के लिए फ्रौजी जवन, कारखानों-फ्रेक्टियों में खटने के लिए मजदूर, कलकंटे की आर्फिसॉं के लिए चपरासी और दरवान तथा बाबू लोग... इन चीजों की दुलाई की खातिर रेलगाडियों से ज्यादा सुविधाजनक भला और क्या हो सकता था ? दूसरे-दूसरे इलाकों में भी रेल-लाइनं बिछायी जा रही थीं।
"पहले तो आम लोगों की समझ मे नहीं आया कि यह हो क्या रहा है !... कोट-बूट और टोपधारी फिरंगी साहब देसी बाबुओं और मजदूरों के साथ रेलव-लाइन के लिए जगह नापते फिर; पीछे दोनों ओर से मिह्री काटकर बाँध खड़ी की जाने लगी। बाँध तैयार हुई तो उस पर इट की रोडियाँ डाली गयीं, फिर साकू की सिल्लियाँ बिछिं, तब कहीं आकर रेल के पत्थर बिछे। इसके बाद हड़हड़ाता हुआ और बड़े बन्बे से काला धुआं निकालता हुआ एक मामूली इंजन आया जिस पर दो जनता से वार थे। तमाशा देखने के लिए लाइन के किनारे-किनारे जगह-जगह भीड़ इकही थी। तेरा दादा भी दरभंगा जाकर पहला इंजन देख आया था।"
लेकिन वह अकाल थोड़ी दूर में सीमित नहीं था। अपने इस देश का समूचा पूर्व हिस्सा भुखमरी की चपेट में आ गया था। हजारों परिवार बरबाद हो गये और लाखों की जान चली गयी।
"रल-कम्पनियों के लिए यह सुनहला मौका था। कम-से-कम मजदूरी पर ज्यादा-से-ज्यादा काम करने की वह अनोखी आपाधापी थी बेटा ! दिन-भर की कड़ी महनत के बाद एक दुःअची हाथ आती थी। चावल तो मिलते नहीं थे, जुहरी और मुदुआ-जैसा मोटा अनाज मिलता था।
"बूढ़, बच्चे और दोर-डंगर... भुखमरी के सबसे बड़े शिकार यही थे। कई-कई दिनों का फ़ाका, बीच में कुछ मिला तो खा लिया। फिर फ्रांका, फिर कुछ मिला तो अंदर डाल लिया… जो जिन्दा थे, उनको इस क्रम ने काफ़ी कमजोर बना डाला था। प्रिय-से-प्रिय व्यक्ति दम तोड़ देता तो लोग रोते नहीं थे। भूख की जलन में आत्मा डॉँवா गयी थी और ऑसू गायब हो चुके थे।
"लाشों का बुरा हाल था। जब तक लोगों में ताकत थी और काठ जब तक सुलभ थे तब तक मुद्र जलाये जाते रहे। बाद में नन्हे बच्चों की लाशों की तरह सयानों की भी लाशों मैदानों मे गाड़ दी जाती थी। आगे चलकर यह भी असम्भव हो गया तो मुद्रों को यों ही मैदान के हवाले करने लगे। हवा में उन दिनों एक अजीब दुर्ग्रथ भर उसी थी। भूख से
तडपकर दम तोडनवालों में छोटी जातवालों की ही तादाद अधिक हुआ करती। शाम होते-ही डर के मारे लोग घरों में बंद हो जाते। दर तक लाशों अंदर ही पड़ी रहती, उन्हें कोई उठानेवाला न होता। रात के वक्त गीदड़ और भेड़िये गाँव की गिलियों और आँगनों का फेरा लगाया करते; मृतक की महक पाकर किवाड़ों की फॉक में अपनी थूथन अन्दर घुसाने की कोशिश से वे दुतकारे जाने पर भी बाज़ नहीं आते। गीधों, कौओं और कुतों का आपसी वैर-भाव इसलिए खच्छ हो गया था कि लाशों की कमी नहीं थी। मन्च्यों और पशुओं के कंकाल गाँव के बाहर इधर-उधर फैले दिखायी देने लगे…
"चिन्ता और शोक के मारे में सूखने लगा। दूसरे निकलते ज़रूबर, मगर अगले ही दिन जली हुई मूगफली की शक्ल के हो जाते। नये पतों की लाली जाने कौन पी गया ! बाकी पटे हरियाली के लिए तरसा करते, अकाल की कृपा से भूग-पीला और चितकबरा बद्रंग उनके रेशों पर हाँवी हो आया। छालें सिंकुड़ गयीं, तने अकड़ गये। डालों को सूखा मताने लगा, टहनियाँ टिठक गयीं। जड़ के सिंरे और सोर लाख कोशिश करके भी धरती माता से कछ अधिक रस नहीं पा रहे थे।
"उसी अकाल में मेरा पड़ोसी मर गया—अरे, वही बौनौ और कुबड़ा गूलर था न ? सूख गया बेचारा ! यों, उसकी आयु कम नहीं थी। लेकिन अकाल की आग उस बार उतनी न बरसी होती, तो अभी कुछ वर्ष वह और जिन्दा रहता रे ! वह सूख गया तो कई दिनों तक मैं रोता रहा… मैं उसे ताऊ की तरह मानता था… तेरे तो ताऊ-बाऊ है नहीं, तू क्या समझेगा कि भतीजे के लिए तاऊ का सनेह भला क्या अह-मियत रखता है ! है पता ?"
जॉक्सुन ने निपेध-मुद्रा मे माथा हिलाया। बेचारे को याद आया अपना बचपन, जब ताऊ-ताई के लिए दिल तरसता रहता था। बाबा ने कहा :
"मुझे अब तक वह बुजुर्ग गूलर अच्छी तरह याद है।
वह अकाल डेढ़ वर्ष तक जीवों और जন্তुओं की बिल लेकर आखिर रवाना हुआ—अपने पीछे रबी की फ्रासलों का अम्बर छोड़ता गया, जो बच रहे उनके चुचके चेहरों पर हल्की खुशी की गुलाबी रोनी छिड़कता गया।
"लोग अब तक उस अकाल की चर्चा करते हैं। असनी वर्ष से पहले की घटना है यह। उसके बाद एक और वैसा ही प्रत्येकर अकाल पड़ा था, अब से पैंतालीस-पचास साल पहले..."
जॉर्कसुन समझ गया कि बाबा सन् सोलह के अंकाल की बात कर रहे हैं अब। सन् तेरह सौ सोलह साल फ़सली, यानी १९०६ ई०।
6
इस बीच जैकिसन को एक आदमी इधर आता दिखायी दिया। बाबा तो खैर, किसी दूसरे को नजर आयेगा नहीं। हाँ, बटोही को यह जस्स जिजासा होगी कि इतनी रात गये बरगद के तले कोई क्यों बैठा है।
बाबा ने बातें बन्द रखीं।
राह्मिर नर्जदीक आया।
मटमैली धोती, गोल-कट हाफ अंगा। पैरों में देहाती पनही। धुला माथा। हाथ में लाठी।
पेड़ के पास आकर वह हमक गया तो जैकिसुन ने पूछ दिया—
"कहां जाओगे ?"
"पंंडील" —जवाब मिला।
"आये हो कहाँ से ?"
"शिवराम से। माचिस है ?"
"ऑफर है..."
जैकिसुन उठा। सोते हुए जीवनाथ की अंती टटेलकर दियासलाई निकाल लाया।
आगन्तुक ने पाकित से दो बीडियाँ निकालीं तो जैकिसुन ने कहा—
"नहीं भाई, में नहीं पिता हूँ बीड़ी-सिंगरेट।"
फिर उसने कसैली का टुकड़ा निकालकर कहा—"यह तो खाओगे ?"
जॉर्जसुन ने हाथ बढ़ाकर सुपारी ले ली और पूछा—"कौन आसराम है भाई साहब आप ? बैठिये, ज़रा सुस्ता लीजिये।"
राहरीर ने बतलाया, वह केवट है। उसके चाचा ने कसाई के हाथ अपना बूढ़ा बैल बेच डाला है। गाँव के लोगों को मालूम हुआ तो खुसुर-फुसुर होने लगी। पंचों ने कहा, पराश्थित लगेगा अगर बैल नहीं लौटा तो… वह जा रहा है बैल वापस लाने। दिन बड़ा तपता है आज-कल, रात के वक्त चला है और सुबह ऐढे-ऐढे में लौट आयेगा। बैठेगा तो अलसा जायेगा…
अन्त में उसने जैकिसुन से पूछ लिया—"आप कौन बिरादरी हैं?" "यादव हूँ और वह भुईहार है…!" सोनेवालों की तरफ इशारा करके जैक्सीन बोला।
बीड़ी का धुआँ अंदर घोटकर आगन्तुक ने कहा—"हवा बन्द है, आपकी भी नींद इसी से उचट गयी है न?"
"हूँ"—जॉर्कसुन नाक के सहारे बोला और हाथों में दियासलाई की डिबिया को लोकने लगा। बटोही ने अपने पैर आगे बढ़ा दिये। अब आकर वह बाबा के करीब इतमीनान से बैठा तो बटोसरनाथ ने मस्कारकर कहा :
"रंग-ढंग से मालूम होता था कि यह जवान गाँव से बाहर भन-नौकरी करता है... देखा नहीं, बातों के लहजे से शहरी नफ़ासत थी ?" "शहर की बू-वास बोलचाल से यही परगट हो, यहाँ देहितयों से नाक-भी नहीं सिकोड़नी चाहिए बाबू ! शहर आसमान में नहीं हुआ करते। गाँव की तरह शहर भी इसी भूमि पर आबाद है। पड़े-लिखे काफ़ी ऐसे लोग हैं जो नासमझी के कारण गाँवों और शहरों को परस्पर प्रतिकूल बतलाते हैं। पाना और कपड़ों की तंगी न रहे, सभी लिख-पढ़ जायें, बाहर जाने-आने की सुविधा मिले, काम और आराम का बदस्तर सिलसिला हो, मनोरंजन के साधन सुलभ रहे, तो फिर इन देहतां का दांचा ही बदल जायेगा। आलस, पिछड़ापन, अभाव, अशिधा, अस्वास्थ्य, गन्दगी आदि दुर्गुण हमेशा नहीं रहेगो। अभी तो शहरों में भी नरक है और गाँवों में भी। मुद्रि-भर लोग होंगे जिनके लिए देहतां में भी स्वर्ग-सुख सुलभ है और नगरों में भी।"
जैकिसुन हथेली पर ऊँगली गोद-गोदकर कुछ लिखने लगा तो बाबा ने ताड़ लिया। वह बोला :
"गाँव और शहर की बातें अभी छोड़ता हूँ; अपने बारे में सुनाऊँ अभी। हे न?"
जैकिसुन ने स्वीकार की मुद्रा मे माथा हिलाया।
बटேसरनाथ ने कहना आरम्भ किया :
"दुनाई पाठक का दादा था जहू पाठक। दादा का सगा। वह काफी बुढ़ा होकर मरा। मरते वक्त वह तेरे दादा से कहता गया कि धवजा खड़ी करके बरगद की वेदी पर ब्रह्म बाबा की स्थापना करो। तेरे दादा का नाम था अधिकलाल राउत। अधिक भाई ने मेरी जड़ों के चारों तरफ गोल चबूतरा बांधा और एक दिन धूम-धाम से धवजा गाड़कर ब्रह्म की स्थापना कर दी।
"पाठक के घराने में तीन सौ वर्ष पहले एक अकबालि पुरुष हुए थे। नाम था चन्द्रापिण पाठक। अपनी सूड-बूझ और बहादुरी से उन्होंने नेपाल के राजा को रिझा लिया तो उसने उन्हे अपना सेनापति मुकरर किया। पाँच वर्ष भी नहीं बीतने पाये थे कि किसी राजपूत सर-दार ने अपनी फ़ौज लेकर इधर से अचानक हमला बोल दिया। राजा चीन की ओर भाग गया, सेनापति आखिर तक जूझा और वीर-गति प्राप्त की; रानी हमलावर की शरण में चली आयी… चन्द्रापिण पाठक मरकर ब्रह्म हुए। दो सौ साल तक वह एक पीपल पर रहे, पच्चीस वर्ष आँवले के पेड़ पर और पचहतर वर्ष एक पाकड़ पर। कुछ वर्षों से यह ब्रह्मबाजा वे-घर थे, क्योंकि जीवछ और कमला में एक बार जोरों की बाढ़ आयी और बाढ़ हटी तो इलाके के बहुत सारे दरखत सूख गये। तभी से पाठक बाबा आश्रयहीन हो गये थे।
"जहू पाठक की नजर मुझ पर बहुत दिनों से थी। वह जिस वर्ष मरा, महीने में दो बार गाँव में आग लगी थी। बुझे को ब्रह्म ने सपना दिया… 'तीसी बार जो आग उठेगी वह तेरे ही घर से उठेगी और समूची बस्ती को खाक कर डालेगी, अग्निकांड के बाद महामारी को बुलाऊँगा मै। समझ क्या रखा है तूने ?"
'इस स्वाद से वह बेहद डर गया और अधिकलाल भाई को बुला-कर समझाया-बुझाया; वह राजी हो गये। तब से लेकर पाँच वर्ष तक में ब्रह्मा बादा का अडुा बना रहा।
"भक्ति-भाव, पूजा-पाठ और धमा-चौकड़ी के वे दिन भी क्या भूलने लायक है बंबुआ ? नहीं, बिलकुल नहीं !
"अब लोग मुझे सनेह और प्यार की निगाहों से नहीं, आदर और शब्दों की निगाहों से देखने लगे। मेरे प्रति जन-साधारण के अंदर अबतक जो भावना चली आयी थी, वह मानो एक ही दिन में बदल गयी।
"पहले लड़के घंटों मेरी डालों पर उछल-कूद मचாதे रहते… चाकू की नोक से बिना किसी डिझ्रिक के निशान बनाया करते… किस-किसके निशान : मुरली बजाता हुआ मुकुटधारी कृष्ण, खिलता हुआ कमल; एक-दूसरे का हाथ पकड़े विहूल स्री-पुरुष; बछड़ को दूध पिलाती हुई गाय, बाँसों के झुरमुट में कोयल की वहार, कन्धे पर बहंगी और उसके दोनों ओर छिककों पर सौगात का चँंगेरा ढोता हुआ भरिया… बच्चों की सूखी मौगिणियों से गोटियों का काम लेते हुए चरवाह मेरी छाँढ में 'सतघरा' खेलते। हँसली की शकल में
आधा-गोल बांधकर सुनेवाले बैठते और सामने बैठकर सुनानेवाला पहर्ज कहानियों का करता था। गानेवाला गीत अलापता रहता। गाय-बैल-बकरी चरानेवाली लड़कियाँ एक की पीठ-पीछे दूसरी और दूसरी की पीठ-पीछे तीसरी बाकायदा बैठतीं, बाल फैलाकर बड़ी मुसैटी से जूँ निकाला करतीं। बातों या गीतों का क्रम तो खेर चलता ही रहता। जिसकी घरवाली रुठकर मायके चली गयी होती, वह यहाँ बैठकर देर तक मन-ही-मन अपनी आलोचना किया करता। संयने, अधेड़ और बूढ़ आते, बाँह का तकिया बनाकर लेट जाते और देरों बातें करते-करते नाक बजाने लगते !
"बड़ी उम्रवालों का मैं बेटा था, जवानी-अधेड़ों का भाई और छोटों का चाचा। सारी बस्ती के लोग मुझे प्यार करते थे। भाभियाँ और बहनों मेरे बदन पर घड़ी-घड़ी-भर हाथ फेरा करतीं, बहुएँ और बेటిयां दुकी डालों में लटककर अंगड़ाइयां लेतीं, होले-होले टहनियां सहलातीं, टूर्स सूँघतीं और हरे-ताजे पने गालों से छुआतीं। बूढ़ी कोई इधर से गुजरती तो शायद ही कभी रकतीं। हाँ, गर्मी के दिन होते और दोपहर का समय होता तो रक भी जाती।
"लेकिन पाठक बाबा की धवजा जब से यहाँ खड़ी हुई, तब से मेरे प्रति सभी की भावना बदल गयी। श्रद्धा, भक्ति, भय और आतंक.. अब में प्रिय नहीं था, पूजनीय था—वन्दनीय और माननीय था। सोम-वार और बुधवार के प्रातःकाल खियाँ आकर मेरी वेदी पर चாவल की पीठी के घोड़े खड़े करतीं और पिंटियों पर दूध दालती, अक्षत और फूल चढ़ाती, परिवार की भलाई के लिए मिश्रित मानती।
"किसी के घर कोई शुभ कार्य होता तो यहाँ आकर पाठक बाबा का पूजन अवश्य कर लेता। मनोरथ पूरा होने पर लोग आकर धूमधाम से मनोतियाँ चढ़ाते। रेशम की झूलें, फोडिला के बने मिरमौर और मंदप, ज़री-गोटे की मालारें, पीतल-काँसे की घंटियाँ, लाल-इकरंगे का टुकड़ा... धूप-दीप, फूल-फल, अक्षत-दूब, दूध और गंगाजल, वेत और तुलसी के पंखे... फर-फरहरी, मिठाइयों, पकवान, पान-मखान... ढोले-डाक-पिपही! बारह महीनों में बीस-पच्चीस बकरे भी बिल चढ़ते थे—मचलते मुंডो और तड़पते धड़ों की खूनी पिकारियों से मेरा सीना सुख हो उठता था, रोगों में बिजली दौड़ जाती थी, क्षण-भर के लिए पतों का हिलना रक जाता था। मनोतियां चढ़ानेवाले श्रूदாலु लोग घड़ी-दो-घड़ी की पूजा-प्रार्थना के बाद घर चले जाते तो मौका पाकर दिन के समय कुते और रात के वक्त गीदड़ मेरे बदन पर जमी बिलदानी लूह की मलाई चटा करते। चौटियों और ड्रींगुरों का भी इसमें साझा हुआ करता। छितरे-छितराये अक्षत गौरैया की किसमत मे, पकवानों और मिठाइयां की इररी-डूरी कौओ के भाग मे। बकरे का धड़ मनौतीवाला टांग ले जाता और मूढ़ ले जाता वह आदमी जो कि बिल के पशुओं का गला काटता करता। यह काम उन दिनों जैनरायन का ताक किया करता था और अब भानजा करता है। मेरे सामने ब्रह्म बाबा के निमित बलि होनेवाले ये वही बकरे होते थे, जिन्हें मैं भली-भाँति पहचानता था और इसी से उनकी हत्या के समय मेरी तकलीफ और बहु जाती थी। पैदा होने के दस रोज बाद से ही वे मेरी गोद में खेल होते थे; शोखियों से भरी उनकी उछल-कूद, उनके मुलायम खुर्ों की खुशगवार धमक, छोटे-छोटे नथनों की उनकी हल्की पुरफुर्हाट मेरे दिल की धड़कनों का हिस्सा बन चुकी होती थी... और साल-दो साल बाद वही बकरे जब नहलाकर मेरे सामने खड़े कर दिये जाते तो उनका आतंकित चेहरा देखकर मेरा कलेजा सूख जाता भाई! पेडित यजमान से पहले तो बकरे की पूजा करवाता, फिर हथियार की। पीछे पंडित के अनु-सार यजमान दोनों हाथ जोड़कर बकरे से कहता—
'यह के निमित पशुओं की सृष्टि की विधाता ने यश के निमित ही उन्हें मार गिराया जाता है
इसी कारण मै तुम्हे मरवाऊँगा
यह की हिंसा हिंसा नहीं हुआ करती…'
"और मखौल तो देख, इस बलि के लिए घेर-घारकर बकर से उसकी खुद की भी मंजूरी ले ली जाती। यानी, जब तक उसके मुँह से 'में-में' की आवाज़ नहीं निकलवा लेते, तब तक बकर की गदन पर हथियार नहीं पड़ता।
"ब्रह्मबाजा यह बलि जो लेते थे, सो मुझे कभी नहीं अच्छा लगा बेटा, सच कहता हूँ। यों तो पाठकजी महाराज ने मेरी सारी रैनक चीन ली थी पाँच वर्षों तक, लेकिन समय-समय पर बकरे जो कटते थे वह कोई मामूली साँसत नहीं थी अपने लिए। भारी साँसत थी बबुआ ! तूने देखे हैं न बकरे कटते हुए ?"
जैकिसुन ने 'हाँ' की मुद्रा मे सिर हिलाया।
जैकिसुन वैणाव नहीं था। वह मछली, मांस, केकड़ा, धान के खेतों का चूना, खरगोश, कछुआ और डोका—सब-कुछ खाता था, जो कि उसके इलाके मे दूसरे लोग खाया करते थे। मगर बकरों की बिलि का बर्बर नजारा उसकी बर्दिशत के बाहर की बात थी। फूहड़ लुहार की बनायी हुई अनगद हैंसिया लेकर लोग मिनटों तक एक-एक बकरे की गदनं रेतते रहते हैं, उसकी आँखें पधरा जाती हैं और जीभ बाहर निकल आती है।
विल का दृश्य जैकसुन के लिए सदा ही असह्य रहा। उसने बाबा की वेदना का अन्दाज अच्छी तरह पा लिया था। अब वह तनकर बैठ गया और आगे की बातें सुनने की प्रतिक्षा में वृद्ध की ओर गौर से देखने लगा।
बाबा ने साँस को स्वाभाविक गति पर लाकर जैक्टिसुन की तरफ देखा और आहितसे से कहा :
"हमारी विरादरी की वनस्पतियों पर भूतो, पिशाचों, यक्षों, देवों तथा ब्रह्मों की यह 'दया-दृष्टि' कोई नयी बात नहीं है बेटा ! इनका और हमारा सदैव सम्पर्क रहा है। एक वह भी युग था जबकि हमारे पूर्वज मनुष्य की ताँजा अंतिडियों की माला पहना करते थे, एक वह भी युग था कि हमारी वेदियों पर कैदी राजाओं की आँखें निकालकर चढ़ा दी जाती थी; एक वह भी युग था कि ताँजा कटी उर्गिलियों का हार पहना-कर वटवृक्ष का श्रृगार किया जाता था, नरमुण्ड और आदमी का लहू यक्षों, देवों और ब्रह्मों के दबाव मे आकर जाने कितनी बार हमारे पुरखों को स्वीकार करना पड़ा है ! मुझे तो खैर, बकरों की बिल से छुटकारा मिल जाता था। हाय, हमारे पूर्वजों को जाने कैसी-कैसी बीभत्त और रोमांचकारी परिस्थितियों से गुजरना पड़ा था !"
जॉर्कसुन की धृदकन काफ़ी बढ़ आयी थी। ऐसा लगता था कि वह कोई खौफनाक सपना देखकर अभी-अभी जाग पड़ा है। चेहरा बेहद गम्भीर हो गया था, आँखों का तेज डूब-सा रहा था और अमल-ध्वल यौवनवाले जोठ की पूर्णमा इस वक्त जॉर्कसुन के लिए सिवाय एक विराट் शून्य के और कुछ नहीं थी।
बाबा को महसूस हुआ कि नाहक उन्होंने नर-वलि वाली ये बातें जैकिसुन से कही। खैर, जो हुआ सो हुआ !
बरगद बाबा का महसूस हुआ (के निहक उन्होंने नर-वाल वाली ये बात जांकसुन से कहा। खर, जो हुआ (से हुआ ! अब जोंकिसुन की पीठ पर अपनी बड़ी हथेली रख दी तो उसका अनमनापन टूटा। मन अपने काबू में आ गया तो चेहरे पर रैनक आगयी।
जैकिसुन ने बाबा की तरफ देखा तो उन बड़ी-बड़ी आँखों में अभय-दान की भावना छलक रही थी।
उसकी पीठ पर से अपनी हथेली वापस लेकर बाबा ने स्नैही स्वर्ग मे कहा :
"यह तुझे मैनें हजारों वर्ष पुरानी बातें बतलायी हैं। मनुष्यों की बलि चाहने वाले यक्ष-गन्धव, देव-देवियाँ और ब्रह्म अब बाहर नहीं रह गये—मोटी जिल्दों वाले पुराने पोथों की बारीक पंक्तियों के अंदर आज वे नजरवन्द हैं। राजाओं, पुरोहितों, सामन्तो, सोर्ग और तीर्थकरों की बातों का बढ़ा-चढ़ाकर बयान करनेवाले बहुत सारे विद्वान् सुदूर अतीत की उन क्रूर घटनाओं पर अब भी पदों डाले हुए हैं, वह उन लोगों के लिए सत्ययुग है, स्वर्णयुग है ! साधारण जनता का स्वर्ण्युग तो अभी आगे आने वाला है बेटा !
"तो, खूब पूजा होने लगी मेरी उन दिनों।
"लेकिन, मैं बेहद तकलीफ में पड़ गया। कोई खुले दिल से मेरे नजदीक नहीं आता था ! कोई मुझे छूता नहीं था। रात के वक्त दस-बीस पक्षी ज़रूर आ जाते थे, दिन दुपहरीया मे एक-आध गाय या भँस आकर ज़रूर खड़ी हो लेती थी, मगर आदमी मुझसे दूर-दूर रहता था। कड़ी धूप से बचने के लिए राहगीर अब भी मेरी छॉाई में आ बैठते, परन्तु धवजा, वेदी, लिबड़ा हुआ सिन्दूर, खून के निशान वंगेरह की ओर धूर-घूरकर देखा करते। बातचीत मे तकललुफ। हँसी और मुसकान में तकललुफ। डींकने-खॉसने मे तकललुफ। डर के मारे कोई धूकता नहीं था यहाँ। नेह-छोह की बातों पर वैसी अजीब पाबन्दी अपने-आप जाने कैसे होती हो आयी थी ! जोरों के ठहाक, मीठी-महीन खिलखिलाहट, प्यार और भलाई में पगी कानाफूसी, जोश-भरी ललकार... इनके लिए मैं उन पाँच वर्षों में किस हद तक तरसता रहा, बताना मुश्क्ल है बेटा !
"जेठ महीने की अमावस को हर साल सुहुनिगन औरतें बरगद के तने में हाथ-कते धागों के फेरे डालती हैं। जब से 'बरहम महाराज' की कृपा हुई मुझ पर, तब से उन्होंने भी मुझसे नाता तोड़ लिया। इसमें तो मेरा कलेजा ही टूक-टूक हो गया बेटा ! पाठकों के इस खान-दानी ब्रह्म पर में अंदर-ही-अंदर सुलग उठा… पहले कैसी मस्ती कटती थी ! कितनी पहल-पहल, कितना शोर-गुल रहता था यहाँ ! सधवाएँ सुहाग के लिए उस रोज फेरे डालती थीं मेरे चारों ओर—पायली की महीन और कड़ों की मोटी झंकार मेरी रग-रग मे सिहरन भरती रहती थी। उन सुहुनिगनों की मिठास-भरी बातें पंचे झुक-झुककर सुना करते।
अपने नटखट बच्चों की कड़ी भौंहों के इशारों से उनका वह डांटाना टूसों को संजीदा रखने के लिए काफी हुआ करता। किसी कमिसन बहुं के भोलेपन पर उनकी जबत मुसकान इन दीठ टहिनियों के लिए सालना सीख थी। हाय, उस बह्राक्षस ने मुझे कितने बड़े सौभाग्य से विचित कर दिया था ! एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं, पूरे पाँच वर्षों तक मेरे सीने पर वह पिशाच सवार रहा और जों की पाँच अमावसे इसी रो-रो कर काटी रे बबुआन !
"फिर, उस कम्बज्छ से मेरा पिण्ड कैसे छूटा ?"
"बतलाओं न !" —जॉक्सुन मन-ही-मन बोला। "बतलाता हूँ..."
कुछ देर रूक्कर बाबा ने कहा :
"जहू के लड़के मदूरी की शादी पचपन वर्ष की आयु तक नहीं हुई। वह अपने बरहम बाबा को पाँच बार बकरे की बिलि दे चुका, तब भी कोई लड़कीवाला उसे पूछने नहीं आया। अब अपने खानदानी ब्रह्म के बारे मे मदूरी की शब्दा डिगने लगी। ज्योतिषी, साधु-सन्त, ओझा-गुनी, औघड़-औलीया—जो भी मिलता, उससे मदूरी अपनी शादी की बाबत पूछा करता।
"फुलपरास-बाजार के करीब एक गाँव मे एक औच्छा था। साठ-पैसठ साल की उम्र रही होगी, लेकिन देखने मे चालीस-पचास का पहुा लगता था। जात का डोम होने पर भी शकल-सूरत मे बाबू-बबुआन की नाक काटता था। मूछ-दाढ़ी बड़ी-बड़ी, लेकिन घनी नहीं। माथे पर मामूली जटाएं। बदन का रंग गेहुआ। आँख बड़ी-बड़ी, पुतिलिया भूरी। कपार चौड़ा और नाक नोकदार व खड़ी... मालूम न हो तो कौन भला डोम बतलाता ? वह छोटी आयु में घर से निकल गया था। माँ-बाप नील के किसी गोरे कारखानेदार की छत छाया में कुछ समय रहे थे। बीस साल बाद जब वह अपनी जन्मभूमि को लौटा तो साथ में एक नेपाली सुन्दरी थी। परिवार से अलग, गाँव से दूर झोपड़ा बनाकर दोनों रहने लगे। एक लड़का हुआ और बस ! यह औच्छा बाबा आस-पास के इलाकों में जल्द ही मशूर हो गया। जहाँ कहीं भूत-प्रेत का उपद्व उठ खड़ा होता, जहाँ कहीं देव-देवी उत्पात मचाते, जहाँ कहीं ब्रह्म-कर्णपिशाची-चुड़ेल आदि की खुराफाते उभरती, वहाँ औच्छा बाबा की गुहार होती। उस सिद्ध डोम के पहुंचते ही आधी गडबड़ी दुरस्त हो जाती, जटाधारी औच्छा जोरों से चिम्ता पकड़कर जब "ओ 5555 अलख निर्जन भग् सा 5555 ले 5555 !!!" की ऊँची आवाज मारता तो बाकी खुराफाते भी खलम हो जाती। काफी दान-दक्षिणा और भेंट-सौगात देकर लोग उसे विदा करते। अपनी इहदेवी, 'कंकाली माई' के लिए वह एक बकरा और पाँच बोतल दा़र तो पहले ही तलव कर लेता था। ऊँची जात वाले डाह के मारे उसे डोमड़ा कहा करते थे।
"मह्लु इस डोमड़ा का गुण-गौरव पहले ही सुन चुका था। अब अपने ब्रह्म से उदास होकर वह उसके पास जा पहुँचा। सारी बातें ध्यान से सुन कर औघड़ बोला—'तुम्हारा बरहम भारी पाजी है। बरगद का सहारा उसे जब तक रहेगा तब तक तुम्हारी शादी नहीं होगी। कहो, तो चलकर मै उसे कैद कर लाऊँ!'
"मँटू राजी हो गया।
"कुछ दिन बाद डोमेडा रुपुली आया।
"अधिकलाल भी ब्रह्म की ओर से उदास थे। छोटी जातवालों की पाठकों के उस खानदानी 'ब्रह्म' में उतनी दिलचस्या नहीं थी जितनी कि उनके अपने देवताओं—भुइयाँ महाराज, सलहेग राजा और दीना भेदौ गैरैरह—में।
"कंकाली माई का नाम लेकर औघड़ ने एक ही साँस में देसी ठर का अब्दू चढ़ाया; महाप्रसाद तैयार किया था, जी-भर उसे भी पा लिया। इमीनान में चरस का दम लगाया। फिर चिमटा और झोली संभालकर मेरे करीब आया...
"पहले उसने वेदी पर चिम्ता फटकारा और जोरो से आवाज मारी, —'ओ SSSS अलख निर्जन भग् सा SSSS ले SSSS !!!' बाद में ध्वजा उखाड़कर अलग गिरा दी। झोली से खुरपी निकालकर जहाँ-तहाँ से चबूतरा खोद डाला। आखिर में लोहे की एक किल निकाली आधिइ ने।
"तब तक भारी भीड़ इकढ़ा हो गयी थी। सभी दम साधकर औघड़ का करतब देख रहे थे और मैं खूब खुश हो रहा था।
"उस किल को औघड़ ने मेरे सीने में ज़रा-ज़रा ग्यारह दफे छोका —छोककर निकाल लेता और देख लेता; ग्यारहवीं बार बोला : 'चकर-पाइन पाठक ! अब तुम इस किल की हिरासत में आ गये बाबू ! चलो, अब मेरे साथ…' "औच्छ द वह किल साथ लेता गया। रपउली से उत्तर मकरमपुर के नजदीक जीवछ की पुरानी धार के किनारे एक बुढ़ा पीपल था, उस किल को बाबाजी ने उसी के सीने में होक दिया... हथौड़ी की चोट से। जब समूची किल हुक चुकी तो औच्छ भभकार जोरों से हँसा था। रपउली से पचासों जने तमाशा देखने गये थे।
"इस तरह मुझे उस ब्रह्माक्षस से छुटकारा मिला और अगले ही वर्ष मन्झू पाठक का ब्याह एक लंगड़ी लड़की से हो गया था।
"दहशत के मारे फिर भी दो-तीन महीने तक लोग खुलकर यहाँ नहीं आते थे। लेकिन आहितसे-आहितसे बनिदेश टूटने लगीं, चरवाहों का अड्ा फिर जमने लगा। बच्चे बे-शिड्क यहॉ फिर खेलने लगे। जवान और अधेड़ बैतकल्लुफि से यहाँ फिर डटने लगे। बुढ़ों की यह आराम-गाह फिर बदस्तूर चालू हो गयी। छाँठे मे बैठकर बहु-बेటిयां फिर सनेह-छोह की मोटी-महीन जालियां बुनने लगीं और मै अपना सहज-स्वाभाविक जीवन पाकर फिर उसी तरह डूमने लगा।"
जैकिसन की आँखें खुशी से चमकने लगीं।
ग्रेिया के बच्चे ने मुलायम पंख हिलाये, उसकी नरम चंगुलों की मधुर परॉंच का अनुभव करके बाबा ने कहा :
"बेटा, जरा फुसरत दे मुझे!"
वह उठकर चूजे को उठाये हुए अपने बांके पेड़ की तरफ गये, डालों और टहनियों में गायब ।
थोड़ी देर बाद बाबा पेड़ से बाहर निकल आये, गोरैया का बच्चा साथ नहीं था।
बैठ गये और बोलें:
"वह अपने घोसले मे पहुँच गया है। तुझे नींद तो नहीं आ रही है ?"
जॉर्कसुन ने सिर हिलाकर बतलाया कि उसे नींद नहीं आ रही है। सचमुच उसकी आँखों में कही पता नहीं था नींद का ! जाने आज उसकी नींद कहाँ उड़ गयी थी ! दिन-भर भटका था, लेकिन थकावट नहीं महसूस हो रही थी…
बाबा ने कहा:
"रात अब दोपहर से ज्यादा हो आयी है। बातें अभी कार्फी बाकी है। आज सब बातें न भी बतला सकू तो व्या कोई हर्ज रहेगा ?"
जैकिसुन ने माथा हिलाकर इशारे से बतलाया—'नही।'
बाबा ने बतलाया :
"डेख, पूर्णमा की चாँदनी खिली हो और लोग जागे न हों, तो तू बेखटके मेरे यहाँ चले आया करना; घड़ी-आध घड़ी, पहर-आधा-पहर बैठकर मेरी बातें सुन लेना और फिर अपना चल देना ।"
जॉक्तिसुन ने संकेत से मंजूरी जत्लाई।
बाचा बोला: "पिछले भूकमप ने मुझे गिरा नहीं दिया होता तो अब तक में और बढ़ गया होता। वह दुर्घटना मेरी तन्दुर्सती को पी गयी और हमेशा के लिए मुझे अपाहिये बना गयी। कभी-कभी अपना जीवन मुझको भार प्रतीत होता है और तब अपनी मौत मनाने लगता हूँ, लेकिन इस बस्ती का कोई नहीं चाहता कि मै खलम हो जाऊँ। रपुउली का एक-एक बच्चा मुझे प्यार करता है, यहाँ की एक-एक स्ली मेरे स्वास्थ्य के लिए भगवान् सुर्यनारायण के सामने अपना आँचल फैलाती है। दुनोई, जैनरायन और उनके घरवाले ज़रूर ऐसा नहीं चाहते, मगर गाँव के आम लोगों तो मुझे अपने जीवन का एक आवश्यक अंश मानते हैं। मुझ पर सभी का समान अधिकार है।
"पता लगायेगा तो गाँव के बूढ़-बुढ़ियाँ तुझे मेरे बारे मे बतायेंगे। बाढ़ के दिनों में, आग मे समूची बस्ती खाता हो जाती है उन दिनों मे, प्लेग और महामारी के समय...मुसीबत का चाहे कैसा भी दौर गुजरा हो, मैं लोगों के काम आया हूँ। इनकी वजह से हर किसम की तकलीफ बरदाशत की है मंने...
"जीवनाथ का चाचा पागल हो गया था। एक बार वह कहीं से आदि उड़ा लाया और रात के वक्त उपर चढ़कर मेरी एक मोटी डाल काट डाली। मैं दो दिनों तक बेहोश रहा। लोग बेहद खंफा हुए और पकड़कर 'हड़ी' मे डाल दिया उसे उन्होंने। तेरा बाप, जानू राउत, चिकनी मिट्टी के चूरन मे तेल-हल्दी मिलाकर मेरे उस बड़े घाव पर गीली मिट्टी का मोटा पहुर डेढ़ महीने तक बाँधता रहा, खोलता रहा। निरोग तन की रोग का ताजा रस कटाव को भरता आया, जिन्दा छालों की पपड़ी चारों ओर से बढ़ती आयी। चार महीने बाद घाव की जगह बिलकुल भर गयी।
"मोटी डालो से अब बरोज के लाल-लाल गुच्छे निकलने लगे। कुछ-एक बरोज नीचे सटक गये थे। बरोज के ताजा गुच्छों की कांति मूंगे की दहकती लाली को मात करती थी। जो भी देखता, देखता ही रह जाता…
"बाद यों तो कई बार मैंने देखी है, लेकिन एक बार ऐसी भयानक बाद आयी थी कि यह समूचा इलाका पन्द्रह दिनों तक डूबा रहा ! उन दिनों जीवछ और कमला दो नहीं, एक ही नदी थी। अपने गाँव के करीब ही, पश्चिम की ओर जरा हटकर बहती थी। चालीस- पचास गाँव हुए होंगे। में अपनी जवानी मे मस्त रहता था। किसीकी कोई परवाह नहीं थी। उन्हीं दिनों वह विकराल बाद आयी। उस वर्ष वैशाख और जेठ के बीच हल्के-हल्के काफ़ी वर्ष हुई थी। किसान खुश थे कि भेदई की फसलें पहले तैयार हो जायेंगी और धान की अगहनी फसलों पर भी शुरू-शुरू की इन बारिशों का अच्छा असर पड़ेगा। लेकिन असाढ़ के बीचो-बीच जीवछ नदी में उस वर्ष अनोखी बाढ़ आ गयी!
"फसलें डूब गयीं, मैदान समुद्र बन गये। आस-पास के इलाकों में बहुत सारी बस्तियाँ कमर-भर पानी के अंदर आ गयीं। तेरी यह रपुलरी काफ़ी ऊँचाई पर है। सो, यह गाँव टापू-जैसा लगता था। रजबாँध भी पानी के अन्दर था और मेरे भी चारों ओर घुटना-घुटना-भर पानी लह-राने लगा।
"चमारों के घरों के अंदर पानी घुस गया तो वे बुढ़िया-पोखर के मुहार पर आ गये।
"धीमियापहरी के नजदीक मुमहड़ो की एक बस्ती थी। बाढ़ का प्रकोप बढ़ा तो वह कमर-भर पानी के अंदर आ गयी। औरत-मर्द सर-सामान और बाल-बच्चों को लिये-दिये भाग आये। मचान बाँधकर वे मेरी डालों पर रहने लगे। बड़ी मुसीबत थी बेचारों के लिए। रोज मजदूरी करें, रोज खायें...लेकिन उन दिनों तो सारे काम-काज बन्द पड़े थे। ज़मीन पानी के अंदर थी तो वहाँ भला काम क्या होता ?
पुरा तक चले जाते, कहीं उत्तरने की ज़ऱरत ही नहीं पड़ती बीच में। लेकिन इतने बड़े इलाके में सौ-पचास नावों से भला क्या होता? आम लोगों के लिए कहीं आना या जाना बिलकुल असम्भव था। निर्मली और भपिटियाही वाली रेलवे लाइन हाल ही तैयार हुई थी, ड्रिशारपुर से आगे मानसी तक वह डूब गयी थी।
"हाट और पेठ का काम रक गया था। खरीद-खरीदकर चावल-दाल जुटानेवालों के लिए और बेच-बेचकर धन्था कमानेवालों के लिए वे बहुत बुरे दिन थे। "दूसरे के खेतों में मजदूरी करके जीविका चलानेवालों का तो और भी बुरा हाल था। यह बाढ़ उनके लिए तो भुखमरी का बिगुल बजाती आयी थी। रास्ते बंद थे, भागना भी आसान नहीं था।
"मामूली किसान चावल तो क्या, जलावन के अभाव मे खेसाड़ी और मसूर के दाने भिगो-भिगो करके चबया करते थे।
"कुओं का पानी पीने लायक नहीं रह गया था। लोग पटापट बीमार पड़ते थे। दवा-दास का कोई इन्तजাম नहीं... राजाबादुर का एक वैदा था, वह खुद ही बीमार होकर मरने-मरने पर था।
"मैविश्यों के लिए चारा जुटाना मुश्किल था। चरागाह सब-के-सब पानी के अन्दर थे। तालाबों के भिंड, रजबாँध का कुछ हिस्सा, गाँव के बीचवाले खुले डीह... बड़े किसानों की ही गाय-भैंस और बैल उस पर चर पाने थे। बाकी दोर-डंगर गिलियों में आवारा फिरते थे, बाडियों के बाहर लतरी हुई तरोई-नेनुआ की बेलों पर मुँह मारा करते...हिर-याली के नाम पर बस उतनी भर गुजाइश रह गयी थी उनके प्रलोभनों के लिए।
"बाढ़ के उन दिनों में, बेटा, चार आदमी साँप के काटने से मर गये थे अपने गाँव में। बाढ़ के कारण दूसरे गांवों से ओझा-गुनी नहीं मँगाये जा सके, इस बात का लोगों को भारी अफसोस रहा।
"मरई, मडुआ, मकई-कावन की खड़ी फसलों चौपट हो गयी।
गोयना होने लगा, शాम-भर बाद उगना बेशार काठ बुरादा बनकर निकलता… हंसिये की शकल का यह खोदर तभी का है बबुआ ऐ!
जैकसुन बचपन से बरगद का खोडर देखना आया था। यह खोडर गाँव के बच्चों के लिए मिट्रि के खिलौने रखने का आना था। इसमें गिलली-डंडा, कौडिया, गुलेल की गोलीयां, गोफन के डेल, सतधरा और बाघ-गोटी की गोटिया वंगैरह भी जब-तब पड़ी रहती थी... इतने अच्छे पेड़ में यह खोडर कैसे बन गया, यह बात जैकसुन को मालूम नहीं थी। उसने बाबा के चेहरे पर गहरी दृष्टि डाली।
बाबा थोड़ी देर चुप रहा, फिर बोला :
"तेरे दादा के जम्माने में यहाँ से कोस-भर पूर्व एक साहब आकर बस गया। क्या ही शानदार कोठी बनवायी थी उसने ! महाराज बहा-दुर से दो सौ एकड़ जमीन गो-माल के पर्वे पर नील की खेती के लिए उसको मिली थी। दुमका की तरफ से मुमहड़ों के पचास परिवार वह ले आया, कोठी के दिक्जन उनकी बस्ती आबाद हो गयी। उन्हीं लोगों से साहब नील की खेती करता था। वे उसके गिरमिटिया मजदूर थे। वह उनका पूरा मालिक था—महनत का भी, जान का भी, माल का भी। उन दिनों गोरों का आम लोगों पर भारी आतंक था। शहर हो चाहे देहात, व्यापार-वाणज्य का क्षेत्र हो चाहे किसानी-जर्मीदारी का, जज-कलक्टर होता हो या सेक्रेटोरियट—सभी जगह गोरी चमड़ियावार्को की तूली बोलती थी। कानून और हुकमत उनके बूटों की किलों के नीचे थे। राजाओं के मुकुट और जर्मीदारी के तुरंदार पगड़ फिररोग्यों के रास्ते की धूल के जरों को चूमने के लिए बेताब दीखते थे...
"पचास वर्ष तक यह कोठीवाल साहब पास-पड़ोंस की जनता के स्वाभिमान को रौंदता रहा। अपने गिरमिटिया मजदूरों के साथ तो वह इस तरह पेश आता था, जिस तरह बाघ खरगोशों के साथ पेश आता है। बाकी लोगों की भी उसकी नजरों में कोई कीमत नहीं थी। धनी-मानी जो थे, वे किस-किसम की सींगात भेजते रहते थे। साहबबहादुर की खिदमत मे, कि उन पर उसकी शनि-दृष्टि न पड़ जाय ! परसादीपुर, धर्मियापृति और अपनी रुपुअली के किसानों पर इस जोन साहब ने तिनकित्या लागू कर दिया था।
"तिनकीठिया समझा बेटा ?"
"नहीं!" —जॉक्सुन ने निषेध मे सिर हिला दिया।
"एक बीधा में बीस कटुदा ज़मीन होती है न ! तो प्रति बीधा तीन कटुदा जमीन मे नील की खेती करने के लिए किसान मजबूर किये जाते थे। यह दबाव ज़मीदारों और सरकारी अफसरों द्वारा डलवाया जाता था। जो नहीं मानता, उसे कई तरह से परेशान करते थे। तुम्हारे दादा को जॉन साहब के साल मे महज इसलिए पीट दिया एक बार कि वह सलाम करने से चूक गया था। बाजार से आ रहा था। एक हाथ में तेल का बर्तन था, दूसरे मे मछली लटक रही थी; बगल से लाही दवा रखी थी और माथे पर अरहर की छोटी-सी गदुर। इधर से घोड़े पर सवार गोरा जा रहा था, जोन साहब का साल। दोनों एक-दूसरे को पहचानते थे। तेरा दादा आपका खोकर कुछ सोचता चला आ रहा था। उसे साहब को सलाम करने का खयाल ही न रहा। अगले ही रोज साहब के सामने अधिकभाई की पीठ पर हेंटरों की बौछार पड़ी... ता-जिन्दगी तेरे दादा की पीठ पर हेंटर के वे निशान बने रहे !"
यह घटना सुनकर जैक्सुन की मानो सांस टंग गयी। बेचारे को इसके बारे में बिलकुल मालूम नहीं था। चम्पारन में नील के कार्खानेदार कई थे, इतना तो वह जानता था, लेकिन अपने इस इलाके में भी कोई नील-दानव कभी रहा होगा—यह कल्याण जैक्सुन को नहीं थी। कोठी और बंगले का खँड़हर तथा नील की टूटी-फूटी हैी वह बचपन से देखता आया था। बाबा ने कहा :
"पचास-पचपन वर्ष हुए, साहब अपनी जमीन बेचकर कलकता चला गया। नील की खेती पीछे फायदें की नहीं रह गयी और पास-पड़ोंसे के दबे-पिसे किसानों का धीरज छूटने ही वाला था कि फिरगिया जान लेकर भागा।
"इस गाँव में सबसे पहले जैनरायन के चाचा ने अंग्रेजी पढ़ी। घर से चवल और दाल दरभंगा पहुँचाये जाते, खुद रसोई करके बेचारा खाता-पीता। उन दिनों पटना में युनिवर्सिटी नहीं थी। बिहार बंगाल के अंदर ही था। सन् १५०५ ई० में कपिलेश्र ने मैट्रिक पास की और दो साल बाद मुखार बन गया वह। लहोरियासराय की अदालत मे मुकदमों की पैरवी करने लगा। चार-छ: वर्ष बाद तो जैनरायन का यह चाचा चमक उठा। लहोरियासराय के अच्छे मुस्ठारों मे उसकी शुमार होने लगी।
"दूसरा आदमी था दुनाई का भाई जगमोहन, जिसने अंग्रेजी पढ़ी लिखी। एट्रेंस की परीक्षा पास होते ही वह झारखण्ड की किसी स्टेट मे छोटा तहसैलदार बहाल हो गया। उसकी भी किसमत अच्छी तरह चमकी।
"अब तो खैर, रपुली मे पचीसो आदमी अंग्रेजी पढ़-लिख गये हैं मिडल तक तो तू भी पढ़ा है न ?"
सिर हिलाकर जैकिसुन ने स्वीकार किया।
बटैसरनाथ बोला :
"तैरी जात-बिरादरी के लोग भी अब पढ़ने-लिखने लगे हैं। कुछ तो अच्छे ओहदों पर भी पहुँच गये हैं। कई अब असेम्बली के मंबर भी हैं… पहले जमाने में जान-विदान और पढ़ई-लिखई बड़ी जात-वालों की बपौती थी। अब पाठशालाओं और स्कूलों के दरवाजे सभी जातियों के बच्चों के लिए खुल गये हैं मगर ऊँची जातवाले का आपसी पक्षपात और 'शुभ-लाभ' के लिए उनकी आपाधापी जब तक मौजूद रहे।, तब तक मानव-समाज की सामूहिक प्रगति नहीं होगी।"
जैकिसुन को सकरी का वह अछूत स्टेशन-मास्टर याद आया जिसके बारे में थूक लगाकर टिकटें बॉर्टने की अफवाह उड़ायी थी लोगों ने...
क्षण-भर रूक्कर बाबा ने कहा :
"तेरे बाप की यह भारी साध थी कि बेटा कुछ पढ़-लिखे जाय। वह जिन्दा रहता तो ज़रूर तू मैट्रिक पास कर लेता। विधा सिर्फ धन से नहीं होती। धन से ही अगर पढ़ाई होती तो राजाबाहदुर का परपोता यह बाबू कृष्णदतिंश सारी डिग्रियाँ हासिल कर चुका होता। कितने मास्टर रखे गये, कितनी रकम खरची गयी उसकी पढड़ई पर ! मगर मैट्रिक से आगे वह नहीं बढ़ सका।
"जानू राउत पढ़-लिखा नहीं था लेकिन दुनिया उसने खूब देखी थी। पटना, जमशेदपुर, कलकता, ढाका और जलपाइगुड़ी और कितहार का पानी पिया था उसने। बाबूसाहब देवीदतसिंह ने चारों धाम की यात्रा की थी, उस यात्रा मे टहलुआ के तौर पर तेरा बाप ही साथ गया था। बाबूसाहब घूम-घामकर जब वापस आ गये तो जानू राउत को इनाम मे मन-भर चாவल, धोती-चादर और एक गाय मिले थी।
"बाबूसाहब ने धूम-धाम से अपनी मां का श्राढ़ किया था। श्राढ़ के बाद पच्चीस सौ पंडितों को निमन्त्रण गया था। पहली वर्षों के अवसर पर देश के कोने-कोने से विद्वान् लोग गौरीपुर-डेवढ़ी मे जुटे थे। विदाई और आदर-सलकार में एक लाख खर्च हुआ। तेरा पिता दो महीने राजासाहब के यहाँ प्रबन्ध-सम्बन्धी कामों में लगा रहा। वह बड़ा चतुर था, साथ ही महतरी और इमानदार भी था। स्वाभिमान की भी काफी मात्रा थी उसके अंदर। इसीसे राजाबाहदुर समय-समय पर उसे दरबार मे बुलाते रहते। दस-पांच रोज डेवडी में रहकर जाए काम कर देता और सलाम ठोककर वापस आ जाता। जी-हुज़री में उसका दम घुटता। मुफ्तखोरी उसके स्वभाव के अनुकूल नहीं थी। दूसरा होता तो दरवार में बिलकुल चिकक जाता।"
जैकिसुन को अपना बाप अच्छी तरह याद था। आठ वर्ष पहले उसका देहानत हुआ, तब जैकिसुन की आयु पन्द्रह साल की थी। पिता के बारे में उसने मां से बहुतरी बातें सुनी थीं। लेकिन बाबा के मुँह से अपने बाप की प्रशंसा सुनकर जैकिसुन गद्रद हो उठा। '३०-३२ के आन्दोलन में जानू राउत दो महीने जेल भी रह आया था। नमक-कानून तोड़ने के दिनों में बस्ति रपउली के तीन आदमी गिरफ्तार हुए थे... जानू राउत, दयानाथ राय और वीरभ्रद झा... जैकिसुन उन दिनों दाई-तीन साल का अबोध बालक रहा होगा। उसने सविनय कानून-भग आन्दोलन के बारे में काफी कुछ सुन रखा था। अब सही ब्यौर वह बरगद बाबा से मालूम करना चाहता था। पुरानी बातें कुछ-न-कुछ सुन हों ली थीं, आगे जैकिसुन को राष्ट्रीय मुक्ति-संग्राम की कहानी सुननी थी...
बाबा ने गम्भीरतापूर्वक कहा :
"जुआ को सांप ने काट लिया, नहीं तो पच्चीस-तीस वर्ष वह और जिन्दा रहता। पडोंस के घर की पुरानी भीत में चूहों ने बिल बना रखे थे। वही एक बिल में कही से आकर काला नाग रहने लगा था।
"जानू राउत को वागवानी का बड़ा शोक था। घर के पिछवाड़ दस धुर (विवंबोंसी) की वह वाड़ी तेरे वाप की महत्व-महावकत से हमेशा हरी-भरी रहती थी उन दिनों। तेरी माँ को लगाव हरियाली से उतना कभी नहीं रहा। अब तो खैर बुढ़ी हो गयी है, आठों पहर होकेके की नारियल सताये रहती है। पहले भी काम के पीछे हाय-हाय करनेवाली औरतों में तेरी माँ की शुमार रही हों, ऐसी बात नहीं थी। देखा है तूने कभी अपनी माँ को हहुी-तोह महनत करते ? सच-सच बतलाना ! हँ!"
जॉर्जसुन ने सिर हिलाकर 'ना' का संकेत किया।
बादाबोला:
"तो, खेती-गिरसती से जो समय बच जाता उसका अधिक अंश अनुआ अपनी बिगिया की साज-सँवार में लगाता। राजासाहब के बाग से कागजी नीबू का एक कलम ले आया था। अब उसकी झाड़ हर साल फल देती। एक पेड़ अमस्द का लगया था। बीजू आम के दो पेड़ काफी बड़े हो आये थे। एक झाड़ गुलाबजासुन की भी लगायी थी। अलावा इसके, मौसमी साग-भोजियाँ वह खुद ही उगा लेता था। एक बार छिपा-कर जागुं ने गाँजें के दो पौथे उगाये थे..."
"गाँजे के पीथे !" ...जौक्सुन चौक उठा। पिछले वर्ष परसादीपुर का एक बामन इसीलिए फँस गया था कि उसके घर के पीथे गॉजे का एक पौधा देखा गया था। चौकीदार ने थाने में जाकर रिपोर्ट कर दी। लाल मुरेठावाले दो जवान आये और असामी को गिरफ्तार करके लहिरियासराय ले गये। लाख कोशिश-पैरवी पहुँचायी गयी लेकिन अदा-लत ने दो महीने की कड़ी केद की सजा ठोक ही दी उस गरीब पर ! पकड़ जाने पर जौक्सुन के पिता को भी अदालत देंद दे सकती थी... जौक्सुन को ऐसा लगा कि इस वक्त भी उसकी बाड़ी में गाँजें के पीथे खड़े हैं और चौकीदार ने थाने में खबर कर दी है... वह देखो, लाल पगड़ीवाले उसे गिर्फ्तार करने आ रहे हैं।
"तेरा बाप गाँजा खूब पीता था। लेकिन जान-बूझकर उसने गाँजें के पीथे नहीं उगाये थे उस बार। भंग के पीथे समझकर पहले जिन्हें बढ़ने दिया, बाद को अपनी तेज और मस्त कर देने वाली बू की वजह से कुछ और ही सावित हुए। पितिया और दूसरे उन पौधों के भग की ही तरह के थे, हाँ, महक उनमें गाँजें की थी। मसल-मसलकर अनुआ ने उन्हें सूया, कई दफे सोचा... भोग की ही कोई किसम होंगी। दयानाथ से उसकी खूब छनती थी। मालूम होने पर दयानाथ ने मना किया था कि मत रखो उन पौधों को, फैक दो उखाड़कर, फसाद की जड़ हो सकते हैं साले ! क्या कमी है, बाजार से लाकर दम लगाया करो... "परन्तु नहीं, वे पौधे खूब बढ़ और चुपचाप बढ़। उनकी मंजरियाँ सुखा-सुखाकर जानू ने रख ली और बरसात के दिनों में चिलम में सुलगा-सुलगाकर उनका मजा लूटा। बस, दुबारा नहीं गाँजें के पौधे उसने कभी फिर पाले।
"उसी बागवानी ने बेचारे की जान ले ली।
"थोड़ी-सी जगह और काफी पेड़-पौथे...रंगनेवाले कीड़ों के लिए तो वह कुज्वन ही था। बरसात का मौसम उस कुज्वन को बेहद घना कर देता था। रात-भर मेढ़क, न्योले और ड्रींगुर वहाँ कोलाहल मचाये रहते।
"पड़ों का घर एक कविजी महाराज का था। पलती, तीन बच्चे और पीतल-कांसे के चार-छ: मामूली बर्तन, मिट्रि के दो-तीन मटके, फटे कम्बलों और पुरानी रजाइयों का छोटा-सा डेर, टूटी तखतपोश—ऊपर से फूस के छपरों वाला पुराना मकान। गिरस्सी का बुरा हाल था। बच्चे शायद ही तन्दुर्स्त रहते हैं। आमदनी का कोई बँधा-बंधाया सिलसिला तो था नहीं। श्रीमन्ती, जमीदारों, राजाओं तथा नेताओं के मिज़ाज माकूल रहे तो चार पैसे मिल गये वरना टके की बादशाही में मस्त रहते थे कविजी—भंग का हरा रस ही उनके लिए सुधासिन्धु था। उनके पैरों में चककर था। बीस वर्ष की आयु के बाद शायद ही वह कभी पन्द्रह रोज लगातार रपुउली रहे हों। स्वर कविजी का इतना मीठा था कि रोता हुआ शिशु उनका कविता-पाठ सुनकर मुसकराने लगता या, बिलली अपने शिकार को सामने से बेधड़क गुजर जाने देती थी।
"न जाने, कहाँ से एक करैत (काला नाग) आकर कवि के घर की भीत के अंदर रहने लगा था। पडोसियों ने कवि का ध्यान उस ओर दिलाया तो वह क्या बोले, बताؤँ ?"
जैकिसुन बाबा की ओर प्रश्नसूचक निगाहों से देखने लगा। अभी चार ही साल पहले तो कवि का स्वर्गवास हुआ है...
बाबा ने कहा:
"कविजी बोले... 'स्वयं शेषनाग ने यह कृपा की है मुझ पर ! मैं अपना खण्डकाव्य समूचा-का-समूचा भगवान् नागनाथ को सुनाऊँ ! मलकुणीकन्दन !! (खटमल-विलाप) कितनी महत्व से मैंने यह रचना तैयार की है।'
"उस शेषनाग ने जानू राउत पर बड़ी विकट कृपा की, कविजी पर चाहे जैसी कृपा की हो!"
जैकिसुन को अपने बाप की मौत की याद आ गयी। शాम का वक्त था। सूरन का चोखा बना था रसोई में। राउत ने जैकिसुन की माँ से पूछा… 'नीबू का रस खूब डाला है कि नहीं?' जवाब में किसी ने कुछ नहीं कहा। राउतइन ने एक ही नीबू निचोड़ा था, बेचारी को खुद ही सन्देह था कि जिमीकन्द की कवकवी (खरास) इतनी-सी खटाई से कटी होगी। राउत घर के पिछवाई गयी, बिगिया से नीबू लाने। लोटा तो 'सी-सी-सी-सी' 'सू-सू-सू' करता हुआ आया और धम् से आँगन की लिपी-पुती भूमि पर बैठ गया। दो नीबू थे हाथ में, वे छूटकर अलग-अलग दिशा में लुढ़क गये… साँप ने इस लिया था दाहिने पैर की एड़ी के पास… जहर फैलता गया, बेहोशी बढ़ती गयी। सुबह होते-होते नाडियों की गति बिलकुल रक गयी। इसी बरगद के नजदीक रात भर झाड़-फूक होती रही थी…
जैकिसुन को वे क्षण अच्छी तरह याद थे।
बाबा चुप था।
जॉर्कसुन अपने पिता की स्मृति में डूब गया। बुलन्द चेहरा, चौड़ा कपार, घनी भीँहें, सफेद और चिकने दाँत, छँटी मूई... बदन में बाल कितने थे ! और हँसता था किस तरह खिलखिलाकर। ज्यादा बोलता नहीं था !
জঁকিসুন বাপে কে কণ্ঠের পর বৈতকর পরসাদীপুর আর সত্যামা জায়া করতা খা দুর্গাণুজীয আ কৃষ্ণাধমী কে মেলে ম্খিয়েত দেক্সনে... লেকিন তব ভহ সাত-আত ভর্ষে কার হোগো। ননিহাল কে রাস্টে ম্খিয়েত বলান কি ধার পড়তই নে, চীমাসে মে তো বীতত দাওয়ার কি শরণ লেটেই লেকিন কর্ড বোল উঁকিসুন নে পিডা কো হাথ পকড়কর উঠে নদী কো পার কিয়া হোগো... ঘুটনো-খর যা কমর-খর পানী মে সে হোক।
जैकिसुन को थोड़ी देर तक सोचने का मौका देकर बरगद बाबा फिर बोले :
"जानू, दया और वीरभद्र, तीनों एक ही उम्र के थे। तीनों का बचपन मेरी छॉह में बीता था। "दयानाथ शत्रुमर्दन राय का पोता था। वीरभ्रद था बलभ्रद का पोता। दयानाथ को पढ़ने-लिखने का मौका नहीं मिला लेकिन वीरभ्रद कलकता यूनिवर्स्टी का ग्रेजुएट था। घरवालों की राय में उसे 'बंगाल की हवा' लग गयी थी।
"बंगाल की हवा का मतलब समझा ?"
"नहीं!"
जैकिसुन की समझ में सचमुच नहीं आया कि बंगाल की हवा से बाबा का यहाँ क्या अभिप्राय है।
बाबा ने कहा:
"बंगाल के नौजवान महात्मा गांधी की असहयोग और सत्य-अहिंसा की बातों मे आस्था नहीं रखते थे। दुश्मनों को पछाड़ने के जितने भी तरीक हो सकते हैं, वे उन्हें आजमाने के पक्ष में थे। इस्त्र-इण्डिया कम्पनी के जमाने से ही गोरी हुकूमत के खिलाफ बंगालियों का सशंख प्रतिरोध शुरू हो गया था। कर्जन जब बड़ा लाट होकर आया तो उसने बंगाल को दो हिस्सों में बातना चाहा। वहाँ की शिशित और अशिक्षित समूची जनता ने अंग्रेज शासकों की उस कुटिल नीति का विरोध किया। नौजवानों ने कई गोरे आफ़िकरों को मार डाला और क्रान्तिक की एक नयी परम्परा हिन्दुस्तान में शुरू हुई। सामाज्यवादशाही बौबला उठी तो दमन का चक और जोरों से चलने लगा। अंग्रेज कूटनीतिख गोखले और गांधी जैसे नेताओं की उतनी परवाह नहीं करते थे, क्रान्तिकारियों के गुप्त संगठनों की उभार तो ब्रिटिश प्रभुओं की नींद हराम किये रहती थी…
"मैट्रिक करके वीरभ्रद कलकता चला गया था। ट्यूशन करके अपना सारा खर्च निकालता था। बंगाली विद्राधियों की संगति में पड़कर उसके भी विचार बदल गये थे।
"घरवालों की आशा के முताबिक उसे वैकिल या डिटी मिजिस्ट्रेट या प्रोफेसर होना चाहिए था। लेकिन बारह-चौदह वर्ष कलकना रहकर भी वीरभद्र वीरभद्र ही बना रहा। उसकी चर्च चलती तो लोग कह उठते—बंगाल की हवा लग गयी लड़के को...
"एक बार तीन साल की और दूसरी बार दो साल की कैद काट चुका था वीरभ्रद। तीसरी दफा वह यही अपनी बस्ति रपउली में ही सोलह महीने नजरबंद रहा; हपते में एक बार খाना पहुँचकर दरोगा से मिलना पड़ता था और गाँव का चौकीदार हर रात एक-आधार नाम लेकर वीरभ्रद को पुकार लेता।
"संसुरालवाले काफी मातबर थे। औरत अपने माँ-बाप की इकलौती थी। वीरभद्र का अपना घर भी 'सुखी खानदान' कहलाता था। दो बड़े भाई थे, एक बेतिया-राज की किसी सिर्कल में मैनेजर था और दूसरा घर-गिरस्की सँभाले हुए था। परिवार बड़ा था सही, मगर अस्त-व्यस्त नहीं था। जमीन काफी थी। पोखरा था, बाग-बगीचे थे। काम करने के लिए जन-बिनहारों की कमी नहीं थी…वीरभद्र पर दुनियादारी का रती-भर भार नहीं था। बंगला-गीतजिलि, गीता का तिलक-भाष्य और अंग्रेजी दैनिक अमृतबाजार पत्रिका—कुछ समय तो उसका इनमें कट जाता और कुछ समय गेंवंई बातचीत व बच्चों के साथ खेलों में।
"दयानाथ को अपने जीवन में पढ़ने-लिखने का अवसर नहीं मिला था सही, लेकिन महात्मा गाधी के लिए उसके अंदर अपार शब्द और गम्भीर भक्ति थी। यह शब्दा-भक्ति अंकुरीत तो तभी हो गयी थी जबकि चम्पारन की भूमि पर गाधीजी के चरण पड़े थे। नील के कार्खानेदार साहबों की तरफदारी में पहले तो सरकार तन गयी परन्तु पीछे उसे झुकना पड़ा और इस प्रकार चम्पारन की जनता को नील-दानवों से छुट-कारा मिला। चार वर्ष बाद असहयोग-आनदोलन छिड़ा तो गाधी की कीति में मानो पंख लग गये; महात्माजी के नाम पर चम्कारपूर्ण सैकड़ों कівदनियाँ लोगों के होठों पर शेरकती फिरेंी; वाँसुरी के छेदों से छन-छनकर गाधीवाले बीसियों गीत गंदक, बागमती, कम्ला और कोसी की लहरों पर मचलते फिरे।
"१९२३ में नागपुर में ड्रांदा-सत्याग्रह छिड़ा तो वे वैशाख के आखिरी दिन थे। रबी की फ्रासलं न केवल पक चुकी थीं बल्कि खेतों और खिल-होनों से उठकर घर के अंदर पहुँच गयी थीं। अगहनी फ्रासलें भी उस साल अच्छी हुई थीं। दयानाथ ने हिसाब लगाकर देखा कि अठारह महीने की खुराक के लायक अनाज मौजूद है। गने की पिछली उपज से गुड़ तैयार किया था जिसकी बिक्री से पचास रुपये आ गये थे। "उपज अच्छी हुई हो और घर-गिरिस्त्री का काम ठिकाने से चल रहा हो, तो किसान अपने को व्या समझता है बेटा ?"
जॉक्सुन ने बाबा की तरफ देखा।
बाबा ने आँखें दुहरी करके उसे वार-वार देखा।
ऑक्तिसुन की पलकों नीचे डुक गयी...
बाबा ने जॉक्सुन की तुईी छूकर उसे अपनी ओर मुखாतिब कर लिया और कहा :
"उस हालत में किसान अपने को बादशाह समझता है, बल्कि उस स्थिति में वह अपने आगे किसी को कुछ नहीं समझता, है न?" जैकिसुन ने माथा हिलाकर स्वीकार किया।
बाबा बोले :
"नागरपुर के इंडा-सत्याग्रह की खबर सूखे सरकंडों के जंगल में आग की तरह जोरों से फैल रही थी। गாந்தीजी जेल के अंदर थे। लोगों में बेहद उटेजना थी। वीरभ्रद का भाई काशी से 'आज' मंगविता था। दुपहरिया में और रात के पहले पहर के वक्त उसके दालान में छोटे-मौखोंले किसानों का अडुा जमता। यह उन्हीं तर्कपंचानन महाशय की चौपाल थी जिनके बारे में पहले बता चुका हूँ। पहले इस दालान पर भागवत और ब्रह्मवैवर्त पुराण, कृतिवास की रामायण और काशीरामदास का महाभारत, पीछे सुखसागर-प्रेमसागर और रामचरितमानस का पारायण होता आया था। अब बनारसी दैनिक 'आज' का नम्बर था।
"असहयोग और सत्याग्रह की हलचलों को यह अख्बार उछलती भाषा में छापता था। किसान बड़े गौर से उन्हे सुना करते।
"दो वर्ष पहले चौरीचौरा-काण्ड के बाद गாँधीजी ने आन्दोलन पर रोक लगा दी थी, पस्तिहम्मती के कारण लोगों का दिल पधरा गया था। इंडा-सत्याग्रह में शामिल होने के लिए कांग्रेस की अपील सुनकर अब उनके अंदर फिर सुरसुराहट पैदा हुई। दयानाथ ने किसी से कुछ बतलाया नहीं, अगले ही रोज पटना के लिए वह चल पड़ा। स्वयं-सेवकों के जतहे में नागपुर पहुँचा। खत आया तो गांववालों को उसका ठौर-ठीकाना मालूम हुआ।
"कुल मिलाकर दयानाथ बाईस रोज़ नागपुर-जेल में रहा। छूटा तो सीधे रुपुली आया।
"पूछने पर लोगों से यही बताया कि तीर्थ-यात्रा से लौटा है।
"और, सचमुच नागपुर का वह जाना-आना उसके लिए तीर्थ-यात्रा ही था। उन दो-दाई महीनों में दया को जितना कुछ तजरा हुआ, उतना तीस वर्षों की आयु मे उससे पहले कहाँ हुआ था।
"तेरा बाप उन दिनों दाके में था और वीरभद्र था कलकते में। मैने दयानाथ से इंडा-सत्याग्रह की सारी कहानी सुनी तो उस व्यक्ति के सौभाग्य के प्रति एक पवित्र इर्षार् का अनुभव हुआ।
"बेटा, में अब काफ़ी सयाना हो गया था। असहयोगियों और सत्या-ग्रहियों की शास्त्रमय निहथी भीड़ पर लाही-चार्ज की खबरे सुनता तो पतते खड़े हो जाते; टूसी से गरम-गरम भाग निकलने लगती और इन टहनियों में कुछ तनाव-सा महसूस करता।
"सतगामा के यह लीडर, जो आजकल पालियामेष्ट के मंबरर है, व्या नाम है उनका ?"
"कुलानन्द दास"—मन-ही-मन जैकिसुन बोला।
"हाँ हाँ, कुलानन्द दास ! याद आया नाम रे !
"यह बाबू कुलानन्द दास सन् बाईस में वकालत छोड़कर गाधी महत्वा के दल में शामिल हो गये थे, पता है तुझे?"
जॉर्जसुन ने 'ना' के तौर पर माथा हिला दिया।
बाबा ने कहा:
"ऐसी बात नहीं कि वकालत उनकी खूब चलती रही हो, तो भी घरवालों ने उन्हें इसकी इजाजत नहीं दी थी कि जेल चले जायें।
"उन दिनों असहयोग की धूम मची हुई थी…कोई अपनी नौकरी से इस्तीफा दाखिल कर रहा था; कोई कालेज की पढ़ाई छोड़ रहा था;
कोई प्रोफेसरी और मास्त्री पर लात मार रहा था। असहयोग की बातों को लेकर पढ़-लिखे लोगों में खूब चल-पहल थी। "अपनी इन देहातों का साधारण ढाचा पिछले पंचीस-तीस वर्षों मे थोड़ा-कुछ बदला अवश्य था, परन्तु परिवर्तन की यह कोई उसाह-वर्धक रणतार थोड़े थी।
"रेलेवं की छोटी लाइनें उत्तर की ओर नेपाल की तराई को छू चुकी थीं। उन दिनों इस रेलवे का व्या नाम था, मालूम है न ?" जॉक्सुन ने संकेत से स्वीकार किया।
"हाँ, बी० ऐन० डब्ल्यू० आर० (बंगाल-नॉर्थ-वेस्टर्न रेलवे) ! यही नाम था। सकरी से उत्तर की ओर मधुबनी होकर एक नयी ब्रांच लाइन निकाली थी जिसका आखिरी स्टेशन जयनगर था। सकरी से पूर्वबाली लाइन भपतियारी, सुपौल, सहरसा तथा मानसी होती हुई महादेवपुर घाट तक पहले ही खुल चुकी थी। इस और महादेवपुर घाट और उस और बरारी घाट, भागलपुर...स्टीमर-सिविस मुसाफ्रों को गंगा पार कराने लगी थी। समस्तिपुर रेलवे का भारी जंवंशन हो गया। सिमरिया घाट और मुकामा घाट के दरम्यान जहाज चलने लगे थे। दर्भंगा से उत्तर रेल की एक लाइन फैली जो सीताम्ढ़ी, रक्षौल, नरकित्यांगज, छितौनी घाट तथा भिसवावा बाजार होती हुई गोरखपुर को ছुरी थी। इधर के सभी प्रमुख नगर रेलवे द्वारा एक-दूसरे से जुड़ चुके थे। रैयाम, लोहट, रीगा, मुक्तापुर आदि कई स्थानों में अंग्रेज सौदागरों ने चीनी और जूट की मिलें खड़ी कर ली थी। विलायत की बनी चीज़ अब इन इलाकों में ध्छल्ले से मिलने लगी थी। देहाली कार्गेगरों पर इसका बड़ा ही बुरा असर पड़ा।
"अपनी इस बस्ती रपउली पर भी इस नयी व्यवस्था का वैसा ही बुरा प्रभाव पड़ा..."
जॉर्कसुन ने बाबा की ओर देखा। निगाहें प्रश्न उगल रही थी।
बाबा बटेसरनाथ बोले :
"चमार जूते बनाना भूल गये। मोहिनों के पांच करचे थे सो अब एक ही रह गया। चीनी की आमद ने गुड़ के व्यापार को चौपट कर दिया। बटन, सुई, आईना, कंची, उसत्रा और कैची...कपड़े, खेती के औजार...बाहरी माल आ-आकर स्थानीय उद्योग-धन्थों का गला दबाने लगे। तेजी और मन्दी के दो पाटों मे पड़कर अनाज का एक-एक दाना कराह उठा बेटा ! अनाज का एक-एक दाना ही नहीं, गाँव का एक-एक आदमी कराह उठा बेटा ! बतन में पानी तो पहले ही जितना आता था, लेकिन छेद उसमें एक के बदले अनेक हो गये थे !!
"इस अपूर्व धंस-लीला के साथ ही रोजगार की कुछ नयी सूरतं भी निकल आयी थी। नये ढंग में तालीम पाये हुए आदमियों का एक नौकरीपेशा बाबू-तबका और आपसी भेद-भाव भूलकर अनोखी मशीनों के जरिये नये तौर-ओ-तरीकों से काम करनेवाले मजदूरों का एक सर्व-हारा-वर्ग अस्तवत मे आ चुके थे।"
जॉर्कसुन को बाबा का यह प्रवचन बुरा नहीं लग रहा था। अफसोस उसे यही हो रहा था कि जीवनாथ और सरजुग भी क्यां नहीं पेबातं सुन पाये !
रात तीन पहर तो नहीं, लेकिन दाईं पहर जस्त्र बीत चुकी थी। मनीगाधी की तरफ से आनेवाली दो बजे की पैसंजर ट्रैन धरती को धमधमाती हुई अभी-अभी निकली होगी...
घण्टे-भर बाद चरवाह भंसों को खोल देगे तो उनके खुरों की आवाजें और नथनों की फरफराहट सुनकर बुढ़ों की नींद अवश्य उच्चजायगी।
थोड़ा रककर बाबा ने जैकिसुन से पूछा—
"क्यों, घास-खाम तो नहीं लगी है?"
स्वीकार की मुद्रा मे जैक्टिसुन का माथा हिला। फिर वह अलग जाकर पेशाब कर आया।
तब तक बाबा दोने मे पानी ला चुका था। जैकिसुन ने एक ही सांस मे पी लिया और दोने को फैक दिया।
दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए बाबा ने कहा :
"अपने देश मे आजादी की लड़ाई कई मंजिलों से गुज़रती हुई आज की स्थिति तक पहुँची है। राजनीतिक उथल-पुथल का देशव्यापी विराट प्रदर्शन १९२१ के अन्त में पहली बार हुआ। 'प्रिंस औफ वेल्स' को बड़े-बड़े शहर्ों में घुमाया गया था। शाही स्वागत तो उसका हुआ नहीं, हाँ, विरोध-प्रदर्शन अवश्य हुए। ब्रिटिश सामाज्य के प्रति भारतीयों के अंदर जो विक्षोम घुट रहा था उसका इजहार इतने जोरों में हुआ कि विलायती तानाशाह बुरी तरह घबरा उठे और दमन की चककी दस गुनी रपतार से चला दी। गांधीजी अपने लेखों, वक्तव्यों और भाषाएण में उस व्यापक जन-क्षोभ को छण्डा करने की कोशिश करते रहे...अन्त में ऊबकर उन्होंने कहा कि उन्हें 'स्वराज्य' शब्द से भी चिढ़ हो गयी है।"
आश्रय के मारे जैकिसुन की आँखें फैल गयी—" 'सराज्य' शब्द से भी चिढ़ हो गयी गாந்தीजी को !"
"हाँ बेटा, गाधीजी अपनी अहिंसा के आगे और सत्य व आत्म-शुद्धि के आगे बाकी बातों की परवाह शायद ही करते थे। जल्द-से-जल्द स्वराज्य हासिल करने के लिए १९२० के अन्त मे कोग्रस ने असहयोग और बिहुकार का नया लड़ाकू प्रोग्राम अपनाया था। बड़े नेताओं के इस निर्णय से साधारण जनता में उत्साह की अनोखी लहर फैल गयी। राष्ट्रीय मुक्ति-संग्राम की धारा लोक-चेतना के समतल मैदान मे उत्तर आयी। गाधीजी ने भविष्यवाणी कर दी थी कि वर्ष भर मे स्वराज्य मिल जायगा... मगर इस विराट जन-आन्दोलन की रूप-रेखा क्या होगी, इस बारे में स्वयं गाधीजी भी स्पष्ट नहीं थे और स्पष्ट थे भी तो दूसरों को उस विषय में कुछ बताना आवश्यक नहीं समझते थे। किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि महासाद क्या करनेवाले हैं; प्रबल परा-कमी अंग्रेज-सरकार को वह किन बाव-पेचों से पछाड़ींगे, यह किसी को साफ-साफ सूड नहीं रहा था।
"असहयोग का वह जमाना अद्द्रुत था। देश का हर हिस्सा नयी चेतना से स्पष्टित होकर अंगड़ाइयां ले रहा था। आसाम-बंगाल रेलवे में हड़ताल हुई। मिदनापुर के किसानों ने लगानबंदी का आन्दोलन छेड़ दिया। दक्षिण मालावार के मोपलों ने बगावत कर दी। पंजाब मंसर-कार के पिट्बु महनों के खिलाफ अकाली सिखों की घृणा भड़क उठी।
"गांधीजी को छोड़कर तमाम प्रमुख नेता गिरफ्तार कर लिये गये— मोतीलाल నెह्ल, देशबन्धु चित्रजनदास, लाला लाजपत्राय वंगैरह। उन्हें जेलों में बन्द कर दिया गया। स्वराजी कैदियों की तादाद 30,000 तक पहुँच गयी।
"अब एकमात्र महत्वपूर्ण कोडिटर के डिस्पेटर थे। आन्दोलन पूरे उठान पर था। कांग्रेस ने सारे अधिकार उन्हें सौप दिये थे कि वह संघर्ष को सही दिशा में और देश को विजय की आखिरी मंजिल तक पहुँचाये। अब अवसर आ गया था कि जन-विरोधी सरकार से ताकत आजमा ली जाय। एक-एक भारतीय की नजर गாँधीजी की तरफ थी कि देखें अब यह क्या करते हैं।
"आशा और उत्साह के उन तूफानी दिनों मे गாँधीजी स्वयं ही बेहद परेशान हो उठे। उनका असहयोग-आन्दोलन उनके सुझाये हुए अहिंसक माँगों पर ठीक-ठीक चल नहीं पा रहा था। भूल-चूक के छिट-पुट समाचार आते ही रहते थे। अहिंसा की जिस दिव्य और भव्य प्रतिमा की वह कल्पना के अपने गहरादल कमरा पर बैठाये हुए थे, उसके चेहरे पर अनचाह और दीठ जन-समूहों के कुछ-नुकुले नाख्नों की गहरी परोच बार-बार उभर आती थी। गாँधीजी को ऐसा अनुभव होता था कि उनकी इन कोशिशों से एक महाभयानक दैत्य के पैरों की बेड़िया खुल गयी हैं और यह अहिंसा की देवी का गला घोटने ही वाला है। बात-बात मे महात्माजी परेशानी और हिचक प्रकट करने लगे थे; तभी तो उन्होंने कहा था कि उन्हें स्वराज्य शब्द से भी चिढ़ गयी है।
"उन्हीं दिनों गोरखपुर जिले मे 'चौरीचौरा' काण्ड हो गया, जिसमे जनता की उतलेजित भीड़ ने धाना जला दिया था।
"गाहीजी बड़े दुखी हुए और उन्होंने सत्याग्रह तथा असहयोग की उस व्यापक लड़ाई को बिलकुल स्थगित कर दिया। स्वयंसेवकों के जुलूस, सरकार-विरोधी सभार्ए, दमन-कानूनों के खिलाफ संघर्ष...सब बन्द !
"आन्दोलन एकदम ऐप हो गया।
"जन-संग्राम के प्रति महात्माजी का यह खिलवाड़ देश के लिए बहुत बड़ी दुर्घटना थी। गாधीजी के खास साथी जेल के अंदर बन्द थे। यह समाचार पाकर क्रोध और दुख के मारे वे पागल हो उठे।
"कोई भी समूचा आन्दोलन जब एक व्यक्ति के मातहत होता है तो इसी तरह के नतीजे बाहर आते हैं। "चरखा, व्रत-उपवास, आत्म-शुद्धि, ग्रामोहोग...गीता, कुरान और बाइबल...सत्याग्रह, असहयोग, बिहंकार...जैल जाना, बाहर आना, आश्रम-जीवन, सत्य और अहिंसा के नये-नये प्रयोग, सेठों और जमी-दारों का हृदय-परिवर्तन...सामाज्यशाही, छोटे-बड़े लाटों की नेकनीयती के प्रति आस्था, विमानों और मजदूरों के वर्ग-संगठनों की ओर सन्देह की दृधि...इस प्रकार के बहुतेरे चमलकारों का केन्द्र था महतमाजी का जीवन। उनकी सबसे बड़ी खूबी क्या थी, पता है ?"
निषेध की मुद्रा मे जैक्सीन का माथा हिला।
बाबा बोले:
"आजादी के लिए जो समझदारी पहले थोड़-से पढ़-लिखे लोगों तक सीमित थी, उसे गाँधीजी आम पबिलक तक ले आये। यही उनकी सबसे बड़ी खूबी में मानता हूँ।
"दस वर्ष बाद '३० मे फिर कांग्रेस ने मोचारबंदी की। जन-विरोधी कानूनों से ऊबे हुए लाख-लाख लोग फिर मैदान मे निकल आये। फिर गाधीजी ने कहा कि अहिंसा में बढ़ा न लगे तो मुझे हार भी कबूल होगी।
"इस बार महत्वपूर्ण अपने आश्रमवासी चेलों के साथ नमक-कानून तोड़ने निकले।
"लेकिन कानून तोड़ने का यह आन्दोलन थोड़े ही अरसे में जोर पकड़ गया।
"गैर-कानूनी नमक बनाना, शराब-अफीम और विलायती कपड़ो की दुकानों पर पिकेटिंग करना, तकली और चरखे पर सूत कातना, डेर-का-डेर सूत कतवाना, छुआछूत खतम करना, विदेशी कपड़े जलाना, स्कूल-कोलेजों का बिह्मकार, सरकारी नौकीरियों से इस्तीफा...यही प्रोग्राम था। गாँधीजी ने कहा था—"ऐसा करने पर हम देखेंगे कि स्वराज्य हमारे दरवाजे खड़ा है।"
"पहले तो सरकार ने भी खेल किया और गाधीजी को गिरफ्तार नहीं किया। पुराने तजरबे के आधार पर नौकरशाही समझ बैठी थी कि महासा की गिरफ्तारी से लोगों में नाहक उतलेजना फैलती है। लेकिन इस दफा जनता ने नेता की धर-पकड़ से पहले ही जौर दिखाने शुरू किये। अहिंसा के पैगामबर ने जन-आन्दोलन की जो सीमाएं बाँध रखी थीं, उनका टूटना आरम्भ हो गया। बड़े-बड़े प्रदर्शन होने लगे। चटगांव के शस्त्रागर पर छापा मारा गया। उत्तरप्रदेश में जोरों से लगानबन्दी शुरू हुई। पेशावर मे गढ़वाली सिपाहियों ने निहथी भीड़ों पर गोली चलाने से इनकार करके कानून को अपने हाथों में ले लिया।
"और, गाधीजी की गिरफ्तारी के बाद तो हड़तालों की मानो बाढ़ आ गयी। शोलापुर के एक लाख चालीस हजार बाशिन्दों ने शहर पर कब्जा कर लिया। उनमे पचास हजार सूती मजदूर थे। लोगों पर कंग्रेसी नेताओं का नियंत्रण टिक न सका, जनता अपनी हुकूमत कायम करना चाहती थी।
"सामाज्यशाही दमन की कोई सीमा नहीं थी। ऑर्डिनेंस-पर-ऑर्डिनेंस निकल रहा था। कार्ग्रेस और उनके सम्बन्धित संगठन गैर-कानूनी करार दिये गये। दस महीने के अंदर नव्वे हजार मदों औरतों और बच्चों को केँद की सजा दी गयी। जेले ऐसाठस भर चुकी थी। बेतों, हणटरों, लाियों और गोलियों का सिलेसिला चला, लेकिन जनता की हिममत नहीं टूटी। खबरों पर सख्त संसार थी, अखबार ज्यादातर बन्द कर दिये गये थे। जिनमे सरकार ने ताला जड़ दिया था, वैसे छापाखानों की भी कमी नहीं थी। आन्दोलन का विस्तार फिर भी कम नहीं हुआ।
"अंग्रेजी हुकूमत बेहद घबरायी। लंकाशायर की कपड़ा-मिलों के विदेशी धनासेठों की नींद हराम हो गयी। इस देश मे कारोबार करने-वाले गोरे सौदागर तो करारी दहशत खा गये थे। उन्होंने भारतीय जनता को अनुकूल रखने के लिए अपनी गोरी सरकार से अनुरोध करना आरम्भ किया कि हिन्द को औपनिविशेक दरजा तो अवश्य दे दिया जाय। आन्दोलन विश्वद्वि अहिंसात्मक ढंगों पर नहीं चल रहा था। इसमें गாँधीजी को जेल के अंदर भी बड़ा दुःख था। वह शासित और सहयोग के अवसरों की प्रतिक्षा उल्कणतापूर्वक कर रहे थे।
सावन का महीना था। धान की रोपाई खतम हो चुकी थी। मडुआ और मकई की फसलें तैयार थीं। सामने खेतों की हिरियाली, ऊपर आकाश और नीचे धरती। किसान मस्त थे।
'नमक-कानুন तोड़ने का यज्ञ जिले में कहीं-न-कहीं आये-दिन होता ही रहता था। दयानाथ ने सावन की पूर्णमा के दिन यही मेरी छॉाह में नमक बनाना शुरू किया। दारोगा को खबर दी जा चुकी थी। पाँच-सात चौकीदार, दो दफादार, पाँच कान्नेटबल और दारोगा मौक पर हाजिर थे... 'बूहे, बच्चे और जवान सैकड़ों की तादاد में तमाशा देखने आये थे। काफी दूर पर उधर अलग बड़ी ओढ़ने भी 'गाथी बाबा' का यह यज देखने आयी थी।
'गुहा खोदकर तीन चूलह बना लिये गये थे। उसमें आँच जगायी गयी। तीन नयी हाँडियों में नोनी मिट्रि और पानी घोलकर उन्हें चूलह पर चढ़ा दिया दयानाथ ने। तेरा बाप आँच ठीक रखने की छुटी पर था। दयानाथ के एक हाथ में तिरंगी झपडी थी, दूसरे में वह लोगों को समझा रहा था कि वे शास्त्रपूर्वक तमाशा देखें और हल्ला-गुल्ला न करें।
'हॉर्डियों का पानी थोड़ी देर में खोलने लगा।
'काफी खौला तो हाँडियाँ जानू राउत ने चूलहों पर से उतार लीं।'
'तब तक दया उधर पन्द्रह-बीस स्कूली और गौर-स्कूली लड़कों को बटोरकर गा रहा था—विजयी विश्व तिंगा घारा ! ड़ंडा ऊँचा रहे हमारा !!...
'धजा की जगह एक बेढ़गी लहु खड़ी थी जिसके सिरे पर मामूली-सा मझोला तिरंगा फहरा रहा था। गीत की एक कड़ी दयानाथगाता, बाकी लड़के उस पद को जोर से दुहराते। गाँववाले गहरी दिलचसपी में देख-सुन रहे थे।
'मेरे लिए भी वह सब एक नया अनुभव था बेटा ! दम साधकर में देख-सुन रहा था।
'कुछ देर बाद हाँडियों का पानी नीचे गिरा दिया दया ने। तले में जमी नमकीन मिह्री को दानों में निकाल लिया गया।
'फिर नकली नमक का वह दोना उठाकर दया ने लोगों से कहा : 'भाइयो, इसे आप मामूली मिट्टी मत समझे। यह तो स्वाधिना दिलाने वाली दवा है। इसके जरें-जरें से अंग्रेज-सरकार खौफ खाती है। इस नमक की एक चुटकी एक और और जालिमों का सौ मन बारूद दूसरी ओर—वह इसकी वरावरी नहीं कर सकता। यह नमक नहीं है, महात्मा जी की प्रसादी है...लीजिये, दो आने में एक दोना मिलेगा...यह खाने का नमक नहीं है, तावीज़ में डालने का नमक है।'
'इतना कहना था कि दयानाथ को दारोगा ने रकने का इशारा किया।
'दो कान्नेटबलों के साथ दारोगा आगे बढ़ आया और दयानाथ के हाथों में एक कान्नेटबल ने हथकड़ी डाल दी।
'दयानाथ ने नारा लगाया : 'महालमा गांधी की जय !' 'महालामा गांधी की जय !!'—लोगों ने दुहराया।
'दयानाथ अब की उत्साहित होकर और जोर मे चिललाया : 'भारत माता की जय !' 'भारत माता की जय !!'—लोगों ने दुहराया...आवाज़ कई गुनी ऊँची थी इस बार।
'तीसरी बार दया हथकड़ी में फंसी कलाइयो-समेत दोनों बाँहं ऊपर उठाकर समूची शक्ति से चில்लाया : 'अंग्रेजी राज...' '...नाश हो!' "इस दफा तो लोगों ने नारे में इतनी ताकत लगा दी कि आकाश गनगना उठा। कानस्टेबल और दारोगा का कलेजा काँप गया।
"दारोगा ने अब दोनों हाथ जोड़कर लोगों मे कहा—'अपने पेंट के कारण मैं मजबूर हूँ। अपना देश किसे घारा नहीं होता ? सरकारी आईं के मुताबिक ही मैंने उन्हें अरेस्ट किया है इसमें मेरा अपना कोई कसूर नहीं।"
"दारोगा की इस दीनता पर बूढ़ और अधेड़ चकराये, जवान मुसकराये और जिनकी मंस भीग रही थीं वे खिलखिला पड़े।
"इस दारोगा का नाम था भीम झा। तांगड़ी डीलडेल और रोवदार चेहरा। मूई उसकी ऐसी थी कि देखनेवालों के सिर में दर्द उठा करता, जब कभी वे याद आ जातीं। वह घूस तो नहीं लेता था मगर जोर-जबरदस्ती काफ़ी रक्षा एंट लेना था रियाया से। आपसी बातचीत मे लोग उसे 'डकैतों का सरदार' कहा करते। जरा-जरा-सी गुनाह के नाम पर मुज़िरम की बड़ी पिटाई करता था। बड़ी-बड़ी हैसियतवाले किसान और काशतकार खुंश रखने के लिए उसके यहाँ सौगात भेजते रहते थे —दही, मछली, आम और कटहल, मालभोग और चम्या केलों की घौँद, तुलसीफूल-लछमनभोग-जैसे बिढ़िया चावल वंगैरह...मामले की तहकिकात मे भीम झा जब-जब अपने इलाके की बस्तियां का चककर लगाया करता। जीन-कसे घोड़े पर टोपधारी सवार को देख कर लोग चौकके हो जाते कि दारोगा आ रहा है; कुछ चौकौदार और दो-एक कान्सेबल पहले आ चुके होते। चोरी के मामले में जिन पर शुबहா रहता, उन असामीयों की भीम झा कोड़ों से बुरी तरह खबर लेता, फिर कोई और बात करता...जमीन के झगड़ों में दोनों पक्ष वालों को धाना बुलवाता, डरा-धमकाकर कुछ रकम वसूल कर लेता और कच्चा समझाता उन पर थोप देता। दहशत, अकड़, मकारी, जोर-जबदर्स्ती और प्रपंच का अवतार समझा जाता भीम झा दारोगा। हमेशा कड़ककर बोलता, तनी भौंह और कड़ी मूई उसकी आँखों में आतंक का लाल सुरमा भरती होती।
"और वही भीम डा आज मजदूरी के दाँत दिखा रहा था ! अपने बेकसूर होने की कैफ़ियत दे रहा था !
'जैनरायन का बुढ़ा बाप रामनरायन फुसफुसाया, 'यह महतमाजी का जादू है।'
'हाँ, सरकार के इस पदार्थ-हाथी पर अबकी देवता का अंकुश पड़ा है चाचा !' किसी ने बूढ़ का समर्थन किया।
"तेरा बाप जानू राउत इतने मे दारोगा के सामने आया और छाती तानकर खड़ा हो गया। बोला, 'दारोगाजी, मुझे भी गिरफ्तार कर लीजिये, मै भी जेल जाऊँगा…'
"इतना कहकर जानू मुसकराया और दोनों हाथ उस कास्टेबल के आगे फैला दिये, जिसके तीन-चार हथकडियाँ लटक रही थीं। कास्टेबल ने भोली निगाहों से दारोगाजी की ओर देखा। अलग खड़े दो चौकी-दारों ने आपस मे कुछ कानापूसी की और दारोगा के करीव आकर बोले, 'हुजूर, नमक तो दरअसल इसीने तैयार किया है। इसको छोड़ना ठीक नहीं होगा…'
"भीम झा ने मुँह से तो हामी नहीं भरी, लेकिन भारी-सा अपना माथा ज़रूर होती दिया।
"जानू के भी हाथों मे हथकड़ी डाल दी गयी।
"फिर पहले की तरह नारे लगे, और जोश मे आकार लोगों ने उन्हें दुहराया।
"जानू की इस दिलेरी से में बहुत खुश हुआ। किसीके हाथों मे हथकड़ी डाली जाय, भला इसमें खुश होने की क्या बात थी ?"
बाबा ने प्रश्नसूचक ध्वनि को अपनी अद्दृत भर्गिमा से बेहद गम्भीर बना दिया तो जैकिसुन आवश्यकता से अधिक साकाश हो उठा और उनकी ओर गौर से देखने लगा। गर्दन लम्बी करके बाबा ने फिर कहा : "बबुआ, यह कोई चोरी-छिनारी की गिरफ्तारी तो थी नहीं, यह स्वाधीना-संग्राम की गौरवमय परम्मा का एक सामान्य प्रदर्शन था। गिरफ्तार होना, जेल के अंदर कैद काटना, लाठियों की चोट बरदाशत करना, पुलिस और मिलिटरी के फ़ौजी बूटों से कुचला जाना…इन बातों से जरा भी नहीं घबराते थे लोग। सत्याग्रह और पिकेटिंग तैयारे बन गये थे। पुलिस एक को गिरफ्तार करती तो उस एक की जगह दस आदमी आ डटते, दस गिरफ्तार कर लिये जाते तो उन दस की जगहों पर सौ जवान खड़े हो लेते। घरवाले सत्याग्रह या पिकेटिंग के लिए जाते हुए अपने आदमी को माला पहनाकर और टीका लगाकर विदा करते, मानो वह शादी करने जा रहा हो। गजब का जोश था बेटा, वह उत्साह का अपूर्व वातावरण था ऐ
"जानू की गिरफ्तारी के वाद यहाँ उस दिन का सारा प्रोग्राम खतम हो गया। दोनों सत्याग्रियों को लेकर पुलिसवाले धाने की ओर चल दिये और भीम झा घोड़े पर सवार होकर राजाबाहदुर देवीदत की छोढ़ी की तरफ बढ़ा।
"लोग अपने-अपने घर गये।
"दो रोज़ बाद कार से पुलिस-सुपरिरण्टेण्डेणट आया, लॉरी में लदकर एक दर्जन मिलिटरी वाले आये। रात का वक्त था। चार-चार बैटिरियों वाली टाँचों के तेज प्रकाश से समूचा गाँव रह-रहकर जगमगा उठता था।
"वीरभद्र बम पार्टी का आदमी था न ! उसीको वे गिरफ्तार करने आये थे।
"यह वीरभ्रद पिछले सोलह महीनों से गाँव में नजरबند था... बंगाल सरकार के हुक्म से। सत्याग्रह और पिकेटिंग से उसका कोई सम्बन्ध नहीं था। वह खुलेआम सत्य व अहिंसा का उपहास करता था और महाना को महामूर्ख एवं पूजौपितयों का दलाल बतलाता था। रुस के किसानों, मजदूरों और सैनिकों ने क्रानित का जो रास्ता अपनाया था, वीरभ्रद उसी रास्ते को भारतीय जनता की मुक्ति का एकमात्र मार्ग मानता था। बात-बात में उसके मुँह से मावर्स और लेनिन के नाम निकल आते…
"पुलिस-सुपरिएट्रेपेइट अंग्रेज था। वीरभ्रद के चेहरे को टार्च की रोशनी में पहले उसने एक फ्रोटो से मिलाया, फिर गिरफ्तार करके उस चार फ्रौजियों के हवाले किया। खुद चार फ्रीजियों को लेकर मकान के अंदर गया तलाशी लेने। तब तक दारोगा भीम झा भी अपने चार-छ: जवानों के साथ यहाँ पहुँच चुका था।
"घर को औरत घूघट निकालकर एक तरफ हो गयी। संयانه सहमे-सहमे दूसरी तरफ खड़े थे। भय, आश्रय और कौतूहल में डूबे बच्चे बीच आँगन में इकट्रेह हो गये थे। छोटे बच्चे दहशत के मारे अपनी-अपनी माँ की गोद में दुबके हुए थे। टार्च की तेज रोशनी में संगीन रह-रहकर चमक उठती थी। सिवाय बूटों की टापों के और कोई आवाज़ नहीं थी। यह ऐसा सचता था बेटा, जिसमे साँस तक गिनी जा सकती थी।
"छिड्याँ, लाठियाँ, कुदाले, खुरेंपें, हँसिया, कुल्हाड़, साग-भाजी काटने की हँसिया, बसूला, रखान, गंती...यानी खेती-गिरस्सी का एक भी औड़ाएर नहीं छोड़ा गया। सभी औड़ाएर बीच आँगन मे जमा कर लिये मिलिटरीवालों ने।
"गोरा पुलिस आफ़िसर गरज उठा—'माइ गाँड, इतने हथियार !"
"गाँव-भर के लोग तब तक जमा हो चुके थे। दुनाइ पाठक और जैनरायन झा ने हाथ जोड़कर साहब से कहा… दोहাই माय-चाप की ! ये हथियार नहीं हैं सरकार, ये तो खेती-गिरस्ती के अपने औजार हैं। हुजूर-लोग काँटा-चममच से खाना खाते हैं, बुश से दाँत साफ करते हैं, फ्राउपटेनपेन से लिखते हैं। हम गृहस्थों के लिए उसी तरह ये औजार जरूरी हैं। हुजूर, ये हथियार नहीं हैं, घर-गिरस्ती के कामों की चीजें हैं…'
"इसके बाद दिच्छन की तरफ चेहरा करके पाठक और जैनरायन बोले… 'जाने गंगामैया, हुजूर, हमारी बस्ती मे एक भी हिथियार नहीं है सरकार !" "छड़ियों, लाठियों और कुलहाड़ को बूट से तुकराकर साहब गुरिया —'डैमफूल, हम सब जानता है! यह किया है? हमको डोखा (धोखा) नेई दो !"
"तब साहब ने मिलिटरी के एक जवान से पूछा तो उसने कहा, 'यह कुल्हाडा है सर, इससे लकड़ी काटी जाती है और गाय-बैल-भँस हैं क्कने के लिए लाठी या छड़ी की ज़स्रत पड़ती है हुजूर !' 'शट-अप !"
"बूट पटककर गोरा कड़का—'बुक-बुक (बक-बक) कटें हैं ! शट-अप !"
"तलाशी में कोई खतरनाक चीज नहीं मिली। वीरभद को मिलि-टरी ट्रूक में बैठा दिया गया। संगीनधारी फ्रेंजी जवान उसे बीच मे करके बैठे थे। सुपरिएण्टेण्डेणट की मोटर और फ्रेंजी ट्रूक स्टार्ट हुई, गाँव से बाहर निकली और उत्तर की ओर सड़क पर सर-सर खड़-खड़ करती हुई चली गयी…
"गाँव वालों ने चैन की साँस ली।
"सब जानते थे कि वीरभ्रद को अवश्य पकड़ ले जायेंगे। सरकार सौ सत्याग्रहियों से उतना नहीं घबराती थी जितना बमपार्टी के एक अदना आदमी से। अब तक वीरभ्रद को जो लोग आवारा और पागल समझते थे, उन्होंने इस घटना के बाद अपनी राय बदल दी। अब वह मामूली वीरु नहीं था, वीर बॉके भगतसिंह का साथी था।
"पीछे सुना गया कि वीरभदर को हजारीबाग-सेपट्ल जेल के एक सेल मे रखा गया। दयानाथ और जानू कुछ दिनों तक लहरियासरायंजेल मे रखे गये, बाद को उन्हें पटना-कैम्प जेल पहुँचा दिया गया। सत्याग्रह और पिकेटिंग का जोर बढ़ा तो बिहार की एक-एक जेलठसम-ठस भर गयी। लाचार होकर अधिकारियों को पटना के नजदीक फुल-बाड़ी-शरीफ से उत्तर एक भारी-सा होता घेरकर 'कैम्पंजेल' बनाना पड़ा था।
"सविनय आशा-भंगवाला वह देशयापी आन्दोलन भी बीच मे ही रोक लिया गया, गாँधीजी का बड़े लाट इर्विन से समझौता हुआ था। तब तू वर्ष-भर का था बेटा !
"अंग्रेज़ सरकार ने कांग्रेस से यह सुलह इसीलिए की थी कि उसे संभलने का मौका मिले। गாந்தीजी तो खुले-आम कहने लगे—'कांग्रेस ने कभी नहीं कहा था कि वह जीतकर ही रहेगी।'
"कांग्रेस के बाहर, नौजवानों की तरफ से और मजदूर-संगठन की तरफ से समझोते की तीखी नुकताचीनी हुई। नयी पीड़ी के नेताओं में से सुभाष बोस-जैसे लोगों ने गाधी-इर्विन-पैक्ट पर काफ़ी ड्यूडलाहट ज्राहिर की।"
"समझौते का फल व्या हुआ ?"
जैकिसून की निगाहों में फिर सवाल तैरने लगा। अब वह बाबा के इस प्रवचन की समापिति चाहता था।
जरा रककर बाबा बोले :
"१९३१ मे अंग्रेज़ों ने गोलमेज़-कानफेन्स का नाटक रचा। इस देश के पचासों प्रतिनिधि उसमे शामिल हुए...गांधी, जिला, अम्बेडकर और दूसरे बड़े-बड़े आदमी, सेठों के नुमाइनदं, रियासतो के नुमाइनदं, जर्मीदारों के एवजी, दीगर जमातों और जातियों के मुखिया...वह कानफेन्स क्या थी, पूरी शिवजी की वारात थी ! जितने मुँह, उतने बोल ! विलायती राजनीतिकों के मनोरंजन के लिए वह एक अच्छा अखाड़ा रहा !...समझौते का फल यही हुआ कि कुछ नहीं हुआ। गांधीजी सद्वावनाओं के गुबबारे लटकाये हुए विलायत से वापस आये, खाली हाथ ! "इधर दमन की शत-प्रतिशत तैयारी कर रखी थी सरकार ने, वह कार्ग्रेस पर बिलकुल टूट पड़ी। साल-भर के अंदर फिर एक लाख बीस हजार आदमी जोलों के अंदर हूँस दिये गये। कार्ग्रेस कमोटियों के दपतरों में ताले लटकने लगे।
"बड़े-बड़े नेता आराम से जेल पहुँचा दिये गये थे। सरकार को उनकी सुविधा-असुविधा का काफी खयाल रहता था।
"अन्त मे सत्याग्रह बन्द करके गாँधीजी ने अपनी असफलता कबूल कर ली। एक वक्तव्य में महत्वा दे कहा : 'सत्याग्रह का सन्देश जनता तक पहुँचते-पहुँचते अपवित्र हो गया है। हम जब आध्यात्मिक अस्स्रों का उपयोग आध्यात्मिक तरीकों से नहीं करते तो उनका कुण्ठित हो जाना अनिवार्य हो जाता है। हमारा यह सत्याग्रह अपूर्ण रहा, यही कारण है कि इससे शासकों का हदय द्रिंत नहीं हुआ... भविष्य मे केवल एक च्यक्ति को सत्याग्रह करना चाहिए और वह व्यक्ति ऐसा हो जो कि सत्याग्रह करने के योग्य हो...'
"जानू और दया तो चार ही महीने जेल के अंदर रहे, वीरभदर लेकिन सात साल बाद बाहर आया… सो भी तब जबकि चुनाव के बाद कंग्रेस की मिनिस्ट्री कायम हुई और क्रान्तिकारी राजबेन्द्रियों ने अपने छुटकारे के लिए अनशन आरम्भ कर दिया था।"
वावा बटेसरनाथ थोड़ी देर चुप रहे।
फिर जैकिसुन की पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा :
"घबराने की ज़खरत नहीं है। अन्त में जीत तो तुम्हारी ही होगी। आज न सही, कल। कल न सही, परसों। मगर एक बात फिर कह दू... मुझे रंच-मात्र क्षिजक नहीं होगी यदि मेरे यहाँ न रहने से रपउली की जनता को यह जमीन कोई लाभ पहुँचा सके।"
१९४२ वाला जन-आन्दोलन जैकिसुन के लिए 'आँखों-देखा तमाशा' था। इसीसे उसने चाहा कि अब वावा अपना प्रवचन समाप्त करें। मौजूदा संघर्ष के लिए अपनी ओर से बावा ने जैकिसुन को पूरी छूट दे ही दी थी। कुछ क्षण वाद वह वृद्ध व्यक्ति बरगद की ओर जाकर उसकी घनी शाखाओं में अदृश्य हो गया।
90
"उठ कितना सोता है!"
जैकिसुन ने पास में सोये हुए दो साधियों की पीछे बारी-बारी से थपथपायी।
जवाब कुछ नहीं।
अब उसने एक को झकझोरा…"जीवनाथ ! जीवनाथ !! ओ जी55 वना55 थ !"
जीवनाथ ने करवट बदल ली और फिर नाक बजाने लगा। अबकी खीझ-भरी आवाज़ में जैकिसुन ने कहा…"यहाँ दिमाग फटटा है और नवाबों की नींद ही नहीं टूट रही !"
उसने आकाश की ओर देखा।
चन्द्रमा पश्चिम की ओर काफी नीचे उतर आया था अजोरिया स्थिर और समान रूप मे घुल रही थी। उस पूर्ण और मधुर प्रकाश के कारण तारों पर ध्यान ही नहीं जाता था। प्रभाती समीर की तर-सिहरन का अन्दाज पाकर जैकिसुन ने ताज़गी महसूस की और पूर्ब की ओर मुँह कर लिया।
उषा की स्वर्णम आभा अभी अलाक्षित थी। हाँ, चुहचुहिया ज़रूर बोल पड़ी किसी तरफ से…" चुह चुह चुह चुह चुचूएस ह चूएस चुएस ह ! चुह !!"
यह ननही-सी चिडिया रात्रि-शेष मे ही आवाज लगाती है। शुक तारा का उदय और चुहचुहिया की ध्वनि—दोनों ही निकट आ रही उपा की सूचना देते हैं।
जॉर्कसुन रात-भर जगा था, लेकिन रती-भर कड़वाहट आँखों मे नहीं थी। चित खूब प्रसन था। अब वह जीवनाथ और सरजुग से बातें करना चाहता था... बाबा बटेसराथ ने आज उस पर कृपा की थी—पिछले युगों की बहुत सारी बातें बाबे नें जैकिसुन को बतलायी थी और मौजूदता संघर्ष के बारे में अपना दृष्टिकोण साफ-साफ जिहिर किया था। यह कोई मामूली घटना नहीं थी, जिसको वह यों ही पी जाता। दर-असल वह बेँचन हो रहा था, सारी बातें अपने इन दोनों साधियों से बता देने के लिए।
जैकिसुन उठकर कुछ फ्रासले पर गया और पेशाब कर आया। फिर समूचे बदन का बोझ डालकर वह जीवनाथ पर झुक गया।
'उंहू! हूहू! ओंह! उंइ...' जीवनाथ ने नाक की अनुनासिक धविनियों के सहारे उस दबाव का प्रतिवाद-सा किया।
"उठता है कि नहीं?"
"अभी तो काफ़ी रात पड़ी है।"
"नहीं रे, हो तो गयी सुबह..."
"ཝཱཾ"!"
जैकिसुन ने एक बार और उसी तरह दबाव डाला तो जीवनाथ उठ बैठा। नाटा कद, साँवली सूरत और गोल चेहरा...
"क्या बात है?"—आख्ठ मलते हुए जीवनाथ ने पूछा— "तुझे नींद क्यां नहीं आती है ?"
फिर वह उठ पड़ा हुआ, अंगड़ाइयां ली और झटक से देह को सीधा किया। आसमान की तरफ निगाहं फेरता हुआ लघुशंका के लिए चला।
जैकिसुन गुनगुनाकर गाने लगा :
"उठ जाग முसाफिरे भोर भई
अब रैन कहांजो सोवत है
जो जागत है सो पावत है
जो सोवत है सो खोवत है
उठ जा S S S ग..."
"सचमुच अब रात नहीं है"—जीवनாथ ने लघुशंका से वापस आते हुए कहा। इतने मे उसे धरती की धमक महसूस हुई तो बोला
—"चार बजे वाली पैसिंजर निर्मली की तरफ से आ रही है। तेरी भंसों को तो ले गया होगा चरवहवा, खोलकर अब चराने; है न ?" "हूँ।"
सरजुग की नाक अब भी बदस्तर बज रही थी। वही तीनों में सबसे ज्यादा लम्बा और तगड़ डील-डेल का जवन था। चितं लेटा पड़ा था। आधी बाँहों की बिनियान पहन रखी थी, कमर मटमैली धोती से लिपटी थी।
जीवनाथ सरजुग के नजदीक बैठता हुआ बोला—"इसे भी उठा देता हूँ!"
"उँह, छोड़ दो..."
जैकसुन के इस निषेध पर जीवनाथ को थोडा-सा विसमय हुआ अवश्य, परन्तु उसने कुछ कहा नहीं। जैकसुन की गति-विधि में आज उसे कुछ विलक्षणता अनुभव हो रही थी। समझ नहीं पा रहा था : रात-ही-रात में ऐसी क्या बात हुई कि जैकसुन की नींद उचट गयी ! क्या पता, यह रात-भर आज जगा ही रह गया हो ! लेकिन कहाँ, जीवनाथ ने तो उसे सोते पाया था : वह तो जाने कब से सो रहा था ! जीवनाथ और सरजुंग काफी देर के बाद यहाँ आये थे…
जीवननाथ गुमसुम इसी प्रकार कुछ सोच रहा था।
क्षण-भर बाद उसने अपनी हाँफ कमीज की पाकितट से बीड़ी और माचिस निकाली। सलाई की तीली राइडकर बीड़ी को सुलगाने लगा, होठों से बिना लगाये ही—मानों आतिशबाजी का प्रयोग कर रहा हो वह !
सलाई की तीली समूची जल गयी तो बीड़ी का सिरा दहकता नजर आया। जीवनाथ ने उसे सीधे होठों में न लेकर मुझे के माध्यम से जोरों की दो कश खींची और देर-सा धुआँ मुँह से निकाल दिया।
दो-एक कश उसी तरह और खींचकर उसने कहा—"आज तुम्हे नींद नहीं आयी?"
जैकिसுन ने जवाब नहीं दिया।
"जो होना होगा, हो लेगा"—जीवनாथ आहितसे से बोला—"आखिर, कब तुम्हारी नींद उचट गयी जैकिसुन?"
जॉर्कसुन का मुँह खुला। उसने कहा—"भाई, वह नहीं सकता, कब मेरी आँखें खुली और कब व्या हुआ..."
जीवनாथ की आँखों में विस्मय फैलता जा रहा था।
जैकिसुन ने संक्षेप में बाबा और उनकी बातें बता दीं। आषाढ़ में उस वर्ष खूब वर्ष हुई थी। नदियों मे यदापि बाढ़ नहीं आयी थी। बीच-बीच मे आसमान खुल भी जाता और बीच-बीच में बादल बरस भी जाते…
सभी खेती के अपने-अपने कामों में मशगुल थे।
बाबा बटेसरनाथ के शरीर पर कुलहाड़ चलने-चलवाने की जो किवदन्ती फैली हुई थी लोगों में, वह अपने-आप दब गयी। दुनाड और जैनरायन की तरफ से इस प्रकार की अफवाहं यदा-कदा उड़ा दी जाती थी। इसमे उद्देश्य उनका यही रहता कि आम लोगों की मानसिक प्रतिक्रिया का आभास मिलता रहे।
मगर बाबू जीवनाथ की अपने साथियों को कड़ी हिंदायत थी— बाये-बाये मत करते फिरो, सबकी बातें गौर से सुन लो; बस ! सावन में दुनाई का पोता सांप के काटने से मर गया—लोगों ने कहना शुरू किया : विधाता से नहीं देखा गया, आखिर बेईमान को उन्होंने चेतावनी दे ही डाली।
इस वज़पात का पाठक-परिवार पर गहरा असर पड़ा। अगले तीन-चार महीने दुनाइ शायद ही मुसकराया हो। जैनरायन घण्टो बैठकर जब-तब उसे समझाया करता। पाठक के नाम उसने 'कल्याण' चालू करवा दिया आखिर।
जैकिसुन लेकिन हमेशा चौकस रहता था—क्या पता, पाठक और जैनरायन के आदमी किसी दिन कुल्हाड़ लेकर वावा बटेलकर पर टूट ही पड़े ! उनका क्या ठिकाना ? पुरानी पोखर की कछार तो खैर बरसात के मौसम मे पानी के अंदर होने से आबाद नहीं की जा सकती, मगर बरगदवाली जमीन पर तो हल चल सकता है...
परन्तु उसकी यह आशा निमूल सिद्ध हुई।
आधिन्न की पूर्णमा आ पहुँची। धानों की मंजरियों के सूक्ष-सुरुभित फूल अपना मन्द-मधुर परिमल शरद-समीर को लुटाने लगे, अब उनसे दूधिया दाने निकल आये। नुकिले दानोंवाली बालियों का वह विचित्र वैभव हेमन्त की अगवानी मे अभी से झूम उठा। रुपुली और आस-पास की बीसियों बस्तियों का जर्मीदार बाबू कृष्णदतिसिंह राजाबहादुर देवीदत का इकलौता उत्तरधिकारी था। डेवही आरामपुर रुपुली से आधा कोस उत्तर पड़ता था। नये जर्मीदार ने पुरानी कोठियों से अलग एक फ्लेट बनवा ली थी। विजली पेदा करनेवाली मशीन बैठा रखी थी।
कातिक की अँधेरी रातों ने इस बार राजाबादुर कृष्णदतिसिंह पर मुसीबत का पहाड़ गिरा दिया—पिस्टौलों, बन्दूको और टाँचों से लैस डाकुओं का एक भारी दल एक रात उसकी ड्योढ़ी पर चढ़ आया…दो घण्टे तक लूट-पाट मचाता रहा, जाते-जाते चार लाशों, सात घायल और अपनी दो बन्दूके छोड़ता गया, और लेता गया पौने दो लाख का माल—नकद, गहने, जवाहरात…
पास-पड़ोंसे के दस कोस के इलाकों में हल्ला पड़ गया—वाप रे, ऐसी डकैती तो कभी नहीं कही पड़ी थी !
ज्लेल-भर के पुलिस आप्रफर और बड़े हाकिम राजाबाहदुर की डेव़डी के हাতे में इकटே हुए...चार घण्टे तक उनकी कानापूसी चलती रही और फिर वे दरभंगा लौट गये।
राजमाता पर इस घटना का घातक प्रभाव पड़ा, दिल की धड़कन बंद हो जाने मे वह हर्षते के अंदर ही चल बसीं। उसके बाद राजा-बहादुर कुणादतिंश सपरिवार चले गये देवधर। बूढ़े दीवान दुन्दुना मिलिक के तो अफसोस के मारे दाढ़ी और बाल बढ़ आये। पीछे इस सिஸ்लिले में परसादीपुर और सतगामा के चार जवन पकड़े गये। उनका सरगना बजरगसिंह पुलिसवालों के हाथ नहीं आया, नेपाल के ऊपरी इलाकों की तरफ भाग गया। बजरगसिंह पेशेवर डाकू तो नहीं था, लेकिन सन् १९२५ और १९३५ के दरम्यान क्रान्तिकारियों ने जिन पहुंको को राजनीतिक डेकैतियों के लिए दीक्षित किया, जाने कैसे, बजरगसिंह उनके सम्पर्क में आ चुका था। और, अब जब वह फरार हो गया तो लोगों ने समझ लिया कि इस डकैती मे उसका हाथ अवश्य रहा होगा। पाठक, जैनरायन और दारोगा चाहते थे कि इस काण्ड में जीवनाथ और जौकिस्न गरीरह को फंसा दें...
परन्तु उनका यह मनोरथ सफल नहीं हो पाया।
सफल इसलिए नहीं हो पायी उनका मनोरथ किजिया-कोर्ट के सरकारी वैकिल बाबू रामचन्द्रिंश एडवोकेट और सोशलिस्ट एम.एल.ए बाबू लोचन छाकुर ने पुलिस-सुपिर्तेडेंट और कलक्टर को स्पष्ट शब्दों में आगाह कर दिया था। पीछे दारोगी पर जिला-अधिकारियों की करारी डॉट पड़ी थी—ऐसी साहसिक दुष्टना का छोर तुम रपुलरी के उस गर्व में मामले से छुआते हो ! खबरदार ! सरकारी वैकिल पतौर के रहनेवाले थे और जीवनाथ का निनिहाल उसी गाँव में था। निनियार का वही रिश्ता इस वक्त काम आ गया। लोचन छाकुर द्यानाथ के जेल के साथी रहे थे, वह परिचय भी सहायक सिद्ध हुआ, वरना बेचारे नाहक ही डकैती के मामले में फँसा लिये जाते। दुनाइ पाठक का लड़का मुजफ्फरपुर मे इनकम्टैवस का औफिसर था। नाम था नीलाम्बर पाठक। हाईकोर्ट के जज की भतीजी से उसका व्याह हुआ। जज का वह खानदान जालिम जर्मीदारों का खानदान था और अपनी काली करतूतों के लिए जिले-भर मे बदनाम था। उनके यहाँ कई मशहूर वकिल थे, जिला और प्रान्त के शहारों में कई एक ऊँचे औफिसर भी थे उनमें से। इसीसे हुकूमत की मशिनरी हमेशा उनके अनुकूल रहती।
यह रिश्तेदारी दुनाई पाठक के लिए विधाता का वरदान थी। वह कई कुकर्म करके भी कानूनी तौर पर 'जज साहब का समधी' बना बैठा था। छोटे अफसरों का सम्मानपात्र और बड़े अफसरों का कृपापात्र था।
नीलाम्बर दीवानी की तातिल में घर आया और बाप को बरगद-वाली जमीन दर्खल कर लेने की तरकीब बताता गया।
जैनरायन को अपने बेटे की राय दरकार नहीं थी इस काम के लिए, वह खुद ही शहर्त चलाकर था।
चार कास्टेबल और पड़ोंसे के गाँवों के चार चौकीदार साथ लेकर थानेदार आ धमका अगले ही रोज। लेकिन वह मौके पर नहीं गया, गया वह दुनोई पाठक के घर पर।
दारोगा साहब आये हैं, इस खुशी में पाठक ने बकरा कटवाया। बड़े अच्छी तरह उनको खिलाया-पिलाया। देर तक हा-हा ही-ही होती रही और बैटरीवाले रेडियो पर लता मंगेशकर का सुरीला कण्ठ रह-रहकर लहराता रहा। और अन्त में, बाबू दुनাই पाठक ने अपने इस रेखुआ-थाने के जनाब धनेदारसाहब के सामने गाँव के 'बदमाशों' की पूरी लिस्ट पेश की जिनमें उनकी जान और माल-अमवाव को खतरा था।
थानेदार छाकुर रामफलसिंह अधेड उम्र के भारी-भरकम डीलडौल-वाले एक मुच्छड़ आदमी थे। चौड़ा कपार, लम्बोत्रा चेहरा, छोटी-छोटी बादामी आँखें। खास बात यह थी कि तोड़ ने बुरी तरह विद्रोह कर दिया था। पौने दो लाख की आबादी वाला यह धाना रहेआ बिना ती-चपड़ के उनका अंकुश मानता था, लेकिन अपनी ही तोड़ छाकुर साहब का अनुशासन नहीं मानती थी।
खाना-पीना हो चुका था। कान्नेबल लोग भी जीम चुके थे। चौकी-दार वैलों की बथान के करीब बैठकर चावल का भूँजा फॉक रहे थे, गोशत-मछली तो दूर, मामूली भात-दाल तक के लिए वहाँ किसीने उनसे नहीं पूछा। हाँ, चावल के तीन-एक पाव दाने मिले थे भुने हुए, डोल-भर पानी रखा था आगे और कुछ दूर पर कुआँ था।
आरामकुर्मी पर इसीनान से टॉर्नै फैलाकर थानेदार सिगरेट पी रहा था। बदन पर कॉलरवाली बिनियान थी, कमर में हाफ पैंट थी। फंनी-फैली-सी वह खाकी होंफ पैंट बैठने के उस आसन के लिए फिट बिलकुल नहीं थी। वह वेशकर, बातें मगर इस वक्त 'यूनाइटेड नेशनस' (राबू-संघ) की कर रहा था। इतने में पाठक की दस-सालா पोती वहाँ आ गयी और अपने बाबा से सटकर खड़ी हुई। लड़की का ध्यान अनायास दारोगा के बैठने की उस निलजज मुदा की तरफ चला गया। पाठक खुद एक मामूली कुर्सी पर बैठा था। बच्ची से उसने कान में कुछ कहा। अगले ही धण वह अंदर चली गयी।
'बदमांशां' मे ग्यारह आदमी थे। थानेदार ने एक-एक के बारे मे विस्तार से जानकारी हासिल की। चलते समय सबके नाम वह नोट कर चुका तो बोला—"दुनাই बाबू, घबराइयेगा नहीं! सबका भाग्य हम ठीक कर देंगे..."
"हुजूर !"—पुलिकित स्वरों में पाठक ने कहा।
"हाँ, सरकार गुण्डागीरी बद्रिशत नहीं करेगी..."
"जी हुजूर ! सरकार का ही तो भरोसा है।"
"फिल्வர் बाबू को सब बात लिख दीजियेगा न ?"
"ज़रुर लिख दैनो हुजूर..."
दारोगाजी ने गाँव के बाहर घोड़ा खड़ा किया।
रजबாँध की ओर मे दो खेतिहर आ रहे थे। कान्नेटबलों ने उन्-दशारे से रोक लिया।
चंबुकवाले हाथ को उठाकर थानेदार ने दूर के उस बरगद की ओ संकेत किया और पूछा—"वह बरगद किसकी जमीन में पड़ता है ठीक-ठीक बताना, देख !"
उनमें से जिसकी उम्र ज्यादा थी, वह बोला—"सरकार, विसरव नाम बताऊँ ? यह जमीन तो में हमेशा पच்கी ही देखता आ रहा हूँ यहाँ आस-पास गाँव-भर की गायें घाम चरती हैं। गाँव के लोग उस पे के नजदीक उठते-बैठते हैं। गरमजरआ (गैर-आबाद) जमीन है वह तं ...उस जमीन पर सबका हक है, हुजूर !" "जी, सरकार!"—कम उम्रवाले ने ताईंद की। आगे चलकर दारोगा ने दो-एक आदमी से और भी पूछा। जवाब तो कुछ-कुछ वैसा ही मिला।
तीन-चार दिन बाद दो पुलिसवाले आये। उन्होंने दुनाई पाठक के दालान में अपना डेरा जमाया। गाँववालों को मालूम हुआ कि पाठक की हिफाजत के लिए सरकार की ओर से यह इन्तजাম किया गया है। दोनों सिपाही अब दुनாई पाठक के जान-माल की निगरानी करेंगे।
खास मंहमान थे ये पाठक के। दाल-भात, दो किसम की तरकारियाँ, घी, दही, अचार और हपते में तीन-चार बार मंहली और खीर... बड़े ठाट से दोनों जून वे भोग पाते थे और तानकर सोते थे; ताश खेलते और रेडियो सुनते थे। बन्दूर्क उनकी दीवार से टिकी खड़ी रहती थी। रात के वक्त उन्हें पाठक अंदर रखवा देता।
थानेदार और नीलाम्बर का विचार था जीवनाथ को फोड़ लेने का। इसके लिए दो बींघा बिढिया ज़मीन दीवान टुनदुना मालिक से वे उसको दिलवान की सोच रहे थे। पिछले किसान-आन्दोलन में तीन किसान लीडर थोड़ी-थोड़ी ज़मीनों के बदले हमेशा के लिए बैठा दिये गये थे। घाध लोग इस बार भी उसी दृष्टि से समस्या को देखते थे। उनकी धारणा थी कि जीवनाथ गरीब है, जमीन का प्रलोभन कारणर रहेगा...
दो चतुर वृद्ध जीवनाथ की टोह लेने के लिए नियुक्त किये गये। उन्होंने जीवनाथ की माँ को बार-बार खोदा। उस स्टी ने हमेशा यही जवाब दिया कि जीवू के कामों में वह किसी तरह का दखल नहीं देगी; हाँ, कोई बुरा काम करने लगेगा तो ज़रूत्र समझायेगी-बुझायेगी… बाकी, बेटा बेटा है और माँ माँ है। जीवनाथ की माँ को इस बात का गर्दर था कि उसका बेटा सैकड़ों आदमियों का विश्वासापत्र है; कि पाँच पच इकड़े हैं और जीवनाथ वहाँ न पहुँचे तो वह पंचायत अधूरी घोषित की जाती है; कि गाँव का गरीब-सैगरीब आदमी जीवू को अपना समझता है—
दर्जि आठ तक अंग्रेजी पढ़कर जीवनाथ ने स्कूल छोड़ दिया था—छोड़ क्या दिया, छूट गया था ! पिता का देहानत् हुआ एक ओर, दूसरी ओर सन् ब्यालीस का अगस्त आ धमका। चौदह वर्ष की आयु थी। थाना दखल करने के लिए जो जुलूस आगे बढ़ा था, जीवनाथ उसमें बहुत पीछे नहीं था। रेहुआ थाने का दारोगा डर के मारे गॉर्धी-टोपी पहनकर कॉपते शब्दों में किस प्रकार 'भारत माता की जय', 'महामा गाँधी की जय' और 'हिन्दुस्तान आजाद' के नारे लगा रहा था—जीवनाथ को अच्छी तरह याद था। सकरी और मनीगाही स्टेशनों के दरम্যান रेलवे-लाइन उयाड़नेवालों में वह भी था। फिर गाँव के अंदर टाँमी आये तो औरतों को घरों में छोड़कर लोग मकई के खेतों में जा छिपे थे, लेकिन जीवनाथ नहीं गया था छिपने कहीं। एक गोरा उसके नजदीक आया और बोला— "कहो, अंग्रेज़ हमारा राजा है!" जीवनाथ ने चुपी साध ली तो टोमी ने उसे घूँसा मारकर गिरा दिया था… उसके बाद अंग्रेज़ी की भाषा अंग्रेजी से जीवनाथ को घोर विरक्ति हो गयी और स्कूल छूट गया।
१५ अगस्त, '४७ के दिन जीवनाथ ने अपने घर के सामने लम्बे बाँस की ध्वजा गाढ़ी थी और तिंगा झणदा फहराया था। लोगों में दो सेर बताश बॉर्ट थे। परसादीपुर के किन्हीं बाबू के यहाँ से हारमोनियम और तवला-डुगमी माँगकर ले आया था और दिन-भर आजादी का त्योहार मनाया था। रात को दीप जलाये थे, सेर-भर तीसी का तेल खर्च किया था।
फिर इलाके में कपड़ा-संकट, करासन-संकट और चीनी-संकट आये तो बस्ती रपउली का यह बहादुर उनसे जूझता रहा। धाना-कोग्रेस-कमेटी के मन्ती ने कई बार समझाया : अपने घर की ओर भी तो धान दीजिये जीवू बाबू ! यह फकीरी किस काम की जो अपनों की सुध ले ही नहीं… मगर जीवनाथ टस-से-मस नहीं हुआ।
जीवनாथ की इस रखाई और साफ़गेई में मन्यीजी और परिमट की लाइसेन्सवाले मारवाड़ी सौदागर का हाज़मा खतरे में था। मन्यी की कृपा से दुनাই पाठक का भतीजा रघुवीर रपुली का हेडमैन बना दिया गया। धाना और जिला के कार्गेसियो का स्वार्थी रखेखकर जीवू का दिल उनकी ओर से फटने लगा। अब केवल नेहरू और विनोवा उसके लिए लीडर रह गये थे। जयप्रकाश नारायण पर भी उसकी कुछ प्रश्नों थी। क्युनिस्टो के नाम पर वह जोशी और डोगे को थोड़ा-थोड़ा जानता था। कभी कोई पूछ देता तो जीवनाथ अपने को इमानदार नेशनलिस्ट बताता है। नेह्ल और जयप्रकाश में उसे कोई भेद मालूम नहीं देता।
और, इसीलिए पिक्सेल चुनाव में जीवनாथ ने एक वोट कोंग्रेस को दिया और दूसरा (पालियामेणट वाला) सोशलिस्ट पार्टी को। वोट के बारे में अपनी यह राय उसने साधियों से भी बता दी थी। खुल्लमखुल्ला सोशलिस्टों को वोट देना चाहिए—जैकिसुन की राय तो यही थी, लेकिन जीवनாथ उससे सहमत नहीं था।
क्यों नहीं सहमत था ?
सहमत इसलिए नहीं था कि अब भी जीवनाथ को कांग्रेस से कुछ उमीदीं थी। वह नाहक कांग्रेस को दुश्मन बना लेने के पक्ष में नहीं था। अधिकारियों या नेताओं को यह कहने का मौका वह नहीं देना चाहता था कि रपुली के किसान कांग्रेस-विरोधी हैं। उसने जैकिसुन को समझा-बुझाकर मना लिया।
आजकल बरगदवाली जमीन पर समूचे गाँव की नजर लगी हुई थी। पुरानी पोखर भी लोगों की चर्चा का विषय थी। नखे प्रतिशत आदमी ऐसे थे जिनका इन इरागड़ों से सम्बन्ध था। दुनाई और जैनरायन का कहना था कि वह बेकार पड़ी हुई जमीनों को आबाद करना चाहते हैं, इसमें भला किसीका क्या बिगड़ता है ? जर्मन दार तो अपनी जमीन छोड़ेगा नहीं; वे नहीं लेते, कोई और ले लेता; रपुउली वाले 'ना' करते तो पड़ोस के किसी गांव का कोई लिखवा लेता। क्या बुरा है, गाँव की जमीन गाँववालों के पास रही… जीवनाथ चाहें, वही रख लें; करें वही इस जमीन को आबाद… न वह पोखर ही किसी काम की रही और न बरगद का वह पेड़ ही किसी काम का रहा ! यह नाहक टटा खड़ा करते हैं अब जीवू। कोई कुछ नहीं बोलता है फिर वही क्या बीच में टांग अड़ते हैं ? क्या मशा है बाबू जीवनाथ की, कुछ मालूम भी तो हो !
गाँव के नौजवान इन भली-भली बातों का मतलब खूब समझते थे। 'सतर चूहे खाकर विलली चली हज को', सो उनसे छिपा नहीं था। पाठक की माँ वर्ष में एक बार भागवत का पारायण करवाती थी, नौ दिनों तक। जैनरायन के घर प्रतिमास, सफ़ाति के दिन, सत्यनारायण की पूजा होती थी। परन्तु इससे क्या ! जमीन की उनकी भूख का न ओर था, न छोर... परमार्थ और स्वार्थ साथ-साथ चलते रहे इन परिवारों में।
छोटी जात के गरीब लोग जीवनाथ के प्रति आदर और शब्दों के भाव रखते थे अवश्य, परन्तु दुनई पाठक का उनपर भारी आतंक था। इसके अलावा, अकाल के दिनों में पाठक उन्हें अनाज देता था—भले ही पीछे छोढ़ों वसूल कर लेता, लेकिन तकाल तो उनके बच्चों की प्राण-रक्षा इससे हो जाती थी। पाठक और जैनरायन के आदमी उन्हें अवसर समझाते रहते थे : जमीन अगर किसीने बेच दी और किसीने खरीद ली तो इसमें भला कौन-सा आसमान फट पड़ा ! परती जमीन जोत में आयेगी तो अनाज की बढ़ती होगी और इससे अपना गाँव सुखी होगा… उस बीने बरगद के पीछे भला क्यों कोई सती होगा ? और, उस रही पोखर के लिए किन आँखों में भला आँसू आयेंगे ? हाँ, जीवनाथ का अपना कोई स्वाथ इससे सधे तो सधे !
एक गूगा और बोडम चमार था। पहला पति मर जाने के बाद रपुउली में यह दूसरी शादी की थी उसकी माँ ने। नयी गृहस्थी में उस चमारिन के कई एक लड़के हुए जो अब सयाने हो रहे थे। नये पिता को पुराने पिता के पुत्र में कोई दिलचस्पी नहीं थी। शत्रुओं को फँसाने की नीयत से पाठक ने डेढ़ सौ रुपये पर उससे गूगो की जान का सौदा किया और दो ही रोज बाद बेचारा बाँसों की दुरुमूट में बेजान पाया गया। गदन और माथे पर गॉंडों के घाव थे; चेहरा लहूलुहान था।
खबर पाते ही थानेदार साहब पहुंचे, बन्दूकों से लैस पुलिस के दस जवान उनके साथ थे।
लाश टांग-टूगकर दरभंगा की ओर रवाना की गयी। हत्या के अभियोग में पाँच आदमी गिरफ्तार हुए...
1. जीवनाथ राय,
2. सरजुग महतो, ३. जैकिसुन यादव,
8. लक्ष्मनसिंह, और
५. सुतरि इयां।
हथकिडिया डालकर पाँचों को लहेरियासराय-जेल की हाजत में पहुँचा दिया गया।
कोर्ट में मुकदमा दायर हुआ, सरकार स्वयं मुकदरी हुई और जीवनाथ वगैरह पाँचों-जनெ मुदालह बनाये गये।
クミ
दयानाथ जहाज (स्टीमर) से गंगा पार करके दीघाघाट उत्तर और वहाँ से रिकशा किया, सीधे आर ब्लोक पहुँचा। ८ नमबर के क्वार्टर में उग्रमोहनदास का डेरा था।
बाबू उगमोहनदास रेहुआ-थाना की जनता के प्रतिनिधि थे, एम० एल० ए०। पांच उम्मीदवारों को हराकर आप ही चुने गए थे कांग्रेस की टिकट पर। की तो थी आपने वकालत पास, लेकिन मास्त्री का पेशा ही आपको प्रिय था। '३०-'३२ के आन्दोलन में नमक बनाकर जेल गये थे, '४२ के दिनों में छ. महीने फरार रहे और बाद को पकड़े गये तो दो साल की सजा हुई थी। पीछे दासजी ने साहित्य-सेवा आरम्भ की। कई एक आलोचनात्मक ग्रथ लिखे, जो छपे तो अवश्य, परन्तु प्रकाशक के गोदामों और स्थानीय बुकसेलरों के शो-केसों तक सीमित रह गये। कुछ महीनों तक दास बाबू साप्ताहिक 'प्रभात' निकालते रहे, जिसके कुछ पृथु हिन्दी में होते और कुछ मैथिली में। सम्पादकी से जी भर गया तो आठ महीने जाकर पापिडेचरी रह आये। महिर्ष अरिविन्द की वह छत्रछाया उगमोहन बाबू को बड़ी शीतल और शान्त प्रतित हुई थी। आप वहाँ से यही निश्रय करके लौटें कि आगे राजनीतिक हलचलों में शामिल नहीं होंगे। सुखी काशतकार-खानदान में जन्म था और भाइयों में सबसे छोटे थे—इसी कारण दासबाबू पर दुनियादारी का बोझा कभी नहीं पड़ा। स्ली भी ऐसी मिली जो जर्मीदार बाप की इकलौती थी… क्या राजनीति, क्या साहित्य-निर्माण, क्या अध्यात्म और क्या वेदान्त, क्या सभा-सोसाइटी और क्या लोक-सेवा—सब-कुछ आपके लिए विश्वद्वर मनोरंजन था। पिछले एन्नेकशन में प्रादेशिक कार्ग्रेस कमेटी के एक गुरूप ने आपको अपना उम्मीदवार घोषित किया और दूसरे गुरूप ने हल्की-सी मुखालफत की तो उगमोहन बाबू सीधे दिल्ली-दरबार पहुँचे और मुस्कराते हुए वापस आये। डिटि मिनिस्टर होने की चास थी, मखौल तो कोई था नहीं। वोर्टिंग से चार-छ: रोज पहले वह रपुटली भी आये थे; द्रार-द्रार पर हाथ जोड़कर लोगों से 'भोट-भिश्रा' मंगी थी।
और दयानाथ राय तो उग्रमोहन बाबू को बीस वर्षों से जानता था—अभी से जब कि पटना-कैम्य जेल में एक ही इलाके के होने के नाते दोनों में परिचय हुआ था। चुनाव के जमाने में तो कई बार देखादेखी हुई थी।
जीवनाथ और जॉर्किसुन ने बेदखली के इस झगड़े की खंबर कई वार अखबारों में दी थी। कई अखबारों ने उस समाचार को छापा भी था। इसके अलावा, जिला-प्रदेश और केन्द्र की कांग्रेस कमोटियों के प्रसिडेंटों के नाम सारी बातें तफसील से लिख भेजी थी रिजिस्ट्री-पोस्ट द्वारा। भारतीय प्रजातत्त्व के प्रसिडेणट बाबू राजेन्द्रप्रसादजी और महामन्ती पंडित जवाहरलाल नेहरू के नाम भी दरखलासे की थी। और कहीं से कोई जवाब नहीं आया था—हाँ, राष्ट्रपति-भवन, नयी दिल्ली से पहुँच की मंजूरी के तौर पर एक पत्र आया था। हिन्दी में टाइप किया हुआ पत्र, निहायत खूबसूरत काराज पर। उस पत्र मे था इतना ही कि राष्ट्रपति के सचिव के कार्यालय में आपका पत्र पहुँच गया है...
उग्रमोहन बाबू को इन बातों की जानकारी थी और अभी चन्द रोज पहले 'इण्डियन नेशन' से यह भी मालूम हुआ था कि रपुलली में कल हुई है, पाँच आदमी गिरफ्तार हुए है उसी सिलिसिले में।
कल की असलियत मालूम करके दासजी गम्भीर हो गये। दयानाथ ने उनसे अनुरोध किया कि वह खुद रपुली चलकर मामले की तहकीकात करें। बेदखली रकवाने के लिए दयानाथ स्वयं मालमन्जीरी से आश्रासन पाना चाहता है, यह बात एम० एल्० ए० साहब को ठीक नहीं जँँची। प्रकट तौर पर वह बोले—"घबराने की कोई ज़रस्त नहीं, सार्वजनिक उपयोग की भूमि पर व्यक्तिगत अधिकार विधाता का भी नहीं हो सकता। मिनस्टर इसमें क्या करेंगे ? में कलवटर को सब बातें समझा दूगा...अभी आप आराम कीजिये द्या बाबू, जाइये !"
नौकर ने बाहर बरामदे की ओर इश्तारा किया और दयानाथ वहाँ कम्बल बिछाकर लेट गये।
दिन डल चुका था। चार बजनेवाले थे। गंगा के उस पार हरिहर-क्षेत्र मे महामेला लग रहा था। वहाँ सामूहिक विकास-योजना के सम्बन्ध में कोई प्रदर्शनी थी, जिसका आज ही सात बजे शाम को उद्धारत था। कुछ एम० एल० ए० अगिनबोट (स्टीम-लांच) से गंगा पार करके वहाँ पहुँचनेवाले थे।
टीक पाँच बजे उपगमोहन बाबू अपनी बैठक से निकले। दयानाथ की ओर एक नजर फैककर दूसरी नजर उन्होंने उठी हुई बाई कलाई पर टिका दी, फिर बाजांस् मुसकानों से उस किसान की बेधक दृष्टि को धकेलते हुए-से बोले—"में अब परसों लौटूगा...आज भी एक स्पीच देनी है और कल सोनेपुर में आभा साहित्य-परिषद्का कोई फैकशन है और परसों हाजीपुर का किरण-मण्डल कौमुदी-महोस्व मनायेगा...ही-ही-ही-ही...आप रिहायेगा तब तक ! मैं परसों रात लौटूगा, नहीं तो उससे अगली सुबह..."
दयानाथ पर जैसे ओले पड़ रहे हों, वह उठकर बिलकुल खड़ा हो गया। कम्बल समेटने का उपक्रम करता हुआ-सा बोला— "तो मै भी चलू ? मेला देखूगा..."
नेताजी ने खीझ को दबाकर कहा—"नहीं जी, नहीं जायँगे आप ? इतनी दूर से आये है, आराम कीजियेगा अब कि भटिकियेगा मेंले में जाकर !"
फिर उन्होंने नौकरों से कहा—"देखना रे, भाईजी रपुली के रहने-वाले है...इन्हे कोई तकलीफ-उकलीफ न होने पाये!"
"जी मालिक!"—नौकर के मुँह से निकला।
चमकदार पेशावरी चपल्लो और नफीस ऊनी मोजों में कसे-लिपटे दासजी के चरणकमल सीढ़ियों से नीचे उतरे। उत्तरकर तीन-चार कदम आगे बढ़े, फिर रिकशे पर विराजमान हो गये।
दयानाथ देर तक बरामदे में खड़ा रहा। जिसे ओर रिकशा गया था उसी ओर देखता रहा और फिर दीवार में पीठ टिकाकर बैठ गया। था तो वह सोचने की मुद्रा में, लेकिन दीमाग की रग-राग ऐठ गयी थी, कुछ भी सोचने को जी नहीं कर रहा था। कुछ देर पहले पास महसूस हुई थी, अब उसका भी पता नहीं था कही...
मगर इस तरह वह कब तक बैठा रहेगा ? नहीं। उसने अब अपने को संक्षाल लिया—अपनी से चुनौती निकाली दयानाथ ने, आधी बाँहाँ-वाली गोल-कट बिनियान की पाकिंट से तम्बाक का पता निकाला। नाख्नों से तम्बाक खॉट-खॉटकर वह सुरती तैयार करने लगा। अब चिन्तन की उसकी चरखी घूमने लगी, आँस्-आस्ते :
पाठक और जैनरायन की अगर इसी तरह चली तो समूचा गाँव मंसान बन जायगा। जर्मीदार बाबू कृष्णदतिंशह और उसका दीवान मिललक अब भी अपनी जालिमाना हरकतों से बाज नहीं आया तो आदमी आदमी को खाने लगे। थानेदार और जिला के अधिकारी यों ही छूट-कर यदि चरते रहे तो भारतमाता की इज्ञत-आवर्क लुट जायगी...किस उमंग में दयानाथ नागपुर गया था इण्डो-सत्याग्रह में शामिल होने ! किस उससाह से उसने नमक-कानून तोड़ा था ! उछलता हुआ कैसा दिल लेकर वह दोनों बार जेल के अंदर पहुँचा था !! हजारों और लाखों आदमी उसी तरह जेल गये। सैकड़ों फांसी पर खूले। हजारों के परिवार टूट...तब आकर यह आजादी हासिल हुई है... आजादी ! छि : ! आजादी मिली है हमारे उग्रमोहन बाबू को, कुलानन्ददास को… कांग्रेस की टिकट पर जो भी चुने गये हैं उन्हें मिली है आजादी। मिनिस्टरों को तो और ऊँचे दर्ज की आजादी पहुँची है। सेकेटोरियट के बड़े साहबों को भी आजादी का फायदा पहुँचा है।
'३२ में जेल से छूटा, तब से दयानाथ की दिलचस्पी इन मामलों में कम हो गयी। गॉधीजी ने सत्याग्रह-आन्दोलन सार्वजनिक तौर पर वापस ले लिया, आगे आन्दोलन को व्यक्तिगत दायरें में सीमित कर दिया उन्होंने। यह दयानाथ की समझ में बिलकुल नहीं आया। उसकी यह धारणा पककी हो गयी कि राजनीति गरीबों और मूखों के लिए नहीं हुआ करती, वह तो बस खाते-पीते सयानों की चौपड़ है।
'४२ के तोड़-फोड़ और ६ अगस्त की उथल-पुथल के दिनों में दयानाथ बुरी तरह बीमार था लेकिन जीवनाथ की उछल-कूद उसे अच्छी ही लगी थी। "चाचा की विरासत अबकी भतीजे ने सँभाली"—इस बारे में गाँव के सभी लोग एकमत थे...चाचा को जीवू उन दिनों अख-बार सुनाया करता, चारपार्ई के करीब बैठकर ! अखबारों का छपना अंग्रेज-सरकार ने नामुमिकन कर दिया तो जाने कहाँ से और कैसे लिखा-वटी छापे में 'रणभेरी' निकलने लगी। उसके दो-ही-तीन अंक जीवनाथ के हाथ लगे थे। लेकिन भतीजे ने उसमें भी चाचा से साइडारि निभायी।
१५ अगस्त '४७ के बाद स्वदेशी शासकों के रग-ढंब देखकर दया-नाथ अंदर-ही-अंदर कुढ़ता रहा और जीवनाथ को जब-तब समझाता रहा। भतीजा बाकी सब-कुछ सुन लेता था, लेकिन नेहर-की आलोचना उसके लिए असह्य थी।
बेटे दो थे दयानाथ के। एक बी० ऐ०, बी० टी करके सुपौल (जिला सहरसा) के किसी हाई स्कूल में असिस्टेट न्हेडमास्टर था और दूसरा खेती-गिरिस्ट्री सँभाले हुए था। जीवू को भी 'ओरसपुत्र' समझते थे दयानाथ राय।
बाबू दयानाथ सुरती फॉककर ऋ, अंदर झॉककर नौकर से पूछा : "पाखाना किधर है ?" फिर गठरी से अपना लोटा निकालकर उन्होंने पानी लिया और नौकर ने जिधर बताया था, उधर को हृए।
नेताजी का यह क्वार्टर एक तरह से खाली पड़ा था। नौकर था और स्वयं थे, बस। कुछ दिन पहले तक एक अंग्रेजी दैनिक के न्यूज़ एडीटर रहते थे। उसी बड़े स्नम में अब कोई प्रोफेसर आकर रहेगा… अखल की बदहजमी के कारण, या क्यां, नेपाली नौकर ने द्यानाथ से यह सब बता दिया जब कि पाखाने से आकर हाथ मितिया रहे थे।
"मेरा खाना मत बनाओ!"
दयानाथ के इन शब्दों से नेपाली छोकरे को विस्मय हुआ। जिशासा में गदन लम्बी करके उसने मुँह वा दिया...
"में अभी जा रहा हूँ बॉक्पीपुर की तरफ"—दयानाथ ने सामान की गठरी सँभालते हुए कहा—"रात उधर ही गुजरेगी और कल सुबह के जहाज से वापस जाना है। समझे?" स्वीकृति में नेपाली का सिर हिला।
बेचारे की कुछ समझ में नहीं आया कि आखिर वह चून्ला सुलगाये कि नहीं। मालिक जब नहीं हैं और महमान भी जब जा रहा है तो सिर्फ अपने पेट के लिए क्यों वह नाहक हाथ काले करे?
कुट्टी का अहसास होते ही उसका प्रिंटॉर्स (पीताभ) चेहरा जगमगा उठा, खुशी के मारे बतीसां दांत दशनीय हो गये। दयानाथ ने अपनी गठरी उठायी और रखे हाईंग पारंक की ओर किया।
वह किसान-सभा के लीडरों से बातें करने जा रहा था। उसे मालूम था कि लंगरटोली में कहीं उनका दपत्र है।
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تین وর্ष বাদ, इस বার अगहनी फसल इतनी अच्छी आयी थी ! राजभाँध के पास का मैदान धान के वजन दार शीशों का लहरاتا समुदह हो रहा था। अगहनी और कतकी पकनेवाली थी। अधपकी बालियों की मीठी सरसराहट हेमन्त की हल्की बयार को मादक खुशगवार प्रदान कर रही थी। उत्तरायन की ओर बढ़ते सूरज की स्वर्ण किरणों उसमें रपहला और चन्दनकान्त आलोक भरती थी। शरद की शेष प्रकृति धान की इन फसलों में गन्ध-गौरव डाल गयी थी। फलित धानों का वह प्रिय दर्शन पारावार रपुटली के एक-एक व्यक्ति को पुलिकित किये हुए था।
लेकिन पांच-पांच जवान जेल के अंदर बन्द थे। देव-उठान (प्रबोधिनी एकादशी) का त्योहार बड़ा ही फीका गुजरा। लोगों का दिल बैठ गया था, फिर वे भगवान् को शेषशैया से किस प्रकार उठाते? गोबर से लिपे हुए आँगन ऐपन (आलपना) के भूखे थे परन्तु पाँच परिवारों की सिखियों के हृदय में कोई आनन्द या उल्लास नहीं था। उन्होंने सिफ रसमे अदा करने के लिए पूजा की जगहों पर मामूली-से ऐपन डाल दिये थे।
मंद चुप नहीं बैठे थे। एक तरफ हाजित्यों की जमानत के लिए दौड़-धूप जारी थी, दूसरी तरफ बेदखली के खिलाफ प्रतिरोध-आन्दोलन संगठित हो रहा था।
उपर-ऊपर मामला ठडआ दीखता था, मगर अन्दर-ही-अंदर दोनों ओर संघर्ष की तैयारियाँ चालू थीं।
दुनई पाठक अपने-आपमें आतंकित हो उठा था। 'सीधी कार-वাই' की अपने लड़के की यह पॉलिसी उसे पसंद नहीं थी। लड़का तीन-चार महीने बाद दो-एक रोज के लिए रपुलली आ जाता था, मेहमान की तरह। मगर पाठक का रहना तो रात-दिन और बारहों महीनों इसी बस्ति में होता था… समूचे गाँव को दुश्मन बनाकर जीना असम्भव नहीं तो कितन अवश्य था। चमार की हत्या और उस हत्या के अभियोग में पांच आदमियों की गिरफ्तारी और दयानाथ राय का एकाएक पटना जाना-आना और उसके बाद रात के वक्त छिपे तौर पर अवसर मुहல்லा-मौटिंग और मुकदमे में अदालत की ओर से डिलाई… भारी अन्देश की बात थी यह सब पाठक के लिए। उसको नीलाम्बर पर खीझ उठनी थी और अपने पर गुममा। गुस्सा इसलिए कि क्यों वह बरगदवानी जमीन के इंड्रिट में पड़ा ! दस-बारह वर्ष पहले की स्थिति तो अब रही नहीं, जबकि जमीदार रातों-रात खेत बन्दोबस्त दे देते थे और घुटरी बजাতे-बजাতे उन खेतों पर कब्जा भी अपना हो जाता था। जैनरायन भी ही गुममा था यह, उमोसा दिल छुह्दर की तरह
कुछता रहता है, वरना पाठक को क्या पड़ी थी कि इस उसर-बंजर जमीन का झगड़ा मोल लेता ! नीलाम्बर की अंकल पर पाठक को तरस आती…
सवा तीन-साढ़े तीनसौ रुपये वेतन पाते हो। घर में किसी वस्तु की घटी-कमती नहीं है। সसुराल की भी दौलत मिलनेवाली है... और किसी चीज़ की हवस हो तो ऐका-पृद्वा लो, सवारी दोनेवाली लारी का कन्द्राक्ट लो, शहर में एक-आध अच्छी फलैट खड़ी कराकर उसे भाड़ पर लगा दो, देहात में खेती-बाड़ी ही पसन्द हो तो जर्मीदारी-काशतकारी खरीदकर कोई फार्म खड़ी करो और ट्रैक्टर दौड़ाओ! सो नहीं करेंगे ! करेंगे क्या कि चोर की तरह चुपचाप गैर-मजरआ जमीन बन्देबस्त लोग और सारी दुनिया को अपना दुश्मन बना लोगे ! चौड़ी राह के बीचों-बीच बरगद का पेड़ है, चालू रास्ता है। हमेशा से इस भूमि पर लोगों का समान अधिकार रहा है... अब तुम इसके चारों ओर काँட்டेदार तार डालोगे? बरगद का खाला करके वहाँ तुम कौन-सी फैक्ट्रि खड़ी करने जा रहे हो बाबू ? शहर में पढ़-लिखकर तुम सयाने हुए, अब शहर में रहकर ही सरकारी नौकरी कर रहे हो—चार दिन भी तो देहात में तुम्हारा जी नहीं लगता है बबुआ ! फिर क्या तुम गाँववालों की जिन्दगी में यह उपद्व खड़ा करना चाहते हो? भले तो शहर में हो, जननी डेरा भी साथ रहता है, बच्चों को भी साथ रखते हो ! फिर यह क्या लार टपककों हो चार कहा जमीन के लिए? बताओ बेटा, ! बताओ, ज़रूर बताओ… देखना मुझसे चिपाना मत ! ...
पुरानी पोखर के कछार में एक दिन तड़के दो हल चलने लगे तो बस्ति-भर में सनसनी दौड़ गयी। जैनरायन का छोटा भाई फली भिटे पर स्वयं मौजूद था। उसीकी निगरानी में जुताई शुरू हुई थी...
यह पुरानी पोखर सालों से बेकार पड़ी थी। किसी युग में राजा की सास ने इस पोखर को खुदवाया था, सैकड़ों साल पहले। अब उथली-
छिछली हो आयी थी। बरसात के दिनों में पोरसा-भर से ज्यादा अथाह पानी इस पोखर में कभी नहीं देखा गया। अब जर्मीदार बाबू कृष्णदासिंह के लिए भी किसी काम की नहीं रह गयी थी। जिन पोखरों में पानी बारहों महीने टिकता है उन्हें मल्लाह आमानी से बन्दोबस्त ले लेते हैं—मखिल्यां पालते हैं, मखाना उपजात है, सिंघाड़ पैदा करते हैं... मगर यह पुरानी पोखर अब उन कामों के लायक नहीं रह गयी थी। घुटने-भर पानी और नीचे कीचड़-ही-कीचड़। पिनियाही घासों का जंगल ऊपर-ऊपर फैला रहता और मलेरिया के मच्छर उसमे किलोल किया करते। मुँह-अंदेरे सुबह-सुबह या फिर शाम को डुटपुट ऑधेरे के बाद इस जलाशय में लोग आते आवदता लेने। शौचाधारी करापत्रियों की आवदस्त लेते समय की 'छप-छप' की अजीब आवाज़ नागरिक अतिथियों के लिए सर्वथा नयी हुआ करती। जो हो, इस तलैया पर रुपुली के एक-एक आदमी का वराव हक था। यह उनकी कल्पना के परे था कि कोई पुरानी पोखर को खरीद लगा या बन्दोबस्त ले लगा और इसमें धान उपजायेगा या किसी दूसरे च्यक्तिगत काम में इसका उपयोग करेगा।
दयानाथ राय नयी पोखर के मुहार पर बैठकर दतुअन कर रहे थे, इसके बाद उन्हें नहाना भी था। धोती ले आये थे, सो वह धुनयाई हुई अलग दूब पर रखी हुई थी।
दो-तीन लड़कों ने इतने में हला का किया :
"पुरानी पोखर में हल चल रहे हैं वा 5 वा SSS !"
बाबा ने हल्ला सुनते ही जल्दी से दतुअन चीरकर जीभ साफ की और कुलिरयों से मुँह साफ किया। अंगोछे से हाथ और चेहरा पॉचित-पॉचित खड़े हए।
लोटा और धोती दयानाथ ने वही छोड़ दी और झटकारते हुए आगे बढ़ा
पुरानी पोखर गाँव के दिक्छन-पाक्छम दिशा में थी। नयी पोखर पूर्व-उत्तर की ओर। बीच मे बाग थे, बस्ती थी। इमली, पीपल और
पाकड़ के कई पेड़ थे। नहाने-धोने के लिए गाँववालों के पास अब यही नयी पोखर शेष थी।
गाँव की पूर्व तरफ से होते हुए दयानाथ निकल आये। रजबॉँध पर पैर रखते ही पुरानी पोखर की कछार में हल-बैल दिखायी पड़े।
जुताई चालू थी। दस-पन्द्रह जनएे और तीन-चार आदमी दूसरी ओर ... हाथ उठा-उठाकर जोर से वे बातें कर रहे थे।
रास्ता छोड़कर द्यानाथ ने खेतों की मेड़ पकड़ ली, रणतार उनकी और भी तेज हो गयी।
पुरानी पोखर की भिंड भी अब ऊँची नहीं रह गयी थी। वहाँ पहुँचते ही दयानाथ ने जोर की आवाज दे— "ठहर जाओ!"
दयानाथ की आवाज़ सुनकर हल्ला-गुल्ला तो रक गया, लेकिन जुताई नहीं रकी, हल-बैल और हलवाहे नहीं रके।
क्षण-भर की चुப்பी के बाद दयानाथ ने फन्ची से कहा— "तुम्हारे भाई कहाँ है ?"
फनी के हाथ में बैत की मोटी छड़ी थी। छड़ी की नोक से धरती पर 'फनीन्दनारायण झा' लिखते हुए उसने गम्भीरता से जवाब दिया — "कहिये न, क्या कहते हैं ?"
"तुमसे क्या कहू! जैनरायन कहीं बाहर गये हैं?"
"हाँ, लहेरियासराय गये है। व्या चाहते हैं आप?"
दयानाथ को हँसी आ गयी। वह मामूली हँसी नहीं थी, चुनौती को कबूल कर लेने की हँसी थी वह।
अब तक दयानाथ के पीछे पचास-एक आदमी इकट्रेट हो गये थे। फच्री के पक्ष मे वही चार-पांच आदमी—दो उसके अपने ही भतीजे और दो बिनहार तथा एक नौकरानी।
दयानाथ ने दृढ़ स्वरों में फंची से कहा— "नाहक झगड़ा-फसाद बढ़ेगा, तुम अपने हल-बैल वापस ले जाओ फंची ! काफी धन-सम्पदा भगवान् ने तुम लोगों को दी है, पोखर की कछार पर समूची बस्ती का
अधिकार है..."
"उं हू"—बीच में ही फबी चில்ला उठा—"सो, कहाँ होगा दया-भाई ! इस वक्त आप दूसरी चाहे जो बात मुझसे मनवा ले, यह बात आपकी मै नहीं मान्�गा ।"
"नहीं मानोगे?"
"नहीं मानूगा, नहीं मानूगा और नहीं मानूगा!!"
"अच्छा बाबू!"
दयानाथ ने लोगों की तरफ गदन फेरी।
दाहिने हाथ से समाधान चाहनेवाला संकेत करते हुए उन्होंने भीड से पूछा..."तुम सबकी क्या राय है?"
"कछार में या भिंड पर हल नहीं चलेगा" ...लोगों ने एक स्वर से कहा।
दयानाथ ने फिर पूछा—"नहीं चलेगा ?"
"नहीं, नहीं, नहीं!!!" जोरों की आवाज आयी उसी भीड़ के अंदर से। दयानाथ ने देखा : सभी तरह के लोग हैं इनमें...पिंडित शिनाथ ठाकुर हैं, हाजी करीमबक्स है, मोसम्मात झुनिया है, अहीरों की बिरादरी के गोनउड़ महतो और सहदेव राउत है, भुदू पासवान है, विजयबहादुरसिंह सिसोदिया है, जहदली जोलहा है, सोनमा दोलीया है, अचकमणि मोस्मात है...खेतिहर है, बिनहार हैं, हलवाहे-चरवाह है—कौन नहीं है ?
दयानाथ अब हलों की ओर बढ़े। जुताई अब भी चल रही थी। कछार के अंदर आकर दयानाथ ने हलवाहों से कहा—"दुनमा ! सुनता है ? खोल हल...और यह दूसरा कौन है ?...तू भी खोल!"
दुनमा खड़ा हो गया। बैल रक गये। पिछला हल भी अचल।
फनी लपककर आगे आया और टुनाई मडड की बांह पकड़कर गरजा..."खबरदार ! हल खोला कि चमड़ी उघेड़ ली जायगी...देखता व्या है ? हांक बैल ! हांक !!"
लेकिन दुनमा सहमी आँखों से ताक रहा था। फन्दी के चेहरे की ओर। बाक उसकी बन्द थी, हाथों और पैरों में मानो लकवा मार गया था।
बैलों को खड़े होने का मौका मिला तो पेशाब करने लगे।
सही चुप थे।
फनी ने पिछले हलवाहे की बांह पकड़ी और फिर पीठ पर हाथ से थपथपाया—"तू ही आगे बढ़, चल ! आ !"
वह भी आगे नहीं बढ़ा।
फणीन्द के मुँह से खीझ के मारे निकला—"खच्र कहीं के!"
दुनमा की भवे तन गयीं। वह कड़ककर बोला—"मालिक, गाली मत दीजिये हमको ! हाँ!"
"हूँ!!"—दूसरे हलवाहे ने अपने साथी का समर्थन किया, खर में दृढ़ता थी।
फंसी का चेहरा फक रह गया।
इतने में दयानाथ आगे बढ़े। अपने हाथों से उन्होंने हल के डंडे को जुए से खोल दिया। फपीन्द ने उन्हें रोकने की कोशिश की थी सही मगर दो आदमियों ने उसे पकड़कर अलग कर दिया था। जुए-समैत बैलों के दोनों जोड़ खुलते ही गाँव की तरफ चले और हलवाहे अब भी अपने-अपने हल की मूठ पकड़े खड़े थे। कछार की नम जमीन में फारें अब भी बीत-बीत-भर अंदर खुभी रह गयी थीं। जुताई अभी आधी तो क्या, चौथाई भी नहीं हई थी…
लोगों के चेहरे खुशी के मारे दमक रहे थे और दयानाथ गम्भीर मुद्रा में खड़ा था।
फनीन्द्र बकता हुआ, बुदबुदाता हुआ घर की ओर अपना रख कर चुका तो हलवाहों ने हलों को कन्धे पर उठा लिया और कछार में से बाहर निकल गये।
दयानाथ ने लोगों से लौट चलने के लिए कहा, इशारों में उन्होंने
अपने लीडर की आशा का पालन तत्काल किया।
जैनरायन ने अगले ही रोज दो किया फ्रेंजदारी लहेरियासराय-लाअर-कोर्ट में दायर कर दी। एक थी मार-पीट की, दूसरी थी पराई भूमि पर दखल जमाने के प्रयास की। दयानाथ तो खेर दोनों में मुदालह बनाये गये थे, अलावा उनके, और चार आदमी पहले मुकदमे में और छ आदमी दूसरे में लपेटे गये थे।
कल का मुकदमा पहले से पेशा था ही।
गाँव में जितने भी समझदार आदमी थे, सबका ध्यान लहेरिया-सराय के अदालती कठचरों पर मँडरा रहा था।
दयानाथ लहरियासराय पहुँचकर युवक वकिल बाबू श्यामसुन्दरसिंह से मिले। उनका डेरा बिलभद्रपुर मुहல்லे मे, एकेडमी स्कूल से सीधे पूर्व पड़ता था।
शयाம்सुन्दर बाबू वकिल तो थे ही, साथ ही जनवादी नौजवान संघ की जिला-कमेटी (दरभंगा) के प्रसिडेणट भी थे। छात्र-जीवन में उन्होंने प्रादोशिक स्टूडेणट फेडरेशन के माध्यम से अपनी सार्वजनिक सेवा-भावना का पयर्णत परिचय लोगों को दिया था। एक वार आप फेडरेशन के जनरल सेकेटरी (प्रोदेशिक) भी निविचित हुए थे और पौने दो साल तक शानदार तरीके से संगठन के मनिवत की जिम्मेवारी निभायी थी। पिता का देहानत् हुआ तो पिछले कई वर्ष वकिल साहब के घरेलू झाँडटों में ही सर्फ हो गये। अब गृहस्थी सँभल चुकी थी। एक भाई एम० ऐ०, बी० ऐड० करके सीतामहरी कालेज में दर्शन-शास्त्र का प्रोफेसर और सबसे छोटा दरभंगा मेडिकल कॉलेज का मेघावी छात्र था। वाकशक्ति अच्छी होने के कारण उनका अपना पेशा भी कार्फी सन्तोषजनक था। पूर्वजों की उपाजित सम्पति के तौर पर सौ बींघा उपजाऊ जमीन थी, सो अलग। नयी पीढ़ी के प्लीडरों में जो तीन-चार नाम लोगों की जबान पर अक्सर फिल्म आते थे, उनमें से एक नाम श्यामसुन्दर बाबू का भी होता था। रपुली में जो घटनाएँ इधर घटी थीं, उनका पता वकिल साहब को था। अलावा इसके, दयानाथ पटना में नौजवान-संघ और किसान-
सभा के नेताओं से मिला तो उनकी ओर से दरभंगा की जला-आफिसों में रपुउली-कांड की बावत हिदायतें आयी थी।
श्यामसुन्दरसिंह ने ध्यान-पूर्वक द्यानाथ की बातें सुनीं और बिना फीस के मुकदमों मे पैरवी का आश्रासन दिया।
नौजवान-संघ की जिला-कमेटी के प्रसिंपेडट की हैसियत से श्याम-सुन्दर बाबू ने दयानाथ से कहा—"अपने गाँव में नौजवान-संघ की एक शाखा खोलिये और नौजवानों को संगठित होने का अवसर दीजिये..."
"जो!"
"जी-जी नहीं, अगले रविवार को नौजवान-संघ के मन्त्री रपुउली पहुचेंगे। वह आपसे इस बारे में बातें करेंगे, समझे ?"
"सरकार!"
"हाजत में जो लोग वन्द है उन्हें जमानत पर छुड़वा वयो नहीं लेते ?"
इस सवाल को सुनकर दयानாத ने मुँह वा दिया।
घर से निकलते वक्त उसे इसका ख्याल ज़रूर था और अभी नहीं तो विदा होते समय जमानत की बावत वकिल साहब से वह पूछता ही।
कुछ देर वाद द्यानाथ ने कहा—"अब आज तो नहीं हुआ
सरकार!"
"क्या नहीं हुआ?"
"सरकार. यहाँ कौन जामिन होगा हम गाँववालों का ? गाँव जाकर राय-बात करेगे फिर कोई इन्तजাম होगा..."
कुछ देर बाद श्यामसुन्दर बाबू ने कहा—"दो के लिए तो हम कल जमानत का इन्तजাম कर देगे, बाकी आप गाँव से प्रबन्ध कर लीजियेगा..."
दयानाथ कृतझता के मारे वकिल साहब के पैर छुने को हुआ लेकिन रोक लिया गया—"'ओं हाँ हाँ हैं ! क्या कर रहे हैं यह आप ?" गदद होकर दयानाथ ने कहा—"'गाँव में हमारे यहाँ हल्ला था कि खून का मामला है, जमानत इसमें नहीं ली जायगी..."
इस पर उँगिलियों से नाक चिकनाते हुए श्यामसुन्दर बाबू हँस पड़े, और हँसते-हँसते बोलै—"नीलाम्बर पाठक के आदमीयों ने आप लोगों को भरमाने के लिए यह शिग्गफा छोड़ रखा होगा।"
"जी, हुजूर ! यही बात होगी…"
वकिल साहब ने हाथघड़ी देखी और उठ खड़े हुए। तीन-चार मुविकिल अलग तखतापोश पर बैठे थे, उनसे कहा—"में भोजन करके आता हूँ।"
दयानाथ ने आगे बढ़कर कहा—"में तब तक किसान-सभा के दपतर से हो आता हूँ।"
"जाइये, जगह मालूम है न ?"
"जी, लाइट हाउस सिनेमा से उत्तर, सडक के किनारे।"
"हाँ, लाल झपड़ा लगा होगा और मकान खपरेल है।"
वकिल साहब खड़ाऊँ खटखटाते अंदर गये और दयानाथ किसान-सभा के दपतर की तरफ हुआ।
वहाँ से एक तो उसे मैम्बर बनाने की रसीद-विह्याँ लेनी थी, दूसरे, किसान-सभा के किसी लीडर से कुछ राय लेनी थी।
पूछ-पाछकर वह दपतर पहुँचा तो वहाँ बिना मूहोंवाले एक बाबू मिले। उन्होंने अपना नाम अली सफदर बताया। किसान-सभा की रसीद-विहयाँ तो २५-२५ की दो मिल गयीं मगर आदमी एक भी नहीं मिला। अली सफदर थककर कहीं बाहर से आये थे और जेलवाले कम्बल पर लेट गये थे। दयानाथ कुछ बोलना-बितयाना चाहता था मगर सफदर ने कहा—"में बीड़ी-मजदूरों की युनियन का यहाँ सेकेटरी हूँ, किसान-सभा के बारे में कुछ नहीं बता सकूणा। कामरेड श्रीनारायण वारिस नगर गये हैं, दो रोज बाद लौटेंगे..."
साप्ताहिक 'जनशक्ति' के पिछले दो अंक द्यानाथ वहाँ से खरीदता आया। दुअनी लगी थी।
फिर उसने सोचा कि बारह बजे की ट्रैन से गाँव लौट चले और जमानत के लिए दो आदमियों को कल कचहरी ले आये…एक वह खुद होगा। बाकी दो के लिए श्यामसुन्दर बाबू ने कहा है…
यह बात दयानाथ को जेंच गयी। फोरन अदालत पहुँचा। वहाँ वकिल साहब से पूछकर सीधे स्टेशन की ओर भाग। खैर, गाड़ी मिल गयी।
आज ट्रन में दया को वीरभ्रद की बड़ी याद आयी। वह देर तक बीरू के बारे में सोचता रहा...वीरभ्रद आजकल रानींगज (बंगाल) के नज़ादिक किसी गुज़राती सेठ की कोयला-कम्पनी का मैनेजर बना बैठा था; चार सो की तनखवाह और रहने के लिए आलीशान बंगला — व्यक्तिगत सेवाओं के लिए आधे दर्जन नौकर...कलकता, बम्बई, मद्रास, दिल्ली, कानपुर, अहमदाबाद और पूना...कम्पनी की खर्च पर टूर करता फिरता है। पाँच-सात साल हो गये, गाँव नहीं आया। क्या ज़्सरत रह गयी उसे इधर झॉकने को ? '३८ मे जेल से छूटा वीरभ्रद तो दस-बीस रेज़ ससुराल में रहकर कलकता भागா था। विद्यार्थी था, तभी से एक धनी घराने की बंगाली विधवा वीरपर फिदा थी। सो, इस बार हमारे बीरू भाई को बंगाले की उस जोगिन ने पूरी तरह भेड़ा बना
लिया। बगालिन का छोटा भाई ढाका में मिल-मालिक था, उसीकी महरवानी से वीरु भी अब एक मालदार कम्पनी का मालिक बन गया है...हाय ! आज वह सही रास्ते पर होता तो रपुउली मे इन कुलों की एक भी नहीं चलती। चलती ? नहीं, बिलकुल नहीं चलती !! गरीब चमार की जिस तरह हत्या करवायी पाठक और जैनरायन ने, उसकी भारी प्रतिक्रिया हुई थी दयानाथ के मन पर। वह इन दुर्घों को किसी प्रकार भी धमा नहीं करना चाहता था...वह रात-दिन यही सोचा करता कि कैसे ग्राम-कण्टक निमूल किये जायें !...और इसीलिए द्यानाथ को सशस्त्र क्रान्तिकारी वीरुभ्रद आज इतनी तीव्रता से याद आ गया। गாँधीजी की अहिंसा मे तो खैर तब भी द्यानाथ को आस्था नहीं थी और अब तो बेचारी अहिंसा को खुद ही कार्गेसवालों ने विनोवा के अनाथालय मे भेज दिया है...तो क्या चिटपुट हत्याओं वाला सशस्त्र क्रान्तिक का वही रास्ता रपुउली वालों के लिए मुक्ति-मार्ग होगा ? नहीं, नहीं, यह भी नहीं ! तो फिर क्या द्यानाथ के दीमाग मे वीरुभ्रद की वे दीप स्मृतियाँ चककर काट रही है इस समय ? किसानों और देहात के दूसरे गरीब वागों को शोषक शक्तियों के खिलाफ सगहित करनेवाला एक भी आदमी इन इलाकों मे द्यानाथ को दिखायी नहीं दे रहा था। वह सोचने लगा —'काश ! वीरुभ्रद, तुमने आज कही इधर के देहातों की यह जिम्मेदारी उठायी होती ! घर-घर तुम देवता की तरह पूजे जाते भाई ! और तुम्हे क्या पड़ी थी कि गुजराती सेठ की चाकरी करने गये?'
फिर दयानाथ को ख्याल आया कि गरीबों का संकटमोचक वही होगा जो खुद गरीब के घर पैदा हुआ रहेगा; और, गरीब के घर में पैदा होने से ही भला लीडर की देह मे सुरखाब के कौनसे पर लग जाते हैं ? बहुत सारे आज के कांग्रेसी गरीब घराने के हैं, मगर बाबू लोगों का रग-ढंग तो देखो जरा !...
तब दयानाथ का ध्यान गया संगठन के वर्ग-स्पोर्स पर—कांग्रेस किन
वर्गों का संगठन थी और क्यों नहीं वह हम किसानों की एक भी समस्या हल कर सकी ? जर्मीदारों, मेठों और वक्िलो-वालिस्टरों की यह जमात खुली तौर पर तब भी कहाँ खेतिहरों को अपने संगठन मे घुसने देती थी ? गरीब जनता चाहे गाँवों की रही हो, चाहे शहरो की—उसे कोग्रेस ने कभी अपने संगठन की रीढ़ नहीं बनाया…
पहले सोशलिस्ट पार्टी देहातो मे किसानो का साथ देती थी, जमी-दारों के खिलाफ देहातियों के बीसियो मोर्च पार्टी की निगरानी मे जहाँ-तहाँ कायम हुए थे और कामयाबी भी हासिल हुई थी कई जगहों पर। लेकिन पिछले पाँच वर्षों से सोशलिस्टों का तेज घटता आया था। असर इसमें पार्टी के साधारण कार्यकर्तिओं का नहीं, बल्कि ऊपर की सोश-लिस्ट नेताशही का था। दयानाथ की राय में जयप्रकाश नारायण 'कुल-मुल-यकीन' नेता थे।
मधुवनी सब-डिवीजन के अंदर किसानों के बीच कम्युनिस्टों का भारी असर था। पूरा वक्त लगाकर काम करनेवाले कई दर्जन नौजवान थे। एक पैर उनका बाहर रहता था, दूसरा पैर जेल के अंदर। बेईमान अफसरों, तानाशाह धानेदारों तथा सबडिवीजन के ऊँचे अधिकारियों की नींद हराम थी उनके मारे। उधर के जर्मीदार और सेठ-साहुकार खीझे के कारण लाल भाइयों को 'एलंग के कीड़' कहते थे...दयानाथ राय उन नौजवानों का नाम रखे हुए ये 'लाल बहादुर'।
जोर का धकका खाकर समसतीपुर-जयनगरवाली उस पैसेंज गाड़ी के डबे व्बे छे हो गये तो दयानाथ ने सामने के मुसाफ्रर से पूछा —"तार-सराय ?"
"तारसराय तो पीछे छूट गया"—भभकार हँसते हुए उस दिह्यल मुसाफिर ने कहा—"सकरी है सकरी, कहाँ उत्तरना था आपको ?" सोच-विचार और ग्न-ध्�न मे गर्क था दयानाथ, अब समाधि टटी तो चपचाप गाडी से उत्तर गया।
स्टेशन से बाहर आकर गाँव की पगडण्डी पकड़ी उसने। छिक तीसरे दिन पाँचों जवान हाजत से बाहर आ गये।
इसी बीच जैनरायन को राह चलते वक्त सरे-आम दो तरणों ने पीट दिया, सो उन पर एक किता मुकदमा वह फिर दायर कर आया था।
एक और तिकड़म थी, पैसे थे, पराई समपति हड़पने की लालसा थी—दूसरी ओर सार्वजनिक इमानदारी थी, जन-बल था और अत्याचारियों के प्रति असहिणपुता थी।
जीवनाथ और जॉर्जसुन आदि ने अच्छी तरह समझ लिया कि सिर्फ अदालत के भरोंसे इन दुर्घों से छुटकारा नहीं मिलगा पाँव को। जन-बल को अच्छी तरह संगठित कर लेना चाहिए। अपनी रपुउली के इस जन-आन्दोलन को जन-संघर्ष की जिला और प्रदेश- व्यापी धारा से मिला देना होगा। जेल में बीड़ी-मजदूरों और वेदखली के खिलाफ लड़नेवाले किसानों से उनकी मुलाकात हुई थी। पिछले वर्ष जब ऑनरेबल मिनिस्टर पं० श्री नमोनाथ मिश्रणी श्रीकृष्ण पुस्तकालय का उद्दात करने के लिए मधुबनी पधारे तो बाढ्- पीड़ित इलाकों के निवासियों ने हजारों की तादाद में आपके समक्ष प्रदर्शन किया था; उनकी माँग थी—कमला नदी में मधुबनी के आसपास कहीं 'सलूश-गेट' का निर्माण हो और गाँव-गाँव में सस्ते राशन की व्यवस्था की जाय। पुलिस-अधिकारियों ने मन्त्री जी की हिफ्राजत के लिए उनमें से दस आदमियों को गिरफ्तार कर लिया। पीछे 'शाति भंग करने और पबिलक के बीच गडवड़ी फैलाने' के अपराध में उनमें से छह प्रदर्शनकारियों को सब-डिवीजनल कोर्ट ने चार-चार महीनों की सजा दे दी—बा-मशककत क्रेद की सजा। ऊँची अदालत में अपैल की जाने पर सपरीक्षम कारावास का दण्ड 'मामूली कैद की दो महीने की सजा' रह गया। संयोग ऐसा हुआ के उनसे भी लहियासराय-जेल में जीवनाथ वंगरह की मुलाकात होती रहीं : उन छः में दो किसान कम्युनिस्ट थे, एक विधाधी कम्युनिस्ट था, तीन ये साधारण किसान-कार्यकर्ति। यह सम्यर्क था तो महीने-भर का ही, लेकिन पाँचों रपुउलीवाले हाजतियों के लिए वह 'सतसंग' खूब चेतनाप्रद और स्फूतिकारक सावित हुआ।
वे आगे के संघर्षों के लिए दीक्षित होकर ही जेले से बाहर आये थे। उनकी बातों से आशा छिटकती थी, भरोसा टपकता था। स्वयं को इस बात का विश्वास नहीं होता था कि वे इतनी आसानी से जमानत पर छुट आयेंगे।
जॉर्कसुन की माँ ने बेटे से कहा—"दुवले हो गये हों!" जीवनाथ की माँ को भी बेटे के प्रति ठीक यही शिकायत थी। लेकिन उन दोनों को यह बात सुनकर हँसी आयी। उन्होंने हाथ चलाकर कहा—"हमारा तो ओजन (वजन) बढ़ गया है, कहती क्या हो तुम लोग ?"
जीवनाथ की बैठक में बातें हो रही थीं। दयानाथ भी थे। जैक्केसुन था, उसकी माँ थी। सुतरी और लक्ष्मन थे। दूसरे भी चार जने थे। दालान की अंगनई खलिहान के लिए ठीक की जा रही थीं, बीच अंगन में दवनी खम्भा गाड़ा जा चुका था। जीमड़ का ताजा कटा धड़ था, पतों समेत एक ऊपर-मुँही डाल उसमें रहने दी गयी थी। सामने ही लखमनसिंह के घर का पिछवाड़ा दिखायी दे रहा था। उसकी ओरत दीवार के छेद में आँख डाले गौर से सब-कुछ देख रही थी। पाँच साल का बच्चा पिछवाड़े के नजदीक खड़ा था, उसको पिता से बुलावे के इशारे की प्रतिक्षा थी। अगहन के प्रातः काल की हल्की धूप सभी को अच्छी लगती है। वे उसकी मीटी सेंक ले रहे थे।
"में कहां मानूंगी..." जैकिसुन की माँ ने कुछ धण बाद प्रतिवाद किया..."कि जेले के अंदर तुम लोगों का ओजन बढ़ गया है ! ऐसा भी कही हुआ है ?"
"चलो, इस बार हम दोनों जेल हो आये, जैकिसुन की माँ!"
दया ने मुसकराकर कहा—"न बढ़ जाय ओजन तो तुम फिर मुझसे बताना, हाँ!"
"चुप रहो बाबू, मै तुमसे नहीं पूछ रही हूँ!"
"तो, अब और किससे पूछोगे?"
जॉर्जसुन की माँ दयानाथ के प्रति तुनककर बोली—"मेरा बस चले तो इसी बखत बुढ़े को गिलफदार कराके जहुल भेज दू..."
देवर-भाभी की इस नोक-झोंक में अपने को विजयी समझकर बाबू दयानाथ राय ने छौंटी-खिंचड़ी मूछों पर बार-बार हाथ फेरा। जीवनाथ की माँ गम्भीर प्रकृति की महिला थी, वह इन बातों पर सिर्फ मुसकरा कर रह गयी। बाकी सबके चेहरे हुलास से दमक रहे थे। जीवनாथ ने पीछे सजीदगी से कहा — "सचमुच चाची, हमारा ओजन सेर-सेर, डेढ़-डेढ़ सेर बढ़ गया है। तुम समझती नहीं हो...हम हाजती कैदी थे। काम न धाम, खूब खाओ और आराम करो और गपें लड़ाओ; किताबों का इन्तजাম रहता है, कैदी पढ़-लिख भी सकता है चाची ! हमारे सुतरी झा पहाड़ा खतम करके आये हैं, न हो तो उन्हीं से पूछ लो..." जॉक्सन की माँ ने स्तरी झा की ओर विस्मय से देखा।
सुतरी ने दृढ़तापूर्वक कहा—"हाँ जैकिसुन की माँ! मैं अब हनुमान चालीसा अपने-आप पढ़ लेता हूँ। टीसन पर मोसाफिरखाने में रंगे-बिरंगे काराज चिपके हुए थे, उस पर मोटे-मोटे आखरों में बहुत-कुछ लिखा था। एक काराज से चार पानी और दूसरे से दो पानी मैंने खुद वाँच ली। पूछ लो न जीवू से ?...क्यों जैकिसुन, अपनी मई से तुम्हीं बता दो न !"
जैकिसுन और जीवनाथ ने राय ही सिर हिलाया।
तब कुछ देर तक इधर-उधर की बातें होती रही। औरतं पहले ही चली गयी थी। धीरे-धीरे बाकी आदमी अपने-अपने काम पर गये। रहे दयानाथ, जीवू और जैकसुन ।
आगे की बातचीत का आधार था किसान-सभा की ग्राम-कमेटी का ढाचा खड़ा करना। दो महीने के भीतर आसपास के गाँवों में ऐसी सरगिमाँ पैदा कर देना जिससे 'प्रथम रेहुआ-थाना किसान-सममेलन' सम्भव हो।
༣༡
दुनाई पाठक के लिए गाँव में रहना असम्भव हो उठा।
पाँचों युवक जेल से छूट आये थे। उन्होंने दुगुने जोश से काम शुरू कर दिया था। अपने घरेलू काम तो वे करते ही थे, किसान-सभा और नीजवान-संघ की ग्राम-कमोटियां उन्होंने कायम कर ली थी। किसान-सभा के ५६ मेम्बर बन चुके थे, मेम्बर होने की फीस एक आना थी। दयानाथ और जैक्सुन ने घूम-धूमकर लोगों को किसान-सभा के उद्देश्य समझाये। दुनौई, जैनरायन और तीन-चार दूसरे आदमीयों को छोड़कर वाकी सभी मेम्बर बनने को तैयार थे लेकिन अब रसीद-वही खतम हो चुकी थी।
ग्राम-कमंटी बनी तो हाजी करीमबवस उसके सदर चुने गये, दयानाथ उपसभापति और जीवू सेकेटरी। काम की देख-रेख और सलाह मशविरा के लिए सात मैबर्गों की छोटी किसान-काउनिल चुनी गयी। स्थायी फण्ड के लिए सेकेटरी ने अपील की तो पाँच मन धान का वायदा फॉरन मिल गया। अगले ही दिन वसूली भी उसकी हो गयी।
पहली बैठक में काउंसिल नैपांच फ्रेसले लिये थे :
१. पन्द्रह दिन के अंदर स्थानी फण्ड मे पन्द्रह मन धान और जमा करना।
२. साप्ताहिक 'जनशक्ति' और दैनिक 'नवराष्ट्र' के लिए तीन-तीन महीने की अकाउंक रकम मनीआडर से भेज देना।
३. पुरानी पोखर की मरममत के लिए 'लघु सिंचाई-योजना' के अंदर सरकारी मदद हासिल करने की कोशिश करना।
8. जिला और प्रदेश की किसान-सभाओं को ग्राम-कमेटी की हलचलों से वाकिफ़ रखना, अगले कामों के बारे में उनसे हिदायत माँगना।
५. जमीन की बेदखली के खिलाफ गाँव के लोगों का संयुक्त मोचि; पास-पड़ोंसे के किसानों से इस संघर्ष में मदद लेना और ज़रूरत पड़े तो उन्हें भी मदद पहुँचाना।
दपत्तर के लिये हाजरी साहब ने अपने दालान की दो कोठोरियों में से एक दे दी। हर्पते में एक बार काउनिल की बैठक तय हुई और पन्द्रह दिन बाद ग्राम-कमैटी की बड़ी मीटिंग। स्थायी फण्ड की रकम और मेबरी की फ्रॉस वंगैरह से आने वाली रकमों किसके पास जमा रहेगी, यह सवाल उठा तो काउनिल के कुछ मेबरों ने दयानाथ का नाम लिया, कुछ ने हाजरी साहब का। अन्त में दयानाथ के आग्रह से यह भार भी सदर को ही उठाना पड़ा।
हजमी, दया और जीवू के अलावा, काउंसिल के बाकी चार मैम्बर थे : गोनउड़ महतो, विजयबहादुरसिंह, लछमनसिंह और जहदली जोलहा। जीवनाथ ने 'नवराष्ट्र' और 'जनशक्ति' में छपने के लिये ये बातें लिख भेजी थी। अक्षर उसके अच्छे नहीं होते थे और भाषा भी खूब शुद्ध नहीं थी, परन्तु कुछ दिनों बाद ग्राम-कमोटी की स्थापना आदि के सम्बन्ध में वही समाचार 'नवराष्' में प्रकाशित हुआ। न्यूज-एंडीटर ने काट-छॉटकर भाषा दुरस्त कर दी थी...फ्रिजूलल के शब्द होता दिये थे...दो-तीन जगहों पर आगे की लाइन पीछे और विराम-चिन्ह इधर-उधर हो गये थे...लेकिन अब उन पंक्तियों में जान पड़ गयी थी, जों आ गया था। जीवनाथ ने उछलते दिल से जैक्सीन को बताया— "देखो, अपनी खबर छपी है ?"
अखंबार غీन लिया जैकिसुन ने। उसकी आँखें 'नवराब्ह' के कालमों में भटकने लगी।
"यो नहीं पाओगे, तीसरे पेज में देखो!"
आखिर जीपूने উগली से बता दिया।
जैकिसुन ने आदि से अन्त तक कई बार पढ़ा। गिनकर देखा, बारह पंकितयों में छपा था।
दयानाथ के बैठकखाने मे उस रोज अनायास काउंसिल की मीटिंग हो गयी मानो। ग्राम-कमेटी के बारे में 'नवराष्ट्र'-जैसे लोकप्रिय दैनिक में इस प्रकार समाचार छपना रपुली की सामूहिक आत्मा को आह्�ादित कर रहा था। लोगों को लगा कि उनका यह स्थानीय प्रयास अखबार के माध्यम से समूचे बिहार की वाणी पा गया है और जिले-जिले में, थाने-थाने में मुखरित हो उठा है...
दुनाई पाठक अपने पापों में आप ही आतंकित होने लगा। पुलिस के दो जवान डटे थे, डेढ़-दो महीनों में वह उनकी हिफ्राजत में था। उनके पीछे कम-से-कम सौ रुपये माहवार की खर्च आती थी, लाभ कुछ भी नजर नहीं आता था, बल्कि पाठक के प्रति लोगों का द्रॅष इधर और बढ़ गया था। छोकरे खुलेआम उसे सुना-सुनाकर फकरा (फिकरा) गुनगुनाते थे :
'पाठक दुनइयों !
पाठक दुनइयाँ !
पुलिस तोहर नानी
दरोगा तोर सइयाँ !
पाठक दुनइयों…!'
खूनवालா मुकदमा लम्बा खिंच रहा था। उधर श्यामसुन्दर बाबू डटकर पैरवी कर रहे थे, इधर सिखाये-पढ़ाये गवाहों की नीयत हिल रही थी। जैनरायन ने जो केस चलाये थे, उनका तो और भी बुरा हाल था। बरगद के नजदीक नौजवानों ने इस बीच एक अखाड़ा तैयार कर लिया था। शाम को रोज दस-पाँच शरीर वहाँ मिट्टी उकरने लगे। ताल होकने की आवाजें पाठक के कानों में पड़ती तो कलेजा फटने लगता उसका। रात में अवसर वह सपने देखता कि लक्ष्मनसिंह उसकी कनपित्यां में झापाण्ड-पर-झापाड़ लगा रहा है...
पुरानी पोखर के उत्तरी मोहार पर पण्डित शिशनाथ ठाकुर ने आँवले का पेड़ लगा रखा था। तीन-चार साल बाद अब वह काफ़ी छतनार हो आया था। पिछले वर्षं जैनरायन के भानजे ने इस आँवले के साथ एक धवजा गाड़ दी और हनुमान जी का फ्रोटो उसमें चिपका दिया। तभी से सप्ताह में एक बार, मंगल के संध्याकाल, वहाँ कीर्तन चालू हुआ जो अब तक जारी था। जैकिसुन और सुतरी द्वारा कीर्तन में नियमित रूप से शामिल हुआ करते। शिक्षितों और सयानों की इस ओर अर्चि शुरू से ही थी। वे इस कीर्तन को 'छोरकों का हुरदंग' समझते।
जैनरायन का भानजा सतदेव अपने मामा से अलग था। इमानदार और मोहनती आदमी था, सुघंग—लेकिन खुया—टाइप का। सुतरी द्रा की उससे खूब पटती थी। ये दोनों दर-असल रपुटली के अनपढ़ नौजवानों के स्वयंभू नेता थे। सुतरी द्रा साहस का प्रतीक था तो सतदेव परिश्रम का पुतला। दूसरों की मदद के लिए दोनों मुस्तैद रहते। श्राद्ध हो, व्याह हो, स्कूलों का देहारी मंच हो, बाँध पर मिहरी डाली जा रही हो, बरसात का रका पानी निकाला जाता हो, जीवछ नदी में पानी की रोकथाम हो रही हो, मेले-ठेल में जाना हो, स्कूल-पाठशाला का मकान बन रहा हो, जर्मीदार के बाग्गों मे छिपकर आम-कटहल तोड़े जा रहे हैं...वहाँ इन्हीं दोनों में से एक-न-एक अगुआ होता था। जैकिसुन ने उन्हें नौजवान-संघ का मैम्बर बना लिया था। अब मंगलबारी कीर्तन के समय हनुमानजी को नौजवान-संघ के जोशिले गाने सुनाये जाने लगे।
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फसल इस बार दुगुनी तो हुई ही थी, किसी-किसी के किन्हीं खेतों में तिगुनी-दाई गुनी थी।
स्थानी फण्ड में तीस मन धान आ गये थे। उन्हें बेचकर साढ़े चार सौ रुपये की रकम बना ली गयी थी। डेढ़ सौ रुपये का चन्दा गब्रे की फसलवालों से आ गया था। कुछ चन्दे की उम्मीद रबी की फसलों से भी थी।
कमंटी के समझाने-बुझाने पर दो चमारों ने अदालत में पहुँचकर उस कल का भण्डाफोड़ कर दिया। मुकदमा तो डिसिमिस हुआ ही, उलटे दुनाई पाठक और जैनरायन के नाम वारणट निकल गये। गाँव छोड़कर दोनों डेढ़-डेढ़ महीने तक फरार रहे। पीछे कोर्ट में हाजির हुए तो दो-दो हजार रपयों के मुचलके पर छूटे। पाठक की हिम्मत नहीं हुई कि वापस आकर घर पर रहे। जैनरायन लौटा भी तो गुमसुम रहता, गाँव में या खेतों की ओर नहीं निकलता।
इस दरम্যান तीन सौ रुपये की लागत से पुरानी पोखर का उद्दार कर लिया गया। इस काम में गाँव के एक-एक मर्द ने हाथ बँटाया, किसी ने उजरत नहीं चाहिए। धर्मीपापद्ये के मुसहर्जों ने मजदूरी लेकर महतत की थी, एक-एक मजदूर ने 'जगा' समझकर डेढ़ गुना काम किया था… पोखर का अन्दरूनी रक्षा यानी पेंट चार बींघे का था, इसीसे ज्यादा गहराई से तो उसे नहीं खोदा जा सका; हाँ, चार फुट मिट्रि निकाल दी गयी। चारों ओर भिड को ऊँचा कर दिया गया। तय था कि अगली बरसात में अब पुरानी पोखर अपने अंदर इतना पानी भर लगी कि गिर्मियों में सूख नहीं जायगी बिलकुल।
दयानाथ और हाजी करीमबवस 'लघु सिंचাই-योजना' के अधिकारियों से दर्भणा जाकर दो बार मिल आये थे, नीचे-ऊपर कई दप्रतार में दरखास्त भी भेजी थी, लेकिन सिवाय आश्रासनों के अब तक कुछ मिला नहीं था। इस बारे मे पूछताछ करने पर जीवनाथ और जैकसुन को एक विश्वस्त सूत्र से मालूम हुआ कि बाबू उग्रमोहनदास एम० एल्० ए० और बाबू कुलानन्ददास एम० पी० से राय माँगी गयी तो उन्होंने मना कर दिया। लोक-सभा और विधान-सभा के इन कार्गेसी प्रतिनिधियों ने रपुलरी को 'कम्युनिस्ट-प्रभावित गाँव' बताया था...नीलाम्बर के संसुर—जज साहब—से दोनों नेताओं की रख-जबत थी, उन्हीं के यहाँ चाय और कॉफी के गर्म प्यालों से उड़ती भाप ने स्वराजी बाबुओं को बार-बार यह ताजी सूचना दी होगी।
जीवनाथ अब अपने इलाके का किसान-लीडर हो चला था। आस-पास के पच्चीस गाँवों में धूम-घूमकर किसान-सभा के १२९० मेम्बर उसने बना लिये थे, नौ ग्राम-कमोटियां चालू करा दी थी। अनेक प्रकार की सामाजिक और प्राकृतिक विपतियों से ग्रस्त, मौजूदता शासन-व्यवस्था की विषमताओं से तबाह, तीस-चालीस गाँवों का वह परोपद्य (परगना) इन किसान-संगठनों की तरफ भरोंसे की निगाहों से देखने लगा। उच्च वर्ग के खेच्छाचारियों से अपनी हिफ्राजत के लिए, तानाशाह अधिकारियों से वाजिब हक हासिल करने के लिए बीसियों देहाती तरण आगे निकल आये—जीवू भाई उनके रहनुमा थे। उनमें कोई प्राइमरी स्कूल का बेरोज़गार मास्टर था, कोई मैट्रिक पास करके बेकार बैठा हुआ पहुआ बाबू था, कार्बनाने में छोटनी के बाद देहात को वापस आया हुआ कोई मजदूर था, कोई भूतपूर्व फ्रोजी जवान था, स्टाइक के बाद हाई स्कूल या कॉलेज से निकाला हुआ कोई विधाधीं था, खाते-पीते किसान खानदान का कोई आदर्शवादी तरण था...
अपनी बस्ती रपउली के लिए जीवू ने जैकसुन और लछमनसिंह वंगैरह को छोड़ रखा था। प्रोत्साहन और परामर्श के लिए दयानाथ ही क्या कम थे ?
'मार-पीट' का अभियोग लगाकर जो मुकदमा उन पर जैनरायन ने दायर किया था, उसमें उन्हें महीने-भर की कैद हो गयी थी...हँसी-खुशी वह जेल गये और महीने-भर 'कलपवास' कर आये। वैशाख का महीना और तीर्थ का निवास—कलपवास ही तो हुआ ! जैकिसुन ने अपने करवायी थी, मगर सड़ा बहाल रही।
"मुझे यह सजा बिलकुल नहीं अखररी !"—दयानाथ ने वापस आकर कहा था। पुरानी पोखरवाली जमीन पर अपनी दखल के सबूत में जो दस्तावेज़ जैनरायन की तरफ से उसके वैकिल ने कोर्ट के सामने पेश किया, उस पर '३० मार्च, १९५१' तारीख पड़ी थी...जमींदारी-उम्मूलन-विल स्टेट-असेम्बली में पास हो चुका था मगर हाट, बाजार, पोखर, ड्रील, बाग-बगीचा वैरोंह की शुमार जमीदार की 'व्यक्तिगत जायदार' के अंदर की जायगी या नहीं, इस बारे में स्वयं सरकार ही भारी दुविधा में थी। इस प्रसंग में किसानों की तरफ से श्यामसुन्दर बाबू की बहस ने मुनिंसफ को काफी प्रभावित किया था। फिर भी फैसला मुलतवी रखा गया।
आमों में अब के खुब फल लगे थे।
आज जेठ की पूर्णमाथी।
जैकिसन को आज जोरों से बाबा की याद आयी।
कई दिनों से वह इस पूर्णमा का इनजार कर रहा था, बल्कि कई महीनों से। सो हर पूरनमासी की रात जौंकसुन बॉके बरगद के करीब जाता कि शायद बाबा की कृपा हो जाय, दर्शन दे दें शायद वह...लेकिन हरेक पूर्णमा बेचारे को निराश करती गयी—दो पूरनमासियां हाजत मे गुजर गयी थीं, उन रातो मे जौंकसुन को अपने बरगद बाबा याद आते रहे थे।
आज दिन के वक्त तूफान उठा था, दिक्छन-पिच्छम दिशाओं के कोने से बादल उमड़ आये थे। बूदाबादी होकर रह गयी, पानी इतना
भी नहीं बरसा कि धरती की धूल ही बैठ जाती।
चलो, अच्छा ही हुआ—जैकिसुन ने सोचा।
पहली ही शाम को खाना खाकर अपना रखे उसने रजबॉँध की तरफ किया।
थोड़ी देर में लखमनसिंह और सुतरि इरां भी आ धमके।
अंगोछी की गॉडुरी बनाकर जैकिसुन ने उस पर सिर रख लिया और लम्बा पड़ गया।
काफी देर तक इधर-उधर की बातें होती रही…
तूफान के बाद बूदाबूदी हो गयी थी, इसीसे आकाश बिलकुल स्वच्छ था। मजे की चॉँदनी खिल रही थी। हवा बन्द थी, तथापि ऋतु का ताप असह्य नहीं था। चोंच मार-मारकर अधपके आमों को बरबाद करते हुए परिन्दो को रखवाले बागों के अन्दर बार-बार ललकार रहे थे—'हा-हा हो—हो—हुह' और 'ले ले ले ले—ल 55 ल 55 ल 55 ल 55 5 5 5 'की ये अजीब आवाजें रात के सलाट को चीरती हुई दूर-दूर तक गूज जाती थी...उन गूजों से प्रतिधवित होकर दिग्-दिगन्त देर तक गनगनाते रहते।
जैकिसान को आखिर नींद आ गयी।
सुतरी झा चला गया तो लखमनसिंह भी वही सो रहा, आधी धोती बिछाकर और बाँह का तकिया बनाकर।
कुछ ही काल बाद बरगद की डाला-टहनियों के झुरमुट में से विशाल आकृति वाला वही बूढ़ा निकल आया।
गत वर्ष की ही तरह जैकिसून के माथे पर उसने अपना हाथ फेरा और वार-वार सूँघता रहा सिर के बालों को...
कब तक झुका रहता ? पालथी मारकर आखिर बैठ गया, उसके पैर की उंगलियाँ जैकिसुन के माथे से छू रही थीं।
चौदह आसमान में ऊपर चढ़ता जा रहा था।
दिशाएँ शान्त थीं, वायुमण्डल नीरव था।
थोड़ी-थोड़ी देर बाद आम के रखवालों की आवाजें उसी प्रकार उठती थी और उनका अनुरणन चराचर मे छा जाता था। बाकी फिर शानि, फिर सनाटा !
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"तुम लोगों ने तो बस्ति की हवा ही बदल दी ! अब तुम्हारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते पाठक और जैनरायन। पाठक और जैनरायन ही क्यों, कोई हिम्मत नहीं करेगा तुम लोगों से टकराने को…मै आशीर्वाद देता हूँ, रपुलीवालों की यह एकता हमेशा बनी रहे ! सुखमय क्षण-भर के लिए जैक्सीन की पलके मुँद गयी। आँखें खोलने पर उसने सामने किसीको नहीं पाया...
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२१ श्रावण की पूर्णमा थी आज। रंग-विरंगी राखियों से पुरुषों की कलाइयाँ शोभित थी। रजबौध पर उसी जगह बरगद का नया पौधा लहरा रहा था। दतुअन-सा पतला सादा तना...दो पते थे हल्की हिरियाली मे डूबे हुए, फुनगी पर एक टूसा था—दीप की लौ की तरह दमकता हुआ। प्रकृति नये सिरे से मानवता को नवजीवन का सन्देश दे रही थी। आसपास चारों ओर सावनी समाँ छायी हुई थी। समय पर वर्ष। हुई थी, सो, धान के पौधे दूम-डूमकर नन्हा बरगद को अभिनन्दित कर रहे थे। सभी के चेहरे से उल्लास टपक रहा था। हाजी करीमब्वस की कलाई में भी किसीने राखी बाँध दी थी। वह गुनगुना रहे थे : "सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्ता हमारा ! हम बुलबुல் है इसकी, ये गुलिसता हमारा !"