स्त्री-वैचारिकी

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स्त्री-वैचारिकी
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स्त्री-वैचारिकी
• अनुगूंज
वैदुष्यपूर्ण विलायती
नारी की अपनी
के
१४
क्यादेश
लैंगिक
/ धार्मिक
निजता
में
उद्धरणीय
समर्थन की
आवश्यकता
कथादेश का मार्च 2026 का अंक वाणी प्राप्त हुआ. इस स्त्री वैचारिकी के लिए आपको और वंदना राग को
में न केवल हिन्दी साहित्य नहीं है. उनकी
योगदान दिया है वरन् हमारे समय
की अनेक प्रतिभाशाली स्त्री लेखकों की भाषा
भी
एक प्रतिच्छेदी सम्बन्ध
है.
नारीवाद का ज्यादातर
बधाई.
अंक
की शीर्षस्थ महिला
लेखकों
ने अपना देसी मिजाज
शब्दाडम्बरविहीन
स्त्री वैचारिकी
विमर्श लैंगिक निजता और स्वतंत्रता केन्द्र में रखकर
ने इसे अपने-अपने तरीके से किया है. इनमें से कुछेक अपनी बखूबी करना परिवर्तनकामी सामाजिक भूमिका के
समृद्ध
अपना काम
जानती है.
हैं.
इतने
स्वर
लिए भी जानी और मानी जाती वस्तुतः इस वैचारिकी में और पहलू हैं कि यह कहने का मन होता है कि कथादेश इस अंक के माध्यम से साहित्य के लोकतंत्र को आहूत कर रहा है.
यह सम्भव नहीं है कि इस अंक में सभी के योगदान पर टिप्पणी की जा सके इसलिए सबसे पहले में नाइश हसन के लेख 'ताकत के विस्तार की कीमत चुकाती औरतें पर एक दो बात कहना चाहूंगा. ऐसा नहीं है कि नाइश हसन कोई नई बात कह रही हैं. किन्तु आलेख की नीयत इतनी साफ है कि उस पर ध्यान देना जरूरी है. एक मर्दाना ताकतवर शब्द है जो लगातार अपना विस्तार चाहती है. जंग अपनी नवैयत में ही औरतखोर है, नाइश के लेख में अगर पक्षधरता है तो वह उसी चबाई
जंग
कि
को
मुक्त
इसके बाद आई फीमेल अवस्था में स्त्री होने के अनुभव को विशेष स्वर मिला. यह स्त्रीलेखन अपने रचनाकर्म में अर्न्तमन के संस्कारों और बाह्यमन के दबावों से होकर रचना करने में समर्थ हुआ. आत्मकथाओं की सूची में चन्द्रकिरण सौनरिक्सा की पिंजरे की मैना' का उल्लेख देखकर में जलती बुझती स्मृतियों के लोक में
समय सौनरिक्सा
चला गया. किसी हुआ है किन्तु सरिता और मुक्ता में लिखती थीं सामाजिक और मुझे जो स्मरण है उसके आधार संस्थानों यथा पर कह सकता हूं कि वह परिवार में इस फेमिनिन अवस्था का लेखन था. आत्मकथा लिखकर वह कितना मुक्त हुई, कह नहीं सकता.
निजता की क्या सैद्धान्तिकी और व्यावहारिकता होगी के बारे में यथोचित अवधारणा अभी तक नहीं बन पाई है. इसका परिणाम यह हुआ है कि स्त्री लेखन व्यक्तिगत विद्रोहों की रचनावली बन गया है. व्यापक सामाजिक सरोकारों वाली नारीवादी अस्मिता के विकास के पड़ावों की समझ के लिए इण्टरसेक्शनैलिटी एक उपयोगी अवधारणा है. यह कहने में परेशानी नहीं होनी चाहिये कि स्त्रीलेखकों की जीवनी और उनकी आत्मकथा का उनकी अन्य रचनाओं के साथ पाठ हमें नारीवादी साहित्य की एक सुसंगत प्रश्नोत्तरी निर्धारित करने में मदद कर सकता है, क्योंकि किसी लेखक की आत्मकथा उसके शेष लेखन की आनुवंशिक कड़ी है.
उनकी
यहां पर कुछ रुककर जीवनियों और आत्मकथाओं के दूसरे और किंचित संगदिल पहलू की ओर भी इशारा करना ठीक लगता है. विलायती (आज के समय में यूरो-अमरीकन) साहित्य में जीवनी आधारित आलोचना का अपना एक मुकाम है. यह आलोचना पद्धति किसी रचनाकार के जीवन में प्रवेश कर के उसके कृतित्व का विस्तार करती है. ब्रेट सी मिलर ने एलिजावेथ विशेष की 'वन आर्ट' नामक कविता की जीवनी आधारित आलोचना की है. यह वैसे ही है जैसे कोई अमृत राव की 'कलम का सिपाही' पढ़ कर प्रेमचंद्र के कृतित्व का आलोचकीय विस्तार करे. जीवनी आधारित आलोचना के बारे में कुछ नेक इरादों वाली
लेखन की एक महत्वपूर्ण विधा है जीवनीपरक और आत्मकथात्मक लेखन. इस सम्बन्ध में गरिमा श्रीवास्तव का आलेख 'इण्टरसेक्शनैलिटी और स्त्री आत्मकथाएं दृष्टव्य हैं. यह मानते हुए कि भारत में स्त्रीवादी अस्मिता को जाति, धर्म, लिंग और राष्ट्रवाद के प्रतिच्छेदी प्रभावों से गुजरना पड़ता है, उन्होंने किम्बरले क्रोशे की इण्टरसेक्शनैलिटी की अवधारणा को समझा जाना अनिवार्य बताया है. यह राहत की बात है 'अनिवार्यता' की इस वकालत के बावजूद उन्होंने यह माना है कि जब इस अवधारणा को स्थानीय संदर्भों को ध्यान में रखे बिना विभिन्न संस्कृतियों में लागू किया जाता है तो इसका अपेक्षित प्रभाव नहीं पड़ता है. वह लिखती हैं कि यद्यपि इण्टरसेक्शनैलिटी यह दिखाने में उपयोगी है कि भेदभाव के विभिन्न एलेन शोवाल्टर ने स्त्री द्वारा रूप कैसे आपस में जुड़े होते हैं किये गये लेखन की तीन क्रमिक चेतावनियां भी लेकिन इसे हर जगह एक ही तरह अवस्थायें बताई हैं. पहली अवस्था. आत्मकथाओं फेमिनिन लेखन की थी. शोवास्टर यह देखा गया यह मानती हैं कि गाइनोटेक्सट (स्वी का लेखन) की फेमिनिन अवस्था में वह पुरुषवादी कलादृष्टि और सौन्दर्यचेतना का अनुकरण करती थीं. इसके बाद आई फेमिनिस्ट अवस्था में कुछ मूलभूत किस्म का परिवर्तनकारी लेखन हुआ जो फेमिनिन अवस्था की लेखकीयता का मूलोच्छेद सा करता प्रतीत हुआ
हुई औरत की है, न कि किसी धार्मिक, राष्ट्रीय या जातीय अस्मिता की. चाहे सन् 622 से सन् 632 के बीच मदीना की हुकूमत का विस्तार हो, चाहे तमाम युद्धों और विश्वयुद्धों से लागू करने पर महत्त्वपूर्ण में औरतों के साथ किया गया सलूक सामाजिक और ऐतिहासिक हो, भारतीय उपमहाद्वीप में हुए दंगों विशेषताओं को समझने में दिक्कत की विभीषिका हो, ये सब एक साथ मिलकर उस औरत की शिनाख्त करते हैं जिनका आखेट पुरुष योद्धाओं का शगल रहा है.
औरत के भूगोल पर इतिहास की हिंसक अदावतों की नोच बकोट संप्रेषित करने के लिए उन्हें किसी
दरपेश हो सकती है. वस्तुतः किसी सचेत स्वीकथा के लिए अब पितृसत्तात्मक मातृसत्तात्मक समाज जैसे युग्म के अन्तर्गत स्त्री की अस्मिता की पहचान नाकाफी है. नारीवाद की अस्मितापरक शिनाख्त और उक्त
4 कथादेश मई 2026
पर
हैं जो कि होती हैं. लेखक
दी गई भी लागू है कि कुछ अपने जीवन की नागवार घटनाओं को या तो पूरी तरह से छिपाते हैं या उन्हें अतिरंजित ढंग से प्रचारित करते हैं. इस स्थिति में जीवनी आधारित आलोचना की नींव खिसक जाती है. इसके अतिरिक्त ऐसा भी होता है। कि जीवन की वास्तविक घटना किसी मार्मिक रचना पर इतना हावी हो जाए कि जीवनचरित आगे आ जाए
और रचना पिछड़ जाए. एक ऐसी ही भविष्य फलित कविता सिल्विया प्लाथ की 'लेडी लाजरस है. इस
कविता
में कवयित्री की आत्महन्ता
विह्वलता की रचनात्मकता पर उनकी वास्तविक
आत्महत्या ने कुछ समय
के लिए ग्रहण लगा दिया था.
इसी प्रसंग में कई वर्ष पूर्व हंस में छपी आत्मस्वीकारोक्ति श्रृंखला याद आती है. बड़ी बेबाक थीं. कइयों में आत्मस्वीकृति
करने चाहिए. इसका तात्पर्य यह नहीं कि योरोप की साहित्य चर्चा से उन्हें कोई परहेज था. उनका जोर केवल इस बात पर था योरोप की सामाजिक राजनीतिक और साहित्यिक समय-समय
परिस्थितयों
के अनुसार पर उठे हुए नाना वादों और प्रवादों से उपजे विलायती मन्त्रों के उच्चारण से काम नहीं चलेगा जबकि उनमें से कुछ ऐसे हैं जो अपने जन्मस्थान में
सकते हैं लेकिन मुद्दे की बात यह है कि क्या पौराणिक कथाएं इतिहास के प्रश्नों का समाधान कर सकती हैं? स्त्री की अस्मिता की खोज पौराणिक कथाओं में क्यों की जाए?
नवम्बर अंक
नवम्बर अंक अभी पढ़ ही रहा हूँ- सबसे पहले 'हमारी हिंदुस्तानियत' श्रृंखला के लिए आपको धन्यवाद! सचमुच 'हिंदुस्तानियत' संकट में है. अब तो लगता है 'हिंदुस्तानियत' शब्द को भी विदेशी घोषित कर
क्या इतिहास पर्याप्त नहीं है? एक आलेख में पार्वती के पिता दक्ष की यज्ञाग्नि में कूदकर जलते हुए लिखा गया है, यह सर्वविदित
है
कि
यज्ञाग्नि
में
सती
कूदी
धीं
दिया
जाएगा
इस
अंक
में छपा
आत्मस्वीकृतियां
अब
सुनाई नहीं
देते.
पार्वती नहीं
यहां
भी
वही बात
किरण
जी का
अफसोसनुमा सवाल
अतिरंजना थी.
एक
इस समय
भी
स्थिति यह है
कही
जा
सकती है
कि
पौराणिक
कहाँ
गयी
हमारी
'हिंदुस्तानियत'
तो ऐसी थी जिसके कई प्रस्तर अंग्रेज़ी कि
विलायती मंत्र में दीक्षित लोग कथाओं की उद्भावनापूर्ण प्रस्तुतियों
मौजूं है. हम पड़ोसी हैं, साथी हैं,
में छपी
एक
उठा
लिए
गये
अन्य आत्मस्वीकृति से थे. उस समय तो
ऐसे
जटिल
शब्द
विन्यास
कर
रहे
हैं
से
स्त्री-अस्मिता
की संगति
क्या है,
कथादेश'
भी
उनसे
लिया है. तो
गोया
कोई
रहस्योद्घाटन
मंत्र
पढ़
इसके
अलावा
अधिकतर
मुझे बहुत बुरा लगा लेकिन अब
रहे हों. शुक्ल जी चाहते थे कि
इसे में छपने
पढ़
चुका
सोचता हूं तो
लगता है कि एक लेखक की आत्मस्वीकृति कोई शपथ पत्र तो नहीं हो सकती है. वह अपनी जीवन गाथा में भी रचनात्मक हो सकता है. उस पर अन्य भाषाओं में छपी आत्मस्वीकृतियां आत्मकथाओं का प्रभाव पड़ सकता है. इस विचार के तहत यह सुझाव देने का मन होता है कि किम्बरले क्रोशे की इण्टरसेक्शनैलिटी के अलावा जूलिया क़िस्तोवा की इन्टरटेक्सचुअलिटी की अवधारणा का उपयोग करने का अवकाश हमें यह आत्मकथायें देती हैं.
विष्णु खरे के हवाले से एक बात कही जाती है कि उन्होंने सिनेमा को देखने के साथ-साथ उसे पढ़ने की भी पैरवी की थी. विभावरी का 'सिनेमा में दलित स्त्री का
लेख
प्रतिनिधित्व' को पढ़ना अच्छा लगा. मेरी संस्तुति है कि अगर आगे कभी वह इस लेख को परिवर्धित करें तो
श्याम बेनेगल की 'भूमिका' का उल्लेख करने का विचार करें. यह फिल्म मराठी फिल्मों की ख्यातनाम
अभिनेत्री हंसा वाडेकर की आत्मकथा पर आधारित है, हंसा वाडेकर की मां स्त्रियों के उस वर्ग से आती थीं जिसमें उनका व्यवसाय तो वंशानुगत था, किन्तु जाति अनाम थी.
प्रसंगवश ही उल्लेख करना है कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी
साहित्य के इतिहास में एक जगह आगाह किया कि हमें अपनी आलोचना के मानदंड स्वयं विकसित
पाश्चात्य ज्ञान का लाभ उठाया जाए किन्तु भारतीय ज्ञान-परम्परा को न भूला जाय. इस अंक में अनेक ऐसे लेख हैं जो बिना किसी जरूरत के विलायती नामों और मंत्रों से भरे पड़े हैं. लेकिन आश्चर्य की बात है कि मिथकों पर डॉ. रमेश कुन्तल मेघ का इतना बड़ा काम होते हुए भी उनका उल्लेख पाश्चात्य मनीषियों के अगल-बगल भी नहीं किया गया.. मिथकों की चर्चा करते समय मिथकों
के विदेशी विद्वानों के साथ मिथकायन के प्रणेता रमेश कुन्तल मेघ की अवधारणाओं की ओर भी थोड़ा ध्यान देना उचित होता. वाल्मीकि रचित रामायण में शूर्पणखा की आयु का ऐसा कोई उल्लेख नहीं है कि वह सोलह साल की मोहांध बाला थी. प्राचीन ग्रन्थों के अध्ययनोपरान्त 'वयं रक्षाम' जैसा उपन्यास लिखने वाले आचार्य चतुरसेन ने उसे कालिकेय विद्युज्जिस्व की विधवा बताया है.
रावण की इच्छा के विरुद्ध शूर्पणखा ने विद्युज्जिस्व से परिणय किया था. यह घोषणा कर के कि
वह एक साहसिक प्रेमिका है. रावण ने विद्युज्जिहब को इस अपराध के लिए दण्डित करते हुए युद्ध में उसका वध किया. विद्युज्जित्व की चिता में आरोहण करती हुई शूर्पणखा को चिता से खींचकर रावण ने उसे दण्डकारण्य का राज्य दिया.
बड़ी आसानी से शूर्पणखा के और भी अधिक आख्यान रथे जा
नारीवादी बुद्धिजैविक विमर्श
मध्यवर्गीय उच्चाशयी चेतना से ओत-प्रोत हैं, निम्न आर्थिक वर्ग की स्त्रियों पर किया गया नारी लेखन संरक्षणवादी है और पोषक प्रवृत्ति का है जिसे वह साबित करना होता है कि वह अन्य मध्यवर्गीय गृहस्वामिनियों की तरह शोषक नहीं हैं. वह नारी श्रेष्ठ है.
हरीचरन प्रकाश गोमतीनगर, लखनऊ
हमारी हिंदुस्तानियत सादर एक जिज्ञासा है सभी पत्रिकाओं में 'पाठक विचार के
लिए कुछ निर्धारित होता है. कथादेश में खोजा नहीं है. इस बार हिंदुस्तानियत शीर्षक में जो छपा है वह अनमोल है शायद इस शीर्षक में छपे सभी संस्मरणों में अव्वल अन्य लोगों ने आपबीती लिखी है- बहनजी ने सबकी लिखी है.
से पहले था, मगर फिर से पढ़ गया फिर से अच्छा लगा. उनका संस्मरण खुशनुमा है, मगर आज हालात कितने बदल गये हैं, यह मधु कांकरिया जी का 'मोहभंग' पढ़ने से पता चलता है. गनीमत कि उनका मोहभंग हो गया, पर थोड़ा अचरज भी हुआ कि इतना समय लग गया 'छह दिसंबर और 'गुजरात' के बाद भी इससे भी पता चलता है कि संघ परिवार का काम कितने स्तरों पर कितने महीन
तरीके
से चलता रहता है! संयोग से आज चार दिसंबर है, तो 'छह दिसंबर' का नजारा जेहन में घूम रहा है. साथ में छह दिसंबर 1992 का अपना संस्मरण भी अलग से भेज रहा हूँ, हालांकि वह भी 2022 का है, "92 को बाद करते हुए, तब मैं एक अखबार से जुड़ा हुआ था. भागलपुर दंगे (1989) की रिपोर्टिंग करने भी गया था, और तभी आनेवाले दिनों की भयवाहता की आहट मिल गयी बहरहाल सत्यनारायण जी के थी उस रिपोर्टिंग का अनुभव /
कुछ लिखने का मन था पन्नों में पाठक को बैठने की है, कहें खड़े होने की गुंजाइश नहीं है.
वाक्य के लिए-
बीते दिन उज्ज्वल लौटा दे, वही सुनहरा पल लौटा दे मां का वह आंचल लौटा दें, बचपन का वह दिन लौटा दे.. इति, जय हो. एक नियमित पाठक.
5 कथादेश मई 2026
विकास झा,
मुजफ्फरपुर, बिहार
संस्मरण भी रोमांचक और लोमहर्षक है!
'कम से कम राजा तो खुश है' के लिए ज्ञान चतुर्वेदी को सलाम! देश का मौसम जितना भी खराब हो, खतरे लाख हों, व्यंग्यकारों के लिए तो अनुकूल ही है! श्रीनिवास, रांची, झारखंड
करते
हुए एक
ज्ञानरंजन के हल्का-सा
कुछ
पत्र
यहाँ
प्रस्तुत
● पत्र
ज्ञानरंजन
पत्र
हैं. ये प्राप्तकर्ता के प्रति स्नेह, अपनत्व और सराहना से भरे हैं, इसलिए इन्हें सार्वजनिक संकोच साथ रहा. पर अंततः यह विचार प्रबल हुआ कि बड़े लेखकों के पत्र सिर्फ निजी दस्तावेज नहीं होते. वे अपने समय की साहित्यिक संवेदना, संवाद और रिश्तों के साक्ष्य होते हैं. इनमें सृजन के पीछे की बेचैनियों, संघर्ष, उम्मीद और आत्मीयता की धड़कनें सुनी जा सकती हैं. हर लफ्ज के पीछे कोई अनकहा किस्सा महसूस किया जा सकता है. ये बताते हैं कि साहित्य केबल प्रकाशित रचनाओं और किताबों से नहीं बनता, लेखकों के आपसी संवाद, विश्वास और आलोचनात्मक स्नेहिल आदान-प्रदान से भी निर्मित होता है.
यह भी जरूरी लगा कि आज के डिजिटल दौर में युवा पाठक जानें कि कभी हिन्दी साहित्य में पत्र-लेखन की कितनी गहरी, ऊष्म और आत्मीय परंपरा रही है. पत्र सिर्फ सूचनाओं के माध्यम नहीं, विचारों के विस्तार, संबंधों की ऊष्मा और रचनात्मक साहचर्य का आधार हुआ करते थे उन्हीं के सहारे लेखक एक-दूसरे को संभालते, प्रेरित करते और कठिन समय में संबल देते थे.
इन पत्रों को उसी सांस्कृतिक स्मृति और विरासत के रूप में देखा जाना चाहिए. एक ऐसी विरासत, जो याद दिलाती है कि शब्द कागज पर नहीं, इन्सानों के बीच जीवित रहते हैं और समय के पार भी असर छोड़ते हैं.
(1)
31-5-94
प्रिय योगेंद्र भाई आपका
पत्र मिला.
कहानी में पृष्ठ 17 में चीजें साफ हैं। पर उनके लिए जो सजग, जानकार हैं. आपने मणिकील का नाम तो ले ही लिया
है पर कुमार शाहनी का नाम नहीं लिया है. यह हिस्सा चिंताजनक नहीं है. 'कुल' शब्द हटा दिया है. कहानी को आप अपने लिए जिस रूप
में ले रहे हैं वह सही आत्मावलोकन है. कहानी में श्रेष्ठ और मार्मिक गद्य है. पठनीय बिलकुल ताजा और आपका अपना गद्य में विवरण है और कभी-कभी डावल्यूशन की हद तक जाता है. बातूनीपन के कारण लगता है कि जैसे कसाव कम है. फिर कबड्डी के खिलाड़ी की तरह पाले से बहुत दूर तक चले जाने की आदत भी है. यह गुण भी है स्टाइल भी कहानी के प्रस्थान और अंत में गहरी संगति नहीं है. फिर भी इस कहानी को हम बहुतेरे दूसरे गुणों के कारण छाप रहे हैं. काश यह पूरी
तरह एकजुट होती... आप अब लिखने और कहानी लिखने की इस प्रारम्भ प्रक्रिया को जारी रखें.
अभिवादन सहित आपका
ज्ञानरंजन
(2) ज्ञानरंजन
13.03.1995
प्रिय योगेंद्र भाई
आपका पत्र मिला. मैं लगभग पूरी फरवरी यात्राओं में रहा. तकरीबन 7 हजार किलोमीटर की यात्रा की दो दिन सतपुड़ा के घने जंगलों में भी रहा. बाकी तो कामकाजी शहरी यात्राएं थीं.
आपकी कहानी के एक पाठक शहडोल के ऐसे थे जैसे कि वे दर्शक जिन्होंने 'किस्मत' को 40 बार देखा था. उन्होंने लिखा कि मैंने 'सिनेमा सिनेमा' कहानी 10 बार पढ़ी है. वे पेशे से चित्रकार हैं. एक निशांत जी पीलीबंगा गुजरात के ऐसे थे जिन्होंने इस तरह की कहानी छापने पर ही
6 कथादेश मई 2026
-योगेंद्र आहूजा
आपत्ति की. हिन्दी का संसार बिल्कुल हिंदुस्तान की सामाजिक परतों जैसा है,
आपने जो लेख भेजा है उसे मैंने कई टुकड़ों में पढ़ा. वह दिलचस्प है और हमारे समाज में इस तरह के लेख छपने से बहुत सारी भ्रांतियाँ मार्क्सवाद के बारे में दूर होंगी. आप इसका अनुवाद करें. हाँ पहल का अंक आपको मार्च के अंत तक मिल जाना चाहिए. अभिवादन सहित
आपका
ज्ञानरंजन
(3) ज्ञानरजन 25/06/95
जबलपुर प्रिय योगेंद्र भाई
आपका पत्र और अनुवाद मिला. अनुवाद तो आप बहुत अच्छा करते हैं. आपके पास एक बहुत ताजा धड़कती भाषा है. इस लेख का हम उपयोग जरूर करेंगे. परिचयात्मक टिप्पणी की जरूरत
कथाकार ज्ञानरंजन और उनकी पत्नी
नहीं है. आपके पत्र की ही कुछ पंक्तियाँ उसमें किचित असफल रह जाते हैं. जैसे इंट्रो में चली जायेंगी.
आपसे टेलीफोन पर बात करना अच्छा लगा. मैं यकायक इस टेलीफोन पर सलीका ही खो बैठा. आप पहल के लिए इतना ध्यान रखते हैं, इतना सहयोग देते हैं कि विभोर अनुभव करता हूं, आपसे आग्रह है कि पहल की समीक्षा बहुत विनम्र और सुसंस्कृत तरह से न करा करें उसमें बहुत कुछ छिप जाता है. हां यह जरूर है कि हमारे भरपूर श्रम और कोई कोर कसर न छोड़ने के बावजूद कमियाँ रह जाती हैं. इनके लिए विवशताएं भी एक हद तक हैं. ललित कार्तिकेय अच्छे अनुवादक हैं पर उनको हमने 7 दिन का समय दिया अनुवाद
के लिए, और निश्चय है कि अनुवाद बुरा हुआ. देरिदा और एजाज जहमद की बहस को सामने लाने का उद्देश्य पाठ प्रस्तुत करके आगे बहस चलाना था जिसका प्रयास हम कर रहे हैं. हिन्दी के पाठक अंधकार और हवा में भी संतुष्ट विचरते हैं और
पहल के पाठकों में बहुत विविधता और भिन्नता है. हम कठिन काम उठाते हैं और
हम चाहते थे कि 'हम आपके हैं कौन' पर एक लेख तैयार करवाएँ पर जब तक उस काम को करते ई पी डब्लू में एक लंबा लेख आ गया. जबलपुर स्थानीय तौर पर सूना है. मैं यहाँ किसी भी उन्नत और समर्थ साथ के बिना रहता हूँ, काम करने की दिक्कतें हैं. बार-बार भागता हूँ प्रवास पर जाता हूँ और मेरी हैसियत इतनी यात्रा करने की नहीं है. आर्थिक तौर पर और सेहत के तौर पर
आपकी कहानी इस तरह पसंद की गई इसका सुख हमको भी मिल रहा है. आपको इस तरफ काम करते रहना चाहिये.
इधर मैं 12 दिन दिल्ली रहा और 9
दिन नागपुर. बहुत ही ज्वलंत थे ये दिन. काम कम हुआ मंद गति जादा रही. दिल्ली में मैंने ऐसे दिन इस उमर तक कभी नहीं देखे. पर अंक 52 छपने के लिए दे दिया
है.
अब तबियत ठीक नहीं रहती.. हेमोग्लाबिन 7 है इसलिए थकान कमजोरी
7 कथादेश मई 2026
बहुत रहती है. काम कम नहीं होता, बांटने के बाद भी जिन की तरह खड़ा हो जाता है, पर मित्र समाज के बूते सब चल रहा है. मुद्रण और वितरण तो दिल्ली से किया है पर बाकी सारा काम यहीं से होता है. हर अंक के लिए कुछ साधन एकत्र करने के लिए जोर मारना पड़ता है. अभी तक तो गरिमा के साथ हो रहा है पर शिकंजा कस रहा है.
बाकी फिर आपका
ज्ञानरंजन
(4)
25.01.97
प्रिय भाई योगेंद्र अभिवादन
दिल्ली जितने बार जाते हैं उतनी बार वही होता है जो पहले हुआ रहता है. हमको दिल्ली वाले भी दिल्ली जैसा बना देते हैं और कुछ दिल्ली का मनुष्य से अलग उसका उचक्कापन जब वीरेन ने बताया अपनी दिनचर्या आपके साथ तो
लगा कि अब यह सब सदा के लिए तो नहीं छूट गया है हमसे. मैं तीन साल पहले दिन-रात मनोहर नायक के साथ उस इलाके में भटका था. भांग भी खाई थी.
कुछ चीजें हमेशा ही छूटेंगी और कुछ चीजें उपजेंगी क्योंकि हम खोजते रहते हैं. जब खोजते हैं तो उसके साथ हो लेते हैं. फिर कहाँ-कहाँ पहुँच जाते हैं.
आप कहानी लिखें अपने हिसाब से इत्मीनान के साथ यह अंक तो हम दस दिन में कम्पोजिंग के लिए दे देंगे. अगले के लिए या कभी भी जब आप तैयार करें. आप नौसिखिया लेखक की तरह नहीं हेमिंग्वे की तरह कहानी तैयार करते हैं. आपकी विनम्रता अद्भुत है.
एक आदमी शरद बाबू के बैठक में नियमित जाता था कलकत्ते में जहाँ साहित्य समाज जुड़ता था. एक व्यक्ति चुपचाप आता था और बैठता था. बोलता नहीं था, सुनता था. वह हुगली पार करके आता था. लालटेन लेकर देहाती जैसा एक दिन तूफान था, बारिश थी और मौसम का मिजाज अल्हड़ था. शरद बाबू ने सोचा अब कौन आवेगा. इस तूफान में और अपना दस्तरखान बिछाकर बैठ गए, तब तक भीगता लालटेन को बचाता वह आया. उस दिन शरद बाबू ने पूछा आप कौन हैं और क्या लिखते हैं. बात होती रही. सकुचाते हुए उसने कहा कल मैं अपना लिखा हुआ लाऊंगा. दूसरे दिन वह पांडुलिपि लेकर आया जिस पर 'आरण्यक' लिखा था और नीचे विभूतिभूषण वंद्योपाध्याय लिखा था.
आपका
ज्ञानरंजन
(5)
24.11.97
प्रिय योगेंद्र
तुम्हारा पत्र मिला और मुझे लगा कि तत्काल अगर नहीं लिखा गया तो अन्तराल के खतरे और लाजवाबी का खतरा पक्का
हो जाएगा. इसलिए कि बस अब सैलानी जैसा ही हो गया हूं. शायद इसमें मजा भी आने लगा है. शुरुवाती दिनों में भी वेस्टर था और इस उत्तरार्ध में भी वेस्टर बहरहाल तुम्हारी कहानी पसंद की जा रही है. युवक पसंद कर रहे हैं. मेरे पास नामालूम लोगों के पत्र हैं. अभी पहल पहुंची ही है लोगों के पास बहुत हिम्मत बनी. असल में लेखक और सम्पादक दोनों के पास एक संशय हमेशा रहता है. पाठक आजाद होते हैं. वे किसी रचना के बाहरी निर्माता होते हैं.
तापोष का काम तुमको अच्छा लगा. यह सुखद है. मेरे पास उसकी सराहना में दूर इलाकों से टेलीफोन और पत्र आ रहे हैं. अब उस पहल पुस्तिका की एक भी प्रति नहीं बची और असाधारण डिमान्ड है, मुझे यह समझ में आता है कि मौलिक विचारों का आदर और इंतजार हमारे समाज में बहुत है और उतनी निराशाजनक स्थिति नहीं है जितना बुद्धिजीवी बताते हैं. तुम्हारी राय में तापोष तक पहुंचाऊंगा.
'पहल सम्मान' में लगना है अब इस बीच 26 से 2 तक दिल्ली और चंडीगढ़ जाना है. फरवरी के उत्तरार्ध में मुम्बई में पहल व्याख्यान गोविन्द निहलानी, साहित्यिक कृतियों के फिल्म निर्माण की चुनौतियों पर देंगे. वह काम भी सर पर है. पहल का अंक कम्पोजिटर्स को सौंप दिया है.
सस्नेह ज्ञानरंजन
(6)
05.03.1998
प्रिय भाई योगेंद्र हार्दिक अभिवादन
तुम्हारा पत्र मिला. मैं दिल्ली 9 की सुबह पहुंचा और 17 को वापस आया. विश्व पुस्तक मेले में गहरी गहमागहमी थी. बहुत घूमा, बहुत थका अंतिम दिन तबियत भी लड़खड़ाई पर कई अच्छी किताबें मिलीं जिन्हें ले आया. ब्रेख्त की
8 कथादेश मई 2026
शताब्दी पर आयोजित कार्यक्रम में मैक्समुल्लर भवन में गैलीलियो के संवादों का पाठ करना मेरे लिए बहुत रोमांचकारी था. पसंद किया लोगों ने.
शहर के यंत्र तो सब जगह लगभग एक सपाट जैसे हैं पर दिल्ली में केवल एक ही घपला रचनाकारों में है कि वे मुकम्मल शहरी नहीं हैं, उनमें गहरा पीलापन है. पारदर्शी तेज स्पष्ट और तटस्थ व्यवहार नहीं है उनका बौद्धिक केन्द्रों से जादा उनकी हैसियत पान सिगरेट की दुकानों में बैठने की है. इससे कुछ घर्षण नहीं होता, चुनौती नहीं मिलती.
अगर हम अपने को ज्यों का त्यों रहने दें नेचुरल और सहज मैनरिज्म के साथ तो दिल्ली में दिक्कत नहीं होगी. हम जिस तरह से बदलते हैं और उन्नत होते हैं वह भीतरी कष्ट पैदा करता है. मुझे यह बात बहुत अच्छी लगती है कि नामवर सिंह हमेशा धोती ही पहनते हैं और किसी भी स्नॉव सोसाइटी को धो सकते हैं या मुग्ध कर सकते हैं. अगर आप अपनी धुरी पर हैं और किंचित आक्रामक हैं तो डरपोक संस्कृति कुछ नहीं करती. आप आक्रामक न हों तो बहुत लो प्रोफाइल में ही रहें, वह भी कारगर है. उस स्थिति में अपना काम करते जाना होगा.
तुम दिल्ली आ
मुझे यह सुखद है कि रहे हो. अब मिलना कुछ संभव है. बाकी ठीक है. ज्ञानरंजन
(7)
09.05.1998
प्रिय योगेंद्र अभिवादन
तुम्हारा पत्र पाना अच्छा लगता है. आज से 30-35 साल पहले मेरे एक मित्र थे जगदीश, कलकत्ते में, उनके मकान का नाम था 'शहर वेके दूरे', ज्ञानपीठ में काम करते थे, अब नहीं हैं इस संसार में और उनके और मेरे बीच अटूट पत्र व्यवहार था, 'इकाई' नाम की एक अप्रतिम पत्रिका
निकाली थी जिसमें सामग्री के अलावा टाइपोग्राफी का अनूठा कमाल था. उनकी हस्तलिपि और तुम्हारी हस्तलिपि में एक अद्भुत साम्य था. मैं इतना बीखल रहा जीवन में कि कुछ भी सुरक्षित नहीं रखा, बस यह उम्मीद थी कि ये स्मृतियाँ काम आएँगी. और वही लोप हो रही है जाति की, समाज की, आत्मीयजन की. बहरहाल यह बकवास इसलिए कि तुम्हारा पत्र
मिलना अच्छा लगता है.
एक विस्थापित की पीड़ा से भरा तुम्हारा पत्र है. पीड़ा अविजित नहीं होती. हाँ, मित्र छूटे हों, एक परिचित छापा पिछड़ गया हो और संवेदनशीलता प्रबल हो तो तकलीफ होती ही है, दफ्तर दूर हो, संगी
न हों,
शाम अपरिचित हो तो यह सब होगा ही. पर अपना चुनाव लिखना पढ़ना साथ देता है और जब हम नितांत अकेले होते हैं तो बहुत सी उन चीजों पर ध्यान देते हैं जिनको सर्र से भुला दिया गया होता है. जिस तरह से तड़के और कर्फ्यूग्रस्त शहर में साइनबोर्ड उभर आते हैं. अफसोस, बिछोह और पीड़ा ही न हो तो हम बेजान
हो जाएँ.
एक पुस्तिका भेजी थी देहरादून के पते पर अब इस पते पर दोबारा भेज रहा हूँ. पहल की पुस्तिका है. अभी मुंबई पूना नागपुर घूमकर और साधकों से मिलता हुआ लीटा 90 को अब 17 से दिल्ली चंडीगढ़ पटियाला और शिमला तक जाना
सस्नेह तुम्हारा ज्ञानरंजन
(8)
30.07.1998
प्रिय योगेंद्र हार्दिक अभिवादन आज ही तुम्हारी याद आई. और तीन महीने पहले साहिबाबाद से आये पत्र के बाद तुमने एक संक्षिप्त ही सही भुलक्कड़ी में तो समय को डाल ही दिया है. नई
जगह अब कितना आगे खिंची लिखना और तुम्हारी कहानी का इंतजार तो रहेगा ही पहल का नया अंक जा रहा है. पहल पुस्तिका कथा समय मिली थी कि नहीं सूचित करो. पहल में तुम्हारी कहानी शिड्यूल करनी है.
कहानी नहीं तुम कुछ और भी मनवांछित गद्य लिखो पर सूना मत करो पहल को उम्मीद है कि मेरी तरह तुम भी हमें याद करते होगे, कोई टेलीफोन सम्पर्क हो तो लिखो.
सस्नेह
ज्ञानरंजन
(9)
31.07.1998
प्रिय योगेंद्र अभिवादन
तुमने पत्र वहां से छोड़ा और 29 को मैंने यहाँ से पत्र भेजा है. हमें लगभग एक ही समय में याद किया.
तुमने लिखा है कि दिल्ली में कविगण अमीर हो रहे हैं. यही नहीं अमीरी उनका जीवन हिस्सा या शैली भी बन रही है. यह एक ऐसा विषय है जिसे मैंने दो कारणों से दवा रखा. एक तो यह कि मेरा एक छोटे शहर में इस सबसे बचा है. दूसरे में तुलनात्मक जिंदगी नहीं जीना चाहता. पर अब यह हमारे लिए निजी सवाल नहीं रहा, यह कविता का जीवन का और इस देश में अपनी जिंदगी का बन गया है. यह हिंदी
कविता को पोला कर चुका है, भुस बना गया है. हमें हमारे बचपन में कभी एक भी वस्तु विलासिता की सपने में भी नहीं
मिली. उस समय बहुत भेद नहीं था. पैसा था हमारे पास पर हमने सामान्य जीवन ही जिया, वही मिला वही दिया गया, वही
आसपास था.
भोपाल में गिने चुने 15-20 लेखक साहित्यकार हैं. पर अब कम से कम दो मकान और एकाध जमीन तो सभी के पास हैं. और शेयर और गाड़ी और अब तो बस गुब्बारे गुब्बारे उड़ रहे हैं. यह
9 कथादेश मई 2026
हालत अब रेंग रही है, बढ़ रही है. निजी उदाहरण में न दूं तो बेहतर. मैं सिनिक नहीं होना चाहता इसलिए इस मसले को उठा नहीं रहा था पर तुमने लिखा तो रक्त फैल गया.
चालीस साल से अधिक दिल्ली को पल-पल मैंने देखा है, हर इलाका हर साल हर मौके में रहा हूँ, दिल्ली में साइकिल चलाकर करोल बाग से कीर्तिनगर और कीर्तिनगर से कनाट प्लेस माडल हाउस से टी हाउस और बस के पैसों की मारामारी. पैदल एक बार प्रगति मैदान से लुडलो
कैसल रात बारह बजे और वह दुनिया ही
ऐसी थी
ऐसे
ही
प्यारे
लोग
आखिर
एक
रचनाकार किस तरह की जीवन पद्धति को
लेकर चलता है. मुझे लगता है कि ये सब रचनाकार हैं.
मरते
मायकोवस्की ने लिखा था अपनी कवितायें फेंकते नहीं कवि कवितायें फेंकती हैं कवियों को
यह शर्मनाक और बड़बोला समय है. दिल्ली से अब मुझे भी घबराहट होती है. मेरे पास ऑटो टैक्सी के लिए भरपूर पैसे नहीं होते. बसों में कभी-कभार ही जब साथी होते हैं चल पाता हूँ, जीवन भर मैंने पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम का ही सहारा लिया या पैदल. मैं कोई गाड़ी नहीं चलाता हूँ. मैं भी कैसा लहू हूँ कि मुझसे अधिक जर्जर लोग जेन चला रहे हैं, कंप्यूटर पर
सवारी
कर रहे हैं. मुझे यह सब नहीं आ सका. स्कूटर भी नहीं चला सका. पर मुझे अफसोस नहीं होता कभी रंज होता है कि हमारा अपना निजी समाज खो गया. हमारी कविता खो गयी. हमारा मस्ती करने वाला मन खो गया. हम नहीं हमारी केंचुल काम कर रही है. सस्नेह तु.
ज्ञानरंजन
लेकिन योगेंद्र मेरा मन बुरे और अप्रिय लोगों के आसपास या काली ताकतों के निकट रहने का भी होता है.
(10)
07.03.2001
प्रिय योगेंद्र, हार्दिक अभिवादन तुम्हारा पत्र मिला. तुम्हारे भीतर अपनी कहानी को लेकर गहरा असमंजस है. और यह जा नहीं सकता. यह मूल्यवान है. कहानी लिखी जा चुकी है. तुम्हारे मन में कहानी को लेकर जो सवाल हैं वे तारीफ या आलोचना से तिरोहित नहीं होंगे. अपनी रचना के बारे में भीतरी मंथन बहुत कारगर होते हैं और वे लम्बी दूरी तक लेखक की सहायता करते हैं. तुमको लोग गंभीरता के साथ लेते हैं और तुमको लोग प्यार भी करते हैं. मैं कहानी के ऊपर से कोई निष्कर्ष नहीं निकाल सका. पर तुम्हारी कहानी से मुझे एक तरह की जीवनपूर्ति या अभावों की पूर्ति मिलती है. शायद यही कला का एक वांछित रूप है. तुमने कहानी में एक गंभीर खेल किया है. और हिंदी का पाठक समाज जो हंस की कहानियां पढ़ते-पढ़ते कंडिशन्ड हो गया है इसको जल्दी आत्मसात नहीं कर पायेगा. यह सब मंद-मंद होना है, और मेरी मंगलेश से वीरेन से लम्बी बात टेलीफोन पर हुई, वे लोग अपने अपने मंतव्यों के बावजूद कहानी से खुश हैं. मैं अगर जरूरी न होती तो कहानी को छापता नहीं. पर वीरेन की बात से मैं सहमत हूँ, तब कहानी अद्वितीय होती.
हमारे यहाँ लोग कहानी को कम से कम दो बार पढ़ रहे हैं उसमें लिप्त हो रहे हैं. मलय जी को कहानी बहुत अच्छी लगी और हम दानी के साथ उस पर घंटों इन्वाल्व रहे. जमशेदपुर से शंकर जी ने भी कहानी को बहुत सराहा है. कहानी पर पूरा विचार कुछ और महीने की दरकार है. जिस दिन में लोगों के साथ तुम्हारी कहानी पर बात करता हूँ उस दिन रात को अकेले में भी उसके बारे में सोचता हूँ. मैं अपने संपादक आलोचक सबको मारकर ही तुम्हारी कहानी की दुनिया में जाना चाहता
योगेंद्र मुझे ध्यान आया कि तुम बुलबुल के विवाह में अपने परिवार को नहीं लाये.
सस्नेह
योगेंद्र
(11)
ज्ञानरंजन 25.04.2001
प्रिय योगेंद्र, तुम्हारी खबर नहीं है. तुम क्या पढ़ लिख रहे हो ? तुम्हारी याद बार बार आती है. एक पत्र भेजा था पता नहीं अप्रिय तो नहीं लगा. तुम्हारी कहानी लोगों को बहुत पसंद आ रही है. नीलाभ का टेलीफोन आया था. सुनते हैं अशोक बाजपेई को दिलचस्प लगी है. कहानी फैल रही है. तुम छोटा सा ही पत्र लिखना. सस्नेह
ज्ञानरंजन
(12)
19.05.2001
प्रिय योगेंद्र, हार्दिक अभिवादन
बहुत उत्साह में यह पत्र लिख रहा हूँ. वीरेन से बात हुई, उसके साक्षात्कार को लेकर में बहुत चिंतित था. एक तो वीरेन का स्वभाव दूसरे सही व्यक्ति की तलाश. मैं वीरेन को बार बार टेलीफोन करता हूँ कि वह अपने को ट्रैक पर लाये और समय व्यर्थ न करे. अब तुम वीरेन के साक्षात्कार की तैयारी करो मुझसे जो भी सहायता की जरूरत है तत्काल लिखो में जिन दो व्यक्तियों को बहुत प्यार करता हूँ वे एक जगह हों और आमना-सामना करें इससे सुखद घटना और क्या होगी? अब में आश्वस्त हूँ.
तुम्हारी कहानी पर मेरे अमर मित्र और साथी अशोक सेकसरिया (गुणेंद्र सिंह कम्पानी) का पत्र आया है. वे सब कुछ भूल जाते हैं, वे 67 साल के हैं कलकत्ते में रहते हैं. 'लेखकी' उनका संग्रह वाग्देवी
10 कथादेश मई 2026
से किसी तरह लाया गया है. उसे तुम जरूर पढ़ो न मिले तो में भेज सकता हूँ. वे लिखते हैं कि मुझे यह कहानी भूलेगी नहीं याद रहेगी. वे दो बार पढ़ने के बाद ही कहानी तक पहुँच सके. बहुत से लोग तीन बार पढ़ने के बाद भी नहीं पहुँच पायेंगे. अशोक सेकसरिया लिखते हैं कि एक उदास कहानी भी आशा का इतना सन्देश दे सकती है यह भी एक विचित्र बात है.
नीलाभ भी तुम्हारी कहानी पढ़कर बहुत उत्तेजित और उत्फुल्ल है. साल दो साल में वह कहता है कि ऐसी कहानी नहीं पढ़ी. वह कई बार पढ़ चुका है. कहानी के बारे में 2-3 बार टेलीफोन कर चुका है.
साक्षात्कार के लिए तुम्हारे पास समझो 2-3-4 महीने हैं. पर तुम्हें तैयारी करनी होगी और शिड्यूल बनाना होगा. इस बीच अपनी कहानी भी करते रहना है..
सस्नेह
तु. ज्ञानरंजन
(13)
30.04.2002
प्रिय योगेंद्र
बड़े दिन बाद उस दिन तुमसे टेलीफोन पर बात हुई तो वस्तुस्थिति का पता चला. चिट्टी-पत्री भी ठहरी हुई थी. जनवरी से मार्च अंत तक लगभग 3 महीने में जबरदस्त मारामारी में था. पहल सम्मान, पहल का नया अंक, बुलबुल का आना और जाना, बार बार यात्रायें, कुल मिलकर ये दिन किसी तरह निकल गए. बस इसी वजह से तुमको लिख नहीं पाया, याद तो लगातार करता रहा.
ने
समझ में आता है कि इस नए तबादले
तुम्हारा दैनिक जीवन कितना बिगाड़ दिया होगा. और फिर जैसी तुम्हारी बुनावट है उसमें भीतरी तकलीफें भी बढ़ गयी होंगी. मेरठ साहिबाबाद दिल्ली इसको साधना थकान भरा है और समय भरा. पिछले तीन बार के दिल्ली के सफर ने मुझे
भी हैरत में डाल रखा है. हांलाकि यह
बहुत कुछ उम्र, जेब और मानसिक हालत
की वजह से है
लेकिन मुख्य वजह है वह दुनिया जो अब सामने आई है. हांलाकि इस दुनिया से चैन किसी को नहीं मिल रहा है. एक पागलपन अवश्य मिल रहा
होगा.
योगेंद्र तुमने कहानी की नब्ज तो पूरी तरह पकड़ी है पर अब इसी तरह या इससे भी बदतर समय में काम करने की क्षमता
भी बनानी होगी. डिप्रेशन भी इसीलिए
कि मन शरीर इस हालात को रिजेक्ट करते हैं. यह डिप्रेशन दवा से नहीं रचने से ही कारगर होगा. तुमने अब तक अपनी
कहानी पर लिखा लेख पढ़ा होगा. अब यह
लेख और तुम्हारी नई कहानी अगले अंक
में जानी है, पहल 70 के बाद अंक 71 छपने जा रहा है..
बच्चों का इस वक्त बहुत ध्यान रखना. वे कुछ सीढियां और चढ़ जाएँ.
तुम्हारी पत्नी भी इस कठिनाई में मजबूत बनेंगी. अब हालातों की निंदा के लिए कोई वक्त नहीं है. अब सर्वाधिक समझदारी के लिए कोशिश हो..
सस्नेह तुम्हारा ज्ञानरंजन
(14) ज्ञानरंजन
20.12.2002
प्रिय योगेंद्र
मैंने रास्ते में ही कहानी पढ़ ली थी. कहानी को निराशाजनक मानना ठीक नहीं में वह दुनिया जिसे हम घिरते और ढहते है. लेकिन मुझे लगता है कि हमारी सृष्टि हुए देख रहे हैं वह दुनिया अब बचेगी नहीं. जब सोवियत यूनियन गिरा और बाबरी मस्जिद गिरी तो यह पर्याप्त और प्रचुर संकेतों वाली घटना थी. 11 सितम्बर को भी इस रूप में देखना चाहिए की प्रतिमाओं को फोड़ देने को भी. अंततः लाखों साल की सभ्यताओं में हर रचना की एक उम्र है. और ऐसा नहीं कि अब
- कथाकार ज्ञानरंजन के साथ योगेन्द्र आहूजा
कि
दुनिया अंतिम रूप से बदसूरत हो जाएगी. अनेक ऐसे पहलू हैं जो मुझे लगता है विनाश से उबर रहे हैं. हमारी प्रतिभा को उन्हें खोजना और देखना होगा. तुम्हारी कहानी का उत्तरार्ध मुझे बहुत अच्छा लगा और अंत तुम्हारी कहानियों में सदा ही गहरा और अच्छा होता है.
अटपटा
प्रिय योगेंद्र
तुम्हारा पत्र मिला. दिल्ली आकर तुमसे और मंगलेश से न मिलना मेरे स्वयं के लिए कितना कष्टप्रद हो सकता है इसको मैं भी बता नहीं सकता, पर में योगेंद्र बचना चाहता था, यह भी सच है. लम्बा अवसाद है. निजी कुछ नहीं पहल की
तुम्हारा वाक्य विन्यास कहीं-कहीं अर्थव्यवस्था को लेकर, जो अब चरमरा रही है. आखिर हर चीज का अंत तो होता ही है. मैं अपने सारे निजी और सार्वजनिक साधनों को पहल के लिए दुह चुका हूँ. अब लज्जा आती है. कोशिश में हांलाकि करता भी जा रहा हूँ. बीच में एक दिन, अंततः तय कर लिया था कि, पहल का
सस्नेह
ज्ञानरंजन
और बुद्ध
(15)
15.05.2004
11 कथादेश मई 20026
पटाक्षेप करना है एक-दो अंक के बाद असाधारण सहयोग हमें पहल के लिए हर दिशा से मिला. लेकिन आयु एक जरूरी फैक्टर है. मेरी और पत्रिका की आयु लगभग बराबर-बराबर लगती है.
इस मनःस्थिति में मैं तुम दोनों से मिल न सका. मैं दो दिन के लिए गया था और पटपड़गंज में अपने एक विद्यार्थी के घर रुका था जहाँ हम मिल-जुलकर खाना पकाते थे. मेरा उद्देश्य दिल्ली का यह था कि अशोक, भूमिका और परितोष चक्रवर्ती से मिलूं. पहल को विज्ञापन आदि के लिए परितोष मेरे घरेलू मित्र हैं फिर वे स्वयं गहरी मुसीबत में हैं इन दिनों उनसे भी कुछ इनफार्मेशन गैप हुआ और मुलाकात नहीं हो पाई. बस चलते चलते टेलीफोन पर वार्ता हुई. अशोक भौमिक हमारे पुरातन कामरेड हैं, हमने उनके साथ पोस्टर वर्कशॉप की थी. उनके भाई भी हमारे मित्र हैं जो इलाहाबाद में थियेटर
करते हैं. अशोक ने अपनी दो पेंटिंग पहल को दी हैं. इनको विकना है. इस बारे में कुछ रास्ता निकालना है. किसी गैलरी द्वारा विककर उसकी राशि पहल में लगाने का
संकल्प अशोक का पुराना सपना है. बस उसी बारे में बात करने गया और उससे 20 मिनट की मुलाकात हुई. मंडलोई के अलावा किसी से मिलना नहीं हुआ. यह दिल्ली आने जाने की कहानी है.
मैं सोचता हूँ कि कहानी लिखने की तुम्हारी अपनी मौलिक शैली जितनी भी कारगर और नैसर्गिक हो, उसमें अगर तुम्हारा तुम्हारा दबाव तेज काम करने का अपेक्षाकृत नहीं बनेगा तो यह बहुत अच्छे संकेत नहीं हैं. यह एक यथास्थिति का संतोष ही कहा जायेगा. जिसे तुम्हें किसी हद तक तोड़ना चाहिए. मेरा आग्रह है कि कृतज्ञता को अब स्थिर कर दो और कहानी पर झपट्टा मारो. तुमने साबित कर दिया है कि तुम कम समय में भी दबाव की स्थिति में अच्छा काम कर सकते हो.
हाथी का गुण उसका मंद मंद व्यक्तित्व है. लेकिन जब वह दौड़ता है तो अद्भुत दौड़ता है. उसके बाद फिर वह वही पुराना मंद मंद हो जाता है.
योगेंद्र तुम्हारी किताब आ रही है यह खबर मुझे ज्ञानपीठ के दफ्तर में मिली थी. यह बहुत अच्छी खबर है. हम बहुत खुश हैं. और तुम हमारे साथ नहीं भी होगे तो भी हम जबलपुर में या कहीं भी इसे सेलीब्रेट कर लेंगे. लेकिन पहल को कहानी अगर जल्दी भेज सकोगे तो अंक 77 में ही देना चाहेंगे.
वीरेन के लिए अब परेशान न हों. जेएनयू में उसका हो जाता. उसे बुलाया था मैनेजर पाण्डे ने उसने मुझे टेलीफोन पर आश्वस्त किया कि 29 को वह साक्षात्कार के लिए जायेगा. जब वह नहीं गया और उसको इतना बड़ा प्रलोभन हिला नहीं सका तब साक्षात्कार उसके लिए कोई आकर्षण नहीं है. यह अच्छी बात नहीं है। पर हम वीरेन पर गर्व करते हैं. हमें ऐसे बड़े मनुष्यों की मैत्री मिली है इस भगोड़ी कैरियरिस्ट अवसरवादी प्रतिभाशालियों की
दुनिया में. सस्नेह
ज्ञानरंजन
(16) ज्ञानरंजन 04.07.2004
प्रिय योगेंद्र,
'अंधेरे में हंसी' की प्रति मिली. मैं अपने में समा नहीं पा रहा हूँ इस वक्त यह एक शांत लेखन हमारे लिए अच्छी घटना है, कितनी किताबें निकल रही हैं, साबुन की टिकियों और वेफर्स के पूड़ों की तरह. कुछ भी नहीं लगता, महसूस होता, कूड़ेदान में चली जाती हैं. तुम्हारा संग्रह बार-बार संभालना पड़ेगा लोगों से तुमने अपना व्यक्तित्व बनाने में कड़ी मेहनत की है, बाजार से बचने में जरूरी उदासी वरती
12 कथादेश मई 2026
है. तुम बाजार की सूची से बाहर हो, यही तुम्हारी भूमिका है, यही तुम्हारा हासिल है. हमें जीवन में जो अनेक खुशियाँ और तसल्लियों मिली हैं उनमें एक चीज तुम्हारा सृजन भी है. हम इस प्रकार बने हैं, बिगड़ने से बचे हैं. तुम्हें बधाई.
पहल का नया अंक भेजा है, अब तुम्हारी कहानी वाला अंक आएगा 78. में ब्राजील, स्पेन, अमरीका, कनाडा जाऊँगा जुलाई अंत में दो तीन महीने के लिए. तुम्हारी कहानी की प्रतीक्षा रहेगी.
पहल इस समय कठिनाई में है. लौटकर
उसको भी
सस्नेह
तुम्हारा
ज्ञानरंजन
(17)
सुदृढ़ करना है.
22/8/2005 प्रिय योगेंद्र
तुम्हारा पत्र मिला और कल तुमसे टेलीफोन पर बात हुई. तुम्हारे विचलन, बेचैनी और दुखद परिस्थितियों की खबरें मुझको परेशान कर रही हैं. कई बार हम चुप हो रहते हैं कि शायद समय लेकर यह सब खत्म हो जाय. लेकिन ऐसा नहीं हु हुआ. बल्कि कुछ और संकट जुड़ गया. मैं भी इस बीच नहीं लिख सका. इसके पीछे बस मेरी अपनी दिक्कतें थीं और यह भाव कि मुझे तुम्हारे पीछे नहीं पड़ जाना चाहिये. बाकी एक निरंतर बनी हुई शारीरिक- कमजोरी भी थी जो अब भी है. नागपुर गया था अपने चेकअप के लिए वायरल अलग हो गया. बहरहाल जैसा तुमने लिखा है क्षुद्र स्थितियाँ ही तंग कर रही हैं.
अब हमारा तुम्हारा संबंध इस तरह का पहुंच गया है कि बार-बार स्पष्टीकरण जैसी भाषा का उपयोग करना समय और सच्चाई की बरबादी लगने लगती है. सांसारिकता से बचते हुए हमें मित्र संकेतों
प्रिय योगेंद्र
को आस्था के साथ सदा के लिए स्वीकार
ये माना कि मजनू का मिलना है।
या तीसरे अंक में छपेगा.
कर
लेना
चाहिये.
मुश्किल
सस्नेह तुम्हारा
मैं
नये सिरे से के. एस. बघेल को
कहूंगा कि वे तुम्हारे मामले में कुछ प्रयास
अवश्य करें. अब तक तुम्हारी मदर इन ला
हमीं से काम चलाओ बड़ी उदास है रात...... तुमसे मिलने, तुम्हारे साथ बैठने की
ज्ञानरंजन
(20)
का आपरेशन हो
चुका
होगा और
तुम्हें
बड़ी इच्छा होती है पर अब मैं उजड़ गया
ज्ञानरंजन
और सुमन को चैन
मिला
होगा..
24/10
मुझे एक बार और अंतिम बार एक
तुम्हारा
प्रयास
वीजा
का
करना
है.
मैं
इस महीने
ज्ञानरंजन
के अंत में
मुम्बई जा रहा हूँ
4-5
दिन के
लिए
पहल का नया अंक 80 लगभग छप
चुका
है.
(19) ज्ञानरंजन
सस्नेह
तु. ज्ञानरंजन
(18)
ज्ञानरजन
27.12.2009
प्रिय योगेंद्र
तुम्हारा पत्र मिले एक पखवारा हुआ, मैं पत्र को पढता रहा, तुम्हारे बारे में सोचता रहा. तुम्हें देर से ही सही, 50 साल
के जीवन को पूरा करने के लिए बधाई शुभकामनाएं.
तुम्हारा पत्र एक मजबूत स्तम्भ की तरह है. मेरा निजी गर्व और शांति तो तुम हो ही, भरोसा भी. इस शोर और भीड़ भरी दुनिया में एक छोटे से निर्जन आकाशदीप की तरह तुम्हारा लेखकीय जीवन है जिन्हें भटकना है ये भटकें तुम अंचल रहो.
मैंने कभी तुम्हारे साथ अमानुषिक पत्राचार भी किया, मैं उसको खारिज नहीं करूँगा क्योंकि वह मेरे एक बड़े, श्रमपूर्ण उद्यम का एक हिस्सा था. मेरी निजी खुन्नस नहीं थी.
तुम अपने अंदर तो कठोर, अनुशासित और लक्ष्यपूर्ण हो पर तुम्हें जैसे सक्रिय बड़े और अद्भुत साथियों की जरूरत है वैसे तुम्हारे आसपास नहीं हैं, मेरी थोड़ी चिंता यही है.
बस यही शेर याद आता है
07.10.2013 (7.01 होना चाहिए) प्रिय योगेंद्र
तुम्हारी शुभकामनाएँ और पत्र मिला. सर्वप्रथम तुम सबके लिए नए वर्ष पर हमारी हार्दिक शुभकामनाएँ. यह साल 2013 तुम्हारे लिए जानदार होगा. बेटी का
'पहल' को निकालते हुए हमें पैतीस वर्ष पूरे हुए. इसे पाठकों, लेखकों का अप्रतिम सहयोग मिला है. हमने भी
भरसक अपना संपादकीय दायित्व पूरा किया. हमारी कई कल्पनाएँ और स्वप्न अभी भी अधूरे रह गए हैं. अब हमारी सेहत के कारण मेरा इसको आगे चलाना सुविधाजनक नहीं है. दूसरे मुझे लगता है। कि 'पहल' का पटाक्षेप होना भी जरूरी है. इसे आजीवन चलाने का कोई लोभ और
विवाह तुम्हारे जीवन की एक बड़ी घटना आवेग में उचित नहीं समझता. पूरा समय होगी, उसके बाद तुम स्फूर्त और रचनात्मक हमने वर्चस्व और सत्ता के खिलाफ काम हो उठोगे झरना फूटेगा.
एक बात का प्रतिवाद करता हूँ कि मैं
नाराज हूँ, कतई नहीं. तुम्हारे पास जो
किया और 'पहल' ने अपनी आयु भी पूरी
की.
आपने समय-समय पर हमें जितना रीजन हैं वे बहुत महत्वपूर्ण हैं, उन्हें में सहयोग दिया है उसके प्रति अच्छी तरह समझ रहा हूँ. इस पारी में भी धीरज में हूँ. तुम अफसोस से मुक्त रहो
हाँ मेरे अभिन्नतम मित्रों ने मुझे बहुत छला है. मेरे लिए यह दूसरा ऐसा धक्का हैं जिसकी मैं कल्पना नहीं कर सकता था. बहरहाल एक दीर ही छिन गया है और में उसके लिए अपने को तैयार कर रहा हूँ. मेरे पास समय बहुत कम बचा है और में नए दोस्त बनाने की मूर्खताएं कर रहा हूँ.
कृतज्ञता हमेशा बनी रहेगी. 'पहल' 90 अंतिम अंक होगा. जो प्रकाशनाधीन है. सूचनार्थ निवेदन है कि 'पहल' के आगे के प्रकाशन में हमारे सामने किसी भी प्रकार का रचनात्मक या आर्थिक अवरोध नहीं है.
शुभकामनाओं सहित
आपका
ज्ञानरंजन
केवल अच्छी रचनाएँ ही संतोष का
अब केवल तुम्हारे और देवी पर विषय नहीं होंगी. हमारी मुठभेड़ लगभग उम्मीदें हैं. देवी ने अच्छी चीजें दीं. वह नहीं के बराबर है. और यह स्थिति दुखद स्वयं कठिन स्थितियों में रहता है. अशोक है. पहल एक संभ्रांत लोक बनाए यह को दोस्तों ने त्याग रखा है. वह बीमारी के उचित नहीं था. भयानक दौर से कुछ निकला है. अब उसकी पत्नी भी चपेटे में है.
और बाकी भी अंधेरा है. मैं राहुल सिंह से तुम्हारे ऊपर लिखवा रहा हूँ. वह दूसरे
13 कथादेश मई 2026
ज्ञा.
O योगेन्द्र आहूजा
मो. 9899398693
कहानी
डंक
आनंद हर्षोल
"झे यह पता नहीं है कि मैं उसे याद करते हुए, क्यों बेशरम के पौधों को याद कर रहा हूँ? बेशरम के पौधे, पहले इस शहर में सब जगहों पर थे. अब वे पहले की तरह दिखते नहीं हैं. पहले वे बेशर्मी से फैले हुए थे पूरे शहर में कहीं भी उगते-बढ़ते ढीठ और जिद्दी. वे गरीब घरों की बाड़ तक बने हुए थे. ध्यान ना दो तो वे घर के भीतर आँगन में घुस आते थे. जानवर और मनुष्य उनकी पत्तियों को खाते नहीं थे. उनके नुचने नष्ट होने की कोई गुंजाइश भी नहीं थी. इस शहर में, वे कभी जिस बेशर्मी से उगे थे, उसी बेशर्मी से अब नष्ट हो गए थे. धीरे-धीरे ही सही इतने वर्षों में बेशरम के पौधों ने इस शहर को छोड़ दिया था. दिखते दिखते कब उनका दिखना बंद हो गया, शहर यह पकड़ ही नहीं पाया. ना मैं पकड़ पाया और ना मेरा वह दोस्त जिसे याद करते हुए बेशरम के पौधे मुझे आज याद आए हैं. यह मेरी और उसकी उम्र बढ़ने के साथ हुआ है. शहर के बेशरम के पौधे हमारी उम्र से जैसे जुड़े हुए थे. बेशरम के पौधों ने इस शहर में हमारा अधेड़ होने तक साथ दिया था. हमारे बुढ़ापे की ओर फिसलते ही वे हमारा साथ छोड़ गए थे. ऐसा नहीं था कि हम अपने बुढ़ापे की फिसलन से लिपटे, किसी एक दिन बस सुबह उठे और हमने उन्हें गायब पाया. कम होते-होते, अचानक वे लुप्त हो गए थे. इतना था कि पृथ्वी पर हमारे गायब होने से पहले वे इस शहर से गायब हो चुके थे. पता ही नहीं चला कि हमारे आसपास से कब वे चले गए हैं और कब हम उन्हें भूल गए हैं। वे हमारे स्वभाव से भी जैसे जुड़े हुए थे. हम भी इस शहर में बेशरम के पौधों से कहीं भी उग आते थे. किसी भी जगह, यह शहर हमारे पैरों में लिपटा हुआ था, जैसे हमारे पैरों में चकरी बँधी हो !
में खिले रहते थे, बेशरम के फूल दिखने में जितने सुंदर थे, सूँघने में उतने ही गंधहीन. बेशरम के इन बैगनी सफेद-गुलाबी-से गंधहीन फूलों को अपने कानों में खोंस, नाचते मटकते हमारे मोहल्ले में हमारा बचपन देखा जा सकता था. लड़कियाँ हमसे एक कदम आगे थीं, वे इन फूलों की माला बनाकर भी पहन लेती थीं. बेशरम के पौधे, पौधे होते हुए भी इतने ऊँचे होते थे कि हमारी किशोर हो गई उम्र में, वे हमारी ऊँचाई को छूने लगे. जब हम चाहें, वे हमें अपने भीतर छुपा लेते थे. उन्हें थोड़ी काँट-छाँट के बाद, पत्ती और टहनियों की छोटी गुफाओं में बदलना आसान था. वे गुफाएँ हमें उस दुनिया से बाहर कर देती थीं जो हमारे पास थी. वे गुफाएँ किसी दूसरी दुनिया को हमारे लिए रच देती थीं. बेशरम के पौधों की उन गुफाओं में बैठे, हम अपने को आदिमानव-सा महसूस करते थे. यकीन नहीं करेंगे, पर यह महसूस करना, आज का मनुष्य होने के बनिस्बत ज्यादा अच्छा महसूस करना था.
बेशरम के पौधों की सफेद मटमैली-हल्की हरी-सी डेंगाल आसानी से टूट जाती थी और वे खेल-खेल के बीच उपजी हमारी लड़ाइयों के लिए तुरंत हथियार सा इस्तेमाल होती थीं. उनकी डंगालें अपने भीतर ऐसी नमी समेटे रहतीं कि जिस लड़के को वह जहाँ पड़तीं वहाँ अपने पड़ने का लाल निशान छोड़ जाती थीं. हमारे बीच ऐसा कोई लड़का नहीं बचा था, जिसे ये निशान ना मिले हों और जिन्हें अपने माँ-बाप से छिपा पाना, उसके लिए मुश्किल न हुआ हो. पेंट विशेषकर हाफ पेंट पहनने की उस उम्र में, घुटनों से नीचे पड़े बेशरम की छड़ियों के निशान को छुपा पाना मुश्किल था. वे घर पहुँचते ही ऐसे सवाल पैदा करते थे, जिनके ठीकठाक जवाब किसी लड़के के पास होते नहीं थे. हम बेशरम के इन पौधों को जड़ों से उखाड़कर उनकी हॉकी बना अपने मोहल्ले के धूल भरे मैदान में खेलते थे. सच यह है कि ये बेशरम की हॉकियाँ भी कब एक दूसरे को पीटने का हथियार बन जाती थीं यह हम ठीक-ठीक कभी बता नहीं सकते थे. वैसे तो अपने एक सिरे में गांठदार जड़ ली वे बेशरम की इंडियाँ, हॉकी खेलने के ही ज्यादा काम आती
उससे मेरी दोस्ती जब शुरू हुई थी तो बेशरम के पौधे इस शहर में इतने अधिक थे कि हम जहाँ जाते वे हमारे साथ रहते थे. वे पेड़ नहीं थे. थे तो वे पौधे ही पर उन्हें ठीक-ठीक पौधा भी नहीं कहा जा सकता था. वे बढ़ते-बढ़ते एक-दूसरे से उलझकर, पौधे और पेड़ के बीच कहीं अटक जाते थे. उनके पास हमारी हथेलियों जितने बड़े पत्ते थे और शंकु आकार के बड़े सफेद बैगनी से गुलाबी रंग की ओर झुके फूल थे जो उनके पत्तों के बीच बहुतायत जिसे इतने बरसों बाद याद करते मुझे बेशरम के पौधों की 14 कथादेश मई 2026
कुछ
थीं.
याद आयी है, वह हमारे मोहल्ले में रहता नहीं था. यह तो मुझे बाद मंडी सरकार ने वहाँ रच दी है, जहाँ जाकर सब्जी मुझे आज भी में पता चला कि वह हमारे मोहल्ले से थोड़ी ही दूर इस शहर में खरीदनी पड़ती है. मैं नजूल के हमारे घर को खाली करने के एवज सरकार के हाउसिंग बोर्ड की बसायी एक नई कॉलोनी में रहता में सरकार के दिए एक मकान में रहता था. यह मकान चार था. उस कॉलोनी में हमारे मोहल्ले की औरतें वर्तन, झाड़ू-पोंछा, मंजिला बिना लिफ्ट की इमारत की तीसरी मंजिल में डेढ़ कमरों खाना बनाने और यहाँ तक कि शौचालय को साफ करने जैसे का था. मैं उसी में अपने परिवार के साथ तब तक रहता आ रहा कामों के लिए जाया करती थीं. इस कॉलोनी से पहले, यह शहर था. उस मकान में रहते मेरे परिवार के कुछ लोग बूढ़े हुए और मर हमारे जैसे मोहल्लों से ही आबाद था. यह कॉलोनी सरकार ने जब गए थे. कुछ पैदा हुए और जीवित थे. कुछ लड़कियाँ ब्याह होकर बसायी तो धनाढ्य और संभ्रांत लोगों ने यहाँ मकान ले लिया था विदा हो चुकी थीं. एक स्त्री मेरे लिए अपना घर छोड़ यहाँ रहने और अपने उन मोहल्लों को छोड़ दिया था जो गलियों में बसे थे आ गई थी और मेरे साथ रहते-रहते अब बूढ़ी हो चली थी. कुछ और जिसके कारण वे अपनी मोटर कभी अपने घर के सामने तक बच्चे उस स्त्री से इसी घर में पैदा हुए थे और जवान हो गए थे. नहीं ले जा पाते थे. वैसे मोटरगाड़ियाँ इस शहर में उस समय कम में लगातार उस स्त्री के साथ बूढ़ा हो रहा था जो मेरी पत्नी थी थीं- एक मोहल्ले के हिस्से में एक दो आ जाएँ तो बहुत थीं. इस और मेरे बच्चों की माँ थी. दो बूढ़े जो मेरे माँ और बाप थे इसी नई बसी कॉलोनी में भी उन दिनों हर घर के पास मोटरगाड़ियाँ घर में रहते मर चुके थे. मेरी तीन बहनें जवान होकर बमुश्किल नहीं थीं. हम बच्चों का इस कॉलोनी से सिर्फ इतना रिश्ता था कि इस घर से विदा हो पाई थीं. मेरा यह ढाई कमरे का घर जो जब इसकी नींव खुद रही थी तो हम इतने छोटे थे कि उस दूर-दूर सरकार ने मेरे पिता के तीन कमरों के मकान को छीनकर तीसरी तक फैली खुदी हुई नींव में हम छुपाछुपी खेला करते थे. हम इतने मंजिल पर हमें खैरात में दिया है, उसमें बरसों से रंगरोगन और छोटे थे कि नींव अपने भीतर हमें डुबा लेती थी और हम उन मरम्मत नहीं हुई थी. वह लगातार जर्जर होता जा रहा था. उसके इधर-उधर जाने कहाँ मुड़ती नींव में दौड़ते रहते थे. हमारा मोहल्ला पास तीसरी मंजिल में जाने के लिए कोई लिफ्ट नहीं थी. इस इस कॉलोनी से सटा हुआ था. बस एक चौड़ी सड़क जितनी दूरी थी. इस दूरी को पार कर कभी भी उस कॉलोनी से इस मोहल्ले में और इस मोहल्ले से उस कालोनी में आया-जाया जा सकता था.
वह मुझे अचानक एक दिन दिखा था, जब बेशरम की इंडियों की हॉकी लिये अपने मोहल्ले के मैदान में, में अपने मोहल्ले के लड़कों के साथ धूल उड़ा रहा था. उस मैदान में धूल इतनी ज्यादा थी कि पता नहीं चलता था कि हॉकी गेंद से खेली जा रही है या धूल से मैदान भी घरों से घिरा तिरछा मिरछा-सा था. लालच में कुछ घर मैदान के भीतर घुस आए थे. यह ऐसा मोहल्ला था जो नजूल की जमीन पर अवैध कब्जे से बना बसा था. कुछ चालाक घरों ने नजूल के बाबू और आधिकारियों को घूस खिलाकर तीस सालों के लिए उनका पट्टा जारी करा लिया था. पर अधिकांश घर बिना पट्टे के थे तो उनके सर पर कभी भी टूट जाने का खतरा मंडराता रहता था. यह खतरा तीस साल के पट्टों वाले घरों के साथ भी था. वे बेशरम के पौधों की तरह ही उगे घर थे और मनमाने ढंग से इधर-उधर बढ़ रहे थे. कभी भी किसी सरकारी निर्माण योजना के लिए उन्हें उखाड़ फेंकना आसान था. इसका उदाहरण वह नई बसी कालोनी थी, जिसमें उससे पहले बसा मोहल्ला उजड़ चुका था. उस मोहल्ले के कुछ लोग हमारे मोहल्ले में आकर बस गए थे, बाकी कहाँ जाकर बसे थे किसी को ठीक-ठीक पता नहीं
था.
यही हुआ भी. मेरा वह मोहल्ला जिसकी में यहाँ बात कर रहा हूँ, मेरी इस उम्र में जो बुढ़ापे में अब डूब चुकी है बेशरम के पौधों-सा ही कहीं अब गायब हो चुका है, उसकी जगह, एक सब्जी
15 कथादेश मई 2026
चित्र संदीप राशिनकर
मकान में हम इस संतोष के साथ रहते आए थे कि गनीमत है कि हमें कमरा चौथी मंजिल पर नहीं मिला है और हम एक मंजिल और चढ़ने से बच गए हैं. मेरे इस घर से वही सब्जी मंडी सबसे पास थी जो सरकार ने हमारे नजूल के घरों को तोड़कर बनाई थी. उस सब्जी मंडी में, मैं उस दुकान से सब्जी खरीदने की कोशिश करता था, जो अंदाजन उस जगह पर बनी थी, जहाँ वह तीन कमरों का मेरा छूटा टूटा घर हुआ करता था, जहाँ मेरा बचपन अपने किशोर से फिर युवा होने तक रहता था.
लपेटकर बनाया होता था.
ऐसे ही अपने सिर तक उठे धूल के एक गुबार के बाद जब में अपनी साँसों को सहेजने हॉकी खेलते रुका तो मुझे वह दिखा था. मैदान के किनारे खड़े पीपल के एक पुराने पेड़ के तने से सटा, हमें हॉकी खेलते ध्यान से देखता यह दिखा. वह हमें कब से देख रहा था यह अंदाज लगाना मेरे लिए मुश्किल था. मैंने उसे बस एक क्षण देखा और फिर अपने खेल में डूब गया. सच यह था कि मैं उसे तुरंत भूल चुका था..
उन दिनों अपने मोहल्ले के गायब हो जाने का खतरा तो हमारे दिमाग में था ही नहीं. दिमाग में जो था, ठीक इससे उलट था. हम वह रविवार का दिन था, जब हमारा यह हॉकी युद्ध हमारे थककर चूर होने पर ही खत्म होता था. हॉकी का यह युद्ध जब बच्चों को जो सबसे बड़ा खतरा दिखता था, वह हमारे मैदान के खत्म हुआ तो मैं मैदान के बीच खड़े मंदिर की पिछली दीवार से गायब हो जाने का था. बेशरम के पौधों से बढ़ते हमारे मोहल्ले के पीठ टिकाए गहरी साँसें ले रहा था और अपनी सी ही गहरी साँसें ये घर कभी भी उस मैदान को लील सकते थे. तभी एक पट्टे वाले लेते दो खिलाड़ियों के साथ खड़ा था. तब मुझे वह फिर दिखा. अब घर के महाराज का दिमाग चला और उन्होंने मैदान को बचाने के वह पीपल के तने से टिका खड़ा नहीं था. वह हमारी ओर लिए मैदान के बीचोंबीच एक छोटा मंदिर रच, उसके पुजारी बन मुस्कुराता आता दिखा मुझे वह मुझसे थोड़ा ऊँचा था. दुबला और गए. इस तरह हमारे खेलने का मैदान, बीचोंबीच रचे मंदिर के गोरा चिट्टा उसने बहुत साफ-सुथरे कपड़े पहन रखे थे. उसके कारण कुछ खराब तो हुआ, पर उसकी एक अदृश्य सीमा रेखा बन कपड़े, हमारे कपड़ों से आगे के फैशन के थे. उसने काली गई. अगर मोहल्ले में बेशरम के पौधों से बढ़ते ये जरूरतमंद घर, बेलबॉटम पेंट और फूलदार बेल शर्ट पहन रखी थी. पेंट के पायंचे बढ़ने की बहुत ज्यादा बेशर्मी में ना उतरें जो जाहिर है कि ईश्वर जरूरत से अधिक चौड़े थे और शर्ट का कॉलर बकरे के कानों की के खिलाफ होती तो यह सीमा रेखा बनी रह सकती थी. सर पर तरह लंबा था. वे वैसे कपड़े थे जो उस समय हमारे स्वप्न थे. छत ईश्वर से जरूरी चीज है. पर कुछ कहा नहीं जा सकता था कि जिन्हें हम कभी कभार देख पाई फिल्मों में हीरो को पहनते देखते मंदिर की रची यह अदृश्य सीमा रेखा कब तक मैदान को बचाए थे और अब तक खरीद नहीं पाए थे. हम आमतौर पर अपने स्कूल रखेगी. वह छोटा-सा मंदिर अब हमारे खेल में मैदान के ठीक के लिवास में में ही रहते थे. जिन बच्चों ने स्कूल जाना छोड़ दिया बीचोंबीच अंपायर सा खड़ा था. इस तरह उस मंदिर में बैठा देवता, था वे घर के लिवास में रहते थे जो बनियान और चड्डी तक हो जब हम हॉकी खेलते तो अंपायर की भूमिका निभाने लगता. सकता था. कोई छोटा नंगा बच्चा हमारे इस खेल में हमारे साथ-साथ बेवजह दौड़ता भी मिल सकता था जो हमें कभी नंगा नहीं दिखता था. हमारे कपड़ों की चिंता के लिए हमारे घर वालों के पास ना समय था और ना पैसे थे तो वे जाने कब से उस चिंता से बाहर थे. उनके भीतर चिंता अगर रही हो तो बस सिर्फ इतनी रही होगी कि भरसक यह हो सके कि हम नंगे ना घूमें और हमारे तन ढँके रहें. हम अगर नंगे भी घूमते तो मुझे नहीं लगता कि हमारे माँ बाप शर्मिंदा होते.
हमारे पास धूल उड़ते इस मैदान के दो छोरों पर पत्थरों के निशान से रची गोलपोस्ट थी. गोल के किसी विवाद पर हम मंदिर में बैठे देवता की सहायता लेने लगे. मुझे हमेशा लगता था कि जो गोलपोस्ट मंदिर के दरवाजे के सामने पड़ रहा है और जिसे वह देवता देख पा रहा है, उस गोलपोस्ट में हुए गोल का निर्णय तो यह ले सकता है, पर मंदिर के पिछवाड़े बने गोलपोस्ट का निर्णय कैसे वह लेता है, इस पर मुझे हमेशा संदेह ही रहता था. हमने मंदिर के एक कोने में पाँच कौड़ियाँ छुपाकर रखी थीं, जिनसे हम छोटे-मोटे जुए खेला करते थे. हम उन पाँच कौड़ियों को ही मंदिर में देवता के सामने फेंक, गोल के सही-गलत का निर्णय उससे माँगते थे. होते गए थे. उस निर्णय को मानते थे. इस तरह हमारे बीच गोल के विवाद कम
इस मैदान में खेलते हुए, मुझे तो यही लगता था कि हम धूल से खेलते हैं. कभी-कभी मैदान की धूल हमारे सिर के ऊपर तक उठ आती थी. ऐसी स्थिति में हॉकी की उस बॉल को देखना मुश्किल हो जाता था, जिसे हम लोगों ने मिलकर पुराने कपड़ों की चिन्दियों और रस्सियों को एक दूसरे के ऊपर कस कसकर
हमारी ओर अपने लकदक कपड़ों में, एक उसक भरी चाल के साथ वह आ रहा था. वह हॉकी के खेल के बाद अब बैठती। वाले मैदान में आ रहा था. वह अपने उन चमकीले कपड़ों के धूल में डूब जाने के डर से बेफिक्र था. चलते हुए वह इस तरह दायें बाएँ झुक रहा था कि उसके बाल लहरा रहे थे. उसके पास आते ही मैंने देखा कि उसके पैरों में चमकीले काले जूते थे. उन जूतों को देख मुझे लगा कि इसके ये जूते मैदान में घुसते ही धूल में डूब जाएंगे!
वह ठीक मेरे सामने मुस्कुराता खड़ा था. हम मंदिर की दीवार में पीठ टिकाए वहाँ तीन लड़के थे, पर पता नहीं क्यों उसने 16 कथादेश मई 2026
बातचीत के लिए मुझे चुना था. शायद इसलिए कि मेरे आजू-बाजू के लड़के अब थककर बैठ गए थे और मैं अब तक खड़ा था. इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि इससे पहले अपनी साँसों को सहेजते मैंने उसे अपने बीच खेल में देखा था. हो सकता है वह मेरे उस देखने को पकड़ मुझे बातचीत के लिए चुना हो
“मैं
जॉनी !”
उसने अपना हाथ बढ़ाते मुस्कुराते हुए कहा. मैं जानता था मेरे हाथ मैदान की धूल और मेरे पसीने से उससे हाथ मिलाने अपना हाथ उसकी ओर
लिथड़े हुए बढ़ाता बढ़ाता में रुक गया था.
वह मेरे इतने पास था कि उससे उठ रही महीन खुशबू के मैं पास था. मैंने सोचा यह उसके नहाने के बाद शरीर पर छिड़के किसी पाउडर की होगी. वह बहुत गोरा था और उसका गोरा रंग पीलेपन की ओर ज्यादा झुका हुआ था. मैंने उसे ध्यान से देखा उसके काले लंबे सीधे बाल उसके कानों को टैंक, उसके कंधों के करीब तक जा रहे थे. उसका चेहरा हमारे समय के एक 'डैनी' नाम के एक्टर-सा मुझे लगा जो उन दिनों की फिल्मों में विलेन का रोल निभाता था. उसके पास डैनी-सी चाल भी थी जो पीपल के पेड़ से मुझ तक आते मुझे दिखायी दी थी. अपनी इस 'डैनी' खोज के बाद मैं उसके प्रति ज्यादा अपने को आकर्षित पा रहा था. सच कहूँ तो प्रभावित भी.
मैंने उसकी टकटकी निगाहों के सामने अपना नाम रखा, "मानसा..." मैं मुस्कुरा रहा था या कह सकते हैं कि मैं मुस्कुराने का प्रयत्न कर रहा था. मैं उसके किसी पासंग नहीं टिक रहा था. वह हम-सा था ही नहीं. हमारी उससे कोई बराबरी नहीं थी. वह चमकीली रोशनी में डूबा हुआ था और हम अपने ऊपर गिरती धूल
में डूबे हुए थे.
"यहीं रहते हो?" उसने पूछा. वह मुझसे ऐसे बात कर रहा था, जैसे मुझसे उम्र में बड़ा हो वह ज्यादा से ज्यादा मुझसे ऊँचाई में बड़ा रहा होगा. उम्र में तो वह मुझे अपने बराबर ही लग रहा था. उसकी मूँछें फूट आयी थीं, जैसे मेरी मैं अपनी मूंछों के धनी होने का इंतजार कर रहा था. वह भी कर रहा होगा. उसके बाद ही यह तय होना था कि मूँछें हमारे चेहरे पर रहेंगी या चेहरे से मिट जाएँगी फिर मुझे लगा कि हो सकता है वह मूँछें न रखे क्योंकि 'डैनी' मूँछें रखता नहीं था.
मैंने अपने उस मकान की ओर इशारा करते हुए जो मैदान के इतना करीब था कि मैदान में मुझे खेलते देखता रहता था कहा, "यहीं और कहाँ ?"
वह मेरे जमीन की ओर झुकते, खपरेल की छत वाले मकान को ध्यान से देखता मुझे दिखा जो वैसे ही झोंपड़ों के बीच धँसा खड़ा था. सारे झोंपड़े एक दूसरे से सटे एक दूसरे को थामे खड़े थे. मैंने भीतर ही भीतर अपने को शर्मिंदा महसूस किया.
भी अब उठ खड़े ही हुए थे. बाकी लड़के भी मैदान छोड़ उसके पास आकर जमा हो गए थे. उन लड़कों के चेहरों पर उग आयी हँसी मेरी मुस्कुराहट से मिल रही थी. हमारे बीच वह अपने को किसी हीरो से कम नहीं समझ रहा था. वह किसी हीरो से कम था भी नहीं. मैदान की धूल अब पूरी तरह बैठ चुकी थी. बैठी हुई धूल पर शाम उतर आयी थी. शाम के उतरने से मैदान की धूल ने अपना रंग खोना शुरू कर दिया था. मैदान में रोशनी का कोई इंतजाम नहीं था. मैदान आसपास के घरों से झाँकती मरियल-सी रोशनी से रोशन होने की कोशिश करता था और कभी नहीं हो पाता था. शाम गहरा रही थी. हमारे पैर मैदान की धूल के साथ अँधेरे में डूबने वाले थे.
मैंने उससे यह नहीं पूछा कि वह कहाँ रहता है. मैं उसमें पड़ना नहीं चाहता था. यह तय था कि वह हमसे किसी बहुत अच्छी जगह पर रहता होगा. साफ था कि वह हमारे जैसा नहीं था. मुझे लगा वह उत्सुकता में यहाँ टपक पड़ा है. मैं यह उससे आती खुशबू और उसके कपड़े-लत्ते देख समझ चुका था. मैं उससे दुबारा मिलने की उम्मीद नहीं कर रहा था. मुझे घर लौटने की जल्दी थी. थोड़ी-सी भी मैं और देर करता तो मेरे बाप का सिर मेरे घर के दरवाजे से झाँकता हुआ चीखता कि साले रात भर वहीं पड़े रहना है क्या? मैं सिर्फ फटी बनियान और कमर पर बस पंछा लपेटे अपने बाप को उस लड़के को दिखाना नहीं चाहता था..
"मैं भी खेलूँ तुम लोगों के साथ तो चलेगा?" उसकी आवाज में हमारे साथ खेलने की लालसा थी. उसे हमारा जीवन खींच रहा था. मुझे उसका जीवन खींच रहा था.
"कोई भी खेल सकता है, जिसे धूल से खेलना पसंद हो... याद रखना हम सिर्फ छुट्टियों के दिन खेलते हैं." थोड़े व्यंग्य से मुस्कुराते हुए मैंने कहा. मैं भरसक वह कोशिश कर रहा था कि उसके सामने दबा-दबा-सा न लगूं. यह लगने से पहले मैं अपने घर की ओर जाने के लिए मुड़ चुका था, जिससे दरवाजे पर लटके भूरे मटमैले परदे के पीछे अभी मेरे बाप की छाया उभरी नहीं थी.
"आता हूँ!" उसने कहा और मैदान से बाहर हो गया. फिर बाहर हो गया मोहल्ले से उसकी जाती हुई चाल पीछे से ठीक फिल्मों के उस विलेन जैसी थी, जैसा वह दिखता था. यह दिखा मुझे, जब मैंने उसे अपने घर के दरवाजे से मोहल्ले के घरों को पार करते देखा.
यह किसी अपराध स्वीकार-सा ही है कि मुझे अगले रविवार जॉनी का खेल में शामिल होने का इंतजार रहा. रविवार आया और वह नहीं आया एक और रविवार मैंने उसका इंतजार किया. यह अलग बात है कि मैंने अपने मोहल्ले के किसी लड़के से यह नहीं कहा जो जॉनी से मिल चुके थे. हमारे बीच एक अचानक आ टपके, हमारे जैसे नहीं लड़के के लिए इतना इंतजार काफी था. मैं अब उसे भूलने लगा था. समझे भूल ही चुका था. तभी अचानक 17 कथादेश मई 2026
मेरे आजू-बाजू थककर बैठ चुके मेरे मोहल्ले के वे दो लड़के
जॉनी दो रविवारों को छलाँगते हुए, तीसरे रविवार को हमें दिखा. हमारा खेल शुरू हो चुका था. मैदान की धूल हमारे घुटनों तक उठ आयी थी. हमें उसे देख अपना खेल रोकना पड़ा. उसे देख दरअसल न सिर्फ में बल्कि सारे लड़के चौंके थे. उसके दाहिने हाथ में बाकायदा हॉकी स्टिक थी. बाएँ हाथ में हॉकी की सफेद गेंद थी, जिसे वह अपनी हथेली पर उछाल रहा था. उसने बाकायदा खेल की पोशाक यानी जर्सी और शार्ट्स पहन रखे थे. उसने अपने दाहिने हाथ में दस्ताना भी चढ़ा रखा था. हमारे बीच उसे इस रूप में देख हमारी पहली प्रतिक्रिया हमारे खेल के रुकने और रुके खेल के बीच से उठती हँसी की थी. उस हँसी में जॉनी के लिए मखील था. हम सब जानते थे कि उस मखील के भीतर हॉकी की उन चीजों को पा लेने की लालसा हमारे भीतर छिपी हुई थी. जॉनी हमारी मखौल उड़ाती हँसी से बाहर मैदान के किनारे मुस्कुराता खड़ा था निश्चिंत, जैसे कहना चाह रहा हो हॉकी खेलने के लिए, उन चीजों की जरूरत है जो वह लेकर आया है. जॉनी को देख मुझे यह समझ नहीं आ रहा था कि वह हमें शर्मिंदा करने आया है या जो अब तक उसकी हॉकी और गेंद को देख हँसा नहीं था. हमारे साथ खेलने आया है. अपने साथियों के बीच में ही एक था
जॉनी की हॉकी जो सच में हॉकी थी. उसके हाथ में उछल रही सफेद नई गेंद सच में हॉकी की गेंद थी. लड़कों को अपनी उस हँसी के बावजूद, वह हॉकी और वह गेंद अपनी ओर खींच रहे थे. हम जॉनी को घेर चुके थे. यही वह चाहता था. हमने पारी पारी उसकी हॉकी और गेंद को अपने हाथों में लेकर देखा. पारी पारी हमने सच की हॉकी से, हॉकी की सच की गेंद को ड्रिब्लिंग करके देखा. हमारे उस धूल छोड़ते मैदान ने भी पहली बार सच की हॉकी और सच की गेंद को महसूस किया पर बात कुछ बनी नहीं. अकेले-अकेले हॉकी नहीं खेली जा सकती थी. हॉकी की एक सच
रविवार के दिन उसके घर ने उसे स्कूल ड्रेस पहने देख आश्चर्य किया था. वह घर से झूठ बोलकर एक्स्ट्रा क्लास के नाम से उस रविवार निकला था. उसके पास मामूली कपड़े नहीं थे, यही उसकी दिक्कत थी. हमारे पास सिर्फ मामूली कपड़े थे, वह भी सिर्फ हमारी स्कूल ड्रेस- यह हमारी दिक्कत थी. आगे के रविवारों के लिए जॉनी ने स्कूल ड्रेस नहीं पहना. उसके लिए हर रविवार अपने घर से झूठ बोलना मुश्किल था. वह घर के कपड़ों के साथ हमारे खेल में शामिल होने लगा. हम अपनी स्कूल ड्रेस के कारण, खेल में आमने-सामने होते भी एक टीम लगते थे. जॉनी रविवार के पहनने के लिए खाकी-सी कोई पेंट चुनता और सफेद शर्ट की उसके पास वैसे भी कोई कमी नहीं थी. वह हम जैसा होने बनने की पूरी कोशिश कर रहा था.
की गेंद से काम तो चल सकता था, पर एक सच की हॉकी से सात-आठ लड़के नहीं खेल सकते थे. हमने अपनी बेशरम की हॉकी से जॉनी की लावी गेंद से खेलने की कोशिश की तो हमारी बेशरम की हाँकियों के बस में हॉकी की सच की गेंद नहीं आयी, बल्कि उन बेशरम की हॉकियों के परखच्चे उड़ने लगे. आखिरकार हमने तय किया कि हम जॉनी की लावी गेंद के चक्कर में नहीं पड़ेंगे. हमारी बेशरम की हाँकियों के लिए, हमारे हाथों से बनी चिवड़ों और रस्सी की गेंद ही ठीक थी. हमने जॉनी की सच की हॉकी और सच की गेंद को नकार दिया था. वे हमारे बस से बाहर थीं. उनका लालच हमारे लिए ठीक नहीं था. जॉनी ने थोड़ी देर हमारे साथ हमारी गेंद से अपने सच की हॉकी से खेलने की कोशिश की तो हमें लगा कि हमारी गेंद उस हॉकी को नहीं सह पा रही है. वह खुलने बिखरने लगी है. हम अपनी गेंद को समेटने में लग गए. हमने जॉनी को खिलाने से मना कर दिया. उसके पास अब कोई चारा बचा नहीं था. वह लौट सकता था वापस पर वह लौटा नहीं. जॉनी पीपल के पेड़ से पीठ टिकाए, अपनी हॉकी और गेंद लिये हमें खेलता देखता रहा. वह इस पूरे समय बहुत शांत और झेंपा-सा था. लग रहा था कि अपने घर से सच की हॉकी और गेंद लाकर वह पछता रहा है.
अगले रविवार हमारे खेलने के लगभग बिल्कुल शुरुआती समय पर जॉनी पहुँचा. हमने देखा कि वह हमारी तरह ही अपने स्कूल के कपड़ों में था और उसने कहीं से बेशरम की मजबूत गांठदार एक डंडी अपने लिए तोड़ ली थी. अब उसकी हॉकी हम-सी थी. अब वह हम-सा था. अगर कोई अंतर था तो उसकी ड्रेस का था. जहाँ हम खाकी की पेंट और सफेद शर्ट में अपने सरकारी स्कूल की ड्रेस में थे. वह होली क्रॉस स्कूल की ड्रेस में था, जिसकी शर्ट तो सफेद ही थी, पर पेंट नीली थी. जिसमें स्कूल के मोनो के साथ एक टाई तब तक लहराती रही, जब तक जॉनी अपनी बेशरम की हॉकी से चिन्दियों की गेंद से ड्रिबलिंग करता हमारे साथ हॉकी खेलता रहा.
रविवार के दिन उसके घर ने उसे स्कूल ड्रेस पहने देख आश्चर्य किया था. वह घर से झूठ बोलकर एक्स्ट्रा क्लास के नाम से उस रविवार निकला था. उसके पास मामूली कपड़े नहीं थे, यही उसकी दिक्कत थी. हमारे पास सिर्फ मामूली कपड़े थे, वह भी सिर्फ हमारी स्कूल ड्रेस यह हमारी दिक्कत थी. आगे के रविवारों के लिए जॉनी ने स्कूल ड्रेस नहीं पहना. उसके लिए हर रविवार अपने घर से झूठ बोलना मुश्किल था. वह घर के कपड़ों के साथ हमारे खेल में शामिल होने लगा. हम अपनी स्कूल ड्रेस के कारण, खेल में आमने-सामने होते भी एक टीम लगते थे. जॉनी रविवार के पहनने के लिए खाकी-सी कोई पेंट चुनता और सफेद शर्ट की उसके पास वैसे भी कोई कमी नहीं थी. वह हम जैसा होने बनने की पूरी कोशिश कर रहा था.
18 कथादेश मई 2026
मैं ठीक उसके उलट था. मैं उस जैसा होना चाहता था-
चमकदार, मैं अपने घर को लेकर जो झोंपड़ी-सा था, हीन भावना
से भरा हुआ
था. मेरे भीतर यह भावना मेरे अपने पिता की फटी बनियाइन से लेकर अपनी माँ के जोर-जोर से बोलने के उजड्डपन
तक फैली हुई थी. जॉनी के घर को देखने के बाद यह मेरे भीतर ज्यादा बढ़ गई थी. इसी बीच हुआ यह कि एक रविवार हॉकी खेलते हुए, एक लड़के की कोहनी, उसके नाक में धोखे से लग गई. वह घायल हो गया. नाक से खून बहने लगा. उसने अपनी सफेद शर्ट से नाक के बहते खून को रोका, पर वह थोड़ी-थोड़ी देर
में फिर
रिस रहा था. उसने कहा, "अब मुझे घर जाना होगा!" मुझे लगा कि उसे छोड़ने उसके घर तक मुझे जाना चाहिये. मैं उसके साथ उसके घर तक जाने निकला, जबकि वह मुझे मना करता रहा. कहता रहा कि वह चला जाएगा. मैंने उसके नाक से बहते खून को देख यह बिल्कुल नहीं सोच पाया था कि वह मुझे अपने घर ले जाने से बच रहा है. उसका घर कॉलोनी के बड़े घरों
में से एक था. वह जैसे ही घर में पहुँचा, सबसे पहले उसका भाई
बाहर
आया. वह उससे बड़ा और उस-सा ही गोरा और ऊँचा-पूरा था. उसके नाक से बहते खून को देख, उसके भाई ने घर के भीतर आवाज दी. उसकी दो बहनें और माँ बाहर आई. बहनें भी जॉनी से बड़ी थीं. मुझे बाद में पता चला था कि उसकी दोनों बहनें डॉक्टर हैं और भाई इंजीनियर जॉनी के पिता सेना में डॉक्टर थे
और अब नहीं रहे थे. वे रंगून से यहाँ आकर बसने के कुछ समय बाद ही मर गए थे. जॉनी ने अपने बाप को तस्वीर में ही देखा था और पहचाना था. उसके ऊपर अपने पिता की तरह डॉक्टर या
भाई की तरह इंजीनियर बनने का दबाव था. जैसे-जैसे वह बड़ा होता जा रहा था, यह दबाब बढ़ता जा रहा था. मोहल्ले में उसकी घुसपैठ की कोशिश दरअसल इसी दबाव से मुक्ति की शुरुआत थी.
चित्र संदीप राशिनकर
संदीप
जॉनी के बताने पर ही, यह मुझे बाद में पता चला कि उसका पूरा नाम जनार्दन था. यह हमारी दोस्ती के लंबे और गहरे हो जाने के बाद हुआ था. तब, जब हम एक दूसरे के बहुत से रहस्य जानने लगे थे. उसमें से एक रहस्य यह भी था कि उसने हमारे मोहल्ले से ही उसके घर काम करने जाने वाली नौकरानी से पहली बार संभोग किया था जो उससे उम्र में बड़ी थी और दिखने में बहुत अच्छी नहीं थी. मेरे मोहल्ले में दिखने में बहुत अच्छी नहीं स्त्रियों की बहुत बड़ी तादाद थी. इतने से मेरे लिए, इस बात का अंदाज लगाना लगभग असंभव था कि जॉनी मेरे मोहल्ले की किस स्त्री के साथ सोया होगा. उसने मेरे बहुत उकसाने पर भी उस स्त्री का नाम मुझे नहीं बताया था. सच कहूँ तो इस बात को सुन में शर्मिदा हुआ था, पर मैंने उससे कुछ कहा नहीं था. मैंने अपने मन को समझाया था कि जॉनी साला झूठ बोल रहा है.
जॉनी को घर के भीतर ले उन्होंने दरवाजा बंद कर लिया था. मेरी ओर उन लोगों ने उस समय बस ध्यान दिया था, जब मैं जॉनी को लेकर वहाँ पहुँचा था. उस ध्यान देने में कुछ ऐसा था कि मैंने ही जॉनी की नाक तोड़ी है. जॉनी के भाई, बहनों और माँ की दृष्टि में मेरे लिए वस हिकारत थी और कुछ नहीं था. उसके बाद मेरी ओर ध्यान ही नहीं दिया गया था. जॉनी ने जरूर घर के भीतर जाते कनखियों से मुझे देखा था. उसके देखने में लाचारी थी. मैं जॉनी के घर के बाहर, उसके बगीचे में कुछ देर खड़ा रहा. मुझे लगा कि हो सकता है दरवाजा फिर खुले और वे मुझसे कुछ पूछना चाहें. दरवाजा बंद ही रहा. फिर मैं लौट आया था. बगीचे में खिले बहुत से गुलाबों को तोड़ उन्हें वहीं मसलकर बिखेर देने की मेरी चार साल से जॉनी बोल रहा था. कोई जानता भी नहीं था कि इच्छा हुई थी, पर मैंने अपनी इस इच्छा को अपने भीतर मार लिया उसका असली नाम जनार्दन है. वह खुद को जॉनी कहता था, था. मेरे घर में वैसे भी कोई बगीचा नहीं था. जॉनी के घर के जबकि घर में वह जनार्दन कहलाता था. उसने उस समय प्रसिद्ध
बगीचे से बहुत छोटी जगह पर मेरा पूरा घर था.
जॉनी, अपने दोस्तों के बीच वह बोला जाता था. मैं ही उसे
एक हिन्दी गाने "जॉन, जॉनी, जनार्दन, तरा रम पम पम
19 कथादेश मई 2026
पम..." से यह नाम उठाया था. उठा लेने का यह अधिकार उसके भीतर इसलिए पैदा हुआ था कि गाने की पहली पंक्ति में ही उसका नाम 'जनार्दन' आ रहा था. इसलिए वह यह मान रहा था गाने की वह पंक्ति उसकी हो गई है. 'जनार्दन' उसके पास पैदा होते ही था और उसे लग रहा था कि वह गाने से पहले उसके पास है. 'जॉन' या 'जॉनी' में से कोई एक नाम अपने नाम के विकल्प के रूप में उस गाने से चुनना उसने अपना अधिकार समझा. उसे 'जॉनी जमा था और 'जॉनी' उसने गाने की उस पंक्ति से उठा लिया था. उठाते ही गाने की वह पंक्ति उसके लिए कुछ इस तरह हो गई थी कि वह जब भी गाने की उस पंक्ति को सुनता तो उसमें उसे सिर्फ शब्द जॉनी ही सुनाई देता था, जिसमें जॉन और जनार्दन इस तरह घुल चुके थे कि सुनाई ही नहीं पड़ते थे, उसका अपना रखा यह नाम 'जॉनी' इतना चला कि घर का रखा 'जनार्दन' धुंधला होते-होते अब पूरी तरह मिट चुका था.
जॉनी रविवार के अलावा भी अब लगभग रोज ही हमारे इस मोहल्ले पर आने लगा था. इस मोहल्ले में मेहतरों के बारह घर थे. इन्हीं घरों में से एक घर मेरा था. यह घर मोहल्ले में होते हुए भी मोहल्ले से अलग थे. मोहल्ले के भीतर एक छोटे मोहल्ले से हम बसे थे. हमारे इस मोहल्ले में यादव ज्यादा थे. इसलिए गाय-भैंसें और उनका मल-मूत्र भी मोहल्ले में जरूरत से ज्यादा था. मेरे माँ-बाप मेहतर थे. वे मेरे लिए भी यह स्वप्न देखते थे कि मैं भी यही काम करूँगा. दरअसल वे मेरे रेल्वे में स्वीपर बन जाने का
खुद रेल्वे में स्वीपर था. स्वप्न देखते थे जो मेरे मामा ने उनके दिमाग में डाल रखा था जो
पता नहीं यह क्यों था? मुझे लगता है यह जॉनी से मिलने और एक बार उसके घर जाने के बाद ही मेरे भीतर पैदा हुआ था. अब मैं अपने घर और घर की एक-एक चीज से अपने को शर्मिंदा महसूस करता था. यहाँ तक कि घर से आती बू से भी मैं शर्मिंदा था जो धुएँ और पानी की मिली-जुली गंध-सी थी कुछ-कुछ मछली की देह से आती गंध-सी. में अपने घर, माँ-बाप, बहनों और घर की सारी चीजों को जॉनी के सामने आने से बचाता रहता था. उससे मुलाकात की शुरुआत में, मैं हमेशा अपने घर के बाहर ही मिलने की कोशिश करता, अगर वह कभी मेरे घर के दरवाजे तक आ जाता मुझे पुकारता तो मैं उसके घर के भीतर घुसने से पहले ही अपने घर के दरवाजे पर आ, उसके भीतर आने में बाधा बन जाता. पर मैं बहुत दिनों तक अपने घर घुसने में उसे रोक नहीं
पाया.
जॉनी बिल्कुल मुझसे उलट था. वह जैसे अपने बड़े घर पैदा हो जाने पर शर्मिंदा था. उसे मेरे घर की गंध अच्छी लगती थी. वह अपने को, मेरी बहनों और माँ-बाप के सामने, शायद अपनी बहनों, भाई और माँ से अधिक सहज पाता था. वह मेरे घर अधिकार से माँगकर खाने लगा. वह भी ऐसा खाना, जिसमें
आमतौर पर थोड़ी-सी कोई सब्जी और मोटा चावल होता था, कभी रोटी होती तो चावल नहीं होता था. कभी कभी वह खाना माँ के काम की जगह का बचा खाना होता था. ऐसे खाने को जॉनी को परोसते हुए मेरी माँ को शर्म आती थी. वह अपनी, कमरे के एक कोने में रची-बसी रसोई में, जॉनी के लिए कुछ आचार-वचार खोजने लग जाती थी जो उसे कभी मिलता और कभी नहीं मिलता था. मेरी माँ को जॉनी को खाना खिलाना अच्छा लगता था. यह बात जरूर थी कि उसके हमारे घर खाने से वह गौरवान्वित होती थी. मेरा बाप कुछ कहता नहीं था, पर गौरवान्वित तो वह भी था. दरअसल उसे घर में घुसा देख मेरे अलावा मेरा पूरा घर गौरवान्वित
रहता था.
जॉनी जब-तब मेरे घर आ जाता था और मुझे संदेह था कि वह मेरी सबसे छोटी बहन पर डोरे डाल रहा है, जो पता नहीं कैसे हम भाई-बहनों में सबसे गोरी और सुंदर थी. सच तो यह था कि वह हमारी बहन लगती नहीं थी. वह दो काले माँ-बाप से पैदा हुई गोरी औलाद थी. उसका चेहरा हम किसी भाई बहन से मिलता नहीं था. हम सब अपने माँ-बाप की तरह काले कलूटे ही थे. माँ ही बता सकती थी कि वह किसकी औलाद है. मेरे पिता ने कभी माँ से पूछा होगा ऐसा लगता नहीं था, वह जानता रहा होगा कि वह किसकी औलाद है, जिसे उसकी स्त्री ने जना है. जॉनी मेरी इसी बहन से पूरी बेशरमी के साथ लगा रहता था जो मेरे माँ-बाप को दिख नहीं रहा था, बस मुझे दिख रहा था. यही वह बात थी जिससे मैं जॉनी से अब कटने लगा और मेरा व्यवहार उसके प्रति बेरुखा होता चला गया.
उसने मुझसे नजदीकी बनाए रखने की कोशिश की, पर मैंने अपने भीतर के सारे दरवाजे जानबूझ कर उसके लिए बंद कर दिए थे. आखिरकार जॉनी अपनी उन कोशिशों से थक गया जो मेरे और उसकी दोस्ती को, दोस्ती के उन प्रगाढ़ दिनों में पहुँचा सकती थीं, जिसमें हम इतना ज्यादा एक दूसरे के साथ थे कि बस सोने के लिए अलग होते थे और कई बार तो उसके लिए भी नहीं. जॉनी दिन भर हमारे मोहल्ले में पड़े रहकर, मेरे घर कभी भी रात बिता लेता था. मैं जॉनी के घर नहीं ठहर सकता था. मैं जॉनी के घर उस पहली बार के बाद, फिर कभी गया ही नहीं था. उसकी कोई गुंजाइश भी नहीं थी. मेरी सायास रुखाई के कारण, धीरे-धीरे जॉनी का मेरे घर में आना, कम होते-होते आखिर बंद हो गया था. उन दिनों जॉनी के मेरे घर आना बंद कर देने के बावजूद, मुझे बहुत दिनों तक यह संदेह रहा कि वह मेरी उस बहन से मोहल्ले में बाहर कहीं मिलता होगा. यह भी कि किसी दुपहर या अंधेरे की ओर लुढ़क गई शाम में, वह बेशरम की झाड़ियों के उलझन से बनी किसी गुफा में, उसके साथ सो चुका होगा.
जॉनी ने मुझे छोड़ अब मोहल्ले में दूसरे दोस्त खोज लिये थे जो नशेड़ी थे और जिनका ज्यादा समय बेशरम की गुफाओं में ही
20 कथादेश मई 2026
बीतता था. मेरे साथ अपनी दोस्ती के फिसलते ही, वह बहुत तेजी से फिसलता चला गया था. गाँजा और ठर्रा इन दोनों चीजों की तलाश में वह भटकता रहता था. हमारे मोहल्ले में इस तरह भटकने वाले लड़कों की कोई कमी नहीं थी. मैं मानता हूँ कि जॉनी के घर को देखने के बाद और उसके उस रहन-सहन के प्रभाव के कारण मैं इस भटकने से बच गया था. दरअसल मैंने जॉनी के घर को अपने एक स्वप्न-सा चुन लिया था. मेरे इस मोहल्ले को चुन और इसके तिलिस्म में फँस, जॉनी अपने घर को अब पूरी तरह खोता जा रहा था. वह बड़े तालाब की एक मछली थी, जो डबरे में आकर फँस गई थी.
कुछ
इस मोहल्ले के भीतर मेरी बस्ती किसी गंदे डबरे से अधिक नहीं थी. एक-डेढ़-दो कमरों के घर थे, जिनमें शौच का कोई इंतेजाम नहीं था. आसपास जब तक खेत मैदान बचे थे, वही शौचालय के उपयोग में आते थे. बाद में सार्वजनिक शौचालय हमारे जैसे लोगों के लिए ही बनाए गए थे. नहाने के लिए, कंधे तक की आड़ का घेरा, घर के दरवाजे के एक कोने में नाली के ऊपर बना रहता, जिसके भीतर नहाती स्त्रियाँ, बहुत चाहकर भी आड़ से अपने शरीर के झाँकने को छिपा नहीं पाती थीं. पुरुषों को आड़ की जरूरत नहीं थी. वे सार्वजनिक बंबे पर या नल के पास ही नहा लेते थे.
मोहल्ले में बेशरम की गुफाओं की कोई कमी नहीं थी. हमारे मोहल्ले ने उसे खींच लिया था और खींचकर अपने ऊपर बिखेर लिया था.
मैं पढ़ने और हॉकी दोनों में ठीकठाक था. मैंने गणित लेकर ग्यारहवीं पास की. उसके बाद मैंने सरकारी कॉलेज से इंजीनियरी की, जिसमें अपनी जाति के कोटे के कारण मेरा एडमिशन आसानी से हो गया था. मैं अपने खानदान का पहला चिराग था जो इंजीनियर होने वाला था. मेरे इंजीनियरी पास करते ही, मेरे शहर से चालीस किलोमीटर दूर के एक स्टील प्लांट में मेरी नौकरी लग गई. यह वही स्टील प्लांट था जिसका उद्घाटन इस देश के पहले प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ने किया था और जिसकी स्थापना सोवियत रूस की मदद से हुई थी. इस नौकरी के लगने में मेरी जाति के साथ-साथ, मेरी हॉकी खेलने की प्रतिभा की भूमिका भी थी. में स्पोर्ट-कोटे से चुना गया था. मैं अपने माँ-बाप के उस स्वप्न से अब बाहर आ गया था जो मुझे रेल्वे का मेहतर बना रहा था. मैं अपने मोहल्ले के आवारा लड़कों और जॉनी से बहुत दूर चला आया था.
मैं अपनी नौकरी की जगह पर रहने की बजाय वहाँ आना-जाना कर रहा था. मैं सुबह जल्दी निकलता और रात देर से अपनी नौकरी से लौटता था. जॉनी से मेरा मिलना वैसे भी बहुत कम हो चुका था. उसका दिखना और मुझे देख मुस्कुराना और दो चार बातें करना अब गाहेबगाहे हो गया था. मेरी नौकरी लगने की सूचना के बाद जॉनी को मेरे कहीं मिल जाने या टकरा जाने का इंतजार रहता था. वह मिलते ही दो-चार मीठी बातों के बाद मुझसे किसी ना किसी बहाने पैसे माँगने लगता था. में कभी उसे मना नहीं कर पाता था, पर उससे टकराते बचता था.
जॉनी के किस्से मुझसे टकराते रहते थे. मोहल्ला जब जब
बहुत जल्दी जॉनी इसी तरह नहाते दिखने लगा. उसने अपने कपड़ों पर ध्यान देना बंद कर दिया था. उसके इस भटकाव के कुछ समय बाद समझा-समझा कर थक गए उसके घर वालों ने उसे घर से निकाल दिया था. इसमें समय लगा. उसके घर वालों ने हमारे मोहल्ले के तिलिस्म से उसे निकालने की पूरी कोशिश की थी, पर अंततः वे हार चुके थे. उनके घर में चोरी बढ़ गई थी. नगदी के साथ-साथ वे चीजें भी गायब होने लगी थीं, जिन्हें बेचकर नगदी में बदला जा सकता था. जॉनी अब अपने घर में सब्जी मंडी के लिए टूट गया तो वह अपने नशेड़ी दोस्तों के साथ बस चीजों को गायब करने घुसता था. फिर खुद कई दिनों के मोहल्ले के मलबे में भटकता पाया जाने लगा. वे वहाँ काम कर रहे लिए, हमारे मोहल्ले में आकर समा जाता था. ऐसे में जॉनी के घर मजदूरों और ठेकेदारों को चमकाकर उनसे नशे का जुगाड़ करते वाले कितने दिन बर्दाश्त करते. उसे अंतिम तौर पर घर से रहते थे. मेरे मोहल्ले के लोग नई बनी बिना लिफ्ट वाली उस चार निकालना जो हुआ, वह तो होना ही था. मंजिला चार ब्लॉक की इमारत में सिमट आए थे जो हमारे टूट गए मोहल्ले की तरह इधर-उधर फैली नहीं थी. यह धरती को कम से कम घेरे आसमान की ओर उठी हुई थी. मोहल्ले के परिवार जो कभी एक दूसरे के बाजू में रह रहे थे, अब एक दूसरे के ऊपर नीचे हो गए थे. कौन किसका पड़ोसी है यह ठीकठाक नहीं दिखने के कारण कोई किसी का पड़ोसी नहीं बचा था.
जॉनी ग्यारहवीं में तीन बार फेल हो चुका था. अब उससे और उसकी पढ़ाई से उसके घर के लोग उम्मीद छोड़ चुके थे. उनके हिसाब से वह लगभग बर्बाद हो चुका था. यह बात सही थी. मैं ऐसा मानता हूँ कि जिस दिन उसने अपनी सच की हॉकी और गेंद को छोड़, हमारी बेशरम की हॉकी और गेंद पर अपने को उतारा था, उस दिन उसके बर्बाद होने की शुरुआत हुई थी. हम बेशरम की हॉकी से खेलने वाले मेरे मोहल्ले के कुछ लड़के अब हॉकी की सच की स्टिक और सच की गेंद से खेल रहे थे, जिसमें एक में भी था, जबकि जॉनी हॉकी और स्कूल कब का छोड़ चुका था. वह बेशरम की झड़ियों से बनी गुफाओं का अब स्थायी निवासी था.
जॉनी मोहल्ले के किसी ना किसी घर में पहले भी टिका रहता. इस नई जगह पर भी वह वैसे ही टिका रहने लगा. मोहल्ले के निवासी सोचते रहे थे कि वह कितने बड़े घर का है और उसकी कैसी दुर्गति हो गई है. जॉनी को लेकर इस सोच में इस चार मंजिल इमारत में पूरे मोहल्ले के समा जाने के बाद भी कोई फर्क 21 कथादेश मई 20026
नहीं पड़ा था. कोई ना कोई उसे अपने घर में रख लेता. जॉनी के लिए नशा रोज जरूरी हो चुका था. जब कहीं से कोई जुगाड़ बहुत कोशिशों के बाद भी नहीं हो पाता तो वह अपने आसरा देने वाले घर की कोई वस्तु चोरी कर, उसे औने-पौने बेच अपने नशे का जुगाड़ कर लेता. एक बार तो उसने भरी गर्मी में अपने ऐसे ही एक घर के कूलर को ले जाकर बेच दिया, जब घर का मालिक अपने परिवार सहित एक दिन के लिए कहीं गया था. तब उसके आसरा देने वाले ने, कूलर के रुपयों से नशे में झूमते और खाना पा जाने की आशा में, घर घुस रहे जॉनी को पीटकर अपने घर से निकाला था और कसम खाई थी कि अब उस पर कभी दया नहीं करेगा.
था. अब वह दूसरों के उतरे कपड़ों पर निर्भर हो गया था जो उस मोहल्ले से उसे वैसे कभी नहीं मिल सकते थे, जैसे कपड़े वह कभी पहना करता था. उसके चेहरे में उसके बीते समय का आभिजात्य कुछ इस तरह ठहरा हुआ था कि कितने भी गंदे कपड़ों में रहते। भी वह हमसे अलग लगता था.
हुए
शराब के नशे कहीं भी पड़ गिर जाने के कारण वह अपने आसरा दाता घर का रास्ता ही भूल एक दो दिन बाद कभी पहुँच पाता था. उसे नशे और नशे के जुगाड़ में इतना समय लग जाता था कि नहाना-धोना, खाना-पीना उसके लिए गौण होता चला गया था. जॉनी अब जैसा हो गया था, वैसे लोग मेरे मोहल्ले में कम नहीं थे. जॉनी ने उन्हीं से यह सुख ढूंढ लिया था और इस सुख में ठहर गया था. उन्हीं अपने जैसे चार-पाँच के साथ वह इस सुख की तलाश और उसके जुगाड़ में दिन भर भटकता रहता था. इस जुगाड़ के लिए जॉनी और वे चार-पाँच सब करने को तैयार थे. वे एक पव्वा के आधे के लिए, थूक तक चाटने के लिए तैयार थे.
जॉनी के लिए उसके जवान दिनों में आसरों की कमी नहीं थी. मोहल्ले की स्त्रियाँ खुद अपने पति को समझा बुझाकर उसके लिए दया पैदा कर देती थीं. वह एक घर से बाहर किया जाता तो उसे दूसरे किसी घर में आसरा मिल जाता था. जिस घर में वह रहता उस घर की स्त्री के लिए दूसरे घर की स्त्रियाँ आँखें मटकाते जिस महाराज ने मोहल्ले के मैदान में मंदिर बनवाया था. उस मुस्कुराती देखी जाती थीं. वैसे यह सच था कि जॉनी को जितना महाराज का लड़का अब बड़ा हो गया था. वह जॉनी से दस-बारह प्रेम शराब और गाँजे से था, उतना स्त्रियों से नहीं था. वह गाँजे साल छोटा था. वह टूट चुके मोहल्ले के सरकार से भी न तोड़े जा और शराब के लिए स्त्री से संभोग के मौके को छोड़ सकता था. सके अपने बाप के स्थापित मंदिर में, बाप के कभी नहीं आ पाने इसके बावजूद उसके अधेड़ होते तक उससे मिलते-जुलते रंगरूप पर पूजा करने आता रहता था. मंदिर अब सब्जी मंडी के निर्माण के बच्चे मोहल्ले में बढ़ गए थे. के इंतजार में पड़े मलबे के बीचोंबीच दिखता था. मलबे के बीचोंबीच मंदिर में बैठे, महाराज के उस लड़के को जॉनी और उसके बेवड़े दोस्तों से अपना पैर पड़वाने में मजा आने लगा था जो मोहल्ले के टूट जाने के बाद भी उस मलवे में भटकते रहते थे. इसकी शुरुआत इस तरह हुई थी कि एक दिन वह लड़का मंदिर के पास ही धूप के एक टुकड़े पर बैठा, सिक्के और एक-एक के कुछ नोट गिन रहा था. वे मंदिर के चढ़ावे के थे. वे ज्यादा नहीं थे. जॉनी ने उसे नोट गिनते देख लिया. उसने लड़के से बहुत प्यार से
अपने घर से निकाल दिए जाने के बाद, पैसों की कमी के कारण उसका रहन-सहन लगातार गिरता गया था. वह दिनोंदिन गंदा होता गया था. पहले के अपने एक दो कपड़ों में अपना जीवन काटते हुए, वह अपने कपड़ों को लेकर बहुत लापरवाह हो चुका
जॉनी जब-तब मेरे घर आ जाता था और मुझे संदेह था कि वह मेरी सबसे छोटी बहन पर डोरे डाल रहा है, जो पता नहीं कैसे हम भाई-बहनों में सबसे गोरी और सुंदर थी. सच तो यह था कि वह हमारी बहन लगती नहीं थी. वह दो काले माँ-बाप से पैदा हुई गोरी औलाद थी. उसका चेहरा हम किसी भाई बहन से मिलता नहीं था. हम सब अपने माँ-बाप की तरह काले कलूटे ही थे. माँ ही बता सकती थी कि वह किसकी औलाद है. मेरे पिता ने कभी माँ से पूछा होगा ऐसा लगता नहीं था. वह जानता रहा होगा कि वह किसकी औलाद है, जिसे उसकी स्त्री ने जना है. जॉनी मेरी इसी बहन से पूरी बेशरमी के साथ लगा रहता था जो मेरे माँ-बाप को दिख नहीं रहा था, बस मुझे दिख रहा था. यही वह बात थी जिससे मैं जॉनी से अब कटने लगा और मेरा व्यवहार उसके प्रति बेरुखा होता चला गया.
कहा, "एक दे दे!" "क्यों?" लड़के ने कहा.
"यह पैसे तेरे नहीं लग रहे हैं..."
"तो क्या हुआ, यह तुम्हारे भी नहीं लग रहे हैं...!" "यह भगवान के पैसे हैं... तेरे नहीं हैं..."
"भगवान मेरे बाबू के हैं... तुम्हारे नहीं!" लड़के ने जॉनी से साफ-साफ कहा. वह जॉनी से बिल्कुल नहीं डर रहा था जो तब तक मोहल्ले का दादा कहलाने लगा था- जॉनी दादा. उसने दो चार बार मारपीट की थी, उसके दबाव में आने के लिए हमारे मोहल्ले के लिए इतना काफी था.
“दे, दे, पंडित... मैं तेरे पैर पड़ लूँगा....!" जॉनी ने मजाक में यह कह दिया था.
"ठीक है पैर पड़ोगे तो मैं अठन्नी दे दूंगा..." महाराज के लड़के ने कहा.
22 कथादेश मई 2026
जॉनी ने लड़के के पैरों की ओर हाथ बढ़ाया. वह नशे में था, नशे की और लहरों की उसे जरूरत थी. वह लड़के का पैर पड़ अठन्नी के बाद और एक और अठन्नी के जुगाड़ में था, जिससे
पव्वे का
इंतजाम
जाए.
हो "ऐसे नहीं चलेगा, पैरों पर माथा चाहिए" लड़का कहते हुए मुस्कुरा रहा था. वह अपने पिता को देख-देख कर अपना महत्व
समझने लगा
था.
जॉनी बस एक क्षण ठिठका और फिर उसने अपना माया लड़के के पंजों पर रख दिया जो बिना चप्पल इधर-उधर लड़के के घूमने के कारण बहुत मैले हो चुके थे. सिर उठाते ही उसे लड़के का अठन्नी के साथ बड़ा हाथ दिखा. लड़का वचन का ईमानदार था. जॉनी ने सोचा यह भाग जाता तो वह क्या कर लेता. उसके पीछे चीखता भागता. नशे में होने के कारण उसे पकड़ नहीं पाता. ज्यादा से ज्यादा लड़का कभी सपड़ में आता तो एक दो झापड़ मार सकता था बस इतना ही.
"एक बार और पैर पड़ देता हूँ... एक अठन्नी और दे दे... कम से कम पब्वे का इंतजाम हो जाएगा... पव्वा एक रुपये में आता
एक शराबी के पास अगर आधे पव्वे के पैसे हों तो वह दूसरा आधे पव्वे के पैसे रखे शराबी को ढूँढता है जो शराब भट्टी में आसानी से मिल जाते हैं. इस तरह ऐसे दो आधे पव्वे का पैसा रखे शराबी एक पव्वा खरीद आधा-आधा बराबर बाँट पी सकते हैं. यही शराब भट्टी का शरावियों का आपसी व्यवहार था. जिस शराबी के पास पव्वे में आधे का पैसा होता तो वह भट्टी में पुकारता गुजरता, "पव्वे में दो... पव्वे में दो!" कोई ना कोई पब्बे का आधा पैसा रखा शराबी उसे मिल ही जाता था.
"नहीं!" लड़के ने साफ इनकार कर दिया. फिर उसने कुछ सोचकर कहा, "अब दूसरा कोई पैर पड़ेगा तो उसे दे दूंगा!" लड़के को लड़खड़ाते शराबी का माथा अपने पैरों के पंजों पर पसंद आया था. वह किसी दूसरे शराबी का माथा अपने पंजों पर देखना चाह
रहा था.
जॉनी लड़के को अठन्नी के लिए मनाता बैठा रहा. जब तक एक अठन्नी और नहीं मिल जाती वह इकलौती अठन्नी दारू के पव्वे में बदल नहीं सकती थी. तभी जॉनी को गोलू देवड़ा दिखा. उसने उसे पुकारा. गोलू वेवड़ा लड़के का पैर पड़ने से पहले एक बार ठिठका भी नहीं. तुरंत पैर पड़ा और जब तक लड़के ने अपने पैरों को पीछे नहीं खींच लिया, वह लड़के के पंजों पर अपना माथा रखे रहा. हुआ यह था कि वह इतने नशे में था कि लड़के के माथे पर वह लुढ़क गया था. उसके बदले जॉनी ने ही लड़के से अठन्नी बसूल की और गोलू बेबड़े को वहीं छोड़ पव्वा के लिए देशी ठेके
की ओर निकल गया था.
चित्र संदीप राशिनकर
से या मंदिर के ईश्वर से चुराए पैसे होते, वह सबसे पहले जॉनी और उसके बेवड़े दोस्तों को अठन्नी-अठन्नी देकर अपने माथे को छुआते पैर पड़ाता था. पैर पड़ने की यह दर जब तक एक रुपये तक पहुँची तब तक यह चलता रहा. महाराज का लड़का महीने में दो तीन बार उनसे पैर पड़वा लेता था. महाराज के तो सब पैर पड़ते थे, लड़के का कोई पड़ता नहीं था तो महाराज का लड़का इस शौक को शराबियों से पूरा कर रहा था. यह बात मंदिर के पास से उजड़कर इमारत में बस गए मोहल्ले तक भी पहुँच चुकी थी. सच यह था कि जॉनी और उसके दोस्त उस लड़के के दिखते ही उससे पूछते रहते थे कि पैर पड़ना है क्या? एक बार उस लड़के ने पैर पड़वाने के बाद तुरंत पैसा देने की बजाय यह कहा कि पैसा कल दूंगा आज तो नहीं है, बस जॉनी ने आव देखा ना ताव और उस लड़के को तड़ातड़ थपियाते हुए, उससे कहा था, "मादरचोद इज्जत भी उधारी में बेचें!".
उस दिन महाराज के लड़के पर जॉनी का गुस्सा जायज था. दोपहर हो चुकी थी और दारू का जुगाड़ अब तक नहीं हुआ था. पर जॉनी के उस गुस्से ने कभी कभार के, पर एक स्थायी आवक को बंद कर दिया था. महराज का वह लड़का उस घटना के बाद पैर पड़ाना भूल चुका था. वह जॉनी को देखते ही आँखें चुराते इधर-उधर हो जाता था. इस बात के लिए जॉनी को अपने बेवड़े दोस्तों की खरी-खोटी भी सुननी पड़ी थी. एक आवक बेवजह नष्ट
उसके बाद से जब भी उस महाराज के लड़के पास अपने बाप हो चुकी थी. जॉनी के दोस्त कभी दो, कभी तीन कभी चार-पाँच
23 कथादेश मई 2026
लिए किस्म-किस्म के तरीकों की खोज में लगे रहते थे. एक स्थायी हो जाते थे और वे जॉनी की अगुवाई में नशे की लहरें बटोरने के थी. आवक बंद हो जाने के कारण उनकी मेहनत थोड़ी और बढ़ गई
हरकतें ऐसी होती गई थीं कि अब उस पर एक भी आदमी की दया नहीं बची थी.
इसी बीच उस तालाब के किनारे बसी चार ब्लाकों वाली इमारत वाला मोहल्ला रात में भूतों की चपेट में आ गया. बारह एक बार जब जॉनी को यह पता चला कि उसके एक बेबड़े बजे के बाद जोर-जोर से विचित्र सी आवाजें उठने लगीं. आवाजें साथी के भाई को उसकी नौकरी में पंद्रह दिन के मेडिकल इतनी डरावनी और विचित्र थीं कि लोग दरवाजा खोल आवाज सर्टिफिकेट की जरूरत है. पहले से डॉक्टर को नहीं दिखाने के कहाँ से आ रही है यह देखने की हिम्मत नहीं कर पा रहे थे. कारण कोई डॉक्टर बनाकर नहीं दे रहा है. तब जॉनी ने सर्टिफिकेट एकाच दो घरों ने यह कोशिश की भी तो उन्हें गलियारे के अंधेरे बनवा देने की जिम्मेदारी कुछ सोचकर ले ली. उसने अपने साथी के अलावा कुछ अब तक मिला नहीं था. लोगों की नींद हराम हो से कहा कि वह अपने भाई से पूछ ले बीस रुपये लगेंगे. साथी चुकी थी. उस इमारत में ये आवाजें रातों में, करीव पाँच दिन अपने भाई का संदेश लेकर आया कि वह तैयार है, पर सर्टिफिकेट लगातार नाचती रही थीं. अचानक पाँच दिन बाद वे गायब हो गई. देखने के बाद ही पैसा देगा. जॉनी ने इस शर्त को मंजूर कर लिया. अब वे जॉनी की कालोनी में सुनाई पड़ रही थीं, जिसमें जॉनी का जॉनी को दो दिन लगे. वह अपने उस घर के आसपास परिवार रहता था. जैसे भूतों ने मोहल्ले वाली इमारत के बाद, उस मंडराता रहा, जिस घर से उसके माँ के मरते ही उसकी हरकतों का कालोनी को चुन लिया हो. वहाँ के लोग भी चार-पाँच दिन सो नहीं हवाला देकर उसे निकाल दिया गया था. वह जानता था कि पाए. वे लोग मोहल्ले की इमारत के लोगों से ज्यादा भयभीत रहे, उसकी एक डॉक्टर बहन अब भी उस घर में बची है, जिसकी अब क्योंकि वे नाजुक लोग थे जो जीवन में आई थोड़ी-सी दिक्कत में तक शादी नहीं हुई है. वह घर के बरामदे को ही अपनी डिस्पेंसरी घबरा जाते थे. यही हुआ. उन्होंने उन मुतही आवाजों को लेकर की तरह इस्तेमाल करती है. एक सूनी दुपहर में जब डिस्पेंसरी पुलिस से लेकर अखबार तक हल्ला मचाया. उस कॉलोनी में इस वाला बरामदा पूरी तरह खाली था जॉनी अपनी बहन का शहर के सबसे ताकतवर लोग बसते थे. पुलिस सक्रिय हो गई. पर लेटरपैड और सील उठा लाया. उस लेटर पैड और सील से वह भुतही आवाजें अब उस कालोनी से गायब हो गई थीं. अब भूत मेडिकल सर्टिफिकेट बनाने लगा. उसके घर वाले उसे डॉक्टर पास की उस सिन्धी वस्ती में अपनी आवाजों से कूद रहे थे, बनाना चाहते थे. इसके लिए उसकी बहनें उसे पढ़ाया करती थीं. जिनके दादा-बाबा पाकिस्तान से आए शरणार्थी थे. तब तक पूरा उसने अपने घर में डॉक्टरों के बीच ही समय बिताया था. उसके शहर, शहर की इस जगह से, शहर की उस जगह नाचते भूतों से आया. ऐसा कोई सर्टिफिकेट जब जॉनी बेचता तो उसके सारे पास जमा वह अधूरा ज्ञान मेडिकल सर्टिफिकेट बनाने में काम बुरी तरह भयभीत हो चुका था. शहर के हर रिहायशी जगह को यह लग रहा था कि भूतों की यह टोली कभी भी उन तक पहुँच बेवड़े दोस्तों की चांदी हो जाती थी. दारू के साथ-साथ मुर्गे मटन सकती है. का इंतजाम भी दो-चार दिन के लिए हो जाता था. जॉनी खर्च में बहुत उदार था. पैसा उसे काटता था. आता और वह उसे यहा देता था. जितना भी आता, जैसे भी आता- उसके पास से वह जाता था.
आश्चर्य की बात यह थी कि इस घटना के ठीक पहले मेरा हाल ही खरीदा टेप रिकॉर्डर मेरे घर से चोरी हो गया था. जॉनी मेरे घर नहीं रहता था. पर वह किसी और घर की दया पर रहता तो भी रहता तो उस इमारत में ही था. तो वह कभी-कभी प्लांट से मेरी छुट्टियों वाले दिन मेरे घर मुझसे मिलने आ जाता था. सबसे छोटी बहन के शादी होकर विदा हो जाने के बाद, अपनी बहन को लेकर जॉनी के लिए मेरे भीतर उठे संदेह अब मर चुके थे. जॉनी के मिलने आने का अर्थ, मेरे लिए दस-पचास रुपए की चपत ही होती थी. मैं अब भी उसके प्रभाव से बाहर नहीं हुआ था और उसे कभी मना नहीं कर पाता था. ऐसे ही एक दिन वह बहुत देर तक, मेरे उस नए लाए टेपरिकॉर्डर पर एक के बाद एक कैसेट लगाकर गाना सुनता रहा. उसने 'नसीब' फिल्म के उस गाने के कैसेट की भी फरमाइश की, जिसमें उसका प्रिय गाना 'जॉन, जॉनी जनार्दन' था. वह उस दिन टेपरिकॉर्डर देख मेरे घर पर इतनी देर अटका रहा कि दस दोपहर का खाना खिलवाकर ही वमुश्किल में उसे अपने घर से बाहर कर पाया था. मैं जानता था कि टेपरिकार्डर सुनते 24 कथादेश मई 2026
धीरे-धीरे मोहल्ले के लोगों की दया जॉनी खोला गया था. जॉनी के पास हमारा जो मोहल्ला था और जिस मोहल्ले के जीवन को जॉनी ने अपने लिए चुना था, वह मोहल्ला कब का मलबे में बदल चुका था और चार ब्लाकों वाली एक चार मंजिला इमारत में सिमट आया था. जहाँ जाकर मोहल्ला गहू-महू हो चुका था. मोहल्ले के घरों को किसी जुआरी ने कौड़ियों की तरह मुट्ठी में हिलाकर मिला दिया था. जॉनी को इस नई जगह रहने में कोई सुख मिलता नहीं था. वह मोहल्ले के नष्ट होने के बाद अब उभर आयी सब्जी मंडी में ही अपने बेवड़े दोस्तों के साथ भटकता रहता था. अब वह जॉनी दादा था, जिससे डरकर सब्जी व्यापारी हफ्ता देने लगे थे. इस सिमट आए मोहल्ले में भी जानी के कुछ बरस कट गए, क्योंकि उसे सोने की जगह तो चाहिए ही थी. उसकी
उसने मेरी आँख बचाकर खाने से पहले अपने जेब में रखा पव्वा निकालकर गटक लिया था जो मेरे ही दिए पैसे से वह खरीद लाया था. बहुत दिनों बाद टेपरिकॉर्डर ने इतनी देर तक जॉनी को मेरे घर
में बाँधे
रखा
था.
आखिरकार पुलिस की रातों की गश्त और मेहनत रंग लायी. भूत पकड़ लिये गए थे. बाकी मोहल्लों के निवासियों ने चैन की गहरी साँसें लीं, जहाँ अब तक भूत पहुँच नहीं पाए थे, उनके पकड़े जाने के बाद, उनके पहुँचने का खतरा पूरी तरह मिट चुका था. सुबह-सुबह जब लोगों ने यह सुना कि भूत कोतवाली में बंद हैं तो लोगों की भीड़ भूतों को देखने कोतवाली में जमा हो गई. भूत कोतवाली के लॉकअप में बंद थे. उन्हें बाहर से देखना मुश्किल था. लोगों ने भूतों को देखने के लिए इतना हल्ला-गुल्ला मचाया कि कोतवाली के थानेदार को भूतों को दिखाने कोतवाली के बरामदे तक ले जाने का आदेश अपने सिपाहियों को देना ही पड़ा.. भूत बरामदे में लाए गए, वे चार थे. वे चारों चड्डी-बनियाइन में थे और उनके हाथों में हथकड़ी लगी थी. उसमें एक जॉनी था और तीन मेरी उस मेहत्तर बस्ती के लड़के थे जो बस्ती इमारत में मोहल्ले के समा जाने के कारण अब अपने आकार-प्रकार में बिल्कुल नहीं बची थी. जॉनी के साथ-साथ वे तीन लड़के, इमारत के अलग-अलग घरों से निकलकर भूत बन गए थे. उन चारों ने अपनी आवाज को भूत की आवाज में बदल जिस टेपरिकॉर्डर में टेप कर बजाया था और शहर की नींद हराम कर दी थी वह मेरा
टेपरिकॉर्डर था.
मैं भी कोतवाली में भूतों को देखती भीड़ में खड़ा था. जब थानेदार की घोषणा से मुझे यह पता चला कि भूत की आवाज के लिए टेपरिकॉर्डर का इस्तेमाल किया गया है और जब थानेदार ने उस टेपरिकॉर्डर को अपने हाथ में उठाकर भीड़ को दिखाया तो मैं अपने टेपरिकॉर्डर को पहचान गया. वह मेरा ही था. जॉनी ने उसे मेरे घर से मार लिया था. मैं काँप गया. जॉनी टेपरिकॉर्डर के मालिक का नाम अगर पुलिसवालों को बता दे तो भीड़ के सामने खड़े उन चारों में एक पाँचवों में भी जुड़ सकता था. पुलिस वाले उन चारों से कुछ वसूल नहीं सकते थे, क्योंकि उनके पास वसूलने के लिए उनकी देह के अलावा कुछ था ही नहीं. उन्हें देखकर लग रहा था कि वे रात में ही बहुत कूटे गए हैं और उनकी देह से पुलिस वालों ने पर्याप्त वसूली कर ली है. मुझ नौकरीपेशा आदमी का नाम आते ही पुलिसवालों को धन वसूली साफ दिखाई देने लगती और वे मुझे फँसाने के लिए सारी धाराएं लगा देते. जब तक जॉनी पुलिस रिमांड में रहा में रातों में सो नहीं पाया. घर का दरवाजा कोई खटखटाता तो लगता कि पुलिस की खटखटाहट है. जॉनी ने मुझे बचा लिया था. वह पुलिस वालों के बार-बार पूछने पर भी यही कहता रहा कि टेपरिकॉर्डर उसी का है. पुलिस वाले उसका रंगरूप और उसकी बातचीत में बीच-बीच में आ रहे
अंग्रेजी के वाक्यों से आश्चर्य चकित थे कि यह आदमी इन मेहतरों के चक्कर में कैसे पड़ गया है. यह उन्होंने जॉनी से कहा भी जवाब में जॉनी ने बस अपने कंधे उचका दिए थे. जबकि यह कांड जॉनी के दिमाग की ही उपज था. जॉनी को उसकी अंग्रेजी ने ज्यादा मार खाने से से बचा लिया था. उसे दो-चार झापड़ ही पड़े थे. पुलिस वालों का सारा गुस्सा उन तीन लड़कों पर ही निकला था और मार-मार कर उन्होंने उन्हें सुजा दिया था.
मामला ऐसा गंभीर नहीं था जॉनी और वे तीनों लड़के जल्दी ही जेल से बाहर आ गए.
जॉनी जेल से आने के बाद पहली फुरसत में मेरे पास आया. उसने कहा, "मानोगे मैं तुम्हारा दोस्त हूँ... मैंने तुम्हें जेल जाने से बचा लिया है!"
वह सही था. उसने मुझे बचा लिया था बहुत-सी झंझटों से. "तुम्हारे पास पाँच सौ होंगे?" उसने कहा. वह रात का समय था. उसे घर के भीतर लाना मुझे ठीक नहीं लगा.
झूमता.
"तुम यहीं रुको!" मैंने कहा. वह मेरी देहरी पर खड़ा रहा
मैंने सौ-सौ के पाँच नोट उसे लाकर दिए. वह मुस्कुराया और लौट गया. जॉनी ने जैसा सोचा होगा, वैसा हुआ नहीं. उसे हमारी इमारत में सोने की जगह नहीं मिली. उसके तीन दोस्त जो उसके साथ छूटे थे अपने-अपने घरों में जो अलग-अलग मंजिलों में थे जाकर सो चुके थे. मुझे बाद में पता चला वह इमारत के हमारे ब्लॉक की सबसे निचली मंजिल में सीढ़ियों के पास जमीन पर जाकर सो गया था. अगर मुझे यह पहले पता होता तो शायद मैं अपनी पत्नी की मर्जी की चिंता किए बिना कम से कम उस दिन, उसे अपने घर में जगह दे सकता था. मैं उसका एहसानमंद था. उसने मुझे जेल जाने से बचा लिया था.
इस कांड के बाद अपनी पत्नियों के आग्रह पर भी जॉनी को हमारी इमारत का कोई परिवार रखने को तैयार नहीं था. जॉनी के पास अब सिर टिकाने की कोई जगह बची नहीं थी. उसने रास्ता निकाला और नई बनी सब्जी मंडी में नए-नए खुले रेस्टोरेंट में बरतन धोने का काम करने लगा. वह दिन भर नशे में रहता था इसलिए रेस्टोरेंट के मालिक को उसे पीछे बर्तन धोने का काम देना ही ठीक लगा था. वेटर के काम में नशे में गड़बड़ी की गुंजाइश ज्यादा थी. उस रेस्टोरेंट में जॉनी की मजदूरी दोपहर और रात के लिए एक-एक पब्या देशी दारू और दो समय का खाना था. यह उस समय की एक मजदूर की रोजी के हिसाब से शायद कुछ ज्यादा ही था. वह शायद इसलिए था कि उस रेस्टारेन्ट का मालिक हमारे मोहल्ले का हमारे साथ का था जो कभी जॉनी का दोस्त रह चुका था. जॉनी के जीने के लिए इतना काफी था. बरसों से वह ऐसे ही जीते हुए अब मेरे साथ-साथ अधेड़ हो चुका था.
जाने कब जॉनी के घर के लोग कॉलोनी का अपना मकान
25 कथादेश मई 2026
बेच किसी दूसरे शहर में चले गए थे, जिससे अपने बड़े नाम और काम को जॉनी की काली छाया से बचा सकें. सच यह था कि जॉनी भी अब यह भूल चुका था कि वह किस घर में पैदा हुआ था, किसका भाई था, किसका बेटा था... हमारा मोहल्ला ही उसका घर था जो अब मलबे में बदल एक इमारत में सिमट आया था और जहाँ अब उसके लिए कोई जगह नहीं बची थी. मैं जब भी चाहता कि उससे मेरा सामना ना हो. उसे कहीं देखता मुझे उसके पैसा मांगने का डर होता और मैं
जब मेरी उम्र पैंसठ के आसपास कहीं दिपदिपा रही थी. जॉनी भी उसके आसपास अपनी उम्र में रहा होगा. बहुत पहले ही उसमें दिखती, उसकी कभी की पारिवारिक स्थिति से उसमें समायी कुलीनता झड़ चुकी थी. उसे उस रूप में पहचनाना मुश्किल था. उस रूप के खंडहर ध्यान से देखने पर उसमें दिखते थे. अब वह बहुत दुबला और कमजोर हो चुका था. लगातार नशे ने उसके शरीर को खोखला कर दिया था. अब वह सब्जी मंडी के मुहाने पर बने एक शेड में फलों और सब्जियों के खोखों और बोरों के साथ, अपनी मोटरी गठरी लिये, किसी गंदे ढेर की तरह पड़ा रहता था. सब्जी मंडी के सामने ही वह कान्वेन्ट स्कूल था. जहाँ कभी वह पढ़ा करता था. स्कूल और सब्जी मंडी के कारण वहाँ आवाजाही बहुत थी. कुछ वर्षों से यही आवाजाही जॉनी के जीने का साधन हो चुकी थी. सब्जी मंडी से निकलते लोग उसकी ओर सिक्का फेंक जाते थे. साथ ही स्कूल में अपने बच्चों को छोड़ने आते लोगों से जॉनी को भीख मिल जाती थी. कुछ भीख उन लोगों से उसे सहायता के रूप में भी मिल जाती थी जो ऐसे लोग थे जो जॉनी के साथ उसी कान्वेन्ट में वर्षों पहले पढ़ चुके थे और अब बड़े अधिकारी-व्यापारी हो गए थे. अब उनके बच्चे उसी कानवेंट में पढ़ रहे थे. जॉनी उनकी दया का पात्र था. अब भी शराब की लालसा उसके भीतर उतनी ही बनी हुई थी. अब भी शराब लायक पैसा इकट्ठा होते ही उसे देशी भट्टी की ओर जाते देखा जा सकता
था.
इस बात पर आश्चर्य किया जा सकता है कि बिना अपने घर-परिवार के कोई आदमी इतनी उम्र कैसे काट सकता है, पर जॉनी ने यहाँ वहाँ पड़े रहकर अपनी उम्र के वर्षों काट लिये थे. वह दिखने और गायब होने और गायब होने और दिखने के बीच जी रहा था. अब हम उसके इस दिखने गायब होने के आदी हो चुके थे, जैसे धूप छाँव की आदी हो जाती है.
ही जॉनी भी अब ध्वस्त होकर एक मलबे में बदल चुका था. हमारे मोहल्ले की बगल की आभिजात्य कॉलोनी में कभी रहने वाले जॉनी को, जॉनी के मलवे से अब खोजना और पहचानना मुश्किल हो चुका था.
में स्टील प्लांट में कई प्रमोशन पाकर एक बड़ा अधिकारी बन अब रिटायर्ड हो चुका था. मैंने जवान दिनों में, वहीं मेरे नीचे काम कर रही एक ब्राह्मण लड़की से प्रेम विवाह कर लिया था. इससे मेरा तो कुछ बिगड़ा नहीं, पर लड़की के घर वालों ने लड़की को हमेशा के लिए छोड़ दिया था और बाकायदा अपनी लड़की का श्राद्ध कर तेरह ब्राह्मणों को भोज करा दिया था. इस तरह ससुराल होते हुए भी मेरे पास कोई ससुराल नहीं बची थी. मायका होते हुए भी मेरी पत्नी के पास कोई मायका नहीं बचा था. पहले मैं स्टील प्लांट वाले अपने शहर में ही बसना चाहता था. मेरी ससुराल उसी शहर में थी. ससुराल की बेरुखी ने मुझे उस शहर से दूर कर दिया
था.
मैंने अपने शहर को अपने लिए चुना, पर मैंने रहने की जगह बदल दी. पिता के साथ जिस घर में में रहता आया था, मेरी अब की स्थिति से वह घर अब बाहर हो चुका था. मैंने उस इमारत में बसे मोहल्ले को छोड़ दिया, जो मेरे पिता के नजूल के मकान के एवज में उन्हें मिला था और जॉनी की उस कॉलोनी जहाँ मेरे माँ-बाप स्वीपर के काम के लिए जाते थे, रिसेल में एक बंगला खरीद लिया था. मैंने उस स्वप्न को पूरा कर लिया था जो मेरे भीतर अपनी चौदह-पंद्रह साल की उम्र में जॉनी को देखने के बाद उपजा था. प्लांट से मिली गाड़ी से मैं अब अपने शहर से चालीस किलोमीटर दूर अपने प्लांट में आना-जाना करता था. एक सजा-धजा बेंगला मुझे प्लांट वाले शहर में भी मिला हुआ था, ज्यादा काम होने पर जहाँ में कभी-कभी रुक जाया करता था. रहता ज्यादा अपने ही शहर में था.
मुझे इस कालोनी में रहना पसंद था. इसके बावजूद कि कॉलोनी के दूसरे परिवारों के बुजुर्गों और मेरे हमउम्र के लोगों में मेरे मोहल्ले और मेरे माँ-बाप की पुरानी स्मृति की वजह से, कई तरह की फाँसें थीं. मैं उस कॉलोनी के निवासियों के बीच कुलीन नहीं समझा जाता था, इसके बावजूद कि मेरी पत्नी ब्राह्मण थी. कई बार मुझे लगता था कि मेरी कालोनी के लोग मुझसे ज्यादा सम्मान मेरी पत्नी का करते हैं. इस बात का आभास, मुझे उस कालोनी के निवासियों के व्यवहार से होता रहता था. कई बार मुझे लगता था कि मेरा इस कॉलोनी में घर लेने का निर्णय ही गलत था जो मोहल्ले के करीब थी. मेरा अतीत इस नजदीकी के कारण मेरे ध्वस्त हो चुके मोहल्ले से इस कालोनी में झाँकता रहता था. मेरे अतीत से उठ रही इस ताकाझाँकी को रोक पाना मेरे बस में नहीं था. कई बार मुझे यह लगता था कि अपने स्टील प्लांट वाले शहर में ही मुझे बस जाना था, जहाँ किसी ने मेरे माँ-बाप को 26 कथादेश मई 2026
मैं बहुत पहले से ही उससे कटने लगा था. में शुरुआत के जॉनी जैसा होना चाहता था, जिसे पहली बार मैंने अपने मोहल्ले के धूल उड़ते मैदान में हॉकी खेलते हुए देखा था. मैं उस जॉनी जैसा हो चुका था, जिस जॉनी को मेरे मोहल्ले में जीते हुए इस जॉनी ने खो दिया था जो अब सब्जी मंडी के मुहाने पर पड़ा था. सब्जी मंडी के लिए ध्वस्त होकर मलवे में बदल गए मेरे मोहल्ले-सा
कर सकता था ऐसी स्थिति में जब मधुमक्खियों जॉनी के चारों ओर, जॉनी को अपने एक बड़े-से घेरे के भीतर लिये हुए थीं. मेरे
स्वीपर का काम करते नहीं देखा था. मैं चाहता तो अपनी ब्राह्मण-ससुराल से दूर किसी आसपास के शहर में मकान ले सकता था. यह गड़बड़ी मुझसे जॉनी के पुराने जीवन की नकल साथ मेरा नाती था. मैंने अपने ड्राइवर करने के कारण हो गई थी. मैं उम्मीद कर रहा था कि मेरे सकते हो, इसे बचाने के लिए?" बेटा-बेटी जिसमें दो डॉक्टर थे और एक इंजीनियर थे- अपने प्रभाव से, मेरे मरते तक इस गड़बड़ी को सुधार लेंगे.
मैं जॉनी को अपनी कार से आते-जाते देखता था. अब उसके पास रुकता नहीं था. वह कूड़े का ढेर था. मुझे कूड़ों के ढेर से शर्म आती थी. यह इसलिए भी था कि इससे मुझे अपने माँ-बाप के काम की स्मृति हो आती थी और मैं अपने आप को शर्मिंदा महसूस करता था. इसलिए किसी छुट्टी वाले दिन में सब्जी खरीदने खुद सब्जी मंडी जाता तो जॉनी को देखने और पहचानने से अपने को बचाए रखने की कोशिश करता जो जॉनी के ठीक सब्जी मंडी के मुहाने के पास पड़े रहने के कारण कभी ठीकठाक पूरी नहीं हो पाती थी. जॉनी इतना ढीठ था कि मेरी अनदेखी को वह मेरे नाम से मुझे जोर से पुकारकर देखी में बदल देता था. मुझसे बात करते हुए, वह पुराना जॉनी ही लगता था. वह अपनी इस बदतर स्थिति के लिए मुझे कभी शर्मिंदा नहीं लगा. कितनी अजीब बात थी कि उसने उस कुलीनता को छोड़ दिया था जो उसके पास पैदायशी थी. मैं उसकी उस कुलीनता की ओर लपका था जो मेरे पास नहीं थी, पर उसे देखकर वह स्वप्न वन चुकी थी.
ऐसे ही एक छुट्टी के दिन मैंने सब्जी मंडी के मुहाने तक अपनी कार से पहुँचा. मेरे साथ मेरा ड्राइवर और मेरा तीन साल का नाती था, जिसे मैं अपने साथ घुमाने ले आया था. ड्राइवर ने हमें उतारने कार खड़ी ही की थी कि जॉनी मुझे दिखा. उसकी गठरी मोटरी सब्जी मंडी के मुहाने के बाजू पड़ी रह गई थी. 'मानसा बचा मानसा बचा!' चीखता वह मेरी कार की ओर आ रहा था. मैं यस कार का दरवाजा खोल उतरने ही वाला था कि मैंने देखा जॉनी ऊपर से नीचे तक मिनभन करती मधुमक्खियों से घिरा, मेरी कार की ओर बढ़ा चला आ रहा है. उसने बस चड्डी पहन रखी थी, इसलिए उसका बाकी सारा शरीर मधुमक्खियों के हवाले हो गया था. मुझे पता था, वह सुबह-सुबह ही सब्जी मंडी के गेट से थोड़ी दूरी पर लगे नल पर नहाया करता था. वह सब्जी मंडी के हमालों और मजदूरों के नहाने की जगह थी. वे सब सब्जी मंडी के पीछे बने सार्वजनिक शौचालय से आकर यहाँ नहाते थे. सब्जी मंडी में ही कहीं सो जाते थे. जॉनी इन दिनों बाहर से आए हमालों और मजदूरों-सा ही जीवन काट रहा था. बस इतना था कि वह सब्जी मंडी के भीतर कम उसके गेट के किनारे पड़ा ज्यादा पाया जाता था. लगता है नहाते समय ही मधुमक्खियों ने जॉनी पर हमला कर
दिया
था.
से
पूछा,
"तुम
कुछ
कर
उसने कहा, “सर हमें यहाँ से निकल जाना चाहिए... बाबा भी हमारे साथ है... नीचे उतरते ही मधुमक्खियाँ हमारे ऊपर भी हमला कर देंगी..." ड्राइवर कभी किसानी किया, बूढ़ा और अनुभवी आदमी था. वह मुझे वह जगह दे रहा था, जिससे में जॉनी को छोड़ बचकर सुरक्षित भाग सकता था.
पीछे
बैठे
मुझे और मेरे नाती को ड्राइवर ने मुड़कर देखा था. कार अब स्टार्ट हो चुकी थी. जॉनी अब तक कार के करीब आ चुका था. उसके हाथ मधुमक्खियों के घेरे में डूबे कार के शीशों को थपथपा रहे थे. वह लगातार 'मानसा बचा! मानसा बचा!" की पुकार लगा रहा था. कार की आवाज से मधुमक्खियाँ अब शायद और भड़क गई थीं. जॉनी मधुमक्खियों के डंक से बेचैन कार के चारों ओर कार के भीतर घुसने का रास्ता तलाशता उसके बंद दरवाजों और खिड़कियों पर अपना हाथ और सिर पटक रहा था. वह कार से इस तरह चिपका और कार पर ही लोटता, कार के चारों ओर था कि अब मेरे हाँ कहने पर भी ड्राइवर का कार को एक इंच भी हिला पाना मुश्किल था. मैं अपने बेटे की कुछ दिनों पहले खरीदी गई बहुत ही महंगी कार को जानी और मधुमक्खियों की गंदगी से लिथड़ते देख रहा था. जॉनी पर इतनी मधुमक्खियाँ थी कि उनकी भिनभिनाहट कार के बंद शीशों से भीतर आ रही थीं. लग रहा था मधुमक्खियाँ कार के शीशों को तोड़, कार के भीतर आ जाएँगी. मेरा नाती डरकर रोने लगा था. खुद मैं भयभीत था. शायद मेरा ड्राइवर ही ऐसा था जो थोड़ी अलग स्थिति में था. वह जॉनी और मेरे संबंध को जानता नहीं था. वह मधुमक्खियों को जानता था. उसे जॉनी की परवाह नहीं थी. उसे मधुमक्खियों के स्वभाव की परवाह थी. उसे मेरी और मेरे नाती की परवाह थी. वह कार मोड़ इस जगह हमें दूर ले जाना चाहता था, जहाँ अब सिर्फ हवा में तैरती हमलावर मधुमक्खियों का विशाल झुंड एक. आदमी को अपने डंक से लगातार घायल करता मौजूद था.
सब्जी मंडी में आ-जा रहे लोग अब दूर खड़े थे. वे अपनी सुरक्षा जितनी दूरी से दर्शक थे. ज्यादातर दर्शक हमलावर मधुमक्खियों के हमले से घिरे आदमी का अपने मोबाईल में विडियो बना रहे थे, जिससे उस वीडियो को तुरंत रील में बदलकर उससे धन अर्जित कर सकें. मधुमक्खी के हमले में तड़फड़ाता आदमी एक सनसनीखेज और वायरल हो सकने लायक रील का विषय था. वह सुबह-सुबह का समय था तो भीड़ कम थी और इसलिए दर्शक भी कम थे. जो थे उनके पास जॉनी की सहायता का कोई कदम नहीं था. मैं था और मेरे पास भी जॉनी की सहायता का कोई कदम नहीं था. अब तक हमलावर मधुमक्खियाँ अपना डंक जॉनी के 27 कथादेश मई 2026
मुझे लगा मैं कार से उतरूँ जो बने मैं उसके लिए करूँ. यह मैंने बस एक क्षण सोचा था. मुझे सूझ नहीं रहा था कि मैं क्या
शरीर पर छोड़, मरते-मरते कम होती जा रही थीं. मधुमक्खी के डंक पर ही मधुमक्खी की मृत्यु लिखी हुई थी. कम होते मधुमक्खी के झुंड ने, अब रील बना रहे दर्शकों को निराश करना शुरू कर दिया था.
जॉनी अब भी मेरी कार के चारों ओर तड़फता घूम रहा था. पर उसमें अब तड़प की वह तेजी नहीं बची थी जो पहले थी. वह पस्त पड़ रहा था. तभी सब्जी मंडी की गेट से एक हमाल बाहर आता दिखा. उसे मैंने सब्जी मंडी के दरवाजे के ठीक सामने होने के कारण, सब्जी मंडी के गेट के भीतर के दर्शकों के बीच से उभरता देखा. वह एक खाली बोरा सिर से पीठ तक ओढ़े आगे बढ़ रहा था जो शायद भरे बोरे की लदान की गंदगी से अपने कपड़ों को ज्यादा गंदे होने से बचाने उसने ओढ़ रखा था. जॉनी अब तक पस्त होकर मेरी कार के बोनट पर पसर गया था. अभी भी बची हुई मक्खियों जो कम नहीं थीं, बोनट पर पसरे जॉनी के शरीर पर डंक उतारते एक-एक कर मर रही थीं. तभी ठीक जॉनी के पीछे आकर उस हमाल ने अपना ओढ़ा बोरा जॉनी पर टैंक दिया और तुरंत वहाँ से हट गया. मधुमक्खियों के पास अब जॉनी की खुली देह नहीं बची थी. वे अपने शिकार के गायब होने से चौंकी और अचमित-सी मिनभिनाती धीरे-धीरे अपने छत्ते की ओर लौट गई. उनका छत्ता उस पीपल के पेड़ पर था, जिसके नीचे कभी खड़ा होकर जॉनी ने हमें बेशरम की स्टिक से धूल उड़ाते हुए मैदान में हॉकी खेलते देखा था. पीपल का वह पेड़, हमारे मोहल्ले की जगह सब्जी मंडी के बनने के बाद, सब्जी मंडी के गेट के ठीक किनारे आ गया था. इधर जॉनी के मंडी के मुहाने पर पड़ी रहने की जगह, उस पीपल के पेड़ से गिरती छाया के नीचे थी जो थोड़ी-सी भी हवा चलने पर पीपल के पत्तियों के कलरव से भर जाती थी. पत्तियों की वह मधुर आवाज ही एकमात्र कारण थी, जिसके कारण जॉनी सब्जी मंडी के गेट के किनारे पीपल के पेड़ के नीचे की उस जगह को चुना था और अपने मोटरी-पोटरी के साथ वहाँ पड़ा रह गया था. कम से कम बरसात के आने तक वह वहाँ पड़ा रह सकता था. अभी जनवरी का आखिरी सप्ताह चल रहा था और मधुमक्खियों ने उस पर हमला कर दिया था.
जब हमाल ने मधुमक्खियों के हटने के बाद, मेरी कार के बोनट से जॉनी को हटा जमीन पर लिटा दिया तो मधुमक्खियों को आसपास न होने को लेकर पूरी तरह आश्वस्त होने के बाद में अपनी कार से उतरा. जॉनी बेहोश मेरी कार के सामने पड़ा था. उसका पूरा चेहरा, हाथ पैर, धड़, सिर्फ चड्डी में होने के कारण मधुमक्खियों के डंक से भर चुके थे. मधुमक्खी के डंकों ने उसके पूरे शरीर को लाल कर सुजा दिया था. जॉनी का चेहरा सूजकर इतना लाल और बड़ा हो चुका था की वह जॉनी के पुराने चेहरे के पास पहुँच गया था जो लगातार वर्षों से शराब पीने से पहले कभी
आनंद हर्षल
आनंद हर्षुल (जन्म 23 जनवरी 1959) का कथा-गद्य सर्वथा नए, अनूठे और एक हद तक चकित करने वाले (चौकाने वाले नहीं) शिल्प में समाविष्ट है. उनके यहाँ कथानक का कोई एकरेखीय सपाट विन्यास नहीं दिखता. बल्कि अधिकतर महाकाव्यात्मक रोमांस और लोककथा में काम आने वाले खंड-खंड कथासूत्र हैं जिनके सहारे कथा रची जा रही है. उनके पाँच कहानी संग्रह बैठे हुए हाथी के भीतर लड़का, पृथ्वी को चंद्रमा', 'रेगिस्तान में झील', 'अघखावा फल एवं चिड़िया और मुस्कुराहट तथा तीन उपन्यास "चिड़िया बहनों का भाई', 'देखना' एवं 'रेतीला' तथा एक संपादित पुस्तक, 'अनगिन से निकलकर एक अब तक प्रकाशित हैं. उनकी रचनाओं का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ है, वे 'सुभद्रा कुमारी चौहान पुरस्कार' (1997) विजय वर्मा अखिल भारतीय कया सम्मान' (2003) 'वनमाली कथा सम्मान (2014) तथा संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार की सीनियर फलोशिप' ( 2020-21 ) से सम्मानित हैं. सम्पर्क: anand.harshul@gmail.com .: 9425208064/7999286419
उसके पास था और शराब के कारण जिसे वर्षों पहले उसने खो दिया था. जॉनी के शरीर पर मधुमक्खी के इतने डंक थे कि उन्हें एक-एक कर निकालते सुबह से शाम हो सकती थी.
जब मैं जॉनी के पास पहुंचा तो वह हल्की-हल्की थकी हुई-सी साँसें ले रहा था. में उसके पास खड़ा रहा यह सोचता कि उसे झुककर देखूं या बैठ जाऊँ उकडूं उसके पास, जैसे बैठा हुआ था हमाल जिसने उसे मधुमक्खियों से बचाने की कोशिश की थी. बैठ जाऊँ मैं और उसके माथे पर अपना सांत्वना से भरा हाथ फेरूँ और उसे विश्वास दिला दूँ कि उसे ठीक करने के लिए मैं सब कुछ करूंगा. में यह कर पाता, इससे पहले ही जॉनी ने अपनी आँखें खोल मुझे देखा उसकी आँखों में दर्द था. उसकी आँखों में मेरे लिए कुछ नहीं था. था ऐसा कुछ कि जैसे उसने मुझे पहचाना ही नहीं है. उसने अपनी आँखें बंद कर लीं. हमाल अब भी उकडू जॉनी की देह के पास बैठा था. जॉनी की बंद होती आँखों को देख, हमाल ने अपनी अंगुलियाँ जॉनी के नाक के ऊपर फेरीं और मेरी ओर देखते ना के इशारे में अपना सिर दायें-बाएं घुमा दिया.
28 कथादेश मई 2026
कहानी •
परिशिष्ट
विभांशु दिव्याल
ज फिर वह उन अंधेरे-डरावने कोनों में पहुंच गयी थी जिनसे पिछले कई वर्षों से वह लगातार भागने की कोशिश कर रही है. जितना भागती है ये भीतर दवे-छुपे कोने उतने ही डरावने हो जाते हैं, अपनी तरफ खींचने लगते हैं..... अंधेरे कोने से निकलकर वे दिन जैसे लाल-लाल आंखों, नुकीले पंजों वाले चमगादड़ों में बदल जाते हैं, उसके ऊपर झपटने लगते हैं, उसे बार-बार लहूलुहान करते हुए, उसके भीतर चीसों का ज्वार उठाते हुए. फिर वह भागती थी अपने उस एकमात्र शरण्य की ओर अपना बार-बार उलटा हुआ एक बार फिर उनके आगे उलट देने के लिए चमगादड़ों को भगाने के लिए, चीसों से मुक्ति पाने के लिए.
वह कभी अपने कमरे के तख्त पर लेटे हुए मिलते हैं या गाँव तकिए से पीठ सटाकर बैठे हुए कोई किताब पढ़ते हुए या फिर उसी मुद्रा में अपने घुटनों पर टिकी
मेजनुमा तख्ती पर कुछ लिखते हुए. अब तक उसका सारा संकोच तिरोहित हो गया है. शुरू में जब आती थी वो
और वह अपनी खुली मुस्कान के साथ 'आओ आओ' बोलकर उसका स्वागत करते थे तो कहीं से संदेह के
कांटे से उग आते थे... क्या यह मुस्कान वास्तविक है या इसमें भी
कहीं कोई छल छिपा हुआ है, कोई धोखा, कोई कूट योजना. जब उसका वह मुग्धक जिसे उसने अपना समूचा
अस्तित्व सौंप दिया था उसके साथ ऐसा कर सकता था तो फिर कोई
भी
दूसरा क्यों नहीं. लेकिन जैसे-जैसे
चीस मुक्ति के लिए वह उनके पास
आती गयी थी उसकी नुकीली आशंकाएं कुंद होती गयी थीं. अब वही एकमात्र व्यक्ति थे जिनके पास
वह कभी भी बुलाए - बिनबुलाए आ
सकती थी, बार-बार का कहा हुआ फिर-फिर दुहरा सकती थी और बार-बार सांत्वना से गर्भित शब्द वाक्य कितनी भी देर तक सुनते रह सकती थी. अपने जलते हुए दिमाग पर बर्फ में लगे फाहे रख सकती थी. कभी-कभी जिन्हें हम अपना सब कुछ मान लेते हैं वे कुछ भी नहीं रहते और जिन्हें हम सिर्फ कुछ होने के तौर पर लेते हैं वे बहुत कुछ हो जाते हैं. वह उसकी उन्मुक्त उड़ान और फिर किसी घायल परिंदे की तरह जमीन पर आ गिरने के साक्षी भी थे. आखिर उनकी उड़ान भी तो रोक दी गयी थी. उनके पंख भी तो कतर दिये गये थे. अपनी बीस के साथ आज वह उनके लिए भी एक सूचना लेकर आयी थी. कैसा लगेगा उन्हें जानकर ?
जब वह अखबार से जुड़ने से पहले पत्रकारिता का अपना पाठ्यक्रम पूरा कर रही थी, तभी उस विशेष परिशिष्ट से परिचित
चित्र संदीप राशिनकर
29 कथादेश मई 2026
हो गयी थी. वही क्या, उसका हर सहपाठी इस वैचारिक परिशिष्ट से परिचित था जिसे हिंदी पत्रकारिता में अनूठे प्रयोग की तरह देखा जा रहा था. अखबार से ज्यादा सम्मान उसके परिशिष्ट को मिल रहा था. उसके साथी कहते थे, वह स्वयं भी ऐसा मानती थी कि हिंदी पाठकों के मध्य अखवार की पहचान उसके
विचार- परिशिष्ट की वजह से ही बनी थी. जब वह स्वयं अखवार में बतौर
उप संपादक संपादन मंडल की सदस्य बनी तो उसकी पहली जिज्ञासा उस व्यक्ति से मिलने की थी जो यह परिशिष्ट निकाल रहा था. मुलाकात
हुई, और अच्छी हुई. उन्होंने पूछा था, 'केवल खबरों का संपादन करती हो या कुछ लिखती करती भी हो?" इस सवाल का उत्तर उसने इस तरह दिया
था कि परिशिष्ट के असाइनमेंट पूरे
शरीर पर छोड़, मरते-मरते कम होती जा रही थीं. मधुमक्खी के डंक पर ही मधुमक्खी की मृत्यु लिखी हुई थी. कम होते मधुमक्खी के झुंड ने अब रील बना रहे दर्शकों को निराश करना शुरू कर दिया था.
जॉनी अब भी मेरी कार के चारों ओर तड़फता घूम रहा था. पर उसमें अब तड़प की वह तेजी नहीं बची थी जो पहले थी. वह पस्त पड़ रहा था. तभी सब्जी मंडी की गेट से एक हमाल बाहर आता दिखा. उसे मैंने सब्जी मंडी के दरवाजे के ठीक सामने होने के कारण, सब्जी मंडी के गेट के भीतर के दर्शकों के बीच से उभरता देखा. वह एक खाली बोरा सिर से पीठ तक ओढ़े आगे बढ़ रहा था जो शायद भरे बोरे की लदान की गंदगी से अपने कपड़ों को ज्यादा गंद होने से बचाने उसने ओढ़ रखा था. जॉनी अब तक पस्त होकर, मेरी कार के बोनट पर पसर गया था. अभी भी बची हुई मक्खियाँ जो कम नहीं थीं, बोनट पर पसरे जॉनी के शरीर पर डंक उतारते एक-एक कर मर रही थीं. तभी ठीक जॉनी के पीछे आकर उस हमाल ने अपना जोड़ा बोरा जॉनी पर टैंक दिया और तुरंत वहाँ से हट गया. मधुमक्खियों के पास अब जॉनी की खुली देह नहीं बची थी. वे अपने शिकार के गायब होने से चौंकी और अचमित-सी मिनभिनाती धीरे-धीरे अपने छत्ते की ओर लौट गई. उनका छत्ता उस पीपल के पेड़ पर था, जिसके नीचे कभी खड़ा होकर जॉनी ने हमें बेशरम की स्टिक से धूल उड़ाते हुए मैदान में हॉकी खेलते देखा था. पीपल का वह पेड़, हमारे मोहल्ले की जगह सब्जी मंडी के बनने के बाद, सब्जी मंडी के गेट के ठीक किनारे आ गया था. इधर जॉनी के मंडी के मुहाने पर पड़ी रहने की जगह, उस पीपल के पेड़ से गिरती छाया के नीचे थी जो थोड़ी-सी भी हवा चलने पर पीपल के पत्तियों के कलरव से भर जाती थी. पत्तियों की वह मधुर आवाज ही एकमात्र कारण थी, जिसके कारण जॉनी सब्जी मंडी के गेट के किनारे पीपल के पेड़ के नीचे की उस जगह को चुना था और अपने मोटरी-पोटरी के साथ वहाँ पड़ा रह गया था. कम से कम बरसात के आने तक वह वहाँ पड़ा रह सकता था. अभी उस पर हमला कर दिया था. जनवरी का आखिरी सप्ताह चल रहा था और मधुमक्खियों ने
जब हमाल ने मधुमक्खियों के हटने के बाद, मेरी कार के बोनट से जॉनी को हटा जमीन पर लिटा दिया तो मधुमक्खियों को आसपास न होने को लेकर पूरी तरह आश्वस्त होने के बाद में अपनी कार से उतरा. जॉनी बेहोश मेरी कार के सामने पड़ा था. उसका पूरा चेहरा, हाथ पैर, धड़, सिर्फ चड्डी में होने के कारण मधुमक्खियों के डंक से भर चुके थे. मधुमक्खी के डंकों ने उसके पूरे शरीर को लाल कर सुजा दिया था. जॉनी का चेहरा सूजकर इतना लाल और बड़ा हो चुका था की वह जॉनी के पुराने चेहरे के पास पहुँच गया था जो लगातार वर्षों से शराब पीने से पहले कभी
आनंद हल
आनंद हर्षुल (जन्म 23 जनवरी 1959) का कथा- गद्य सर्वथा नए, अनूठे और एक हद तक चकित करने वाले (चौकाने वाले नहीं) शिल्प में समाविष्ट है. उनके यहाँ कथानक का कोई एकरेखीय सपाट विन्यास नहीं दिखता. बल्कि अधिकतर महाकाव्यात्मक रोमांस और लोककथा में काम आने वाले खंड-खंड कथासूत्र हैं जिनके सहारे कथा रची जा रही है. उनके पाँच कहानी संग्रह बैठे हुए हाथी के भीतर लड़का, पृथ्वी को चंद्रमा', 'रेगिस्तान में झील', 'अघखाया फल एवं चिड़िया और मुस्कुराहट तथा तीन उपन्यास 'चिड़िया बहनों का भाई', 'देखना' एवं 'रेतीला' तथा एक संपादित पुस्तक, 'अनगिन से निकलकर एक अब तक प्रकाशित हैं. उनकी रचनाओं का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ है, वे 'सुभद्रा कुमारी चौहान पुरस्कार' (1997) 'विजय वर्मा अखिल भारतीय कथा सम्मान' (2003) 'वनमाली कथा सम्मान (2014) तथा संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार की सीनियर फलोशिप' ( 2020-21 ) से सम्मानित हैं. सम्पर्क: anand.harshul@gmail.com .: 9425208064/7999286419
उसके पास था और शराब के कारण जिसे वर्षों पहले उसने खो दिया था. जॉनी के शरीर पर मधुमक्खी के इतने डंक थे कि उन्हें एक-एक कर निकालते सुबह से शाम हो सकती थी.
जब मैं जॉनी के पास पहुंचा तो वह हल्की-हल्की थकी हुई-सी साँसें ले रहा था. मैं उसके पास खड़ा रहा यह सोचता कि उसे झुककर देखूं या बैठ जाऊँ उकडूं उसके पास, जैसे बैठा हुआ था हमाल जिसने उसे मधुमक्खियों से बचाने की कोशिश की थी. बैठ जाऊँ मैं और उसके माथे पर अपना सांत्वना से भरा हाथ फेरूँ और उसे विश्वास दिला दूँ कि उसे ठीक करने के लिए मैं सब कुछ करूंगा. मैं यह कर पाता, इससे पहले ही जॉनी ने अपनी आँखें खोल मुझे देखा. उसकी आँखों में दर्द था. उसकी आँखों में मेरे लिए कुछ नहीं था. था ऐसा कुछ कि जैसे उसने मुझे पहचाना ही नहीं है. उसने अपनी आँखें बंद कर लीं. हमाल अब भी उकडू जॉनी की देह के पास बैठा था. जॉनी की बंद होती आँखों को देख, हमाल ने अपनी अंगुलियाँ जॉनी के नाक के ऊपर फेरी और मेरी ओर देखते ना के इशारे में अपना सिर दायें-बाएं घुमा दिया.
28 कथादेश मई 2026
कहानी •
परिशिष्ट
विभांशु दिव्याल
ज फिर वह उन अंधेरे-डरावने कोनों में पहुंच गयी थी सकती थी, बार-बार का कहा हुआ फिर-फिर दुहरा सकती थी जिनसे पिछले कई वर्षों से वह लगातार भागने की कोशिश और बार-बार सांत्वना से गर्भित शब्द वाक्य कितनी भी देर तक कर रही है. जितना भागती है ये भीतर दबे-छुपे कोने उतने ही सुनते रह सकती थी. अपने जलते हुए दिमाग पर बर्फ में लगे फाहे डरावने हो जाते हैं, अपनी तरफ खींचने लगते हैं.... अंधेरे कोने से रख सकती थी. कभी-कभी जिन्हें हम अपना सब कुछ मान लेते निकलकर वे दिन जैसे लाल-लाल आंखों, नुकीले पंजों वाले चमगादड़ों हैं वे कुछ भी नहीं रहते और जिन्हें हम सिर्फ कुछ होने के तौर पर में बदल जाते हैं, उसके ऊपर झपटने लगते हैं, उसे बार-बार लेते हैं वे बहुत कुछ हो जाते हैं. वह उसकी उन्मुक्त उड़ान और लहूलुहान करते हुए, उसके भीतर चीसों का ज्वार उठाते हुए. फिर फिर किसी घायल परिंदे की तरह जमीन पर आ गिरने के साक्षी वह भागती थी अपने उस एकमात्र शरण्य की ओर अपना भी थे. आखिर उनकी उड़ान भी तो रोक दी गयी थी. उनके पंख बार-बार उलटा हुआ एक बार फिर उनके आगे उलट देने के लिए भी तो कतर दिये गये थे. अपनी चीस के साथ आज वह उनके चमगादड़ों को भगाने के लिए, चीसों से मुक्ति पाने के लिए. लिए भी एक सूचना लेकर आयी थी. कैसा लगेगा उन्हें जानकर ?
वह कभी अपने कमरे के तख्त पर लेटे हुए मिलते हैं या गाँव तकिए से पीठ सटाकर बैठे हुए कोई किताब पढ़ते हुए या फिर उसी मुद्रा में अपने घुटनों पर टिकी
मेजनुमा
तख्ती पर कुछ लिखते हुए.
अब तक उसका सारा संकोच तिरोहित हो गया है. शुरू में जब आती थी वो
और वह अपनी खुली मुस्कान के
साथ 'आओ आओ' बोलकर उसका स्वागत करते थे तो कहीं से संदेह के
कांटे से उग आते थे... क्या यह मुस्कान वास्तविक है या इसमें भी
कहीं कोई छल छिपा हुआ है, कोई धोखा, कोई कूट योजना. जब उसका वह मुग्धक जिसे उसने अपना समूचा
अस्तित्व सौंप दिया था उसके साथ ऐसा कर सकता था तो फिर कोई
भी
दूसरा क्यों नहीं. लेकिन जैसे-जैसे
धीस मुक्ति के लिए वह उनके पास
आती गयी थी उसकी नुकीली आशंकाएं कुंद होती गयी थीं. अब वही एकमात्र व्यक्ति थे जिनके पास वह कभी भी बुलाए - बिनबुलाए आ
जब वह अखबार से जुड़ने से पहले पत्रकारिता का अपना पाठ्यक्रम पूरा कर रही थी, तभी उस विशेष परिशिष्ट से परिचित
चित्र: संदीप राशिनकर
29 कथादेश मई 2026
हो गयी थी. वही क्या, उसका हर सहपाठी इस वैचारिक परिशिष्ट से परिचित था जिसे हिंदी पत्रकारिता में
अनूठे प्रयोग की तरह देखा जा रहा था. अखबार से ज्यादा सम्मान उसके परिशिष्ट को मिल रहा था. उसके
साथी कहते थे, वह स्वयं भी ऐसा मानती थी कि हिंदी पाठकों के मध्य अखबार की पहचान उसके विचार - परिशिष्ट की वजह से ही बनी
थी. जब वह स्वयं अखबार में बतौर
उप संपादक संपादन मंडल की सदस्य बनी तो उसकी पहली जिज्ञासा उस व्यक्ति से मिलने की थी जो यह परिशिष्ट निकाल रहा था. मुलाकात
हुई, और अच्छी हुई. उन्होंने पूछा था, 'केवल खबरों का संपादन करती हो या कुछ लिखती करती भी हो?" इस सवाल का उत्तर उसने इस तरह दिया
था कि परिशिष्ट के असाइनमेंट पूरे
करने लगी थी, अनुसंधान कार्य करने लगी थी और विशिष्ट व्यक्तियों के साक्षात्कार भी लेने लगी थी. यहां तक कि उसके सहकर्मियों की शिकायतें होने लगीं कि ड्यूटी समाचार डेस्क पर है मगर काम विचार - परिशिष्ट का हो रहा है... शिकायतों और मौखिक चेतावनियों के बावजूद वह परिशिष्ट विभाग में जा पहुंचती थी और अपनी पहुंच के भीतर के बहुत से सवाल उनसे पूछ डालती थी. कभी संतुष्ट होती थी तो कभी खुद को उलझन में पड़ा हुआ महसूस करती थी. वह मुस्कुराते हुए कह देते थे, 'अभी और पढ़ो, जितना पड़ सको उतना पढ़ो." वह सोचने लगी थी कि आगे कोई अच्छा सा मौका देखकर विचार- परिशिष्ट की टीम में शामिल किये जाने का अनुरोध करेगी उनसे. पर आगे तो एक तूफान इंतजार कर रहा था उसका सब कुछ उलट-पुलट कर देने वाला तूफान. उसे लगा चमगादड़ झपट पड़े हैं.
बहुत दिन बाद आना हुआ, सब खैरियत तो है." स्वागत वैसा ही था जैसा हमेशा होता था 'आओ-आओ,
उसने खोजी नजरों से उनके चेहरे को निहारा कोई भी शिकन ऐसी नहीं थी जो किसी भी असामान्यता का संकेत देती हो, 'कुछ भी ठीक नहीं है', कहते हुए वह उनके तख्त के करीब पड़ी लकड़ी की कुर्सी पर बैठ गयी. साथ ही लगा, चमगादड़ थम गये हैं.
"अब क्या हुआ? कुछ नया " वह अचलेटी मुद्रा से निकल बैठने की मुद्रा में आ गये. हाथ का अखबार बगल की टेबल पर रख दिया. अब उनके चेहरे पर चिंता की कुछ ईमानदार रेखाएं उभर आयीं. उसे उनकी यह चिंता अपने तई सुखद-सी लगी.
तो आपके पास निमंत्रण नहीं आया?" उसने सीधा सवाल किया. इस सवाल के साथ उसे अपनी धीस फिर उभरती सी लगी. "कैसा निमंत्रण, किसका कहां से?" वह उत्सुक हुए. "आपके विचार परिशिष्ट के जयंती समारोह का? मीडिया के बड़े-बड़े दिग्गजों के साथ-साथ नेताओं-मंत्रियों की बड़ी जमात जुट रही है." उसने बताया.
“तुम्हारे पास बुलावा आया है?" उन्होंने सहजता से पूछा. "मेरे पास? मेरे पास क्यों आएगा?" उसने महसूस किया कि उन्होंने सिर्फ मजाक किया है, बोली, "मैंने तो अखबार में पढ़ा. न जाने किन-किन के नाम दिये गये थे. आपका नाम नहीं दिखा तो सोचा जाकर ही पूछ लूं. आप तो यह अखबार अब पढ़ते ही नहीं." उसने मुस्कुराने जैसा उपक्रम किया.
"ओह, तो तुम यह पूछने आयी हो इस बार "
उसने इसका जवाब नहीं दिया, बोली, "जिस इंसान ने विचार- परिशिष्ट को पूरे हिंदी क्षेत्र में स्थापित किया, और उसी को ..मैं देखती थी आपको इस परिशिष्ट में जान झोंके हुए, टीम के साथ लंबी-लंबी बैठकें करते हुए विषय का चयन करते हुए, फिर राजनीतिवेत्ताओं, अर्थशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों, राजनेताओं, विषय विशेषज्ञों आदि की सूची तैयार करते हुए किससे लेख लिखवाना
है, किसका साक्षात्कार लेना है, किन-किन बिंदुओं को लेकर रिसर्च करानी है... इन बातों पर तो आप कभी-कभी मेरे साथ भी डिस्कस कर लेते थे ... जब आप मुझे असाइनमेंट देते थे." "मैं तुम्हें बुद्धिमान जो समझता था." उन्होंने हल्का मजाक-सा
किया.
या
अचानक एक शब्द उसकी जुबान पर उतर आया, "बुद्धिमान बुद्धियौनिक?" उसे वर्षों पुराना प्रसंग, शायद तब का जब उसे संपादकीय विभाग से हटाकर मालिक प्रबंध संपादक के सचिवालय में बुला लिया गया था. और वह पूरी तरह से मोहबिद्ध हो गयी थी. सरापा जुड़ गयी थी अपने स्वामी मुग्धक से अपने इस मुग्धक की प्रतिभा की मुरीद हो गयी थी. उसे इधर-उधर जाने का समय नहीं मिलता था मगर किसी न किसी बहाने परिशिष्ट की डेस्क पर दस्तक दे ही देती थी. तारीफ के पुल बांध देती थी अपने प्रबंधन संपादक की मेघा के. वह ऐसा ही कुछ कह रही थी उस दिन जब इन्होंने कहा था, "तुम बुद्धियौनिक हो,”
"बुद्धियौनिक यह क्या होता है?" उसने पूछा था. वह शब्द वह पहली बार सुन रही थी.
"बुद्धियौनिक यानी सेपियो सेक्सुअल वानी वह व्यक्ति जिसे मेधा में जबर्दस्त आकर्षण प्रतीत होता है. बुद्धिमान वा प्रतिभावान व्यक्ति जिसे अपनी तरफ खींचते हुए लगते हैं, यौन सुख जैसी सुखानुभूति."
"में तो आपके पास भी आकर बैठती हूं." उसने कहा था. "तो क्या तुम मुझे बुद्धिमान नहीं मानतीं?"
वह झेंप गयी थी. पर आज क्यों निकला यह शब्द उसके मुंह से? वह बुद्धियौनिक थी या नहीं परंतु वज्रमूर्ख अवश्य थी. अन्यथा.....
उसने देखा, 'बुद्धियौनिक शब्द सुनकर वह पहले मुस्कुराए फिर गंभीर हो गये.
उसने उनकी तरफ देखा तो उसके भीतर की बेचैनी फिर उभर आयी, "क्या आपको सचमुच तकलीफ नहीं होती?"
“तकलीफ होती भी होगी तो अब उसके मायने क्या हैं?" उन्होंने कहा, "लगता है आज तुम कुछ ज्यादा ही परेशान हो. तुम्हें पहले भी कई बार समझा चुका हूं, वह सब भूलने की कोशिश करो, बहुत दिन हो गये, अब तक तुम्हें बाहर निकल आना चाहिए
था. "
कैसे निकले बाहर? जब भी बाहर निकलने की कोशिश करती है तो तिलमिलाहट होने लगती है, गुस्सा भड़कने लगता है, बदला लेने की न जाने कैसी-कैसी तुकी बेतुकी योजनाएं दिमाग में उफनने लगती हैं. वे बार-बार कहते रहे हैं कि उस परिशिष्ट को मैंने अपने बच्चे की तरह पाला-पोसा था, तो फिर अपने उस बच्चे को ये कैसे भूल सकते हैं. उसने एक बार फिर उन्हें गहरी नजरों से देखा, बोली, "उस विचार-परिशिष्ट की नींव आपने ही 30 कथादेश मई 2026
रखी थी न? वह आपकी ही रचना था न?"
“इतने वर्षों बाद यह सवाल तुम्हारे मन में क्यों उठा ? तुम्हें संदेह है कि इसकी परिकल्पना मेरी थी?"
संदेह तो होता ही है कि कोई अपनी संतान को कैसे इतना निर्विकार होकर दिमाग से परे धकेल सकता है. वह बोली, "संदेह न भी हो तो जिज्ञासा ही मान लें. आपके दिमाग में विचार- परिशिष्ट का विचार आया कैसे था?" वह सचमुच जिज्ञासु हो उठी. वह जैसे पुनः आश्वस्त होना चाहती थी कि परिशिष्ट उन्हीं का मानसपुत्र था. अगर था तो फिर कैसे... कैसे वह इसे इतनी आसानी से बिसरा सकते थे?
"यह कोई ज्यादा लंबी कहानी नहीं है. अखबार का मालिक चाहता था कि सप्ताह में कुछ ऐसा निकाला जाये जो सबसे अलग हो, जिससे अखबार पाठकों की पसंद बने. विचार के क्षेत्र में
कुछ करने जैसा मेरे मन में हमेशा उमड़ता रहता था, बस, मैंने सुझाव दिया था कि एक परिशिष्ट निकाला जाना चाहिए जिसे विचार केंद्रित बना दिया जाये. बात मान ली गयी, क्योंकि इसका प्रस्ताव मेरा था इसलिए इसकी जिम्मेदारी भी मुझे दे दी गयी. "
उन्होंने सरल शब्दों में समझा तो दिया था, लेकिन वह सब इतना सरल कहां था परिशिष्ट को लेकर प्रबंधन में कई दिनों तक लंबी-लंबी बहसें चली थीं. क्योंकि विचार उनका था इसलिए सवाल उन्हीं पर दागे जाते थे, शंकाएं उन्हीं की तरफ उछाली जाती थीं. अगर अलग-अलग विचारधारा वाले लोगों को एक साथ प्रस्तुत किया जाएगा तो पाठक भ्रमित नहीं होंगे? इतनी गरिष्ठ सामग्री कौन पढ़ना चाहेगा? किसी भी अखबार ने ऐसा प्रयोग नहीं किया, बाकी अखबार मालिक नासमझ हैं क्या? और भी न जाने कैसी-कैसी आपत्तियां तब उन्होंने सीधे कहा था कि एक बार उन्हें परिशिष्ट निकालने दिया जाये, अगर पाठक वर्ग स्वीकार नहीं करे तो बंद तो कभी भी किया जा सकता है. उन्हें अपनी योजना पर पूरा भरोसा था. उन्हें लगता था कि हिंदी क्षेत्र को एक ऐसे मंच की जरूरत है जिसमें सभी भिन्न मत वाले लोग एक साथ भागीदारी कर सकें. विभिन्न विरोधी विचारधाराओं वाले लोग किसी भी एक विषय पर अपनी-अपनी राय रख सकें. जब ये विरोधी विचार पूरी प्रामाणिकता के साथ पाठकों के सामने आएंगे तो उन्हें किसी भी समस्या या मुद्दे को उसके समूचे परिप्रेक्ष्य के साथ समझने में आसानी होगी. वह पक्के तौर पर मानते थे कि हिंदी क्षेत्र में ऐसे भी गंभीर पाठक हैं जो सिर्फ सस्ता मनोरंजन ही नहीं चाहते बल्कि सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक विमर्शो को समझना चाहते हैं, उनमें भागीदारी भी करना चाहते हैं. उन्हें जितना भरोसा अपने आप पर था उतना ही भरोसा पाठकों पर भी उन्होंने परिशिष्ट की सफलता के लिए सचुमच अपने आपको इसमें झोंक दिया था, तमाम बाधाओं से लड़ते हुए, व्यंग्य- उपहासों को दरकिनार करते हुए, प्रबंधन को पुनः पुनः समझाते सहलाते
हुए.
"क्या आपके मन में कभी यह खयाल आया था कि जिसे आप अपने खून से सींच रहे हैं, आपको उससे अलग कर दिया जाएगा, आपसे उसका श्रेय तक छीन लिया जाएगा?" पूछते हुए उसकी आवाज भर्रा गयी.
उन्होंने फिर उसके चेहरे को देखा. स्पष्ट महसूस हुआ वह उनसे सवाल नहीं कर रही है बल्कि अपनी निज की पीड़ा को शब्द दे रही है. वह बोले, "जैसे तुम्हें अनुमान नहीं था मुझे भी नहीं था. मैं नहीं जानता था कि जिस परियोजना को मैं खड़ा कर रहा हूं वह एक जिंस बन जाएगी. मैं सोचता था कि विचार की शक्ति पैसे की शक्ति को भेद सकती है, पर मैं गलत था. पैसे की शक्ति विचार की शक्ति को गुलाम बना लेती है, पैसा विचार को विक्रय 'वस्तु बना देता है."
की
जैसे-जैसे परिशिष्ट मजबूत हुआ था, पाठकों के बीच लोकप्रिय हुआ था, अखबार का लैगशिप बन गया था. इसकी लोकप्रियता के चलते मालिक ने उसे कंपनी के प्रोडक्ट बतौर प्रचारित करना शुरू कर दिया था, पी. आर का औजार बना दिया था. यानी यह परिशिष्ट अखबार का परिशिष्ट न होकर कंपनी का ब्रांड बन गया था. ऐसा होने से रोकने की उनकी कोशिश उन पर भारी पड़ गयी थी. अपने रहते दलाल नेताओं-पत्रकारों-लेखकों को उन्होंने परिशिष्ट के पन्नों पर नहीं आने दिया था... बस.
" आपको दुख तो होगा, पश्चाताप भी?" उसने पूछा. वैसा ही पश्चाताप जैसा उसे हो रहा था.
"हां, होता है अपनी नासमझी पर, अपने सारे दिमागी - दैहिक श्रम को एक कंपनी उत्पाद में बदलते देखने पर... अपने नादान भ्रमों पर..." उनकी आवाज भी थोड़ी बोझिल हो गयी, "पीड़ा होती ही है जब हम किसी से प्रभावित होकर अपने आपको उसका मुहरा बन जाने देते हैं, उसे सच्चा मानकर उसके प्रति समर्पित हो जाते हैं... मालिक राष्ट्रभक्ति, समाज कल्याण आदि की ऊंची-ऊंची बातें किया करता था. मैं बातों से प्रभावित हो गया था, एक अच्छा काम कर डालने की खुशी से भर गया था. मगर वह सब बेहद अश्लील छलावा निकला... लेकिन सच कहूं तो वह तकलीफ खत्म हो गयी है. मुझे अपनी और अपने जैसों की नियति समझ में आ गयी है. और परिशिष्ट में मैं ही नहीं और भी लोग जुड़े थे जिन्होंने इसमें अपने-अपने स्तर से योगदान किया था. मैं मानता हूं कि वे सब भी भूल चुके हैं. बेहतर है तुम भी भूल जाओ. "
झुका
इस बार उसने उनकी आंखों में नहीं झांका अपनी नजरें : लीं. उसे भी कब मालूम था कि जिस व्यक्ति के रुतबे पर वह मुग्ध हो गयी थी, उस पर न्योछावर होकर उसने ऊंची उड़ान भरने के लिए जो सुनहरे पंख लगा लिये थे वे उसे जमीन पर ला पटकेंगे. वह किर्च- किर्च बिखर जाएगी, अपना सर्वस्व खोकर दिमाग पर खुद गया है वह दिन जब ऑफिस के चपरासी ने उससे कहा था, 31 कथादेश मई 2026
करने लगी थी, अनुसंधान कार्य करने लगी थी और विशिष्ट व्यक्तियों के साक्षात्कार भी लेने लगी थी. यहां तक कि उसके सहकर्मियों की शिकायतें होने लगीं कि ड्यूटी समाचार डेस्क पर है मगर काम विचार - परिशिष्ट का हो रहा है... शिकायतों और मौखिक चेतावनियों के बावजूद वह परिशिष्ट विभाग में जा पहुंचती थी और अपनी पहुंच के भीतर के बहुत से सवाल उनसे पूछ डालती थी. कभी संतुष्ट होती थी तो कभी खुद को उलझन में पड़ा हुआ महसूस करती थी. वह मुस्कुराते हुए कह देते थे, 'अभी और पढ़ो, जितना पढ़ सको उतना पढ़ो." वह सोचने लगी थी कि आगे कोई अच्छा सा मौका देखकर विचार-परिशिष्ट की टीम में शामिल किये जाने का अनुरोध करेगी उनसे पर आगे तो एक तूफान इंतजार कर रहा था उसका सब कुछ उलट-पुलट कर देने वाला तूफान. उसे लगा चमगादड़ झपट पड़े हैं.
बहुत दिन बाद आना हुआ, सब खैरियत तो है." स्वागत वैसा ही था जैसा हमेशा होता था- 'आओ-आओ,
उसने खोजी नजरों से उनके चेहरे को निहारा कोई भी शिकन ऐसी नहीं थी जो किसी भी असामान्यता का संकेत देती हो, 'कुछ भी ठीक नहीं है, कहते हुए वह उनके तख्त के करीब पड़ी लकड़ी की कुर्सी पर बैठ गयी. साथ ही लगा, चमगादड़ थम गये हैं.
"अब क्या हुआ? कुछ नया ?" वह अधलेटी मुद्रा से निकल बैठने की मुद्रा में आ गये हाथ का अखवार बगल की टेबल पर रख दिया. अब उनके चेहरे पर चिंता की कुछ ईमानदार रेखाएं उभर आयीं. उसे उनकी यह चिंता अपने तई सुखद-सी लगी.
"तो आपके पास निमंत्रण नहीं आया?" उसने सीधा सवाल किया. इस सवाल के साथ उसे अपनी धीस फिर उभरती सी लगी. "कैसा निमंत्रण, किसका कहां से?" वह उत्सुक हुए. "आपके विचार परिशिष्ट के जयंती समारोह का? मीडिया के बड़े-बड़े दिग्गजों के साथ-साथ नेताओं मंत्रियों की बड़ी जमात जुट रही है." उसने बताया.
"तुम्हारे पास बुलावा आया है?" उन्होंने सहजता से पूछा. "मेरे पास? मेरे पास क्यों आएगा?" उसने महसूस किया कि उन्होंने सिर्फ मजाक किया है, बोली, "मैंने तो अखबार में पढ़ा. न जाने किन-किन के नाम दिये गये थे. आपका नाम नहीं दिखा तो सोचा जाकर ही पूछ लूं. आप तो वह अखबार अब पढ़ते ही नहीं." उसने मुस्कुराने जैसा उपक्रम किया.
"ओह, तो तुम यह पूछने आयी हो इस बार ?"
उसने इसका जवाब नहीं दिया, बोली, "जिस इंसान ने विचार- परिशिष्ट को पूरे हिंदी क्षेत्र में स्थापित किया, और उसी को ... मैं देखती थी आपको इस परिशिष्ट में जान झोंके हुए, टीम के साथ लंबी-लंबी बैठकें करते हुए विषय का चयन करते हुए, फिर राजनीतिवेत्ताओं, अर्थशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों, राजनेताओं, विषय विशेषज्ञों आदि की सूची तैयार करते हुए किससे लेख लिखवाना
30 कथादेश
है, किसका साक्षात्कार लेना है, किन-किन बिंदुओं को लेकर रिसर्च करानी है... इन बातों पर तो आप कभी-कभी मेरे साथ भी डिस्कस कर लेते थे ... जब आप मुझे असाइनमेंट देते थे." "मैं तुम्हें बुद्धिमान जो समझता था." उन्होंने हल्का मजाक-सा किया.
अचानक एक शब्द उसकी जुबान पर उत्तर आया, "बुद्धिमान या बुद्धियौनिक?" उसे वर्षों पुराना प्रसंग, शायद तब का जब उसे संपादकीय विभाग से हटाकर मालिक- प्रबंध संपादक के सचिवालय में बुला लिया गया था. और वह पूरी तरह से मोहविद्ध हो गयी। थी. सरापा जुड़ गयी थी अपने स्वामी मुग्धक से अपने इस मुग्धक की प्रतिभा की मुरीद हो गयी थी. उसे इधर-उधर जाने का समय नहीं मिलता था मगर किसी न किसी बहाने परिशिष्ट की डेस्क पर दस्तक दे ही देती थी. तारीफ के पुल बांध देती थी अपने प्रबंधन संपादक की मेघा के. वह ऐसा ही कुछ कह रही थी उस दिन जब इन्होंने कहा था, "तुम बुद्धियौनिक हो.".
"बुद्धियौनिक? यह क्या होता है?" उसने पूछा था. यह शब्द वह पहली बार सुन रही थी.
"बुद्धियौनिक यानी सेपियो सेक्सुअल यानी वह व्यक्ति जिसे मेघा में जबर्दस्त आकर्षण प्रतीत होता है. बुद्धिमान या प्रतिभावान व्यक्ति जिसे अपनी तरफ खींचते हुए लगते हैं, यौन सुख जैसी सुखानुभूति."
"मैं तो आपके पास भी आकर बैठती हूं." उसने कहा था. "तो क्या तुम मुझे बुद्धिमान नहीं मानतीं?"
यह झेंप गयी थी. पर आज क्यों निकला यह शब्द उसके मुंह से? वह बुद्धियौनिक थी या नहीं परंतु वज्रमूर्ख अवश्य थी.
अन्यथा.....
उसने देखा, 'बुद्धियौनिक शब्द सुनकर वह पहले फिर गंभीर हो गये.
मुस्कुराए
उसने उनकी तरफ देखा तो उसके भीतर की बेचैनी फिर उभर आयी, "क्या आपको सचमुच तकलीफ नहीं होती ?"
"तकलीफ होती भी होगी तो अब उसके मायने क्या हैं?" उन्होंने कहा, "लगता है आज तुम कुछ ज्यादा ही परेशान हो. तुम्हें पहले भी कई बार समझा चुका हूं, वह सब भूलने की कोशिश करो, बहुत दिन हो गये, अब तक तुम्हें बाहर निकल आना चाहिए.
था. "
कैसे निकले बाहर? जब भी बाहर निकलने की कोशिश करती है तो तिलमिलाहट होने लगती है, गुस्सा भड़कने लगता है, बदला लेने की न जाने कैसी-कैसी तुकी बेतुकी योजनाएं दिमाग में उफनने लगती हैं. ये बार-बार कहते रहे हैं कि उस परिशिष्ट को मैंने अपने बच्चे की तरह पाला-पोसा था, तो फिर अपने उस बच्चे को ये कैसे भूल सकते हैं. उसने एक बार फिर उन्हें गहरी नजरों से देखा, बोली, "उस विचार परिशिष्ट की नींव आपने ही मई 2026
"मेम साहब आपको बुला रहे हैं. साहब यानी अखबार के मालिक, वह उसे क्यों बुलाएंगे..
.?
उन्होंने फिर उसके चेहरे को देखा. स्पष्ट महसूस हुआ वह उनसे सवाल नहीं कर रही है बल्कि अपनी निज की पीड़ा को शब्द दे रही है. वह बोले, "जैसे तुम्हें अनुमान नहीं था मुझे भी नहीं था. मैं नहीं जानता था कि जिस परियोजना को मैं खड़ा कर रहा हूं वह एक जिंस बन जाएगी. मैं सोचता था कि विचार की शक्ति पैसे की शक्ति को भेद सकती है. पर मैं गलत था. पैसे की शक्ति विचार की शक्ति को गुलाम बना लेती है, पैसा विचार को विक्रय की वस्तु बना देता है."
उसने इस शख्सियत को पहली बार नजदीक से देखा था. आकर्षक देहयष्टि, चेहरे पर दर्प, चमकती सी आंखें जैसे अंदर तक झांक रही हों. उसके कानों से एक भारी भरकम आवाज टकराई, "तुम्हारी शिकायतें मिल रही हैं, तुम अपनी डेस्क पर कम परिशिष्ट की डेस्क पर ज्यादा दिखाई पड़ती हो."
तो उसकी शिकायत हुई थी. उसके भीतर गुस्सा पैदा हुआ. सवाल भी उठा अखबार का मालिक, इतना बड़ा आदमी एक अदनी-सी उप संपादक की शिकायत सुन रहा है? यह काम तो उसका डेस्क प्रभारी कर सकता था, और ज्यादा हुआ तो स्वयं संपादक कर सकता था, मगर मालिक....?
"डरो मत, बैठ जाओ" उस दबंग जैसे व्यक्ति का हाथ सामने की कुर्सी की ओर इशारा कर रहा था. वह बैठ गयी, भीतर से असहज होती हुई. लगा जैसे वह अपने ऊपर से नियंत्रण खो रही हो. इस व्यक्ति का रुआवदार चेहरा जैसे उसे निहत्था किये दे रहा
था.
फिर उसने सुना, “कहा न डरो मत. परिशिष्ट के लिए तुमने जो इंटरव्यू लिये हैं वो मैंने देखे हैं, अच्छा काम किया है तुमने. इंटेलीजेंट हो, इंप्रेसिव पर्सनेलिटी है तुम्हारी. मैं चाहता हूं तुम्हें कुछ बड़ा काम दिया जाये..."
सुनकर उसका डर तो कम हुआ, मगर उससे और क्या-क्या कहा गया, उसने क्या-क्या सुना, कितनी देर तक सुना, दिमाग से फिसलता गया. जो हुआ वह यह कि उसका ट्रांसफर मालिक के सचिवालय में हो गया. लगभग दुगुने वेतन पर परिशिष्ट के लिए काम करने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगा, पर सचिवालय में काम न होते हुए भी इतना काम निकलने लगा कि उसकी सारी फुर्सत खत्म हो गयी. ज्यादातर काम होता था- साहब बुला रहे हैं. बेहद अश्लील छलावा.
उसने अपनी उंगलियां कसमसाई, जैसे कुछ मसल डालना चाहती हो, बोली, "हम लोग इतने कमजोर क्यों हैं? क्यों मजबूर हैं सब कुछ सह जाने के लिए? जो हमारा है हम उस पर भी अपना हक नहीं जमा पाते. हमारा प्रेम, ईमानदारी, क्षमता, भावनाएं क्यों हमारे लिए जाल बन जाती हैं? हम सिर्फ छटपटाते रहते हैं,
निकल नहीं पाते.” उसके भीतर की छटपटाहट अब उसके चेहरे पर उभर रही थी.
पूंजीवाद अलगाव पैदा करता जहां श्रमिकों को उसके श्रम के परिणामों और उत्पादों से अलग कर दिया जाता है. श्रमिक की अपने उत्पाद पर कोई दावेदारी नहीं होती. मुझे लगता है, हम जैसे दिमागी मजदूरों की भी वही स्थिति है. हम जिस उत्पाद में अपना श्रम, अपनी बुद्धि, अपना कौशल, अपनी निष्ठा और भावनाओं को झोंक देते हैं उस बौद्धिक उत्पाद पर हमारा कोई हक नहीं होता. अगर हम उस पर कोई दावा पेश करें तो अपने ही जैसे लोगों के बीच तमाशा बन जाते हैं. हम जिस व्यवस्था में रह रहे। हैं उसका चरित्र है यह "
पर क्या इतना आसान होता है अपना दावा छोड़ना?" वह जानती थी कि वह जो कह रहे हैं वह पूरी तरह सच है, जहरीला सच पर पूछकर जैसे वह अपने तई कहीं से कोई राहत तलाश लेना चाहती थी. जिस पर उसे दावा छोड़ना था क्या यह भी सिर्फ एक उत्पाद था? चीसें उठने लगीं.
"आसान नहीं होता, हमारी मजबूरी होती है, कुछ भी न कर पा सकने की मजबूरी." वह बोले, "तुम्हें याद है जब तुम सचिवालय चली गयी थीं तो मैंने तुम्हें चेताया था. जिस तरह खबरें अफवाहों की शक्ल में उड़ती रहती थीं वही सब तुम्हें बताया था."
बताया तो था. पर तब तो वह सुनहरे पंखों से उड़ रही थी. किसे मिलती है इतने बड़े आदमी की छत्रछाया, किसे मिलता है। इत्ती सी उम्र में इतना पैसा इतना लाड़-दुलार सचिवालय की सारी लड़कियों के बीच जैसे उसे पटरानियत का ओहदा दे दिया गया था. हवाई यात्राएं हो रही थीं, महंगे होटलों का आतिथ्य मिल रहा था, खूबसूरत महंगी भेंट्य वस्तुओं से झोली भर रही थी. अपने कुछ होने के गुरूर में डूब गयी थी वह तब किसकी चेतावनी, कैसी चेतावनी किसे चेतना था तब वह केवल बुद्धियौनिक ही नहीं, धनयीनिक भी हो उठी थी और देहवौनिक भी.
उन्होंने उसके कंधे पर हाथ रखा, "तुम ठीक तो हो न कैसा सवाल पूछा जा रहा था उससे वह कुछ भी नहीं बोली. चुप रही और देर तक चुप रही.
वह उठे. किचन में गये. पानी का गिलास लेकर आये और उसके हाथ में पकड़ाते हुए बोले, "लो पानी पी लो खुद को शांत करने की कोशिश करो."
पानी का गिलास उसने ले लिया. सोचा, अगर पानी पीने से ही कुछ शांत हो सकता तो शायद अब तक वह एक समंदर पी गयी होती. वह थोड़ी प्रकृतिस्थ हुई तो एक सवाल अनायास ही भीतर
"मुझे मार्क्स का एक चर्चित कथन याद आ रहा है कि उग आया. बाहर लाये या न लाये? पर अब तो सब उजागर था
32 कथादेश मई 2026
उन पर उनसे तो पूछ ही सकती थी. बोली, "जब मैं अचानक मुंबई चली गयी थी तो लोग मेरे बारे में कुछ कहते थे? आपने कोशिश की थी मुझसे संपर्क करने की ?"
“पहली बात तो यह कि पहले किसी को मालूम ही नहीं था कि तुम मुंबई गयी हो, मतलब कि तुम्हें मुंबई भेजा गया है. पर अफवाहों के स्तर पर बहुत कुछ था. आखिर किसी लड़की को अचानक कहीं और भेज दिया जाना कोई नयी बात नहीं थी, खास तौर पर सचिवालय की लड़कियों को लोग सामने खड़े होकर भले ही मैम मैम करने लगते हों लेकिन पीछे तो गंदी भद्दी बातें ही होती थीं." उन्होंने कोई विशेष बात कहे बिना अपनी तरफ से जितना कहा जा सकता था, कह दिया था. फिर कहा, "मैंने तुम्हें चार-पांच बार फोन किया, शुरू में तो उठा नहीं, बाद में स्विच ऑफ हो गया. सोचा तुम खुद कॉल करोगी. और मैं सोचता था कि कम से कम मुझे तुम बताकर जाओगी, लेकिन कुछ भी नहीं."
"अब तो आपको मालूम ही है कि मैं किस स्थिति मनःस्थिति में थी. न इतना होश था न हिम्मत थी कि आपके सामने पड़ती या आपसे बात करती." फिर जो
बात वह कई बार उनसे कह चुकी
थी फिर
से
कहने
लगी,
"मुंबई जाकर तो मैं जेल में ही पहुंच गयी थी. सुबह से रात तक कुछ भी अपनी मर्जी से करने की आजादी नहीं. मेरा फोन भी मेरे पास नहीं रहता था. एक दूसरा फोन था जिसका नंबर सिर्फ मेरे मम्मी-पापा को दिया गया था. उनका फोन आता था तो वह औरत पास ही
खड़ी रहती थी कि मैं कोई ऐसी
बात न कह दूं कि कुछ गड़बड़ हो जाये... बस, सब ठीक है, सब ठीक है, यही बोल सकती थी. यही बोलती थी..." उसने कहा.
वैसे भी किसी से कहती तो क्या कहती, क्या बताती कि वह मुंबई में क्या कर रही है. मम्मी-पापा
को
तो वह आज तक कुछ नहीं बता पायी है.
अपनी उस सुविधा संपन्न कैद
में जिस व्यक्ति के फोन का उसे हर समय इंतजार रहता था वह था उसका वह मुग्धक, जिसकी
संदीप
राशिन्द्र
आंधी में वह तिनके की तरह निरस्तित्व हो गयी थी. "कैसी हो, ठीक तो हो? तुम्हारी देखभाल तो ठीक से कर रहे हैं न? परेशान मत होना, सब ठीक हो जाएगा." ये फोन भी शुरू के दो महीने आये थे, उसके बाद लगभग बंद हो गये थे. कमीना, हरामी - दो मोटी गालियां उसके भीतर ही घुट गयीं. नालायक तो वह खुद थी, खुद को ही होशियार समझने वाली बेवकूफ पर उसने तो कोई कपट नहीं किया था, कोई छल नहीं किया था. वह तो जैसे गंगा की तरह सागर में जा समायी थी.
फिर उसने खुद को जैसे भंवर से निकाला, “आपको मैंने पहले नहीं बताया, अब बता रही हूं. मुंबई से लौटकर जब मैं ऑफिस में घुसी थी तो सबसे पहले मैं परिशिष्ट की डेस्क पर गयी थी आपसे मिलने तब तक मैं इतनी हिम्मत जुटा चुकी थी कि आपका सामना कर सकूं, लेकिन वहां की कुर्सी पर कोई और बैठा था. बताया गया कि आपको भी प्रमोट किया गया था परंतु आप छोड़कर चले गये थे. सच बताऊं, मैंने पहली बार खुद को बेहद अकेला महसूस किया था. शायद तभी मैंने भी छोड़ने का मन बना लिया था."
चित्र संदीप राशिनकर
39 कथादेश मई 2026
"मुझे प्रमोट नहीं किया गया था प्रमोट करने के बहाने से हटाया गया था. वैसे, जैसे किसी बाधक तत्व को हटाया जाता है. मुझसे जितना काम लिया जा सकता था ले लिया गया था. परिशिष्ट अब ब्रांड बन गया था, एक आत्मनिर्भर ब्रांड. अब न वहां मेरी जरूरत थी न अहमियत... सो मेरा बोझ क्यों ढोया जाता?" उनके कहने में कोई व्यग्रता नहीं थी. लगा, जैसे कोई शिकायत भी नहीं हो.. उसके साथ भी शायद - बिल्कुल यही हुआ था, उसने सोचा. जब घटनाओं के बीच में थी तब नहीं समझ पायी थी, पर अब जैसे सब कुछ साफ हो रहा है. जो हुआ वह शायद अनायास नहीं था. शायद क्यों, निश्चित ही अनायास नहीं था.
वह मुग्ध हुई नहीं थी उसे
सम्मोहन में बांधा गया था. प्यार
से पोसा गया था कटने जाने वाली बकरी की तरह फिर
निकाल फेंका गया उसे उस सम्मोहन से बाहर जिसे वह अपने जीवन का चमकता संसार मान बैठी थी, सब कुछ भूल बैठी थी जिसके भीतर... उसके मुग्धक ने उसका इस्तेमाल किया था अपने उस एन. आर. आई दोस्त के लिए अब जैसे सारे जाते साफ हो गये हैं... पर क्या करे, कैसे अपनी चीस को रोके, कैसे समझाए खुद को? कोई कैसे उसकी दुग्ध धवल प्रेमानुभूतियों पर ऐसी कालोंच मल सकता है? कोई कैसे उसकी आत्मा के अमृत को निचोड़कर उसे जहर में डुबो सकता है? उसने पूछा, “क्या सचमुच आपको गुस्सा नहीं आता? कोई शिकायत नहीं है?" वह अपने भीतर उबलते गुस्से के लिए जैसे उनका समर्थन चाह रही हो.
वह मुस्कुराए, एक बेहद फीकी-सी मुस्कुराहट, “गुस्सा, आखिर किस पर शिकायत, आखिर किससे? यह हमारी व्यवस्थागत करनी पड़ती है." नियति है जिसे हम स्वीकार न करना चाहें तो भी हमें स्वीकार
तो क्या वह भी स्वीकार कर ले? न स्वीकार करे तो क्या करे? क्या कर सकती है किसी का वह? क्या बिगाड़ सकती है किसी का? जब अपनी शर्मिंदगी की वजह से किसी को कुछ बता तक नहीं पाती तो कानून जैसी किसी बात पर तो सोचना तक संभव नहीं. जब भी वह किसी को जलाने की सोचती है तो खुद जलने लगती है, किसी पर गुस्सा होती है तो वह गुस्सा उसकी तरफ ही बनकर उसे छा लेता है. पलट आता है, बदला लेने की सोचती है तो बदला प्रायश्चित
जब उसने यकायक जाना था कि हर माह जो नियमित होता है। वह नहीं हुआ है तो वह आशंकित हो उठी थी. एक दूरस्थ महिला चिकित्सक के पास नाम छुपाकर जा पहुंची थी. जब आशंका सच साबित हुई तो वह सिहर उठी थी. अगले दिन जब उसने अपने मुग्धक को बताया तो लग रहा था वह चिंतित होंगे और तुरंत इस अवांछित स्थिति से निजात दिलाने का उपाय करेंगे. पर यह खबर सुनकर वह मुस्कुराने लगा था, जैसे उसका मनचाहा हो गया हो. वह हैरत में पड़ गयी थी. शायद उसे चिंता मुक्त करने के लिए थी यह मुस्कुराहट, मुग्धक ने कहा था, "तुम परेशान मत हो, मैं कुछ करता हूँ." कहीं कुछ खटक जाने के बावजूद उसने उन शब्दों में आश्वस्ति खोज ली थी. एक, दो, तीन, कई सप्ताह गुजर जाने के बाद भी उसके मुग्धक के मुंह से यही शब्द बाहर आते रहे- "तुम बिल्कुल परेशान मत हो, मैं इंतजाम कर रहा हूं." दो सप्ताह और गुजर जाने के बाद उसने उभार को छुपाने के लिए अपना वस्त्र विन्यास बदल लिया था. अभी भी पूरी तरह मुग्ध, वशीकृत. फिर एक दिन उसने कहा, "तुम्हारा यहां रहना ठीक नहीं है, मैं तुम्हारा ट्रांसफर मुंबई कर के फ्लैट में रहना है. वे तुम्हारा पूरा ध्यान रखेंगे....". रहा हूँ, वहां तुम्हें ऑफिस भी नहीं जाना मेरे खास दोस्त हैं, उन्हीं
दिलाने के लिए है. खूब ध्यान रखा था उन्होंने निःसंतान दंपत्ति थे. उसने सोचा था, यह सब निश्चित ही उसे अवांछित से मुक्ति
उन्होंने जैसे उसे पलकों पर बिठा लिया था. लेकिन अवांछित से मुक्ति की प्रतीक्षा कर रही थी. फिर उसे बताया कि वह समय सीमा पार हो गयी है, अब सिवाय इसके कि आना है वह आ जाये, अन्य कोई रास्ता नहीं है. यानी इस को छोड़कर बाकी अन्य रास्ते बंद कर दिये गये थे. और वह बेवकूफ कि इसमें भी अपने मुग्धक की सदाशयता ही खाँ रही. मोह पैदा हो गया था उससे जो आने वाला था. मानती कि उसके निश्छल, निर्मल समर्पण का प्रस्फुटन है यह दोन उन्मुक्त प्रेम का प्रतीक. मगर बिना अपने मुग्धक के क्या क वह तो अब फोन तक नहीं कर रहा था.
उन यादों का विद्रूप शायद उसके चेहरे पर उतर रहा था उन्होंने उसे हमेशा की तरह समझाने की कोशिश की, "मैं देख हूं, तुम बहुत विचलित हो रही हो. अब तुम्हें संभलना चाहिए
"जानते हैं, मैं एक बार उस आदमी का कॉलर पकड़ झकझोर डालना चाहती थी, पूछना चाहती थी, क्या अपराध मेरा मेरे साथ क्यों किया ऐसा? तुम पर अटूट भरोसा करन मन-देह से समर्पित हो जाना, तुम्हारी बातों को अंतिम सत्य मा लेना, क्या यही पाप था मेरा?", उसकी आंखें छलक आयीं, उसने तो बात करने तक का मौका नहीं दिया था. तिस सचिवालय की लड़कियों की निगाहें, क्या नहीं था उनमें व्यंग् उपहास, दया. मैं एक हफ्ते भी नहीं ठहर सकी थी." वह जैस अपने भीतर के तूफान से वरवराने लगी थी.
जब भी उसके भीतर ऐसा तूफान उठता है चीसें जाग जाती हैं, चमगादड़ फड़फड़ाने लगते हैं वह आदमी, यह औरत जो उसकी देखभाल कर रहे थे, उस पर लाड़ लुटा रहे थे, जान छिड़का रहे थे, आखिर उसे उसकी असहायता का पूरमपूर अहसास दिलाकर उसके प्रति अपनी भरी पूरी कृतज्ञता जताकर उस जान को ले गये थे जिसमें उसकी जान बस गयी थी. अभी तो उसकी छातियां भी टपकनी बंद नहीं हुई थीं, और वे उसे उससे छीन ले गये थे. फ्लैट में उसे नितांत अकेला छोड़कर यह फ्लैट भी उनका नहीं था. शायद किराये पर लिया था. उसे छोड़ गये थे चीसों और चमगादड़ों के बीच शून्य हो गयी थी वह मगर शून्य भी कहां हो पा रही थी... यह पूछना चाहती थी अपने मुग्धक से- क्या इसीलिए बेऔलाद आदमी-औरत को उसकी टहल को रखा था कि वे उसकी गोद छीनकर अपनी गोद हरी कर लें? अब तो वह जान ही रही है, पूर्व नियोजित था सब कुछ प्रेम से लेकर परिणति तक वह इस्तेमाल हुई थी. उससे जिसे जो पाना था पा चुका था. उसे चूसकर छोई की तरह फेंक दिया गया था. उसकी मुंबई से दिल्ली वापसी के लिए सिर्फ एक ड्राइवर आया था, उसकी टिकट लेकर उसे एयरपोर्ट तक छोड़ने के लिए. उस दिन से वह जिस दुःस्वप्न में प्रविष्ट हुई थी उसमें से आज तक नहीं निकल पायी. उन्होंने फिर कहा, "लंबा अरसा गुजर गया है, तुम्हें अब उबर
34 कथादेश मई 2026
जाना चाहिए."
वह उनकी आंखों में झांकती हुई बोली, “इतने साल हो गये हैं, मुझे पता तक नहीं है वह कहां है, कैसा है." उसके आंसू टपकने टपकने को हो रहे थे.
“एक बात पूछूं", उन्होंने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, "तुम्हारा यह दर्द अपने अंश को खो देने का ही है या अपने स्वत्व को खो देने का भी है यानी स्वयं अपने आपको खो देने का ?"
उसने उनकी आंखों में देखा और समझने की कोशिश की कि वह क्या कह रहे हैं.
वह फिर बोले, "देखो, हम जैसे लोग जिंदगी के अखबार के सिर्फ परिशिष्ट होते हैं अखबार नहीं होते, सिर्फ उसे उठाने और विश्वसनीयता प्रदान करने की अतिरिक्त सामग्री मात्र. हम अभिशप्त होते हैं उन धनभक्षियों को अपना खून पिलाने के लिए जो अपनी
स्वार्थ सिद्धि की खातिर हमारी झोली में दो-चार मनचाहे अवसर, दो-चार अतिरिक्त सुविधाएं डाल देते हैं, हमारी अपनी महत्वाकांक्षाएं, महत्वाकांक्षाओं की सिद्धि में मिली दो-चार टुच्ची-सी सफलताएं, कुछ पुरस्कार-प्रशस्तियां हमारे भीतर कुछ होने का भ्रम पैदा कर देती हैं। पर असल में हम कुछ भी नहीं होते. हर कदम सही होते हुए भी हम गलत सिद्ध होते जाते हैं, अपने सरोकारी मानवीय कर्मों को लेकर भी पश्चाताप संताप से घिर जाते हैं. और जो कुछ हम खो बैठते हैं।
उसे
दुबारा
पाने के रास्ते भी नहीं होते हमारे पास."
विमांशु दिव्याल
'हंस', 'सांचा', 'संडे मेल' आदि के
संपादकीय विभागों में रहने के अलावा
दूरदर्शन के समाचार प्रभाग में कार्य किया. राष्ट्रीय सहारा अखबार के स्थानीय संपादक एवं वैचारिक परिशिष्ट 'हस्तक्षेप' के प्रवर्तक प्रभारी
रहे.
सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर
एक हजार से अधिक लेख 'गाथा लंपटतंत्र की', 'कोई कनुजा क्या करे', 'पिंजरे परिंदे' आदि उपन्यासों और कुछ नाटकों के अलावा 'तंत्र और अन्य कहानियां', 'अब मत आना किन्नी',
'ब्लू फिल्म', 'प्रतिनिधि प्रेम कहानियां' और 'लल्लू लाल की रुपैया कहानी संग्रह प्रकाशित 'सारिका', 'धर्मयुग', 'कादम्बनी', 'नवनीत', 'रविवार' से लेकर 'हंस', 'कथादेश' आदि प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में कहानियों का प्रकाशन. आकाशवाणी मथुरा और
दिल्ली से अनेक कहानियां प्रसारित कुछ कहानियों पर लघु फिल्में. गजल संग्रह 'माफ कर मेरी कलम'.
सम्पर्क मो. 9873401064, 9899274439 E-mail: vibhanshudivyal@gmail.com
उसने गहरी नजरों से उन्हें देखा, "आखिर आप कहना क्या अपने जैसे लोगों के सहयोग संगठन के बल पर करना चाहिए,
चाहते हैं?"
वह बोले, “कहना यह चाहता हूं कि हमारे पास सिवाय इसके कुछ नहीं बचता कि जिंदगी ने जो सिखाया है उसे समझें और
कदम-कदम मिलने वाले प्रलोभनों से बचकर यहीं करने का प्रयास कर रहा हूं मैं."
वह बोली, "तो आप कहना चाहते हैं कि हमें अपने प्रति हुए अपने भीतर के सारे ताप - पश्चाताप से उबरकर आगे का रास्ता धोखे का अन्याय का, अपराध का कोई प्रतिकार नहीं करना
तैयार करें. तुमसे भी यही कहता हूं कि जिसे भूल जाना चाहिए चाहिए, सब कुछ सह जाना चाहिए ?" उसे भूल जाओ, व्यवस्थित करो जिंदगी को, कोशिश करो अपने आपको फिर से पाने की. "
"चाहती तो मैं भी यही हूं पर कैसे भूलूं वह सब? जो मेरे साथ हुआ उससे क्या सीखूं, क्या रास्ता बनाऊं आगे के लिए? और बताइए, आपने ही क्या सीखा, क्या रास्ता बनाया अपने लिए?" वह सीधे उनकी आंखों में झांक रही थी.
"मैंने?" वह बोले, "मैंने बहुत कुछ सीखा है. पहली बात तो यह सीखी कि किसी भी क्षुद्र व्यापारी की भ्रष्ट पूंजी के बल पर आप कोई पवित्र वैचारिक अनुष्ठान पूरा नहीं कर सकते. दूसरी बात यह सीखी कि जो भी बड़ा-छोटा व्यापारी समाचार-विचार के किसी उद्यम में निवेश करता है तो उसका पहला लक्ष्य इस उद्यम
के जरिए संपर्क संबंध बनाकर अपने धंधे की सुरक्षा और विस्तार का होता है न कि समाचार-विचार की गरिमा को सुरक्षित रखने का. तीसरी बात यह सीखी कि अगर हम जैसे लोग वैचारिक दुनिया में कुछ सकारात्मक करना चाहते हैं तो हमें अपने बूते पर
का
वह बोले, "ऐसा मैंने कब कहा सवाल हमारी अपनी सीमाओं
है, अपनी कमजोरियों का है, अपनी विवशताओं का है. हम इन्हीं के चलते शिकार हो जाते हैं और हमें पता तक नहीं लगता.. अगर हिम्मत है आपके अंदर तो आपको कौन रोकता है प्रतिशोध लेने से या चीजों को बदलने से लेकिन जब आप निरुपाय हों, किसी पर थूकने तक ही हैसियत में न हों तो दिल-दिमाग को जलाने से बेहतर है कि स्वयं को सम पर लाया जाये, किसी दूसरे के अपराध की सजा स्वयं को न दी जाये और जिंदगी को नये अनुभवों के दायरे में फिर से एक मौका दिया जाये."
वह रोना चाहती थी पर उसने महसूस किया जैसे उनके शब्दों की आंच उसके भीतर फैल रही हो, जैसे उसके आंसू भाप बन रहे हों, भीतर कहीं कुछ दहकने सा लगा हो, वह सचमुच थूकना चाहती थी, थूकने की हिम्मत तो जुटा ही लेना चाह रही थी.. उसकी आंखों के आगे एक चेहरा उभर ही रहा था.
35 कथादेश मई 2026
कहानी
ओक का पेड़
प्रदीप श्रीवास्तव
अभीच में छोड़ ये कुछ देर खांसता ही उन पल को चुकी थी. जुने दाते अटे एक वे
भीना बेगम की खांसी का दौरा शुरू हो गया था, बोलना बेटियां, दोनों दामाद और एक बेटा था, बेटे की शादी भी त
कुर्सियों पर बैठे इर्द गिर्द खड़े सभी लोग खांसी की तकलीफ से उनके बनते बिगड़ते चेहरे को चुपचाप, बेबस बने देख रहे थे. कोई बावजूद कई बार अपनी तकलीफें खुद ही उठानी पड़ती हैं. कुछ कर भी तो नहीं सकता. जिदंगी में सभी अपनों के होने के
बिस्तर के सिरहाने बैठी अमीना बेगम की बड़ी बेटी जुनैदा कभी उनके सन की तरह सफेद हो चुके बालों को, कभी उनके सीने को हल्के हाथों से सहला रही थीं. एक मिनट में खांसी का बाएं हाथ की कोहनी का सहारा ले थोड़ा उठीं, पलंग के बाईं तरफ यह दौरा शांत हो गया. खांसी के शांत होते ही अमीना बेगम अपने नीचे रखे पीकदान को दाहिने हाथ से पकड़ उसमें छाती से मुंह तक आ पहुंचे बलगम को निकाला, फिर आराम से लेट गई. उस पीकदान को वे किसी को छूने नहीं देतीं, कितनी ही तकलीफ में क्यों ना हों. अस्थमा की उनकी यह तकलीफ पांच छह महीने पहले ही उमरी थी, लेकिन बगैर समय दिये अजगर की तरह उसने जिस का डॉक्टर भी हैरान था. अस्थमा के किसी मरीज को उसने इतने तेजी से अमीना वेगम को अपनी गिरफ्त में लपेटा उसे देख गांव कम वक्त में इस तरह टूटते नहीं देखा था. सालों तक लोग इस कि अब्बा के गुजरने के बाद चूंकि अम्मी भीतर से टूट चुकी थीं, बीमारी के साथ जिदंगी बिता लेते हैं. उनके बच्चों का मानना था जद्दोजहद के बावजूद महीने भर पहले अमीना बेगम को बिस्तर इसलिए अस्थमा के हमले को वे झेल नहीं पाई. तमाम इलाज पकड़ना पड़ा. इस तरह की लाचारी ख़ुदा किसी को ना दे, वह अकसर अपने आप में बड़बड़ाती रहतीं. दरअसल बीमारी के पहले वे नौकर चाकर के रहने के बावजूद भरसक एक गिलास पानी तक कष्टप्रद थी. किसी से नहीं मांगती थीं. उनकी जैसी मजबूत महिला के लिए बिस्तर पर बेकार पड़े रहने की स्थिति बीमारी से कहीं ज्यादा
अनवर के कुल जमा चार बच्चे थे. शकील लंदन में और अन दुबई में अपने परिवार के साथ बस गए थे. इन चारों बच्च अनवर की बेटी फातिमा सबसे छोटी थी. हांलाकि वह भी चा साल की हो चुकी थी. खांसी का दौरा उठने के पहले अमीना बे अपने नाती, पोते, पोतियों से मुखातिब थीं, वे उन्हें गांव उन्न दादा जी के बारे में तफ्सील से बता रही थीं. अमीना बेगम = सुनाई जा रही खानदानी कहानी को ये सभी नौजवान छोटे बच्च की ही तरह दिलचस्पी से सुन रहे थे.
खांसी का आवेग खत्म हो चुका था, कमरे में कुछ संकेड के लिए खामोशी छाई रही. कमरे में पसरी इस खामोशी के बीच अमीना बेगम की तेज चलती सांसों की आवाज सुनाई दे रही थी. उनकी तबियत देख सभी उनके आराम के लिए कमरे से निकलना चाहते थे. लेकिन अमीना बेगम ने हाथ के इशारे से उनको रोक रखा था. अनवर से नहीं रहा गया. उन्होंने पंलग की पाटी को दोनों हाथ से पकड़ अमीना वेगम की तरफ झुकते हुए धीरे से कहा-
"अम्मी आपकी तबियत ठीक नहीं है. डॉक्टर ने ज्यादा बोलने से मना किया है, खांसी फिर से उठ सकती है. अभी आराम कीजिए आपकी खांसी जब स्थिर होगी तो बच्चे आ जाएंगे."
अनवर हुसैन अमीना बेगम की तीन संतानों में सबसे छोटे थे. ज्यादा सटे थे. पचास साल की उम्र हो चुकी थी. 'पेट पोंछना' थे, इसलिए मां से
"यह कम्बख्त खांसी अब तो मेरी जान के ही साथ ही जाएगी अनवर मियां." अमीना बेगम ने संयत स्वर में एक बार फिर आहिस्ते आहिस्ते बोलना शुरू किया- "मैं आप लोगों को नहीं, आप लोगों के बच्चों से बात कर रही हूं. मैं उन्हें उनके खानदान, उनके दादा जी के बारे में बता रही हूं. ये बच्चे कितना भी बाहर पढ़ लिख लें, नौकरी कर लें, वहां अपनी जमीन जायदाद बना लें, लेकिन अनवर मियां उनकी जड़ें इस नोहटी गांव में ही धंसी हैं. इन्हें अपनी जड़ों का जब तक पता रहेगा, जमाने की कोई भी आंधी इन्हें उड़ाकर इधर-उधर नहीं ले जा पाएगी. इन बच्चों को अपने पुरखों का पता रहेगा तो शहर में, विलायत में कहीं भी रहें, 36 कथादेश मई 2026
अमीना बेगम ने खांसी पर काबू पा लिया था, लेकिन उनका सीना किसी धौंकनी की तरह अभी भी ऊपर नीचे हो रहा था. वहां मौजूद सारे लोग शांत थे. इनमें अमीना बेगम के बेटे बेटियों के बच्चे भी थे. वे बच्चे कोई छोटे बच्चे नहीं थे. इनमें जुनैदा की दो
इन्हें इस बात का फख
रहेगा
कि वे किस खानदान से जुड़े
हैं, उनकी
रंगों में परवेज
हुसैन
जैसे
कद्दावर इंसान का लहू
दौड़ रहा है. इससे इन
सबको
नेक रस्ते पर
चलने
की
नसीहत
मिलेगी. उनकी यह समझ आज की दुनिया में इन्हें
हर चुनौती का मुकाबला करने का भरोसा देगी."
अनवर या उनके भाई बहन के पास अमीना
चित्र: संदीप राशिनकर
बेगम की इन बातों का प्रतिकार करने, उनको जबाब देने का साहस नहीं था. वे अपने पिता परवेज हुसैन की
संदीप
हुसैन खानदान की फेहरिस्त में शामिल हो
गई. उस समय वे केवल सोलह साल की थीं. अमीना बेगम वैसे परवेज हुसैन की खाला की बेटी थीं. उनके अब्बा
छुट्टियों
गांव जब
अपने
में जौनपुर भी आते, सास
ससुर से मिलने नौहटी
जरूर जाते थे. ऐसी ही
एक मुलाकात में परवेज हुसैन और अमीना बेगम का रिश्ता तय हुआ था.
परवेज हुसैन
मिर्जापुर के एक कालेज में लेक्चरर
थे, शमशेर हुसैन को अपनी पढ़ी लिखी बेटी के लिए इसलिए भी रिश्ता पसंद आया.
शख्सियत से पूरी तरह वाकिफ थे. उन्हें इस बात का पूरा अहसास यह था कि लंदन, दुबई में करोड़ों रूपए वे भले कमा लिए हों, इन पैसों की वजह से गांव में थोड़ी बहुत उनकी भी हैसिएत भले बन गई हो, लेकिन आज भी नौहटी और अगल बगल में उनकी पहचान उनका सम्मान उनके वालिद परवेज हुसैन के बेटे होने की वजह से ही है.
अमीना बेगम जिस खानदान के बच्चों से बात कर रही थीं, वह उनका पैदाइशी खानदान नहीं था. व्याह के बाद बहू बनकर जब नौहटी आई, हर विवाहित बेटी की तरह उनका गांव खानदान भी बदल गया. उनका बचपन तो नैनीताल के पहाड़ों पर बीता था. उनके वालिद शमशेर हुसैन थे तो जौनपुर के, लेकिन अपनी शादी के बाद अपनी बीबी के साथ नौकरी करने वे कभी नैनीताल गए थे, फिर वहीं बस गए. कुछ समय तक नौकरी करने के बाद नैनीताल में शमशेर हुसैन ने अपना धंधा शुरू किया. बेकरी की दूकान खोली. बेकरी का बिजनेस चल निकला पैसा आया तो नैनीताल से बीस किलोमीटर पर स्थित महेश खास में दो नाली जमीन खरीदी, उस पर मकान बनवाया. तब तक उनके चारों बच्चे हो गए थे. इन बच्चों में अमीना बेगम इकलौती लड़की थी, सबसे छोटी. लाड़ प्यार देने के साथ अमीना बेगम को बेहतर तालीम
दिलाने की खातिर शमशेर हुसैन ने नैनीताल के एक अंग्रेजी स्कूल में उनको दाखिला दिलाया. अमीना बेगम ने वहां से हाई स्कूल तक की पढाई की. आगे पढ़ना चाहती थीं पर शमशेर हुसैन ने जान पहचान का अच्छा लड़का देख उनका निकाह परवेज हुसैन से कर दिया. इस तरह साठ साल पहले अमीना बेगम परवेज हुसैन की ब्याहता वन नैनीताल से गाजीपुर के नीहटी गांव आ गई, जौनपुर के हुसैन परिवार की लिस्ट से निकलकर वे नौहटी के
अमीना बेगम पैदाइशी सुंदर थीं, पहाड़ों की आबोहवा के असर से जवानी में उनकी खूबसूरती और निखर गई. छिहत्तर साल की उम्र तक पहुंचते पहुंचते खाल ने हड्डियों को जगह जगह से भले छोड़ दिया हो पर आज भी उन्हें देखकर कोई जवानी के दौर की उनकी खूबसूरती का अंदाजा आसानी से लगा सकता है. बहरहाल, परवेज हुसैन पर भी अमीना बेगम की खूबसूरती से ज्यादा उनकी पढ़ाई का असर पड़ा था. उस समय नौहटी, अगल बगल दूसरे गांवों में लड़कियों की तालीम को जरूरी नहीं समझा जाता था. ज्यादा से ज्यादा गांव की प्राइमरी स्कूल से लिखना पढ़ना सीख लिया, उतना ही बहुत था. मुस्लिम परिवार की लड़कियों के लिए तो आमतौर पर यह भी मुमकिन नहीं था. चूंकि प्राइमरी स्कूल में लड़के भी जाते थे, इसलिए उनके घर वालों को दिक्कत थी. उन लड़कियों को मस्जिद जाकर मौलवी साहब से उर्दू-फारसी सीखने, कुरान हदीस को पढ़ने तक की छूट जरूर मिल जाती थी. ऐसे में टीचर की नौकरी कर रहे परवेज मियां को वालिदान की तरफ से तय की गई शादी में बतौर पत्नी अंग्रेजी स्कूल से हाई स्कूल पास लड़की मिल गई, इसे उन्होंने ऊपर वाले की एक बड़ी नियामत माना.
पहाड़ और मैदानी इलाकों के मौसम में ही नहीं, रहन सहन, खानपान में भी काफी अंतर होता है. उस पर से परवेज हुसैन जैसे शौहर का तौर तरीका, जीने का ढंग भी आम लोगों से कुछ अलग था. उस छोटी सी उम्र में अमीना वेगम ने एकदम से बदले इस माहौल को बड़ी तेजी से अपनाया, माहौल के साथ शौहर के जनून, सामाजिक सरोकार के साथ भी खुद को जोड़ लिया. जिदंगी भर उनका साथ दिया. शहर में नौकरी करते रहे तब, और जब
37 कथादेश मई 2026
परवेज मियाँ रिटायर होने के बाद गांव रहने लगे उस समय भी. परवेज हुसैन के इंतकाल के बाद बच्चों ने जब जोर दिया कि गांव छोड़कर वे उनके साथ चलें तो उन्होंने परवेज हुसैन के नाम को आगे कर गांव छोड़ने से मना कर दिया. दोनों बेटे, जो विदेश में थे, उनसे अमीना बेगम ने साफ कह दिया जिस गांव और घर में वे अभी तक अपने शौहर को साथ रह रही थीं, जहां परवेज साहब की रूह बसी है, उस जगह को वे छोड़कर जा ही नहीं सकतीं. यहां उनकी डोली आई थी, वहीं से उनकी मैय्यत जाएगी. ऐसे मौका पर हर बार अपने बच्चों को दो टूक लहजे में समझा देती." मेरी चिंता ना करो तुम लोग जब तक जिंदा हूं, बाकी जिदंगी अब यही बीतेगी, मौत के बाद मुझे परवेज मियां के बगल में दफन कर देना. बस यह दुआ करो कि मेरे हाथ पांव को मौत के आने के पहले तक अल्लाह ताला दुरुस्त रखे.'
बड़ी बेटी जुनैदा का ब्याह नौहटी से चालीस मील दूर खजरी गांव में हुआ था. अब्बा के गुजरने के बाद अमीना बेगम की मिजाजपुर्सी के लिए वह अकसर माएके चली आती, मां के साथ कुछ दिन रह जाती. अमीना बेगम के बिस्तर पकड़ने के बाद उनकी तबियत जब ज्यादा बिगड़ने लगी तो जुनैदा ने दोनों भाइयों अपने बेटे बेटियों को एक सी खबर भेजी "अम्मी की तबियत है तो तुरंत आ जाओ." बेहद खराब है, दुनिया से उनके रुखसत होने के पहले उन्हें देखना
ज्यादा उम्र हो जाती है तो इनसान कितना ही स्वस्थ क्यों ना हो, उसको पकड़ने के लिए फरिश्ते मौत के किसी बहाने को जन्म दे देते हैं. इस उम्र में इस तरह से अस्थमा का अटैक ऐसा ही एक बहाना है, सभी यह समझ रहे थे. वैसे परवेज हुसैन ने भी अपनी पूरी जिंदगी तकरीवन जी ली थी. पचासी ईदें देखी थीं. पच्चासवीं यानी अपनी अंतिम ईद की शाम को वे मस्जिद से नमाज अता कर घर आए थे. घर आने के दो घंटे बाद नौहटी, उसके चारों तरफ यह खबर फैल गई कि परवेज हुसैन अब नहीं रहे. नेक इंसान थे, कभी किसी का बुरा नहीं चाहा, जिदंगी भर गांव के भले के लिए लगे रहे, इसीलिए चलते फिरते वगैर किसी तकलीफ के गुजर गए, गांव वाले उन्हें दफनाने के बाद उनकी अचानक हुई मौत को लेकर इसी नतीजे पर पहुंचे. परवेज हुसैन के इंतकाल के पांच साल बीत चुके हैं, लेकिन आज भी नोहटी ही नहीं, मुहम्मदाबाद तहसील के कई गांवों में बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक परवेज हुसैन का नाम बड़े सम्मान से लेते हैं.
"मैं क्या कह रही थी आप लोगों से?" अमीना बेगम ने सिर घुमाकर अनवर के पीछे खड़े शकील के बेटे ईशान से पूछा.
"नोहटी गांव के बारे में दादी मां." वह तुरंत बोला.
"हां मैं बता रही थी बेटा जब मैं नैनीताल से यहां आई तो बहुत छोटी थी. केवल सोलह साल की. में और पढ़ना चाहती थी लेकिन मेरे वालिद नहीं माने. तुम लोग के दादा जी उस समय
मिर्जापुर में टीचर थे. निकाह के पहले भी नोहटी एक दो क अब्बा और अम्मी के साथ में आ चुकी थी. तब बहुत छोटी पूरा गाजीपुर जिला पिछड़ा माना जाता था, वह गांव भी उसी तम था. तुम्हारे दादा जी के अब्बा इस गांव के रसूखदार लोगों में गि जाते थे. लेकिन यहां लाइट नहीं थी, पानी पीना हो, नहाना हो हैंडपंप चला के पानी भरना होता था. जहां से आई थी वहां लाइ पहले ही आ चुकी थी. फिर वहां का मौसम एकदम अलग. लेकिन चूंकि पढ़ाई लिखाई में शुरू से शौक रहा, मैं इस बात से खुश कि एक टीचर से मेरी शादी हुई है. वह भी किसी मदरसे के मास्ट से नहीं. फिर मुझसे अब्बा ने पहले ही कह दिया था कि गांव में रहना नहीं है. रहना मिर्जापुर शहर में है. मिर्जापुर में भी तुम्हा दादा जी की इज्जत थी. उस समय तनखा भले ही कम हो बेटा लेकिन स्कूल कालेज के टीचरों की समाज में इज्जत होती थी.
अमीना बेगम ने एक बार फिर से बगावत कर रही अपनी सांसों को संयत किया. कुछ देर सुस्ताने के बाद उन्होंने अपनी बात जारी रखी- "मिर्जापुर के जिस इंटर कालेज में वे थे, वह बहुत बड़ा कालेज था, तकरीबन एक हजार लड़के पढ़ते थे वहां कई मास्टर थे, चपरासी थे. जिले के कलेक्टर, बड़े अधिकारियों क बेटे भी वहीं पढ़ते थे. जब मैं वहां गई उसके पांच साल बाद ये उस कालेज के प्रिंसिपल बन गए तब मेरी उम्र इक्कीस साल की ही थी. इस उम्र में उन्होंने मुझे रानी बना दिया था. सुबह शाम चपरासी खाना बनाने आते थे. शहर के बड़े बड़े लोगों के यहां आना जाना था. एक महिला क्लब बना वहां जिसमें में भी थी. उस क्लब में शहर के जाने माने लोगों की पत्नियां थीं. पुलिस कप्तान की पत्नी उस क्लब की प्रेसीडेंट थी..." अमीना बेगम पुराने समय में पहुंच चुकी थीं. उनके चेहरे पर अचानक से आई चमक से पता चल रहा था कि अतीत की यादें उन्हें सुकून पहुंचा रही हैं.
इसके बाद वे बोलती रहीं. खाँसियों का दौरा नामालूम कैसे गायब हो चुका था. सभी यह सारा कुछ देख हैरान थे. ऐसा लग रहा था जैसे उन्हें कहीं से नई ऊर्जा मिल गई हो. लेकिन नाती पोतों की हैरानी का सबब कुछ और था. वे बस इतना जानते थे कि दादा जी प्रिंसिपल थे पहले यह नहीं जानते थे कि गांव में रहने वाली उनकी बूढ़ी दादी मां के भी उन दिनों जलवे थे. उस समय भी क्लब था, वह भी महिलाओं का दादी मां मुस्लिम होने के बावजूद उसमें शिरकत करती थीं, उनका भी मान सम्मान शहर में था.
"तुम लोगों के दादा जी बहुत ही नेक इंसान थे. मिर्जापुर में तो उनकी इज्जत थी ही, गांव में भी यहां के लोगों के लिए उन्होंने जो मेहनत की, जो समय दिया, जो तकलीफें उठाई, उनकी मिसाल यहां उनके इंतकाल के बाद आज भी लोग देते हैं. वे पहाड़ की तरह नहीं बल्कि पहाड़ की पथरीली चट्टानों को तोड़कर बाहर निकले एक विशाल 'ओक के दरख्त की तरह थे."
कहते-कहते अमीना बेगम चुप हो गई. बोलने के साथ ही उन्हें
S8 कथादेश मई 2026
यह लग गया कि ये बच्चे ओक के दरख्त के बारे में शायद ही नाम किस की सलाह से रखा गया यह तक याद है. जानते हों.
"तुम सबने 'ओक का दरख्त नहीं देखा होगा. ये पहाड़ों पर होते हैं. पर सब पहाड़ों पर नहीं. हमारे नैनीताल में हैं. दो सौ साल से भी ज्यादा पुराने मिल जाएंगे."
"वहां लोग इसे 'बाझ' कहते हैं. यह दरख्त देवदार, चीड़ के पेड़ों से अलग होता है. धूप बारिश, बर्फ सभी आपदाओं को ये सहते हैं, अपने वजूद को मजबूती से टिकाए रखते हैं. ये पहाड़ के दूसरे दरख्तों की, वहां पर रहने वाले लोगों की जिदंगी बचाने के लिए बारिश और बर्फ के पानी को सोख लेते हैं. ओक के इन दरख्तों से पहाड़ी जमीन को समय समय पर गर्मी के मौसम में भी पानी मिलता है. झील के पानी सूखने नहीं पाते. झील और पहाड़ों के भीतर मौजूद पानी से ही पहाड़ के दूसरे पेड़ पौधों, इंसानों की जिंदगी चलती है."
जुनैदा, शकील, अनवर, परवेज हुसैन के सभी बेटे बेटियों ने ओक का नाम और उसकी महानता की बात तो मां से अपने बचपन में कई बार सुन रखी थी, लेकिन उन्होंने अम्मी को इसके पहले कभी ओक की मिसाल से अब्बा की शख्सियत को जोड़ते नहीं सुना था. उनके बच्चों ने तो पहली बार यह जाना ही कि पहाड़ों पर ओक नाम का कोई खास दरख्त होता है, पहाड़ों पर पाए जाने वाले चिनार, देवदार, सागोन जैसे पेड़ों से अलग. फिर दादा जी ओक की तरह थे, सुनकर थोड़ा चकराए भी.
"तुम लोगों के दादा जी ओक जैसे ही थे" अमीना बेगम ने बच्चों के मन में चल रहा ऊहापोह को जैसे समझ लिया था "ओक की तरह दूसरों के भले के लिए अपने शरीर में सभी तकलीफों को झेल लेते थे. ओक के दरख्त की तरह तमाम जिंदगी मजबूती से खड़े रहे लोगों की भलाई के लिए काम करते रहे. जब नौकरी में थे, उस समय भी उन्होंने नौहटी और आस पास के लोगों की तकलीफों की, गांव की सुविधाओं का ध्यान
रखा."
"मिर्जापुर से हम लोग, गर्मी की छुट्टियों में जब भी गांव आते, वे गांव के नौजवानों को लेकर नाले, पोखरे, गलियों के रास्तों को ठीक करने लिए 'श्रमदान का काम शुरू करते. इस गांव में हिंदू और मुसलमानों की आबादी तकरीबन बराबर है. उनके साथ इन कामों में हर मजहब के हर बिरादरी के लड़के हिस्सा लेते थे. इन लोगों को लेकर पचास पचपन साल पहले उन्होंने नौजवानों का एक संगठन बनाया. एक हरिजन लड़के की सलाह पर उसका नाम 'नवयुवक मंगल दल' रख लिया गया. तब से लेकर आज तक नौजवानों की दो पीढ़ी गुजर गई पर 'नवयुवक मंगल दल का वजूद अभी भी है..."
"ईद मिलन हो, होली मिलन हो, दीवाली में नाटक खेलना हो, यह सब नवयुवक दल की सरपरस्ती में होने लगा.... तुम्हारे दादा जी हर इन मौकों पर किसी भी हालत में मिर्जापुर से गांव आ जाते थे. जुनैदा शकील, अनवर... सभी छोटे थे, लेकिन सभी को साथ लाते. इनकी पढ़ाई का भले नुकसान हो. वैसे दीपावली में जब दो दिन का नाटक होता था तो उस समय गांव ही नहीं अगल बगल के गांवों की भीड़ जुट जाती थी... औरतें तो नाटक देखने टूटकर आतीं... मर्दों और औरतों की बैठने की व्यवस्था अलग होती थी. परवेज हुसैन की बीवी थे हम, इसलिए मेरे और बच्चों के लिए नवयुवक दल के वालेंटियर आगे जगह रखे रहते. हांलाकि हम सभी को जमीन पर ही बैठना पड़ता था."
"जब तक जिंदा रहे, नवयुवक दल के अध्यक्ष बने रहे. मैं कई बार मजाक में कहती भी थी कि नवयुवक दल के मुखिया रहकर बूढ़े से जवान नहीं बन जाओगे." कहते हुए अमीना बेगम मुस्कराई, "दीपावली में जब भी गांव आना होता था, हमारा झगड़ा एक बार जरूर होता. नाटक में स्टेज तैयार करने के लिए वे मेरी साड़ी, चुन्नी, घर की बेडशीट उठा लाते थे. एक बार तो फोन भी उखाड़कर लेते आए नाटक में दरोगा का रोल था, अब बिना फोन के थानेदार काम कैसे करता. "
कहते कहते इस बार वे कसकर हंसी. बेटे, बेटियां, नाती-पोते सभी ने उनकी हंसी में साथ दिया. हांलाकि अनवर डर गए. हंसी से अम्मी की खांसी ना उठ जाए. वैसे भी वे उनके इस लगातार बोलने से तनाव में थे. लेकिन अमीना बेगम का उत्साह और उनके चेहरे पर आई रौनक को देख उनमें इतना साहस नहीं बचा था कि वे उन्हें चुप रहकर आराम करने को कहें.
"रिटायर होने के बाद तो उन्होंने पूरा समय इसी सब में बिताया. शहर में कहीं कोई मकान नहीं बनवाया था. सीधे गांव आ गए. जब कि बच्चों उस समय के गांव आज की तरह नहीं थे. शहर की कोई सुविधा यहां नहीं थी. "
"उस समय उनकी पेंशन भी काफी कम थी, अनाज भी ज्यादा नहीं बिकता था, बच्चे हास्टल में थे, बच्चों के निकाह में पैसे की जरूरत होती, लेकिन जो कुछ भी पैसा बचता, वे इन सब कामों में बांट देते थे. उनके इंतकाल के बाद भी लोग होली, ईद, दीपावली, नवयुवक दल के लिए चंदा मांगने आते हैं और मैं देती हूं. उनकी आधी पेंशन जो मिलती है. कई बार उन्हें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा. लेकिन हार नहीं मानी. ताजिया के आलम तो हमारे दरवाजे पर आकर आधा घंटा रुके ही रहते, होली में नाथ मंडली भी शाम को हमारे दरवाजे पर आती. देर तक जोगिड़ा होता. गांव के कुछ लोगों को बुरा लगता. खासकर यहां के कुछ भूमिहारों लोगों को ज्यादा तकलीफ होती थी. मजहब के नाम पर बांटने और इनके खिलाफ भड़काने की कोशिश की गई. 99 कथादेश मई 2026
अमीना बेगम के आसपास मौजूद सभी वही सोच रहे थे कि इतने दिनों बाद बीमारी की इस हालत में, इस उम्र में, उनकी यादाश्त पूरी तरह काम कर रही हैं. उन्हें 'नवयुवक मंगल दल का
लेकिन ऐसे मौकों पर उन रसूखदार हिंदू जमात के लौंडे इनके लिए अपने बाप से बगावत पर उतारू हो जाते. फिर... अचानक अमीना बेगम चुप हो गई. उन्हें लगा कि ये सब सियासी बातें वे बच्चों से क्यों करने लगी.
लेकिन अमीना बेगम की बातों में उनके नाती पोतों की दिलचस्पी बढ़ती जा रही थी. सभी बड़े ध्यान से उनकी बातें सुन रहे थे. बड़े थे, समाज सेवा क्या होती है वे जानते थे. पहली बार उन्हें परवेज हुसैन की पूरी शख्सियत का अंदाजा हो रहा था. हैरानी के साथसाथ उन्हें अपने दादा जी पर फख हो रहा था. यानी अमीना बेगम जो चाहती थीं वह हो रहा था.
"फिर क्या हुआ नानी जी?" जब अमीना बेगम की चुप्पी की मियाद कुछ ज्यादा हुई तो किसी ने पूछ लिया. जुनैदा चौंकी, पूछने
वाला उनका दामाद था.
"बेटा रिटायर होने के बाद उन्होंने पहला काम किया गांव में पोस्ट आफिस खुलवाया. इसके बाद एक दिन घर में बिना किसी के कुछ कहे जूनियर हाई स्कूल खोलने के लिए अपने आम के एक बगीचे की जमीन दान में दे दी. "
ना जाने क्या हुआ अपने चचाजात भाइयों के साथ खड़ी फातिमा आगे बढ़ी, दादी के पलंग पर जुनैदा के बगल में बैठ गई. अपना हाथ बढ़ाकर उसने अमीना बेगम का हाथ अपने हाथ में ले लिया और मुस्कराई. जैसे वह दादी को तस्सली दे रही हो. अमीना बेगम ने फातिमा के मनोभाव को समझ लिया. उन्होंने अपनी हथेलियों से उसकी हथेली को हल्के से दबाया.
"फिर क्या हुआ दादी?" फातिमा ने धीरे से पूछा. "फिर तो बेटी घर में बवाल हो गया. इनके दोनों छोटे भाई, इलाहाबाद वाले आफताब मियां और नौशाद मियां जो दिल्ली में रहते हैं, वे सारे लोग बेहद नाराज उनकी लंबी चौड़ी चिट्ठी आई, फिर उन्होंने बंटवारा भी कर लिया. इस डर से कि कहीं परवेज साहब सभी के हिस्से के जायदाद को इसी तरह ना लुटा दें. बेटे बेटियों ने भी इनसे बहस की."
"हमने बगीचे के लिए नहीं ऐतराज जताया था अम्मी, हमारी मंशा थी अब्बा परिशान ना हों." शकील हुसैन ने बच्चों के सामने तुरंत सफाई दी. जुनैदा और अनवर खामोश रहे.
अमीना बेगम ने शकील की सफाई पर कुछ नहीं कहा.
"तुम लोगों के दादा जी बहुत ही नेक इंसान थे. मिर्जापुर में तो उनकी इज्जत थी ही, गांव में भी यहां के लोगों के लिए उन्होंने जो मेहनत की, जो समय दिया, जो तकलीफें उठाई, उनकी मिसाल यहां उनके इंतकाल के बाद आज भी लोग देते हैं. वे पहाड़ की तरह नहीं बल्कि पहाड़ की पथरीली चट्टानों को तोड़कर बाहर निकले एक विशाल 'ओक के दरख्त' की तरह थे."
"दो साल बाद दो कमरों के लिए उन्हें एक लाख रुपए क जरूरत पड़ी. गांव के सबसे धनी माने जाने वाले अजय राय उन्होंने इस बारे में बात की तो उन्होंने शर्त रख दी. वे मान गए आदर्श जूनियर स्कूल की जगह स्कूल का नाम अजय राय के पिता के नाम पर हो गया. घर में एक बार फिर हंगामा हुआ. जमीन हमारी स्कूल खोला इन्होंने और नाम हो गया अजय राय के पिता का. गांव वालों को भी बुरा लगा फिर धीरे-धीरे स्कूल में अजवा राय की मनमानी चलने लगी. इनका दिल टूट गया. बिना कुछ कह मैनेजरी से इस्तीफा दे दिया. लेकिन कुछ दिनों बाद ही एक अलग हाई स्कूल खोलने का फैसला कर लिया. केवल लड़कियों के लिए. सत्तर साल के हो चुके थे. लेकिन उस पर लगे रहे. जाड़े, गर्मी, बरसात में गाजीपुर से लेकर इलाहाबाद और लखनऊ का चक्कर लगाते रहे. उनकी चिंता हम सबको होती थी. पर वे सुनते कहाँ थे. ठान लिया तो ठान लिया. एक साल में बोर्ड से मान्यता वाला केवल लड़कियों का हाई स्कूल खोलकर ही इन्होंने दम लिया."
“बे मुझसे कहते थे कि मेरी वजह से गांव आते ही उन्होंने लड़कियों के स्कूल के बारे में सोचना शुरू कर दिया था. मुझसे प्रेरणा मिली थी. उनका कहना था कि मैं नैनीताल में नहीं रही। होती, इधर जौनपुर, अपने गांव में रहती तो शायद पांच तक भी नहीं पढ़ पाती. पढ़ाई से खवातीन की सोच में क्या और किस तरह का बदलाव आता है यह मुझसे मिलने बाद उन्हें पूरा यकीन हो गया था. मुझसे वे मिर्जापुर में भी कहते थे कि अगर मैं पढ़ी लिखी नहीं होती तो उनकी बातों को ठीक से नहीं समझ पाती, उनका साथ नहीं दे पाती."
में
"तब बच्चो नौहटी और आसपास के गांव में प्राइमरी स्कूल के बाद पढ़ने की सुविधा नहीं थी. लड़के तो सात आठ किलोमीटर साइकिल से मिडिल, हाई स्कूल, फिर आगे की पढ़ाई के लिए जा सकते थे. पर लड़कियों के लिए यह नामुमकिन था. उन्होंने बगीचे में जूनियर हाईस्कूल भी लड़कियों को ही ध्यान में रखकर ही खोला था. पहले साल बहुत ही कम लड़कियां आई तो स्कूल लड़को का दाखिला भी लेने लगे. लेकिन इससे नुकसान यह हुआ कि लड़कों की वजह से जो भी लड़कियों थीं उन्हें भी उनके वालिदों ने भेजना बंद कर दिया. वे इन लोगों के दकियानूसी ख्यालात से नाराज भी थे. खासकर मुस्लिम मां बाप के रवैए से थे. जब केवल लड़कियों के लिए दर्जा छह से हाई स्कूल तक का स्कूल खुला तो मुस्लिम लड़कियों को ज्यादा फायदा पहुंचा. पहली बार इनकी लड़कियां पांच से ऊपर पढ़ीं, पहली बार गांव की लड़कियों को हाई स्कूल तक पढ़ने का मौका मिला. बच्चो, इस इलाके के लिए यह बहुत बड़ी क्रांति थी. तुम लोग शायद आज इसकी कीमत नहीं समझ पाओगे. उन्होंने फीस बहुत कम रखी थी ताकि गरीब बच्चियों को पूरा मौका मिले कुछ साल बाद उन्होंने बोर्ड से बारहवीं की मान्यता भी ले ली. उनके समय में मिर्जापुर कालेज के पुराने छात्रों ने इन कामों मे बहुद मदद की."
40 कथादेश मई 2026
अनवर मियां ने घड़ी पर नजर दौड़ाई. अमीना बेगम को लगातार बोलते एक घंटा हो चला था. वे अम्मी को बोलने से
रोकने के
लिए
कहने
वाले ही थे कि फातिमा का सवाल आ गया- "दादा जी के इंतकाल के बाद स्कूल कैसा चल रहा दादी ?" अनवर ने घूरकर फातिमा की तरफ देखा, लेकिन फातिमा की ने निगाह दादी के चेहरे की तरफ थी. वह अपने वालिद की नाराजगी
से बेखबर थी. अनवर को समझ में नहीं आ रहा था कि फातिमा इतना जज्बाती कब से हो गई है. दुबई में तो अपने कमरे में बंद रहती या सहेलियों के साथ रहती. कहीं साथ चलना होता तो भी
मना कर देती थी. अमीना बेगम की तरफ उसकी और उत्सुकता को देख अनवर हैरान थे.
बढ़ती
मुहब्बत
"तुम्हारे दादा जी ने बहुत कोशिश की घर का कोई उसे संभाल ले, लेकिन किसी की स्कूल में दिलचस्पी नहीं थी. ये लोग जब नौकरी नहीं पकड़े थे, तब भी स्कूल में किसी तरह की दिलचस्पी नहीं रखते, उल्टे अपने अब्बा को कभी कभी इशारे से उल्टा बोल देते थे."
अमीना बेगम ने अपने बच्चों की शिकायत उनके बच्चों के सामने करने में कोई संकोच नहीं किया.
"ये लोग फिर कमाने बाहर चले गए, जुनैदा की शादी हो गई. हमारे देवर और उनके बच्चों को भी दिलचस्पी नहीं थी. यह सही भी था. उन लोगों का तो शुरू से स्कूल से कोई मतलब नहीं था. इनके इंतकाल के बाद मैनेजर बनने को लेकर कमेटी में काफी झगड़ा हुआ. अहीरों, भूमिहारों और मुसलमानों के अलग गुट बन गए. अंत में भूमिहारों का इस स्कूल पर भी कब्जा हो गया. मुझसे
चित्र संदीप राशिनकर
संदीप राशिनकद्र
मिलने स्कूल की पुरानी लड़कियां और स्कूल की टीचरें आती हैं. सब आए हैं. पर यह क्या कम नसीब की बात हैं कि उनके जाने
वे लोग
सब
पसीने
बताती हैं. वे बताती थीं कि
से स्कूल खड़ा
परवेज मियां ने जो खून किया था, वह खत्म हो रहा है. पहले जैसी
स्थिति नहीं है. वह जो जूनियर हाई स्कूल खुला था वह तो इन्हीं
के पहले सारे आ गए. जो कुछ कहने को मन बेचैन रहता था उसे इनके सामने निकाल लिया.
इसके बाद अमीना बेगम की सेहत सुधरने लगी. इस बातचीत
के सामने चौपट हो गया था. जो भी हो उन्होंने बहुत बड़ा काम के बाद उनके खांसी के दौरे भी कम हो गए. उन्हें भूख ज्यादा किया था और उसका फाएदा भी वहां के बच्चों को मिला. अभी लगने लगी. कोई ना कोई नाती या पोता उनके साथ रहता. छह सात महीने पहले यासीन दर्जी की बेटी मुझे देखने आई थी. खासकर फातिमा तो दादी की दीवानी हो चुकी थी. उनके सिर में अपने दो छोटे बच्चों के साथ बोली चाची अगर चाचा ने यह तेल लगाती, बालों में कंघी करती. अकेले में उनसे बहुत से सवाल स्कूल ना खोला होता तो मेरी शादी इतनी बढ़िया नहीं हो पाती, करती जवान हो रही थी, समझ बढ़ रही थी, विदेश में खुले इतनी सुखी नहीं रहती आज हाई स्कूल करने की वजह सरकारी माहौल में रहती थी इसलिए कुछ ऐसे सवाल भी पूछ लेती कि बाबू से शादी हुई थी. मुझे याद आ गया परवेज मियां भी तो अमीना बेगम हैरानी से उसे एकटक देखने लगतीं. उन्होंने एक इसीलिए मुझसे निकाह करने को तैयार हुए थे, क्योंकि मैं हाई दिन अनवर से कहा भी "तुम्हारी बेटी बहुत ही होशियार है, स्कूल पास थी." अल्लाह का करम है उस पर आगे वह काफी अच्छा करेगी. "
तो
उनकी यह बात खत्म होते ही अनवर ने तुरंत हस्तक्षेप किया. साथ में दूसरों ने भी समझाया- अम्मी ज्यादा बोलीं तो जो तबियत ठीक दिखाई दे रही है, वह बिगड़ सकती है. अमीना बेगम बात और करना चाहती थीं. लंबे समय से अकेलेपन का दर्द झेल रही थीं. परवेज साहब के इंतकाल के बाद पहली बार पूरा परिवार इकट्ठा हुआ था. वे समझ रही थीं उनकी चला चली की खबर से
चार दिन बीत चुके थे. सबको यह भरोसा हो चला था कि अम्मी अभी कुछ साल और टिकेंगी. सब लोगों ने वापसी का प्रोग्राम बनाना शुरू कर दिया. अनवर बीस दिन की छुट्टी लेकर आए थे. लौटने के पहले रामपुर, अपने ससुराल भी जाना था. फिर दिल्ली से दुबई की फ्लाइट पकड़नी थी. फातिमा को कुछ दिन
और दादी के साथ बिताने का मन था. उसने अपनी मां से साफ
41 कथादेश मई 2026
जी से इसके बाद ना जाने कब मुलाकात हो. कहा भी कि मैं इतने दिनों के लिए रामपुर नहीं जाना चाहती. दादी
रात में अनवर ने एक बार फिर कोशिश की. अमीना बेगम से दुबई साथ चलने की गुजारिश की, कहा यहां अकेले कैसे रहिएगा. अमीना बेगम ने भी अपने उन्हीं पुराने तर्कों के साथ इनकार कर दिया. सभी कुछ ठीक था. सुबह जब अमीना बेगम को चाय देने घर की नौकरानी आयशा उनके कमरे में गई तो मालूम हुआ अमीना बेगम सभी को छोड़ अल्लाह के पास पहुंच चुकी हैं. आएशा हांलाकि रात में उन्हीं के कमरे में, उनके बिस्तर के बगल में एक खटोले पर सोई थी. पर उसे पता ही नहीं चला रात में कब अमीना बेगम की सांसें बंद हो गई.
घर में सब हैरान थे. अब तो वे काफी ठीक हो गई थीं. लेकिन शायद यह चिराग बुझने के पहले ली के तेज हो जाने जैसा ही मामला था. अमीना बेगम की जो आखिरी ख्वाहिश थी वह पूरी हो चुकी थी. सबसे मिल लीं, मन में जो कुछ था उसे निकाल लिया. उन्हें लगा होगा अब ज्यादा दिन रुकना मुनासिव नहीं है. लिहाजा रुखसत हो गई.. बच्चों, नाती पोतों के घर से निकलने के पहले वे खुद दुनिया से
सबके साथ बैठी थी. मकान का क्या करना है, खेत का करना है, इन सबके अलावा परवेज हुसैन के जमाने से खेत दरवाजे पर जमाने से सेवा कर रहे मुलाजिमों के बारे में भी क हुई. यह सब चर्चा चल ही रही थी कि फातिमा बीच में बोल प
"पापा दादी जी वाज रियली अ ग्रेट लेडी" उसने अनवर तरफ मुखातिब होकर यह बात कही थी.
बगैर किसी संदर्भ के फातिमा की इस टिप्पणी से सभी ची बड़ों के बीच उस छोटी सी बच्ची का इस तरह से दखल देना व बैठे कुछ लोगों को नागवार गुजरा. असल में फातिमा को वहां च रही चर्चा से कोई मतलब नहीं था. इन सबके बीच वह अपन दुनिया में खोई थी. अपनी दादी के बारे में ही सोच रही थी. दाई के मरने का उस पर कुछ ज्यादा असर पड़ा था. माहौल को ठीक तरह से नहीं समझ पाई. चूंकि बात अमीना बेगम के बारे में कही गई थी इसलिए उसकी इस बदतमीजी' पर कोई कुछ कर नहीं पाया.
“फातिमा बिटिया अब काफी बड़ी हो गई है". शकील फिर भी बिना बोले नहीं रह पाए.
अनवर ने गहरी निगाहों से फातिमा को देखा. फातिमा पिता का इशारा समझ गई. उसने अपनी नजरें झुका लीं और खामोशी से खाना खाने लगी.
रहे
अमीना बेगम की मैय्यत उठने के पहले तकरीबन पूरे गांव की औरतें घर पर जिस तरह इकट्ठी हुई उससे सभी हैरान थे. इनमें हिंदू महिलाओं की तादाद मुस्लिम औरतों से कहीं ज्यादा थी. स्कूल की टीचर लोगों के साथ बहुत सी छात्राएं भी आ गई. इंतकाल की खबर मिलते ही दोनों स्कूल बंद करा दिए गए थे. अमीना बेगम का जनाजा उठा तो घर की औरतों से अधिक गांव की महिलाएं जोर जोर से रो रही थीं. नाती पोतों के साथ अमीना बेगम के बेटे बेटियों को भी पहली बार अहसास हुआ परवेज हुसैन से अलग अमीना बेगम की भी एक निजी शख्सियत थी, गांव महिलाओं के बीच उनकी लोकप्रियता थी. उन्हें पहली बार यह जानकारी हुई कि रामपुर के लिए गाजीपुर से सीधे ट्रेन नहीं थी, इसलिए अनवर महज अब्बा की वजह से ही नहीं, अपने खुद की वजह से ने वहां के लिए टैक्सी करना मुनासिब समझा. टैक्सी में चार लोग कायम किया था. पर्दानशीन बहू होने के बावजूद गांव में उन्होंने अपना यह इकवाल थे, अनवर, उनकी बेगम, फातिमा और उसका बड़ा भाई साहिल. लंबा रास्ता था, छोटी गाड़ी में दिक्कत हो सकती थी इसलिए अनवर ने सात सीट वाली एसयूवी, एक बड़ी गाड़ी मंगवाई थी.
दो दिन बाद अनवर अपने परिवार के साथ निकले तो सभी रो थे. जुनैदा के अलावा शकील घर पर रह गए. उन्हें तीन दिन बाद लंदन के लिए निकलना था. उनके बच्चे पहले जा चुके थे. यह तय हुआ कि चार महीने बाद आने वाली ईद के बाद सभी गांव आएंगे. उसी समय मकान और जमीन के बारे में अंतिम फैसला किया जाएगा. तब तक अम्मी का चालीसवां भी हो। जाएगा.
और आसपास के इलाके से उमड़ी भारी भीड़ की मौजूदगी में बेटे, नाती-पोते, पूरे खानदान, रिश्तेदारों के साथ साथ गांव जनाजे की नमाज अता करने के बाद अमीना बेगम को गांव के पश्चिमी सीमा पर स्थित कब्रगाह में 'सुपुर्द ए खाक' किया गया. उन्हें परवेज हुसैन की कब्र के ठीक बगल में दफनाया गया था. यह उनकी ख्वाहिश थी और गांव वालों ने उनकी इस ख्वाहिश की जानकारी होने के चलते पांच साल से परवेज हुसैन के कब्र के बगल की जगह खाली छोड़ रखी थी.
अमीना बेगम के इंतकाल के दो दिन बाद घर के भीतर बरामदे में विछे दस्तरखान पर परिवार के सभी सदस्य इकट्ठे थे. खाने के साथ अमीना बेगम के जाने से पैदा हुई नई परिस्थितियों को लेकर राय मशवरा हो रहा था. दस्तरखान पर नई पीढ़ी भी
एक घंटे सफर का हो चला था. फातिमा सबसे पीछे गुमसुम, एकदम शांत बैठी थी. अनवर के साथ उनकी बीवी ने भी यह भांप लिया था इस बार की यात्रा में फातिमा अपने दादा दादी, गांव के घर को लेकर ज्यादा सोचने लगी है. खासकर दादी को लेकर ज्यादा जज्बाती हो चुकी है. दो साल पहले आई थी तब ऐसा नहीं था. इस बार समझ बढ़ गई है, रिश्तों को ठीक से समझने लगी है. “फातिमा, क्या सोच रही हैं आप ?" अनवर से नहीं रहा गया.
पूछ लिया.
“पापा, दादी काफी पढ़ी लिखी थीं ना? गांव में रहते हुए भी काफी एलिगेंट, सोवर दिखती थीं फातिमा तुरंत बोल उठी. जैसे वह इसी का इंतजार कर रही हो.
42 कथादेश मई 2026
"ज्यादा तो नहीं बेटी, लेकिन उस जमाने की हाई स्कूल पास थी. बात डिग्री की नहीं थी फातिमा, वे हाई स्कूल होते हुए भी रात दिन, जब मौका लगे पढ़ती रहती थीं. कुछ भी, किसी तरह का मैटीरियल हो. उपन्यास हो, मैगजीन हो, यहां तक कि रेसीपि की किताब क्यों ना हो, जो भी उनके हाथ लग जाती उसे पूरा पढ़े बगैर नहीं छोड़ती थीं. मैंने हमेशा उन्हें अब्बा से ज्यादा पढ़ते देखा है, जबकि अब्बा टीचर थे. मैंने उन्हें किचेन में खाना बनाते हुए भी उपन्यास पढ़ते देखा था. उस वक्त कोयले की अंगीठी पर खाना बनता था. वैसे तो दोनों वक्त तब चपरासी खाना बनाने आते थे, लेकिन इतवार और छुट्टियों के दिन अब्बा उन्हें आने से मना कर
इसके बाद कार में देर तक सन्नाटा पसरा रहा. हाई वे मिल गया था. ड्राइवर अब कार को 80-90 किलोमीटर की रफ्तार से रहा था.
भगा
"बहुत ही आइडियल जोड़ी थी दोनों की. दादा जी और दाद की." फातिमा ने ही इस सन्नाटे को तोड़ा. किसी ने
जी
जबाब
नहीं दिया.
“गांव
में मैंने
एक
फैसला
किया है."
कोई
फातिमा ने कहा. सबने सुना. लेकिन इस बार भी सभी चुप रहे सभी को मालूम था कि फातिमा खुद बताएगी क्या है उसका फैसला..
"वाह."
देते. उस दिन अम्मी ही खाना बनाती थीं. वे उर्दू में लिखे उपन्यास "मैं दुबई पहुंचते ही एक कहानी लिखूंगी. उसका टाइटिल ही नहीं शरत चंद्र, रवींद्रनाथ टैगोर, प्रेमचंद जैसे हिंदी राइटर के होगा 'ओक का पेड़'." उपन्यास, कहानियां भी पढ़ती रहतीं. मैं टेंथ में था तब से मैंने भी उनकी वजह से उपन्यास और पत्रिकाएं पढ़ना सीख लीं. में उनकी किताबें चुराकर पढ़ता था. तभी तो अभी तक नाम वाद हैं. घर के दूसरे लोगों से मेरी हिंदी भी इसीलिए ज्यादा अच्छी है." अनवर ने फन से कहा.
पहली बार चलती कार में अनवर ने अपना चेहरा पीछे घुमाकर फातिमा की तरफ देखा "दादा जी पर?" "नहीं दादी जी पर" फातिमा ने कहा.
यह सुनते ही इस बार फातिमा की मम्मी ने भी गर्दन घुमाकर
"लेकिन दादी मां को हिंदी में कैसे इन्टरेस्ट जग गया? क्या वे उसकी ओर देखा, सबसे आगे, ड्राइवर की सीट के बगल में बैठा साहिल भी चौंक गया. पीछे मुड़कर पूछा- "यह क्या?"
सारी किताबें खुद खरीदती थीं?"
"पर अम्मी ने तो ओक की मिसाल दादा जी के लिए दी
थी."
अनवर भी हैरान रह गए.
दादी
जी थीं.
"हां पापा. पर सच पूछिए तो 'ओक का पेड़ तो आप लोग मानें या ना मानें, वे ही वह पिलर थीं जिस पर दादा जी,
गांव,
"अम्मी को नैनीताल में यह माहौल मिला. जिस स्कूल में थीं वहां उर्दू से कोई मतलब नहीं था. स्कूल में उनकी एक खास दोस्त थी, नीरा आंटी. पांच-छह साल पहले वे भी गुजर गई. मां हमेशा उनको खत लिखती थीं. उनसे मिलने नैनीताल भी गई थीं. नीरा आंटी की मां अम्मी के स्कूल में हिंदी की टीचर थीं. अम्मी की स्कूल सब कुछ खड़ा था. जैसा आप भी बताते हैं वे पढ़ी दिलचस्पी देखकर वे उन्हें पढ़ने को हिंदी पत्रिकाएं देने लगीं जिनमें लिखी थीं, जहीन थीं, शहर में हमेशा रहीं, वहां दादा जी के साथ उस समय के मशहूर लेखकों की कहानियां छपती थीं. अम्मी उनकी भी पोजिशन थी. बड़े लोगों के साथ उठना बैठना, घर पर बताती थीं कि उनकी टीचर को यह अच्छा लगता कि मुस्लिम चपरासी खाना बनाते थे. हर तरह की सुख सुविधा. लेकिन लड़की होते हुए मम्मी को हिंदी लिटरेचर में दिलचस्पी है. उनका दादाजी ने रिटायरमेंट के बाद गांव बसने को कहा तो वे सब कुछ शौक देखकर किताबें पत्रिकाएं कालेज लाइब्रेरी से अब्बा भी छोड़ उनके साथ चलने को तैयार हो गई. समाजसेवा तो दादा जी अम्मी के लिए लाते थे. बाद में अम्मी ने मुझे यह बताया कि वे को करनी थी. उनका पेशन था यह. लेकिन दादी जी दादी जी तो जानती थीं कि मैं उनकी किताबें चोरी से पढ़ता हूं, लेकिन सारी सुख सुविधा को छोड़कर, गांव की तकलीफों को जानते हुए जानबूझकर कभी टोका नहीं." अनवर मियां फातिमा को सब कुछ भी बस उनके पीछे चल दीं. वहां उनका सहारा देने के लिए खड़ी रहीं. आपको नहीं लगता दादा जी की ताकत, उनके एनर्जी की "बेटी ना जाने क्यों वे सभी भाई बहनों से अलग मुझसे ही सोर्स दादी जी ही थीं. अपनी पढ़ाई लिखाई, जानकारी और मेहनत लिटरेचर और पुरानी पिक्चरों की कहानी लाइन पर देर तक बात से जो समझ उन्होंने इकट्ठी की थी, वह दादा जी के काम आई. करतीं. उन किताबों की, पिक्चर की कहानियों का ब्यौरा, उनकी पापा, अगर दादी जी पीछे नहीं खड़ी रहतीं तो दादा जी वह सब खासियत तफ्सील से मुझे बताया करतीं. भले वे पुस्तक मैंने न नहीं कर पाते जिसकी वजह से वे पूरे विलेज और एरिया में पढ़ी हों, वे पिक्चरें मैंने न देखी हों. सचमुच अम्मी जहीन थीं, पापुलर बने यहां तक कि दादी जी ने जो कुछ भी हम लोगों से जानकारी के लिहाज से बहुत ही पढ़ी लिखी, अब्बा से भी कहा वह दादा जी की ही तारीफ में कहा. अपने सैक्रीफाइस के
बताते बताते खुद मां की और अपने बचपन याद में डूब गए.
ज्यादा."
अंतिम लाइन उन्होंने बहुत धीरे से कही. जैसे फातिमा को बताने के लिए नहीं, खुद को समझाने के लिए उन्होंने यह बात कही हो.
बारे में एक शब्द नहीं कहा. कोई क्रेडिट नहीं ली. दादा जी को ही 'ओक का पेड़' बताया. जबकि 'ओक का पेड़ वे खुद थीं. उन्होंने ही दादा जी को सींचा और दादा जी के जरिए पूरे गांव को सीचा. "
43 कथादेश मई 2026
अनवर दंग रह गए. उन्हें लगा इंतकाल के एक रात पहले अम्मी ने फातिमा के बारे में जो कहा था वह सही कहा था. अम्मी की कुर्बानी को तो किसी ने देखा या समझा ही नहीं. फातिमा की बात ने उनके दिल और दिमाग को झकझोर दिया.
सही तो कह रही है फातिमा अब्बा की ही सबने तारीफ की. लेकिन अम्मी उनके पीछे खड़ी नहीं रहतीं तो परवेज हुसैन क्या गांव और समाज के लिए इतना कर पाते? अब्बा ने जो मशाल जलाए रखा उसकी रोशनी के पीछे अम्मी का ही तो खून पसीना था. खुद को झोंके रखा, कभी एक शिकायत नहीं की. समाज सेवा के नाम पर अब्बा ने जब भी पैसा खर्च किया, अम्मी ने अब्बा से
इस बारे में कभी कुछ नहीं कहा. बगीचे की जमीन वाले मामले में जब सब अब्बा के खिलाफ थे, मैंने भी मुखालफत की तो अकेले वे ही उनके साथ खड़ी थीं. उसके सामने अब्बा का पक्ष लेकर उसे भी देर तक समझाने की कोशिश की थी. यहां तक अंत समय में भी वे बच्चों के सामने सभी क्रेडिट अपने शौहर के नाम कर रही थी. फातिमा ने अमीना बेगम के त्याग और कुर्बानी का यह अहसास अनवर को पहली बार कराया था. यकायक वे आत्मग्लानि में छटपटाने लगे, अम्मी के इतने करीब रहकर वे भी उन्हें कभी इस तरह से क्यों नहीं समझ पाए, अंत तक उनसे यह कह नहीं सके कि.... अनवर सोचते जा रहे थे और उनका दिल डूबता जा रहा था. उनकी आंखों में आँसू उमड़ आए.
"दादी जी की डेथ के दो दिन पहले जब मैंने उनसे कहा था कि मैं आप पर कहानी लिखूंगी, मेरे लिए तो 'ओक का दरख्त आप ही हो तो वे जोरों से हंसीं."
अनवर ने चौंककर एक बार फिर पीछे मुड़कर फातिमा को देखा जो वे और कोई संतान अम्मी के जीते जी उनसे ना कह सका, उनको ना समझ पाया वह छोटी सी फातिमा ने कर दिया. मरने के पहले अम्मी को उनकी कुर्बानी को लेकर सुकून दिया. वह सूकून जिसकी शायद अम्मी ने अपने बच्चों से कभी ना कभी सुनने की उम्मीद की होगी. "फिर?"
प्रदीप श्रीवास्तव
जन्म करीब तीन दशक से ज्यादा समय से पत्रकारिता से जुड़े हैं, 23 वर्ष जनसत्ता दिल्ली ब्यूरो के लिए रिपोर्टिंग, फिर पांच वर्ष सन्मार्ग (कोलकोता) में दिल्ली ब्यूरो चीफ और एसोसिएट एडीटर के पद पर काम किया. तीन पुस्तकें प्रकाशित, जिनमें दो (नान फिक्शन) पेंगुइन रेन्डम' में प्रकाशित की. इनमें पहली को 2020 में 'कलिंग पुरस्कार मिला, दैनिक जागरण ने इसे अपने सर्वे में 2022 के बेस्टसेलर बारह में रखा. तीसरी पुस्तक (फिक्शन) '1989 द टर्निंग प्वाइंट इसी साल प्रकाशित कहानियों में पहली कहानी 'हंस' में पर्काशित तीन अन्य कहानी विभिन्न पत्रिकाओं में मंजूर मूलतः यूपी के बलिया जिले के निवासी, उच्च शिक्षा मगध विश्वविद्यालय, बोध गया, और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से.. सम्पर्क बी-804 जनसत्ता अपार्टमेंट, सेक्टर 9 वसुंधरा, गाजियाबाद (उ. प्र.)
मो. 9213324605
E-mail: pradeepsanmarg@gmail.com
प्रामिस किया कि मैं उनसे मिलने जल्दी ही इस बार आऊंगी. लेकिन अब तो..."
लगे.
यह कहते-कहते फातिमा की आंखों से झर झर आँसू बहने
अनवर ने अपने चेहरा घुमा लिया. वे अब कार की खिड़की से बाहर देख रहे थे. उनकी आंखों में जो आँसू कुछ समय से टिके थे, जिसे उन्होंने किसी तरह से जब्त कर रखा था, वे गालों पर
."..फिर उन्होंने प्यार से मेरे गाल पर चपत मारते हुए कहा मैं ढुलक गए. फातिमा की बात सुनकर अनवर की पत्नी भी अपने को रोक नहीं पाई. उनके आंसू तो पहले ही बहने शुरू हो गए थे। मूर्ख हूं... मैंने उन्हें यह बताया कि क्यूं उन पर कहानी जिसे किसी ने देखा नहीं था. अब वे हिचक हिचककर रो रही थीं. उन्होंने पर्स में अपना रूमाल ढूंढना शुरू कर दिया.
लिखूंगी..."
"फिर उन्होंने क्या कहा?" अपने आँसुओं को जब्त कर किसी तरह अनवर ने पूछा.
फातिमा गंभीर हो गई. जैसे उसे अमीना बेगम की याद आ गई हो- "वे तो इसके बाद भी कह रही थीं पगली कहानी लिखना है तो दादा जी पर लिखो वह बहुत बड़ी शख्सियत थे. फिर मैंने भी कहा कि आप ना होतीं तो ऐसा नहीं होता..." कहते-कहते वह रुक गई. उसका गला भरा गया था.
"मैंने उनसे यह भी कहा दादी जी दुबई जाऊंगी तो इस बार आपकी बहुत याद आएगी. आप तो आओगी नहीं. मैंने उन्हें
कार पूरी रफ्तार में हाई वे पर तेज गति से भागी चली जा रही थी. फातिमा के अलावा सभी की निगाहें सामने थीं, सड़क पर टैक्सी ड्राइवर नियोगी परवेज हुसैन के परिवार, अमीना बेगम को बचपन से जानता था. कार चलाते हुए उसकी नजरें सामने थीं, लेकिन उसके कान अभी तक पीछे लगे थे, फातिमा की बातें वह ध्यान से सुन रहा था. फातिमा की आखिरी बात पर नियोगी की आंखें भी डबडबा गई. वह कुछ कहना चाहता था, पर बोल नहीं पाया.
44 कथादेश मई 2026
कहानी
बारूद
उर्मिला शुक्ल
थी,
बहुत खुश थी दीपालिका, उसकी पोस्टिंग उस अंचल में हुई
उसे झरझरी सी हो आयी. कुछ देर बाद स्टेशन
जिसके बारे में उसने यह उक्ति सुनी थी "सरगुजा मास्टर भी चले गए. वह बस के इंतजार में बैठी रही. दिन चढ़ता
होगी." सोचकर
गाजम
गुजा,
घर-घर
देव
पहाड़
के
पूजा.'
यानी
सरगुजा
पहाड़ों
की
रहा.
बस
की
कोई
सुगबुग
तक
नहीं
हुई.
जब
दिन
ढलान
की
ओर
भूमि है. पहाड़ ही वहाँ के देव हैं. सो हर घर में
पहाड़ ही पूजे जाते
चलने
लगा, तो
उसका डर
गहराने
लगा.
उस
सुनसान
स्टेशन
पर
हैं
और भी बहुत
कुछ
सुना था उसने
उसने
उन
पहाड़ियों के बारे
रात
गुजारने
की
कल्पना ने उसे
सिहरा
दिया-
"क्यों न स्टेशन
में भी सुना था, जिन पर उमगते मेघ के सामने कालिदास के यक्ष
मास्टर के घर आश्रय माँगूं." सोचा. फिर कुछ
घटनाएँ याद हो
ने अपना
हृदय
उधारकर रख
दिया
और
उसे
अपनी
सारी
पीर,
आयीं
और
मन ने कहा, "नहीं
किसी
अनजान
पुरुष
पर
विशवास
करना ठीक नहीं."
अपनी सारी अकुलाहट सौंप भेज दिया था, अपनी प्रिया के पास. एक अजनबी मेघ पर इतना गहन विश्वास कि उसे अपना सारा उठी आगे बढ़ी. एक कोने में छोटा सा प्रतीक्षालय तो था, पर गोपन ही सौंप दिया? मगर वह मेघ भी कोई साधारण मेघ तो था द्वार में पल्ले नहीं थे. और कोई उपाय भी तो नहीं था. सो उसी नहीं. वनवासी मेघ था. सो उसने भी उसके विश्वास को कायम प्रतीक्षालय में रात गुजरने का मन बनाया, तभी सन्नाटे को चीरती रखा. उसने तो यह भी सुना था कि उन्हीं पहाड़ियों की क्रोड़ में घरघराहट सी उमरी उसके मन में आस का एक जुगनू चमका. प्रकृति नटी ने अपने हाथों से एक नाट्यशाला भी रची है." फिर देर तक कोई आवाज नहीं आई, तो लगा उसका भ्रम है, मगर ऊँची-नीची पहाड़ियों के बीच एक एक रंगशाला का उभर आना कुछ देर में बस का हार्न गूंज उठा. उसे तो मानो नियामत ही मिल एक करिश्मा ही तो है. कितनी अदभुत होगी वह नाट्यशाला! गयी. लगभग दौड़ते हुए बाहर निकली. बस में गिनती की सवारियाँ कितना सुंदर होगा वह अंचल' सोचकर उसे रोमांच हो आया. थीं. सो जगह की कोई कमी नहीं थी लेकिन एक भी सीट सलामत
वह चल पड़ी उस अंचल की ओर रात का सफर था. सो ट्रेन नहीं थी. सो फटी हुई सीटों में, एक कम फटी सीट तलाशकर बैठ
कहाँ-कहाँ से होकर गुजरी, पता नहीं चला लेकिन अलसुबह जब ट्रेन ने उसे पहले पड़ाव पर उतारा तो चकित रह गयी उस स्टेशन पर स्टेशन जैसा कुछ भी नहीं था. चाय का एक खोंचा तक नहीं था. ऐसे में अपना ट्रालीबैग घसीटती वह आगे बढ़ी... वहाँ उतरने वाली वह एक मात्र संवारी थी सो स्टेशन मास्टर के केबिन की
ओर बढ़ी. उनसे पूछा तो. "बस तो यहीं स्टेशन के बाहर से मिलता है. फेर कुछ दिन से दिखा नइ. गाँव गँवई का बस है मेडम आया- आया, नई आया नई
आया. आप इंतजार कर लो. साइद आ जाय."
"और कोई साधन नहीं."
“नइ दूसरा कोई साधन नइ है. ये बस भी तो राज्य बनने के बाद चालू हुआ. नइ तो हम बनवासी लोग के लिए कोई साधन कहाँ था. ये रेल लाइन भी तो कतना लंबा लड़ाई के बाद बना. " स्टेशन मास्टर उस अंचल की दिक्कतें बयाँ कर रहे थे, और उसका ध्यान अपनी मंजिल की चिंता में अरझा हुआ था. “अगर बस नहीं आई तो ? फिर तो रात यहीं, इसी प्लेटफार्म पर गुजारनी
गयी.
"कोन गाँव जायेगा?" कंडक्टर सामने था.
"पसरागढ़.
"सौ रुपिया."
उसने सौ का नोट बढ़ाया. पैसे लेकर वह चालक सीट पर जा बैठा और बस तेज घरघराहट के साथ आगे बढ़ चली. कुछ आगे जाकर दो चार सवारियाँ दिखीं. उन्हें चढ़ाया. पैसे लिये फिर चालक सीट सम्हाल ली. दीपालिका ने अब गौर किया कि उस बस में कंडक्टर तो था ही नहीं सो वह कंडक्टर और ड्राइवर दोनों भूमिका में था. जंगल की राह थी, सो बस उचकती उचकाती मंजिल की ओर बढ़ने लगी. रफ्तार के साथ बस की घरघराहट भी तेज हो उठी.
कुल जमा दस यात्री थे. वे आपस में कुछ बतिया रहे थे. बातचीत के कुछ टुकड़ों से उसने जाना, वे किसी बीमारी की चर्चा कर रहे थे. "तो क्या यहाँ भी कोरोना आ चुका है? भव सा लगा. 'लेकिन ये लोग तो जिस तरह से सटकर बैठे हैं, इससे लग तो नहीं 45 कथादेश मई 2026
चित्र: संदीप राशिनकर
रहा कि कोरोना यहाँ आया है.' सोचती वह उनकी बातचीत के टुकड़े पकड़ने की कोशिश करने लगी. कुछ देर बाद वे उतर गये. अब बस में वह अकेली सवारी थी. अँधेरा घिरने लगा था. सो भय जगा और उसका मन आशंकाओं में डोलने लगा- "बस में इसके और मेरे सिवा कोई और नहीं. कहीं यह...? नहीं इस अंचल के लोग ऐसे नहीं." सोचकर मन को ढाढ़स दिया, तभी एक तेज झटका ले बस रुक गयी. फिर तो आशंका तनकर सामने आ खड़ी हुई और वह अपने बचाव के उपाय तलाशने लगी. तभी
"मेडम लगता है बस पंचर हो गया. थोड़ा देरी लगेगा." सुनकर आशंका और जोर से खदबदायी. उसे याद हो आया उसके बैग में एक ऊँची है. उसने कैंची निकाली और चौकन्ने कानों से आहट को टोहने लगी. नीचे से ठक-ठक की आवाज आयी. फिर सन्नाटा, वह सधे कदम दरवाजे के करीब पहुँची कि भागने में आसानी हो.
"आप डोर पर काहे खड़ा है? कोनो जिनावर आ गया तो जाके सीट पे बैठिये और हाँ दरवाजा भीतर से बंद कर लीजिये." लेकिन उसने न तो दरवाजा बंद किया और न ही सीट पर गयी बल्कि आसन्न संकट से निपटने के लिए और सजग हो गयी "अरे! आप अबी तलक यहीं है. चलिए अपनी सीट पर बैठिये." कहते वह गेट की ओर बढ़ा, तो वह पीछे हटी कैंची पर
उसकी पकड़ और कस गयी. वह भीतर आया उसने दरवाजा लॉक किया और अपनी सीट पर जा बैठा. बस स्टार्ट हुई और अँधेरे का चीरती आगे बढ़ चली.
"माना कि जमाना बहुत खराब है, मगर हर पुरुष वैसा नहीं होता." मन ने कहा.
"हाँ! लेकिन मेरी आशंका भी निराधार नहीं थी. आजकल के घटनाएँ कितनी बढ़ गयी हैं." उसने अपनी दलील रखी फिर भी मन के एक कोने में बैठा पछतावा उसे खदखोरता रहा. कुछ देर बाद बस अपनी मंजिल पर जा पहुँची.
"आज बस बहुते देरी से लाया." उसे लेने आये व्यक्ति ने पूछा.
"हव! बस पंचर मै रहिस."
"अच्छा तभी." फिर उससे मुखातिब हुआ "मैडम पईदल रेंगना पड़ेगा. इहाँ रक्शा ताँगा कुठु नई मिलता."
उसने उसका सामान उठाया और चल पड़ा. वह भी उसके पीछे चली. फिर ठिठकी "भैया बहुत धन्यवाद."
वह चकित. आज तक तो किसी ने उसे धन्यवाद नहीं दिया. और दीपालिका? वह तो धन्यवाद से अपनी ग्लानि पोंछ रही थी. सो कुछ देर ठिठकी रही फिर चल पड़ी. अँधेरी रात और गाँव की डीपा खोचका वाली गली. सो उसकी पदचाप के सहारे आगे बढ़ती रही.
आइये आइये आपको तकलीफ तो नइ हुआ. मैं खुद लेने आता. फेर मेरा छौवा आने नइ दिया. अकेला डेराती है न."
सरपंच ने टार्च की रौशनी में उसकी अगुवाई की. दीपालिका ने गौर किया मुख्यद्वार से आँगन तक एक कोलकी (सँकरी गली) थी. फिर लंबी परळी ( बरामदा ) थी और उससे जुड़ी थीं कई खोलियाँ (कमरे) उन्होंने एक खोली में उसका सामान रखवाया और.
"उधर बाड़ी है, कुआँ है, बातरूम भी. बस एके तकलीफ है, बिजली नइ है. टारच लेके जाना पड़ेगा."
"कोई बात नहीं टार्च से काम चल जायेगा." "आप हाथ मु धो लीजिये. मैं खाना भेजवाता हूँ."
वह खोली (कमरा) के भीतर गई. मिट्टी की मोटी-मोटी दीवारों वाली पुराने ढब की खोली थी. दीवारों में आले बने हुए थे. “खाना इदरी खटिया पे घर दूं?"
देखा एक आदमी थाली लिये खड़ा था. थाली से भाप उठ रही थी. उसने थाली धाम खटिया पर रखी और तौलिया ले बाड़ी की ओर बढ़ गयी. उसे लगा था कुँए से पानी भरना पड़ेगा, मगर कुँए के किनारे वाल्टियों में पानी रखा था. कुँए के ठंडे पानी ने उसकी सारी थकन उतार दी और खाना जवाफूल का खुशबूदार भात और पुटू (जंगली मशरूम) की रसदार सब्जी घर से बाहर घर का खाना मिलना सौभाग्य ही था. सो खाकर भीतर तक तृप्त हुई." "कुकड़ू कूँ.”
46 कथादेश मई 2026
दूर किसी मुर्गे ने भोर की बॉंग दी, तो नींद खुल गई. फिर उस
आफिस में प्रवेश करते
ही
एक महिला से साक्षात्कार हुआ.
घर के मुर्गे ने भी 'कुकड़ू कूँ.' की एक लंबी टेर लगाई. फिर तो चोंगा जैसा लिवास, माथे पर लंबा सा तिलक और गले में रुद्राक्ष
गाँव
के
सभी मुर्गों में प्रतियोगिता सी शुरू हो गयी. घर वाला मुर्गा पूरे जोश में आ गया. अब उसकी बाँग में एक लय उत्तर आई थी.
की
माला.
"बैठो!" अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे आदेश दिया.
यह प्रतियोगिता इतनी मनोहारी थी कि वह उसमें डूबती चली
गयी. वह
उसमें डूबी ही रहती, पर.
"आ आ हई. आ आ हई...” का स्वर उभरा. फिर "देखो देखो भगवान आया है, चलो आरती करो उसका.” फिर आरती के कुछ टूटे शब्द आपस में गहु-महु होने लगे. फिर अचानक जोर की चीख
उभरी और "नई इ. नई इ." के बीच दरवाजा भड़भड़ा उठा. वह उठकर बाहर आई.
"नइ मेरा छोवा, तेरे को कुछ नई होगा." सरपंच उसे पुचकार रहे थे लेकिन वह लगातार चीख रही थी. देर तक चीखने के बाद वह लस्त हो गयी. "सोरी मेडम आपको तकलीफ हुआ. मैं आपके लिए कोई दूसरा खोली तलासता..." सरपंच की आवाज में शर्मिंदगी सी थी.
"मुझे दूसरी खोली नहीं चाहिए, पर इसे क्या हुआ ?" " बताऊँगा सब बताऊँगा. आप सब जान लें, इसी खातिर तो यहाँ बुलाया आपको." उनकी नजरें शून्य में जा ठहरीं.
"उसने लड़की को गौर से देखा. तेरह चौदह साल की किशोरी. गहरा साँवला रंग, छोटी मगर चमकदार आँखें और घुंघराले बाल. इतनी सी उम्र और मस्तिष्क में इतनी उथल पुथल ऐसा क्या हुआ होगा कि यूँ...?" वह देर तक अपने आपसे उलझती रही. फिर बाड़ी की ओर बढ़ गयी. स्वच्छ जल से भरा पक्का कुँआ. जगत के चारों ओर सुंदर देसी फूल. कोई और समय होता तो वह खुशी से झूम उठती लेकिन इस समय उसकी नजरों में कुछ देर पहले का दृश्य फ्रीज था और मन बार बार पूछ रहा था- "ऐसा क्या हुआ होगा कि.... ? कहीं तन से जुड़ी कोई घटना तो नहीं घटी....." देर तक सोचती रही. फिर स्कूल की तैयारी करने लगी.
स्कूल देख मन लहक उठा. चारों ओर सुंदर वन वल्लरियाँ और दूर से नजर आती रामगढ़ की पहाड़ी की हरियल आभा सो स्कूल के आस पास का वातावरण मनोरम था, मगर स्कूल? हाते के भीतर पहुँचते ही चकरा गयी वह हाते की दीवारें देवी देवताओं के चित्रों से अटी पड़ी थीं. वहाँ पीपल का एक पेड़ था. उसे घेरकर बड़ा सा चौरा बना था. उसमें बहुत से पत्थर रखे हुए थे. उन पर चढ़े फूल बता रहे थे कि वे कोई देवी देवता ही होंगे. कुछ आगे बढ़ी तो देखा बरामदे की दीवारों पर आले बने हुए थे. उन आलों में छोटी-छोटी मूर्तियाँ थीं. उसे लगा मानो वह किसी मंदिर में परिसर में चली आई है लेकिन स्कूल के बाहर लगा प्राथमिक शाला का बोर्ड, जता रहा था कि वह स्कूल ही है. ऐसा स्कूल ? वह अकचकायी सी निहार रही थी कि "आपको प्रचार बहेन जी बुला रहा है." एक तिलकधारी उसके सामने खड़ा था. वह कुछ देर उसे थहाती रही फिर उसके पीछे चल पड़ी.
"क्या इन्हें मालूम नहीं कि में इन्हीं के बदले..." उसने सोचा
और उनके ठीक सामने बैठ गयी.
"रहने का ठिकाना हो गया. कहाँ आश्रय मिला."
आश्रय शब्द कानों में चुभा मन हुआ एक करारा सा जवाब
दे लेकिन, “सरपंच महोदय के घर पर "
है."
"ठीक ही है. वैसे भी तुमको ज्यादा दिन तो यहाँ टिकना नहीं
से
"मुझे ज्यादा दिन नहीं रहना है? यह आपने कैसे सोच लिया?" "बस ऐसे ही. चलो इस स्कूल तुम्हारा साक्षात्कार करवा दें?"
“शुक्रिया. पहले चार्ज ले लें. फिर स्कूल देख लेंगे. " "कार्यभार इतनी शीघ्रता क्यों? पहले तुम्हारे कदम इस धरती पर टिक तो जाएँ? आओ" कहा और बाहर निकल गयीं.
वह देर तक देखती रही उन्हें उनका यह व्यवहार उसे चिंतित कर गया. "मैंने ज्वाइनिंग तो जिला आफिस में दे दिया था, मगर चार्ज? चार्ज के बिना तो यहाँ मेरा कोई वजूद ही नहीं." सोचती देर तक बैठी रही. फिर बाहर आयी. वे सामने वाले बरामदे में खड़ी थीं. उसे देखते ही चल पड़ीं. एक कक्षा के सामने रुकीं. मुड़कर उसे देखा और "यह हमारी पाँचवीं की कक्षा है. हम बच्चों को सिर्फ पढ़ाते ही नहीं, इनके भावी जीवन की नींव भी डालते हैं."
दीपालिका ने देखा कुछ लड़कियाँ चावल बीन रही थीं. कुछ सीना पिरोना कर रही थीं. उस कक्षा में लड़के भी थे, उनमें से कुछ हँसी ठठा में डूबे थे, तो कुछ लड़कियों को सताने में मशगूल इस
# अब न तो हमारी सरकार रही और न ही पंचायत. ढहा दिया हमारा सपना और उसी मलबे से बना लिया अपना मठ. पीपर का वो पेड़, जो इस शिक्षा की नींव था. जिसने एक मिसाल बनाया था, अब वो ही पेड़...? आप देखी तो हैं उसको. कैसे...? इन लोगों ने स्कूल की नींव में बारूद भर दिया, हम लोग विरोध किया फेर गाँव भी तो अब उसी रंग में रंग चुका था. हमारा विरोध फुस्स हो गया. फिर तो हम लोग को खुल्लेआम दूसरा घरम का संगी कहा जाने लगा. ये सच है के इधर पहले भी धर्म का ये खेला चलता था. भोला भला लोग को हर कोई बेकूप बना लेता है, तो दूसरे धर्म के लोग भी ये खेला करते थे. वो भी गलत था. हम लोग ने उसका भी विरोध किया था. फेर अब? अब तो विरोध का कोनों गुंजाइस नइ बचा. ये लोग उनसे भी दस कदम आघू बढ़ गये.
47 कथादेश मई 2026
तरह लड़कों को भी भावी जीवन के लिए तैयार किया जा रहा था. कक्षा की दीवारों पर बने अहिल्या और सावित्री के कथात्मक चित्र भी लड़कियों के जीवन की नींव डाल रहे थे.
उनके साथ निरीक्षण करते हुए उसने गौर किया उस परिसर में न तो शौचालय था और न ही पीने का पानी. जीवन के लिए जरूरी चीजें, यहाँ कतई जरूरी नहीं. यानी यह स्कूल नहीं धर्म का गढ़ है. इसे भेदना आसान नहीं सो मुझे लौट जाना चाहिए. हाँ यह सही होगा. यहाँ रहकर अपना लिखा पढ़ा सब गँवा देने से बेहतर है में लौट ही जाऊँ. सोचा. खोली में लौटकर अपना सामान समेटा बाहर आयी.
"अरे! ये सामान लेके कहाँ चल दी?" "जहाँ से आई थी?"
"ओह! तो आपने भी हार मान ली ? बिना लड़े ही." दीवारें इतनी पुख्ता हैं कि उनसे टकराना....?". "उन लोगों से लड़ने का कोई फायदा नहीं. जड़ता के गढ़ की
“टकराना बेकार है. यही न? ठीक है? जाइये. आपके लेख पड़कर मैंने सोचा था कि आपकी सोच अलग है. यहीं आकर ये सब बदलने की कोशिश करेंगी. यही खातिर कमेटी से लड़ झगड़ गलती किया. वैसे भी बड़ा बड़ा बात लिख देना आसान है. आप के नया नियम बनवाया. प्रिंसिपल की सीधे भर्ती रखवाया. फेर में लेखक लोग बदलने का बात बस लिखते ही हो. अब में समझ गया कि आप लोग भी..."
"ऐसा नहीं है? मैं तो...?"
वह अपनी बात रखने ही जा रही थी कि दरवाजा फिर भड़भड़ा उठा और "आ आ हई. आ आ हई देखो देखो...." फिर वही चीत्कार. अबकी वह चीत्कार इतनी तेज थी कि कमरे को भी. लाँघकर आँगन तक फैल गयी. सरपंच दौड़कर भीतर गये दीपालिका
"वो स्कूल? कैसे?"
"क्यों और कैसे ये सब जान के क्या करेंगी? जाइये बस क टाइम हो रहा है? धुरिया जा इनको बस में बैठा दे."
उनके इस कहन में आक्रोश और पीड़ा की एक ऐसी आँच कि वह अकुला उठी. "प्लीज मुझे बताइए ऐसा क्या हुआ कि का इस तरह...?
सरपंच ने उसकी ओर देखा. उसे लगा जैसे उसकी संवेदना क थहा रहे हैं, पर वो तो अपनी वेदना के उस खोह में उत्तर र थे, जहाँ उनकी सुगना समा गयी थी. सो देर तक उसकी ओर देखते रहे. फिर.
"पहले यहाँ स्कूल नहीं था. बच्चा लोग को दूर गाँव के स्कूल में जाना पड़ता. लड़का लोग तो जैसा तैसा पढ़ लेता, पर लड़की लोग? फेर पंचायत का जमाना आया. हम लोग पंच लोग का समझाया. गाँव के सबलोग से चंदा माँगे, पर स्कूल नहीं बन पाया? हमलोग कोई मंदिर मस्जिद तो बनवा नहीं रहे थे के चंदा मिल जाता. तब भी स्कूल खोलने का हमारा एक जिद्द था, तो ओही पीपर (पीपल) पेड़ के नीचे स्कूल शुरू किये. गाँव कि सब लड़का लड़की पढने लगे. मेरी सुगना और मुगना भी. कतना साल तक टीचर भी नइ रख पाए. हमी लोग पढ़ाते रहे. फेर में सरपंच बना. अब अपना सपना पूरा करने का समय था. लगने लगा था के वे स्कूल एक मिसाल बन जायेगा फेर माहौल ही बदल गया. हमारे टीचर भी बदल गये और बदल गया स्कूल का रंग." उन्होंने एक लम्बी उसांस ली.
“अब न तो हमारी सरकार रही और न ही पंचायत ढहा दिया हमारा सपना और उसी मलवे से बना लिया अपना मठ. पीपर का वो पेड़, जो इस शिक्षा की नींव था. जिसने एक मिसाल बनाया था, अब वो ही पेड़...? आप देखी तो हैं उसको. कैसे...? इन लोगों ने स्कूल की नींव में वारूद भर दिया, हम
(पिता) तेरे पास है न." "नइ मेरा छौवा, ऐसा परीशान न होते रे. देख तेरा दाऊ लोग विरोध किया फेर गाँव भी तो अब उसी रंग में रंग चुका
दीपालिका ने देखा उसकी देह थरथरा रही थी. फिर भी वह पूरी ताकत लगा छूट जाने को छटपटा रही थी. वह छटपटाहट इतनी तेज थी कि सरपंच की बलिष्ठ भुजाएं भी उसे थाम पाने में असमर्थ थीं. आवाज सुन कुछ और लोग आये लेकिन सब मिलकर भी उसे सम्हाल नहीं पाए. हारकर उसके हाथ पैर बाँध दिए. वह देर तक छटपटाती रही. फिर उसकी देह अकड़ने लगी और कुछ ही देर में वह पानी खाए काठ सी ऐंठ गयी.
"क्या हुआ है इसे?"
"क्या करेंगी जान के?"
था. हमारा विरोध फुस्स हो गया. फिर तो हम लोग को खुल्लेआम दूसरा धरम का संगी कहा जाने लगा. ये सच है के इधर पहले भी धर्म का ये खेला चलता था. भोला भला लोग को हर कोई बेकूप बना लेता है, तो दूसरे धर्म के लोग भी ये खेला करते थे. वो भी गलत था. हम लोग ने उसका भी विरोध किया था. फेर अब? अब तो विरोध का कोनों गुंजाइस नइ बचा. ये लोग उनसे भी दस कदम आघू बढ़ गये.
"वो ही समय में एक ठो कुयोग हुआ. ये इलाका में दल का दल हाथी आने लगा. इनने हाथी का एक बच्चा पकड़ के बाँध लिया. ये लोग उनका मन में बैठा देना चाहते थे के वो हाथी नह भगवान है, तो उसका पूजा आरती करने लगे. हाथी का बच्चा भी सबसे हिल मिल गया. बच्चा लोग आ आ हई बुलाता, तो सूंड उठाके वो भी खुशी जताता. झूम-झूम के अपना आरती उतरवाता. सब बच्चा उसका दोस्त बन गया था. फिर वो दिन का जाने का 48 कथादेश मई 2026
"ऐसा मत कहिये. बताइये प्लीज. शायद कुछ मदद..." "मदद? आपने तो मेरी आस पे पानी डार दिया. अब मेरे को का जिम्मेदार वोही स्कूल है, जहाँ से आप भाग रही हैं." आपसे कोई उमीद नइ. फिर भी इतना जान लो, इसका ये हालत
हुआ था के...?".
उनकी आँखें डबडबा आई और नजरें सामने वाली दीवार पर जा टिकीं. शायद अपना बिखराव सहेज रहे थे वो. फिर. "वो दिन आ आ हईं सुनते ही जोर-जोर से चिंघाड़ने लगा और
तलक
आरती देखते ही खम्बा उखाड़ के बच्चों की ओर दौड़ पड़ा. मेरी मुगना सबसे आगे थी. सुगना उसको पकड़ने दौड़ी फेर जब वो उसको पकड़ती... मेरी मुगना माँस का लोथ..." वो फफक उठे और बाकी शब्द उनके रुदन में बिला गये.
दीपालिका के पास सांत्वना के जितने शब्द थे सब बिला गए. सो भीगी आँखों से सुगना को निहारने लगी. उसने पुरुष की कठोरता, उसके पौरुष के तमाम किस्से सुने थे मगर उसे यूँ रोते कभी नहीं देखा था. उसने यह भी सुना था कि पुरुष के आँसू बहते नहीं जम जाते हैं लेकिन आज वो सारे मिथ टूट गये थे. उनके आँसुओं से धरती भीग उठी थी. यह ममता थी. वे देर रोते रहे फिर.
तक “मैं चाहता था के यहाँ कोई अइसा आये, जिसका सोच..... सोचा था के आप..... फेर जाने दो." नौकर को आवाज दी- "अरे धुरिया ! जा इनको बस में चढ़ा दे." फिर "जाइये नहीं तो आपका बस छूट जायेगा. फेर कल तलक जबरन रुकना पड़
जायेगा."
उनके कहन में एक तंज था.
वह कुछ देर सोचती रही फिर कोठरी से बाहर निकल आयी. उसे बाहर आया देख धुरिया उसका सूटकेश उठाकर चलने लगा. “सुनो! उधर नहीं. इधर ?" उसने कमरे की ओर इशारा किया. धुरिया ने उसकी ओर देखा और आशय समझते ही झपाटे से सूटकेश भीतर पहुँचा दिया. उसके पीछे वह भी अपनी खोली में खोली अँधेरे में डूबी हुई थी. सो अंदाज से कदम बढ़ाये. कुछ देर बाद आँखें उस अँधेरे की अभ्यस्त हुई, तो कोठरी का अँधेरा कुछ कम हुआ मगर असल अँधेरा तो अभी भी कायम था. वह इतना गहरा था कि उसमें धँसने की कोई राह ही नहीं मिल रही थी. वह देर तक उस अँधेरे को थहाती रही कि कहीं तो थाह मिले.
आ गयी.
उठकर कोठरी से बाहर आयी. अपनी सोचों में गुम वह देर तक यूँ ही खड़ी रही. फिर मुड़ी तो उसकी नजरें छानी पर जा अटकीं. छानी की ओरवाती में बहुत सी चीजें खुबी हुई थीं. उनमें कुछ अखबार भी थे. उसने उचककर उन्हें निकाल लिया. अखबार पुराने थे. सो यूँ ही पलटने लगी कि एक समाचार पर उसकी नजरें जा ठहरीं और उसे लगा यही तो उसकी भी राह है. "हाँ मुझे भी यही तरीका अपनाना होगा.” सोचा और अपनी योजना सरपंच को बतायी.
"यह काम आज रात ही करना है."
“रात में? कैसे हो पाएगा? लाईट भी तो नहीं है. फिर ? " “अँधेरे में रौशनी कहाँ होती है. उसे तो जुगाड़ना पड़ता है न, तो हम अपने पुरखों वाला तरीका अपनायेंगे. आप तो सामान और
उर्मिला शुक्ल
शिक्षा: एम.ए., पी-एच.डी. डी.
लिट्..
लेखन : छत्तीसगढ़ी और हिंदी, दोनों भाषाओं में लेखन.
उपन्यास
त्रयी-
प्रकाशन हिंदी 1. बिन बोदी का घर 2. बिन
ड्योढ़ी का घर भाग दो, 3. बिन
घर
भाग
4. मैं
तीन, कुँवर तुम
घोड़ी का बृहन्नला देहकारा का प्रेत. कहानी संग्रह- 1. फूल जागती रहना, 2. मैं फूलमती और हिजड़े, उजास और कालिमा
की
कहानियाँ सिर्फ
के पार, मेरी कहानियां, 3. बीसवीं सदी की महिला कथाकारों कहानियाँ के नवें भाग में कहानी गोदना के फूल प्रकाशित 4. हंस महिला विशेषांक- सिर्फ महिलायें अगस्त 2013 कहानी बैसवा फुलाइल मोरे अंगना प्रकाशित और चर्चित कविता संग्रह- 1 इक्कीसवीं सदी के द्वार पर. 2. गढ़ रही है औरत. 3 रैम्प पर चलती लड़कियाँ. यात्रा संस्मरण - 1. यात्रायें उस धरा की जो धरोहर हैं हमारी, 2. चाँद की धरती पर, हिम शृंगों के संग संग, आलोचना-- 1. हिंदी कहानियों में छतीसगढ़ी संस्कृति, 2. स्वतंत्र्योत्तर हिंदी कहानी बिखरते मूल्यबोध, 3 हिंदी कहानी मूल्यों के निकष पर 4 छत्तीसगढ़ी गीतों में स्त्री चेतना से विमर्श तक, 5. छत्तीसगढ़ी साहित्य के विविध आयाम
-
अनुवाद- पंजाबी, गुजराती, मराठी, कन्नड़ और उर्दू, अंग्रेजी फ्रेंच में कहानियाँ और मराठी, उर्दू और अंग्रेजी में कविताएं अनुदित.
छत्तीसगढ़ी प्रकाशन कविता संग्रह 1 कहानी संग्रह, 1 खण्ड काव्य और समीक्षा की 2 पुस्तकें प्रकाशित सम्पर्क: ए. 21 स्टील सिटी, अवति विहार, रायपुर, छत्तीसगढ़ मो. 9893294248
कुछ ऐसे लोग जुटाइये, जो मेरा साथ दे सकें."
सरपंच ने उसकी बात मान ली और वह निकल पड़ी उस अँधेरे को चीरने फिर तो मशाल की पीताभ आँच में अंधेरा सिमटने लगा और भोर होते-होते दीवारों पर सफेदी की गहरी परत चढ़ गयी. "अब ये दीवारें कबीर, नानक और गुरु घासीदास की सूक्तियों से चमकेंगी." सोचा. फिर उसकी आँखों में वो पंक्तियाँ चमक उठीं- "वारूदी सुरंग ध्वस्त युवकों ने डाला बारूद में
पानी."
यही पक्तियां थीं, जिनसे उसे राह मिली थी. वह खुश थी कि
उसने भी इस बारूद में पानी तो डाल ही दिया.
49 कथादेश मई 2026
कविताएँ
ललन चतुर्वेदी की कविताएँ
1. वह आती है हीरोइन की तरह
जैसे सुई के गिरने की आवाज नहीं आती जैसे बिल्ली पैर मारकर आती है। अंदेशा तक नहीं होता उसके आगमन का बड़ी आसानी से प्रवेश करती है। कोई हो-हल्ला नहीं, न ही कोई ताम-झाम यूँ ही कभी बोलते बतियाते कभी सोते-जागते, कभी चलते-फिरते
कोई बीमार भी नहीं सोचता उसके बारे में जब केवल आंखों में भरा हो जीवन ही जीवन और जेहन में घूम रहे हों हजारों लंबित काम ढेर सारे सपने हों आधे-अधूरे
और इतने प्यारे बच्चे जब खेल रहे हों आस-पास तमाम तरह के वैभव और ऐश्वर्य के बीच इस तथाकथित अशुभ की कल्पना कौन करे लगता तो हमेशा यही है कि वह क्यों आएगी आखिर जीवन में है उसका कौन सा काम ?
किसी को पता नहीं कि पहरा है उसका हर सांस पर और उसके इजलास में कोई मोहलत नहीं मिलती
कोई नहीं देखना चाहता उसका सौन्दर्य कि वह आती है किसी हीरोइन की तरह कर देती है तमाम दुश्चिंताओं का अंत और ले जाती है हीरो को अपने साथ
2. कामना
इतनी चीजें मत भरो थाल में कि देखकर थिर नहीं रह पाए मन
किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाऊं शुरू करने के पहले
या देखकर ही भर जाए पेट
चावल दाल के साथ क्या एक सब्जी पर्याप्त नहीं होगा?
जंगल में फैले तमाम घासों के बीच बकरी ग्रहण करती है चुनिंदा पात वह सर्वग्रासी नहीं बनना चाहती सभी प्राणियों के लिए है निर्धारित आहार
गिने-चुने लोगों से ही मिलूं
दो दिन ही मियाद होती है मेले का यह सफर तो बिलकुल अकेले का
कोशिश रहती है कि कम ही बोलूं जिल्वा पर आए केवल चुने हुए शब्द प्रार्थना के लिए पहूं नहीं संपुट स्तोत्र स्मरण की यथेष्ठता पर भरोसा रखूं.
3. तुम नहीं समझोगे
यह दिन
कितना लंबा होता जा रहा है क्या कल्प भर होगी इसकी उम्र
कब खत्म होगा इसके समाप्त होने का इंतजार
मुझे तेज रोशनी से नफरत है
मैं डरने लगता हूं उजाले से.
मैं चाहता हूं
जल्दी रात आए खूब लंबी रात
और रात की उम्र हो खूब लंबी
इतनी लंबी कि सुबह प्रतीक्षा करते-करते हो जाए जर्जर उसकी रोशनी हो जाए अंधेरे की मानिंद
तुम मेरी बात समझोगे तो कैसे
तुम तो सुनना भी नहीं चाहते मेरा एक शब्द.
50 कथादेश मई 2026
4. मैं फूलों को याद करता हूं
चाहे पहाड़ से हों दुःख तकलीफ
हों
परेशानियां
चाहे
जितनी
या जब भी चुभते हैं पैर में कांटे
मैं फूलों को याद करता हूं
मैं प्रेयसी को भेंट करता हूं एक फूल वह फूल की तरह खिल जाती
है।
मैं बागियों को भेंट करता हूँ एक फूल पड़ जाते हैं नरम उनके तेवर
एक छोटा गुलाब बदल देता है मरीज की मनोदशा
पूजा के लिए ही नहीं
जन्म, मृत्यु और पावन परिणय के क्षणों में
एक समान आती है फूलों की याद
फूलों को याद करते हुए
याद आता है उसका चार रोजा जिंदगी का सफर
उसे खिलने की बेचैनी नहीं है
उसे नहीं है अपनी सुगंध फैलाने की आतुरता
वह जानता है धरती कर रही है अपना काम शीतल फुहार उसे दे रही है आराम
आकाश कर रहा है उसका काम और भी आसान उसे मालूम है कुछ ही दिनों में
उसे धूल में मिल जाना है
यह किसी भूल-भुलैया में बिलकुल नहीं है।
उसे कोई याद करे या नहीं करे
उसे कोई फर्क नहीं पड़ता है
एक पागल प्रेमी उसे टहनियों से तोड़
प्रेयसी के जूड़े में जब खोंस रहा होता है
वह अपने मोक्ष पर मुस्कुराता
है
उसे लगता है वह पूरी धरती पर फैल गया है। और भर गया है उसकी सुगंध से पूरा आकाश.
ललन चतुर्वेदी
ललन चतुर्वेदी (मूल नाम-ललन कुमार चौबे
वास्तविक जन्म तिथि
10 मई,
1966, मुजफ्फरपुर (बिहार) के
पश्चिमी
इलाके में नारायणी नदी के
तट पर स्थित
शिक्षा
बैजलपुर
ग्राम में.
एम.ए. (हिन्दी), बी. एड.,.
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की
नेट जेआरएफ परीक्षा उत्तीर्ण.
प्रकाशित कृतियाँ प्रश्नकाल का दौर, बुद्धिजीवी और गधे (दो
व्यंग्य संकलन), ईश्वर की डायरी, यह देवताओं का सोने का
साहित्य
की
समय है एवं आवाज घर (तीन कविता संग्रह) तथा स्तरीय पत्रिकाओं तथा प्रतिष्ठित वेब पोर्टलों पर कविताएं एवं व्यंग्य प्रकाशित.
सम्पर्क 202, असीमलता अपार्टमेंट, मानसरोवर एन्क्लेव, हटिया, रांची-894003
मो. 9431582801
ईमेल: lalancsb@gmail.com
5. बच्चे अपनी मां को ढूंढते हैं।
पिता से पूछते हैं क्या खाया, क्या पीया कैसा है मौसम, कैसी है तबियत फिर देश-दुनिया का हाल-चाल कहते हैं रखिएगा अपना खयाल आप कर चुके हैं अपना काम
पढ़िए, लिखिए और कीजिए आराम ढेर सारी बातें करते हैं
थोड़ी हंसी-ठिठोली भी करते हैं
करते हैं अपने बचपन और बचपना की याद फिर ठहाके भी खूब लगाते हैं इतनी सारी बातों के बीच वे अपनी मां की चर्चा नहीं करते
पिता से हर रोज बात करते हुए वे किस बात की क्षतिपूर्ति करते हैं
जब भी कॉल आता है पिता को लगता है- बच्चे अपनी मां को ढूंढते हैं.
51 कथादेश मई 2026
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KTMDOHOR
संस्मरण / हमारी हिन्दुस्तानियत
सवाल मनुष्य बनने का है!
विश्वनाथ सचदेव
हमारी हिन्दुस्तानियत' की अब यह समापन किस्त! ऐसा नहीं कि इस स्तम्भ में व्यक्त विचारों की जरूरत अब नहीं है बल्कि तबाह का उद्घोष करते युद्ध की भीषण जघन्यता में मिसाइलों से जिस तरह मासूम जनता को निर्ममता से मारा जा रहा है और पर्यावरण क ध्वस्त किया जा रहा है, इस रौंदी जाती धरती को सद्भाव और शांति की जरूरत आज किसी भी दूसरे समय से ज्यादा होगी, लेकिन क मुश्किलों और स्वास्थ्य की सीमाओं के चलते अब हमारे लिए इसे और आगे ले जाना संभव नहीं हो पा रहा। अगर कुछ युवा मित्र, किन और तरह से, इस दिशा में काम कर सके तो हमसे अधिक आश्वस्त कोई दूसरा नहीं होगा !
'हमारी हिन्दुस्तानियत' की परिकल्पना 2024 के लोकसभा के चुनावों के दौरान हुई थी. यूं तो 2014 के बाद से ही इस देश में वृहद स्तर पर जिस तरह का सांप्रदायिक विद्वेषपूर्ण माहौल तैयार हो रहा था और हमारे समाज की साझी सांस्कृतिक विरासत को नफरत और हिंसा की आग में झोंका जा रहा था, उसका प्रतिवाद करने का जज्बा हमारी तरह हजारों लोगों के भीतर था खास तौर पर हमारी उस पीढ़ी के दिलों में, जिसने इसकी भीषण आग को अपने निजी आँगनों में जलते और धधकते देखा था, लेकिन हम इसके खतरे को उस नई पीढ़ी के साथ बांटना चाहते थे, जो बंटवारे के कई वर्षों के बाद पैदा हुई और जो इसकी विभीषिका से व्यक्तिगत और वैचारिक तौर पर अनभिज्ञ थी. हमारे हाथ में सिर्फ कलम थी और मन पर काबिज थी गहरी चोट हमें मालूम था कि इस अभियान में हम अकेले नहीं हैं, हमारी ही तरह बहुत से समानधर्मा साथी भी इसी तकलीफ से गुजर रहे हैं. शायद इसीलिए इस स्तम्भ को हमारे बहुत से विचारवान मित्रों का और कथादेश के पाठकों का सक्रिय सहयोग मिला जिसे अब तक प्रकाशित कई किश्तों में हम तीसे रचनाकारों के संस्मरणों को आपके साथ बाँट सके.
'कथादेश' के संपादक हरिनारायण ने आज के विद्वेषपूर्ण माहौल में भी अपनी पत्रिका में सितंबर 2024 के बाद से ही लगातार जिन तरह इस स्तम्भ के लिए जगह बनायी, हम उनके नैतिक साहस की दाद देते हैं. उन सभी मित्रों का तहे दिल से आभार जिन्होंने स्वयं आगे बढ़कर न सिर्फ इसके लिए लिखा, बल्कि दूसरों से भी लिखवाया और 'हिन्दुस्तानियत' की डोर को साधने में अपना सहयोग दिया इस स्तम्भ का समापन हम विश्वनाथ सचदेव के लेख से कर रहे हैं. सुधा अरोड़ा, रूपरेखा वर्मा
मेरा जन्म साहीवाल में हुआ था. सरगोधा जिले के इस गांव में, जब मेरा जन्म हुआ था वह हिंदुस्तान था, अब यह पाकिस्तान का हिस्सा है. क्वेटा भी
पाकिस्तान में है. जिंदगी के शुरुआती दो-चार साल मैंने बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा में ही बिताये थे, जहां मेरे दादा व्यापार करते थे, पिता बैंक में नौकरी करते थे. इस नाते मैं पंजाब का भी हूं और बलूचिस्तान का भी. देश के विभाजन के समय मेरा साहीवाल और मेरा क्वेटा दोनों मेरे लिए पराये हो गये. भारत मेरा देश बना बहुत
sudhaaroraa@gmail.com, rooprekhaverma1943@gmail.com
छोटा था तब में जब हम हिंदुस्तान और पाकिस्तान में बंट गये विभाजन के समय मेरा परिवार क्वेटा में था. वहीं से भागकर हम देश के भारत वाले हिस्से का हिस्सा बन गये नये भारत के नागरिक हो गये. पुराने हिंदुस्तान से नये भारत में आने का यह किस्सा उतना आसान है नहीं, जितना लग रहा है. देश के विभाजन की घोषणा के साथ ही एक ऐसा इतिहास लिखा जाना भी शुरू हो गया जिस पर आने वाली नस्लें आसानी से विश्वास नहीं कर पायेंगी. करोड़ों लोग विस्थापित हो गये
52 कथादेश मई 2026
थे, लाखों मारे गये थे. भारत से पाकिस्तान की ओर जाने वालों के काफिले उनसे छोटे नहीं थे जो पाकिस्तान से भारत आये थे. विस्थापन दुनिया भर में हुए हैं, पर भारत और पाकिस्तान में विभाजित होने वाला यह विस्थापन मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में गिना जायेगा, यह कहना गलत होगा कि मैंने यह सब देखा था, पर यह सही है कि इस विभाजन की कहानियां घर में सुनते-सुनाते ऐसा लगने लगा है जैसे वह सब मैंने देखा झेला था.
उस दिन शाम को बाऊजी घर जल्दी
आ गये थे. एक दहशत-सी थी हवा में फिर अंधेरा घिरने लगा. रात हुई. बेहद डरावनी रात थी वह एक अजीब-सा कोलाहल सुनाई देने लगा था सब तरफ छतों पर खड़े होकर चारों तरफ उठती आग का मंजर देख रहे थे लोग पिताजी ने बताया था इसके बाद क्वेटा न जाने कब तक सामान्य नहीं हो पाया. डरे सहमे हिंदू अपने घर छोड़कर भागने लगे थे. भाग रहे थे पर यह नहीं पता था जाना कहां है. एक होड़ सी लगी थी वह रेखा पार कर लेने की जिसे खींचकर अंग्रेजों ने देश का ही बंटवारा नहीं किया लाखों आंगनों और दिलों में दीवार खड़ी कर दी थी. पर आज मैं वह सब बताकर एक त्रासदी का चित्रण नहीं करना चाहता. असल में मुझे कुछ और
बताना है. मैं बताना चाहता हूं कि उस रात जब क्वेटा में नफरत की आग लगायी जा रही थी, और भी कुछ हो रहा था शहर में
भारत ले जाने वाली विशेष रेलगाड़ी में सवार होकर पाकिस्तान से बाहर निकलना चाहते थे. स्थानीय पुलिस को यह गवारा नहीं था, उसने आरोप लगाया कि बैंक का मैनेजर बैंक बंद करके आपराधिक तरीके से भाग रहा है. पिताजी को गिरफ्तार कर लिया गया. यह बात जब उस मुसलमान व्यापारी को पता चली तो वह जमानत देने के लिए थाने में आया था.
यह एकमात्र उदाहरण नहीं है अपनी तरह का बाऊजी बताते थे जिस रात क्वेटा में सांप्रदायिक हिंसा की होली जली थी उस दिन शाम को वह कार्यालय में कुछ ज्यादा देर तक अकेले बैठे कार्य निपटा रहे थे. उनके सामने वाला दफ्तर मुस्लिम लीग का कार्यालय था. तब उस कार्यालय के एक परिचित व्यक्ति ने आकर उन्हें जल्दी घर पहुंचने की सलाह दी थी और यह भी कहा था कि वह अपने भाई को, यानी मेरे
मसलन हमारी गली के दोनों किनारों पर चाचा को भी दुकान से उठाकर घर ले प्रभावशाली मुसलमानों के घर थे. उन दोनों जाएं. इस सलाह में उस मुस्लिम लीगी के
बार उन्होंने मुझसे पूछा था कि विभाजन की सारी विभीषिका झेलने के बाद यह कैसे संभव है कि मेरे मन में मुसलमान के प्रति कटुता नहीं है. तब मैंने उन्हें यह और कुछ अन्य ऐसे उदाहरण दिये थे यह समझाने के लिए कि किसी व्यक्ति के अच्छे या बुरे होने का प्रमाण उसका हिंदू या मुसलमान होना नहीं है. धार्मिक होने का यह मतलब कतई नहीं है कि किसी दूसरे धर्म वाले के प्रति नफरत का भाव रखा जाये. मुझे बाऊजी ने यह तो कभी नहीं बताया कि उनके कितने दोस्त मुसलमान थे, पर मुझे याद नहीं पड़ता कि उन्होंने कभी इस आशय का कोई संकेत दिया हो कि हमें मुसलमानों से कुछ दूरी बनाकर रखनी चाहिए. उन्होंने यह तो कभी नहीं कहा कि वह कट्टर हिंदू हैं या नहीं, पर यह कई बार जताया था कि उन्हें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पसंद नहीं है. मुझे याद है बचपन में, यानी जब में सातवीं कक्षा में पढ़ता था, उन्होंने इस बात पर डांट अवश्य पिलायी थी कि मैं बिना उनसे
के युवा सदस्य बंदूकें लेकर रात मन की चिंता साफ झलक रही थी. पिताजी पूछे आर. एस. एस के दिन भर चलने वाले
परिवारों भर छतों पर खड़े रहे थे उन्होंने गली के सभी हिंदू परिवारों को आश्वासन दिया था कि वे एक भी दंगाई को गली में नहीं घुसने देंगे. उन्होंने यह करके दिखाया. मेरे बड़े भाई आज भी याद करते हैं कि उन दो परिवारों में एक का लड़का उनके साथ
ने उसका कहा माना. उनके घर पहुंचने के
कुछ समय बाद ही अंधेरा घिरने के साथ-साथ क्वेटा के हिंदू बहुल इलाकों में आगजनी की घटनाएं घटने लग गयी थीं. हमारी गली के दोनों छोरों पर उस रात मुसलमान 'पहरेदार' अपनी बंदूकें लेकर खड़े थे...
कार्यक्रम में क्यों गया था. उनकी शिकायत दिन भर के कार्यक्रम' से नहीं थी, उन्हें संघ पसंद नहीं था. विभाजन के दौरान संघ के कार्यकर्ताओं द्वारा किये गये सहायता कार्यों की तो वे तारीफ किया करते थे, पर कुछ था जो उन्होंने देखा-सुना होगा संघ के
स्कूल में पढ़ता था. और उस डरावनी रात उस रात हमारे घर के सामने रहने वाले बारे में जो उन्हें नापसंद था. संघ वालों
महिलाओं को अपने घर में शरण दी थी
के बाद हम जितने दिन क्वेटा में रहे कुल मुसलमान वकील परिवार ने गली की हिंदू मिलाकर एक दहशत में जीने का अनुभव ही था. पर अनुभव करने के लिए और भी बहुत कुछ था जो आज भी याद आता है तो अच्छा लगता है- मसलन उस मुसलमान इसलिए बुरा नहीं हो जाता कि वह मुसलमान व्यापारी का बाऊजी की जमानत के लिए है, कि कुछ आतंकवादी मुसलमान होने का
यह कुछ उदाहरण हैं उस बात के जिसने मुझे यह सिखाया कि कोई व्यक्ति सिर्फ
थाने के दरवाजे तक पहुंचना संक्षेप में मतलब यह नहीं है कि सारे मुसलमान
बता दूं मेरे पिताजी एक बैंक में मैनेजर थे आतंकवादी हैं.
और हमारा परिवार उन परिवारों में शामिल
मेरे एक मित्र थे 'हिंदी ब्लिटज़' के
अच्छा परिचय रहा होगा उनका, क्योंकि क्वेटा में हमारे पड़ौस वाले मकान में संघ की रिहाइश थी. एक दीवार थी दोनों आंगनों के बीच, जो ज्यादा ऊंची नहीं थी. आप समझ रहे हैं न नीची दीवार का मतलब? संघ के कार्यकर्ता उस दीवार के दूसरी ओर सुना है, पड़ीसी होने के नाते अच्छे रिश्ते थे। हमारे उन युवाओं से.
यह सारी स्थितियां अवश्य मेरे सोच में
था जो क्वेटा में तैनात हिंदू सैनिकों को संपादक स्वर्गीय नंदकिशोर नौटियाल एक होंगी जब राजस्थान के कस्बे सिरोही में
53 कथादेश मई 2026
शायद राजेंद्र भाई नाम से पुकारा जाता था संघ की शाखा खोलने के लिए एक सज्जन, उन्हें जोधपुर से आये थे. जिन आठ-दस लोगों से बातचीत की थी उन्होंने उनमें
एक सातवीं आठवीं में पढ़ने वाला में भी था. संघ की शाखा में जाने लगा था मैं.
मुझे वहां गाये जाने वाले गीत बहुत अच्छे लगते थे. उनमें से एक की कुछ पंक्तियां तो मुझे आज साठ-सत्तर साल बाद भी याद हैं- 'घन-धन कलश टकोरे बोले, ईंटों से झंकार उठी है..."
एक दिन में उसे भी शाखा में ले गया. सिरोही में मेरा एक दोस्त था मिर्जा. दो-एक दिन बाद ही शाखा के घटनायक या दलनायक ने मुझसे कहा था, मिर्जा को साथ न लाया करूं. तब मुसलमानों के खिलाफ उन्होंने जो कुछ कहा वह मेरे गले नहीं उतरा था. मुझे याद है तब मैंने अपनी अलग शाखा लगायी थी पांच-सात दोस्तों के साथ. मेरी 'शाखा' तो कुछ ही दिन चल पायी, पर मेरे दोस्त मिर्जा के प्रति संघ का रवैया मेरे मन में स्थायी गांठ बन गया. सुना है, अब इस बारे में संघ वालों का रवैया कुछ बदल गया है, पर मेरे मन में जो धारणा बन गयी थी, वह नहीं बदली है. सच कहूं तो मुझे धर्म के नाम पर भारतवासियों के बीच बंटवारे का तर्क कभी समझ नहीं आया. आज सरसंघचालक भले ही भारत में जन्मे हर व्यक्ति को हिंदू कह उनकी इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहे हों, पर सामान्य संघ वाला भीतर से रहा. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उनकी राजनीतिक शाखा, भारतीय जनता पार्टी, कह कुछ भी रहे हों, पर मानते वे यही हैं कि यदि धर्म के नाम पर देश का बंटवारा हुआ था तो मुसलमानों को भारत में क्यों रहना चाहिए. संघ और भाजपा के कुछ वरिष्ठ लोग तो साफ-साफ कह भी रहे हैं कि यदि मुसलमान को भारत में रहना है
तो उन्हें द्वितीय श्रेणी का नागरिक बनकर रहना होगा. मेरे जैसे सोच वाले व्यक्ति को यह सहज समझ नहीं आ सकता कि कोई विवेकशील व्यक्ति ऐसा कैसे कर सकता
है?
को
जब हमारे नेताओं ने देश के विभाजन स्वीकार कर लिया तो यह अनुमान तो उन्हें था ही कि कुछ लोग पलायन कर सकते हैं, पर वह पलायन इतना विशाल स्तर पर होगा, यह शायद ही किसी ने सोचा होगा. पाकिस्तानी हिस्से में रहने वाले हमारे जैसे हिंदू-परिवार डरकर भारत भाग आये थे. पर उनमें से बहुत से ऐसे थे जो यह मानकर आये थे कि जल्द ही उनकी स्थितियां बदलेंगी और हम वापस अपने वतन लौट आएंगे. ऐसा मानने वालों में मेरे ननिहाल वाले भी थे जो अपने घर की चावी मुसलमान पड़ोसी को यह कहकर सौंप आये थे कि जल्दी ही लीटेंगे. पर इस 'जल्दी' का मतलब 'कभी नहीं था, यह कल्पना उन्होंने नहीं की थी.
बहरहाल, पाकिस्तान से भारत आने
वाले हमारे जैसे अधिसंख्य हिंदू यही सोचकर आये थे कि अब लीट नहीं पाएंगे. आप चाहे तो कह सकते हैं कि हम लोग यह मानकर आये थे कि अब लौटना नहीं होगा. यह भी मान लिया गया था कि बर्तन छोड़ने के अलावा हमारे पास और कोई चारा नहीं है. सच कहें तो हमने अपनी मातृभूमि डरकर छोड़ी थी. पर जो मुसलमान तब भारत छोड़कर पाकिस्तान नहीं गये थे, उन्होंने सोच-समझकर ही यह निर्णय लिया था. वे चाहते तो जा सकते थे, पर नहीं गये. यहां में उर्दू के कद्दावर शायर और अपने मित्र निदा फाजली को याद करना चाहूंगा. उनका सारा परिवार 'मुसलमानों के नये मुल्क' पाकिस्तान चला गया था, अकेले युवा निदा ने भारत में ही रहने का निर्णय किया था. उनका सोच और
54 कथादेश मई 2026
कदम
दोनों प्रशंसनीय हैं. निदा का मानना उनकी जड़ें देश के भारत वाले हिस् हैं, वे अपनी मिट्टी छोड़कर कहीं नहीं आदर्श स्थिति तो यही थी कि पाि छोड़कर भारत आने वाले हिंदू और छोड़कर पाकिस्तान जाने वाले मुसा अपनी जड़ें न छोड़ने का निर्णय ले यह आदर्श स्थिति थी. सच तो य स्थितियां ऐसी हो गयी थीं कि शायद होना या करना संभव नहीं रह गया
एक उदाहरण उर्दू के बड़े रचन इंतजार हुसैन का भी है. वे विभाजन वर्षों बाद भारत छोड़कर पाकिस्तान गये थे. यह निर्णय उन्होंने क्यों लिया क्या अपने इस निर्णय से वह बाद में थे, मैं नहीं जानता. पर इतना अवश्य ज हूं कि अपने इस निर्णय के सालों बाद वह अकसर भारत आया करते थे. बार ऐसी ही एक भारत यात्रा के दा उन्होंने बताया था, "कुछ है जो मुझे खीच यहां ले आता है. ऐसी यात्रा के दौरान अपने ननिहाल अकसर जाते थे." प्रदेश के एक छोटे से कस्बे डिवाई में उनका ननिहाल संयोग की बात यह है। विभाजन के बाद भारत आने वाले ननिहाल वाले परिवार को भी इसी दि में शरण मिली थी. जब मैंने इंतजार हु साहब को यह बताया कि देश के विभाज के बाद अब मेरा ननिहाल भी उनके ननिहा वाले डिवाई में ही है तो उन्होंने जैसे चहकन हुए कहा था, "तब तो हम आपके नाम हुए" तब मैंने इस रिश्ते को बड़े उत्साह स्वीकारा था. ऐसे ही रिश्तों की रेशमी से बंधे हैं हम भारतीय इस बंधन सहजता और ऊष्मा को अनुभव कर स्वीकार करके ही हम सही अर्थों में भारतीय हो सकते हैं. लेकिन आज जिस तरह वातावरण देश में बनाया जा रहा है हमारी भारतीयता को चुनौती ही दे रहा है
किसी भी धर्म, जाति या वर्ण-वर्ग के हों, हम पहले भारतीय हैं. जिस दिन हमें यह अहसास हो जायेगा हम रंगों का भेद भूल जाएंगे, कपड़ों से आदमी को पहचानने के दावे नहीं करेंगे.
पर हो इसका उल्टा रहा है. हमने उपासना को मंदिर-मस्जिद में ही नहीं बांटा, रंगों को ही हिंदू- मुसलमान बना दिया है. हैरानी की बात तो यह है कि इस बंटवारे से हम तनिक भी शर्मिंदा नहीं होते. देश के एक मुख्यमंत्री को यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं होता कि तुम्हें कब्रिस्तान प्रिय थे इसलिए तुमने उन्हें पैसा दिया, हमें मंदिर प्रिय हैं, हम मंदिरों को पैसा देंगे! यह समझना मुश्किल ही नहीं कि वे तुम और हम किसे कह रहे थे.
संविधान की शपथ लेकर अपने पद पर बैठने वाले किसी व्यक्ति का यह बीमार सोच वस्तुतः हमारे संविधान का अपमान है. हम यह भूल जाते हैं कि देश के विभाजन के बाद जब हमारे पूर्वजों ने संविधान बनाया तो सारा देश सांप्रदायिकता की आग की तपन सह रहा था. तब यह अस्वाभाविक नहीं होता कि पाकिस्तान की तर्ज पर ही हमारे संविधान निर्माता भी भारत को हिंदू
राष्ट्र घोषित कर देते. वस्तुतः इस आशय की मांग उठी भी थी. लाखों शरणार्थियों का हवाला देकर यह भी कहा गया था कि भारत में रहने का निर्णय करने वाले मुसलमानों को या तो पाकिस्तान भेज दिया जाये, या फिर द्वितीय श्रेणी का नागरिक बनाया जाये. पर हमारे समझदार संविधान निर्माताओं के विवेक को यह स्वीकार नहीं था. उन्होंने भारत को एक
पंथ निरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया, जो समता, न्याय और बंधुता के आदर्शों के आधार पर खड़ा था. हमारा संविधान हर नागरिक को अपने विवेक के अनुसार धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता और अधिकार देता है.
6) आधी सदी का फासला
विश्वनाथ सचदेव
जन्म 2 फरवरी 1942. साहीवाल, अब पाकिस्तान का हिस्सा है.
शिक्षा एम.ए. (अंग्रेजी साहित्य), राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर. बी.जे., नागपुर विश्वविद्यालय.
प्रकाशन 1) हिंदी-अंग्रेजी विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर लेखन. 2) में गवाही देता हूं (काव्य संकलन), 3) तटस्थता के विरुद्ध (लेख संकलन),
4) (लेख-संकलन) पुरस्कार-सम्मान : 1) 'मैं गवाही देता हूँ (काव्य-संकलन) भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत, 2) पत्रकारिता के क्षेत्र में की गयी सेवाओं के लिए मारवाड़ी सम्मेलन मुंबई द्वारा दुर्गाबाई सराफ पुरस्कार, 3) श्रेष्ठ पत्रकारिता के लिए सहयोग पुरस्कार, 4) साम्प्रदायिक सौहार्द के लेखन के लिए मौलाना अब्दुल कलाम आजाद सम्मान (1997), 5) श्रेष्ठ पत्रकारिता के लिए आचार्य तुलसी सम्मान (2000), 6) परिवार पुरस्कार (2000), 7) श्रेष्ठ पत्रकारिता के लिए जायंट इंटरनेशनल सम्मान (2002), 8) सौहार्द सम्मान ( उत्तर प्रदेश सरकार), 9) वरिष्ठ साहित्यकार सम्मान, राजस्थान साहित्य अकादमी, 10) हिंदी पत्रकारिता में योगदान के लिए राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित (2012), रेडियो, टी.वी. पर पिछले 30 वर्ष से अनेक कार्यक्रम, दूरदर्शन पर सच की परछाई‍ एवं स्टार टी.वी. पर 'अर्द्धशताब्दी' काफी चर्चित रहे.
मैं जो हूं (काव्य संकलन), 5) सवालों के घेरे (लेख-संकलन),
यही नहीं, हमारा संविधान हर नागरिक को यह अधिकार भी देता है कि वह न्यायपूर्ण तरीके से अपने धर्म और आस्था का प्रचार भी कर सकता है.
के
ऐसे में जब हम यह देखते हैं कि देश नागरिकों को धर्म के आधार पर बांटने की कोशिशें हो रही हैं, गैर-हिंदुओं के सामाजिक बहिष्कार की खुले आम मांग होने लगी है तो हैरानी नहीं होती, पीड़ा
होती है. हम यह भूल जाते हैं कि हमारे पूर्वजों ने इस देश में गंगा-जमुनी संस्कृति को विकसित करके मनुष्यता को एक नयी और ठोस पहचान दी है. इसी संस्कृति के आधार पर हमारा देश आज विकास के उस शिखर पर है जो हमारे साथ ही स्वतंत्र हुए देश, पाकिस्तान के लिए ईर्ष्या की वस्तु बना हुआ है. यह संस्कृति हमें सिखाती है कि मानव समाज को धर्मों-जातियों में 55 कथादेश मई 2026
बांटकर हम मनुष्यता को ही कलंकित करते हैं. यह देश हिंदू या मुसलमान का नहीं, भारतीयों का है. इस देश का हर नागरिक प्रथमतः और अंततः भारतीय ही है. भारत को अस्सी और बीस के बीच में बांटने का मतलब एक ऐसे विभाजन को जन्म देना है। जो हमें हिंदू और मुसलमान तो बना सकता है, मनुष्य नहीं.
अब यह हमें तय करना है कि हम मनुष्य बने रहना चाहते हैं अथवा नहीं. मनुष्य बनने का मतलब हमें क्वेटा के उन मुसलमान युवकों ने समझाया था जो विश्वनाथ की गली के हिंदुओं की रक्षा के लिए सारी रात बंदूकें लेकर खड़े रहे थे ताकि कोई दंगाई उस गली में रहने वाले हिंदू परिवारों को कोई नुकसान न पहुंच सके!
O
शायद राजेंद्र भाई नाम से पुकारा जाता था संघ की शाखा खोलने के लिए एक सज्जन उन्हें जोधपुर से आये थे. जिन आठ-दस लोगों से बातचीत की थी उन्होंने, उनमें एक सातवीं आठवीं में पढ़ने वाला में भी था. संघ की शाखा में जाने लगा था में. मुझे वहां गाये जाने वाले गीत बहुत अच्छे लगते थे. उनमें से एक की कुछ पंक्तियां तो मुझे आज साठ-सत्तर साल बाद भी याद हैं- 'घन-धन कलश टकोरे बोले, ईंटों से झंकार उठी है..."
सिरोही में मेरा एक दोस्त था मिर्जा. एक दिन मैं उसे भी शाखा में ले गया. दो-एक दिन बाद ही शाखा के घटनायक या दलनायक ने मुझसे कहा था, मिर्जा को साथ न लाया करूं, तब मुसलमानों के खिलाफ उन्होंने जो कुछ कहा वह मेरे गले नहीं उतरा था. मुझे याद है तब मैंने अपनी अलग शाखा लगायी थी पांच-सात दोस्तों के साथ. मेरी 'शाखा' तो कुछ ही दिन चल पावी, पर मेरे दोस्त मिर्जा के प्रति संघ का रवैया मेरे मन में स्थायी गांठ बन गया. सुना है, अब इस बारे में संघ वालों का रवैया कुछ बदल गया है, पर मेरे मन में जो धारणा बन गयी थी, वह नहीं बदली है. सच कहूं तो मुझे धर्म के नाम पर भारतवासियों के बीच बंटवारे का तर्क कभी समझ नहीं आया. आज सरसंघचालक भले ही भारत में जन्मे हर व्यक्ति को हिंदू कह रहे हों, पर सामान्य संघ वाला भीतर से उनकी इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहा. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उनकी राजनीतिक शाखा, भारतीय जनता पार्टी कह कुछ भी रहे हों, पर मानते वे यही हैं कि यदि धर्म के नाम पर देश का बंटवारा हुआ था तो मुसलमानों को भारत में क्यों रहना चाहिए. संघ और भाजपा के कुछ वरिष्ठ लोग तो साफ-साफ कह भी रहे हैं कि यदि मुसलमान को भारत में रहना है
तो उन्हें द्वितीय श्रेणी का नागरिक बनकर रहना होगा. मेरे जैसे सोच वाले व्यक्ति को यह सहज समझ नहीं आ सकता कि कोई विवेकशील व्यक्ति ऐसा कैसे कर सकता है?
जब हमारे नेताओं ने देश के विभाजन को स्वीकार कर लिया तो यह अनुमान तो उन्हें था ही कि कुछ लोग पलायन कर सकते हैं, पर यह पलायन इतना विशाल स्तर पर होगा, यह शायद ही किसी ने सोचा होगा. पाकिस्तानी हिस्से में रहने वाले हमारे जैसे हिंदू-परिवार डरकर भारत भाग आये थे. पर उनमें से बहुत से ऐसे थे जो यह मानकर आये थे कि जल्द ही उनकी स्थितियां बदलेंगी और हम वापस "अपने वतन लौट आएंगे. ऐसा मानने वालों में मेरे ननिहाल वाले भी थे जो अपने घर की चाबी मुसलमान पड़ौसी को यह कहकर सौंप आये थे कि जल्दी ही लीटेंगे. पर इस 'जल्दी' का मतलब 'कभी नहीं था, यह कल्पना उन्होंने नहीं की थी.
बहरहाल, पाकिस्तान से भारत आने वाले हमारे जैसे अधिसंख्य हिंदू यही सोचकर आये थे कि अब लीट नहीं पाएंगे. आप चाहे तो कह सकते हैं कि हम लोग यह मानकर आये थे कि अब लौटना नहीं होगा. यह भी मान लिया गया था कि वतन छोड़ने के अलावा हमारे पास और कोई चारा नहीं है. सच कहें तो हमने अपनी मातृभूमि डरकर छोड़ी थी. पर जो मुसलमान तब भारत छोड़कर पाकिस्तान नहीं गये थे, उन्होंने सोच-समझकर ही यह निर्णय लिया था. वे चाहते तो जा सकते थे, पर नहीं गये. यहां मैं उर्दू के कद्दावर शायर और अपने मित्र निदा फाजली को याद करना चाहूंगा. उनका सारा परिवार 'मुसलमानों के नये मुल्क' पाकिस्तान चला गया था, अकेले युवा निदा ने भारत में ही रहने का निर्णय किया था. उनका सोच और कदम
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दोनों प्रशंसनीय हैं. निदा का मानना उनकी जड़ें देश के भारत वाले हिस्स हैं, वे अपनी मिट्टी छोड़कर कहीं नहीं आदर्श स्थिति तो यही थी कि पा छोड़कर भारत आने वाले हिंदू और छोड़कर पाकिस्तान जाने वाले मुस अपनी जड़ें न छोड़ने का निर्णय ले यह आदर्श स्थिति थी. सच तो यह स्थितियां ऐसी हो गयी थीं कि शाय होना या करना संभव नहीं रह गया
एक उदाहरण उर्दू के बड़े रचन इंतजार हुसैन का भी है. वे विभाजन वर्षों बाद भारत छोड़कर पाकिस्तान गये थे. यह निर्णय उन्होंने क्यों लिया क्या अपने इस निर्णय से वह बाद में थे, मैं नहीं जानता. पर इतना अवश्य ज हूं कि अपने इस निर्णय के सालों बाद वह अकसर भारत आया करते थे. बार ऐसी ही एक भारत यात्रा के उन्होंने बताया था, “कुछ है जो मुझे खींच यहां ले आता है. ऐसी यात्रा के दौरान अपने ननिहाल अकसर जाते थे." प्रदेश के एक छोटे से कस्बे डिबाई में उनका ननिहाल संयोग की बात यह है विभाजन के बाद भारत आने वाले ननिहाल वाले परिवार को भी इसी डि में शरण मिली थी. जब मैंने इंतजार हु साहब को यह बताया कि देश के विभाग के बाद अब मेरा ननिहाल भी उनके ननिहत् वाले डिबाई में ही है तो उन्होंने जैसे चहक हुए कहा था, "तब तो हम आपके मान हुए।" तब मैंने इस रिश्ते को बड़े उत्साह स्वीकारा था. ऐसे ही रिश्तों की रेशमी से बंधे हैं हम भारतीय. इस बंधन सहजता और ऊष्मा को अनुभव कर स्वीकार करके ही हम सही अर्थों में भारतीय सकते हैं. लेकिन आज जिस तरह वातावरण देश में बनाया जा रहा है हमारी भारतीयता को चुनौती ही दे रहा है
हो
किसी भी धर्म, जाति या वर्ण-वर्ग के हों, हम पहले भारतीय हैं, जिस दिन हमें यह अहसास हो जायेगा हम रंगों का भेद भूल जाएंगे, कपड़ों से आदमी को पहचानने के दावे नहीं करेंगे..
पर हो इसका उल्टा रहा है. हमने उपासना को मंदिर-मस्जिद में ही नहीं बांटा, रंगों को ही हिंदू- मुसलमान बना दिया है. हैरानी की बात तो यह है कि इस बंटवारे से हम तनिक भी शर्मिंदा नहीं होते. देश के एक मुख्यमंत्री को यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं होता कि तुम्हें कब्रिस्तान प्रिय थे इसलिए तुमने उन्हें पैसा दिया, हमें मंदिर प्रिय हैं, हम मंदिरों को पैसा देंगे! यह समझना मुश्किल ही नहीं कि वे तुम और हम किसे कह रहे थे.
संविधान की शपथ लेकर अपने पद पर बैठने वाले किसी व्यक्ति का यह बीमार सोच वस्तुतः हमारे संविधान का अपमान है. हम यह भूल जाते हैं कि देश के विभाजन के बाद जब हमारे पूर्वजों ने संविधान बनाया तो सारा देश सांप्रदायिकता की आग की तपन सह रहा था. तब यह अस्वाभाविक नहीं होता कि पाकिस्तान की तर्ज पर ही हमारे संविधान निर्माता भी भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित कर देते. वस्तुतः इस आशय की मांग उठी भी थी. लाखों शरणार्थियों का हवाला देकर यह भी कहा गया था कि भारत में रहने का निर्णय करने वाले मुसलमानों को या तो पाकिस्तान भेज दिया जाये, या फिर द्वितीय श्रेणी का नागरिक बनाया जाये. पर हमारे समझदार संविधान निर्माताओं के विवेक को यह स्वीकार नहीं था. उन्होंने भारत को एक पंथ निरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया, जो समता, न्याय और बंधुता के आदर्शों के आधार पर खड़ा था. हमारा संविधान हर नागरिक को अपने विवेक के अनुसार धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता और अधिकार देता है.
विश्वनाथ सचदेव
जन्म 2 फरवरी 1942. साहीवाल, अब पाकिस्तान का
हिस्सा
है.
शिक्षा: एम.ए. (अंग्रेजी साहित्य), राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर. बी. जे. नागपुर विश्वविद्यालय.
प्रकाशन 1) हिंदी-अंग्रेजी विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर लेखन. 2) मैं गवाही देता हूं' (काव्य संकलन), 3) तटस्थता के विरुद्ध (लेख संकलन), मैं जो हूं (काव्य संकलन), 5) सवालों के घेरे (लेख-संकलन), 6) आधी सदी का फासला ( लेख संकलन )
4)
पुरस्कार-सम्मान : 1) 'मैं गवाही देता हूँ (काव्य संकलन) भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत, 2) पत्रकारिता के क्षेत्र में की गयी सेवाओं के लिए मारवाड़ी सम्मेलन मुंबई द्वारा दुर्गाबाई सराफ पुरस्कार, 3) श्रेष्ठ पत्रकारिता के लिए सहयोग पुरस्कार, 4) साम्प्रदायिक सौहार्द के लेखन के लिए मौलाना अब्दुल कलाम आजाद सम्मान (1997), 5) श्रेष्ठ पत्रकारिता के लिए आचार्य तुलसी सम्मान (2000), 6) परिवार पुरस्कार (2000), 7) श्रेष्ठ पत्रकारिता के लिए जायंट इंटरनेशनल सम्मान (2002), 8) सौहार्द सम्मान ( उत्तर प्रदेश सरकार), 9) वरिष्ठ साहित्यकार सम्मान, राजस्थान साहित्य अकादमी, 10) हिंदी पत्रकारिता में योगदान के लिए राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित (2012), रेडियो, टी.वी. पर पिछले 30 वर्ष से अनेक कार्यक्रम दूरदर्शन पर इसच की परछाईं‍ एवं स्टार टी.वी. पर 'अर्द्धशताब्दी काफी चर्चित रहे.
यही नहीं, हमारा संविधान हर नागरिक को यह अधिकार भी देता है कि वह न्यायपूर्ण तरीके से अपने धर्म और आस्था का प्रचार भी कर सकता है.
ऐसे में जब हम यह देखते हैं कि देश के नागरिकों को धर्म के आधार पर बांटने की कोशिशें हो रही हैं, गैर-हिंदुओं के सामाजिक बहिष्कार की खुले आम मांग होने लगी है तो हैरानी नहीं होती, पीड़ा
होती है. हम यह भूल जाते हैं कि हमारे पूर्वजों ने इस देश में गंगा-जमुनी संस्कृति को विकसित करके मनुष्यता को एक नयी और ठोस पहचान दी है. इसी संस्कृति के आधार पर हमारा देश आज विकास के उस शिखर पर है जो हमारे साथ ही स्वतंत्र हुए देश, पाकिस्तान के लिए ईर्ष्या की वस्तु बना हुआ है. यह संस्कृति हमें सिखाती है कि मानव समाज को धर्मों-जातियों में
55 कथादेश मई 2026
बांटकर हम मनुष्यता को ही कलंकित करते हैं. यह देश हिंदू या मुसलमान का नहीं, भारतीयों का है. इस देश का हर नागरिक प्रथमतः और अंततः भारतीय ही है. भारत को अस्सी और बीस के बीच में बांटने का मतलब एक ऐसे विभाजन को जन्म देना है जो हमें हिंदू और मुसलमान तो बना सकता है, मनुष्य नहीं.
अब यह हमें तय करना है कि हम मनुष्य बने रहना चाहते हैं अथवा नहीं. मनुष्य बनने का मतलब हमें क्वेटा के उन मुसलमान युवकों ने समझाया था जो विश्वनाथ की गली के हिंदुओं की रक्षा के लिए सारी रात बंदूकें लेकर खड़े रहे थे ताकि कोई दंगाई उस गली में रहने वाले हिंदू परिवारों को कोई नुकसान न पहुंच सके!
कहानी ●
टुकटुकी का पसारा
'कटुकी में पिता... पिता में माँ
ऋतु त्यागी
बहुत दूर एक छोटे से गाँव में, जहाँ बरसात के बाद सारे ताल-तलैया और पोखर भर जाते थे, वहीं एक चौंतीस पैंतीस बरस की औरत और उसकी आठ बरस की बेटी टुकटुकी रहते थे.... स्त्री का व्यापारी पति उसे जवानी में ही छोड़कर दूसरा घर बसा चुका था. स्त्री ने खूब पैर पीटे, रोयी धोयी पर वह नहीं रुका, उस समय टुकटुकी सिर्फ छह साल की थी. स्त्री गुजर बसर के लिए जैसे-तैसे पास के पोखर में मछलियाँ पालकर बेचने लगी. पेट को भरने के लिए उसके पास वही एक उपाय था. टुकटुकी अब आठ बरस की हो चली थी. टुकटुकी का स्कूल पैसों के अभाव में छूट चुका था. माँ के बाजार जाने पर अकेली टुकटुकी पोखर के पास ही बैठी रहती. पोखर के चारों तरफ खूब झाड़ झंकार और पेड़ थे.
वह वहीं पोखर के किनारे बैठकर पक्षियों को देखती रहती. धीरे-धीरे उसे पक्षियों के साथ समय बिताना अच्छा लगने लगा. अब वह पक्षियों को देखकर उनके साथ खेलने की कोशिश करने लगी. वह उन्हें देख ताली बजाती तो पक्षी पहले तो डरकर उड़ जाते, फिर कुछ दिनों में उसने देखा कि उसकी ताली पर पक्षी उड़ते नहीं हैं बल्कि अपने पंख फटकारकर जैसे उसे डाँट रहे होते थे. वह समझ गई थी कि अब उन्होंने उससे डरना बंद कर दिया है, वह शायद उसके दोस्त बन गए थे. अब वह कभी-कभी भागकर उनके पास पहुँच जाती. पक्षी भी कभी उसके सिर पर तो कभी कंधों पर बैठ जाते. टुकटुकी घर से अपने फ्रॉक में बाँधकर चावल के कुछ दाने लाने लगी. पक्षी उसकी हथेली से दाना चुगते फिर उसके आस पास ही घूमते रहते. टुकटुकी को उनके पंखों पर हाथ फेरना बहुत अच्छा लगता. छोटी-छोटी मछलियों को तलैया में तैरते हुए देखना भी. ये सभी उसके एकांत के साथी बन गए थे. रात के अँधेरे के उसके साथी जुगनू ये जिन्हें वह अपनी मुट्ठी में बंद करती, फिर उँगलियों के बीच के अवकाश में उनते प्रकाश में डूब जाती. चिरमिराते सन्नाटे में उसे दोस्त मिल गए थे. टुकटुकी की चाहती थी, पर पैसों के अभाव में कुछ भी नहीं हो पा रहा था. माँ चाहती थी कि टुकटुकी फिर से पढ़ने लगे. टुकटुकी भी यही
56 कथादेश
एक दिन माँ के बाजार जाने के बाद टुकटुकी अपनी जंगली दुनिया में विचर रही थी. उस समय किसी तश्तरी की लटकते आसमान पर बादल घुमड़ रहे थे. हवा के झोंको में गुला गंध थी. उसके उदास मन को हवा छेड़ रही थी. तभी उसने के कि तलैया के पास की मिट्टी में एक सुनहरा छल्ला पड़ा था. उस चमक में डूबी टुकटुकी दौड़कर उसके पास गई तो देखा कि अंगूठी थी, शायद सोने की.. टुकटुकी को जैसा गड़ा खजाना ि गया था. जिससे दरिद्रता भाग जाएगी. वह माँ के बाजार से ली की राह तकती रही माँ शाम को लौटी लस्त पस्त... टुकटु अंगूठी दिखाकर माँ को खुश कर देना चाहती थी. धैर्य का था तोड़कर वह माँ के पास दौड़ी चली गई. टुकटुकी को लग था... शायद... माँ अँगूठी देखकर खुश होगी.
"इसे वहीं फेंक आ जहाँ से लायी है."
अंगूठी देखते ही माँ के स्वर से विषाद की हल्की रेख गुज जिसे देख टुकटुकी घबरा गई. टुकटुकी अंगूठी को वापिस उन जगह रख आई थी. जहाँ से उठा लायी थी. दिन बीत रहे सरक रहे थे... माँ ने किसी तरह टुकटुकी को स्कूल में भर्ती करा दिया था. अँगूठी का रहस्य बहुत समय तक टुकटुकी के साथ चलता रहा... कौन ले गया? कहाँ गई? बहुत खोजने पर भी अंगूठी उसे ना मिली.
टुकटुकी अब दस बरस की थी. वह अब आते-जाते बच्चों पिता को देख अपने पिता को याद करती. उसके भीतर पिता उगने लगे थे. तालाब में कंकर फेंक वह पिता को पुकारती पर वह नहीं आते, फिर जोर से पुकारती पर वह फिर भी नहीं आते. एक दिन उसने सपने में पिता को देखा, जो फिर से उसके साथ रहने लगे थे. उस दिन टुकटुकी दिन भर खुश रही. एक दिन माँ से पूछ बैठी कि पिता क्यों चले गए। मां पिता का नाम आने पर रोने लगती बस यही कहती कि डकिनी ले गई.
एक दिन टुकटुकी ने देखा कि पिता लौट आए हैं. पिता थोड़े बूढ़े और थके से लगे. टुकटुकी पिता के आने पर गर्दन ऊँची कर चलने लगी पर मां का रवैया चिड़चिड़ा हो गया था. माँ को उनके आने से जैसे कोई सुख नहीं था. पिता कुछ दिन रहकर फिर लौटने मई 2026
लगे. टुकटुकी पिता को रोकना चाहती थी पर मां की तरफ देखकर
कुछ नहीं कहा. पिता ने चलते हुए कुछ पैसा मां के हाथ में रख
दिया जिसे
माँ
ने
बिना समय गँवाए जमीन पर फेंक दिया. टुकटुकी दोनों को देख रही थी. टुकटुकी पिता को मां के पास खड़े देखना चाहती है. पिता माफी मांग रहे हैं पर माँ के मन में डंकनी का साया इस कदर बैठ गया था कि वह पिता की किसी बात पर भरोसा नहीं करती थी. भरोसा भी करे तो कैसे? पिता ने माँ का साथ तब छोड़ा था जब उसे उनकी सबसे ज्यादा जरूरत थी, ऐसा माँ कहती है.
टुकटुकी को कभी-कभी लगता है कि माँ के व्यवहार से पिता बहुत दूर चले गए थे या माँ और पिता के बीच कोई तीसरा आकर बैठ गया था, शायद एक अदृश्य स्त्री जिसे माँ डंकिनी कहती और पिता जैसे उसका नाम ही नहीं जानते थे या फिर नाम लेना ही नहीं चाहते थे. टुकटुकी उस औरत को देखना चाहती थी जिसे माँ डंकिनी कहती है. एक दिन पिता आए... माँ से फिर झगड़ा हुआ और पिता फिर से वापिस उस दिन पिता ही नहीं गए उनके
चित्र: संदीप राशिनकर
संदीप राशिनकद्र
पीछे-पीछे टुकटुकी भी चल दी. पिता एक पगडंडी पर चले जा रहे थे. बिना मुड़े वो जैसे भागे चले जा रहे थे टुकटुकी उनके पीछे... थोड़ी देर में पिता एक घर में घुस गए. टुकटुकी एक पेड़ अपनी मुट्ठी में भरकर ले आती और अपने बिस्तर के आसपास के पीछे छिपी देख रही थी कि तभी दरवाजा बंद हो गया. वह पिता छोड़ देती फिर उन्हें देखते हुए सो जाती. उसके साथ पढ़ने वाली को देखने खिड़की के करीब पहुंची... खिड़की का पल्ला दुलका बिन्नी कहती है कि जुगनू सपनों में रोशनी भर देते हैं. हुआ था, उसने धीरे से उसे खोलकर देखा, वहाँ सिर्फ पिता थे. टुकटुकी अभी चौथी कक्षा में ही पढ़ती है. पढ़ाई ना छूटती तो अकेले बिल्कुल अकेले, जमीन पर एक टाट का टुकड़ा जिस पर इस बरस छठी कक्षा में होती. उसकी कक्षा के साथी उससे थोड़ा बैठकर वह रो रहे थे. पिता को देख टुकटुकी भी रोने लगी. छोटे हैं. वह उनसे कुछ भी कहने से कतराती है इसलिए वह स्कूल सुबकियों में सील चुके पिता ने टुकटुकी को देख लिया. घबराई हुई से निकलकर सीधे पोखर के पास जा बैठती. आसपास की सुगंध टुकटुकी ने खिड़की का पल्ला कसकर पकड़ लिया था कमरे से से निर्लिप्त पोखर की मछलियाँ पानी में तेजी से तैरती रहती. बाहर निकले पिता का हाथ टुकटुकी के सिर पर था और आँखों टुकटुकी खामोशी से उन्हें देखती रहती, उसे लगता है इन मछलियों में वहाँ फिर से आने की मनाही. टुकटुकी वहाँ से लौट पड़ी पर वह और उसकी माँ में जरूर कोई नाता है. उसकी माँ भी इसी तरह उस स्त्री को देखना चाहती थी जिसे माँ डंकिनी कहती थी और लगातार काम करती रहती है. शायद वह खुद को इतना थका देना चाहती है कि कुछ सोच ही ना पाये.
जिसके लिए पिता घर छोड़ आए थे. पर वह उसे कहीं नहीं दिखी. लौटती हुई टुकटुकी का चेहरा आँसुओं से भीगा था. पिता इतने पास रहते हैं उसे पता ही ना था वह चाहती थी कि पिता उनके साथ रहें... पर माँ... जो अपनी शेष उम्र धोखे की याद में डूबी थी, कि मन से पिता कहीं मिट चुके थे.
पिता अब अकसर आते-जाते रहे ऊपर माँ उनके आने की आंच को महसूस नहीं कर पाती. नैराश्य की राख के पर बैठी वह शायद उनके जाने की राह देखती रहती या उनके रुकने को देखती रहती थी. दोनों के बीच का वह अनवोला दोनों को ही काट रहा था. कटते हुए पिता तड़पते और फिर भाग जाते माँ उन्हें भागते देखती और फिर राख में तब्दील हो जाती. टुकटुकी दोनों के बीच की खाली जगह को जुगनू की रोशनी से भर देना चाहती थी. जुगनू दिन में नहीं आते, रात में आते वह बजते सन्नाटे से उन्हें
टुकटुकी पिता को अपने पास रखना चाहती थी. और बच्चों के पिता की तरह चाहने से कुछ नहीं होता ऐसा माँ कहती है. भरोसे से होता है पर भरोसे का क्या करे? भरोसा तो सोने की तरह होता है जिसे कोई भी उड़ा सकता है जैसे माँ का तो उड़ चुका था. माँ ने बहुत बाद में बताया था कि पिता बहुत पहले उस औरत को घर में ले आए थे. माँ के विरोध करने पर पिता ने पहली बार माँ पर हाथ उठाया. उस दिन के बाद माँ में ना जाने कहाँ से
साहस आया? पहले तो उसने उस स्त्री को धकेला फिर पिता को. पिता ने माँ का यह रूप शायद पहली बार देखा था. उम्मीद से हटा माँ का रूप माँ को बस अब टुकटुकी की फिक्र थी. और शायद अपने स्वाभिमान की थोड़ी ज्यादा. टुकटुकी को ऐसा ही लगता है कि माँ को उदासी का रंग भला लगने लगा है. 57 कथादेश मई 2026
लघुकथा
असवाद
खलील जिब्रान
अनुवाद: सुकेश साहनी
अपने जन्म के तीन दिन बाद भी मैं अपने चारों ओर नए संसार को हैरत और घबराहट से देख रहा था. मेरी माँ ने नर्स से
पूछा, "ठीक तो है न मेरा बच्चा?"
होते ही इतना हँसमुख हो." नर्स ने कहा, "मैडम, बच्चा विल्कुल ठीक है, मैंने इसे तीन बार दूध पिलाया है. मैंने आज तक ऐसा बच्चा नहीं देखा जो पैदा
सुनकर मुझे गुस्सा आया, मैं चिल्ला पड़ा, "माँ, यह सच नहीं है. मेरा बिस्तर सख्त है, दूध का स्वाद बहुत कड़वा था, थाय की छातियों की दुर्गन्ध मेरे लिए असहा है. मैं बहुत दयनीय हालत में हूँ."
लेकिन मेरी बात माँ और नर्स दोनों ही नहीं समझ सकीं क्योंकि में उसी दुनिया की भाषा में बात कर रहा था, जहाँ से में
आया था.
कि आपका बच्चा जन्मजात पंडित मालूम होता है." मेरे जीवन के इक्कीसवें दिन पुजारी जी आए और मुझपर पवित्र जल छिड़कते हुए माँ से बोले, "आपको खुश होना चाहिए
मुझे ताज्जुब हुआ, मैंने पुजारी से कहा, "तब तो तुम्हारी स्वर्गवासी माँ को दुखी होना चाहिए, क्योंकि तुम तो जन्मजात पुजारी
नहीं थे."
पुजारी भी मेरी भाषा नहीं समझ सका.
के सभी गुण हैं." सात महीने बाद एक भविष्यवक्ता ने मुझे देखकर माँ से कहा, "तुम्हारा बेटा बहुत बड़ा राजनीतिज्ञ बनेगा, उसमें महान नेता
मैं मारे गुस्से के चीख पड़ा, "गलत... मुझे संगीतज्ञ बनना है, संगीतज्ञ के अतिरिक्त में और कुछ नहीं बनूंगा.'
पर आश्चर्य... उस उम्र में भी मेरी भाषा किसी के पत्ते नहीं पड़ी.
आज मैं तैंतीस वर्ष का हो गया हूँ. इन वर्षों में मेरी माँ, नर्स और पुजारी सब मर चुके हैं पर वह भविष्यवक्ता अभी जीवित है. कल ही मेरी मुलाकात उससे मंदिर के प्रवेशद्वार पर हुई थी. बातों ही बातों में उसने कहा था, "मुझे शुरू से ही पता था कि तुम संगीतज्ञ बनोगे, इस बारे में मैंने तुम्हारे वचपन में ही भविष्यवाणी कर दी थी."
मैंने उसकी बात पर आसानी से विश्वास कर लिया क्योंकि अब में स्वयं नन्हें बच्चों की भाषा नहीं समझ पाता
O
जिस दिन टुकटुकी पिता के पीछे-पीछे गई थी उसके बाद फिर से पिता बहुत समय तक नहीं लौटे. उस दिन जुगनू भी रात को नहीं आए. टुकटुकी पोखर के पास बैठकर रोती रही पर पिता फिर भी नहीं आए यस बहुत समय के बाद उनका एक खत आया. वह अब थोड़ा पढ़ने लगी थी. पिता ने खत में माँ से क्षमा मांगी थी जिसे माँ अब देना चाहती थी. उस खत को पढ़कर माँ सिसकियों में डूब गई. उस दिन जुगनू भी लीट आए थे. यह रहस्य था वा उजालों का संदेश था. पिता लौट रहे हैं उनकी सजा शायद पूरी हो गई थी. माँ ने शायद उन्हें क्षमा कर दिया था. माँ को उसने पहली बार गुनगुनाते हुए सुना था. माँ समझ गयी थी पिता का अपराध बोध उन्हें जला रहा था. पिता शायद बार-बार क्षमा मांगने आते
थे.
पिता जब आए थे तब माँ चुप रही. उसने माछी बनायी है। पिता का आना माँ को भला लगा था पर पता नहीं फिर क्या हुआ ? टुकटुकी ने अगले दिन माँ को पिता से कहते हुए सुना था "जाओ तुम उसी औरत के साथ रहो, मुझे अकेले रहना आ गया है, उसे शायद ना आया हो. बस टुकटुकी से मिलने आते रहना. जाओ अब तुम पछताए यही बहुत है."
उस दिन के बाद फिर पिता नहीं आए. जिस दिन पिता हमेशा के लिए गए टुकटुकी ने सारे जुगनुओं को अपनी कैद से मुक्त कर दिवा.
टुकटुकी अब सारे सूखे पीले भूरे पत्तों को कुरमुराने से पहले हरा कर देना चाहती थी. माँ अब नींद में बड़बड़ाती नहीं है. उसे नींद आने लगी है. अच्छी नींद की तासीर यही है कि वो समंदर के 58 कथादेश मई 2026
सीप के उस मोती में होती है जिसने अपनी चमक के लिए सैकड़ों नदियों के प्रेम को समंदर के सीने पर रख दिया. पिता को क्षमा कर माँ मुक्त हो गयी थी पर माँ के कहने भर से पिता की गलन कम नहीं हो रही थी, ऐसा टुकटुकी को लगता है. पिता खुश नहीं हैं. क्या माँ का दिया शाप पिता को जा लगा है? उस औरत के साथ रहकर भी पिता खुश नहीं रह पाए, क्यों नहीं रह पाए ? पिता खुश क्यों नहीं है? उन्हें होना चाहिए जिस दिन माँ क्षमा किया. पिता वहाँ से निकल गए थे. सनसनाते सन्नाटे की एक टांग को पकड़... दूर तक रगड़ते रहे उसे... फिर अचानक टुकटुकी को उनकी कराह सुनाई दी, जो जंगल के कलेजे को चीर
ने
पिता
को
रही थी. टुकटुकी को लग रहा था जैसे पिता की कराह से सारे ताल-तलैया, मछलियाँ, पक्षी, पेड़-पौधे और जुगनू सब कराह रहे थे. पूरा जंगल टीसने लगा था. ग्लानि गलाकर ही पीछा छोड़ती है. उससे मुक्ति का शायद पिता के पास एक ही रास्ता था....
टुकटुकी में माँ... माँ
माँ बूढ़ी.
में पिता
ऋतु त्यागी 1 फरवरी
जन्म
सम्प्रति
पी.जी.टी हिंदी केंद्रीय
विद्यालय एनटीपीसी बदरपुर
में कविताएँ तथा कहानियाँ प्रकाशित.
रचनाएँ
विभिन्न
पत्र-पत्रिकाओं
पुस्तकें
कुछ
लापता
ख्वाबों की
वापसी समय
की धुन पर मुझे
पतंग हो जाना है तथा तितलियों के
शहर में (काव्य संग्रह), एक स्कर्ट की चाह (कहानी संग्रह) सम्पर्क: पता-45, ग्रेटर गंगा, गंगानगर, मेरठ
मो.
9411904088
टुकटुकी उस दिन बहुत रोयी थी. सारी रात बाहर बैठकर
थी, माँ से
अब कहानी में कहानी ये है कि टुकटुकी बड़ी हो गई है और जुगनुओं को देखती रही जैसे बचपन में देखा करती प्रश्न करने का साहस उसमें ना था बहुत बाद में उसे समझ आया था कि माँ ने ऐसा क्यों किया? दरअसल माँ को लगता था पिता पर उस स्त्री का भी उतना ही हक था जितना कि उनका. माँ के पास पिता की निशानी मैं थी, पर उस औरत के पास ऐसा कुछ भी ना था. अब पिता भी नहीं रहे. माँ कहती है जो बच जाते हैं दुख उनके पास रह जाता है. वो स्त्री भी अभी शेष थी. उसके पास भी दुख बचा था. पिता की जेब से निकला खत और वह अँगूठी जो माँ की उँगली में ढीली होकर भी कभी नहीं निकलती बस माँ के पास रही. उस खत को वह सोने से पहले रोजाना पढ़ती. खत में क्या था? माँ ने उसे कभी नहीं बताया वो जानना भी नहीं चाहती. माँ के पसारे में सेंध लगाकर वो उस परदे को खींचना नहीं चाहती, जिसे माँ ने छिपाव के मोटे धागे से बुना था. पिता ताउम्र नदी के दो किनारों की तरह भटकते रहे और माँ अपने आत्मसम्मान में बकरी से शेरनी बनी अकेलेपन के संत्रास में डूबी रही. टुकटुकी अब अपनी बूढ़ी माँ के साथ रहती है उसका पति है जो उसे पिता-सा दिखता है. उस स्त्री को माफ कर माँ शायद अपने हिस्से की गलन से मुक्त हो चुकी है.
टुकटुकी का ब्याह हो गया है. पिता अब तलक बहुत दूर निकल गए हैं शायद आसमान के किसी कोने में. टुकटुकी अपने पति को देखती है, वहाँ पिता हैं उसकी ऐनक के काँच में पिता के जाने के बाद माँ ग्लानि में लिपट गई है. माँ ने जब तक पिता को क्षमा किया तब तक पिता गल चुके थे और अब माँ गल रही है... नीली होती जा रही है. पिता के हमेशा के लिए जाने के बाद... एक दिन पिता माँ की क्षमा के साथ पेड़ की मोटी शाख पर झूल गए थे. शेष रह गया था, उनका टूटा चश्मा, सफेद कुर्ते की जेब में पड़ा खत, गलन, माफी और वही अँगूठी... दो किनारों के बीच भटकते समंदर की तरह पिता टकराते रह गए. पिता के जाने के बाद माँ को ना जाने क्या गलन थी? वो उस औरत को रोजाना ढूँढने निकल पड़ती. माँ को ना जाने क्या वहम था कि पिता उसे दिखते थे. जब भी पिता माँ को दिखते माँ उस औरत को ढूंढने निकल पड़ती पर वो नहीं मिलती. टुकटुकी की हिम्मत नहीं थी, माँ कुछ पूछने की. एक दिन टुकटुकी ने देखा. माँ दूर से चली आ रही है. साथ में एक औरत भी है, उस औरत को देखकर लगा जैसे उसने बहुत दिनों से कुछ खाया नहीं है. उसके बदन की हड्डियों को गिना जा सकता था. टुकटुकी उसे देख डर गई थी. घर में लाकर माँ उस औरत को बड़े प्रेम से खाना परोस रही थी. चलते हुए माँ ने उसे कुछ कपड़े दिए और पिता का चश्मा, कुर्ता... माँ ने लगभग पिता की सारी चीजें उस औरत के हवाले कर दीं. उस औरत के चेहरे पर माँ के लिए, कृतज्ञता, प्रेम, अपराध बोध और क्षमा एक साथ उभरे. वो स्त्री धीरे से माँ से कुछ कह रही थी, जिसे टुकटुकी सुन नहीं पायी बस उसने दूर से उसके माँ की तरफ जुड़े हाथों को
से
देखा.
वह अब पिता की बात करती है. उनकी बातों में पिता कभी भी आकर बैठ जाते थे. पिता प्रेम में थे जैसे वो थी... जैसे वो स्त्री थी. माँ अभी भी टोकरी बनाती है. मछलियाँ भी पालती है. माँ के पास वो स्त्री अकसर आ जाती है. वो दो स्त्रियाँ अपने सुख दुख कह लेती हैं. माँ की धरती बहुत बड़ी हो गई है. दोनों स्त्रियाँ भरी दुपहरिया में अपनी स्मृतियों पर धूप की कढ़ाई करती हैं. उनकी धूप की कतरों पर पिता आज भी चहलकदमी करते हैं.
59 कथादेश मई 2026
कहानी
फ्री- बर्ड
रजनी गुप्त
भय अपनी जगह से हिलने का नाम नहीं लेता. ऐसे भारी भरकम लम्हे कठोर शिला की तरह अपनी जगह पर स्थिर हो जाते जिन्हें ओट में रख पाना आसान नहीं अजीब सी दास्तां है। ये, जहां ईर्ष्या की आग में धधकते इंसान को कुछ सूझता ही नहीं, सिवाए दूसरों को कष्ट पहुंचाने के उसके अंदर कुछ सालों से रचा बसा दर्द इतने वेग से बढ़ता गया, जिसे उलीचने के लिए वह गाहे गया और दबाया गुस्सा भड़क पड़ा. बगाह बरस पड़ती. अचानक मां को देखते ही उसका मूड उखड़
मेरे मना करने के बावजूद क्यों किया आपने पापा को फोन? आखिर क्यों मेरे बारे में उनसे कुछ बात की? जिस आदमी का कैरेक्टर खुद संदिग्ध हो, वो मुझे खाक सुधार पाएगा? मुझे क्योंकर समझना चाहेगा वो? मुझसे पूछा, पैसे चाहिए हों तो भेज दें. नहीं चाहिए मुझे उनके पैसे की भीख, नवर. कुछ भी करके कमा लूंगी मगर उनसे फूटी कौड़ी नहीं लेनी. आइंदा से उनसे कोई बात करने की जरूरत नहीं. हां, कहे देती हूं वरना ठीक नहीं होगा.'
गुस्से में बोली तेज आवाजें पूरे घर में गूंज रही थीं. लगा जैसे बाहर से अंदर कदम रखता आगंतुक नवल वहीं से लौट गया. सुनाई पड़ा- ओफ इतना हॉट एक्सचेंज, ये पढ़े लिखे सभ्य सुसंस्कृत समाज के लोग कहलाते हैं? फिर वही आवाजें, वही तिरस्कार, वही अपशब्द, वही अवहेलना, वही अवसाद के काले चैप्टर नए सिरे से इतिहास रचने लगे. जिरह के दौरान उसे किसी वकील की तरह पेश आना पड़ा-
"बेटी नीति, नवल मेरा अच्छा मित्र है, वैतविशर है, नविंग अपनी सफाई देने लगीं. एल्स". बेटी के मन को पढ़ने की कोशिश करते हुए वे फिर से
"ही इज नॉट जस्ट ए फ्रेंड, आई नो. यू विहेव हिम इन सच ए वे, आई कांट टॉलरेट," आगे बोलने से उसने खुद को रोकना चाहा मगर मुंह से कडुवे बोल फिर से निकल पड़े-
बारे में किसी से भी कुछ शेयर क्यों करने लगती हो किसी पर "ममा, पापा इज ए ग्रेट चीटर, यू नो. आप अपने या हमारे भी इतनी जल्दी भरोसा करने की क्या जरूरत है? एक बार धोखा
60 कथादेश
खाने के बाद हाउ कैन यू ट्रस्ट एनीवन? आई नेवर एनीवडी... सारी दुनिया ही धोखेबाज लगने लगी."
टूटी फूटी हिंदी अंग्रेजी में वह देर तक बड़बड़ाती दुख, निराशा, हताशा और भग्न मन के परखच्चे उड़कर दोनों पर फिंकते रहे. जीवन में चारों तरफ काला धुआं भ जा रहा था. हताशा भरे जीवन की तालाब जैसे सूखता जिसकी तली में कंकड़ पत्थर साफ साफ नजर आ रहे थे. चाहती तो मां के शुभचिंतक नवल के प्रति कृतज्ञ हो सक थी, जिसने उन दोनों के लिए कितना कुछ किया मगर अ गुरूर, दंभ और अहम की पराकाष्ठा में डूबी चेतना अ सिवा किसी और के वजूद को स्वीकारने को तैयार ही नाम मैं, मैं और सिर्फ में, यही आवाजें उसके जीवन का एकमा सत्य बनकर उसी को डराने लगीं. नितांत अकेलेपन से जूझन वह बौखलाहट में जो जी में आए, वह बिना किसी संकोच बके जा रही थी. जिंदगी पूरे नंगेपन में अपनी धज्जियां उड़ लगी थी. एक बार जब आवरण निकल जाए तो नंगे वजूद किसी की शर्म लिहाज नही रह जाती. वह पूरी तरह अनावृत होकर रौद्र रूप में अपनी हिंसा प्रतिहिंसा का क्रूर खेल खेलने लगती. पता नहीं ये क्रूरता कब तक चलेगी? कब खत्म होगा उसकी ये बकवास सब कुछ समझ से परे, सोच से पर अविश्वसनीय और अकल्पनीय.
"ममा, आप जब भी किसी से बात करती हैं तो मेरे दिमाग कुछ और चलने लगता. ये सब अच्छी बातें जरा भी रास नहीं आती. ऐसे में सिर्फ और सिर्फ पापा की हरकतें याद आने लगती उनके जैसा काइयां और खुदगर्ज आदमी कहीं और नही देखा. इस उम्र में उनकी ऐसी घटिया हरकतें, सरेआम की गई करतूतें, आई कांट टॉलरेट...." मीतर खोलता लावा बरस पड़ा.
“बेटी, ये सब सोचने की जरूरत नहीं. खामहखां ऊंटपटांग सोचकर माथा खराब कर रही. अरे, अभी तक कुछ खाया नहीं फेरा. तूने? खाना ठंडा हो रहा है." उन्होंने उसके सिर पर नरमी से हाथ
“मुझे भूख नहीं है. लिसन, मैं बाहर जा रही हूँ सो देर से
मई 2026
लौटूंगी, डिनर पर इंतजार मत करना. और कहीं घूमने मत चली जाना." गुस्से से भरी आवाज में दुबारा बोल पड़ी "कहीं आपके मन में भी पापा जैसा कुछ करने की प्लानिंग तो नहीं? हां, बता देना साफ साफ, मुझे अंधेरे में मत रखना, हां, कहे देती हूं."
"मुझे कहीं नहीं जाना, न ही पापा जैसा कोई स्टेप उठाना है, एक बात को कितनी बार दुहराती रहूं?" बोलते हुए आवाज लड़खड़ाने लगी.
मुस्कराते
लगते
तो
ये
सब...
सोचते
पिता के बारे में जितना सोचती, तनाव घेरने लगता. पापा जिस किसी से फ्लर्ट करने से कभी नहीं चूकते. उनकी ये रंगबाजी या लड़कीबाजी के किस्से किसी से छिपे नहीं है. बेशक पापा की पर्सनैली में स्मार्टनेस है, खूबसूरत हैं वे, कायदे से बात करते हुए अदा से हुए हैंडसम हैं, तभी हुए रह रहकर फिर से पापा की काली करतूतें क्यों नही भूल पाती मैं? होली पर पड़ोसन के गले में हाथ डालकर रंग लगाते पापा, मां के विरोध के बावजूद उन्हीं के घर पर देर तक पड़े रहते पापा, मां के सामने ही उन्हें किस करते पापा, उनकी शर्ट पर लिपस्टिक के निशान दिखाती मां......
"शादीशुदा होने के बावजूद ये सब करते हुए जरा भी शर्म लिहाज नहीं बची आपके अंदर?" मां की तीखी बातें सुनकर वे तैश में आकर उल्टा सीधा बकने लगते "तू एक ही बात की माला क्यों फेरती रहती? जो चाहे सो कर. डायवोर्स लेना है तो ले ले. किसने रोका है?"
एकांत कमरे में घड़ी की टिक टिक सुनते हुए वह जोर जोर से चीखना चाहती मगर बगल में लेटी मां की सिसकियां सुनकर चुप लगा जाती. बेचारी मां, इस उम्र में डायवोर्स लेकर भी कहां जाएंगी? अनायास अपनी जिम्मेदारी का अहसास जगते ही नीति फिर से स्टडी में एकाग्र होने की कोशिश करती. ये उसका फाइनल ईअर है, उसके बाद कंपटीटिव एक्जेम्स की तैयारी करने बाहर निकलना ही पड़ेगा. मां की उम्मीदें मुझ पर टिकी हैं मगर कैसे समझाऊं कि किताबें खोलते ही पन्नों पर पापा की नीचता भरी बातें याद आने लगतीं न जाने क्या क्या मैसेज मां ने दिखाए थे मुझे पापा के
मोबाइल से सोचकर तनाव बढ़ता जाता. सांप जैसे फुंफकारते जहरीले संबंधों की पिटारी का मुंह जितनी ताकत से वह बंद करना चाहती, वो सांप दुगुने वेग से मुंह बाए फन फैलाकर घेर
लेते उसके वजूद को.
मां के रोने धोने, चीखने चिल्लाने, डांटने फटकारने या ब्लेकमेलिंग की किसी भी धमकी का कोई असर नही पड़ा उन पर अपनी
रिसर्च स्टूडेंट से उनके संबंध बदस्तूर चलते रहे. पापा को उसका खुलकर साथ देना पड़ा- न ये पूरा सच कतई नही. पापा भी उसके बिना कहां चैन से रह पाते थे? आखिरकार वही हुआ जो वे चाहते थे. लगातार बड़बड़ाने से पागल करार दी गयी आंसू
टपकाती मां की एक न चली और वे हमें अकेला छोड़कर खुल्लमखुल्ला उसके साथ रहने लगे. दुनिया का कोई भी कानून उनका कुछ न बिगाड़ सका. आफ्टरऑल ये उनका निजी मसला है, कहकर हर कोई पल्ला झाड़ लेता.
दादा दादी की बातें या नसीहतें सुनकर अनसुनी कर देते पापा. मां के भाई से पापा से जोर शोर से कहासुनी जरूर हुई मगर नतीजा शून्य. दोनों तरफ की कानफोडू आवाजें सुनकर लगा जैसे एक एक लफ्ज हथौड़ा बनकर सीधे सीने पर पड़ रहा हो. आर्थिक रूप से कमजोर मां ने मायके की संपत्ति में अपना हिस्सा मांगा तो वे अनसुनी करके चलते बने तब उनके सारे सुझाव हवाहवाई लगने लगे थे तब
"अलग होकर एलीमनी मांगो अपने बारे में सोचना शुरू करो. अभी भी अपनी जिंदगी नए सिरे से शुरू कर सकती हो..." अंततः
यही
सब
समझाबुझाकर चलते बने तब मैंने मां को समझाया-
अपने
साथ
"पापा को हमारे साथ नहीं रहना तो उन्हें हम जबरदस्ती नहीं रख सकते. पापा ने ये घर जरूर हमें रहने को दे दिया, यही मेहरबानी समझो,” मैंने मां को कई तर्कों से कन्विंस करना चाहा लेकिन अपने अकेले पड़ते चले जाने की बेबसी पर वे बात बात पर रोने लगतीं.
पति से अलग होकर सामाजिक तौर पर मां अलग थलग पड़ती गई. धीरे-धीरे बेहद चिड़चिड़ी होती गयीं. न जाने किस
61 कथादेश मई 2026
चित्र: संदीप राशिनकर
किसके पास सांत्वना का लेप लगवाने चली जातीं, सोचकर मन खट्टा होने लगा. चर्चा के चक्रव्यूह में फंसी मां की तकलीफ देखकर अच्छा नहीं लगता. गुस्सा भी आता, जब वे जिस किसी से सहानुभूति बटोरने चली जातीं. पीठ पीछे लोग बातें जरूर बनाते होती गयी. मगर काम कोई नहीं आता, ऐसी धारणा समय के साथ साथ पुष्ट
"मेरी बच्ची कैसी कुम्हला गयी, खोयी खोयी सी रहने लगी. जब भी कोई बात करो, चिड़चिड़ाने लगती. किसी भी बात पर
उखड़ जाती. एक बात के सौ जवाब देगी. पढ़ने में मन ही नहीं
लगता."
सुनते ही में चीख पड़ी थी- "दिन रात किताबें घोंटने से कोई फायदा नहीं. यू नो, पापा की रंगीन मिजाजी के किस्से याद करके पढ़ाई से मन उचाट होने लगता. वैसे मॉडलिंग, फोटोग्राफी में पैसा मिले. " है, ट्राई कर रही. कुछ पैसे हो जाएं तो बाहर जाने का कोई मौका
से मुझे ताकने लगीं. "क्या कहा? तू मॉडलिंग करेगी?" वे आश्चर्य से भरी आंखों
"क्या बुराई है? फिगर अच्छा है, इंग्लिश बोल लेती हूं देखने में ठीक ठाक हूं, लंबी, पतली टांगें हैं, और..."
"बस कर. प्लीज, ये सब बातें सोचना भी मत ऐसी टेम्परेरी नौकरियों से कितना कमा लोगी? कोई सुनेगा तो क्या सोचेगा हमारे बारे में? कायदे से पढ़ाई पूरी करके सरकारी नौकरी पकड़ ले. उसके बाद जो अच्छा लगे, करना." भावावेश में बोलते बोलते वे रोने लगी- "हे भगवान, कैसी दोहरी सजा दे रहे आप कम से कम औलाद को सुख तो दे देते. नीति, तू पहले ठीक से नौकरी कर, उसके बाद ही शादी करना. मेरी तरह नही कि बीए के बाद ही मेरे मां बाप ने शादी की रट लगा दी थी."
.
"कान खोलकर सुन लो मेरी शादी की बात तो भूल ही जाओ. आपकी शादी का अंजाम देख लिया न, सो अब शादी करने का कोई इरादा कतई नहीं, नैवर. इन छोटी मोटी नौकरियों से काम तो चल रहा है मेरा. हां, आपका कहना ठीक है, डिग्री ले लूंगी मगर आगे के करियर के बारे में बाद में देखा जाएगा. पलटवार करने से उसे कोई गुरेज नहीं था लेकिन मां का नसीहत देना बदस्तूर चलता रहा- 'बेटी, तेरे भविष्य को लेकर फिक्रमंद रहती हूं. अभी भी सुधर जा, वरना जिंदगी भर हाथ मलती रह जाएगी. जिन लड़कों संग तू रात विरात घूमती रहती, वे तुझे बर्बाद करके छोड़ देंगे, फिर खाक में मिल जाएगी हमारी इज्जत."
“ये किस इज्जत की रट लगा रखी आपने, आई डैम केवर बाद द वे, ये मेरी लाइफ है, जिसे अपने तरीके से जीने का हक मुझे भी है, जैसे पापा को था. पापा की तरह जिम्मेदारी से पल्ला झाड़कर फ्री कौन नहीं रहना चाहता? आपको जो करना हो,
करिए, हू केयर्स ? "
एक झटके से बोलते हुए वह कुर्सी से उठकर खड़ी हो फिर एक पैर से कुर्सी को परे धकेल फर्श पर पड़े रिमोट क से दबाकर टीवी ऑन कर दिया. अब वह किसी और की आवाज नहीं सुनना चाहती थी. न चाहते हुए भी वह फि अपनी दुनिया के आर पार देखने लगी, अपने ही अक्स के बन कुछ दिन ये भी आजमाकर देख लिया उसने.
कितनी विचित्र है ये चकाचौंधी दुनिया मॉडलिंग फोटो की. फोटो शूट के दौरान पता चला कि किस तरह भवें उ आंखें चौड़ी करनी है, चेहरे की बदलती भावभंगिमा से मिलाते हुए गर्दन को खास अंदाज में झटके से यूं टर्न देन खुमारी और मदहोशी से भरी आंखों में कब किस तरह कि चमक भरनी है, जानबूझकर गिराई वालों की लटों को करती उंगलियों को कितनी देर बालों में घुमाना है, कभी अ के जरिए अपने एक्शन में गुरूर और दंभ की झलक, तो क मासूमियत को दर्शाने वाले हावभाव. यू टर्न देकर कमर को ले जाते हुए होठों पर नपी तुली मुस्कान को चिपकाए रख यही है देह की असल पूंजी. टू पीस में पोज देते हुए दांतों होठों से ढाकते हुए आहिस्ते से जीभ को यहां वहां बेमत फिराना है. इशारा मिलते ही छाती की तरफ अधमुदी पलको पोज देते वक्त सेक्स अपील दर्शाना मगर फूहड़पन कतई अजीबोगरीब किस्म की लड़कियों को देखकर उसे लगा, जैसे किसी बुत में तब्दील होती जा रही. ऐसी अश्लील तस् खिचवाकर बेचकर प्रॉफिट कमाना ही इनका एकमात्र मकसद बस इन तस्वीरों को देखने के लिए लालायित है पि हाथोंहाथ बिकती हैं ऐसी नंगी, अधनंगी तस्वीरें.
कैमरामैन बताने लगा- तंग जींस में पोज देते वक्त स्वतः आवेग से भरी लड़की ने खुद जिप खोलकर पोज दिया हाथोंहाथ बिकी थी वो तस्वीर. मोर सेल, मोर प्रॉफिट, यही एकमात्र उसूल हमारी कामयाबी का वैसे नई लड़कियों को क भी पोज देने में गुरेज नहीं, पुरानी जमी जमाई मॉडल्स बड़े न करतीं हैं.
उसे याद आया, जैसे ही वह पोज देकर हटने लगी कि अनजान से लड़के ने उसकी जांघ पर हाथ धरा तो वह गुस्से चीख पड़ी- "ये क्या बदतमीजी है?"
लगा
“पैसा मिलेगा तुम्हें इसका..." वह पूरी बेशर्मी से ह
'भाड़ में जाए पैसा, कान खोलकर सुन लो, मैं पार्टटाइ मॉडलिंग करने आई हूं, रंडीवाजी करने नहीं आई बात समझ म वह गुस्से से थर थर कांपने लगी.
"ज्यादा सतीसावित्री बनने का ढोंग मत करो. सी सी खाय बिल्ली हज को चली... पता है, कुछ सालों का सफर
62 कथादेश मई 2026
है यहां, जल्दी ही बूढी लगने लगोगी तो कोई घास भी नहीं डालेगा. मिटे उस पर आंखों में मोटा काजल, माथे पर बड़ी बिंदी,
बड़ी
आई
...
नौटंकी करने, हुह...' अचानक पीछे से आवाज आई रिलैक्स मूड में पोज देना
चारों तरफ शब्द ही शब्द बारिश की तरह पीठ पर पड़ने लगते, ऐन मौके पर मां की बातें याद आने लगतीं स्टडी पर फोकस
करो, सबसे
मैचिंग
कड़े
हुए
बुंदे, जूड़े में महकते गजरा सूतेि पापा सुध बुध गंवा बैठे. बगल वाली आंटी ने मां को चेताया था- "सुनो, इससे खबरदार रहना. मिठबोली है, काम निकालने की कला में माहिर न जाने कौन सा मंतर फूंकती है कि मर्द इसके आगे पीछे घूमते. इसका घर में आना जाना बंद करो. संभालो अपने जरूरी है करियर, छोटे मोटे काम करके चंद पैसे घर को वरना कौन जाने, कल क्या हो जाए, अभी देर नही कमाना कोई बड़ी बात नहीं. ये सब तो बाद में सोचेंगे मगर ये बंदा तो इतनी जल्दी बूढ़ी बनने की धमकी दे रहा था. कितना सोचा था कि देश से बाहर निकल जाएंगे, वहां कुछ भी कमाकर जी लेंगे मगर इसके लिए कुछ एक्सट्रा पैसे तो जोड़ लें जो इस लाइन में जल्दी से संभव नजर नहीं आ रहा. कितने लोगों से कितनी तरह
लेकिन देर तो हो चुकी थी देखते देखते हमारा सालों पुराना घर संसार छीन लिया गया और हम तमाशबीनों की तरह लुटते. पिटते रहे. उस दिन का वाकया तो कभी नही भूल सकते. हम सबको चा दिन के लिए मुंडन प्रोग्राम में कानपुर जाना के समझौते करने पड़ेंगे यहां वो सब कतई नहीं होगा मुझसे, पड़ा. पापा उसी दिन देर रात निकल लिए जरूरी काम आ गया. सोचकर इस दुनिया को गुडवाय करने का फैसला लेने में पल भर जब कि हमें कुछ दिन और रूकना था. पता नहीं क्यों मां के की देरी नहीं की. दिमाग में फितूर आया कि हम भी अगले दिन पापा को बिना बताए निकल लेंगे.
थके कदमों से घर की तरफ मुड़ने लगी. मां बाप के बीच की कडुवी बातें याद करते करते उम्र का तीसवाँ पहिया निकल गया. पिता के फोन पर नसीहतें सुनकर ऐसा लगा, जैसे गर्म तेल सीधे बदन पर डाला जा रहा हो मैं तुम्हारे भले के लिए ही सोचता रहता हूं. मुझे गलत मत समझो, जो करियर बनाना चाहो, बनाओ. तुम्हारा पढाई का खर्चा उठाने को तैयार हूं. भावुकता का लेप लगाने का अधूरी कोशिश को उसने अनसुना कर दिया और बीच में ही बिफर पड़ी- "नो हमदर्दी प्लीज. गो एंड इंजॉय योर लाइफ अपनी जिंदगी का भला बुरा मैं खुद समझती हूं. बड़े आए मेरा भला चाहने वाले. हुंह, आपको क्या लेना देना मुझसे?"
पापा के नाम से चिढ़न होने लगती. उनकी करतूतें रिवाइंड होती रहती. मां को उल्टा सीधा बकते बड़बड़ाते पापा के बोल कैसे भूल सकती है वह नो नैवर
उन दिनों पापा की पसंदीदा छात्रा हुआ करती थी वह, जो बेखटके घर आ धमकती यस सर, यू आर सो
ओफ, रोंगटे खड़े कर देने वाले उस रात का मंजर कभी नहीं भूल सकती. रंगीन बल्बों के नीचे रेशमी नाइटी से उघड़े बदन को ढापने की कोशिश करती मेधा को देखकर तो मां को जैसे दौरा सा पड़ गया. बदहवास हालत में वे पूरी ताकत से गला फाड़-फाड़कर चीखने चिल्लाने लगी- "ओ चुड़ैल, तूने जिस थाली में खाया, उसी में छेद करने में जरा भी लाज शर्म नहीं आई? मौके का फायदा उठाने में तूने कोई कसर नही छोड़ी जवानी की आग लगी थी तो शादी क्यों नहीं की?" बौखलाई मां की आंखों से अंगारे फिक रहे। थे लेकिन गर्दन नवाए पापा सिगरेट पर सिगरेट फूंकते रहे. जैसे ही मां झपट्टा मारने उसकी तरफ दौड़ी, पापा की खामोशी दहाड़ में बदल गयी "तुम जो ये सब देख रही हो, इसमें मैं भी शामिल हूं. तुम इसे यूं धक्के मारकर इस घर से नहीं निकाल सकतीं. ये मेरा घर है, आई बात समझ में?" पापा एक एक शब्द नाप तौलकर
नोट्स लेने बोले. स्वीट नरमाई और बड़े अदब से बोलते हुए मुस्कराती रहती वह फिर तो वह हमारे चौके में दखल देने लगी. मां का हाथ बंटाते हुए नई नई रेसिपी बनाने लगी. बात बात पर हंसते हुए कहती-- "लाइए, मैं बनाती हूं आज का स्पेशल नाश्ता. ऐसे स्पेशल डोसे बनाऊंगी कि सब चाटते रह जाएंगे, ऐसी चटनी
तो आपने कभी खाई नही होगी. अभी सब तैयार करती हूँ, बस आधा घंटा दीजिए.” कहते हुए अधिकार भाव से रसोई में जाती रही. गजब की फुर्ती थी उसमें इधर पापा भी उसकी हर फरमाइश को पूरी करने में जी जान से जुटे रहते. क्या फर्राटेदार अंग्रेजी बोलती और कितने सलीके से कॉटन की
"एकदम चुप हो जाओ, ज्यादा तमाशा दिखाने की जरूरत नही. शांत हो जाओ, कहते हुए पापा हमारे सामने उसका हाथ थामे उसी वक्त कार से उसे छोड़ने निकल गए। मां की जलती आंखों से लापरवाह वह लंबे लंबे डग भरते हुए सर से बाहर निकल गयी. "
नीति के अंदर उल्टा पहिया घूमने लगा, कितनों से उसकी दोस्ती हुई मगर कहीं बात शादी तक पहुंची ही नहीं. रिश्तों में वैसा कमिटमेंट नहीं, कोई गहराई नहीं. सबके सब फ्लर्ट करने वाले दोगुले लड़के जिनके साथ टाइमपास दोस्तियां की जा सकती हैं, मगर बहुत दूर तक या देर तक कोई किसी का साथ नहीं निभाना चाहता. सबके अपने अपने खटराग हैं. खुद कमाना, खुद पर खर्च करना, किसी से है कोई मतलब? तनाव की अति होने पर खुद ही 63 कथादेश मई 2026
स्टाइलिश साडियां पहनती. खूब बन उनके रहने का शौक था. उसका रूप, रंग, तेवर और आत्मविश्वास देखकर पापा मर
बड़बड़ाने लगती कौन है यहां मेरी परवा करने वाला? मां की पराधीनता देखकर मन खराब हो जाता. मां के लिए कुछ अच्छा करना होगा, उनकी खुशी के लिए जरूर पढ़ाई पर फोकस करेंगे, सोचती रही देर तक वैसे भी पापा मां को सिर टिकाने के लिए घर दे चुके थे, जिसका एक हिस्सा किराये पर चढ़ाकर आराम से मां की जिंदगी चल निकली.
उस दिन पापा की नसीहतों पर देर तक माथापच्ची करती रही. गुस्से में गाड़ी चलाकर क्लव आने का मन बनाया, चलो, कुछ दोस्तों संग गम को फूंक मारकर उड़ाते हैं, ये उखड़ा मूड चेंज होगा, सोचकर सबके बीच इत्मीनान से बैठ गई. मेज पर शराब की बोतलें खुलीं हैं, सिगरेट पर सिगरेट फूंकते दोस्त. तेज गानों के बीच मदमस्त होकर नाचते कई जोड़े. खुमारी में डूबती पलकों के बीच जाने अनजाने दृश्य रिवाइंड होते रहे.
"बस करो यार, बहुत पी चुकी." साथ बैठे लड़के ने रोकना चाहा मगर उसकी बुदबुदाहट बदस्तूर चलती रही- "मेरी जिंदगी में सब कुछ खल्लास जितना ज्यादा सोचती, दिमाग की नसें चटचटाने लगतीं. अब तक घटा सब कुछ भूल जाना चाहती, मगर सब कुछ उतनी शिद्दत से याद आता जा रहा. विचित्र विडंबना है कि भूलने की जबरन कोशिश में और ज्यादा तेजी से धर दबोचती हैं यादें. पाटक में बातों का सिलसिला मला कभी सकता है?" पूरे जोश, उत्साह, उमंग और उठान पर चल रही पार्टी में शराब का रंग नसों में घुलकर लोगों के सिर पर जादू बनकर नाच रहा था. बतरस के मानसरोवर में सभी गोते लगा रहे थे-
"कुछ भी कहो यार, यहां इतने लड़के हैं मगर नीति का किसी से शादी करने का मूड नहीं है."
"तो क्या हुआ? शादी की जरूरत किसे है? बिना शादी किए भी मजे तो किसी शादीशुदा से कम नहीं ले रही? गलत कह रहा
क्या?"
'सबको अपने अपने ढंग से अपना अपना जीवन जीने का हक है न? जजमेंटल क्यों होते हो भला? कितनी तेजी से बदल रहा जमाना. शादी, तलाकशुदा या कुंवारी जैसे टैग गुजरे जमाने के चोंचले बन चुके. आई बात समझ में?"
कनफुसिया बातें, कानफोडू संगीत और हंसी के फौव्वारे के बीच प्लेटों और गिलास की खनखनाहट की आवाजें मिल गई थीं. नींद में अधमुदी पलकों के भीतर तमाम चेहरे गट्टम होते रहे. चारों तरफ पसरे घुप्प अंधेरे को आंखों में भरते हुए वह पूरे इत्मीनान से गाड़ी चलाने लगी. नीति की लड़खड़ाती आवाज जमीन पर टूटकर गिरते बेआवाज पत्तों की तरह झड़ने लगी नाव आई एम ए फ्री बर्ड, फ्री वर्ड, फ्री फॉर एवर... बेतरतीबी से बिखरे बुदबुदाने और फिर फफककर रोने की आवाजें रात के सन्नाटे को बाल आंसुओं में लियड़कर उसके चेहरे पर चिपक गए. अचानक भेदने लगीं. ऐसा लगा, जैसे नीति की रूआंसी आवाज सुनकर
रजनी गुप्त
जन्म 02-04-1963 चिरगांव झांसी, उ.प्र.
प्रकाशित पुस्तकें उपन्यास- 1. कहीं कुछ और 2. किशोरी का आसमां, 3. एक न एक दिन, 4. कुल जमा वीस, 5. ये आम रास्ता नहीं, 6. कितने कठघरे, 7. नए समय का कोरस, 8. बाद जो करें सभी 9. तिराहे पर तीन, 10. आलापचारी कहानी संग्रह- 1. एक नई सुबह, 2. हाट बाजार 3. प्रेम संबंधों की कहानियां, 4. अस्ताचल की धूप, 5. फिर वहीं से शुरू, 6. ढलान पर धूप, 7. सतह पर चांद, 8. फ्रेम से बाहर, 9. धुंध पार की धूप. आलोचना-- 1. सुनो तो सही (आलोचनात्मक पुस्तक), 2. बहेलिया समय में स्वीप स्त्री मुद्दों पर आलेखों की किताब 2016, 3. कथा में हस्तक्षेप 2024
सम्पर्क: 5/259 विपुल खंड गोमतीनगर लखनऊ 226010 t.: 09452295943, 8318573266 E-mail: gupt.rajni@gmail.com
काले धब्बों की तरह बुत बने पेड़ के हिलते डुलते पत्ते सहमकर शाखाओं के बीच दुबक गए हों.
घर पर आकर जैसे ही उसने गेट खोलना चाहा, इंतजार करती मां उसे संभालकर कमरे तक ले आई "बेटी, खुद को संभाल अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है, बस, तू किसी तरह खुश रहना सी ले मैं हूं न तेरी हर यात्रा में तेरे साथ साथ... अपने पर भरोसा कभी मत खोना नीति."
"ओके मां, मन करता है, फ्री बर्ड बनकर खुले आसमान उड़ान भरूं और वापस कभी न लौटू सच में किसी से कोई अपेक्षा नहीं रही अब... बुझी आवाज किसी तरह गले से निकली."
"नीति, ध्यान से सुन, किसी एक के जीवन से चले जाने से खुद की जिंदगी कभी रुकती नहीं, इतनी छोटी सी बात तेरी समझ में क्यों नही आ रही? आजाद है तू मगर एक सीमा के बाद आजादी से उड़ान भरने से तेरे पंख जल सकते हैं, सो खुद को तो बचाना है तुझे तू रहेगी, तो शायद मैं भी जी लूं वरना मेरे जीने का क्या मतलब?" बोलते हुए उनकी रुलाई फूट पड़ी.
अनायास नीति के मन में न जाने ऐसा क्या भाव उमड़ा कि वह मां के गले से लिपट गई. गहराती काली रात में भी उसके नजर आए. मुरझाए चेहरे पर बेफिक्री और सुकून के रंग साफ साफ चमकते
64 कथादेश मई 2026
मलयाली कहानी
सिलाई
अजिजेष पच्चाट अनुवाद: डॉ. सुमित पी. वी.
*बह के छह बजे हमें सूचना मिली कि खदान के पास रबड़ के बागान में लगभग पांच से आठ दिनों का पुराना एक
शव पड़ा है.
अस्पताल जाऊंगा. फिर उस सोच को बदलकर नहाकर काली चाय पीकर जाने का निश्चय किया.
कल जब दो पोस्टमार्टम केस को बाकी छोड़कर देर से निकल
तहसीलदार शराफुद्दीन पी.के. ने जो लोकेशन भेजी थी, उसी रहा था तो एटेंडर हमीद ने मुस्कुराते हुए पूछा था- के मुताबिक जब हम वहां पहुंचे तो करीब पांच साढ़े पांच मीटर जल्दी आएंगे न लंबे सड़े हुए मांस वाले हड्डी के टुकड़े जमीन को गले लगाने की मुद्रा में पड़े थे.
"सर, कल
"जल्दी-जल्दी तो कहते हैं, क्या इन सब कार्यों का कोई समय होता नहीं है! देखते हैं..." जब में उबलती चाय की ओर देख पुलिस उन लोगों को नियंत्रित करने के लिए संघर्ष कर रही है था तब फोन बजा तो पहले मुझे लगा हमीद जो बदबू के कारण निकलने से कतरा रहे हैं.
उस समय तक अधिकारियों ने जगह-जगह से तिरपाल और कपड़े जुटाकर पोस्टमार्टम के लिए एक अस्थायी आड़ तैयार कर
ली थी. वहां के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से मदद के लिए आया जूनियर लड़का जब शरीर के हाथ वाले हिस्से की जांच करने लगा तो मतली के साथ अगले दरवाजे की ओर भागा.
अचानक मुझे अपने सेवा काल की पहली उल्टी याद आ गई. एमबीबीएस के बाद, मैंने लगभग दो वर्षों तक हाउस सर्जन के रूप में काम करने के बाद एमडी किया था. अगले ही साल कूनोलमाड प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में ज्वाइन किया था. ड्यूटी के
चौथे दिन बड़ी भारी बारिश हो रही थी, अस्पताल पहुंचने पर कारीपुर पुलिस टीम मेरा इंतजार कर रही थी.
समस्या अज्ञात लाश ही है. चूंकि यह पहला अनुभव था, इसलिए मलाप्पुरम से एक वरिष्ठ डॉक्टर को साथ लेकर घटना स्थल की ओर रवाना हुआ. अबकी लाश से ज्यादा सड़ी हुई एक झाड़ियों में छिपाकर रखी हुई मिली! जब हम सौ मीटर की नजदीकी पर पहुंचे, सुबह का नाश्ता अंदर जाने की तुलना में चार गुना तेजी से बाहर आया. इसीलिए तय किया कि उल्टी करने गये लड़के का इंतजार न किया जाए और लगभग सब कुछ मैंने अकेले
ही किया. पोस्टमार्टम और उसकी रिपोर्ट तैयार करने के बाद जब मैं घर लौटा तो दस बज चुके थे. पहले मैंने सोचा
स्थल से सी
मंजिमा थी.
“कहां, अस्पताल में हो?"
ही होगा. देखा
रहा
तो वह
"नहीं, आज सुबह ही बाहर एक केस था. क्या हुआ?" "नहीं, वैसे कुछ भी नहीं..."
मैं जानता था कि उसने ऐसे ही फोन नहीं किया था, "तुम बताओ तो."
मेरी आज्ञा पर झिझकती हुई वह बोलने लगी. मैं कल मां के पास गयी थी." अचानक कुछ देर के लिए हमारे बीच कहीं से एक गहरी खामोशी आयी और सीना तानकर खड़ी हो गई. चूल्हा बंद कर चाय में चीनी डालते वक्त वह फिर कुछ कहने लगी-
“छोड़ो यार, मां अब हमारे साथ कब तक रहेंगी. तुम जरा वहां तक जा नहीं सकते...?"
“ठीक है, मैं जाऊंगा...”
"कब से तुमने यह कहना शुरू किया है? और कुछ नहीं तो बेचारी ने हमें पाल-पोस कर बड़ा करने के लिए बहुत कष्ट उठाया है. कम से कम तुम उस बात को तो याद कर सकते हो?” हमेशा की तरह उसकी आवाज में तीन साल बड़ी होने का भाव झलक रहा था.
"मैं भी पिछले कई सालों से हमें बड़ा करने का विवरण सुन रहा हूं." हमेशा के विपरीत मुझे भी गुस्सा आया.
उसे यह बात समझ में आयी. "मैं कहती नहीं हूं, तुम मुझसे
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कहलवा रहे हो. नहीं तो कब तक ऐसे अकेले रहोगे... जीतू, तुम सच में जानते हो कि समस्या क्या है? तुम अभी भी उन बीते दिनों को याद करके जी रहे हो!" "इतना लंबा समय हो चुका. मैं कभी आप लोगों को याद दिलाने आया? नहीं ना... कृपया मेरे साथ भी आप सब वैसा ही व्यवहार
करें. "
मैंने पहली बार बिना उसकी मर्जी के फोन काट दिया. जब मैंने चाय चखी तो बड़ी खराब लगी. उस पूरी चाय को वॉश बेसिन में डाल दिया. सुबह-सुबह सारा मूड खराब हो गया.
जब मैं अस्पताल पहुंचा तो स्थिति लगभग वैसी ही थी. पिछले दिन की दो लाशों का पोस्टमार्टम समाप्त होने तक एक फांसी से मौत और दो दुर्घटना के मामले आए. सभी युवा लोग!
शाम को ड्यूटी के बाद दिमाग को जरा ठंडा करने के लिए मैं क्लब गया. संयोग से शिनोई को वहां देखा तो थोड़ी राहत महसूस हुई. आम तौर पर मैं घर के अलावा क्लब में नहीं खाता हूं, आज तो बस किसी सोच के साथ इधर चला आया. बातचीत आगे बढ़कर मंजिमा के फोन तक पहुंच गयी.
"यार, मेरी भी यही राय है जो उसने कही. तुम्हें जल्द से जल्द जाकर अपनी मां से मिलना चाहिए. तुम्हारे किसी पुराने प्यार के खिलाफ थीं तो भी मां तो मां न."
"गलती तो मेरी ही है. मुझे तुम जैसे लोगों से यह सब बताना ही नहीं था. "
खामोश हो गया. शिनोई ने झागदार बियर को देखा और थोड़ी के लिए चुप हो गया. "तुम मुझे और बीजी को देखकर सीखने की कोशिश करो. हम दोनों के प्रेमी थे. तो क्या हमारे कुछ गड़बड़ है? तुम अभी भी उस धोखेबाज के बारे में सोच हो. सबसे बड़ी समस्या भी यही है."
उसकी धोखेबाज पुकार सुनकर बड़ी भारी गाली मुंह में उ आयी थी. ठीक समय पर पैथोलॉजी विभाग के प्रोफेसर सी. ए राजशेखरन वहां आ गये तो मैंने गाली को उसी रूप में निय लिया. शिनोई बड़ी भव्यता के साथ उठा क्योंकि राजशेखरन उसके गुरु हैं.
"अरे, खाने-पीने के दौरान अपने बाप दिख जाएं तो भी इ होने की कोई जरूरत नहीं है. कैरी ऑन." बड़े ही खुशमिज अंदाज से उन्होंने शिनोई के गाल छूकर ऐसा कहते हुए दो टे दूर जाकर बैठ गए. हमारे चारों ओर केवल उनके शरीर से निक किसी विदेश निर्मित इत्र की गंध मात्र बड़ी सजींदगी से रह
शिनोई ने उनकी ओर देखा और वापस वहीं बैठ गया. "अ जीना है तो उनकी तरह. न कोई प्यार न कोई लड़की और न कोई बदमाशी यहां कोई प्यार के साथ जिंदगी से खेल रहा है. यार, तुम उसे ढूंढते हुए कौन-कौन सी दुनिया में गए. इतने सम में कम से कम एक बार तुम्हें ढूंढ़ती हुई वह आई थी नहीं नह
उसने मेरा उपहास किया. “साले, तुम्हें बता दूं, मैं तुम्हा पुरानी प्रेमिका को वैयक्तिक रूप से तो नहीं जानता. फिर भी,
शिनोई हंसा. "एक बात पूछें, तुम्हारी मां के विरोध की वजह कहानियां तुमने अकसर सुनायी हैं, उनके अनुसार वह बड़ी का से वह तुम्हें छोड़ गयी थी, नहीं है न...".
" अगर मां की तरफ से वह शुरुआती प्रतिरोध न होता, तो
शायद....
"कुछ भी नहीं होता. वह तुम्हारे साथ नहीं आ सकती थी. तब भी मां को दोषी ठहरा रहे हो. तुम्हारी शादी सबसे ज्यादा मां चाहती हैं. यह मत भूलना.
"यह तुम्हारा ही निर्णय पर्याप्त है?" किसीके द्वारा उसे दो ठहराना मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है.
"ठीक है. एक और
साल बाद मैं पचास बरस
का
हो
जाऊंगा." मैंने उसकी ओर
देखा और खुद का मजाक उड़ाया.
अचानक माहौल
चित्र: संदीप राशिनकर
66 कथादेश मई 2026
"और नहीं क्या अपने शरीर बाल काटने से ड थी न? तब जाक उसने मेडिकल प्रवे परीक्षा लिखकर घा काटने निकली थी।" उसने यह सुना लगा कि वहां ज्याद देर बैठना ठीक न होगा. ऐसा लगता मानो हम हाथ स्टेथोस्कोप लेकर
हुए थे. जब मैं अप
गुस्से पर काबू नहीं रख सका तो
तीसरा लार्ज एक ही बार में खत्म किया और तेजी से उठ गया.
अचानक मेरे दिमाग में एक छब्बीस साल की युवती द्वारा रेलिंग पकड़कर ऊपर चढ़ती हुई आत्महत्या करने की दो साल की लड़की को उठाकर तेज बारिश में पुल की
कौवे के घोंसले और उसके ऊपर छोटी सिल्ही के घोंसले हैं. उन घोंसलों के अंदर से पक्षी शावकों
“अरे, यह गुस्सा जाकर किसी पर उतारेगा तो कल
सड़क
पर
की नीयत आएगी. बता रहा हूं ऐसा मत करना. " बेहिचक कहते हुए शिनोई ने गिलास उठाया
ऐसा
तैयारी करने का दृश्य घूम गया. ठीक समय पर उसके गर्भ में सबसे नवीनतम संकुचन शुरू हुआ कि मानो मुझे ही तुम्हारा पोस्टमोर्टम करने सामने की नदी ही मिट गयी. चक्कर आने पर मां और वह अबोध बच्ची दोनों खिलौनों की तरह पुल की रेलिंग से सड़क पर गिर
की
अपरिपक्व
"तब तो हमें उस डर से
छुटकारा
और अपने होठों से लगा लिया. "कोई दिक्कत न होगी, हमीद मुझे ले जाएगा..."
पड़े.
पाना
होगा...*
आखिरकार, कहीं हुए बिना मैंने
कुछ कहकर पूरा किया. उस घटना के तीसरे दिन उसे लेकर मैं मुर्दाघर पहुंचा. सुरक्षा गार्ड को आधी बोतल शराब या थोड़ी सी पेथिडीन देने पर चाबी
कार में बैठते समय दिमाग में शिनोई की कही हुई पूरी बात हमारे हाथ में दे दी. मुझे यकीन था, अगर मैं शाइनी को मुर्दाघर थी. यह बिल्कुल सही लगता है कि कभी भी जीवन का कोई रहस्य जाने की बात कहता तो वह नहीं आती. इसलिए उसे पंजाबी दूसरे को न बताए कब और कैसे उसका गलत नतीजा हमें हाउस फिल्म की कहानी बताकर हॉस्पिटल के अंदर बरामदे से भुगतना पड़ेगा यह हम कह नहीं सकते. मैं लंबे समय तक बिस्तर होते हुए वहां लाया. जब शाईनी को पता चला कि मुर्दाघर के पर सीधे होकर लेटा रहा. फिर फोन उठाया और गैलरी खोली. अंदर खड़ी है तो वह कांप उठी और चारों ओर देखकर मेरे पीछे मोबाइल के एकमात्र गुप्त फाइल को पासवर्ड उसका नाम था. आकर छुपने लगी.. शाइनी कुरियन
"डरो
मत," मैंने उसे आश्वस्त किया. फिर उसके कान में
असल में शाइनी मेडिकल कॉलेज के छात्रों के लिए फिल्म फुसफुसाया "मरने वाला व्यक्ति आखिरी बार यहीं बात कर अभिनेत्री भानुप्रिया सरीखी थी. उसकी बड़ी चीड़ी आंखें थीं. सकता है. थोड़ा और स्पष्ट कहूं तो मृतकों का अंतिम इकबालिया अच्छा नृत्य करती थी, बड़ी सुंदर कविता प्रस्तुत करती थी, चित्र बयान यहीं पर होता है. यहां से निकल जाने पर वे हमसे कुछ नहीं भी अच्छा बना लेती थी. लेकिन उतना ही नहीं शाइनी प्रैक्टिकल कह सकते." परीक्षा के दौरान बहुत ही अच्छे ढंग से बेहोश भी हो जाती थी. दोस्तों को उसकी बेहोशी की कोई फिक्र नहीं थी. लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं था, बड़ा दुख लगता था. शाइनी की ग्यारहवीं बेहोशी के बाद हम कॉलेज के दक्षिणी कोने पर बड़े पेड़ के नीचे बैठे थे. पास
ही उगे शंख-पुष्पों के बीच से शब्द-गौरयों के चहकने की आवाज “मंजीत, मुझे शेविंग सेट से अपने प्यूबिक हेयर शेव करने में भी डर लगता है. तो इस तरह मैं छुरी लेकर दूसरों को कैसे चीर-फाड़ सकती हूं!"
सुनते ही मैं अचानक हंस पड़ा..
उसे यह थोड़ा अजीब लगा. "यह मैंने मजाक के लिए नहीं कहा था. मैं अपने परिवार के आग्रह पर एमबीबीएस करने आयी हूं. क्या तुम्हें पता है, दुनिया में कितने बच्चे अपनी इच्छा के विपरीत का विषय सीखने के बाद मानसिक समस्याओं से पीड़ित रहते हैं? मेरे लिए इतना काफी है कि किसी तरह इस सिर दर्द को पूरा कर यहां से बचकर निकलूं.”
उसकी आंखें भर आई तो मुझे भी दुख हुआ,
"ऐसा मत कहो..." हल्के पतले काले बालों वाले उसके हाथ को मैं प्यार से छूने लगा तो उसने अपना हाथ खींच लिया.
थोड़ी शर्मिंदगी के साथ मैंने पेड़ की ओर देखा. उस पर तो
उसकी तेज सांस जमे हुए वातावरण में छटपटायी. मुर्दाघर की हमेशा मौत की गंध और शांति की ठंडक की गंध होती है. विशाल हॉल के टेबल पर कतार में पड़ी लाशें ... हालांकि उन सब लाशों को ढककर रखा गया था तो भी मैंने उन सभी पर नजर दौड़ाई, फिर एक जो मुझे पसंद आयी उसे मैंने छुआ और धीरे से उसका सफेद कपड़ा खींच निकाला. जैसी उम्मीद की गयी थी, वह पूरे शरीर पर बालों वाला पुरुष था. मैंने पहले से ही अपने कोट की जेब में सुरक्षित रखी छुरी निकाली और उसकी ओर मुड़ा. छुरी देखकर वह डरती हुई कांपने लगी. उस खूबसूरत माथे पर पसीना बह निकला और उसकी काली-धब्बेदार ठुड्डी कांपने लगी.
" अरे मेरी प्यारी शाईनी, इन लाशों में से कोई एक भी उठकर तुम्हारी गर्दन को नहीं पकड़ेगा.
"मुझे लाशों से डर नहीं है मंजीत. "
“मुझे पता है. तुम्हें डर इस बात का है कि छुरी कहीं मांस में लग जायेगी... अगर लग भी गयी तो अब उनसे खून की धारा
नहीं वहने वाली करना हो तो करो, एमबीबीएस के बाद बाहर निकलते समय कम से कम यह कह सकोगी कि अपने बालों को तो साफ करना सीखा है! बस उतना ही "
बड़ी देर जिद करने पर पहली बार उसने अपनी आंखें बंद कर
67 कथादेश मई 2026
***
8
चित्र संदीप राशिनकर
पैंतीस बरस की लगने वाली लाश के बालों के घने जंगलों में छुरी चलायी. दरअसल, कहना यह होगा कि जब में हाथ पकड़कर जबरदस्ती ऐसा कराने की स्थिति पर आया तब वह स्वयं करने को राजी हुई थी. हालांकि मैं उसका प्रेमी हूं, फिर भी मेरे छूने की बात पर भी वह बहुत ज्यादा डर जाती थी.
"तो तुमने उसे अभी तक हुआ नहीं...?".
शेवा हैरान थी. पांचवें सेमेस्टर की परीक्षा के आलस्य के साथ मैं और शेबा हॉस्टल में बीयर पी रहे थे. शाईनी घर चली गयी थी. शरारती ढंग से मैं 'नहीं' के रूप में सिर हिलाया तो उसने अपनी आंखें से मुझे डराया.
"तो फिर तुम दोनों के बीच कैसा प्यार है? मूर्ख कहीं के! इन्सानों की गरिमा को नष्ट करने निकले हैं." उसने बियर बोतल का आखिरी घूंट पी लिया और मुंह से कुछ आवाज निकालती हुई अपने सिर को कुर्सी के पीछे की ओर डाल दिया.
"प्यार का मतलब छूना है?"
"नहीं, प्यार का मतलब चाटना है. हट... साले.” उसके हाथ से बियर की बोतल गिर गयी और बड़ी आवाज हुई.
छुट्टी के बाद आई शाइनी के साथ मैंने शेवा की नोक-झोंक साझा की. उस दिन कॉलेज में केवल हम दो ही थे. क्लास के सभी लोग प्रदीप सर के गृहप्रवेश में गये थे. शाईनी को हल्का बुखार था. इस बहाने उसकी देखभाल करने और उसे कॉफी पिलाने के लिए मैं उसके साथ रहा.
"शादी से पहले मैं उसके लिए तैयार नहीं हूं मंजीत हमारा धर्म इसकी इजाजत नहीं देता. प्लीज मुझे माफ कर दो."
उसके जवाब ने मुझे थोड़ा चिंतित कर दिया. उस समय पूछना चाहता था कि हम दो धर्म के हैं तो एक कैसे हो सकते उसकी रूढ़िवादी पारिवारिक पृष्ठभूमि पर चिंतित होकर खड़े ओर देखकर अचानक वह 'शुक्रिया' कहकर मुस्कुरायी. ह खड़े मेरी ओर उसने अपने मेफ्लावर रंग के चूड़ीदार का पि हिस्सा नीचे कर दिया और बायां हाथ बाहर निकालकर धी ऊपर उठाकर दिखाया. चिकनी और चमकदार बगल!
बालों को साफ किया हुआ उस खूबसूरत त्वचा को बड़े से मैंने देखा. मैं उसे खुशी से दबाकर चूमना चाहता था और बिल्कुल धीरे अपने होंठों से उस बगल पर एक तस्वीर खींच चाहता था.
"तुम इस जगह को एक बार छू लोगे." मेरी सोच को पत्र जैसा उसने कहा और चूड़ीदार के अंदर वापस हाथों को डा हुई अपनी बड़ी आखों को शरारत से
घुमाया. "सर, बड़ी देर से फोन बज रहा है." जब वह अपनी याद जगा तो जूनियर लड़का बजता हुआ फोन पकड़कर पास हुआ मिला. स्क्रीन पर मां का नंबर...
मैंने गुस्से से उसे देखा. प्रोफेसर सी.एस. की दूसरी बहिन सबसे छोटी संतान है. फोरेंसिक सर्जन बनने में रुचि रखता है। उन्होंने मेरे और शिनोई के हवाले कर दिया था.
"मेरे फोन का जवाब देना तुम्हारा काम है?"
वह थोड़ा घबराते हुए कहा- "नहीं सर, बॉडी खुल गयी यह कहने आया था. "
मैंने फोन जेब में डाला और कैबिन से ऑपरेशन टेबल की चला. टेबल पर बॉडीब्लॉकिंग लगाकर खोली गयी एक युवती छाती उम्र तीस के करीब है. अपने सेवा काल में यह पहली बार महीने के गर्भ की सभी कठिनाइयां झेलता ऐसा मृत शरीर मेरे साम आया. मैंने सोचा कि पहले बच्चे को बाहर निकालकर उसकी जान करूंगा. दस्ताने पहने और छुरी को पेट से नीचे की तरफ खींच लिय ऐसा लगता था कि भरा हुआ गर्भाशय से बाहर कुछ छलक जाएग इसलिए बच्चे को बाहर निकालने में थोड़ी कठिनाई भी हुई. गर्भजन का भयंकर प्रवाह हुआ. एक स्वस्थ पूर्ण विकसित लड़के का सिर पर प्रचुर मात्रा में बाल जो गीले होने के बावजूद स्पष्ट दिखाई दे रहे थे. मैंने उसके चेहरे को सहलाया.. पहली बार में किसी बच्च के चेहरे को इस तरह सहला रहा था. वह थोड़ा सा हिला ?!
नहीं, जेब में फोन वाइब्रेट हुआ. जरूर मां ही होंगी.
अचानक मेरे दिमाग में एक छब्बीस साल की युवती द्वारा साल की लड़की को उठाकर तेज बारिश में पुल की रेलिग पकड़कर ऊपर चढ़ती हुई आत्महत्या करने की तैयारी करने 68 कथादेश मई 2026
दृश्य घूम गया. ठीक समय पर उसके गर्भ में सबसे नवीनतम् जो मुझे पसंद है. यह दुनिया की सभी माताओं और बच्चों के बीच संकुचन शुरू हुआ कि मानो सामने की नदी ही मिट गयी. चक्कर आने पर मां और वह अबोध बच्ची दोनों खिलौनों की तरह पुल की रेलिंग से सड़क पर गिर पड़े.
का एक रसायन शास्त्र है. शेविंग कर नहाया और कुछ देर तक आइने के सामने खड़ा रहा. पहली बार, धड़कते दिल के साथ मैंने अपने सिर और मूंछों को धावा बोलने वाले सफेद बालों को देखा. निश्चित रूप से, मां से मिलने पर तो सबसे पहले वह उम्र बढ़ने के बारे में ही बात करेंगी. किसी तरह छुपाना होगा... डाई की तलाश में जाने का समय नहीं है. अंततः मेज पर काली बॉल पॉइंट कलम दिखी तो
मैंने टेबल पर पड़ी युवती के चेहरे को एकटक देखा और हांफने लगा. युवती की शक्ल मेरी मां की शक्ल से मिलती-जुलती है फोन बजता रहता है. अचानक सीने में दुःख का एक छोटा-सा टुकड़ा लहर उठा और में फूट-फूट कर रोने लगा. “बस एक मिनट..." जूनियर लड़के को उतना ही कहकर में अपने दस्ताने वाले हाथ से उसका निब खोलकर स्याही को छुआ और उसे सफेद बालों पर तेजी से लगाया.
बाहर निकला.
केबिन में जाकर दस्तानों को निकालकर हाथ धोया, मां ने अब तक फोन करना बंद नहीं किया. भरी आंखों को हाथ के पिछले भाग से पोंछकर फोन उठाकर धीरे से कान से लगा लिया. भारी सन्नाटा. असमंजस में हूं कि क्या कहूं.
"बाबू..." आखिरकार दूसरी ओर से मां ने आवाज दी.
मुझे ऐसा लगा जैसे पोस्टमार्टम टेबल पर बेसुध पड़ा बच्चा जोर-जोर से रो रहा हो.
सबसे नया कपड़ा पहनने का मन किया. मैंने अलमारी की तलाशी ली तो पता चला कि उसमें नया कुछ भी नहीं है. आम तौर पर समारोहों में नहीं जाता हूं. पोस्टमार्टम टेबल पर पहुंचते समय स्वाभाविक रूप से कोई और बन जाता हूं. यदि किसी समारोह या कार्यक्रम में जाना हो तो कमरा छोड़कर स्नान करना होगा. नहीं तो मृत्यु की गंध लेकर जिन्दा लोगों के पास कैसे जा सकता हूं? नहा लेने पर तो टेबल के पास जाना भी पसंद नहीं है. इस प्रकार,
"मैं कल आऊंगा मां ..." मुझे अचानक कुछ इस तरह कहने समारोहों में शामिल न होने और बाहर न जाने की आदत सी हो
का ही मन किया.
“सच...?" मां पूछ
रही हैं.
जब मैं बच्चा था, तबसे अपनी मां को दुनिया में सबसे ज्यादा प्यार करता हूं- कहने पर वह जो सवाल करती थीं वही सवाल मुझे यकीन था कि मां को अब विश्वास नहीं हुआ है. अंदर से सिसकी का एक झोंका बड़ी तेजी से बाहर आने लगा और वह ग्रासनली में ही फिसलकर गिर पड़ा.
"जी हां, सच..." मैंने आश्वासन दिया तो आवाज लड़खड़ा
गयी. अलमारी में से सबसे नया लगने वाला कपड़ा लेकर पहना
और निकलने लगा तो शिनोई का कॉल आया.
रहा.
"वार..." उसकी पुकार में कुछ गड़बड़-सा लगा.
"क्या रे...?" मैं सांसें रोक कर उसके शब्दों का इंतजार करता
"बीजी को अचानक ब्लॉक की समस्या हुई. स्थिति थोड़ी गंभीर है." “तब?"
“हम लोग तुरंत वेल्लोर शिफ्ट हो रहे हैं. तुम जरा जल्दी
"बेटा, मुझे माफ कर दो... उस समय मां से गलती हो गयी जाकर डयूटी संभाल लेना." थी. "
दूसरी ओर से कराह सुनायी दी. कई बरसों से दबे हुए दुःख का कुल योग. मुझे नहीं पता कि मां ने फोन काट दिया या फिर फोन अपने आप बंद हो गया.
जीवन में पहली बार मैं मुर्दाघर में बैठकर चुपचाप रोया. दस मिनट तक उसी तरह बैठने के बाद फिर मैं टेबल के पास चला
गया.
रात को जब घर पहुंचा, तो मुझे ऐसा महसूस हुआ मानो कोई चीज जो लंबे समय से पूरे शरीर को बांधे रख कर दबाव डाल रही थी, वह ढीली होकर गायब हो गई है. बेहद खुशी का एहसास. अगली सुबह हमेशा से पहले मैं उठ गया. टहलना रद्द कर दिया. नाश्ते में नूडल्स तैयार किया. मुझे पता था मेरे वहां जाने के आश्वासन पर कितना भी थकावट हो, मां वह सब कुछ बना लेंगी
मां
"यह अच्छा हुआ कि तुमने जल्दी फोन कर लिया. मैं अपनी के पास जाने ही वाला था. "
"यार, और कोई रास्ता नहीं है."
"सुबह ही टेबल पर दुर्घटना का मामला रिपोर्ट किया है. उसके बाद वालों में यदि कोई जटिल केस नहीं है, तो तुम जूनियर डॉक्टर को चार्ज देकर जा भी सकते हो. मैं फोन काट रहा हूं..."
कुछ कहने से पहले फोन बंद हुआ. कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं, फोन हाथ में पकड़कर मैं कुछ देर तक वहीं खड़ा रहा. फिर मां का नंबर लगाया. कहूंगा कि फिलहाल थोड़ी देर हो जायेगी. लेकिन कितनी बार डायल किया तो भी मां का नंबर पहुंच से बाहर था.
मॅजिमा को फोन किया तो उसने भी नहीं उठाया. रास्ते में भी उन दोनों से बात करने की मैंने लगातार कोशिश की. लेकिन फोन 69 कथादेश मई 2026
कभी लगा ही नहीं, बारी-बारी से उन्हें फोन कर रहा था तो सहसा पीछे से आवाज सुनाई दी, "मंजीत" में चौंककर फ अस्पताल पहुंचने का पता ही नहीं चला.
हस्ताक्षर करने के बाद मुर्दाघर पहुंचा और बाहर की ओर देखा, तो कुछ लोग आंगन में एकत्रित थे. उनमें से किसी-किसी का चेहरा जाना-पहचाना लग रहा था. यदि आप मुर्दाघर के प्रांगण में शव का इंतजार करते परिवार के सदस्यों और रिश्तेदारों पर गौर करेंगे तो आपको मृत्यु की मूल प्रकृति का अंदाजा लग जाएगा. उनकी जानकारी के बगैर उनका चेहरा कई सारी बातें बुलंद कर देगा.
जब मैं केबिन पहुंचा तो जूनियर लड़का वहां नहीं था. “सर, एक्सटर्नल जांच प्रोफेसर सी.एस. ने की है, तब तक संदेश आ गया कि राउंड्स के लिए डॉक्टर नहीं है, वह जल्द ही लौट आएंगे." सभी उपकरणों को तैयार कर हमीद ने यह विवरण देते हुए पूछा, "मैं साथ रहूं?"
“नहीं." मुझे उसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी. हालांकि हमीद आधा सर्जन ही है. हमारे चार्ज लेने से पहले कई डॉक्टर अपना कार्य आधा या फिर तीन-चौथाई उसी से करवा लेते थे.
"कोई स्त्री है, सर. सुनने में आ रहा है कि उसने बिना जाने-समझे गाड़ी चलाई थी. देखने पर पता चल जाएगा."
"मुझे भी अहसास हो रहा है कि मामला पेचीदा है.” मैंने जेब से फोन उठाया और हमीद को दे दिया. मां का फोन आ सकता है. कह देना कि अत्यावश्यक सर्जरी है, जल्द ही वह पहुंच जाएंगे. दस्ताने पहनकर मैं कमरे में चला गया. बाहरी जांच के बाद फिर कपड़े उतारकर शारीरिक जांच करनी होगी. उसके बाद ही पोस्टमार्टम यानी ऑटोप्सी की ओर बढ़ेंगे. जब में टेबल के पास पहुंचा तो जैसा हमीद ने कहा था मेज पर आवश्यक सारे उपकरण और बर्तन कतार पर रखे गए थे.
हाथ में ऊँची लेकर मैंने साड़ी पहनकर खून से लथपथ लेटी उस महिला के चेहरे की ओर देखा.
बड़ी-बड़ी आंखें जो सिर के घातक घाव के नीचे खुली हैं। अचानक मेरा पूरा शरीर कमजोर होने लगा एक बार फिर ध्यान से देखा, नाक, होंठ, ठोड़ी पर तिल... मैंने गिरने से बचने के लिए मेज को कसकर पकड़ा हाथ से कैंची छूट गई और वह फर्श पर गिर गई. किसी तरह अपनी सिसकियों को नियंत्रित करने के लिए संघर्ष करता हुआ मैं पास की कुर्सी पर गिरने जैसा बैठ गया. मेरी आंखों में अंधेरा छा गया और समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं तो ऊपर की तरफ देखता हुआ वहीं कुर्सी पर सीधा लेटा रहा. जीवन में पहली बार मुझे हमेशा के लिए मुर्दाघर से बाहर भाग निकलने का मन किया.
कार्यालय को सूचित करके कहीं भाग निकलना ही होगा. पूरी ताकत लगाकर मैं तेजी से उठा. जल्दी से बाहर निकलने लगा तो
वह टेबल के ऊपर उठकर बैठी हंस रही है अब उसक पर थोड़ी देर पहले का बड़ा घाव नहीं है.
"तुम मुझे छोड़कर जा रहे हो?" क्या, वो आंखें भरी मैंने ध्यान से देखा. "तो तुम जानना नहीं चाहते हो कि मेरे क्या हुआ? अगर किसी ने मुझे मार डाला है तो?"
मुझे अपने अंदर बहुत बुरा महसूस हो रहा था. वह हंस रही है.
"उस दिन तुमने कहा था- यही वह जगह है जहां मुर्दे आ बार बात कर सकते हैं. याद नहीं?" वह रुक गई, "वह मंजीत, यहां से चले जाने के बाद हम किसीसे बात नहीं पाएंगे."
तब तक जमा की गयी सारी शक्ति खत्म हो गई. मैंने सिर जोर से हिलाया. पैरों के थककर गिर जाने से बचने कोशिश करता हुआ में धीरे-धीरे टेबल तक पहुंचा. सूखे ग साथ मरकर लेटी उसके मुलायम बालों वाले हाथ को मैंने देखा.
"मुझे जरा छू लो मंजीत..." फिर से उसकी आवाज. तसल्ली देते हुए मैंने उसके सिर को धीरे से सहलाया. नीले रंग की गेंदे के फूल वाली साड़ी पहन रखी थी. खून से हुई उस साड़ी को मैंने धीरे से उतार दिया. गुलाबी स्कर्ट की खींचते समय हाथ अनजाने में कांपने लगे. दाहिनी ओर थोड़ा कर लाल ब्लाउज और गुलाबी रंग की ब्रा को काटकर निश फिर आगे न बढ़ पाने के कारण मैं कुछ देर के लिए चिंतित सिर झुकाकर खड़ा रहा. आखिरकार जब मैंने कैंची सफेद अंडर पर रखी तो मेरी दृष्टि बिखरकर चौड़ी हो गयी. उसके बिना बालों वाले गुप्त अंग!
मैंने दोनों कंधों को सीधे कर जल्दी से अपनी भरी पोंछीं आगे और पीछे की ओर पलटकर उसके शरीर पर चोटों और घावों को ध्यान से देखा और रिपोर्ट दर्ज किया. पेट निचले हिस्से पर सिजेरियन के लंबा निशान को बड़े दुःख उससे भी अधिक प्यार से सहलाया.
मैंने उसके पूरे शरीर को पोंछकर साफ किया और टेबल ही मशीन पर उसका वजन मापा सिर उठाकर बॉडी ब्लॉक गर्दन के पीछे रखने लगा तो कितना भी संयमित रहने के बा मेरे भीतर से एक चीख फूटकर बाहर निकली. मजाक अपने बड़े स्तनों के बारे में वह कहती रहती थी कि हमारे को पेट भर दूध पिलाने के लिए में इसे सुरक्षित ले चल रही स्तन अब मुझसे रूठ कर दुख के कारण दोनों तरफ झुके
उसकी चमकती छाती की ओर देखकर मैंने स्केलपेल ली. जम गए छाती के मांस से नाभि तक मैंने छुरी खींची. 70 कथादेश मई 2026
प्यार की तरह जो पांच एक साल था, अब उसका शरीर दो हिस्सों में बंट गया. छुरी को सावधानी से दोनों तरफ की त्वचा में खींचा और धीरे-धीरे अंदर की ओर फाड़ा. आंतरिक अंगों को एक-एक करके उठाया. प्यार से देखने पर उसे बेहद सुंदर बनाने वाला दिल, न दिखाई देने पर तड़पता जिगर, बड़े प्यार से हम बांटकर खाने वाले भोजन को पचाती आंतें... उस तरह हर एक अंग की बड़ी सतर्कता से जांच की गयी.
गुड़हल डालकर उबाले गए नारियल तेल की खुशबू उसकी घनी जुल्फों से आ रही थी. बाएं कान के पीछे से शुरू कर सिर के ऊपरी हिस्से से दाहिने कान की त्वचा तक छुरी से काटकर खींचते समय मुझे लगा कि अब तक खोलकर रखीं अपनी आंखों को उसने दर्द के कारण बंद कर लिया. जब खोपड़ी को काटने के लिए आरा मशीन इधर-उधर घुमाई तो मैंने उस चेहरे की ओर देखा तक नहीं जब मस्तिष्क और तंत्रिकाओं की सावधानीपूर्वक जांच की जा रही थी तो कई बार मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मेरे कई रूप उसके मस्तिष्क में छिपे हुए हैं.
टेबल पर आने वाले मृत शरीर को सिलकर जिन्दा रहते समय के जैसा वापस करते समय किसी रोगविज्ञानी की पूर्णता होती है. मैं उसे बहुत अच्छी तरह जानता था. इसलिए सिलाई करना बिलकुल आसान भी था. टांके लगाने के बाद मैंने टेबल साफ किया और उसका शरीर भी पोंछा बालों में कंघी की पाउडर
लगाया.
ब्रेकअप के बाद सिर्फ एक बार किसी अनजान नंबर से उसने जो संदेश भेजा था वह अचानक मुझे याद आया. मैं उसी संदेश के कारण उसकी तलाश में सऊदी गया था. वह संदेश तो मुझे हृदयंगम था.
"मंजीत, मैं एक बार एक दिन के लिए ही सही, तुम्हारे साथ रहने आऊंगी. लेकिन तब, प्यार करते समय छूने नहीं देती थी, कहकर तुम मुझे गले लगाने से इनकार मत कर देना. '
मेरी आंखें बहुत ज्यादा जल रही थीं. मुझे लगा कि मैं अब नहीं रोऊंगा तो मर ही जाऊंगा. मैं उसके दोनों गाल पकड़कर चुपचाप रोया. फिर उसे आराम से टेबल के दाहिने ओर सरकाकर लिटाया.
फिर टेबल के बाईं ओर की खाली जगह पर चढ़कर मैं लेट गया और जीवन में पहली बार उसे अत्यधिक प्यार से गले लगाया. नकाब हटाया और पहली बार मैंने उसके गाल को चूमा.
उस वक्त मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे सीने में कोई फूल खिल रहा हो... मैंने एक हाथ से अपना सीना और दूसरे हाथ से उसको जोर
से पकड़ा.
अजिजेष पच्चाह
केरल राज्य में मलप्पुरम जिले के पल्लिक्कल नामक जगह में जन्म.
मलयालम के युवा कहानीकारों में
प्रसिद्ध
इनको
कई
महत्वपूर्ण
पुरस्कार
प्राप्त हुए हैं. पी. एन. पणिक्कर कथा पुरस्कार, केलि चेरुकथा पुरस्कार, केरल साहित्य अकादमी गीता हिरण्यन
पुरस्कार आदि उनमें से कुछ हैं. किसेबी, देवक्कलि (कहानी संग्रह), एषां पतिप्पिन्टे आद्या प्रति अतिरषि सूत्रम (उपन्यास), ओरु आनकुट्टि वांगिया आर्तवापूमेत्ता (संस्मरण) आदि रचनाएं अब तक प्रकाशित हुई हैं.
सम्पर्क पल्लिक्कल पोस्ट, चेलेंप्रा मार्ग, मलप्पुरम - 679634 मो.: 9995302940, ई-मेल: ajijeshp@gmail.com
डॉ. सुमित पी.वी.
केरल के कण्णूर में जन्म. मलयालम और हिन्दी में लेखन और परस्पर अनुवाद कार्य समकालीन भारतीय साहित्य, वागर्थ से लेकर देश की तमाम साहित्यिक पत्रिकाओं में निरंतर लेखन. समकालीन कविता और अनुवाद में रुचि. हिन्दी साहित्य की 4 किताबें और अनुवाद की 4 किताबें प्रकाशित. संप्रति केरल के महाविद्यालय में अध्यापन कार्य. सम्पर्क: इंदीवरम, मण्णूर, पोरोरा पोस्ट मट्टनूर, कण्णूर, केरल 670702
मो. 9497388529, ई-मेल: sumithpoduval@gmail.com
बरामदे के अलग-अलग हिस्सों में चढ़कर खड़े हुए. हवा के बड़े झोंके से बिजली कट गयी. कहीं से ऑटोमैटिक जनरेटर के शुरू होने की आवाज और रोशनी एक साथ आई.
बड़ी देर बाद भी दरवाजा नहीं खोले जाने पर एटेंडर हमीद धीरे से उठकर दरवाजे के पास आया.
"मंजीत सर..." उसने दरवाजा खटखटाया और अंदर की ओर ध्यान दिया.
" अरे मंजीत सर... कोई समस्या...?"..
जवाब न मिलने पर वह बार-बार दरवाजे को खटखटाता रहा.
*स्केलपेल सर्जिकल चाकू
O
* बॉडीब्लॉक शव परीक्षण के दौरान शव के नीचे रखा जाने वाला
ऐसे कि कोई उस पकड़ को छुड़वा न सके.... अप्रत्याशित रूप से बाहर बारिश होने लगी. जो लोग लाशों के इंतजार कर रहे थे वे जल्दी से सिर पर हाथ रखकर मुर्दाघर के लकड़ी या रन का ब्लॉक
71 कथादेश मई 2026
What
दलित प्रश्न
प्रगतिशील काव्यधारा में दलित में दलित स्त्री ( 6 )
प्रगतिशील काव्यधारा की शुरुआती पीढ़ियों में स्त्री कवियों की संख्या नगण्य-सी है. जो हैं वे स्त्री शोषण के मुद्दे उठाती हैं लेकिन जातिवादी संरचना में पिसती दलित स्त्री की जीवन स्थितियों को अलग से अपनी कविता का विषय नहीं बनाती हैं. महादेवी वर्मा (1907-1987) ने "श्रृंखला की कड़ियाँ' में आर्थिक पराधीनता को केंद्र में रखकर स्त्री की तमाम गुलामियों का विश्लेषण किया है. उनकी कविताओं में भले ही इस विश्लेषण का प्रत्यक्ष असर नजर नहीं आता लेकिन वे स्त्री मुक्ति की प्रबल समर्थक के रूप में दिखाई देती हैं- "अन्य होंगे चरण हारे और हैं जो लौटते दे शूल को संकल्प सारे." इस विशेषता के बावजूद यह कहा जा सकता है कि उनकी कविताएँ 'भक्तिन' जैसी सामाजिक वास्तविकता से निकली किसी स्त्री का आख्यान नहीं प्रस्तुत करतीं. हाँ, उनकी समवयस्क सुभद्राकुमारी चौहान (1904-1948) के यहाँ ऐसी स्त्री का आख्यान मिलता है. प्रगतिशील लेखक महासंघ हेतु हिंदी की प्रगतिशील कविताओं के चयन और संपादन का दायित्व जब राजीव सक्सेना और उनके सहयोगियों को मिला तो उन्होंने सुभद्राकुमारी चौहान की ऐसी ही कविता चुनीं जाहिरन, तरक्कीपसंद होने का मतलब जातिगत क्रूरताओं के प्रति आलोचना और अस्वीकार का भाव माना जाता रहा है. इसी तर्क से सुभद्राकुमारी की रचना 'प्रभु तुम मेरे मन को जानो' इस संग्रह में है. पारंपरिक भावबोध की प्रतीत होती यह कविता अपनी अंतर्वस्तु में अग्रगामी है. एक दलित स्त्री मंदिर में
बजरंग बिहारी तिवारी
भगवान के दर्शन हेतु जाना चाहती है. प्रथाएँ उसका रास्ता रोके खड़ी हैं. पुजारी उसे अंदर नहीं जाने देता. ईश्वर उच्चवर्णों के लिए आरक्षित है. मंदिर प्रवेश प्रतिबंधित है. सुभद्राकुमारी उस स्त्री के क्षोभ को शब्द देते हुए लिखती हैं-
कह देता है किंतु पुजारी यह तेरा भगवान नहीं है दूर कहीं मंदिर अछूत का और दूर
भगवान कहीं है
मैं सुनती हूँ जल उठती है मन में यह विद्रोही ज्वाला
यह कठोरता ईश्वर को भी जिसने
टूक-टूक कर डाला. यह वही समय था जब गाँधी जी 'अस्पृश्यता उन्मूलन' की अपनी परियोजना के अंतर्गत देश का भ्रमण कर रहे थे और सवर्णों से हृदय परिवर्तन की अपील कर रहे थे. सितंबर 1932 में उन्होंने "आल इंडिया एंटी अनटचेबिलिटी लीग" बनाया था. बाद में इसका नाम बदलकर 'हरिजन सेवक संघ" कर दिया. उन्होंने इस अभियान को गति देने के लिए जनवरी 1933 में 'हरिजन' नामक साप्ताहिक पत्र निकाला. अछूत समस्या को समाप्त करने के लिए उन्होंने नवंबर 1933 से जुलाई 1993 तक देश भर की यात्रा की. इस यात्रा में उन्होंने हरिजन सेवक संघ के लिए चंदा इकट्ठा किया. कांग्रेस के स्वयंसेवकों को छुआछूत विरोधी मानसिकता के प्रसार में लगाया अछूतों को मंदिर प्रवेश उनकी जाति सुधार की वृहत परियोजना का एक हिस्सा था. डॉ. आंबेडकर इसके पहले ही मार्च 1930 में नासिक में कालाराम मंदिर सत्याग्रह
72 कयादेश मई 2026
शुरू कर चुके थे. यह सत्याग्रह पी
तक चला था. सत्याग्रह सफल न क्योंकि सवर्णों खासकर पुजारियों ने द को मंदिर प्रवेश की अनुमति न दी- अभियान की विफलता ने धर्मांतरण अनिवार्यता पैदा की. सुभद्राकुमारी कविता की दलित स्त्री अंततः इसी नि पर पहुँचती है कि उसे इस भेदभाव अपमानजनक व्यवस्था में नहीं रहना "यह निर्मम समाज का बंधन और अ अब सह न सकूँगी. यह झूठा वि प्रतिष्ठा झूठी इसमें रह न सकूँगी. यह प्रगतिशील काव्यधारा के चिंतन और चिंता का विषय होना चा कि शुरुआती पीढ़ी के साथ बाद पीढ़ियों में भी स्त्री-कवि अत्यल्प क्यों प्रगतिशील कविता के जो प्रतिनिधि प्रकाशित हुए हैं उन्हें देखकर इस बात पुष्टि की जा सकती है. अपने शोध 'प्रगतिवाद एवं समानांतर साहित्य' में रेखा अवस्थी ने इस मुद्दे पर स्त्री रचनाक के अभाव पर विचार नहीं किया है, य उनसे ऐसी अपेक्षा थी. चौथे सप्तक शामिल सुमन राजे (1938-2008) की एक कविता दलितों में भी दलित मुसहर स की व्यथा-कथा कहती है. वह व्यथा उ स्त्री का बेटा बयान करता है. स्वाभावित तौर पर इसमें उसकी व्यथा भी शामिल यह व्यथा दहशत से भरी हुई है. अल्प के बालक को संकटापन्न जीवन स्थितिय ने समय से पहले समझदार बना दिया है कविता में बालक का दुःस्वप्न और सामाजिक यथार्थ साथ-साथ चलते है उनकी क्रासिंग कई बार उनमें अंतर करना
मुश्किल कर देती है, दुःस्वप्न की स्मृति भी नहीं देते. माँगने पर
दुत्कार देते हैं.
क्या कर लिया किसी ने जब हमारे
को माँ
से
कहता
हुआ
बालक
स्वानुभूत
जहाँ
कहीं
झोंपड़ी
डालते
हैं, उन्हें
वहाँ से
ही
धानों से
वास्तविकता से
उसे
पुष्ट
करता
चलता है.
निकालने
की
धमकी दी
जाती
है.
एक
ही
बाँध
कर
उसकी नींद कंटकाकीर्ण यथार्थ से बिंधकर मड़ई में
त्रासद जागरण में बदल जाती है. सोते देश तो आजादी पा गया है लेकिन वे अभी समय वह माँ के साथ रहना चाहता है तक गुलाम ही हैं. ब्रिटिशकाल के कानून
पूरा परिवार गुजर-बसर करता है.
इस कविता में
हमें माँ की आवाज
आग लगा दी
थी. 156
सुनाई
नहीं देती. कहा जा सकता है कि वह
अवसन्न
है. ऐसे आघात के बाद निःशब्द
हुई,
रात
को रात जैसा नहीं रहने देतीय माँ को
माँ
जैसा
नहीं
लेकिन माँ उस घुप्प अँधेरे में जाने कहाँ उन पर लागू होते हैं. उन्हें अभी गुम हो जाती है माँ की अनुपस्थिति में जरायम पेशा कौम माना जाता है. अपराध अँधेरा उसकी हड्डियों में सूखे पत्तों की कहीं भी हो, कोई भी करे, पुलिस उन्हें तरह बजने लगता है. आसमान तक उठी पकड़ती है. डंडे के बल पर गुनाह कबूल मीनार-सी लगती एक चक्करदार धुंध कराती है. आखिर ऐसी कौन-सी युक्ति लगाई जाए कि उनकी भी मुक्ति हो सके रहने देती. माँ को पुकारता "मारे थानेदरवा बोलाइ
भी
है.
बालक
अपनी
बदली
हुई माँ
को देख
रहा
है, महसूस
कर रहा है-
"माँ
तुम माँ
जैसी क्यों नहीं लगती हो ?/ यह
रात
जैसी
क्यों
नहीं
रात भी / लगती ?"
कुछ इसी
वह
चढ़ता जाता है, माँ
न आगे
बालक मीनार पर
तरह की स्तब्ध स्त्री सरिता माहेश्वर की कविता 'इसीलिए तो...' में दिखाई देती है. बलात्कार
घरवा से हमें यह युवती सामूहिक झूठइ बनावे गुनहगार/ जेलवा में मलवा
दिखती है, न पीछे बालक अकेला उठावै मजबूर करे / केउ नहिं सुनत जकड़ा था. उसकी गोहार.../ देशवा आजाद अहै हम तो गुलमवाँ हमरे लिए न सरकार / एस कौनउ जुगुति लगावा भइया 'मितई हमरउ करावा उरधार..."
पड़ने से घबरा उठता है, वह चाहता है कि माँ उसे पुकारे, उसका डर काट दे. डर कहीं जाता नहीं. नींद भले ही उचट जाए. नींद का दुःस्वप्न जागृति को अपनी
विरासत
सौंप देता है. घर में अकसर चूल्हा जलता नहीं. दीये की रोशनी भी कभी-कभार होती है, कुछ न जलने से पेट में कुछ जलता है. इसे बुझाती है नींद, जैसे चूल्हे से निकाली गई लकड़ी बुझकर भी धुआँ उगलती रहती है वैसे उसकी नींद भी धुआँती रहती है. बालक चाहता है कि उसकी माँ रोज चूल्हा जलाए, दीया जलाए उसे अँधेरे में न छोड़े. दुःस्वप्न में उसे उनका वाल बाँका न कर सका- भागना पड़ता है. भागते-भागते उसके पैर चीथड़े हो जाते हैं. धौंकनी जैसी चलती साँस बेकाबू हो जाती है. बालक माँ का
सुमन राजे की पूर्वोद्धृत कविता की दलित (मुसहर) स्त्री अपने बच्चे के दुःस्वप्न सुनती है. बच्चे का भय कल्पित नहीं है. दुःस्वप्न बताते बताते वह यथार्थ पर आ जाता है, यथार्थ ज्यादा भयावह है. यह बालक एक हत्याकांड का प्रत्यक्षदर्शी है. उसके अपने परिवार के लोगों की हत्या हुई हत्यारों को कोई रोक नहीं सका. कोई
स्नेहिल स्पर्श चाहता है भय से मुक्ति चाहता है.
इस भय से मुक्ति है क्या? अपने एक
गीत 'सोनवा का पिंजरा' में दलित रचनाकार और राजनेता डॉ. माताप्रसाद (1924-2021) ने मुसहरों की जुबानी उनका दर्द लिखा है.
गीत में यह उत्पीड़ित समुदाय कहता है कि उनके पास कोई ठौर-ठिकाना नहीं. वे किस गाँव-शहर को अपना कहें? उनकी
जिंदगी कैसे बीते? वे रात-दिन मेहनत करते हैं. प्रचंड गर्मी में जलावन की लकड़ियाँ चीरते हैं. लोग उनका आधा दाम
की शिकार है. रात अँधेरे में कई भुजाओं ने उसे चीख सुरक्षाबलों की बिगुल के शोर में गुम होकर रह गई थी.. रात के यही बलात्कारी दिन के तहकीकाताती थे. सरिता माहेश्वर अपनी कविता में बड़ा संवेदनशील, नाजुक और जोखिम भरा प्रकरण उठाती हैं. अकसर कविगण ऐसे प्रसंगों को विषय बनाने से बचते हैं. कवि को इस भीषण यौन हिंसा की सूचना किसी निकट संबंधी द्वारा लिखी एक चिट्टी से मिली. संक्षेप में इसमें सारा वाकया दर्ज था. इस पत्र ने कवि के अंतःकरण को बींध दिया लोहे की तप्त सलाख से जैसे उसका शरीर दाग दिया गया हो. पत्र के चंद शब्दों ने जैसे वाचक
कल जब वे आए थे/ कटे-अधकटे के सामने सारा दृश्य प्रस्तुत कर दिया हो. धान के खेतों में पीड़िता की विस्फारित आँखें, घृणा से
घेर लिया था / हमें उन्होंने / तो बचुआ उफनता अंतर्मन, और उन अधिकार संपन्नों के सामने हाथ जोड़े, गिड़गिड़ाते पिता और
भी
काकी की गोद में था / पी रहा था दूध
गटर- गटर
पति सब कवि ने देख लिया- “उसका बाप / उसका पति खड़े थे सामने ही हाथ जोड़े/ कभी जाते थे लिपट / उनके ही श्रीचरणों में/ कि उन्होंने वेश्यालय नहीं कि वे मजदूरी करके ही अपना पेट पालते हैं उसका अपराध सिर्फ इतना है कि वह गरीब होकर भी सुंदर है कि वह नेक और दिलेर है मगर वे मुस्कराते रहे रहस्यमय ढंग से." प्रगतिवादी स्त्री कवियों ने क्षीण ही दिया था गन्ने की पोई की तरह सही लेकिन दलित स्त्रियों की पीड़ा और
ठीक उस वक्त जब दन्न से/ गोली लगी गर्दन में खोला
तो खून से पहले दूध ही गिरा था धरती पर
क्या कर सके/ दादी, काका, फूहा सभी तो थे वहाँ
जब मुनियाँ को पैरों से दबाध चीर
79 कथादेश मई 2026
संघर्ष को अपनी कविता का विषय बनाना जारी रखा. संस्कृति के मोहक दावों और कड़वी वास्तविकताओं को समझने वाली इन रचनाकारों ने अर्जित ज्ञान और स्वानुभव के रास्ते आगे बढ़कर पीड़ितों के साथ एकजुटता स्थापित की. सरिता माहेश्वर ने लिखा "घातों और आघातों से जूझने का हम नहीं करते दावा / पर हम ही इस गली सड़ी/ बदबूदार लाश को ढोते हैं सदा. अत्याचारियों ने कब कहाँ नहीं की वारदात? सदियों से अवला की उपाधि पा/ रक्षक की शरण में ढोते रहे कुबड़े कंधों पर पश्चाताप ...सिखाया गया दर्शन / ब्रह्म- जीव के एकात्म का ऊँच-नीच के विकट जाल काय अधिकार का नहीं / कर्तव्य के भार का आभार का अब और नहीं/ प्रभु लो/ तुम्हारा जुआ हम अपने कंधों से उतारते हैं. आक्रोश और प्रतिरोध की इसी कड़ी में शोभा सिंह (1952) की कविताएँ आती हैं. वे एक तरफ दुनिया भर की संघर्षशील स्त्रियों के साथ स्वर मिलाती हैं, उत्पीड़ित स्त्रियों का साथ देती हैं दूसरी तरफ अपने ही देश में दलित, मुस्लिम, आदिवासी हाशिये पर खड़ी सभी स्त्रियों के साथ एका बनाती हैं. अपनी कविताओं के मकसद पर विचार करती हुई शोभा सिंह अपने तीसरे संग्रह माँ का गीला चुंबन की भूमिका में लिखती हैं- "आबो दाना की तलाश में शहर आते मजदूर जो अपनी मेहनत से सजाते संवारते शहर. कठोरतम श्रम विषम परिस्थिति में जिंदा रहते. जातीय घृणा के शिकार सफाईकर्मी सेप्टिक टैंकों व सीवर में दम तोड़ते. इन हत्याओं के खिलाफ जब वे होते आंदोलनरत, तब उनकी नहीं होती सुनवाई. महिला मजदूरों के शोषण से मुक्ति के सवाल परिवर्तन की आँधी वहीं से उठती, जिनके पास खोने को कुछ नहीं, आसमां की विशालता समेटे किसान खेतों-खलिहानों व ईंट भट्टे में काम करने वाले श्रमिकों सबका सम्मान करते हुए खेतों की भरपूर फसल का स्वर वन लिखना चाहती हूँ, कवि की
यही प्रतिबद्धता उनकी कविताओं के अंतर्वस्तु चयन में दिखाई देती है. अपनी एक कविता में वे हाथरस की उस चर्चित घटना को विषय के रूप चुनती हैं. राष्ट्रीय मीडिया में कुछ हद तक बहस का मुद्दा बन पाई यह बीभत्स घटना उत्तर भारत में दलितों पर होने वाली हिंसा का एक उदाहरण पेश करती है. उत्तर प्रदेश के हाथरस जिलान्तर्गत बघना ग्रामसभा के वूलगढ़ी गाँव में 14 सितंबर 2020 को एक वाल्मीकि परिवार की बीस वर्षीय युवती के साथ गैंगरेप किया गया और उसकी रीढ़ की हड्डी तोड़ दी गई हिंसा की शिकार उस युवती का दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में 29 सितंबर 2020 को मौत हो गई. प्रशासन ने परिवार की गुहार को अनसुना कर जबरिया उस युवती की लाश को रात के 2 बजे जला दिया. शोभा सिंह 'हायरस देश की बेटी' शीर्षक कविता में लिखती हैं- घास काटती खुरपी दूर जा गिरी/ आवाज गले में घुट गई डरी हुई रक्तिम आँखों में खौफ की काली परछाइयाँ
सरिता माहेश्वर अपनी कविता में बड़ा संवेदनशील, नाजुक और जोखिम भरा प्रकरण उठाती हैं. अकसर कविगण ऐसे प्रसंगों को विषय बनाने से बचते हैं. कवि को इस भीषण यौन हिंसा की सूचना किसी निकट संबंधी द्वारा लिखी एक चिट्ठी से मिली. संक्षेप में इसमें सारा वाकया दर्ज था. इस पत्र ने कवि के अंतःकरण को बींध दिया. लोहे की तप्त सलाख से जैसे उसका शरीर दाग दिया गया हो. पत्र के चंद शब्दों ने जैसे वाचक के सामने सारा दृश्य प्रस्तुत कर दिया हो. पीड़िता की विस्फारित आँखें, घृणा से उफनता अंतर्मन, और उन अधिकार संपन्नों के सामने हाथ जोड़े, गिड़गिड़ाते पिता और पति सब कवि ने देख लिया.
74 कथादेश मई 2026
उमरी अचानक लहूलुहान तूफान जिंदा जवाँ जिस्म को / चिथड़ा-चि करता रहा प्रतिरोध के सारे प्रयास निष् दुर्बल होती गई धरती की बेटी / दलि रीढ़ तोड़ दी गई। टूटी टांगों के बीच बहता मिट्टी में रिसता रहा। वे हँसते शाम रोई". कवि ने उस सवर्णतंत्र संज्ञान लिया है जो ऐसे मौकों पर स हो जाया करता है और पीड़ितों चरित्रहनन करता है. उसका यह पुख्ता माना जाए कि जाति-जेंडर आधा हिंसा करने वाले कानून के शिकंजे अकसर छूट जाते हैं-
पर सवाल
कब दंडित होंगे अपराधी
कब हमारी बेटियाँ
महफूज होंगी
तटस्थ रहकर (कब तक)
चुपचाप तमाशबीन बने रहेंगे शोभा सिंह की तरह साम्यव विचार-प्रणाली से सम्बद्ध मनजीत मान इस दलित स्त्री को 'अंतिम स्त्री' कहती यह दावा कि दलित स्त्री पितृसत्ता से है, कवि को स्वीकार नहीं. वह भी पिता पुत्रों और भद्र पुरुषों की पेचीदी दुनिया उनकी मेहरबानी पर 'जूठन पर पलती इस स्त्री की अपनी आकांक्षाएँ हैं, सपने लेकिन वे लौकिक-अलौकिक-पारली साधन नहीं जिससे वे सपने साकार सकते हैं-
न विधाता है न विद्वता का छ न धरती/ न अन्न जल बस एक बेगार है/ आसमां तक पाँव में छाले हैं सर पे मैला और धमनियों में जमा/ एक
खामोशी का उबलता धुआँ ! 165
शलभ श्रीराम सिंह (1938-2000 मुखर प्रगतिशील कवियों में शुमार ि जाते हैं. अपनी कविताओं के भाषा-शैली और शिल्प पर रोशनी हुए उन्होंने लिखा है, "मेरी कविता भाषा कथ्य की अनुरूपता में स्वतः अस्ति
में आई है. शैली शब्दों के पीछे खड़े अनुभव को विम्बित करने वाली प्रक्रिया के रूप में मिली. शिल्प स्वेटर बुनती, चरखा कातती, धान रोपती, बोझा धोती, बर्तन
माँजती, खाना बनाती... साथ ही साथ नदियों के बहाव, हवा की चाल, पत्तियों के स्पंदन, और परिंदों की चहक और उड़ान से मिला. मुझे शलभ की कविताओं में धान रोपती, बोझा ढोती स्त्रियों के अभिधामूला चित्र नहीं मिले लेकिन वह विक्षोभ मिला जो सामाजिक हिंसा के
प्रतिकार में उभरता है-
मेहतरों के कातिल गिरफ्तार किए जाएँ गिरफ्तार किए जाएँ भिश्तियों के हत्यारे... तुरन्त तुरन्त पकड़े जाएँ- मोचियों की बस्ती पर हमला करने वाले लोग पकड़े जाएँ हरिजनों, गिरिजनों, बनजारों को अस्त
करने वाले तमाम लोग. शलभ के काव्य-संग्रह 'उन हाथों से परिचित हूँ मैं (प्र.सं. 1993) में स्त्री पर कई कविताएँ हैं लेकिन दलित स्त्री पर प्रत्यक्षतः कोई कविता नहीं है, वे व्यक्तिवाचक नामों का कविता में प्रयोग के हिमायती नहीं लगते लेकिन 'विनीता पालीवाल' शीर्षक कविता में उन्होंने नया ढर्रा अपनाया है. इसमें वे नई बनती स्त्री की पहचान कराते हैं जो परिवेश की प्रतिकूलता से सफलतापूर्वक जूझ रही है- "कितनी ताकतवर हो गई हो तुम विनीता पालीवाल / कि सारा गाँव खड़ा है तुम्हारे खिलाफ लेकर हरवा-हथियार और कुछ भी नहीं बिगाड़ पा रहा है. तुम्हारा. कम्युनिस्ट पाटह के घोषणापत्र (1848) में दुनिया भर के श्रमिकों को एक होने का आस्वान किया गया था. दुनिया के हर देश के लिए इसका अर्थ भिन्न-भिन्न रहा. भारत के श्रमिक जाति के आधार पर बिखरे हुए थे, जाति और जेंडर श्रमिकों को बाँटता था. शलभ श्रीराम सिंह ने
इनके एकजुट होने की आवश्यकता रेखांकित की. संत रैदास और मीराबाई के संदर्भ का स्मरण कराते हुए उन्होंने लिखा- आँखें उठी हुई हैं
आदमकद आस्था कि एक स्त्री खड़ी है सामने
कठवत के पानी को गंगा में बदलने की शक्ति से भरपूर
एक चंगा मन सहेजे अपने भीतर मोची की आँखों में
सिर्फ राँपी नहीं हो सकती है कोई
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स्त्री. 'आल इंडिया शिड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन' की स्थापना डॉ. भीमराव आंबेडकर ने की थी. भारतीय संविधान में अनुसूचित जाति के हितों की सुरक्षा के प्रावधानों की व्यवस्था की माँग के लिए फेडरेशन ने 29 सितंबर 1944 को मद्रास में बैठक की थी. डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में हुई इस बैठक में वकिंग कमेटी ने सुरक्षात्मक उपायों के मद्देनजर कई प्रस्ताव पारित किए थे. इन प्रस्तावों को डॉ. आंबेडकर ने अनुसूचित जातियों की राजनीतिक माँगें कहा. अगले वर्ष अर्थात् 1945 में छपी उनकी किताब कांग्रेस और गाँधी ने अछूतों के लिए क्या
लैंगिक न्याय के प्रति मार्क्सवाद की यह प्रतिबद्धता सबसे सघन और प्रामाणिक रूप में मानबहादुर सिंह के काव्य में दिखाई देती है. उनकी कविताएँ हिंदी के शुरुआती प्रगतिवादी चिंतक कथाकार यशपाल के इस कथन की साक्षी बनती हैं। कि "देश की स्त्रियों का प्रश्न देश
के दलित और पीड़ित पुरुष समाज के प्रश्न से भिन्न नहीं "170 मानबहादुर सिंह के जीवनकाल में
उनके कुल चार काव्य-संग्रह छपे- 'बीड़ी बुझने के करीब' (1978), 'भूतग्रस्त' (1985), 'लेखपाल तथा अन्य कविताएँ' (1989), और 'माँ जानती है' (1993).
75 कथादेश मई 2026
किया' के परिशिष्ट में इन मांगों को शामिल किया. 'ऑल इंडिया शिडयूल्ड कास्ट फेडरेशन' की मद्रास बैठक में पारित इन मांगों के समर्थन में कम्युनिस्ट विचारक और संगठनकर्ता बी टी रणदिवे ने पाटह मुखपत्र 'पीपल्स वॉर' में 'सिक्स कोर अनटचेबल्स दियर प्लेस इन फ्रीडम'स बैटल' लेख प्रकाशित कराया था. उनकी समझ थी कि सवर्णों के दमन से निजात दिलाए बगैर दलितों को भारत के स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने की बात नहीं सोची जा सकती. स्वतंत्र भारत के शासन-प्रशासन में अगर दलितों को समान हिस्सेदारी न मिली तो जनतंत्र संभव न होगा. फेडरेशन की वर्किंग कमेटी द्वारा प्रस्तुत एवं पारित प्रस्तावों तथा बी टी रणदिवे के समर्थन लेख में दलित स्त्रियों के अधिकारों की बात अलग से नहीं उठाई गई है. रणदिवे यह मुद्दा रेखांकित कर सकते थे क्योंकि वैश्विक कम्युनिस्ट आंदोलन में स्वायत्त स्त्री संगठन और आंदोलन 1920 में ही आकार ले चुका था. इस वर्ष जुलाई-अगस्त में कम्युनिस्ट स्त्रियों का पहला अंतरराष्ट्रीय सम्मलेन हुआ था. इस समय कोमिंटर्न की दूसरी कांग्रेस चल रही थी. पहले अर्थात् स्थापना सम्मलेन में संगठन के उद्देश्य और कार्यक्षेत्र पर बहस हुई तथा आंदोलन के निर्देशक बिंदुओं पर सहमति बनी. इसमें आंदोलन के संचालन हेतु अंतरराष्ट्रीय सचिवालय बनाने का प्रस्ताव पारित हुआ. कोमिंटन ने बिना विलंब के इसे अपनी मंजूरी दी और तदनुरूप 20 नवंबर 1920 को सचिवालय का गठन हुआ. क्लारा जेटकिन को महासचिव तथा अलेक्सांद्रा कोलंताई को सहसचिव बनाया गया. कोलंताई के अनुसार सचिवालय का उद्देश्य था सर्वहारा स्त्रियों के बड़े हिस्से तक पहुँचना और उन्हें शिक्षित प्रशिक्षित करने में, उनमें स्वातंत्र्य-भाव विकसित करने में कोमिंटन से जुड़कर कार्य करना. अगले वर्ष 1921 में दूसरा सम्मलेन हुआ. इस सम्मेलन में हुई बहसों ने सर्वहारा स्त्री आंदोलन को दिशा देने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई. वर्ष 1921-22 में दुनिया के
C
कई देशों में गोष्ठियां आयोजित की गई. दुनिया में स्त्री आंदोलन के प्रसार को गति देने के मकसद से सचिवालय मास्को से बर्लिन ले जाया गया. साम्यवादी स्त्रियों का जो नेटवर्क बना उसने साम्यवादी आंदोलन को पूर्णतर बनाया और साम्यवादी नेताओं से संवाद करते हुए उन्हें स्त्री प्रश्नों के प्रति संवेदनशील बनाया. स्त्रियों को लेकर पुरुष कम्युनिस्ट नेताओं के पूर्वग्रहों से जूझना आसान नहीं था. लेनिन के साथ क्लारा जेटकिन की बहस और स्त्री आंदोलन को लेनिन का मजबूत समर्थन याद रखने योग्य है.
लैंगिक न्याय के प्रति मार्क्सवाद की यह प्रतिबद्धता सबसे सघन और प्रामाणिक रूप में मानबहादुर सिंह के काव्य में दिखाई देती है. उनकी कविताएँ हिंदी के शुरुआती प्रगतिवादी चिंतक कथाकार यशपाल के इस कथन की साक्षी बनती हैं कि "देश की स्त्रियों का प्रश्न देश के दलित और नहीं पीड़ित पुरुष समाज के प्रश्न से भिन्न मानवहादुर सिंह के जीवनकाल में उनके कुल चार काव्य-संग्रह छपे - 'बीड़ी बुझने के करीब' (1978), 'भूतग्रस्त' (1985), 'लेखपाल तथा अन्य कविताएँ (1989), और माँ जानती है' (1993). इलाहाबाद से अंग्रेजी साहित्य में एम. ए. करने के बाद वे अपने गृह जनपद सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश लौट आए थे. यहीं वे शिक्षक हुए और फिर इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य मार्क्सवाद ने जिस 'कवि-कार्यकर्ता (पोएट-एक्टिविस्ट) नामक रचनाकारों की नई श्रेणी को जन्म दिया था, मानबहादुर उसी में आते थे. अपने कार्यक्षेत्र में वे 'मास्टर जी थे जो दलितों में अधिकारबोध जगाने का काम कर रहे थे. अधिकारबोध राजनीतिक समझदारी के बिना नहीं उपजता. ऐसी समझदारी पैदा करने का प्रयास जोखिम भरा है. कवि किसी दुविधा के बिना इस काम में लग गया था. जातिवादी समाज में उनके प्रति चिड़ होनी स्वाभाविक थी. 24 जुलाई, 1997 में दिन दहाड़े दो हजार से अधिक विद्यार्थियों तथा शिक्षकों के सम्मुख जब
एक हत्यारे ने उन पर हमला किया तो उन्हें बचाने कोई भी आगे नहीं आया. उनका कत्ल हुआ. उनकी आत्मकथात्मक रचना 'यह कहानी नहीं है' 'वर्तमान साहित्य पत्रिका के नवंबर 1999 अंक में छपी. इससे उनके व्यक्तिगत और सामाजिक संघर्ष का पता चलता है. कवि (मानबहादुर सिंह) का परिचय देते हुए अंक में लिखा गया है- "सामंती तत्त्वों ने उन्हें जनवादी कविताओं के लिखे जाने के विरुद्ध धमकाया कि या तो गाँव छोड़ दो या फिर चमरीआ गीत लिखना बंद कर दो. उनके पुत्र पर भी प्राणघातक हमले हुए पर वे अपने इरादे से विचलित न हुए. वे सदा पीड़ितों के पक्ष में लिखते रहे. मृत्यु के कुछ दिन पूर्व भी इन्हें धमकी दी गई पर वे आत्मभीति से मुक्त हो जनता की पक्षधरता करते रहे. समाज में शोषण और अन्याय के विरुद्ध तटस्थता के वे विरोधी थे. "171 पहले ही संग्रह में उन्होंने अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करते हुए लिखा कि खलिहान के बाहर छिटके दाने अर्थात् सीला बीनती अबोध दलित लड़की बदनीयत बूटों की आवाज नहीं सुन रही है. उस बूटधारी की कलुषित निगाह लड़की के जिस्म पर है. ऐसे में प्रतिबद्धता का तकाजा है- खलिहान के बाहर छिटके दाने बीनती लड़की तुम्हारे मचमचाते बूटों को नहीं सुन रही है वह आँखें चुग रही है बंदूक की तरह तनी हुई तुम्हारी
निगाह
लड़की के गोश्त पर सधी हुई बेखटके शर्म और डर के पखने समेटे वह
नेहरू का निरीह शान्ति युग रही है.
...
उसी को सचेत करने मेरी कविताएँ अब खाँसने लगी हैं खलिहान से उठाए गए दाने-दाने
का हिसाब बाँचने लगी हैं.
संदर्भ
150. 'हिंदी की प्रगतिशील कविताएँ :
76 कथादेश मई 2026
स्वतंत्रता प्राप्ति तक' (प. सं. 19 संपादक- राजीव सक्सेना, प्रगतिशील ले महासंघ के लिए वाणी प्रकाशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित, पृ. 95-96. 151. वही, पृ. 96.
152. मेरे देखने में जो संग्रह आ उनमें प्रगतिशील स्त्री कवि शामिल न ऐसे कुछ संग्रहों, अध्ययनों के नाम बा के लिए नीचे दिए जा रहे हैं-
i. 'काव्यधारा' (1955), संपा शिवदानसिंह चौहान, गोपालकृष्ण क प्रकाशक- आत्माराम एंड संस करन गेट, दिल्ली.
ii. हिंदी की प्रगतिशील कि (1971), डॉ. रणजीत, प्र. हिंदी साहि संसार, प्रगतिशील प्रकाशन, दिल्ली. लेखक की पीएच.डी. थीसिस है.
iii. 'प्रगतिवादी काव्य साहित् (1971), सं. डॉ. कृष्णलाल 'हंस' मध्य हिंदी ग्रंथ अकादमी, भोपाल.
iv. 'हिंदी के प्रगतिशील कवि' (197 सं. डॉ. रणजीत, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउ दिल्ली.
v. 'रास्ता इधर है विभिन्न काल के प्रमुख प्रगतिशील कवियों की प्रतिनिध कविताएँ (1978), सं. भीष्म साहनी अन्य राष्ट्रीय प्रगतिशील लेखक महान
का प्रकाशन, दिल्ली.
vi. 'प्रगतिशील कविता के मील-पत् (1985), सं. डॉ. रणजीत, लोकभार प्रकाशन, इलाहाबाद.
vii. 'हिंदी की प्रगतिशील कविताएँ स्वतंत्रता प्राप्ति तक' (1986), सं. राज सक्सेना व अन्य राधाकृष्ण प्रकाश दरियागंज, नई दिल्ली.
153. प्रगतिवाद एवं समानांतर साहि सन् 36 से सन् 51 तक के साहित्य द्वंद्वात्मक विश्लेषण' (द्वितीय संशोधित संस्करण: 2000), रेखा अवस्थी, स्व प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली. इस शो का पहला संस्करण सन् 1978 में प्रकाशि
हुआ था.
154. 'इक्कीसवीं सदी का
( बच्चे को केन्द्रित कर रची गई कविताएँ ) रिपोर्ट्स (2023), माइक तावेर और दारिया
(https:\\laghukatha dot com)
(प्र.
सं.
1992),
सुमन
राजे
रत्नालय,
गिलिस
साहित्य बाजार, कानपुर, पृ.
याकोनोवा,
32-35.
ब्रिल. इस किताब पर तथा कोमिंटर्न के इतिहास पर काम कर रहे प्रो. गोपाल प्रधान के लेख व लेखमाला से सूचनाएँ व विश्लेषण ग्रहीत हैं. गोपाल
लघुकथा. कॉम
अंक
155. 'अस्मितामूलक विमर्श और हिंदी साहित्य' ( 2020), सं. मन्दाकिनी मीणा, श्री नटराज प्रकाशन, साउथ गांवड़ी एक्स. दिल्ली, पृ. 94-95.
35.
156. 'इक्कीसवीं सदी का गीत पृ.
157. 'इतिहास लिखने के वायदे (1991), सरिता माहेश्वर, अप्रतिम प्रकाशन, सादतपुर, पृ.8.
दिल्ली,
158. वही, पृ. 7.
159. माँ का गीला चुंबन... डरता है तानाशाह' (प्र.सं. जनवरी 2026 ), शोभा सिंह, गुलमोहर
प्रकाशन,
मयूर
विहार,
दिल्ली. 'क्यों 160.
प्रधान का लेख
170. 'यशपाल का विप्लव अग्रलेखों का संचयन' (प्र. सं. 2014), संपादन एवं समन्वय आनन्द, विप्लव कार्यालय लखनऊ की ओर से लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ. 129. उद्धृत अंश 'विप्लव' के जनवरी 1941 के अग्रलेख से है. परतंत्र भारत में प्रगतिवाद की प्राथमिकताओं में स्त्री और दलित स्त्री को जातीय-वगस्य शोषण से ऊपर रखते हुए यशपाल ने इसी अग्रलेख में यह भी जोड़ा, "इस देश के पुरुष स्वयं
की
पीड़ित और दलित होते हुए भी इस देश का पीड़न और शोषण करने से नहीं देश की स्त्रियाँ दोहरी गुलाम हैं. एक तो यहाँ के पुरुष समाज की और फिर
लिखती हूँ मैं, पृ. 12. स्त्रियों इस घटना पर किंचित विस्तार चूकते. इस से जानने के लिए देखें, 'हिंसा की जाति जातिवादी हिंसा का सिलसिला' (प्र.सं. 2023), बजरंग बिहारी तिवारी, परिकल्पना प्रकाशन, अजीत विहार, दिल्ली, पृ. 57-58.
161. 'माँ का गीला चुंबन', पृ. 40-43.
162. वही, पृ. 42-43.
163. 'बूंद बूंद शब्द' (2017), मनजीत
मानवी, ऑथर्स प्रेस, हौज खास एन्क्लेव,
इस देश के पुरुषों को गुलामी में बाँधे रखने वालों की." (पृ. 130).
171. 'जनकवि मानबहादुर सिंह (प्र. सं. 2024), डॉ. रामप्यारे प्रजापति, अनामिका प्रकाशन, प्रयागराज, पृ. 44.
172. 'बीड़ी बुझने के करीब' (प्र. सं. 1978), मानबहादुर सिंह, प्रकाशन संस्थान, शाहदरा, दिल्ली, पृ. 83. पूवह उत्तर प्रदेश 164. "ध्वंस का स्वर्ग' (प्र.सं. 1991 ) के अवधी बैसवाड़ी क्षेत्र में किसान से खेत
नई दिल्ली, पृ. 70.
शलभ श्रीराम सिंह, मानक पब्लिकेशंस प्रा. में छूट गई गेहूँ धान आदि की बाली या लि., शकरपुर, दिल्ली, प्रथमतः और अंततः' दाने उठाने को सीला या सिला बीनना (भूमिका), पृ.10. कहते हैं. खलिहान के बाहर छिटके दाने
165. वही, पृ. 30. 166. उन हाथों से परिचित हूँ मैं' (प्र.सं. 1993 ), शलभ श्रीराम सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, विदिशा, म.प्र., पृ. 111.
167. "ध्वंस का स्वर्ग', पृ. 29. 168. 'पास्ट ऑफ द आउटकास्ट रीडिंग्स इन दलित हिस्टरी' (2017), सं. सव्यसाची भट्टाचार्य, वगति चिन्ना राव, ओरिएंट ब्लैकस्वान, पृ. 72-73.
169. 'द कम्युनिस्ट वीमेंस मूवमेंट 1920-22 प्रोसीडिंग्स, रेजोल्यूशंस एंड
बीनने पर भी यही कहा जाता है. यह काम प्रायः भूमिहीन कृषि मजदूर दलित करते रहे हैं. रामविलास शर्मा की 'सिलहार' कविता की पंक्तियाँ हैं- "फटे अंगोछे में बच्चे भी साथ ले / ध्यान लगा सीला चमार हैं बीनते खेत कटाई की मजदूरी, इन्हीं ने/ जोता बोया सींचा भी था खेत को", "हिंदी काव्य में मार्क्सवादी चेतना' (प्र. सं. 1974), जनेश्वर वर्मा, ग्रन्थम, रामबाग,
O सम्पर्क मो. 9818575440
कानपुर, पृ. 356.
देश
मई 2026
सुदर्शन रत्नाकर, राधेश्याम भारतीय, कृष्णा वर्मा, अर्चना राय
पूनम चंद्रलेखा, अतुल मिश्र, शिप्रा मिश्रा, अंजू निगम, हिना श्रीवास्तव अध्ययन कक्ष लघुकथा में पात्र की अवस्था के उल्लेख का औचित्य / सन्तोष सुपेकर संचयन राजेन्द्र कुमार कनौजिया दस्तावेज लघुकथा पर योगराज प्रभाकर की रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' से बातचीत
चर्चा में
कथा दीपंगल
हिन्दी लघुकथाओं के मलयालम अनुवाद का प्रवर्तन, संरचना 18 2025 (वार्षिक) सम्पादनः कमल चोपड़ा,
सम्राट् विक्रमादित्य विश्वविद्यालय उज्जैन में लघुकथा आयोजन देशान्तर खलील जिब्रान (अनुवाद सुकेश साहनी )
ऑडियो छवि निगम (स्वर ऋतु कौशिक)
वीडियो: भगवान् वैद्य प्रखर (निर्देशन : मनीष खण्डेलवाल )
भाषान्तर: रघुनन्दन त्रिवेदी (पंजाबी) श्याम सुन्दर अग्रवाल), दीपक घोष (गुजराती तृप्ति दवे जोशी), योगिता जोशी (मराठी वसुधा सहस्रबुद्धे)
मेरी पसन्द खेमकरण 'सोमन' पाठकीय फ्लैट नंबर इक्कीस (राम मूरत 'राही) पर मुकेश पोपली पुस्तक रँगे हुए सियार (लघुकथासंग्रह) डॉ. सुरेश वशिष्ठ संपादक सुकेश साहनी, रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु
प्रकाशक रीता साहनी, 185 उत्सव. महानगर पार्ट-2, बरेली-243006 sahnisukesh@gmail.com laghukatha89@gmail.com अभिकल्प सुशांत काम्बोज
77 कथादेश मई 2026
आलेख •
पतंजलि और भर्तृहरि से आगे देखने की कोशिश
विनोद शाही
TAK
एक
चिंतन अपने आरंभिक रूप में होने की व्यापक सवालों के साथ हमारे सामने न
भाषा-दर्शन को भर्तृहरि 'वाक्यपदीयम्' वजह से बहुत गहराई में नहीं उतर पाया है. है. ऐसे में हमें भर्तृहरि से आगे देखन
तक ले आये थे. अब जरूरत है उसके अगले चरण में प्रवेश करने की तो क्या यह अगला चरण प्रबंध-पदीयम्' या 'अंतप्रबंध-पदीयम्' का होगा?
भर्तृहरि पांचवीं सदी के आसपास भारतीय भाषा दर्शन को एक क्रांतिकारी मोड़ पर ले आये थे. उनकी मौलिक शिखर जैसी लगती हैं. उद्भावनाएं इस क्षेत्र में प्रकट हुए स्वर्णिम
भर्तृहरि से पहले हमारे यहां भाषा दर्शन की एक समृद्ध परंपरा मौजूद रही है. वेदों में 'बाकू' की अवधारणा और उसके स्तरों का जिस तरह का उल्लेख मिलता है, वह भारतीय भाषा दर्शन को, शेष विश्व के भाषा-चिंतन से अलग और विशिष्ट बनाता है. उससे शब्द और अर्थ के नित्य और अनित्य होने की बहस का जन्म हुआ पाणिनी ने इसे अपने व्याकरण- शास्त्र के ग्रहण किया. निर्माण के लिए आधारभूत धारणा की तरह
पाणिनी का महत्व तत्कालीन भाषा को व्यवस्थित रूप प्रदान करने की दृष्टि से अधिक है. तथापि वह बात पाणिनी के भाषा- दार्शनिक पक्ष का प्रतिनिधित्व नहीं करती. दार्शनिक दृष्टि से उनकी बुनियादी अवधारणा शब्द के नित्य और अनित्य होने से ताल्लुक रखती है. इस संदर्भ में वहां स्फोट से नित्यार्थ को पुनरुपलब्ध करने की बात सामने आती है. तथापि उनका वह
इसके बावजूद वे इसलिए गौर तलब हैं, क्योंकि आगे चलकर तत्संबंधी धारणाओं का खूब विकास होता है. तथापि वे अनेक दृष्टियों से उत्तर-विवेचन और पुनर्विचार की मांग भी करती रहती हैं.
इस संदर्भ में पुनर्विचार की इस जरूरत की पूर्ति के लिए पतंजलि सामने आते हैं. पाणिनी की स्थापनाओं पर 'महाभाष्य की रचना करके उन्होंने भारतीय भाषा दर्शन को ऐसी ऊंचाई पर ला खड़ा किया, जिसे प्रस्थान की तरह ग्रहण किये बिना इस क्षेत्र में आगे बढ़ना असंभव हो गया.
पतंजलि के बाद एक लंबे अर्से तक 'महाभाष्य' की अनिवार्य उपस्थिति दिखाई देती रहती है. ऐसी किंवदन्ती है कि भर्तृहरि से किसी विद्वान ने पतंजलि के 'महाभाष्य' जैसा कोई और बड़ा भाषा दार्शनिक ग्रंथ न होने की बात कही थी. यह सुनकर उन्होंने महाभाष्य' से बेहतर ग्रंथ लिखने की बात को एक चुनौती की तरह स्वीकार किया. 'वाक्यपदीयम्' की रचना के बाद उन्होंने टिप्पणी की कि स्वर्ग में बैठे पतंजलि को यह मलाल रहेगा कि वे 'वाक्यपदीयम्' को पढ़े बिना इस दुनियां से रुखसत हो गये. यह बात भर्तृहरि की गर्योक्ति ही नहीं है. आज जब हम इस ग्रंथ को इतनी सदियों बाद भी प्रासंगिक पाते हैं, तो यह बात भर्तृहरि की भविष्यवाणी जैसी लगने लगती है.
लेकिन यहां यह कहना भी जरूरी लगता है कि अब समय अधिक जटिल व अधिक
78 कथादेश मई 2026
जरूरत महसूस होने लग पड़ी है.
भर्तृहरि ने जब 'वाक्यपदीयम्' था, साहित्य की मुख्य विधाएं काव्य नाटक थीं. कथा के कुछ आरंभिक मिथकों व पशु-पक्षी कथाओं के उनके सामने थे. ज्ञानानुशासनों की शान्त भाषा, सूत्रों या छंदबद्ध पद्य के सा ढलकर हमारे सामने आती थी. हाल वर्तिका भाष्य, निबंध, स्वतंत्र गद्य की लिखे जाते थे. उन्हें सामने रखेंगे, भाषा-पाठ के 'प्रबंध होने की स्थिति चलन में देखी जा सकती है. तथापि तक जन सामान्य के व्यवहार में आने भाषा का सवाल है, उसे किसी त ढांचे में बांधना संभव नहीं है. इसके बावजूद उस दौर भाषा - दार्शनिक शास्त्रों के केंद्र में तत्का साहित्य के विविध रूप ही हैं. उनकी व्या के लिए शब्दार्थ केंद्रित आलोचना-सिद्ध पर्याप्त थे. तथापि भर्तृहरि ने एक क्रांत चिंतक के रूप में अनुभव किया कि 'वाक्य' को एक 'पद' के रूप में, एक 'समग्र अर्थ-गत इकाई (अ होलन सीमेंटिक यूनिट) की तरह देखने का
आ गया था.
वाक्य को एक अर्थगत इकाई की ग्रहण करने की बात, काव्य और बोल-चाल की भाषा के संदर्भ में आ अर्थपूर्ण लगती है. जैमिनी जैसे मीमांस ने तो इसीलिए अपने विवेचनों में वाक्य
ही अधिक केन्द्र में रखा है. इससे साबित होता है कि भर्तृहरि से पहले ही हमारे मीमांसक इस बात को महसूस करने लग पड़े थे कि हमें यदि भाषा के असल अर्थ तक पहुंचना है, तो हमें वाक्य की ओर देखना होगा. मीमांसक, वाक्य की केंद्रीयता तक, अपने कर्मवादी दर्शन की वजह से पहुंचते हैं, वे सवाल उठाते हैं कि भाषा में कर्म का प्रतिनिधित्व कौन करता है? उत्तर है- क्रिया-पद. यानी भाषा को उसका असल अर्थ उसके क्रिया-पदों से मिलता है. पर क्रिया अपने आप में कोई खास अर्थ नहीं रखती. उसके अर्थ को आलोकित होने के
लिए चाहिये एक वाक्य.
वाक्य के अन्य संज्ञादि शब्दों की व्याख्या के लिए शब्दार्थ या वागर्थ केंद्रित भाषा दर्शन पर्याप्त था. पर मीमांसक मानते थे कि क्रिया- विहीन शब्दार्थ हमें सत्य तक नहीं ले जाता. जब पूरी सृष्टि गतिशील है और अपनी गति या परिवर्तनशीलता से ही अपने अर्थ को उदघाटित करती है, तो भाषा की व्याख्या के नियम अलग कैसे हो सकते हैं? इस तरह मीमांसा दर्शन में संज्ञादि शब्दों के क्रिया से जुड़े होने की बात केंद्रीय हो गयी. इससे वैयाकरणों के लिए भी वाक्य को एक समग्र अर्थ- गत इकाई की तरह देखने का रास्ता खुल गया.
अब क्रिया एक ऐसा पद थी, जो वाक्य को एक समग्र अर्थ पूर्ण इकाई की तरह गठित करने का आधार हो सकती थी. मीमांसकों की ऐसी सोच और समझ ने उस दौर में एक बड़ी दार्शनिक बहस को जन्म दिया. पर वह बहुत बाद में केंद्रीय बहस का मुद्दा हो पाती है. शुरुआती रूप में तो उस दौर की अधिकांश भाषा- दार्शनिक बहसें, शब्दार्थ के नित्य अथवा अनित्य होने से ताल्लुक रखने वाली ही हैं.
वैदिक काल से चले आ रहे भाषा दर्शन के तहत वाक् के गहनतम स्तर को 'अपौरुषेय' माना गया. उसे प्रकृति या सृष्टि की बुनियादी भाषिक अभिव्यक्ति के रूप
में देखा गया. वाक् की उस 'परा' अभिव्यक्ति से ताल्लुक रखने वाली भाषा में शब्दार्थ के नित्य होने की बात सामने आई.
परंतु गौतम बुद्ध (563-483 ईसा पूर्व) ने वेदों के अपौरुषेय होने की धारणा पर सवाल खड़े कर दिये. वे सभी मनुष्यों के भीतर परा-चेतना की ऊंचाई को संभव मानते थे. इससे वेद वाक्य के 'नित्यार्थ-मूलक अंतिम प्रमाण' होने की नैयायिकों की धारणा में भी बदलाव हुआ. वेद वाक्य की बजाय बुद्ध-पुरुषों के वचन भी 'आप्त-वाक्य' के रूप में प्रमाण माने जाने लगे. इससे शब्दार्थ की नित्यता की परा वाक् मूलक धारणा तो बची रही, पर वह वेदों तक सीमित नहीं रह गयी. दूसरे, अब शब्दार्थ की नित्यता की व्याख्या वैदिक अवैदिक के विभाजन पर निर्भर नहीं रही. अब कतिपय वेद-वाक्य मी अनित्यार्थ से युक्त माने जाने लगे.
परंतु इससे शब्दार्थ के गहन स्तर के नित्य होने की संभावना खंडित नहीं हुई. नित्यता अब भाषा से परे मौन या निर्विचार में ले जाने वाली चेतना की वस्तु हो गयी. बेशक इससे भाषा के सभी रूपों के विखंडन का रास्ता भी साफ हो गया. उत्तर कालीन बौद्ध धर्म में इस आधार पर 'अपोहवाद' का सिद्धांत सामने आया. शून्य में ले जाने वाले 'प्रतीत्यसमुत्पाद' को कुछ दार्शनिक सर्वात्म की भूमिका की तरह भी देखते हैं. सर्वात्म को हम नित्यता के दर्शन का एक अलग संस्करण कह सकते हैं. परंतु बुद्ध ने बोध अथवा प्रतीति के किसी रूप को नित्य नहीं माना. उसे वे शून्य में ले जाने वाले परिनिर्वाण की भूमिका की तरह देखते हैं. परिनिर्वाण यानी जैसे दिये की लौ जलती जलती बुझ जाती है. फिर वह सर्वत्र परिव्याप्त हो जाती है, पर दिखाई नहीं देती. पर यह भी ध्यान में लेना जरूरी है कि बुद्ध ने वेदों को भी साफ तौर से नकारने की बजाय, वैदिक कर्मकांड पर ही निशाना साधा है और शब्द से बंधने की बजाय उस बोध में उतरने की बात की है,
79 कथादेश मई 2026
जहां से वे ऋचाएं आती हैं. बुद्ध के इन विचारों का असर बाद में सिद्धों, नाथों और निर्गुनियों पर दिखाई देता है, कबीर वही सवाल फिर से उठाते हुए पूछते हैं, 'वेद बड़ा कि जह ते आया?' गीतम के तत्संबंधी उल्लेख हमें 'तेविज्ज सुत्त' और 'भुरिदत्त जातक कथा' में मिलते हैं, बुद्ध, अरिङ्ग को सम्बोधित करते हुए कहते हैं-
बुद्ध
“हे अरिट्ठ! वेदाध्ययन वैयेवान् पुरुषों का दुर्भाग्य है और मूखों का सौभाग्य है. यह (वेद-त्रय) मृगमरीचिका के समान हैं. सत्यासत्य का विवेक न करने से मूर्ख इन्हें सत्य मान लेते हैं. ये मायावी (वेद) प्रज्ञावान को धोखा नहीं दे सकते. मित्र-द्रोही और जीवनाशक (भ्रूण-हत्यारे) को वेद नहीं बचा सकते. द्वेषी, अनार्यकर्मी आदमी को अग्नि-परिचर्या भी नहीं बचा सकती."
इस संवाद को ध्यान पूर्वक देखें. यहां प्रज्ञावान व्यक्ति के वेद वाक्यों से भ्रमित न होने की बात कही गयी है. इससे नित्यार्थ की स्थिति वेद वाक्य में न होकर, मनुष्य की प्रज्ञा में सिद्ध होती है. इस तरह हम देख सकते हैं कि गौतम बुद्ध के ऐसे विचारों के असर में भाषा दर्शन का रूप अचानक कैसे बदल गया.
पर भाषा वैज्ञानिक नजरिये से यह अराजक स्थिति थी. तो छठी से चौथी शती ईसा पूर्व के बीच के समय में पाणिनी ने भाषा को व्यवस्थित करने का महासंकल्प लिया. दार्शनिक धरातल पर उन्होंने यह माना कि आम बोल-चाल की भाषा में अनित्य शब्दार्थों की भरमार होती है. जबकि नित्य शब्दार्थों का आधार वेद वाक्य ही हैं.
इस तरह पाणिनी के साथ वैदिक भाषा दर्शन की जैसे पुनः वापसी होती है. उनके चिंतन में वेद भाषा के अभिव्यक्ति मूलक चरम उत्कर्ष के पर्याय हैं. वैदिक ऋचाओं में भाषा अपने परा- वाक् की व्यंजना सर्वाधिक सशक्त रूप में करती है. उस तल पर शब्द और अर्थ में कोई भेद नहीं रहता. ऐसे शब्दार्थ नित्य होते है.
THE
यहां इस सवाल को उठाना जरूरी लगता खोजता हुआ, वहां पहुंचता है.
है कि पाणिनी को ऐसा क्यों लगा कि भाषा दर्शन के वास्तविक आधार को बचाने के लिए वैदिक 'वाक् दर्शन' में वापसी जरूरी है? गौतम बुद्ध के विचार भाषा का ही अतिक्रमण करने वाले विचार बनकर सामने आये थे. एक तरह से वे उपनिषदों के अधिक करीब मालूम पड़ते हैं, पर उपनिषद भाषा की सीमाओं के पार जाने की अपनी कोशिशों को वहीं तक ले जाते हैं, जहां भाषा के समस्त विस्तार का 'प्रणव' या 'उद्गीथ' में विलय होता है. वह उस नाद की श्रुति में ले जाता है, जिसे कुछ वैदिक ऋचाओं में परा वाक् की सृष्टि में व्याप्ति की तरह देखा गया.
इस तरह औपनिषदिक भाषा दर्शन अपने वैदिक आधार का विस्तार करता ही अधिक मालूम पड़ता है. हालांकि गौतम बुद्ध की विपस्सना जिस मीन निर्विचार में ले जाती है, उसे एक नजरिये से देखें तो भाषा के परे जाने वाली बात कह सकते हैं, पर दूसरे नजरिये से उसकी भिन्न व्याख्या संभव है. वहां सृष्टि के नाद की मौजूदगी होती है या नहीं, इस बारे में स्पष्ट निर्देश न होने से ही यह झमेला खड़ा हुआ है. इसलिए उत्तर-बौद्ध दर्शन और सिद्धों-नाथों के विवेचन हमें शून्य में भी अनाहत नाद के सुनाई देने के बारे में बताते हैं. वह एक तरह से परा- वाक् की श्रुति ही है.
यहां आकर वैदिक और अवैदिक भाषा दर्शन एक-दूसरे के करीब आते मालूम
पड़ने लगते हैं. बौद्ध और जैन दर्शन नित्यार्थ तक पहुंचने के लिए भाषा के परे जाने की बात करते हैं. जबकि वैदिक और उत्तर-वैदिक
वैयाकरण उसे भाषा के गहन स्तर की तरह
देखते हैं.
उस गहन स्तर पर शब्दार्थ अपने नित्य और अविभाज्य रूप में मौजूद रहता है. इससे लगता यह है कि दोनों पहुंचते एक ही जगह हैं. एक भाषा के परे जाता हुआ, तो दूसरा, भाषा के ही गहनतम स्तर को
दो पाणिनी और पतंजलि (पांचवीं से दूसरी शती ईसा पूर्व) के विवेचन, वैदिक परंपरा को आगे बढ़ाते हैं. इस लिहाज से वे शब्दार्थ की नित्यता का भाष्य और महाभाष्य रचते हैं. नित्यता को शब्दार्थ की अंतस्संभावना की तरह खोजते हैं. इसके लिए पाणिनी शब्दों की व्युत्पत्ति पर ध्यान देते हैं.
भाषा के उद्भव काल में शब्दार्थ अविभाज्य होता है. इसलिए वह परा वाक् की अभिव्यक्ति में सहायक हो जाता है. शब्द की व्युत्पत्ति हमें उसके अधिकारी रूप के करीब ले जाती है. भाषा का वह अविकारी नित्ययर्थ, भाषा के उस प्राक् रूप से अभिन्न होता है. इस आधार पर पाणिनी व्याकरण का मूल ढांचा खड़ा करते हैं.
बाद में शब्द के अनेक विकारी रूप प्रकट होते रहते हैं. उनके नियम बनाकर पाणिनी भाषा को व्यवस्थित करने का बड़ा काम कर दिखाते हैं.
यहां जैमिनी (चौथी से दूसरी शती ईसा पूर्व) हस्तक्षेप करते हैं. वे पाणिनी तथा
इस तरह औपनिषदिक भाषा- दर्शन अपने वैदिक आधार का विस्तार करता ही अधिक मालूम पड़ता है. हालांकि गौतम बुद्ध की विपस्सना जिस मौन निर्विचार में ले जाती है, उसे एक नजरिये से देखें तो भाषा के परे जाने वाली बात कह सकते हैं, पर दूसरे नजरिये से उसकी भिन्न व्याख्या संभव है, वहां सृष्टि के नाद की मौजूदगी होती है या नहीं, इस बारे में स्पष्ट निर्देश न होने से ही यह झमेला खड़ा हुआ है. इसलिए उत्तर- बौद्ध दर्शन और सिद्धों-नाथों के विवेचन हमें शून्य में भी अनाहत
नाद के सुनाई देने के बारे में बताते हैं. वह एक तरह से परा-बाकू की श्रुति ही है.
80 कथादेश मई 2026
पतंजलि की धारणाओं का विस्तार क भी नजर आते हैं. वे पहली दफा 'क्रिया' भी नित्य होने की बात उठाते हैं. पर इन नित्यता की परिभाषा पर सवाल खड़े जाते हैं.
नित्य का मतलब है, वह जो अविक है. इसीलिए भाषा के जो रूप प्रचलन दिखाई देते हैं, वे उत्तरोत्तर विकारी हो ज हैं. ऐसे में क्रिया की नित्यता का क्या हो सकता है? वह तो सिवाय परिवर्तनशी के और कुछ नहीं तो उसे नित्य कहेंगे?
मीमांसक साफ करते हैं कि वेद- के अर्थ आप तब तक ठीक से समझ नहीं सकते, जब तक उन्हें क्रिया- आधारित वाक्यों के रूप में ग्रहण न कि
कर्मवादी
होने ।
जाए. व्यवहार में भी कारण मीमांसकों के लिए वेदों के क्रिया-कर्म मूलक संदेश में छिपे हैं. इनके जीवन में नित्य कर्म की अहमियत स्थापित हुई. नित्य कर्म के ठीक से निर्वाह के कर्म बंधन से छूटने के सिद्धांत का विक हुआ. 'कुवन्नेवेह कर्माणि' जैसे वेद-वाक्य के भीतर से कर्मों से मुक्ति की संभावना सामने आई.
उधर हम बौद्ध दर्शन में भी 'सम् कर्म की अहमीयत और समझ को, 'अष्ट मार्ग' का रूप लेता देखते हैं. इस सिद्ध के मुताबिक विकारी या अनित्य कर्म । है, जो अतियों पर डोलता है. उसे छोड़ना और मध्य-मार्ग को खोजना है. इस तर कर्म की नित्यता की व्याख्या मध्य-मार्ग मदद से तर्कसम्मत हो गयी.
पर उस 'मध्य' को बाद में दार्शनिकों के द्वारा 'शून्य' कह दिया ग तो यह बात कर्म में अकर्म की मौजूदग की संभावना की ओर ले गयी. इसे ठीक समझाने के लिए कीचड़ में कमल के खि के प्रतीकात्मक अर्थ को ग्रहण किया इससे बौद्ध दर्शन मे पुंडरीक के श्वेत, अरु नील आदि अनेक रूपों की चर्चा साम
आई. इनका संबंध चेतना के उत्तरोत्तर गहन ध्वनि-पक्ष है वह भी विनश्वर होने से अनित्य
होते स्त्रोतों से जोड़ा गया.
परंतु अब समस्या यह थी कि भाषा दर्शन के तल पर इस गुत्थी को कैसे सुलझाया जाये? भाषा में जिसे पाणिनी और पतंजलि शब्दार्थ की नित्यता कह रहे थे, उसे क्रिया मूलकं कर्म में अकर्म की तरह कैसे समझा जाये ? परंपरागत रूप में वैयाकरण शब्दार्थ की नित्यता के सवाल की व्याख्या भाषा के तल पर करने का प्रयास कर रहे थे. इसमें दिक्कत यह थी कि शब्द का ध्वनि-पक्ष, अर्थ के वाक् से रिश्ते के साथ बंधा था. वह जो ध्वनि-पक्ष था, वह वर्ण क्रम की तरह प्रकट होकर तत्क्षण विलीन हो जाता था. उससे अर्थ का बोध कैसे हो सकता है, इसकी व्याख्या के लिए 'स्फोट' को लाया गया. ध्वनि के भौतिक रूप में क्रम-पूर्वक नष्ट होने के बावजूद, मन के तल पर ध्वनि- समुच्चय संभव था. इससे होने वाले वस्तु के बोध को उसका अर्थ कहा गया. इस तरह ध्वनि के वस्तु के साथ रिश्ते की व्याख्या कर ली गयी. पर बहुत सी समस्याएं बनी और बची रहीं.
स्फोट सिद्धांत में भाषा को शब्दार्थ-संहति की तरह देखा गया. शब्द के बाहरी ध्वनि-पक्ष को विनश्वर माना गया. पर उसके मानसिक 'नाद-समुच्चय' को अपेक्षाकृत टिकाऊ मानने में कोई अड़चन नहीं थी. पर स्फोट से होने वाले वस्तु के बोध को बाहरी वस्तु से अलग माना गया. उसे भौतिक पदार्थ के रूप में न देखकर, उसके मानस -बिंब को भाषा का हिस्सा माना गया.
इससे भाषा में 'पदार्थ' का अर्थ भिन्न हो गया. पद उसे माना गया, जो ध्वनि- समुच्चय से अर्थ यानी वस्तु का बोध कराता है.
इस तरह भाषा के लिए पदार्थ दो तरह का हो गया. एक वह जो बाहरी वस्तुगत पदार्थ है. वह परिवर्तनशील और विकारी होने से अनित्य है. उसके समांतर भाषा का
है. पर अपने मानस-रूप में वे दोनों, नित्यता का उत्तरोत्तर संधान करने वाले होते जाते हैं. ध्वनि का मानस-बिंब 'नादात्मक वाक् बन जाता है. पदार्थ का मानस-बिंब वाक्-स्फुटित पद का अर्थ हो जाता है. तथापि उसे भी नित्य शब्दार्थ नहीं कह सकते, तो पाणिनी और पतंजलि भाषा के व्युत्पत्ति वाले पक्ष की ओर देखते हैं.
व्युत्पत्ति-परक अर्थ को महत्व देने का प्रयोजन यह है कि उसमें परा वाक् के अंतर्नाद की मुखरता देखी जाती है. वहाँ भाषा का ध्वनि पक्ष ही अनाहत नाद की तरह गुंजायमान नहीं होता, वस्तुगत पदार्थ भी एक तरह के ऊर्जा-मूलक विवर्त' में बदल जाता है.
भाषा के इस गहन तल पर ध्वनि और वस्तु में, अथवा शब्द और अर्थ में कोई भेद नहीं रहता. इसे भाषा की गहराई में नित्य परा वाक् की सतत मौजूदगी की तरह देखा जा सकता है, अपने इस विवर्त रूप में
यही वजह है कि आधुनिक काल में काव्य, साहित्य की सिरमौर विधा होने की स्थिति में बना नहीं रह पाता. साहित्य-चिंतन में शब्दार्थ विवेचन संकटग्रस्त हो जाता है. शब्द के रस ध्वनि वाले प्रतीयमान अर्थ अभिधा की जमीन टटोलते दिखाई देने लगते हैं. साहित्य की गुणवत्ता का आधार अब शब्द-साधना ही नहीं बना रह पाता. वाक्य के भीतर से ही कोई शब्द
अपनी गहन अर्थ व्यंजना करता हुआ अचानक आलोकित जरूर हो उठता है, परंतु उससे वाक्य ही 'अर्थ-गौरव' से मंडित हुआ अधिक प्रतीत होता
है. श्रेष्ठ साहित्य की व्याख्या का आधारभूत सिद्धांत अब 'शब्दार्थ संहति' के बजाय, 'वाक्यार्थ-संहति' को खोजता अधिक दिखाई देने लगता है.
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वस्तु शून्य से तथा कर्म अकर्म से गले मिलता है.
भाषा की इस गहन दार्शनिक व्याख्या को निम्न रूप में एक सिलसिले की तरह समझा जा सकता है-
1. भाषा के नित्य रूप के स्फोट की अवधारणा, आरंभिक रूप में पाणिनी के विवेचन में सामने आती है.
2. मानस तल वाली उसकी व्याख्या की गहराई में पतंजलि उतरते हैं.
3. पर पदार्थ के शून्य से रिश्ते की व्याख्या कैसे की जाये, यह समस्या बची रहती है. ऐसे में भर्तृहरि सामने आते हैं. वे महायान से 'विवर्तवाद' को ले लेते हैं. इस संदर्भ में उनपर नागार्जुन (150 से 250 ईस्वी के बीच जैसे चिंतकों के प्रभाव की अनदेखी संभव नहीं लगती. पर भर्तृहरि (485-540) अपने लिए जो रास्ता बनाते हैं, वह ब्रह्मवाद के करीब होने की वजह से मौलिक है. ऐसा करते हुए वे क्रिया के भी नित्य होने के गहन स्तर तक पहुंच जाते हैं. तीन
भर्तृहरि ने शब्द की बजाय, वाक्य को पद, यानी बुनियादी अर्थगत इकाई के रूप में देखा. इसके पीछे तत्कालीन साहित्यिक परिदृश्य की भी बड़ी भूमिका है.
साहित्य में अब कथा और निबंध की विधाओं का विकास अधिक जोर पकड़ने लगा था. नाटक और महाकाव्य को समग्रता में किसी एक अन्तर्ग्रथित अर्थ इकाई की तरह कैसे देखा जाये, यह सवाल भी एक और समस्या की तरह सामने खड़ा था?
भर्तृहरि कृति के समग्र पाठ को एक अर्थ- गत इकाई की तरह ग्रहण करने की हद तक तो नहीं जाते, तथापि एक शुरुआत
के लिए वे कृति के अर्थ को वाक्य दर वाक्य खुलने वाली वस्तु की तरह जरूर देखने लगते हैं.
अर्थ-ग्रहण की उनकी यह वाक्य क्रमिक प्रक्रिया भाषा दर्शन में एक नये दौर की शुरुआत जैसी लगती है. उनका
'वाक्यपदीयम्' इस नयी विवेचन-पद्धति को साहित्य-चिंतन की हद तक विकसित करने
लगता है.
उनके बाद आनंदवर्द्धन (820-890) कुंतक (950-1050 और क्षेमेंद्र (990-1070 ) ने 'प्रबंध-ध्वनि', 'प्रबंध वक्रता' और 'प्रबंध औचित्य' आदि की व्याख्या करने की ओर भी ध्यान दिया.
हालांकि इस साहित्य-चिंतन में पद और पदार्थ संबंधी विवेचन अभी तक शब्दार्थ-केंद्रित ही अधिक दिखाई देता है. नतीजतन 'प्रबंध-पदीयम्' जैसे किसी नये शास्त्र के अभाव में हमारा 'साहित्य-चिन्तन' मूलतः काव्य के विवेचन तक अटका रह जाता है. नाटक तक उसका विस्तार दिखाई तो देता है, पर वह नाटक के 'दृश्य-काव्य' होने की अवधारणा पर ही अधिक टिका होता है. नाटक के एक गद्य विधा भी हो सकने की बात बहुत बाद में सामने आती
इससे यह बात रेखांकित होती है कि बहुत बाद में, यानी आधुनिक काल के एक गद्य-काल होने के हालात के प्रकट होने पर ही साहित्य-चिंतन सही मानों में प्रबंध-केंद्रित होने की स्थिति में आ पाता है. ऐसा होने पर ही वाक्य अपने आप में एक संपूर्ण अर्थ- गत इकाई की तरह, ठीक से ग्राह्य हो पाता है. फिर वह प्रबंध के कलेवर में विलय होकर अपने अग्र विकास की जरूरत को भी हमारे सामने लाने लगता है.
यही वजह है कि आधुनिक काल में काव्य, साहित्य की सिरमौर विधा होने की स्थिति में, बना नहीं रह पाता. साहित्य-चिंतन में शब्दार्थ विवेचन संकटग्रस्त हो जाता है. शब्द के रस ध्वनि वाले प्रतीयमान अर्थ अभिधा की जमीन टटोलते दिखाई देने लगते हैं. साहित्य की गुणवत्ता का आधार अब शब्द-साधना ही नहीं बना रह पाता. वाक्य के भीतर से ही कोई शब्द अपनी गहन अर्थ-व्यंजना करता हुआ अचानक आलोकित जरूर हो उठता है, परंतु उससे
वाक्य ही 'अर्थ गौरव' से मंडित हुआ अधिक प्रतीत होता है, श्रेष्ठ साहित्य की व्याख्या का आधारभूत सिद्धांत अब 'शब्दार्थ संहति' के बजाय, 'वाक्यार्थ-संहति' को खोजता अधिक दिखाई देने लगता है.
साहित्य की व्याख्या के लिए ग्रहण की गयी यह दिशा सही मालूम पड़ती है. परंतु वाक्य-केंद्रित बुनियादी धारणाओं पर पुनर्विचार के अभाव में हमारे साहित्य-चिंतन का अग्र विकास, भर्तृहरि तक आकर भी, वहीं का वहीं ठिठका रह जाता है, साहित्य-चिंतन के अग्र विकास का आधार साहित्य के भाषा- चिंतन के जरिये निर्मित और पुष्ट होता है. पर भर्तृहरि के बाद फिर किसी ने वह बुनियादी काम नहीं किया. भर्तृहरि जिस नाद-स्फोट को वैयाकरणों से लेते हैं, व. शब्दार्थ-मूलक है. पर वे उसे वाक्य पद आधारित अर्थ-स्फोट के लायक बनाते हैं.
इससे ध्वनि के लिए, जो एक भाषा मूलक सिद्धांत है, रस-ध्वनि की तरह अंतर्विकास करने का रास्ता खुल गया.
रस सिद्धांत, पहले से ही एक ऐसे सिद्धान्त की तरह हमारे सामने मौजूद रहा है, जो कृति के समग्र पाठ को विवेचनीय बनाता है, परंतु वह विवेचन भाषा मूलक न होकर भाव-मूलक है. उस सिद्धांत में रस को कृति के 'पदार्थ' की तरह नहीं, 'भावार्थ' की तरह ग्रहण किया गया. पर ध्वनि ने रस को भाषा के व्यंग्यार्थ की तरह ग्राह्य बनाने
में मदद की.
इस नुक्ते निगाह से देखने पर हम न सिर्फ ध्वनि के एक बेजोड़ सिद्धांत होने की बात को समझ पाते हैं, यह भी देख पाते हैं कि 'वाक्यपदीयम्' का असर हमारे साहित्य-चिंतन पर कितने व्यापक रूप में दर्ज होता है.
'वाक्यपदीयम्' वाक्य को ही एक पद के रूप में देखने-समझने में हमारी मदद नहीं करता, वह साहित्य-चिंतन में वाक्य-क्रम से बनने वाले प्रबंध को भी विवेचनीय बना
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देता है.
साहित्य-चिंतन में 'प्रबंध' की अहमि को व्यावहारिक रूप में तो जरूर पहचा मिली, लेकिन उसकी भाषा- दार्शनि सैद्धांतिकी का विकास अभी तक मुल्त पड़ा है.
इससे बड़ा नुकसान हुआ. नुकसान हुआ है कि भाषा के कुदरती नित्यार्थ जिस गहरे स्तर को व्यावहारिक बनाये रख के हालात पैदा हो सके, उनका परव साहित्य-चिंतन में लोप हो गया. भाषा-दर्शन का लगभग पूरा दारोमदार ऐसे शब्दार्थ प निर्भर हो गया, जिसे हमारे यहां विकारी परिवर्तनशील कहा जाता था. अगर आ शब्द की गहराई में मौजूद उसके कुदर नित्यार्थ से मुंह मोड़ लेते हो, तो आप हाथ शब्द के विकारी या अनित्यायों लंबा सिलसिला ही लगेगा. तब भाषा समझने के हालात कुछ-कुछ वैसे ही जायेंगे, जैसे नागार्जुन के बाद के विपुन 'अपोहवादी' चिंतन में दिखाई देते हैं.
ऐसे अनित्यार्थों के लिए हमारे पास जो उत्तराधुनिक शब्द है, वह है यादृच्छिक 'आविंद्रेरी' इससे शब्द से लेकर समग्र कृति-पाठ तक के अर्थ 'विखंडनीय' जाते हैं. इससे आप वर्चस्वी अर्थ को हटाकर उसकी जगह गौण अर्थ को लाकर बिठान लगते हैं. नतीजतन साहित्य-चिंतन में कृतियाँ की विविध दृष्टिकोणों से व्याख्या का रास्ता खुल जाता है. पर आप कभी भी उस अ तक नहीं पहुंच पाते, जो कृति के 'कुदरती अर्थ को उदघाटित करने में हमारी मदद कर सकता है.
तथापि अनित्यार्थ-मूलक व्याख्याओं को
आधार बनाने से उत्तराधुनिक साहित्य-चिंतन का क्षेत्र विस्तार, अभूतपूर्व रूप में अवश्य
हुआ है..
इसके पीछे सस्यूर के विवेचन की भूमिका का बड़ा हाथ है. परिणाम स्वरूप उत्तराधुनिक साहित्य-चिंतन में साहित्य की अर्थ-मीमांसा अचानक केंद्र में आ जाती है. देरिदा इस
लिहाज से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं..
देरिदा का भाषा-चिंतन, भर्तृहरि और नागार्जुन से प्रभावित प्रतीत होता है. इस बात को अनेक पश्चिमी विद्वानों ने कुबूल किया है. पर वे इस बात को रेखांकित करने से चूक जाते हैं कि भर्तृहरि के नित्यार्थ विवेचन से कन्नी काट लेने की
वजह से, देरिदा कितने एकांगी हो गये हैं. इसलिए हम यह कह सकते हैं कि देरिदा भर्तृहरि के बजाये, नागार्जुन और धर्मकीर्ति जैसे बौद्ध दार्शनिकों के अधिक निकट हैं. भर्तृहरि के भाषा-चिंतन की संभावनाएं अधिक मौजूं हैं. परंतु उस ओर अधिकांश चिंतकों का विशेष ध्यान नहीं गया है.
इस संदर्भ में पुनर्विचार की शुरुआत इस सवाल से की जा सकती है कि मौजूदा दौर के लिए भर्तृहरि किस लिहाज से प्रासंगिक हैं?
चार
ऊपर स्पष्ट किया गया है कि भर्तृहरि ने एक ऐसे भाषा दर्शन को विकसित किया, जो भाषा की मीमांसा के अगले चरण जैसा मालूम पड़ता है. मीमांसा दर्शन शब्दार्थ के बोध के लिए क्रिया-पदों पर ध्यान देने की बात कहता है. क्रिया, शब्द के अभिप्रेत अर्थ को अपने 'कर्म' की तरह हमारे बोध का विषय बनाती है. इस तरह 'शब्द-बोध' शब्द और क्रिया को आपस में जोड़ने वाले कारक पर आश्रित हो जाता है. यहां से आगे हम भर्तृहरि तक पहुंचते हैं, तो हम इस सवाल के रूबरू खड़े होते हैं कि असली कारक क्या है?
भर्तृहरि विवर्त की मदद से इस नतीजे तक पहुंचते हैं कि असली कारक ब्रह्म है, उनकी इस धारणा का आधार है मीमांसकों का 'कारक सिद्धांत' इसे निम्न रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है.
मीमांसक, शब्द को नित्य मानते हैं. पर शब्द को क्रिया-कर्म सापेक्ष मानने की वजह
से उनका शब्द-विचार, दूसरों से थोड़ा अलग हो जाता है. वे शब्दबोध' को
'वाक्यार्थ- बोध' की तरह ग्रहण करते हैं. वे मानते हैं कि अर्थ-ग्रहण के लिए वाक्य में 'कारकान्वित क्रिया होनी चाहिए यानी वह क्रिया, जो पहले कारक से अन्वित होती है, फिर उसके जरिये वह वाक्य के अन्य शब्दों से अन्वित होकर अर्थोद्घाटक हो जाती है.
इस तरह 'कारकान्वेति' के दो रूप हो जाते हैं. अभिहितान्वय और अन्विताभिधान,
1. अभिहितान्वय के तहत शब्द आकांक्षा, योग्यता और आसक्ति के गुणों की मदद से लक्षणा के द्वारा अर्थ का बोध कराते हैं.
न्यायमत भी कारकान्येति की अहमियत की तो स्वीकार करता है, पर अर्थ-ग्रहण को भावन पर आधारित मानता है... भावनैव हि वाक्यार्थः सर्वत्राख्यातवत्तया अनेक गुण जात्यादि कारकार्यानुराजिता भावन, तात्पर्यार्थ है, तात्पर्य को लक्षणा का बीज माना जाता है. तात्पर्य भी दो प्रकार के माने गए हैं-
"अवांतर - तात्पर्य, पदार्थ का और महा-तात्पर्य, वाक्यार्थ का प्रतिपादन करता है."
2. अन्विताभिधान में अन्वितार्थ का बोधन, शब्द की शक्ति या वृत्ति से होता है. यानी पद-शक्ति से ही पदार्थ और वाक्यार्थ दोनों का बोध हो जाता है. इस मत के मुताबिक वेद में पद ही वाक्य होते हैं. इससे शब्द और अर्थ का सम्बन्ध नित्य हो जाता है. अभिघात द्वारा नित्य रूप से उपस्थित शब्द अभिव्यक्त होता है.
इस तरह हम भारतीय भाषा दर्शन की परंपरा को दो स्पष्ट शिविरों में विभाजित होता पाते हैं. अभिहितान्वयवादी एक तरफ हैं, तो अन्वितिभिधानवादी दूसरी तरफ
पहले खेमे में वे चिंतक हैं, जो शब्दार्थ को अनित्य मानते हैं और दूसरे में उसे नित्य मानने वाले हैं.
पहले खेमे में आते हैं- न्यायवैशेषिक, सांख्य, योग, जैन तथा बौद्ध दर्शन इनके
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अनुसार शब्द की उत्पत्ति होती है.
दूसरे खेमे में मीमांसक, वैयाकरण तथा कश्मीर शैवदर्शन को रखा जा सकता है. इनके अनुसार शब्द अपने मूल स्वरूप में अथवा मूलतत्व के रूप में नित्य है,
इस आधार पर शब्द-बोध भी दो तरह का हो जाता है.
कुमारिल भट्ट ( सातवीं शती), शब्द में 'भाव' को अर्थ रूप में स्थित पाते हैं. उन्हें हम नित्यतावादी कह सकते हैं.
जबकि प्रभाकर (सातवीं-आठवीं शती) अनित्यतावादियों की तर्ज पर शब्द में कारकान्वित क्रिया के 'कार्य' को प्रधान मानते हैं.
इस तरह हम देख सकते हैं कि शब्दार्थ की नित्यता और अनित्यता संबंधी भाषा-चिंतन, भारतीय भाषा दर्शन का सर्वाधिक जरूरी पक्ष है, इतना जरूरी कि वह भाषा के लगभग सभी अन्य पक्षों की व्याख्या और समझ का आधार बन गया है.
शब्दार्थ की नित्यता के संबंध में इस बात को रेखांकित करना भी जरूरी है कि नित्यता का संबंध शब्द के ध्वनि और अर्थ, दोनों पक्षों से है.
ध्वनि पक्ष गहराकर वाक् के गहन स्तरों के दर्शन में बदल जाता है, और वही व्यापक होकर जब लोक व्यवहार में उतरता है, शब्द का 'वाचक पक्ष' बन जाता है.
नित्यतावादी वैयाकरण जिसे 'प्राकृत ध्वनि' या 'सृष्टि में व्याप्त नाद' कहते हैं, तार्किक उसे ही 'वाचक शब्द' मानते हैं.
इसी प्रकार शब्द का वह जो अर्थ पक्ष है, वह गहराई में 'नाद से स्फुटित अर्थ' का रूप ले लेता है. तार्किक उसे ही भौतिक जगत में, शब्द के द्वारा संकेतित' विविध पदार्थों की तरह देखते हैं.
वैयाकरणों के भाषा दर्शन में, शब्द के मुख्यतः दो भेद माने गये हैं- उपादान और अनुपादान. जो शब्द वस्तु विशेष का बोध कराते हैं, वे उपादान शब्द कहलाती हैं जिन शब्दों को वक्ता अर्थबोध के लिए ग्रहण
नहीं करता, वे अनुपादान शब्द होते हैं. ऐसे शब्द प्रायः मनुष्य की वाणी से सम्बद्ध नहीं होते. वे प्रकृति में अपने आप होने वाले शब्द होते हैं. परन्तु इन्हीं शब्दों को जब कोई श्रोता, अर्थ के बोध के लिए ग्रहण करता है, तो इसमें भी उपादानता आ जाती
ध्वनि को वैयाकरणों ने अनित्य माना है, किन्तु इसके नादात्मक और वाक् पक्ष को वे नित्य मानते हैं.
पांच
वैयाकरणों में भाषा दर्शन पर गहन विमर्श करने वालों में पाणिनी के बाद पहले
पतंजलि, फिर भर्तृहरि का योगदान विशेष महत्व रखता है.
तो पहले पतंजलि के 'महाभाष्य' की कुछ महत्वपूर्ण स्थापनाओं को देखते हैं.
जहां तक पतंजलि के भाषा-चिंतन का प्रश्न है, उन्होंने अपने 'महाभाष्य' में कहा है कि शब्दों में ध्वनि और स्फोट, दोनों मौजूद होते हैं. उनके मत में 'शब्द नित्य है' शब्द की भौतिक काया के रूप में प्रकट होने वाली ध्वनि अनित्य है, पर इस ध्वनि से जो अर्थ स्फुटित होता है, वह नित्य है,
जब वे कहते हैं कि 'सिद्धे शब्दार्थसंबंध तो उसका मतलब है शब्द, अर्थ उनका संबंध, तीनों नित्य हैं.
और
ध्वनि-समूह के द्वारा नित्य अर्थ व्यक्त होता है. इसकी वजह यह है कि वह पहले
से ही वक्ता या श्रोता की बुद्धि में अवस्थित रहता है.
पतंजलि स्पष्ट करते हैं कि जो वस्तुएं नित्य होती हैं, वे भले ही विशिष्ट स्थल में नष्ट होती दिखाई देती हैं, किन्तु उनकी सत्ता नष्ट नहीं होती. इस तरह शब्द नित्य है, अर्थ भी प्रवाह-नित्य है, एवं नित्य शब्द
और नित्य अर्थ का सम्बन्ध भी नित्य है. अब सवाल उठता है कि रूप के नष्ट होने पर भी सत्ता के नष्ट न होने का क्या मतलब है? इसे वे व्यक्ति और जाति के
उदाहरण से स्पष्ट करते हैं. वे कहते हैं कि जाति-परक अर्थ नित्य होते हैं, जबकि व्यक्ति-परक अनित्य इस तरह अर्थ, नित्य या अनित्य हो सकते हैं, पर शब्द और अर्थ का संबंध नित्य होता है. वजह यह है कि संबंध योग्यता-रूप होता है.
पतंजलि के सह- समांतर नैयायिकों ने भी जाति-व्यक्ति, गुण-गुणी, अवयवावयवी के संबंध को नित्य माना है. फर्क ये है कि नैयायिक इस संबंध को गुण मानते हैं, जबकि वैयाकरणों के अनुसार वह क्रिया है.
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यहां से आगे अब हम भर्तृहरि के 'वाक्यपदीयम्' की ओर आ सकते हैं.
भर्तृहरि के 'वाक्यपदीयम्' का प्रथम अध्याय 'ब्रह्मकांड' है, दूसरा 'वाक्यकांड' और तीसरा 'पदकांड' है. तीसरे काण्ड में अनेक दार्शनिक विषयों पर पुनर्विचार किया गया है, जाति, द्रव्य, काल आदि की चर्चा करते हुए भर्तृहरि इस निष्कर्ष तक पहुंचते हैं कि ये विविध मत, एक ही वस्तु के अलग-अलग आयामों को प्रकाशित करते हैं. इस प्रकार वे परंपरागत दर्शनों को अपने तरीके से एकीकृत करने का प्रयास करते हैं. इस संदर्भ में उनका मत है कि 'शब्द और अर्थ एक ही परम तत्व के दो भेद हैं जो पृथक नहीं रहते.' (2.31)
पाणिनी की तरह वे भी मानते हैं कि व्यवहार में भाषा के नित्य या अनित्य दोनों रूप प्रचलित रहते हैं. इस संदर्भ में लोग जिस प्रकार व्यवहार करते हों, उसी तरह सभी को करना चाहिए. (2.143 ).
भर्तृहरि के वाक्यपदीयम्' को भाषा दर्शन के अद्वैत सिद्धान्त का प्रतिपादन माना जा सकता है. कुछ विद्वानों ने भर्तृहरि को 'शब्दब्रह्मवाद' का जनक माना है. मण्डनमिश्र के 'ब्रह्मासिद्धि' नामक ग्रन्थ तथा वाचस्पतिमिश्र की 'ब्रह्मतत्त्वसमीक्षा' नामक टीका भी इसी परंपरा के ग्रंथ माने जा सकते हैं. कुछ विद्वान उन्हें 'प्रच्छन्न बौद्ध' भी मानते हैं.
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पतंजलि की तरह भर्तृहरि भी शब्द दो पक्ष मानते हैं. उनमें से एक है उसक ध्वनि-पक्ष वह अनित्य है. पर वह व्यंज होने के कारण, नित्य- शब्दों का निमित्त जाता है. दूसरा है उसका स्फोट-पक्ष. शब्द के नित्यार्थ का ग्राहक होता है.
अपने मत को स्पष्ट करने के ि भर्तृहरि 'दीप प्रभा' का दृष्टांत देते हैं. जि प्रकार दूरस्थ दीप की प्रभा ही दिखाई दे है, दीप नहीं, उसी प्रकार ध्वनि के प स्फोटार्य मौजूद रहता है. पर वह श्रुति-गोच नहीं हो पाता.
पतंजलि ने शब्द को नित्य और क दो प्रकार का कहा है. परन्तु इन दोनों स्वरूप और परस्पर संबंध की समुति व्याख्या नहीं की. भर्तृहरि इस संदर्भ खाली छूट गयी जगहों को भरने की कोि करते हैं. इसके लिए वे 'शब्द विवर्त को ले आते हैं. इसी को उनके टीकाक 'शब्दाद्वैतवाद' कहा है.
ने
इस मतानुसार 'शब्द-तत्व से ही अर्थ और नाम-रूप जगत् भासमान है. यह सब विश्व का विस्तार शब्द का परिणाम है' 'विवर्त' और 'परिणाम' शब्दों को भर्तृहरि ने लगभग समान अ ग्रहण किया है. 'विवर्त' का अर्थ आ है, तो 'परिणाम' का अर्थ है विकार परिवर्तन शक्ति को रजत समझना, आम है, जबकि सोने से आभूषण का ब परिणाम है.
भर्तृहरि अद्वैत मत तथा विवर्तवाद मानने वाले थे. जिस शब्द से यह जगत् उत्पन्न हुआ है, वह शब्द तत्व ब्रह्म है. सारा विश्व शब्दतत्व का ही दि है. ( प्रथम कांड 118 से 131 )
भर्तृहरि ने न्याय दर्शन की तर्ज प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द, ये तीन प्र माने हैं. प्रत्यक्ष प्रमाण से स्थूल वर्तमानस्थ पदार्थ का ज्ञान होता है. अन से सुक्षम का और आप्तों के शब्द से आ विषयों का ज्ञान होता है.
घटपटादि
वस्तुएं
वास्तव
रूप में
एक पद की तरह, अपने पदार्थ को निर्विकल्प है ही नहीं. इसी तरह सभी तरह के ज्ञान
रूप में आलोकित करने लगता है.
पाणिनी के विवेचन में हमें शब्द के स्वरूप के बारे में सामान्य उल्लेख भर मिलता है. उनके वार्तिकाकार कात्यायन इससे कुछ खास अलग नहीं. महाभाष्य लिखकर पतंजलि ने
का संबंध शब्द से है.
भर्तृहरि के इस मत पर योगसूत्रकार पतंजलि का असर दिखाई देता है, वे शब्द, अर्थ और ज्ञान इन तीनों का इतरेतर अध्यास-रूप तादात्म्य बताते हैं ( योग दर्शन).
ध्वनि से अर्थ का स्फोट कैसे होता है, है. इसी तरह 'असत्य के मार्ग के द्वारा ही शक्ति है. घट पट आदि पदार्थों का वही इसे समझाने के लिए कई दृष्टांत और मत सत्य की प्राप्ति होती है' तब 'ज्ञान' अधिष्ठान है. वह वस्तु की शक्ति नहीं है. भी हमारे सामने आते हैं. एक मत के स्व-प्रकाश हो जाता है, इस तरह वाक्य, दरअसल अनुसार ध्वनि नष्ट हो जाती है, पर स्फोट भीतर मौजूद स्मृति अथवा संस्कारगत अर्थ को उदघाटित कर देता है. इस तरह ध्वनि से स्फोट के स्वरूप का ज्ञान संसर्ग के आधार पर होता है. एक अन्य मत यह है कि 'दूरत्व' दोष के कारण स्फोट के स्वरूप का ज्ञान नहीं होता, केवल ध्वनि का ही भान होता है.. तीसरा मत है कि स्फोट का भान तो होता है, परंतु दूरत्व दोष के कारण अस्फुट वाक्य पद और पदार्थ के संबंध पर रहता है. एक तरह की बहस छिड़ गयी. भर्तृहरि ने विस्तारपूर्वक विचार किया है. जगत के सभी पदार्थ, शब्द या ब्रह्म के ध्वनिरूप शब्द उत्पन्न होता है, अतः उसे इस संदर्भ में वे जाति, द्रव्य, संख्या, गुण, विवर्त्त या परिणाम होते हैं. शब्द की ध्वनि अनित्य मानना पड़ेगा. पर उस ध्वनि-रूप क्रिया, साधन इत्यादि चीदह उप-प्रकरणों में से क्रमशः स्फोट तक पहुंचते हुए हम इसे शब्द से अभिव्यक्त जो अर्थबोधक शब्द है, जान सकते हैं. उसे नित्य माना जा सकता है. वह वक्ता
की
स्थिति भी
पर
उनपर
शब्द, अर्थ और उन दोनों के संबंध, तीनों
की नित्यता को विवेचनीय बना दिया.
'नित्याः शब्दार्थसंबंधाः' इससे
ज्ञान
भर्तृहरि शब्द और को स्वीकार करते हैं. पर उसे
के
तादात्म्य
वे शब्द-ब्रह्म के रूप में ही व्यक्त होता देखते हैं.
अपने विवेचन को प्रस्तुत करते हैं. भर्तृहरि के भाषा दर्शन का उपर्युक्त
इस स्फोट को पदार्थ के अणु-गत रूप और श्रोता दोनों की बुद्धि में पहले से ही किचन इस बात को स्पष्ट करने के लिए को उदघाटित करने की प्रक्रिया की तरह होता है. इस प्रकार वक्ता श्रोता के बुद्धिस्थ पर्याप्त है कि उसका शब्दाद्वैतवाद जहां शब्दों की प्रवाह नित्यता' सिद्ध होती है..
भी समझा जा सकता है, परस्पर-भेद और संसर्ग (वियोग तथा संयोग) की वजह से
अणुओं से संसार के सभी कार्य होते हैं. ये
उसकी मौलिकता पर मोहर लगता है, वहां प्रवाह - नित्यता की इस धारणा को हम वही उसकी सबसे बड़ी सीमा भी हैं.
भर्तृहरि की मौलिक देन की तरह स्वीकार अद्वैतवाद, अपने से पहले के आरण्यक दौर अणु शब्द के रूप में परिणत होते रहते हैं. कर सकते हैं. उनके मुताबिक अर्थबोधक की विविधताओं और बहुलताओं को समेट शब्द प्रवाह-मूलक होने की वजह से, अनादि कर जहां उन्हें बोधगम्य बनता है, वहां वह होता है और भाव-रूप होने से नित्य होता उनका अपने में विलय करके, उनका सरलीकरण भी करता है.
है शब्द की अनादिता और प्रवाह-नित्यता, दोनों का भर्तृहरि ने समर्थन किया है..
जिस प्रकार जल के परमाणुओं से बादल बनते हैं, उसी प्रकार शब्द के परमाणु विविध पदार्थों में प्रकट होकर सभी कार्य करते हैं. दूसरे कांड में 'वाक्य' के पद या अर्थ गत वैदिक भाषा दर्शन में अपने से पहले इकाई होने की संभावना पर विचार किया ध्वनि रूप शब्द से अभिव्यक्त होने के आरण्यक काल की विविधताओं की गया है. तथापि इस संदर्भ में भर्तृहरि ने वाला अर्थ, मानस रूप में नित्यताबोधक गूंज दिखाई देती है. आज हम जिस नए अपना जो मत व्यक्त किया है वह शब्दार्थ है. बुद्धिस्थ शब्द, संसार में स्थित होने से, दौर में प्रवेश कर रहे हैं, उसमें एक दफा फिर से पूरा भाषा परिदृश्य विविध बहुल संभावनाओं वाला होता जा रहा है. ऐसे में जरूरी हो गया है कि हम पतंजलि और भर्तृहरि का अपने समय की जरूरतों के मुताबिक पुनर्पाठ करें. तथापि यहां यह कहना भी जरूरी लगता है कि ऐसा पुनर्पाठ
पर ही आधारित लगता है. यह भी कह सार्वजनिक होता है. उन दोनों का संबंध सकते हैं कि भर्तृहरि का वाक्य संबंधी अभिव्यंजक और अभिव्यंग्य का है. विवेचन, उनके शब्दार्थ मूलक मत का ही अभिव्यंग्य अर्थबोध के लिए 'स्फोट' मददगार विस्तार मात्र है. इस संदर्भ में वे कहते हैं होता है, वह पहले से मौजूद पदार्थों को कि वाक्य के घटक तत्वों के रूप में दिखाई प्रकाशित या अभिव्यक्त ही करता है. उन्हें देने वाले 'शब्द और अर्थ, एक ही परम तत्व के दो भेद हैं जो पृथक् नहीं रहते (2.31 ). अविद्या के नष्ट होने पर आगम के विकल्पों से भ्रम पैदा नहीं होता. तब शास्त्र, प्रपंच शून्य होने पर, 'विद्या' के रूप में प्रकट हो जाते
उत्पन्न नहीं करता.
भर्तृहरि के मुताबिक शब्द-शक्तियां दो संभव ही इसलिए है, क्योंकि हमारे इन बड़े प्रकार की होती हैं स्वयं प्रकाश और भाषा दार्शनिकों ने इसके लिए पुख्ता जमीन अन्य प्रकाश स्वयं-प्रकाश रूप शब्द-शक्ति तैयार कर दी है.. का स्रोत ब्रह्म है, वह शब्द की आंतरिक
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सम्पर्क : 9814658098
कला
धूसर संवेदनाओं की संरचना
समकालीन भारतीय अमूर्त कला के 'परिदृश्य में निर्मला सिंह की उपस्थिति एक विशिष्ट दृश्य वाक्य रचती है, जो रंग, सतह और मौन के अंतसंबंधों के माध्यम
से अर्थ का निर्माण करती है. उनकी कृतियाँ
किसी दृश्य यथार्थ का पुनरुत्पादन नहीं करतीं, बल्कि अनुभव की उन परतों को उद्घाटित करती हैं जो सामान्यतः भाषा और आकृति की पकड़ से बाहर रह जाती हैं. यह अमूर्तता पलायन नहीं, बल्कि दृश्य-व्याकरण का पुनर्संयोजन है- एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें रंग स्वयं कथ्य बन जाता है। और सतह एक वैचारिक भूगोल में रूपांतरित हो जाती है.
निर्मला सिंह का रंग-संसार सीमित होते हुए भी अत्यंत सघन है. धूसर, ब्राउन और गाढ़े लगभग अवसादग्रस्त रंग- खंड उनकी पॉर्टग्स में दृश्य तत्व नहीं, मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक संकेतक की तरह मौजूद हैं. धूसर उनके यहाँ रिक्तता का नहीं, बल्कि समय की थरथराती उपस्थिति का रंग है. यह स्मृति, क्षरण और अव्यक्त संवेदनाओं का वह मध्य क्षेत्र है, जहाँ प्रकाश और अंधकार एक-दूसरे को निरस्त करने की अपेक्षा सह-अस्तित्व की जटिलता रचते हैं. ब्राउन टोन मिट्टी, देह और भू-आकृतिक स्मृतियों की ओर संकेत करते हैं, वे किसी
भालचन्द्र जोशी
ग्रामीण वा शहरी भूगोल की प्रत्यक्ष व्याख्या नहीं करते. एक अंतः स्थित भू-स्मृति को सक्रिय करते हैं.
की दृश्य घनत्व निर्मित करती है. इन की सघनता में एक आंतरिक तनाव । जैसे कोई अनुभव सतह पर धीमी यात्रा
गाढ़े रंगों की उनकी संरचना एक प्रकार शुरुआत कर रहा हो. अपने भीतर अन्
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स्तरों से गुजर रहा हो. यह तनाव दर्शक को आकृति की खोज से हटाकर अनुभव की तीव्रता की ओर ले जाता है. यहाँ चित्र का अर्थ किसी पहचानी जाने वाली वस्तु में नहीं, बल्कि रंगों की पारस्परिक संघर्ष, उनके बीच के अंतराल और सतह पर निर्मित बनावट में निहित है.
निर्मला सिंह की कृतियों में टेक्सचर
का विशेष महत्व है. सतह पर खुरदुरापन,
परतों का जमाव और कहीं-कहीं रंग का जानबूझकर अधूरा छोड़ा जाना एक ऐसी दृश्य-राजनीति की ओर संकेत करता है जो पूर्णता के मिथक को अस्वीकार करती है. यह अधूरापन दरअसल अनुभव की प्रामाणिकता है. उनकी पेंटिंग्स किसी अंतिम कथन का दावा नहीं करतीय वे प्रक्रिया में रहने की स्वीकृति हैं.
स्पेस का उनका उपयोग भी उल्लेखनीय है. रिक्त स्थान उनके यहाँ निष्क्रिय नहीं, बल्कि सक्रिय ऊर्जा क्षेत्र की तरह काम करता है. रंग खंडों के बीच छोड़ा गया मौन दृश्य लय को संतुलित करता है और दर्शक को ठहरने का अवकाश देता है. यह ठहराव ही वह क्षण है जहाँ चित्र और दर्शक के बीच संवाद संभव होता है. निर्मला सिंह की कृतियाँ 'निगेटिव स्पेस' को अर्थ-निर्माण की केंद्रीय इकाई में रूपांतरित करती हैं. वे एक्स्ट्रेक्ट निजी अनुभव और सांस्कृतिक अंतर्ध्वनियों के संलयन से निर्मित होता है. वे रंग को प्रतीक में सीमित नहीं करतीं, उसे एक संवेदनात्मक घटना के रूप में बरतती हैं. यही कारण है कि उनकी पेंटिंग्स
को देखने का अनुभव रैखिक नहीं, बल्कि परतदार है. दर्शक पहली दृष्टि में जो देखता है, वही अंतिम अर्थ नहीं होता, रंगों की
परतें धीरे-धीरे खुलती हैं और अनुभव समय केवल सौंदर्य-बोध का प्रश्न नहीं, बल्कि के साथ गहराता है.
समकालीन संदर्भ में, जहाँ दृश्य-संस्कृति तीव्र, चमकीली और त्वरित उपभोग की ओर उन्मुख है, निर्मला सिंह का यह धूसर और गाढ़ा रंग-लोक एक प्रतिरोध की तरह उभरता है. वे चकाचौंध से दूर, अंतर्मुखी और धीमी संवेदनात्मक गति का प्रस्ताव रखती हैं. उनकी कृतियाँ दर्शक से सक्रिय भागीदारी की अपेक्षा करती हैं. वे अर्थ को थोपती नहीं, बल्कि उसे निर्मित होने की प्रक्रिया में छोड़ देती हैं.
इस प्रकार, निर्मला सिंह की अमूर्त कला
अनुभव की संरचना को समझने का एक माध्यम है. उनके रंगों की मितव्ययिता दरअसल अर्थ की व्यापकता को संभव बनाती है. धूसर और ब्राउन के भीतर छिपी असंख्य छायाएँ हमें यह स्मरण कराती हैं कि दृश्य संसार केवल उजाले से निर्मित नहीं होताय उसकी गहराई उन अँधेरे, सघन और अनिश्चित क्षेत्रों से भी बनती है, जिन्हें हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं.
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सम्पर्क: मो. 8989432087
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समीक्षा
पल्प- साहित्य का सांस्कृतिक विश्लेषण
राजाराम भादू
ल्प साहित्य की दुनिया बहुत मोहक और रोमांचक रही है. हिन्दी में भी यह वैविध्यपूर्ण और समृद्ध हुआ करती थी. जहां तक मेरा खयाल है, मैनेजर पाण्डे ने अपनी साहित्य का समाजशास्त्र पुस्तक के अंतिम अध्याय में लोकप्रिय साहित्य के रूप में इसका विश्लेषण किया है, जो इस विषय पर पहली किताब मानी जाती हैं. बताया जाता है कि कई विश्वविद्यालयों में लोकप्रिय साहित्य को साहित्य-अध्ययन के अन्तर्गत शामिल किया गया है. लेकिन उनके द्वारा प्रयुक्त पूरक पुस्तकों का पता नहीं चलता. वर्षों पहले हंस ने गीतम सान्याल के अतिथि संपादन में अपराध कथाओं पर एक विशेषांक निकाला था जिसमें कई गंभीर लेख थे. हंस के ही किसी अंक में मैंने कुशवाहा कान्त के उपन्यास 'लाल रेखा' पर लेख पढ़ा था, अब उसका लेखक याद नहीं आ रहा. फेसबुक पर यदा-कदा पाकेट उपन्यासों के पुरातन दौर पर टिप्पणियाँ देखने को मिल जाती हैं. ऐसी ही एक टिप्पणी में एक्टिविस्ट कवि कात्यायनी ने पल्प साहित्य पर अपना नजरिया प्रस्तुत किया था. यह मेरे लिए चकित करने वाली बात थी कि वह भी इस पथ से गुजरकर ही विचार और गंभीर साहित्य की दुनिया में आयी हैं. ऐसे मेरे जैसे और अनेक लोग हैं जिनकी स्मृतियों में पल्प उपन्यासों और उनके लेखकों की छायाएं हैं और नोस्टेल्जिया से प्रेरित वे लोग कभी-कभार अपनी यादों को साझा करते रहते हैं. लेकिन पल्प साहित्य को समग्रतः विश्लेषित करने वाला कोई
बुक्स
व्यवस्थित उपक्रम नहीं दिखता था. यशवंत व्यास ने ऐसा काम कर डाला है- बेगमपुल से दरियागंज : देसी पल्प की दिलचस्प दास्तान - पल्प साहित्य पर एक
बेगमपुल दरियागंज
पुस्तक बेगमपुल से
दरियागंज : देसी
पल्प की दिलचस्प
दास्तान
में उन्होंने प्रबंधन - साहित्य के विराट बुलबुले का भी निर्मम आकलन किया है, पेंगुइन स्वदेश से आयी यशवन्त व्यास की उपरोक्त किताब वस्तुतः पल्प साहित्य पर एक
सांस्कृतिक अध्ययन
है.
इसे यशवन्त ने बड़े
अभिनव तरीके से
लेखक
लिखा
है,
अनुसंधान
के
यशवन्त व्यास प्रकाशक
को
तमाम तौर-तरीकों अपनाने के बावजूद उन्होंने आख्यान
की
शैली अख्तियार की है. इस
पेंगुइन स्वदेश
मुकम्मल किताब है. मूलतः व्यंग्यकार के रूप में पहचाने जाने वाले यशवंत व्यास की उतनी ही पुख्ता पहचान एक पत्रकार के रूप में है. लेकिन उनके लिखे उपन्यास भी कम दिलचस्प नहीं हैं. उन्हें केवल व्यंग्य के खाते में डालकर नहीं देखा जा सकता, उनके सिरे जीवन के कुछ ऐसे क्षेत्रों में खुलते हैं जो प्रायः अन उद्घाटित हैं अथवा उन्हें नयी दृष्टि से देखा गया है. हम अकसर समाजशास्त्र वगैरह विषयों में लगे लोगों को ही शोधकर्ता मानते रहे हैं. वास्तव में शोध एक दृष्टि और पद्धति है और उसे कोई भी लेखक अपना सकता है जिसमें कि इसे साधने की क्षमता हो. यशवंत में ऐसी अन्वेषी दृष्टि है जो उनके व्यंग्य ही नहीं बल्कि कथात्मक व गैर- कथा लेखन में भी प्रतिबिंबित होती है. बीसवीं सदी के अंतिम दशक में ढलान पर लुढ़कती हिन्दी पत्रकारिता पर तो उन्होंने बिड़ला फैलोशिप के अन्तर्गत बाकायदा शोध-लेखन किया था. उन्होंने अहा जिंदगी जैसी सम्पूर्ण एवं विलक्षण पत्रिका की परिकल्पना को साकार किया और उसे लोकप्रिय बनाया. धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान के पराभव के बाद यह असंभव लगता था. एक किताब 88 कथादेश मई 2026
नान-फिक्शन को आप फिक्शन की तरह पढ़ सकते हैं। जिसमें उन्होंने पल्प साहित्य के युग को जीवंत कर दिया है. साथ ही वे अपने मंतव्य को फोकस में रखकर विषय की गंभीरता को बनाये रखते हैं. संभवतः ऐसा उन्होंने अकादमिक जड़ता को तोड़ने और अधिक पाठकों तक पहुंचने के लिए किया हो, अपनी फलश्रुति में यह कलात्मक और उपादेय है. किताब के अंत में बाकायदा एक संदर्भ सूची दी गयी है. वे पल्प साहित्य का वैश्विक परिदृश्य प्रस्तुत करते हैं. दुनिया में पल्प की शुरुआत भी यूरोप में छापेखाने से शुरू हुई जिसे औद्योगिक क्रांति से जोड़ सकते हैं. मार्टिन लूथर का चर्च के विरुद्ध आन्दोलन छपे पचों के कारण संभव हुआ था. पल्प से पहले पैनी मैगजींस शुरू हुई थीं जो पहले कहानियाँ छापती थीं फिर इनमें उपन्यास छपने लगे. ये पत्रिकाएं पापुलर साहित्य की वाहक थीं जिसके पाठक नव- शिक्षित शहरी थे. एक नया पब्लिक स्फियर आकार ले रहा था. पुलिस और तदनंतर डिटेक्टिव एजेंसियों ने रहस्य और अपराध-कथाओं के लिए परिप्रेक्ष्य निर्मित किया. इन कथाओं
की लोकप्रियता का आलम यह था कि एक पात्र शरलाक होम्स अपने लेखक आर्थर कानन डायल से भी ज्यादा जाना जाता था.
कहा जाता है कि शरलोक होम्स की टक्कर में दूसरा सिर्फ एक ही कल्पित पात्र था, ब्रेम स्टोकर का ड्रेक्यूला. कुछ यही स्थिति अगाथा क्रिस्टी के जासूस चरित्रों की थी. यूरोप के साथ यशवंत रूस और अमेरिका मैं पल्प साहित्य के विकास का जायजा प्रस्तुत करते हैं. रूस में सोवियत सत्ता में प्रोपेगंडा साहित्य के चलते पल्प नहीं पनपा वह उस व्यवस्था के ढहने के बाद परवान चढ़ा. जबकि अमेरिका में यह इंग्लैंड से होड़ लेता रहा. वहाँ नयी तरह के उपन्यास आये जिनमें जेम्स एम कैन का लिखा द पोस्टमेन आलवेज रिंग्स ट्वाइस शामिल था, जिसे दो बार पढ़ने के बाद जेम्स हेडली चेज जैसा थ्रिलर लेखक वजूद में आया.
भारत में पल्प साहित्य के उद्भव और विकास को वे ऐतिहासिक चरणों में देखते हैं. वे इसके मेरठ के बेगम पुल से दिल्ली के दरियागंज में उतरने की पृष्ठभूमि में जाते हैं. इससे पहले बनारस और इलाहाबाद हिन्दी में ऐसे साहित्य के बड़े केन्द्र रह चुके
थे.
भारत में पेंगुइन की शैली में दीनानाथ मल्होत्रा ने हिन्द पाकेट बुक्स खड़ी की जो अंततः 2021 में पेंगुइन में ही विलीन हो गयी. यशवंत सिलसिलेवार देवकीनंदन खत्री के चन्द्रकान्ता से लेकर तीरथराम फिरोजपुरी गोपालराम गहमरी, किशोरीलाल गोस्वामी से चलकर इब्ने सफी तक पहुंचते हैं. इब्ने शफी के अनुवाद और पुनर्प्रकाशन की मुहिम की वे राजा रवि वर्मा के कलेंडर आर्टिस्ट से बड़े कलाकार के रूप में प्रतिष्ठा के लिए चले अभियान से तुलना करते हैं. वे गहमरी के चरित्र हंसराज और बंगला लेखक सारदेन्दु के व्योमकेश बख्शी में एक जगह अद्भुत साम्य ढूंढते हैं.
इस समूचे विश्लेषण से यह भी निकलकर आता है कि यह पापुलर ही पाठकीय संस्कार करके शास्त्रीय की ओर ले जाने की राह बनाता है. इस क्रम में यशवन्त चन्द्रकांता पर राजेन्द्र यादव और वागीश शुक्ल के काम के साथ संजय कृष्ण, गरिमा श्रीवास्तव, प्रभात रंजन, स्वाति मोइत्रा, यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र, राजकुमार केसवानी, एन के सिंह और पूनम सक्सेना जैसे हिन्दी व अंग्रेजी के अध्येताओं के अनुसंधान को संदर्भित करते हैं. इसी के
साथ किताब में बंगला, तमिल, तेलुगु, मलयालम आदि भारतीय भाषाओं में भी लोकप्रिय साहित्य की पड़ताल की है.
उन्होंने पल्प लेखकों के मानस में उतरने और उनके सोच व सृजन के तरीकों को पकड़ने का भरपूर प्रयास किया है और इसमें उन्हें उल्लेखनीय सफलता मिली है. डोंगरी टू दुबई लिखने वाले एस हुसैन जैदी मुंबई की जिंदगी से वाकिफ थे. लेकिन जेम्स हेडली चेंज ने नक्शों व डिक्शनरी की मदद से अमेरिकी पृष्ठभूमि पर अपना पहला थ्रिलर 'नो आर्किड फोर मिस ब्लेंडेश' लिख डाला था. चेज के एक उपन्यास का शीर्षक कहावत की तरह वरता जाने लगा- 'गिद्ध बहुत धैर्यवान पक्षी है." पल्प साहित्य में भड़कीले रंग, स्त्री-देह, मर्द की शक्ति, हिंसा और सेक्स के प्रतीक कवर पर एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते नजर आते हैं. इस दुनिया में अपराध ही नहीं, सामाजिक अंडरवर्ल्ड का प्रकटीकरण होता है. यशवंत ने विभिन्न अध्ययनों के आधार पर पल्प लेखक व पाठकों की मनो- सांस्कृतिकी का पक्ष विस्तार से प्रस्तुत किया है.
पल्प साहित्य का प्रिंट तकनीकी और प्रकाशन उद्यमों से अनिवार्य संबंध रहा है. यशवंत इस सहसंबंध को सम्पूर्णता में उजागर करते हैं. वे बताते हैं कि किस प्रकार पाकेट बुक आगे पेपरबैक में रूपान्तरित होता है और लोकप्रिय साहित्य के साथ क्लासिकों को भी व्यापक रूप में उपलब्ध करा देता है. अंग्रेजी में पेंगुइन बुक्स ने पेपरबैक की शुरुआत की जिसमें पल्प और क्लासिक दोनों प्रकार का साहित्य प्रकाशित होता था. इसलिए यह कहा जाने लगा कि हर पल्प, पेपरबैक हो सकता है पर हर पेपरबैक पल्प नहीं होता. इसके कुछ समय बाद ही राबर्ट द ग्राफ ने पाकेट बुक्स को बाजार में उतार दिया. पेपरबैक क्रांति सांस्कृतिक चेतना की वाहक बन गयी, इसने साहित्य का लोकतांत्रिकरण किया. पल्प साहित्य में भूत (घोस्ट-छद्म) लेखकों का चलन रहा है जिसमें प्रकाशकों के निहित स्वार्थ हैं. तथापि, कूड़ा शानदार कागज पर भी हो सकता है और शिल्प की मिसाल लुगदी में भी पैदा हो सकती है. इधर पल्प के पुनरोदय के प्रयास हो रहे हैं क्योंकि आनलाइन डेटा बताते हैं। कि अभी भी रोमांस, अपराध और
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रहस्य- सर्वाधिक बिकने वाली श्रेणियाँ हैं. जैसाकि किसी उपन्यास का शीर्षक है- पाप एक कुत्ता है जो घर तक तुम्हारा पीछा करता है.
पल्प- साहित्य की विशिष्ट संरचना और शैली पर यहाँ विस्तृत विवेचना की गयी है. यहाँ स्पष्ट कर देना जरूरी है कि यशवन्त कहीं पल्प का महिमामंडन नहीं करते बल्कि स्वयं पल्प लेखकों को अपने बारे में कोई भ्रम नहीं है. वेद प्रकाश काम्बोज इस संदर्भ में शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय का एक किस्सा सुनाते हैं और उनके हवाले से कहते हैं, रवीन्द्र बाबू हम जैसों के लिए लिखते हैं। और हम जैसे लोग उन्हें पढ़कर तुम जैसों के लिए. यशवंत स्पष्ट करते हैं कि वास्तविक लोक-साहित्य और आधुनिक समय का लोकप्रिय साहित्य दो भिन्न किस्म की चीजें हैं...पापुलर या लोकप्रिय साहित्य जनता से नहीं आता, यह उसे दिया जाता है. उपभोक्ताओं को हद से हद कुछ चयन की आजादी दी जा सकती है. लोक-कथाएं और लोक-संगीत सदियों से मानव मन में अंकुरित और पल्लवित होते रहे हैं. ये कुंजियां समूहों से समाजों में और समाजों से पीढियों में अपने सांस्कृतिक तत्वों के साथ आकार लेती रही हैं. एक तरह से ये सामूहिक स्मृतियों तथा सामूहिक निर्मितियों का सांस्कृतिक प्रतिफलन है. पापुलर लिटरेचर इनसे सुविधानुसार शक्ति ले लेता है. इसी तरह वे मनोरंजन और जीवन बदलने वाले अनुभव को भिन्न मानते हैं, हालांकि दोनों के बीच कई बार सीमाएँ टूट जाती हैं. पापुलर कल्चर की एक सामान्य परिभाषा यह हो सकती है वे कलात्मक वस्तुएँ जो वास्तविक कलात्मक मूल्यों से रहित हैं.
इस प्रोजेक्ट पर शोध के क्रम में यशवंत व्यास ने कई लोगों से लंबे साक्षात्कार किये, उनमें से कुछ यूट्यूब चैनल 'खटाक' पर उपलब्ध हैं. इन पोडकास्ट में वेदप्रकाश कांबोज, परशुराम शर्मा और सुरेन्द्र मोहन पाठक सहित आविद सुरती, फारूक अर्गली तथा योगेश मित्तल जैसी बारह शख्सियतें शामिल हैं. यह इस पुस्तक का मूल्यवान सह-उत्पाद है जो पब्लिक डोमेन में उपलब्ध है.
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परिदृश्य
श्रीधरम
( इस स्तम्भ का उद्देश्य साहित्यिक गतिविधियों घटनाओं को एक साझा मंच प्रदान करना है. कई बार छोटी जगहों में सार्थक कार्यक्रम होते हैं किसी महत्त्वपूर्ण लेखक का निधन हो जाता है, लेकिन उनकी खबर मुख्यधारा की पत्रकारिता में नहीं आ पाती. इसी प्रकार अंतरजाल पर भी कई बार महत्त्वपूर्ण जानकारी और मुद्दे उछलते हैं, बहसें होती हैं जिसकी सूचना प्रिंट माध्यम के पाठकों तक नहीं पहुँच पाती. अतः इस कॉलम को सामूहिक मंच बनाने में आपका सहयोग चाहिए. आप भी अपने शहर मोहल्ले में होने वाली साहित्यिक गतिविधियों (सम्भव हो तो मंगल फॉण्ट ओपन फाइल में) से हमें निम्न पते मेल पर अवगत करायें, हम साभार उसे शामिल करेंगे.)
सभा/ संगोष्ठी
किस्सा कहानी - 5 कहानी द्वारा समाज के सच्चे परिदृश्य के खींचे चित्र
नवीन कुमार नैथानी की कहानी 'पारस' का खुद लेखक ने किया
प्रभावशाली कयापाठ.
आगरा. "सुनैना की चीख सौरी
में सबसे पहले पुरना दाई ने सुनी थी. पुरना सुनती नहीं थी उन दिनों. शंकालुओं ने तर्क किया.
अरे!
जब तक देह है, तब तक
मन है." सौरी के होने पर अगाध
विश्वास
रखने वालों ने कहा, "इन्द्रियाँ देह का साथ छोड़ सकती हैं, मन का नहीं. पुरना दाई ने स्वप्न में प्रसव पीड़ा से कराहती सुनैना को देखा और पानी की धारा की तरफ दौड़ीं. पुरना के पीछे पूनो देवी थीं. सौरी के लोगों
ने
पूनो देवी से जाना कि पानी की
धारा के पास सुनैना ने एक कन्या को जन्म दिया...!" यह अंश था नवीन कुमार नैथानी की कहानी 'पारस' का, जिसका खुद उनके द्वारा ही प्रभावशाली ढंग से कथा पाठ किया गया.
किस्सा कहानी के अंक 5 में एक बार फिर साहित्य प्रेमियों ने कहानी का पाठ सुना, कहानी के घटनाक्रमों के साथ अपने भावों
से ताल मिलाते रहे, कहानी पाठ का सिलसिला जैसे-जैसे आगे बढ़ा,
श्रोताओं की उत्सुकता बढ़ती गई. रोचकता और रोमांच ने श्रोताओं को बांधे रखा. नागरी प्रचारिणी सभा के पुस्तकालय भवन में आगरा की सांस्कृतिक संस्था 'रंगलीला' और कहानी की पत्रिका 'कथादेश' द्वारा शुरू किया गया आयोजन
कार्यक्रम के उद्देश्यों पर संक्षिप्त प्रकाश डाला.
सफलतापूर्वक आगे बढ़ा. भारतीय में संयोजक अनिल शुक्ल कहानीकारों का कथा पाठ एवं चर्चा मंच किस्सा कहानी-5 एसिड हमलों की शिकार महिलाओं के संगठन शिरोज हैंगआउट का आयोजन था. आतिथ्य नागरी प्रचारिणी सभा का रहा. शुरुआत
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आलोचक प्रियम अंकित नवीन कुमार नैथानी के रचना संसार पर विचार व्यक्त कि उन्होंने कहा 'पारस' कहानी केवल
कहानी नहीं बल्कि लोकोक्तियों की कथा कहने की पुरानी परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है, ये समाज में स्त्री की उपेक्षा के सवाल को भी नए संदर्भों में उजागर करती
है.
मुख्य अतिथि प्रो. रामवीर सिंह ने कहा कि, "इस कहानी में एक कन्या की आकांक्षा का मतलब हमें साफ समझ में आ जाता है कि घर में एक कन्या के आने से एक रौनक आ जाती है, क्योंकि घर में कन्याओं के आगमन से विकास की आस पूरी होती है." "मुख्य वक्ता अरुण डंग ने कार्यक्रम का उल्लेख करते हुए कहा कि कहानी के साथ किस्सा को भी जोड़ना बहुत महत्त्वपूर्ण है,
किस्से परंपरागत रूप से लोगों द्वारा सुनाए जाते हैं और वे यूं आगे बढ़ते चले जाते हैं. साथ ही कहा कहानी बड़ी थी, मशविरा दिया
कि कार्यक्रम के लिए आगे से उस कहानी का चयन करना चाहिए. जो छोटी हो."
विशिष्ट
अतिथि हरविजय वाहिया ने कहा, "मैं जब कीनिया में स्टूडेंट था, तब मैंने पहली कहानी 1970 में लिखी थी. 1975 में पहला नाटक लिखा था, जिसको राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था. लिखना मेरा शौक है, करीब 100 कहानियों को मैंने लिखा है, इनको पुस्तक के रूप में प्रकाशित करूंगा.
शक्ति प्रकाश ने कहानी की समीक्षा करते हुए कहा, "कहानी
में महिलाओं की महत्ता को व्यक्त किया गया है. इस कहानी में क्या हुआ से ज्यादा लोग क्या मानते हैं, पर ज्यादा केंद्रित है."
चर्चा में अमीर अहमद जाफरी, डीईआई के ब्रज राज सिंह, वरिष्ठ
कवियत्री
पत्रकार डॉ. सुरेंद्र सिंह, युवा वंदना तिवारी आदि ने हिस्सा लिया. मंचासीन कार्यक्रम अध्यक्ष हरि नारायण, विशिष्ट अतिथियों नवीन कुमार नैथानी, प्रो. रामवीर सिंह, हर विजय सिंह वाहिया का स्वागत शक्ति प्रकाश, रामभरत उपाध्याय, अमीर अहमद एडवोकेट, डॉ. महेश धाकड़ ने किया. इस कार्यक्रम का प्रभावशाली संचालन प्रो. नसरीन वेगम ने किया. कथाकार अर्जुन
सावेदिया ने धन्यवाद दिया. कार्यक्रम में नीरज जैन, संजय गुप्त, राजीव सिंघल, शलभ भारती, डॉ. ज्योति खंडेलवाल, अभिनय प्रसाद, राजीव सिंह, संदीप अरोरा, रिमझिम सचदेवा, मन्नू शर्मा, अर्निका माहेश्वरी, दीपाली सिंह, नीलम भटनागर, डॉ. मधु भारद्वाज, मनमोहन भारद्वाज, डॉ. गिरजा शंकर शर्मा, गति सिंह, अक्षय प्रताप सिंह, विशाल झा, जितेंद्र दीक्षित, शंकर देव तिवारी, बृजेन्द्र सक्सेना, अमरजीत सिंह, ओम ठाकुर, नरेश तन्हा, ऋचा निगम, सरिता शर्मा, नरेश पारस, मनीषा शुक्ला, कुमार अक्षत श्रोत्रिय, हिना, मोहम्मद आरिफ, अजय शर्मा आदि शामिल थे.
समकालीन हिंदी उपन्यास पर पूर्णिया में राष्ट्रीय संगोष्ठी
साहित्य विभाग कला भवन एवं साहित्याकाश, ग्रीनहाऊस रामबाग पूर्णिया के संयुक्त तत्वाधान में 21 मार्च, 2026 को कला भवन में समकालीन हिन्दी उपन्यास पर
आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न हुई. इस दौरान पूर्णिया की माटी के कहानीकार दीर्घ नारायण द्वारा
रियल स्टेट की काली दुनिया पर लिखे गए उपन्यास 'अधभूतल 96 पर आलोचकीय विमर्श हुआ. यह उपन्यास वर्ष 2025 में प्रलेक प्रकाशन नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ है. प्रख्यात साहित्यकार शिवमूर्ति एवं डॉ. रजनी गुप्त मुख्य वक्ता थे तथा पूर्णिया निवासी वरिष्ठ साहित्यकार चंद्र किशोर जायसवाल ने गोष्ठी की अध्यक्षता की और बिहार के कई नामचीन आलोचकों ने विशिष्ट वक्तव्य प्रस्तुत किए.
समकालीन हिन्दी उपन्यास की समालोचना के दृष्टिकोण से रियल एस्टेट की काली दुनिया की परत दर परत पड़ताल करने वाले इस उपन्यास पर यह एक महत्वपूर्ण संगोष्ठी थी. शिवमूर्ति ने अपने वक्तव्य में कहा कि पूर्णिया सच में साहित्य नगरी है और सतीनाथ भादुड़ी, अनूप लाल मंडल, फणीश्वर
समकालीन हिन्दी उपराष्ट्र
के
नाथ रेणु और चन्द्रकिशोर जायसवाल जैसे श्रेष्ठ रचनाकारों की भूमि है पूर्णिया और इसी परंपरा के लेखक हैं दीर्घ नारायण. उन्होंने कथावस्तु की दृष्टि से इसे एक अद्भुत उपन्यास बताया और कहा कि वह आम चलन से हटकर नए विषयों पर रचना करने की क्षमता है दीर्घ नारायण के अंदर रजनी
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गुप्त ने रियल स्टेट की काली परतों को उघाड़ने वाले इस कृति को एक सफल उपन्यास बताया. चंद्रकिशोर जायसवाल ने दीर्घ नारायण की लेखकीय शैली को अनूठा बताया. पंकज शर्मा ने दीर्घ नारायण की औपन्यासिक दृष्टि को अद्वितीय बताते हुए कहा कि उपन्यास के सातों अध्याय में
औपन्यासिक विजन की सतरंगी छटा दिखाई देती है. विनय कुमार चौधरी ने उपन्यास की संरचना को लेखकीय दृष्टि से सम्पन्न कहा. मांगन मिश्र मार्तण्ड मार्तंड (संपादक, संवदिया) ने इस उपन्यास को प्रेमचंद और रेणु की परंपरा का बताया. डॉ संजय कुमार सिंह ने कि इस उपन्यास में आम
जनों की छटपटाहट को जीवंत रूप में प्रस्तुत पाया. रामनरेश भक्त ने कहा कि इस उपन्यास में सन्निहित अंतर्वस्तु में आम निवेशकों की पीड़ा समाहित है. कहानीकार डॉ. निरुपमा राय ने
उपन्यास में पात्रों के चरित्र निर्माण को अद्भुत बताया. आलोचक वंदना भारती ने कहा कि दीर्घ नारायण ने उपन्यास में देश की भविष्य के लिए एक बड़ा संकेत छोड़ गये हैं. डॉ. शंभु कुशाग्र (अंग्रेजी विभाग, पूर्णिया विश्वविद्यालय) ने उपन्यास के कतिपय कमजोर पक्ष का उल्लेख किया. उपन्यासकार दीर्घ नारायण ने इस उपन्यास की रचना प्रक्रिया के बारे में बताया कि यह ग्राउंड जीरो पर लिखा गया उपन्यास है. अंत में डॉ के के चौधरी ने धन्यवाद ज्ञापित किया.
मुंबई में 'युद्ध के विरुद्ध' पर आयोजन
विभिन्न सामयिक मुद्दों पर अपनी सतत उपस्थिति दर्ज करने वाली मुंबई की संस्था 'बतरस' द्वारा केशव गोरे स्मारक सभागृह, गोरेगांव (पश्चिम) में विगत 11 अप्रैल 2026 को 'युद्ध के विरुद्ध' विषय पर एक गंभीर एवं विचारोत्तेजक साहित्यिक गोष्ठी का आयोजन किया गया. कार्यक्रम में साहित्य, संगीत और विमर्श के माध्यम से युद्ध की विभीषिका तथा शांति की आवश्यकता पर गहन चर्चा हुई.
इस विषय पर मुख्य वक्तव्य शैलेश सिंह द्वारा प्रस्तुत किया गया, जिसमें उन्होंने युद्ध के मानवीय, सामाजिक और सांस्कृतिक दुष्परिणामों पर प्रकाश डालते हुए
कहा कि आज विश्व को युद्ध नहीं, बल्कि संवाद, करुणा और बुद्धि की आवश्यकता है. कार्यक्रम का संचालन करते हुए रमन मिश्र ने 'युद्ध नहीं, कुछ चाहिए विषय पर अपने विचार रखे. इसके साथ ही विजय पण्डित ने विश्व साहित्य में बुद्ध और उसके विरोध में लिखे
साहित्य और कविता के माध्यम से इसकी भयावहता को रेखांकित किया. डॉ. मधुबाला शुक्ल ने हृदयेश मयंक की कविता 'युद्ध में शामिल नहीं थी चिड़िया का मार्मिक पाठ किया. नाटककार अभिराम भडकमकर और निर्झर ने जहाँ अपनी कविताओं से चिंता व्यक्त की वहीं पर प्रज्ञा मिश्रा ने 'हिमगिरि की रजत शिलाओं' की काव्य प्रस्तुति दी. डॉ. पूजा यादव ने कुरुक्षेत्र से चयनित अंशों का सशक्त पाठ प्रस्तुत किया. कार्यक्रम को गति देते हुए डॉ. सुशीला तिवारी ने मुक्तिबोध की कहानी 'क्लॉड इथरली' का भावपूर्ण वाचन किया, जिसमें युद्ध और मानव विवेक के प्रश्न को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ सामने रखा गया. रंगकर्मी प्रमोद सचान ने धर्मवीर भारती कृत अंधायुग से 'व्यास अश्वत्थामा संवाद और अभिनेत्री रागिनी कश्यप ने सुई पिरदिलो की विजय शर्मा द्वारा अनूदित कहानी 'युद्ध'
का प्रभावपूर्ण पाठ प्रस्तुत किया.
इस अवसर पर रास बिहारी पांडे द्वारा स्वरचित गीत की को श्रोताओं ने खूब सराहा. इसी क्रम में राकेश शर्मा ने अपनी गजल सुनाकर वातावरण को भावपूर्ण बना दिया. गायक दीपक खरे ने साहिर लुधियानवी के गीत से कार्यक्रम
को और अधिक मार्मिक बनाया. अंत में जे.एन.यू. के पूर्व आचार्य डॉ रामवक्स ने कहा कि ऐसे आयोजन शांति, मानवीय संवेदना तथा सहअस्तित्व की भावना को मजबूत करते हैं. डॉ सत्यदेव त्रिपाठी द्वारा धन्यवाद ज्ञापित किया. प्रस्तुति डॉ सुशीला तिवारी
'भभूल्या' नाटक को महाराष्ट्र का अभिनय पुरस्कार
महाराष्ट्र शासन, सांस्कृतिक कार्य संचालनालय मुंबई की ओर से आयोजित 64वीं हिंदी नाट प्रतियोगिता तीन फरवरी से प्रारंभ होकर 16 मार्च को संपन्न हुई. प्रतियोगिता में नागपुर, पुणे और मुंबई केंद्रों पर 58 नाटकों का मंचन हुआ, जिनमें लगभग तेरह सौ कलाकारों ने अपनी-अपनी भूमिका अदा की प्रतियोगिता का परिणाम घोषित कर दिया गया
है.
प्रसिद्ध लेखक एवं नाटककार रत्नकुमार सांभरिया लिखित एवं डॉ. असलम युनूस निर्देशित प्रसिद्ध नाटक 'भभूल्या' का मंचन वीस फरवरी को पुणे में हुआ था. जिसमें बकरा और हेडकांस्टेबल का चरित्र निभाने वाले अभिनेता विपुल भोले
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और रोहन गहिरे को श्रेष्ठ अभिनय के लिए गुणवत्ता प्रमाण-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया जाएगा. यह सम्मान उन्हें महाराष्ट्र सरकार की ओर से आयोजित राज्य स्तरीय समारोह में दिया जाएगा. उल्लेखनीय है कि हिंदी नाटका को बढ़ावा देने के लिए महाराष्ट्र राज्य की ओर से प्रतिवर्ष यह प्रतियोगिता आयोजित की जाती है. श्री सांभरिया लिखित 'ममूल्या नाटक का मंचन बागवान थिएट ग्रुप गेवराई, बीड की ओर किया गया था. निर्देशक ने बताय कि 'ममूल्या' जैसे उत्कृष्ट नाटक के सृजन के लिए बागवान वि ग्रुप की ओर से श्री सांभरिया संभाजी नगर में नाट्यदल की ओर से सम्मानित किया जाएगा
सम्मान / पुरस्कार
डॉ. अनूप कुमार बाली को नवल किशोर
स्मृति आलोचना सम्मान
का सुदीर्घ विश्लेषण करते हुए उनके आत्मसंघर्ष के व्यापक राजनीतिक निहितार्थों को खोलता है. उन्होंने कहा कि बाली का साफ अध्ययन और विश्लेषण मुक्तिबोध
को लेकर हिंदी में सबसे अधिक सचेत साहित्यकार थे. उनकी साहित्यिक डायरी में उनकी रचना से संबंधित आत्म प्रक्रिया के मोड़ पड़ाव और
इंद्र- तनाव
हैं. ज्ञान,
की पत्रिका बनास जन ने प्रसिद्ध बाली विषय में आंबेडकर दिल्ली. हिन्दी साहित्य और संस्कृति पीएचडी कर रहे डॉ अनूप कुमार दिखाई पड़ते हैं. बाली का विनिबंध के आत्मसंघर्ष को अधिक समग्रता आलोचक प्रो नवल किशोर की विश्वविद्यालय से साहित्यिक कला इनको स्मृति में आलोचना सम्मान की पर पहली पीएचडी कर चुके हैं. घोषणा कर दी है. बनास जन बाली का जन्म 4 अक्टूबर 1990 द्वारा जारी विज्ञप्ति में बताया गया को दिल्ली में हुआ था. दीनदयाल कि यह सम्मान इस वर्ष जामिया कालेज, दिल्ली से स्नातक तथा मिल्लिया इस्लामिया के युवा अम्बेडकर विश्वविद्यालय से
अध्येता डॉ अनूप कुमार बाली को स्नातकोत्तर के बाद उन्होंने इसी उनके विनिबंध 'एक रचनाकार के विश्वविद्यालय से पीएच. डी की
आत्मसंघर्षो का रचनात्मक उपाधि ग्रहण की.
दस्तावेज: एक साहित्यिक की
डायरी और रचना-प्रक्रिया का प्रश्न पर दिया जाएगा. सम्मान के लिए गठित निर्णायक समिति के सदस्यों डॉ.
मुक्तिबोध की डायरी पर उनके
विनिबंध पर अपनी संस्तुति में डॉ. सत्यनारायण व्यास ने कहा कि आधुनिक हिन्दी कविता के सबसे प्रमुख मुक्तिबोध की डायरी पर (चित्तौड़गढ़), प्रो. माधव हाड़ा बाली का अध्ययन इस दृष्टि से (उदयपुर) और डॉ. हिमांशु पंच्या महत्त्वपूर्ण है कि यह कवि की
सत्यनारायण
व्यास
(रानीवाड़ा) ने सर्वसम्मति से अनूप रचना प्रक्रिया को व्यापकता और कुमार बाली की पांडुलिपि का चयन किया. बनास जन द्वारा उक्त विनिबंध का स्वतंत्र अंक के रूप में प्रकाशन किया जाएगा तथा सम्मान राशि भी भेंट की जाएगी. सम्प्रति दिल्ली के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय जामिया मिल्लिया इस्लामिया से हिंदी साहित्य में
गहराई से विवेचित करता है. साथ ही रचना प्रक्रिया जैसे जटिल और गहन विषय पर भी युवा अध्येता का विश्लेषण उनके सामर्थ्य को उद्घाटित करता है कि आलोचना में उनकी रुचि कितनी गंभीर है. प्रो हाड़ा ने अपनी संस्तुति में कहा कि मुक्तिबोध अपनी रचना प्रक्रिया
समझने का सर्वथा नया से हमारे सामने लाते उपक्रम है. डॉ. हिमांशु पंडया ने विचारधारा और वर्चस्व के कहा कि अनूप वाली का आलेख अन्तर्सम्बन्धों का उनका विश्लेषण गजानन माधव मुक्तिबोध के निबंध विचारोत्तेजक और नई बहस का संग्रह 'एक साहित्यिक की डायरी' उत्प्रेरक है. विजय पण्डित को संगीत नाटक अकादमी सम्मान
नाटककार व पटकथा लेखक विजय पण्डित को नाट्य लेखन के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए वर्ष 2021 का प्रतिष्ठित उ. प्र. संगीत अकादमी सम्मान प्रदान किया
जाएगा.
नाटक
वाराणसी जनपद (अब संत रविदास नगर ) के जगन्नाथ पुर गाँव में जन्मे विजय पण्डित की प्राथमिक शिक्षा गाँव के प्राथमिक पाठशाला और उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय व भारतेन्दु नाट्य अकादमी, लखनऊ से हुई. उनके द्वारा लिखित और निर्देशित नाटकों की सौ से अधिक प्रस्तुतियाँ कई राज्यों में हो चुकी हैं. रंगमंच और स्वाधीनता आंदोलन, पूर्ण पुरुष, पिस्तौल, बकरी, लोक नाट्य नौटंकी: कुछ प्रश्न विनोद रस्तोगी के काव्य
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नाटक (संपादन) इत्यादि उनकी कृतियाँ प्रकाशित हैं. उन्हे साहित्य कला परिषद (दिल्ली सरकार ) का मोहन राकेश सम्मान, पद्म श्री गुलाब बाई सम्मान, डॉ सुरेश चंद्र अवस्थी सम्मान, श्री शारदा पीठ सम्मान (कश्मीर), भारतेन्दु हरिश्चंद्र सम्मान व वाग्धारा सहित अनेक सम्मान और पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं. उनके द्वारा लिखित फिल्म 'अदिति सिंह का कान फिल्म फेस्टिवल (फ्रांस) में प्रदर्शन और 'जोसेफ बॉर्न इन ग्रेस' ऑस्कर सम्मान के लिए एलिजिबल केटेगरी में चयनित हो चुका है.
सम्पर्क
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कथादेश
कथादेश के प्रमुख विशेषांक
1. उर्दू कहानी विशेषांक
2. पंजाबी कहानी विशेषांक
3. प्रेम कहानी विशेषांक
4.
मन्नू भंडारी विशेषांक
5. कल्प कल्प का गद्य विशेषांक
6.
कथादेश के 10 वर्ष की रचनाओं का संचयन
7. मीडिया विशेषांक-1
8.
मीडिया विशेषांक 2
9. किसान विशेषांक
10. घर और बाहर स्त्री रचना संसार
उपरोक्त 10 अकों में से प्रत्येक अंक का मूल्य 75/- है. अंक 11 से अंक 28 तक प्रत्येक अंक का मूल्य 50/-
11. रघुनंदन त्रिवेदी विशेषांक
12. सत्येन कुमार विशेषांक
13. नवीन सागर विशेषांक
14.
नवलेखन विशेषांक 2000
15. नवलेखन विशेषांक 2001
16.
नवलेखन विशेषांक - 2002
17. नवलेखन विशेषांक 2003
19. नोबेल के प्रांगण में स्त्री
21. रहस्य- कल्पना कथा ( अंक 2015 ) 23. हिन्दी कहानी में नवोनमेष-1
25. हिन्दी कहानी में नवोनमेष-3 27. अर्चना वर्मा विशेषांक 29. स्त्री विमर्श-1 (रु 60/-) 31. स्त्री दृश्य और दृष्टि (रु 70/-) 39. प्रभु जोशी - विशेषांक (रु 100/-) 35. यादगार स्त्री किरदार (रु 100/-) 37. प्रेम और प्रेम कहानियाँ (रु 60/-)
39. मोहन राकेश विशेषांक (रु 100/-)
18. अफ्रो अमेरिकन स्त्री लेखन पर केन्द्रित अंक
20. स्त्री लेखन : देशान्तर
22. रहस्य- कल्पना कथा ( अंक 2016 )
24. हिन्दी कहानी में नवोनमेष-2
26. स्त्री विमर्श-2
28. ज्योत्सना मिलन विशेषांक
30. दलित साहित्य विशेषांक (रु 100/-) 32. निर्मल वर्मा का पर एकाग्र (रु90/-) 34. विनोद कुमार शुक्ल (रु70/-)
36. हरिशंकर परसाई विशेषांक (रु 80/-). कविता और स्त्री (रु 90/-)
38.
40. स्त्री वैचारिकी (रु 100/-)
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उर्दू कहानी विशेषांक अनुपलब्ध है.
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बारामासी
पथरीली आचार संहिता
ज्ञान चतुर्वेदी
था.
सड़क पर बड़ा सा पत्थर पड़ा
कहीं, टकराकर कोई गिर गिरा न जाये - पत्थर को उठाकर मैं एक तरफ
किनारे धरने
लगा. तभी न जाने कहाँ से वे आ गये. प्रदेश में चुनाव होने को है. वे हमारी हर हरकत पर कड़ी नजर घरे हैं. वे? हां, वे, चुनाव आयोग वाले.
वे सड़क पर ही नोटिस पकड़ाने लगे. चेतावनी देते हुए बोले, "ये क्या कर रहे हैं आप? चलिये, चुपचाप इस पत्थर को वापस वहीं सड़क पर, ठीक उसी जगह घर के आओ जहाँ से तुमने उठाया था.” "क्यों भाई साहब? ऐसा क्यों?" मैंने पूछा.
"क्योंकि तुम्हारा यह काम चुनाव आचारसंहिता के विरुद्ध है. देखते नहीं? सब तरफ कड़ी निगाह है हमारी हमारे रहते अब चुनाव संपन्न होने तक प्रदेश में कुछ भी इधर-उधर नहीं होने दिया जायेगा."
"परंतु यह तो एकदम बीच सड़क पर पड़ा था? कोई भी इससे टकरा सकता
था. "
"संहिता तोड़ने वाले इसी तरह के बहाने करते हैं. चुनाव के समय कौन सा काम भलाई का है और कौन सा मतदाता को फंसाने वाला, यह बात हम तय करेंगे
कि
तुम?"
वे आपसे तुम पर आ गये. "पर यह पत्थर तो....
पर
“पहले तो तुम जाकर इसे वहीं सड़क वापस घर के आओ... अभी जाओ. और इसे अब वापस छूना भी मत अब यह चुनाव पश्चात ही हटेगा."
"तब तक तो दसों लोग इससे टकराकर अपना मुंह तुड़वा चुके होगे? कोई मर भी सकता है."
"लोकतंत्र के इस यज्ञ में कुछ आहुतियां तो आमजन को भी देनी होगी, कि नहीं?"
"परंतु चुनाव के नाम पर देश के जरूरी काम तो नहीं रुकने चाहिये भाई साहब?"
"पत्थर हटाने को ऐसा जरूरी काम समझते हो ऐसा है तो पहले हमें आवेदन दो. हमारे आदमी जांच करेंगे. पत्थर नापा जायेगा, सड़क की नाप ली जायेगी, दोनों का अनुपात आदि केलकुलेट करके वे तय करेंगे कि तुम्हारे इस तरह से पत्थर हटाने से निष्पक्ष चुनावों में कोई बाधा तो नहीं आयेगी." वे मुझे प्रोसीजर समझाने लगे.
"पर यह आवेदन और जांच का मसला ही कहाँ है? एकदम साफ दिख रहा है. पत्थर बीच सड़क पर पड़ा है. इसे हटाना ही पड़ेगा न?"
"क्यों? क्यों हटाना पड़ेगा ? हटाना
क्यों जरूरी है भाई साहब?" "कमाल है यार!"
"यह तुमने यार किसे कहा? यार कहकर सरकारी अफसर से यारी जताना भी आचार संहिता के विरुद्ध है. अभी कोई ऊपर जाकर हमारी ही शिकायत जड़ देगा तो?"
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"क्षमा करें पर मैं आश्चर्यचकित हूँ कि बीच सड़क पर पड़ा पत्थर..."
है
"...पड़ा है तो? आचार संहिता पूछती
कि इसे अभी भी क्यों हटाना ? क्या लोग कुछ दिनों तक इसके बगल से निकलकर नहीं जा सकते? यह जिद क्यों कि हम तो बीच सड़क से ही निकलेंगे?"
"परंतु, मान लीजिये कि कोई शख्स तेज गति से चला आ रहा हो और..." "... तेज गति से वाहन चलाना एक अपराध है श्रीमान्, पता है न तुम्हें? तुम एक अपराधी की वकालत कर रहे हो? जानते हो न, इसका मतलब?"
"मेरा मतलब वह नहीं था. " "पकड़े जाने पर सब यही कहते हैं.' "मैं कह रहा था कि कभी कोई अचानक इसे देख न पाया तो? मान लें कि अंधेरे में.....
"तो प्रॉब्लम तो अंधेरा हुआ, न कि यह पत्थर? तुम यहाँ लाइट लगवाने की अजह देने की बजाय पत्थर को हाथ लगा रहे हो ताकि मतदाता को लुभा सको, है न? क्या सोचते हो, किसी को पता ही नहीं चलेगा? क्यों?"
"ऐसे तो यहाँ लाइट लगाने पर भी कोई आप कहोगे कि लाइट लगवाना भी मतदाता को अपनी तरफ से गलत तरीके से ललचाना है. फिर? आप तो लाइट भी लगाने न दोगे."
गुड.
"यह भी तुमने ठीक कहा. वेरी नियम कार्यदा जानने वाले नागरिक प्रतीत होते हो। चलो, हम तुम्हारी भावनाओं का
ख्याल करके एक काम करते हैं- यहां इस जगह चेतावनी का एक बोर्ड लगा देते हैं। कि पत्थर से बचकर चलें. "
सर. "
"लोग बोर्ड से भी टकरा सकते हैं
“श्रीमान, तुम बात समझने को ही राजी नहीं. अरे, कैसे टकरा जायेंगे? मतदाता आंखें खोलकर चलें न? बोर्ड को देखने के लिए मतदाता चौकन्ना होगा तो लोकतंत्र मजबूत ही होगा."
सड़क
कि.....
“ठीक है सर जैसा आप कहें. हमें तो पर पत्थर पड़ा दिखा तो सोचा
"सोचो मत, हमें बताओ. कानून हाथ में क्यों लिया? हमें तय करने दो, तुम बस
बताओ. हमें लगा तो हम स्वयं इस पत्थर के पास दो पुलिस वालों की पोस्टिंग कर देंगे. वे आने जाने वाली जनता को आगाह करते रहेंगे कि यहाँ पत्थर पड़ा है. इस तरह पत्थर भी पड़ा रहेगा और काम भी हो जायेगा. आचार संहिता का पालन हो, हम तो यह चाहते हैं."
"तो पत्थर को लाल रंग से पुतवा दें न सर? दूर से ही दिख जायेगा.'
"सुझाव अच्छा है, पर यह भी आचार संहिता का उल्लंघन कहायेगा. दूसरे दल वाले कहेंगे कि लाल रंग से पोतकर कम्युनिस्टों का प्रचार किया जा रहा है. ..... इस पत्थर को अकेला छोड़ क्यों नहीं देते श्रीमान् ? इसे चुनावों तक यहीं पड़े रहने दो न? तुम क्यों निरर्थक विवाद की स्थिति पैदा कर रहे हो?"
था?
मैं क्या करता? कर भी क्या सकता
बुख़ार
• नरेन्द्र जैन
तुम एक सूक्ष्म जीवाणु के निशाने पर हो जो विचार बनकर पनप रहा तुम्हारा चिकित्सक
कुछ नहीं जानता उसके बारे में
तुम्हारा शरीर बुख़ार में तप रहा है और चिकित्सक
लानत भेज रहा किसी मच्छर के नाम जिसके बारे में तुम कुछ नहीं जानते
हालाँकि यहाँ मरने की वही वजहें नहीं होतीं जो बतलायी जाती हैं
इस तरह ।
पोस्टर पंकज दीक्षित
पत्थर को वहीं, बीच सड़क पर पड़ा उसी सड़क पर आपसी पत्थरबाजी हुई तो हुआ वापस चला आया. वह पत्थर काम आ गया. पत्थर लगने से किसी का सिर अवश्य फूटा पर वह पत्थर
फिर ?
फिर तो जरूर कोई उससे टकरा सड़क से हट गया.....सिर पर पत्थर मारना वकराकर गिरा होगा? चुनाव संहिता का मामला न होने से उस तरह का कोई पचड़ा भी नहीं हुआ. पत्थरबाजी फौजदारी का मामला था.
नहीं, वो समस्या तो स्वतः सुलझ गई एक चुनावी जुलूस में दो गुटों के बीच,
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मामले में अज्ञात लोगों के खिलाफ
मामला दर्ज हो गया है.
चुनाव जारी है. आचार संहिता भी.
सम्पर्क
ए-40, अलकापुरी, भोपाल-462024 मो. 9425604105
यायावर की डायरी
उजाड़ में बोधिवृक्ष तले
डॉ. सत्यनारायण
रते उसी दरख्त की छाया तले झरकर वहीं मुरझा रहे थे. वह पत्ते झ झरने का मौसम नहीं था. पता नहीं ज्यादा क्या वे अभिशप्त थे. या ज्ञानवृद्ध जो पानी के या अपनी ही घनघोर छाया से. अपने में ही सिमटे रहते हैं. अण्डाकार सफेद संगमरमर का पत्थर जो दरख्त की
जड़ों के ठेठ ऊपर तने से सटकर रखा था. ध्यानस्थ मुद्रा में पत्थर की ध्यान मुद्रा ऊपर नीचे अंग्रेजी में OSHO लिखा था. छाया से परे पानी की खाई के किनारे एक लिखा था. पानी की खाई चौफेर नहीं दो और बदरंग तख्ती पर OSHO TREE फेर थी. दो नहरें जो दरख्त के अगल बगल होती हुई एक दूसरे से मिलकर वहीं लौट आतीं. दरख्त का सुरक्षा घेरा में देखता रहा. उससे परे और भी कई दरख्त नहर या खाई के पास खड़ा होकर देर तक थे जिनकी छाया तले कई लोग बैठे हुए थे. विशेषकर युगल खाई से घिरा यह एक अकेला अपने को अपनी ही छाया तले समेटे. कुछ पंछी जरूर उसकी डालियों पर बैठे थे. पर वे आवाज.
जबलपुर शहर का भंवरताल गार्डन दरख्त से थोड़ी दूर पिरामिड आकार का चौतरफ से खुला हॉल. छत के बीचों बीच एक गोल मोखी जिससे धूप, हवा व रोशनी झर रही थी. उसके चौतरफ गोलाकार
दो तीन फुट ऊँची दीवार पर एक युवा जोड़ा बैठा था. अभिमंत्रित सा. मैं भी देर तक दूसरे एक कोने पर.
वहां से लौटते हुए फिर वही दरख्त घनी छाया. हरेपन से सराबोर पत्ते पूरब की तरफ गरदन की तरह बाहर निकली डाल. बीच-बीच में हरे के बीच जाने कहां अटके झरते सूखे पत्ते घोर हरे के बीच पता नहीं अपने को कहां छिपाए एक एक झर रहे थे. मैं सूखे के साथ हरे को छूकर देखना चाहता था. पर पानी की खाई के ऊपर चारों तरफ नोकदार लोहे के सरियों की फेंसिंग थी. खाई में अरसे से नहीं बदला गया गंदला पानी भरा था. देर सांझ मैं अपने होटल लौट आया.-
जबलपुर 21 अगस्त, 2023 कल देर रात अधनींद या पता नहीं सपने में मुझे लगा कल छोड़कर आए भंवरताल के दरख्त की डालियों पर लटूम कर डोलर हींडा खा रहा हूँ. सुबह जबलपुर के साथी विवेक चतुर्वेदी ने बताया कि यह वही वृक्ष है जिसके नीचे आचार्य रजनीश घण्टों बैठा करते थे. यहीं उनके प्रज्ञा चक्षु खुले या उनके शिष्यों के अनुसार उन्हें बोधि हुई. मैंने आश्चर्य से उनकी तरफ देखा और थोड़ी देर बाद में फिर उस वृक्ष के पास था. अपनी ही छाया में सुस्ताता एक अकेला अनमन सा उदास दूसरे
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दरख्तों को देखता सूखे में हरा या हरे में सूखे को दबोचे. खाई के बगल में पड़ी एक हरी बेंच पर बैठा में देर तक ओशो नहीं बुद्ध के बारे में सोचता रहा. कैसा तो रहा होगा बोद्धि वृक्ष. बेचैन हो उठा. एकाएक लगा मुझे अभी इसी समय अपने ही द्वारा रोपे गये शम्शान के दरख्तों के पास लौट जाना चाहिए. चाहे वे खेजड़ी या नीम के ही हों. अब वे छाया भी देने लगे हैं कुछ कुछ अब तक की अपनी तमाम इच्छाओं, वासनाओं में उलझे मुझे लगा कोई दरख्त नहीं हम स्वयं अपने को कितनी छाया दे पाते हैं, कितना मुक्त कर पाते हैं.
ओशो? पहले रजनीश फिर आचार्य रजनीश फिर भगवान रजनीश फिर ओशो. और अंत में वे ज्ञानी थे क्या उन्हें नहीं पता था कि लौटना है... फिर इतनी रॉल्स रॉयल, महंगी घड़ियाँ कितनी लिप्साएं ? मैंने एक बार फिर उस मौलश्री के वृक्ष को देखा जिसके नीचे उन्हें बोधि हुई. कैसी बोधि ? सिद्धार्थ राजकुमार को जो राज प्रासाद में ही छोड़कर निकले थे बुद्ध. बेनाम होकर उन्होंने अपने लिए अपना कोई नया नाम नहीं रखा. वे एक सामान्य से वृक्ष के नीचे बैठ गये. जाने कितने दिनों तक और उन्होंने जो छाया एक हरे भरे पूरे दरख्त के नीचे वह समूची दुनिया में फैल गया. इसके बाद वे सामान्य मनुष्य नहीं थे
कबियन की वार्ता
रामचन्द्र शुक्ल-
राम का अवतार
विश्वनाथ त्रिपाठी
ग या प्रसाद शुक्ल 'स्नेही' की पंक्ति है, "तुलसी के ऋण से उऋण होने के हेतु रामचन्द्र शुक्ल बन आए थे." बड़ी
साहसपूर्ण कल्पना है. सामान्यतः विष्णु अवतार लेते हैं, मनुष्य का, किन्तु यहाँ ब्रहम के मानव अवतार रामचन्द्र ने एक हिन्दी लेखक के रूप में अवतार लिया है. किसलिए? लुलसी दास ने रामचरित मानस की रचना करके, राम का यश जन जन तक पहुँचा दिया. राम ने इसलिए तुलसी का ऋण स्वीकार किया और उससे मुक्त होने के लिए रामचन्द्र शुक्ल के रूप में अवतार लेकर तुलसी ग्रन्थावली की भूमिका लिखी, जिससे तुलसी का यश जन जन तक पहुँचा.
कहने का तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार तुलसी ने राम का यश घर-घर तक पहुँचाया उसी प्रकार राम ने रामचन्द्र शुक्ल का रूप धारण करके तुलसी ग्रन्थावली की भूमिका लिखकर तुलसी का यश घर-घर तक पहुँचाया. रामचन्द्र शुक्ल को राम का अवतार होने की कल्पना इतनी उदात्त है और किसी भी लेखक- रामचन्द्र शुक्ल को इतनी अपूर्व श्रद्धांजली है, हिन्दी लेखक को राम का अवतार बताना.
बी-5 एफ-2 दिलशाद गार्डन, दिल्ली-110095
और न वह वृक्ष सामान्य. जिसके नीचे वह बैठे वह कहीं भी जरा से रन्ध्र में उगने वाला वृक्ष था. शम्शान तो उसका शाश्वत वास. उजाड़ घरों में खण्डहरों में दीवारों में वीरानों और वहीं कहीं भी जो उपेक्षित जगहें मानी जाती है. वह कहीं भी फूट पड़ता है, कोमल हरी पत्तियों के साथ,
प्राणवायु ऑक्सीजन फेंकता. बुद्ध ने कहा था दुख है और इसी दुख में एक जोत छुपी है उजास की. इसी उजास को उजाड़ में इसी वृक्ष तले बुद्ध के ललाट पर झरते हुए सुजाता ने देखा था. वह एक साधारण ग्वालिन थी जिसने बोधिवृक्ष की छाया में
बैठे बुद्ध के ललाट पर पहली बार देखा क्या रजनीश या ओशो जिस मौलश्री वृक्ष के नीचे ध्यान लगाते थे उसकी तरह हो पाये? वैसे भी यह वृक्ष हर कहीं नहीं उगता. रजनीश भी हर आदमी के भीतर रच नहीं पाते जिस तरह बुद्ध.
मौलश्री वृक्ष को नगर प्रशासन ने पानी की खाई और कांटेदार बाड़ से घेर दिया. अंतिम दिनों में ओशो स्वयं भी इसी तरह घिर गये थे अपने ही घेरे में मौलश्री हर कहीं नहीं पनपता ओशो भी हर किसी के नहीं हो पाये. वे सिद्धार्थ की तरह मानव मात्र के दुखों के कारण और उनको दूर
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करने के उपाय खोजने नहीं निकले थे. भंवरताल में मौलश्री के नीचे बैठकर जितने प्रज्ञाचक्षु खुले उतना दिया फिर अपने चौतरफ प्राचीर खींच ली. और बुद्ध? बोधिवृक्ष? हर कहीं पाये जाते हैं। कहीं भी उग आता है बोधिवृक्ष. गरीब के घर की टूटी दीवार के बीच, श्मशान में, किसी भी उपेक्षित रन्ध्र में वह अपनी जड़े रोप लेता है उसकी छाया आज भी वैसी ही है, सबके लिए समान हर हमेश रात दिन ऑक्सीजन छोड़ती
सम्पर्क मो. 9414182301 drsatyanarayan01@gmail.com
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