Kya, Kab, Kahan Aur Kaise?

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Kya, Kab, Kahan Aur Kaise?

क्या, क्व, कहा और कैसे?

रशिया का स्वाद
रशोदा बैठी अख्बार पढ़ रही थी। अचानक उसकी निशाह एक सुखी पर पड़ी "सौ साल पहले"। वह सोचने लगी कि यह कोई कैसे जान सकता है कि इतने वर्षों पहले क्या हुआ था?
कैसे पता लगाए?
यह जाने के लिए कि कल क्या हुआ था, तुम रेडियो सुन सकते हो, टेलीविजन देख सकते हो या फिर अख्बार पढ़ सकते हो। साथ ही यह जानने के लिए कि पीछले साल क्या हुआ था, तुम किसी ऐसे व्यक्ति से बात कर सकते हो जिसे उस समय की स्मृति हो। लेकिन बहुत पहले क्या हुआ था यह कैसे जाना जा सकता है?
अतीत के बारे में हम क्या जान सकते हैं?
अतीत के बारे में बहुत कुछ जाना जा सकता है-जैसे लोग क्या खाते थे, कैसे कपड़े पहनते थे, किस तरह के घरों में रहते थे? हम आखेटको (शिकारियों), पशुपालकों, कृषकों, शासकों, व्यापारियों, पुरोहितों, शालपकारों, कलाकारों, संगीतकारों या फिर वैशानकों के जीवन के बारे में जानकारी हैं हासिल कर सकते हैं। यही नहीं हम यह भी पता कर सकते हैं कि उस समय बच्चे कौन-से खेल खेलते थे, कौन-सी कहानियाँ सुना करते थे, कौन-से नाटक देखा करते थे या फिर कौन-कौन से गीत गाते थे।
लोग कहां रहते थे?
मानचित 1 (पृष्ठ 2) में नर्मा नदी का पता लगाओ। कई लाख वर्ष पहले से लोग इस नदी के तट पर रह रहे हैं। यहाँ रहने वाले आरंभिक लोगों में से कुछ कुशल संग्राहक थे जो आस-पास के जंगलों की विशाल संपदा से परिचित थे। अपने भोजन के लिए वे जड़ों, फलों तथा जंगल के अन्य उत्पादों का यहीं से संग्रह किया करते थे। वे जानवरों का आखेट (शिकार) भी करते थे। अब तुम उत्तर-पश्चिम की सुलेमान और क्रिस्ट्रर पहाडियों का पता लगाओ। इसी क्षेत्र में कुछ ऐसे स्थान हैं जहाँ लगभग आठ हजार वर्ष पूर्व स्ट्री-पुरुषों ने सबसे पहले गेहू तथा जी जैसी फ्रसलों को उपजाना आरंभ किया। उन्होंने भेड़, बकरी और गाय-बैल जैसे पशुओं को पालतू बनाना शुरू किया। ये लोग गाँवों में रहते थे। उत्तर-पूर्व में गारो तथा मध्य भारत में विश्व पहाडियों का पता लगाओ। ये कुछ अन्य ऐसे क्षेत्र थे जहाँ कृषि का विकास हुआ। जहाँ सबसे पहले चवल उपजाया गया वे स्थान विश्व के उत्तर में स्थित थे। मानचित पर सिंधु तथा इसकी सहायक नदियों का पता लगाने का प्रयास करो। सहायक नदियाँ उन्हें कहते हैं जो एक बड़ी नदी में मिल जाती है। लगभग 4700 वर्ष पूर्व इन्होंने नदियों के किनारे कुछ आरंभिक नगर फले-फुले। गंगा व इसकी सहायक नदियों के किनारे तथा समुद्र तटवर्ती इलाकों में नगरों का विकास लगभग 2500 वर्ष पूर्व हुआ। रमा तथा इसकी सहायक नदी सोने का पता लगाओ। गंगा के दक्षिण में इन नदियों के आस-पास का क्षेत्र प्राचीन काल में 'मगध' (वर्तमान बिहार में) नाम से जाना जाता था। इसके शासक बहुत शिक्षितशाली थे और उन्होंने एक विशाल राज्य स्थापित किया था। देश के अन्य हिस्सों में भी ऐसे राज्य की स्थापना की गई थी। लोगों ने सर्वेष उपमहाद्वीप के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक यात्रा की। कभी-कभी हिमालय जैसे ऊँचे पर्वतों, पहाडियों, रोगस्तां, नदियों तथा समुद्रों के कारण यात्रा जोखिम भरी होती थी, फिर भी ये यात्रा उनके लिए असंभव नहीं थी। अत: कभी लोग काम की तलाश में तो कभी प्राकृतिक आपदाओं के कारण एक स्थान से दूसरे स्थान जाया करते थे। कभी-कभी सेनाएँ दूसरे क्षेत्रों पर विजय हिसिल करने के लिए जाती थी। इसके अतिरिक्त व्यापारी कभी काफ़ले में तो कभी जहाजों में अपने साथ मूल्यवान वस्तुएँ लेकर एक स्थान से दूसरे स्थान जाते रहते थे। धार्मिक गुरु लोगों को शिक्षा और सलाह देते हुए एक गाँव से दूसरे गाँव तथा एक कसबे से दूसरे कसबे जाया करते थे। कुछ लोग नए और रोचक स्थानों को खोजने की चाह में उत्सुकतावश भी यात्रा किया करते थे। इन सभी यात्राओं से लोगों को एक-दूसरे के विचारों को जानने का अवसर मिला।
Image summary: यह एक पोर्ट्रेट तस्वीर है। इस चित्र में एक युवती का चेहरा दिखाया गया है जिसने पारंपरिक परिधान पहने हुए हैं और बालों में फूल लगाए हुए हैं। युवती के चेहरे के हाव-भाव गंभीर हैं और वह सीधे कैमरे की ओर देख रही है, जिससे उसकी एकाग्रता और आत्मविश्वास का पता चलता है।
Figure 1 summary: यह एक भौगोलिक मानचित्र है। इसमें भारतीय उपमहाद्वीप की प्रमुख नदियों, पर्वत श्रृंखलाओं और जल निकायों को दर्शाया गया है। मानचित्र से यह निष्कर्ष निकलता है कि उत्तर भारत में नदियों का घना जाल है जो हिमालय से निकलकर गंगा और सिंधु जैसी बड़ी प्रणालियों का निर्माण करती हैं, जबकि दक्षिण भारत की नदियाँ मुख्य रूप से पूर्व की ओर बहकर बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं। इसके अतिरिक्त, यह चित्र प्रायद्वीपीय भारत की भौगोलिक स्थिति और उसके चारों ओर स्थित सागरों के विस्तार को स्पष्ट करता है।
आज लोग यात्राएँ क्यों करते हैं?
एक बार फिर से मानचित 1 को देखो। पहाडियाँ, पर्वत और समुद्र इस उपमहाद्वीप की प्राकृतिक सीमा का निर्माण करते हैं। हालांकि लोगों के लिए इन सीमाओं को पार करना आसान नहीं था, जिन्होंने ऐसा चाहा वे ऐसा कर सके, वे पर्वतों की ऊँचाई को दूसके तथा गहरे समुद्रों को पार कर सके। उपमहाद्वीप के बाहर से भी कुछ लोग यहाँ आए और यहीं बस गए। लोगों के इस आवागमन ने हमारी सांस्कृतिक परंपराओं को समृद्ध मानचित 1 दक्षिण एशिया (आधुनिक भारत, पाकिस्तान, बंग्लादेश, नेपाल, भूटान और श्रीलंका) और अफगानिस्तान, इरान, चीन तथा म्यांमार आदि पड़ोसी देशों को दर्शाते हैं। दक्षिण एशिया एक महत्वपूर्ण से छोटा है, लेकिन विश्वलता तथा बाकी एशिया से समुद्रों, पहटियों तथा पर्वतों से बैठे होने के कारण इसे प्रायः उपमहाद्वीप कहा जाता है।
3 ☐
क्या, कब, कहाँ और कैसे?
ताडपत्रों से बनी पाण्डुलिपि का एक प्रछ
यह पाण्डुलिप लगभग एक हजार वर्ष पहले लिखी गई थी। किताब बनाने के लिए ताड़ के पतों को काटकर उनके अलग-अलग हिस्सों को एक साथ बाँध दिया जाता था। भूर जैद की छाल से बनी ऐसी ही एक पाण्डुलिप को तुम यहाँ देख सकते हो। किया। कई सौ वर्षों से लोग पत्थर को तराशने, संगीत रचने और यहाँ तक कि भोजन बनाने के नए तरीकों के बारे में एक-दूसरे के विचारों को अपनाते रहे हैं।
देश के नाम
अपने देश के लिए हम प्राय: इण्डिया तथा भारत जैसे नामों का प्रयोग करते हैं। इण्डिया शब्द इण्डस से निकला है जिसे সংकृत में सिंधु कहा जाता है। अपने एटलस में इंगन और यूनान का पता लगाओ। लगभग 2500 वर्ष पूर्व उत्तर-पश्चिम की ओर से आने वाले इरियायों और यूनानियों ने सिंधु को हिंदोंस अथवा इदास और इस नदी के पूर्व में स्थित भूमि प्रदेश को इण्डिया कहा। भरत नाम का प्रयोग उत्तर-पश्चिम में रहने वाले लोगों के एक समूह के लिए किया जाता था। इस समूह का उल्लेख সংकृत की आरंभिक (लगभग 3500 वर्ष पुरानी) कृति ज्वगवेद में भी मिलता है। बाद में इसका प्रयोग देश के लिए होने लगा।
अतीत के बारे में कैसे जानं?
अतीत की जानकारी हम कई तरह से प्राप्त कर सकते हैं। इनमें से एक 전रीका अतीत में लिखी गई पुस्तकों को दूढ़ना और पढ़ना है। ये पुस्तकें हाथ से लिखी होने के कारण पाण्डुलिपि कहीं जाती हैं। अंग्रेजी में 'पाण्डुलिपि' के लिए प्रयुक्त होने वाला 'मैन्यूक्टर' शब्द लेटिन शब्द 'मेनू' जिसका अर्थ हाथ है, से निकला है। ये पाण्डुलिपियां प्राय: ताड़पेंग्रो अथवा हिमालय क्षेत्र में उगने वाले भूर्य नामक पेड़ की छाल से विशेष तरीके से तैयार भोजपत्र पर लिखी मिलती हैं। སྤྱིའི་བསྒྱུར་འདིའི་སྲོགས་ཀྱི་སྐྱེས་མཛད་པའི་ནང་མཚན་ཉིད་ཀྱི་སམ་མཐུད་པའི་ཐོབ་མཐོང་བ་ཡོད་པའི་སྐུ་ཕྲེང་གཅོད་པའི་བཅས་ཀྱི་སྐྱེས་མཚན་ इतने वर्षों में इनमें से कई पाण्डुलिपियों को कीड़ों ने खा लिया तथा कुछ नष्ट कर दी गई। फिर भी ऐसी कई पाण्डुलिपियाँ आज भी उपलब्ध हैं। प्राय: ये पाण्डुलिपियां मंदिरों और विहारों में प्राप्त होती हैं। इन पुस्तकों में धार्मिक मान्यताओं व्यवहारों, राजाओं के जीवन, औषधियों तथा विज्ञान आदि सभी प्रकार के विषयों की चर्चा मिलती है। इनके अतिरिक्त हमारे यहाँ महाकाव्य, कविताएँ तथा नाटक भी हैं। इनमें से कई সংकृत में लिखे हुए मिलते हैं जबकि अन्य प्राकृत और तमिल में हैं। प्राकृत भाषा का प्रयोग आम लोग करते थे। हम अभिलेखों का भी अध्ययन कर सकते हैं। ऐसे लेख पत्थर अथवा धातु जैसी अपेशाकृत कठोर सतहों पर उलकींग किए गए मिलते हैं। कभी-कभी शासक अथवा अन्य लोग अपने आदेशों को इस तरह उलकींग करवाते थे, ताकि लोग उन्हें देख सके, पहुसकें तथा उनका पालन कर सके। कुछ अन्य प्रकार के अभिलेख भी मिलते हैं जिनमें राजाओं तथा रानियों सहित अन्य स्ट्री-पुरुषों ने भी अपने कार्यों के विवरण उलकीण करवाए हैं। उदाहरण के लिए पाय: शासक लड़ाइयों में अर्जित विजयों का लेखा- जोखा रखा करते थे। क्या तुम बता सकती हो कि कठोर सतह पर लेख लिखवाने के क्या लाभ थे? ऐसा करवाने में क्या-क्या कितनाइ्यां आती थी? इसके अतिरिक्त अन्य कई वस्तुएँ अतीत में बनी और प्रयोग में लाई जाती थीं। ऐसी वस्तुओं का अध्ययन करने वाला व्यक्ति पुरातत्त्वविद कहलाता है। पुरातत्त्वविद पत्थर और इट से बनी इमारतो के अवशेषों, चित्रों तथा मूर्तियों का अध्ययन करते हैं। वे औजारों, हिथियारों, बर्तनों, आभूषणों लगभग 2250 वर्ष पुराना यह अभिलेख वर्तमान अफगानिस्तान के संधार से प्राप्त हुआ है। यह अभिलेख अशोक नामक शासक के आदेश पर उล்கीంది करवाया गया था। इस शासक के विषय में तुम अध्यय 8 में पढ़ोगी। जब हम कुछ लिखते है तब हम किसी लिपि का प्रयोग करते हैं। लिपियाँ अक्षरों अथवा संकेतों से बनी होती है। जब हम कुछ बोलते अथवा पढ़ते हैं तब हम एक भाषा का प्रयोग करते हैं। यह अभिलेख इस क्षेत्र में प्रयुक्त होने वाली यूनानी तथा अरामैड्क नामक दो भिन्न लिपियां तथा भाषाओं में है।
Image summary: यह चित्र एक प्राचीन शिलालेख या पत्थर की पट्टिका का है। इसमें दो अलग-अलग लिपियों में पाठ उत्कीर्ण है, जहाँ ऊपरी हिस्सा ग्रीक लिपि में है और निचला हिस्सा एक अन्य प्राचीन लिपि में लिखा गया है। यह दर्शाता है कि यह दस्तावेज़ द्विभाषी था, जिसका उपयोग संभवतः विभिन्न भाषा बोलने वाले लोगों के बीच संचार या आधिकारिक घोषणाओं के लिए किया गया था। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जिस समय और स्थान पर यह बनाया गया था, वहाँ सांस्कृतिक और भाषाई विविधता मौजूद थी और शासन व्यवस्था में बहुभाषी दृष्टिकोण अपनाया गया था।
5 ☐
Image summary: यह एक वस्तु की तस्वीर है। इस चित्र में एक प्राचीन मिट्टी का बर्तन दिखाया गया है जिसके ऊपरी हिस्से पर ज्यामितीय आकृतियों और रेखाओं की नक्काशी की गई है। इस बर्तन की बनावट और उस पर की गई कलाकृति से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह किसी प्राचीन सभ्यता की हस्तशिल्प कला का नमूना है, जो उस समय की सांस्कृतिक और कलात्मक दक्षता को दर्शाता है।
Image summary: यह चित्र एक पुरातात्विक कलाकृति की तस्वीरों का समूह है। इसमें एक प्राचीन मुहर या मिट्टी की पट्टिका के दोनों पहलुओं को दिखाया गया है, जिस पर विभिन्न आकृतियों की नक्काशी की गई है। ऊपरी भाग में जानवरों और प्रतीकों की विस्तृत आकृतियाँ दिखाई देती हैं, जबकि निचले भाग में एक सरल आकृति अंकित है। इन चित्रों से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह वस्तु प्राचीन सभ्यता की कला और लेखन पद्धति का एक उदाहरण है, जिसका उपयोग संभवतः पहचान या व्यापारिक उद्देश्यों के लिए किया जाता था।
तथा सिक्कों की प्राप्ति के लिए छान-बीन तथा खुदाई भी करते हैं। इनमें से कुछ वस्तुएँ पत्थर, पकी मिट्टी तथा कुछ धातु की बनी हो सकती है। ऐसे त्व कठोर तथा जल्दी नष्ट न होने वाले होते हैं। पुरातत्त्वविद्जानवर्ग, चिड्यों तथा मछलियों की हिडुयां भी दूढ़ते हैं। इससे उन्हें यह जानने में भी मदद मिलती है कि अतीत में लोग क्या खाते थे। वनस्मात्यां के अवशेष बहुत मुश्क्ल से बच पाते हैं। यदि अनन के दाने अथवा लकड़ी के टुकड़े जल जाते हैं तो वे जले हुए रूप में बच रहते हैं। क्या पुरातत्त्वविदों को बहुधा कपड़ों के अवशेष मिलते हैंंगे? पाण्डुलिपियों, अभिलेखों तथा पुरातत्त्व से शांत जानकारियों के लिए इतिहासकार प्राय: स्रोत शब्द का प्रयोग करते हैं। इतिहासकार उन्हें कहते हैं जो अतीत का अध्ययन करते हैं। स्वात के प्राप्त होते ही अतीत के बारे में पढ़ना बहुत रोचक हो जाता है, क्योंकि इन स्रोतों की सहायता से हम धीरे-धीरे अतीत का पुनर्निर्माण करते जाते हैं। अत: इतिहासकार तथा पुरातत्त्विक उन जासूसों की तरह हैं जो इन सभी स्रोतों का प्रयोग सुराग के रूप में कर अतीत को जानने का प्रयास करते हैं।
अतीत, एक या अनेक?
क्या तुमने इस पुस्तक के शीर्षिक हमारे अतीत पर ध्यान दिया है? यहाँ 'अतीत' शब्द का प्रयोग बहुवचन के रूप में किया गया है। ऐसा इस तथ्य की ओर ध्यान दिलाने के लिए किया गया है कि अलग-अलग समूह के लोगों के लिए इस अतीत के अलग-अलग मायने थे। उदाहरण के लिए पशुपालकों अथवा कृषकों का जीवन राजाओं तथा रानियों के जीवन से तथा व्यापारियों का जीवन शालपकारों के जीवन से बहुत भिन्न था। जैसाकि हम आज भी देखते हैं, उस समय भी देश के अलग-अलग हिस्सों में लोग अलग-अलग व्यवहारों और रीति-रिवर्जों का पालन करते थे। उदाहरण के लिए आज अंडमान द्वीप के अधिकांश लोग अपना भोजन मंछलियाँ पकड़ कर, शिकार करके तथा फल-फूल के संग्रह द्वारा प्राप्त करते हैं। इसके विपरीत शहरों में रहने वाले लोग खाद्य आपूर्ति के लिए अन्य व्यक्तियों पर निर्भर करते हैं। इस तरह के भेद अतीत में भी विधमान थे। इसके अतिरिक्त एक अन्य तरह का भेद है। उस समय शासक अपनी विजयों का लेखा-जोखा रखते थे। यही कारण है कि हम उन शासकों तथा उनके द्वारा लड़ा जाने वाली लड़ाइयों के बारे में काफी कुछ जानते हैं। जबकि शिकारी, मतुआरे, संग्राहक, कृषक अथवा पशुपालक जैसे आम आदमी प्राय: अपने कार्यों का लेखा-जोखा नहीं रखते थे। पुरातत्त्व की सहायता से हमें उनके जीवन को जानने में मदद मिलती है। हालांकि अभी भी इनके बारे में बहुत कुछ जानना शेष है।
तिथियों का मतलब
अगर कोई तुमसे तिथि के विषय में पूछे तो तुम शायद उस दिन की तारीख, माह, वर्ष जैसे कि 2000 या इसी तरह का कोई और वर्ष बताओगी। वर्ष की यह गणना इसाई धर्म-प्रवर्तक इसा मसीह के जन्म की तिथि से की जाती है। अत: 2000 वर्ष कहने का तात्यय ईसा मसीह के जन्म के 2000 वर्ष के बाद से है। ईसा मसीह के जन्म के पूर्व की सभी तिथियों में पहुं (इसा से पहले) के रूप में जानी जाती हैं। इस पुस्तक में हम 2000 को अपना आरंभिक बिन्दु मानते हुए वर्तमान से पूर्व की तिथियों का उल्लेख करेंगे।

इतिहास और तिथियों

अंग्रेजी में बी.सी. (हिंदी में ई.पू.) का तात्यय 'बिफोर क्रोइस्ट' (इसा पूर्व) होता है। कभी-कभी तुम तिथियों से पहले ए.डी. (हिंदी में इ.) लिखा पानी हो। यह 'एनो डॉमिनरी' नामक दो लेटिन शब्दों से बना है तथा इसका तात्यय इसा मसीह के जन्म के वर्ष से है। कभी-कभी ए.डी. की जगह सी.ई. तथा बी.सी. की जगह बी.सी.ई. का प्रयोग होता है। सी.ई. अक्षरों का प्रयोग 'कामन एरा' तथा बी.सी.ई. का 'बिफोर कामन एरा' के लिए होता है। हम इन शब्दों का प्रयोग इसलिए करते हैं क्योंकि विश्व के अधिकांश देशों में अब इस कैलंडर का प्रयोग सामान्य हो गया। भारत में तिथियों के इस रूप का प्रयोग लगभग दो सौ वर्ष पूर्व आरंभ हुआ था। कभी-कभी अंग्रेजी के बी.पी. अक्षरों का प्रयोग होता है जिसका तात्यय 'बिफोर प्रेजेंट' (वर्तमान से पहले) है। पृष्ठ 3 पर दो तिथियों में, उनका पता लगाओ। इनके लिए तुम किस अक्षर समूह का प्रयोग करोगी?

अन्यत्र

जैसा कि हमने पहले पढ़ा, अभिलाख कठोर सतहों पर उलकींग करवाए जाते हैं। इनमें से कई अभिलख कई सौ वर्ष पूर्व लिखे गए थे। सभी अभिलखों में लिपियों और भाषाओं का प्रयोग हुआ है। समय के साथ-साथ अभिलखों में प्रयुक्त भाषाओं तथा लिपियों में बहुत बदलाव आ चुका है। विद्वान यह कैसे जान पाते हैं कि क्या लिखा था? इसका पता अज्ञात लिपि का अर्थ निकालने की एक प्रकिया द्वारा लगाया जा सकता है। इस प्रकार से अज्ञात लिपि को जानने की एक प्रसिद्ध कहानी उतरी अफ़्रीकी देश मिस्र से मिलती है। लगभग 5000 वर्ष पूर्व यहाँ राजा-रानी रहते थे। मिस्त्र के उत्तरोत्तर पर रोसेट्रूनाम का एक कसब्रा है। यहाँ से एक एस्मा उल्कीर्णित पत्थर मिला है जिस पर एक ही लेख तीन भिन्न-भिन्न भाषाओं तथा लिपियों (यूनानी तथा मिस्री लिपि के दो प्रकारों) में है। कुछ विद्वान यूनानी भाषा पढ़ सकते थे। उन्होंने बताया कि यहाँ राजाओं तथा रोनियों के नाम एक छोटे से फ्रेम में दिखाप गए हैं। इसे 'कारतूश' कहा जाता है। इसके बाद विद्वानों ने यूनानी तथा मिस्री संकेतों को अगल-बगल रखते हुए मिस्री अक्षरों की समानार्थक ध्वनियों की पहचान की। जैसा कि तुम देख सकते हो यहाँ एल् अक्षर के लिए शेर तथा एक अक्षर के लिए चिडिया के चित्र बने हैं। एक बार, जब उन्होंने यह जान लिया कि विभिन्न अक्षर किनके लिए प्रयुक्त हुए हैं, तो वे आसानी से अन्य अभिलेखों को भी पढ़ सके।
Image summary: यह चित्र एक प्राचीन लिपि या प्रतीकात्मक शिलालेख का चित्रण है। इसमें एक आयताकार घेरे के भीतर विभिन्न मिस्र के चित्रलिपि प्रतीकों को दर्शाया गया है, जिनके नीचे अंग्रेजी अक्षरों में एक नाम लिखा हुआ है। यह दर्शाता है कि ऊपर दिए गए प्रत्येक प्रतीक का संबंध नीचे लिखे गए विशिष्ट अक्षरों से है, जो एक नाम के अनुवाद या लिप्यंतरण को प्रदर्शित करता है।
Image summary: यह चित्र एक प्रतीकात्मक लिपि या चित्रलिपि का उदाहरण है। इसमें विभिन्न आकृतियों जैसे कि त्रिकोण, पशु, पक्षी और अन्य ज्यामितीय प्रतीकों का एक क्रम दिखाया गया है, जिनके नीचे अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षर लिखे गए हैं। यह दर्शाता है कि प्रत्येक विशिष्ट प्रतीक एक विशेष अक्षर या ध्वनि से संबंधित है, जिससे यह एक प्राचीन लेखन प्रणाली या कूट भाषा की तरह प्रतीत होता है।
कालपना करो
तुम्हे एक पुरातत्त्विक का साक्षात्कार लेना है। तुम उन पाँच प्रश्नों की एक सूची तैयार करो जिन्हें तुम पुरात्त्विक्द से पूछना चाहोगी।
आओ याद करें
1. निम्नलिखित का सुमेल करो :
- नमंदा घाटी
- पहला बड़ा राज्य
- आखेट तथा संग्रहण
Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में एक लड़की को दिखाया गया है जो बैठकर ध्यानपूर्वक एक किताब पढ़ रही है। इस चित्र से यह निष्कर्ष निकलता है कि लड़की पढ़ने की गतिविधि में पूरी तरह से संलग्न है और शिक्षा के प्रति उसकी रुचि है।
गारो पहाडिया लगभग 2500 वर्ष पूर्व के नगर
सिंभु तथा इसकी सहायक नदियाँ आरंभिक कृषि
2. पाण्डुलिपियों तथा अभिलखों में एक प्रमुख अंतर बताओ।
उपयोगी शब्द
- पाण्डुलिपि
- अभिलेख
- पुरातत्त्व
- इतिहासकार
- स्łott
- अज्ञात लिপি का
- अर्थ निकालना
कुछ महत्वपूर्ण तिथियाँ
- ▶ कृषि का आरंभ (8000 वर्ष पूर्व)
- ▶ सिंधु सभ्यता के प्रथम नगर (4700 वर्ष पूर्व)
- ▶ गंगा घाटी के नगर, मगध का बड़ा राज्य (2500 वर्ष पूर्व)
- वर्तमान (लगभग 2000 वर्ष पूर्व)
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आओं चर्चों करें
3. रशोदा के प्रश्न को फिर से पढ़ो। इसके क्या उत्तर हो सकते हैं?
4. पुरातत्त्विदो द्वारा पाई जाने वाली सभी वस्तुओं की एक सूची बनाओ। इनमें से कौन-सी वस्तुएँ पत्थर की बनी हो सकती हैं?
5. साधारण स्त्री तथा पुरुष अपने कार्यों का विवरण क्यों नहीं रखते थे? इसके बारे में तुम क्या सोचती हो?
6. कम से कम दो ऐसी बातों का उल्लेख करो जिनसे तुम्हारे अनुसार राजाओं और किसानों के जीवन में भिन्नता का पता चलता है।
आओ करके देखें
Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में एक व्यक्ति को दिखाया गया है जो अपने चेहरे पर हाथ रखे हुए ऊपर की ओर देख रहा है। व्यक्ति की शारीरिक मुद्रा और चेहरे के भावों से यह निष्कर्ष निकलता है कि वह गहरी सोच में है या किसी बात को लेकर उलझन में है।
7. पृष्ठ 1 पर शिलेपकार शब्द का पता लगाओ। आज प्रचलित कम से कम पांच भिन्न-भिन्न शिलेपों की सूची बनाओ। क्या ये शिलेपकार (क) स्ट्री, (ख) पुरुष, (ग) स्त्री तथा पुरुष दोनों होते हैं?
8. अतीत में पुस्तकों किन-किन विषयों पर लिखी गई थीं? तुम इनमें से किन पुस्तकों को पढ़ना पसंद करोगी?

अध्याय 2

आरंभिक मानव की खोज में

तुषार की रेल्यात्रा
तुषार अपने एक रिश्तेदार की शादी में दिल्ली से चेनई जा रहा था। रेल में उसे खिड़ुकी वाली सीट मिल गई, जहाँ से वह बाहर का नजारा देखने में मगन हो गया। तेज दौड़ती गाड़ी से उसने देखा कि पेड़-पीथे, घर, खेत-खिलहान बड़ी तेजी से पीछे की ओर छूटते चले जा रहे थे। तभी उसके चाचा ने उसके कंथे पर हाथ रख कर कहा, “पता है लोगों ने मात्र डेढ़ु सौ साल पहले रेल से यात्रा करनी शुरू की थी? बस तो इसके कुछ दशक बाद आई। ” तुषार सोचने लगा, कि जब लोगों के पास आने-जाने के लिए तेज रक्तार वाली सविरयों नहीं थीं, तो क्या वे यात्रा ही नहीं करते थे। क्या वे अपनी सरी जिंदगी एक ही जगह पर बिता दिया करते थे? नहीं, ऐसी बात नहीं थी।
आरंभिक मानव : आंखर वे इधर-उधर क्यों घूमते थे?
हम उन लोगों के बारे में जानते हैं, जो इस उपमहाद्वीप में बीस लाख साल पहले रहा करते थे। आज हम उन्हें आखेटक-खाद्य संग्राहक के नाम से जानते हैं। भोजन का इतजাম करने की विधि के आधार पर उन्हें इस नाम से पुकारा जाता है। आमतौर पर खाने के लिए वे जंगली जानवरों का शिकार करते थे, मखिलयाँ और चिडिया पकड़ते थे, फल-मूल, दाने, पैथे-पतियाँ, अंडे इकट्ठा किया करते थे। हमारे उपमहाद्वीप जैसे गर्म देशों में पेड़-पैथों की अनगितत प्रजातियाँ मिलती हैं। इसीलिए पेड़-पैथों से मिलने वाले खाद्य पदार्थ भोजन के अत्यंत महल्पपूर्ण स्ोत थे। लेकिन यह सब कर पाना बिल्कुल आसान नहीं था। ऐसे कई जानवर हैं, जो हमसे ज्यादा तेज भाग सकते हैं और बहुत-से जानवर हम से ज्यादा ताकतवर भी होते हैं। जानवरों के शिकार, चिडिया या मखिलिया पकड़ने के लिए बड़ा सतक, जागरूक और तेज होना पड़ता है। पेड़-पौधों से खाना जुटाने के लिए यह जानना जरूरी होता है, कि कौन-से पेड़-पौध खाने योग्य होते हैं, क्योंकि कई तरह के पौधे विषैले भी होते हैं। साथ ही फलों के पकने के समय की जानकारी भी जरूरी होती है। ऐसे समुदायों में रहने वाले बच्चों के जान और गुणों का वर्णन करो। क्या तुममं ऐसे गुण और जान हैं? आखेटक-खाद संग्राहक समुदाय के लोगों के एक जगह से दूसरी जगह पर घूमते रहने के पीछे कम से कम चार कारण हो सकते हैं। पहला कारण यह कि अगर वे एक ही जगह पर ज्यादा दिनों तक रहते तो आस-पास के पौधों, फलों और जानवरों को खाकर समाप्त कर देते थे। इसलिए और भोजन की तलाश में इन्हे दूसरी जगहों पर जाना पड़ता था। दूसरा कारण यह कि जानवर अपने शिकार के लिए या फिर Hirpan और मवेशी अपना चारा दूढ़ने के लिए एक जगह से दूसरी जगह जाया करते हैं। इसीलिए, इन जानवरों का शिकार करने वाले लोग भी इनके पीछे-पीछे जाया करते हैं। तीसरा कारण यह कि पेड़ों और पैथो में फल-फूल अलग-अलग मौसम में आते हैं, इसीलिए लोग उनकी तलाश में उपयुक्त मौसम के अनुसार अन्य इलाकों में घूमते होंगे। और चौथा कारण यह है कि पानी के बिना किसी भी प्राणी या पेড়-पीछे का जीवित रहना संभव नहीं होता और पानी झीलों, झरनों तथा नदियों में ही मिलता है। यद्यपि कई नदियों और झीलों का पानी कभी नहीं सूखता, कुछ झीलों और नदियों में पानी बारिश के बाद ही मिल पाता है। इसीलिए ऐसी झीलों और नदियों के किनारे बसे लोगों को सूखे मौसम में पानी की तलाश में इधर-उधर जाना पड़ता होगा। इसके अलावा लोग अपने नाते-रिश्तेदारों या मित्रों से मिलने भी जाया करते होंगे। यहाँ यह स्मरण रखना जरूरी है, कि ये सभी लोग पैदल यात्रा किया करते थे। तुम स्कूल कैसे जाते हो? तुम्हे अपने घर से स्कूल पैदल जाने में कितना समय लगता है? अगर तुम बस या साइक्िल से जाओ तो स्कूल पहुँचने में कितना समय लगेगा?
Image summary: यह एक व्यक्ति का पोर्ट्रेट चित्र है। इस चित्र में एक युवा पुरुष को दिखाया गया है जिसने कॉलर वाली शर्ट पहनी हुई है और वह सीधे कैमरे की ओर देख रहा है। चित्र से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह एक औपचारिक या अर्ध-औपचारिक मुद्रा में ली गई तस्वीर है जिसमें व्यक्ति के चेहरे के भाव गंभीर और स्थिर हैं।
आरंभिक मानव के बारे में जानकारी कैसे मिलती है?
पुरातत्त्वविदों को कुछ ऐसी वस्तुएँ मिली हैं जिनका निर्माण और उपयोग आखेटक-खाद संग्राहक किया करते थे। यह संभव है कि लोगों ने अपने कम के लिए पत्थरों, लकिड्यों और हिडुयों के औजार बनाए हैं। इनमें से पत्थरों के औजार आज भी बचे हैं। यहाँ पत्थरों के औजारों के कुछ उपयोग बताए गए हैं। ऐसे कामों की एक सूची बनाओ जिनमें इस तरह के औजार काम आते हैं। बताओ कि इनमें से कौन-कौन से काम सामान्य पत्थरों से किए जा सकते हैं। कारण सिंहित उत्तर दो। इनमें से कुछ औजारों का उपयोग फल-फूल काटने, हिडुयाँ और मांस काटने तथा पेड़ों की छाल और जानवरों की खाल उतारने के लिए किया जाता था। कुछ के साथ हिडुयां या लकिडियों के मुद्र लगा कर भाले और बाण जैसे हिथियार बनाए जाते थे। कुछ औजारों से लकिडिया की जाती थी। लकिडिया का उपयोग इधन के साथ-साथ श्लोपिड्यां और औजार बनाने के लिए भी किया जाता था। पत्थर से बने औजार (क) ये पत्थरों से बने प्राचीनतम औजार है। (ख) इन्हें कई हजार साल बाद बनाया गया। (ग) इन्हें और बाद में बनाया गया। (घ) इन्हे लगभग 10 हजार साल पहले बनाया गया था। (ड) और ये गुटिका (प्राकृतिक पत्थर) है। पत्थर के औजारों का उपयोग बाएं : इंसान के खाने योग्य जड़ों को खोदने के लिए किया जाता था, और दाएं : जानवरों की खाल से बने वस्त्रों को सिलने के लिए किया जाता था।
Image summary: यह एक फोटोग्राफ है। इस चित्र में पत्थर से बने प्राचीन औजारों के दो अलग-अलग पहलुओं को दिखाया गया है। इन औजारों की सतह पर कई खरोंचें और कटाव दिखाई देते हैं, जो यह संकेत देते हैं कि इन्हें किसी विशेष उद्देश्य के लिए तराशा गया था। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि ये आदिमानव द्वारा उपयोग किए गए हस्त-कुठार या इसी तरह के पत्थर के उपकरण हैं, जिन्हें काटने या पीसने जैसे कार्यों के लिए बनाया गया था।
Image summary: यह चित्र पुरातात्विक कलाकृतियों का एक संग्रह है। इसमें पत्थर के तीन अलग-अलग औजार दिखाए गए हैं जिन्हें तराश कर बनाया गया है। इन औजारों की बनावट और उनके किनारों को देखकर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि इनका उपयोग प्राचीन काल में काटने या छीलने जैसे कार्यों के लिए किया जाता था। इन उपकरणों की आकृति में भिन्नता उनके विशिष्ट उपयोगों की ओर संकेत करती है।
Image summary: यह एक वस्तु की तस्वीर है। इसमें एक खुरदरी और लंबी पत्थर जैसी संरचना दिखाई दे रही है जिसकी सतह असमान है। इस आकृति को देखकर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यह एक प्राचीन पत्थर का औजार या प्राकृतिक खनिज का टुकड़ा हो सकता है जिसका उपयोग काटने या खुरचने के लिए किया गया होगा।
Image summary: यह एक फोटोग्राफ है। इस चित्र में विभिन्न आकारों और बनावटों के तीन प्राचीन पत्थर के औजार दिखाए गए हैं। इन पत्थरों की बनावट से यह निष्कर्ष निकलता है कि इन्हें किसी विशेष उद्देश्य के लिए तराशा गया था, जो आदिमानव द्वारा उपयोग किए जाने वाले प्रारंभिक उपकरणों की विविधता को दर्शाता है।
Image summary: यह एक वस्तु की तस्वीर है। इसमें एक अनियमित आकार का पत्थर या खनिज का टुकड़ा दिखाया गया है जिसकी सतह असमान है। इस आकृति से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह एक प्राकृतिक पत्थर है जिसे किसी विशेष मशीन से तराशा नहीं गया है और इसकी बनावट खुरदरी है।
Image summary: यह एक वस्तु की तस्वीर है। इसमें एक प्राचीन पत्थर के औजार को दिखाया गया है जिसे तराश कर एक विशिष्ट आकार दिया गया है। इस आकृति से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह आदिमानव द्वारा उपयोग किया जाने वाला एक हस्त-कुठार या काटने का उपकरण रहा होगा, जिसे किसी कठोर सतह पर प्रहार करके बनाया गया है।
Image summary: यह चित्र विभिन्न प्रकार के पत्थर के औजारों का एक संग्रह है। इसमें अलग-अलग आकार और बनावट के नुकीले और धारदार पत्थरों को प्रदर्शित किया गया है, जो प्राचीन काल के उपकरणों की तरह दिखते हैं। इन औजारों की विविधता यह दर्शाती है कि इन्हें अलग-अलग कार्यों के लिए तैयार किया गया था, जिनमें से कुछ का उपयोग काटने के लिए और कुछ का उपयोग छेद करने या शिकार करने के लिए किया जा सकता था।
Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में एक तरफ एक हाथ को पौधे की जड़ों के पास मिट्टी खोदते हुए दिखाया गया है और दूसरी तरफ एक नुकीले पत्थर के औजार को दर्शाया गया है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि प्राचीन काल में मनुष्य ने अपनी बुनियादी जरूरतों और खेती जैसे कार्यों के लिए पत्थरों को तराश कर औजारों के रूप में उपयोग करना शुरू कर दिया था।
Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इसमें एक व्यक्ति को पत्थर के औजार बनाने की प्रक्रिया दिखाते हुए चित्रित किया गया है, जिसके साथ ही एक तैयार पत्थर का नुकीला औजार भी दिखाया गया है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि प्राचीन काल में मनुष्य पत्थरों को तराशकर उन्हें शिकार या अन्य कार्यों के लिए उपयोगी उपकरणों में बदलने की कला जानता था।
Figure ङ summary: यह एक फोटोग्राफ है। इसमें विभिन्न आकारों और बनावटों वाले तीन अलग-अलग पत्थरों को दिखाया गया है। इन पत्थरों की सतह चिकनी और अंडाकार प्रतीत होती है, जो प्राकृतिक रूप से घिसे हुए पत्थरों की विशेषता है। यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि ये पत्थर समय के साथ प्राकृतिक क्षरण या पानी के बहाव के कारण अपने वर्तमान गोल और चिकने रूप में परिवर्तित हुए हैं।
रहने की जगह निर्धारित करना
मानचित २ को देखो। लाल त्रिकोण वाले स्थान वे पुरासத்தில் हैं जहाँ पर आखेतक-खादह संग्राहकों के होने के प्रमाण मिले हैं। इनके अलावा भी और कई स्थानों पर आखेतक-खादह संग्राहक रहते थे। मानचित में सिर्फ कुछ गिने-चुने स्थान ही चिहित किए गए हैं। कई पुरासத்தில் नदियों और झीलों के किनारे पाए गए हैं। चूंकि पत्थर के उपकरण बहुत महत्वपूर्ण थे इसलिए लोग ऐसी जगह दूढ़ते रहते थे, जहाँ अच्छे पत्थर मिल सके। जहाँ लोग पत्थरों से औंजार बनाते थे, उन स्थलों को उद्योग-स्थल कहते हैं। हमं इन उद्योग-स्थलों के बारे में जानकारी कैसे मिलती है? आमतौर पर हमं ऐसी जगहों पर पत्थर के बड़े-बड़े टुकड़े मिलते हैं, और ऐसे उपकरण मिलते हैं, जिन्हें लोग इन स्थलों पर छोड़ गए होंगे क्योंकि वे ठीक नहीं बने होंगे। साथ ही औजार बनाने के बाद पत्थरों के टूटे-फूटे टुकड़े भी इन स्थलों पर मिलते हैं। कभी-कभी लोग इन स्थलों पर कुछ ज्यादा समय तक रहा करते थे। ऐसे स्थलों को आवासीय और उद्योग-स्थल कहते हैं। भीमबेतका (आधुनिक मध्य प्रदेश) आवासीय पुरास்தल उन्हें कहते हैं जहाँ लोग रहा करते थे। इनमें गुफाओं और कन्दराओं जैसे वे स्थल होते हैं, जिन्हें यहाँ दर्शाया गया है। लोग इन गुफाओं में इसलिए रहते थे, क्योंकि यहाँ उन्हें बारिश, धूप और हवाओं से राहत मिलती थी। ऐसी प्राकृतिक गुफाएँ विष्य और दककन के पर्वतिय इलाकों में मिलती हैं जो नर्मा घाटी के पास हैं। क्या तुम बता सकते हो कि रहने के लिए लोगों ने यह जगह क्या चुनी होगी? अगर तुम्हे अपने निवास स्थान के बारे में बताना पड़े तो तुम इनमें सैकौन-सा नाम चुनोगे?
Image summary: यह एक प्राकृतिक दृश्य की तस्वीर है। इस चित्र में विभिन्न परतों वाली विशाल चट्टानों की एक संरचना दिखाई गई है, जिसमें पत्थर के प्राकृतिक कटाव और दरारें स्पष्ट रूप से नजर आ रही हैं। चट्टानों के बीच कुछ स्थानों पर छोटी वनस्पतियां और घास उगी हुई है, जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यह एक पहाड़ी या पथरीला इलाका है जहाँ समय के साथ प्राकृतिक क्षरण हुआ है और कठोर परिस्थितियों में भी जीवन विकसित हुआ है।
Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में दो हाथों को दिखाया गया है जिनमें से एक हाथ दूसरे हाथ में रखे पत्थर पर एक अन्य पत्थर से प्रहार कर रहा है। यह दर्शाता है कि प्राचीन काल में मानव पत्थरों को आपस में टकराकर उन्हें नुकीला बनाने या औजार तैयार करने की प्रक्रिया का उपयोग करता था।
- (क) आवास
- (ख) उद्योग-स्थल
- (ग) आवास और उद्योग-स्थल
- (ऑ) अन्य
Figure 2 summary: यह एक मानचित्र है। इसमें भारत के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में स्थित महत्वपूर्ण पुरास्थलों और आधुनिक शहरों के स्थानों को दर्शाया गया है। मानचित्र से यह निष्कर्ष निकलता है कि प्राचीन बस्तियाँ और पुरास्थल मुख्य रूप से नदियों के किनारे और प्राकृतिक गुफाओं के पास स्थित थे, जो प्राचीन मानव सभ्यता के विकास में जल स्रोतों और प्राकृतिक आश्रयों की महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाता है।

पुरास्थल

पुरास्थल उस स्थान को कहते हैं जहाँ औंजार, बतन और इमारतो जैसी वस्तुओं के अवशेष मिलते हैं। ऐसी वस्तुओं का निर्माण लोगों ने अपने काम के लिए किया था और बाद में वे उन्हें वहीं छोड़ गए। ये जमीन के ऊपर, अंदर, कभी-कभी समुद्र और नदी के तल में भी पाए जाते हैं। इन पुरास्थलों के बारे में आपको अगले अर्थायों में बताया जाएगा।

पांचாण और्जारों का निम्नलिखित उल्लेख कर सकता है:

पांག་ उपकरणों को प्राय: दो तरिकों से बनाया जाता था।
1. पत्थर से पत्थर को टकराना। यानी जिस पत्थर से कोई औजार बनाना होता था, उसे एक हाथ में लिया जाता था, और दूसरे हाथ से एक पत्थर का हथौड़ी जैसा इस्तेमाल होता था। इस तरह आघात करने वाले पत्थर से दूसरे पत्थर पर तब तक शलक निकाले जाते हैं जब तक विछित आकार वाला उपकरण न बन जाए।
2. दूसरे तरीकों को 'दवाव शलक-तकनीक' कहा जाता है। इसमें क्रोड को एक स्थर सतह पर टिकाया जाता है और इस क्रोड पर हबुरी या पत्थर रखकर उस पर हथौडिनुमा पत्थर से शलक निकाले जाते हैं जिससे वांछित उपकरण बनाए जाते हैं।

आग की खोज

मानचित 2 में कुरूल गुफा दूढ़ों (पृष्ठ 14)। यहाँ राख के अवशेष मिले हैं। इसका मतलब यह है कि आर्भिभक लोग आग जलाना सीख गए थे। आग का इस्तेमाल कई कार्यों के लिए किया गया होगा जैसे कि प्रकाश के लिए, मांस भूनने के लिए और खतरनाक जानवें को दूर आदि भगाने के लिए। आज हम आग का उपयोग किसलिए करते है?

बदलती जलवायु

लगभग 12,000 साल पहले दुनिया की जलवायु में बड़े बदलाव आप और गमीं बढ़ने लगी। इसके परिणामस्वरूप कई क्षेत्रों में घास वाले मैदान बनने लगे। इससे हरण, बारहर्षिंधा, भेड़, बकरी और गाय जैसे उन जानवरों की संख्या बढ़ी, जो घास खाकर जिन्दा रह सकते हैं। जो लोग इन जानवर्गों का शिकार करते थे, वे भी इनके पीछे आए और इनके खाने-पीने की आदतों और प्रजनन के समय की जानकारी हासिल करने लगे। हो सकता है कि तब लोग इन जानवरों को पकड़ कर अपनी जरूरत के अनुसार पालने की बात सोचने लगे हैं। साथ ही इस काल में मछली भी भोजन का महत्वपूर्ण स्ोत बन गई। इसी दौरान उपमहाद्वीप के भिन्न-भिन्न इलाकों में गेहू, जौ और धान जैसे अनाज प्राकृतिक रूप से उगने लगे थे। शायद महिलाओं, पुरुषों और बच्चों ने इन अनाजों को भोजन के लिए बटोरना शुरू कर दिया होगा।

नाम और तिथियों

हम जिस काल के बारे में पहुंच रहे हैं, पुरातत्त्वविदों ने उनके बड़े-बड़े नाम रखे हैं। आरंभिक काल को वे पुरापाषाण काल कहते हैं। यह दो शब्दों पूरा यानी 'प्राचीन', और पाषाण यानी 'पत्थर' से बना है। यह नाम पुरासथलों से प्राप्त पत्थर के औजारों के महत्व को बताता है। पुरापाषाण काल बीस लाख साल पहले से 12,000 साल पहले के दौरान माना जाता है। इस काल को भी तीन भागों में विभाजित किया गया है : 'आरंभिक', 'मध्य' एवं 'उत्तर' पुरापाषाण युग। मानव इतिहास की लगभग 99 प्रतिशत कहानी इसी काल के दौरान घित्त हुई। जिस काल में हमें पयोरवणीय ब्दलाव मिलते हैं, उसे 'मैसोलिथ' यानी मध्यपाषाण्य युग कहते हैं। इसका समय लगभग 12,000 साल पहले से लेकर 10,000 साल पहले तक माना गया है। इस काल के पाषाणन औजार आमतौर पर बहुत छोटे होते थे। इन्हें 'माइक्रोलिथ' यानी लघुपाषाण्य कहा जाता है। प्राय: इन औजारों में हिडुयो या लकडियों के मुझे लगे हिंसिया और आरी जैसे औजार मिलते थे। साथ-साथ पुरापाषाण्य युग वाले औजार भी इस दौरान बनाए जाते रहे। पृष्ठ 13 पर बने चित्र देखो। इस दौरान बनाए गए औजारों में तुम्हे कोई बदलाव दिखाई देता है? अगले युग की शुरुआत लगभग 10,000 साल पहले से होती है। इसे नवपाषाण युग कहा जाता है। अगले अध्याय में तुम नवपाषाण युग के बारे में पढ़ोगे। नवपाषाण का क्या मतलब होता होगा? हमने कुछ स्थानों के नाम दिए हैं। अगले अभ्यायों में तुम्हे ऐसे अनेक नाम मिलेगी। अकसर हम पुराने स्थानों के लिए उन नामों का प्रयोग करते हैं, जो आज प्रचलित हैं, क्योंकि हमें शांत नहीं है कि उस काल में इनके क्या नाम रहे होंगे। साथ ही वे यह भी सीखने लगे होंगे कि यह अनाज कहाँ उगते थे और कब पककर तैयार होते थे। ऐसा करते-करते लोगों ने इन अनाजों को खुद पैदा करना सीख लिया होगा।

शैल चित्रकला : इनसे हमं क्या पता चलता है?

Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में दो आकृतियाँ दिखाई गई हैं जिनमें से एक आकृति दूसरी आकृति को खींच रही है। यह दृश्य किसी प्रकार के संघर्ष या नियंत्रण को दर्शाता है जहाँ एक पक्ष दूसरे पक्ष पर हावी है।
एक शैल चित्र। इस चित्र के बारे में बताओ। जिन गुफाओं में लोग रहते थे, उनमें से कुछ की दीवारों पर चित्र मिले हैं। इनमें कुछ सुन्दर उदाहरण मध्य प्रदेश और दक्षिणी उत्तर प्रदेश की गुफाओं से मिले चित्र हैं। इनमें जंगली जानवेंरों का बड़ी कुशलता से सजीव चित्रण किया गया है।

कौन क्या करता था?

हमने पढ़ा कि आरंभिक लोग शिकार तथा फल-मूल का संग्रह किया करते थे। वे पत्थरों के औजार और गुफाओं में चित्र बनाते थे। क्या हमें कोई ऐसे साध्य मिलते हैं जिनसे पता चले कि महीलाएँ शिकार करती थीं या पुरुष और जीरा बनाते थे या फिर महीलाएँ चित्रकारी करती थीं और पुरुष फल-मूल इकल्य करते थे? वास्तव में, हमं इसका जान नहीं है। लेकिन दो बातें हो सकती हैं। महीला और पुरुष दोनों ने मिलकर कई काम एक साथ किया होगा। यह भी संभव है, कि कुछ तरह के काम केवल महीलाएँ करती थीं और कुछ केवल पुरुष। इसके अलावा उपमहाद्वीप के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग परम्पराएँ भी रही होगी।

भारत में शुतुरमुंगि!

भारत में पुरापाषाण युग के दौरान शुतुर्मुंग होते थे। महाराष्ट्र के पटने पुरास्थल से शुतुर्मुंग के अडों के अवशेष मिले है। इनके कुछ खिलकों पर चित्रकान भी मिलता है। इन अंडों से मनके भी बनाए जाते थे। इन मनकों का उपयोग किसलिए किया गया होगा? आज हमे शुतुर्मुर्ग कहाँ मिलते है? हमारे अतीत-1

हूंसी का सूक्ष्म-निरीक्षण

मानचित २ पर हँसी द्वी्ढ़ए (पृष्ठ 14)। यहाँ पर पुरापाषाण युग के कई पुरास्थल मिले थे। कुछ पुरास्थलों से अलग-अलग कार्यों में लाए जाने वाले कई प्रकार के औजार मिले थे। ये संभवत: आवास और उद्योग-स्थल रहे होंगे। कुछ छोटे पुरासथलों में भी औजारों के बनाए जाने के प्रमाण मिले हैं। इनमें से कुछ पुरासथल झरनों के निकट थे। अधिकांश औजार चूना-पत्थरों से बनाए जाते थे। क्या तुम दूसरे प्रकार के पुरास्थलों के नाम बता सकते हो?

अन्यत्र

- अपने एट्लस में फ्रांस दूढ़ों। यह चित्र फ्रांस की एक गुफा का है। इस पुरासथल की खोज लगभग 100 साल पहले चार स्कूली छात्रों ने की थी। इस तरह के चित्र लगभग 20,000 साल पहले से लेकर 10,000 साल पहले के बीच बनाए गए होंगे। इनमें कई जानवरों के चित्र हैं। इनमें जंगली घोड़े, गाय, मैस, गैंडा, रेनडीयर, बारहसिधा और सूअरों को गहरे-चमकीले रोगों से चिश्रत किया गया है।
इन रोगों को लौह-अयस्क और चारकोल जैसे खनिज पदाथों से बनाया जाता था। यह संभव है कि इन चिट्रों को उत्सवों के अवसर पर बनाया जाता था या फिर इन्हें शिकारियों द्वारा शिकार पर निकलने से पहले कुछ अनुष्ठानों के लिए बनाया गया होगा। क्या तुम इन्हें बनाने का कोई और कारण बता सकते हो? उपयोगी शब्द आखेतक-खाद संग्राहक पुरास्थल उद्योग-स्थल आवासीय-स्थल पुरापाषाण मध्यपाषाण लघुपाषाण
Image summary: यह एक प्राचीन गुफा चित्र है। इस चित्र में दो बड़े जंगली जानवरों को दर्शाया गया है जो आपस में आमने-सामने हैं। यह कलाकृति दर्शाती है कि आदिमानव प्रकृति और वन्यजीवों के साथ अपने गहरे संबंध को व्यक्त करने के लिए गुफाओं की दीवारों का उपयोग करते थे।
कुछ महत्वपूर्ण तिथियाँ
- मध्यपाषाण युग (12,000-10,000 साल पहले)
- नवपाषाण युग का आरंभ (10,000 साल पहले)
तुम आज से 12,000 साल पहले पत्थर की एक गुफा में रहते हो। पृष्ठ 15 पर देखो। तुम्हारे मामा गुफा की एक भीति दीवार पर चित्र बना रहे हैं और तुम उनकी सहायता करना चाहते हो। तुम रंग बनाओगे, रखाएँ खींचोगे या फिर उनमें रंग भरोगे? तुम्हारे मामा तुम्हे कौन-कौन सी कहानियों सुनाएंगे?

आओ याद करें

1. इन वाक्यों को पूरा करो।
Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में एक छोटी लड़की को दिखाया गया है जो एकाग्रता के साथ एक किताब पढ़ रही है। यह चित्र पढ़ने की आदत और शिक्षा के प्रति रुचि को दर्शाता है।
(क) आखेटक-खाद संग्राहक गुफाओं में इसलिए रहते थे क्योंकि —।
(ख) घास वाले मैदानों का विकास ___ साल पहले हुआ।
(ग) आरंभिक लोगों ने गुफाओं की _____ पर चित्र बनाए।
(घ) हूँसी में ___ से औजार बनाए जाते थे।
2. उपमहाद्रिप के आधुनिक राजनीतिक मानचितर को पृष्ठ 136 पर देखो। उन राज्यों को दूढ़ों जहाँ भीमबेटका, हूँसी और कुरूल स्थित हैं। क्या तुषार कींरल इन जगहों के पास से होकर गई होगी?

आओं चर्चों करें

Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में दो बच्चे एक साथ चलते हुए और आपस में बातचीत करते हुए दिखाई दे रहे हैं, जिनमें से एक ने पीठ पर बस्ता टांगा हुआ है। चित्र से यह निष्कर्ष निकलता है कि बच्चे खुश हैं और संभवतः स्कूल जा रहे हैं या स्कूल से वापस आ रहे हैं।
3. आखेटक-खाद संग्राहक एक स्थान से दूसरे स्थान पर क्यों घूमते रहते थे? उनकी यात्रा और आज की हमारी यात्रा के कारणों में क्या समानताएँ या क्या भिन्नताएँ हैं?
4. आज तुम फल काटने के लिए कौन-से औजार चुनोगे? वह औजार किस चीज से बना होगा?
5. आखेटक-खाद संग्राहक आग का उपयोग किन-किन चीजों के लिए करते थे? क्या तुम आज आग का उपयोग इनमें से किसी चीज के लिए करोगे!

आओ करके देखें

Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में एक व्यक्ति को दिखाया गया है जो सोच विचार की मुद्रा में है और उसने अपने हाथों को अपने चेहरे के पास रखा हुआ है। व्यक्ति के चेहरे के भावों और उसकी दृष्टि से यह निष्कर्ष निकलता है कि वह किसी गहरी सोच में है या किसी समस्या का समाधान खोजने का प्रयास कर रहा है।
6. अपनी पुस्तिका के पने पर एक लाइन खींचकर इसके दो खाने बनाओ। बाँड़ खाने में, उन खाद्य पदार्थों की सूची बनाओ, जिन्हें आखेटक-खाद्य संग्राहक खाते थे (पृष्ठ 11 पर देखो) और दाएं खाने में तुम जो चीजें खाते हो उनमें से कुछ के नाम लिखो। क्या तुम्हे इन दोनों में कोई समानता या भेद दिखाई देता है?
7. यदि तुम्हारे पास कोई गुर्तिका (प्राकृतिक पत्थर का टुकड़ा, जैसे कि (पृष्ठ 13 पर दिखाया गया है) हो तो उसे किस काम के लिए इस्तेमाल करोगे?
8. ऐसे दो काम लिखो जिन्हें आज महिलाएँ और पुरुष दोनों करते हैं। दो ऐसे काम बताओ जिन्हें सिर्फ महीलाएँ ही करती हैं और दो वे जिन्हें सिर्फ पुरुष ही करते हैं। अपनी सूची की अपने दो साधियों की सूचीयों से तुलना करो। क्या तुम्हे इनमें कोई समानता या भेद दिखाई दे रहा है?

अध्याय 3

भोजन : संग्रह से उत्पादन तक

Image summary: यह एक पोर्ट्रेट तस्वीर है। इस चित्र में एक युवा लड़की का चेहरा दिखाया गया है जिसने सिर पर एक हेयरबैंड पहना हुआ है। तस्वीर से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह व्यक्ति शांत मुद्रा में है और सीधे कैमरे की ओर देख रहा है।

नेइनुओं का भोजन

आज नेनुओ अपना पसंदीदा खाना खा रही थी-चावल, स्क्वांश, कद्दू, बीन्स और गोशत। स्क्वांश, कद्दू और बीन्स उसकी नानी ने अपने घर के पिछवाड़े के छोटे से बगीचे में ही उगाया था। खात-खात नेइनुओ को पिछले दिनों अपनी स्कूल की तरफ से की गई यात्रा के दौरान मध्य प्रदेश में खाए खाने की याद आ गई। वह कितना मसालदार था। पर वह ऐसा क्या था?

विभिन्न प्रकार के भोजन

आज हमं अपने भोजन का अधिकांश हिस्सा उगाई गई फ्रांसलों और पालें गए पशुओं से मिलता है। भिन्न-भिन्न फ्रासलों को उगाने के लिए भिन्न-भिन्न जलवायु की आवश्यकता पड़ती है जैसे धान की खेती के लिए गेहू या जो की तुलना में ज्यादा पानी की ज़रूरत पड़ती है। इसीलिए हम देखते हैं कि किसान विशेष फ्रासल विशेष थेत्रों में ही उगाते हैं। यही नहीं पशुओं को भी अपने अनुकूल वातावरण की आवश्यकता होती है। उदाहरण के तौर पर हम देख सकते हैं कि सूची और पहाड़ी जलवायु में मविशायी की तुलना में भेड़ या बकरी अधिक सहजतापूर्वक जीवित रह सकते हैं। पर जैसाकि तुमने अध्याय २ में पढ़ा है, स्त्री-पुरुषों ने अपने भोजन का उत्पादन हमेशाना नहीं किया।

खेती और पशुपालन की शुरुआत

अध्याय 2 में हमने पढ़ा है कि दुनिया की जलवायु बदलती रही है। साथ ही लोग जिन वनस्तियों और पशुओं का भोजन के रूप में इस्तेमाल करते थे, वे भी बदलते रहे। लोगों का ध्यान कुछ बातों की ओर गया जैसे खाने योग्य वनस्तियों कहाँ-कहाँ मिल सकती हैं, बीज कैसे अपनी डंठल से टूट कर गिरेते हैं, गिरे बीजों का अंकुरण और उनसे पैथो का निकलना आदि। इसी तरह उन्होंने पौधों की देखभाल करनी शुलू कर दी होगी। चिडियों और जानवर्ण से पौधों की सुरक्षा की होगी, ताक वै टीक से बढ़ सके और उनके बीज पक सके। इस प्रकार धीरे-धीरे वे कृषक बन गए होंगे। इसी तरह लोगों ने अपने घरों के आस-पास चारा रखकर जानवरों को आकर्षित कर उन्हें पालतू बनाया होगा। सबसे पहले जिस जंगली जानवर को पालतू बनाया गया वह कुछ का जंगली पूर्ववां था। धीरे-धीरे लोग भेड़, बकरी, गाय और सूअर जैसे जानवरों को अपने घरों के नजदीक आने को उत्साहित करने लगे। ऐसे जानवर खुण्ड में रहते थे और ज्यादातर घास खाते थे। अक्सर लोग अन्य जंगली जानवरों के आक्रमण से इनकी सुरक्षा किया करते थे और इस तरह धीरे-धीरे वे पशुपालक बन गए होंगे। क्या तुम बता सकती हो कि सबसे पहले कुतों को ही पालतू क्या बनाया गया?
बसने की प्रक्रिया
लोगों द्वारा पौधे उगाने और जानवरों की देखभाल करने को 'बसने की प्रक्रिया' का नाम दिया गया है। अपनाए गए ये पौधे तथा जानवर अक्सर जंगली पौधों तथा जानवरों से भिन्न होते हैं। इसकी वजह यह है कि बसने की प्रक्रिया की दिशा में अपनाए गए पौधों या जानवरों का लोग चयन करते हैं। उदाहरण के तौर पर लोग उन्होंने पौधों तथा जानवरों का चयन करते हैं जिनके बीमार होने की संभावना कम हो। यही नहीं, लोग उन्होंने पौधों को चुनते हैं जिनसे बड़े दाने वाले अनाज पैदा होते हैं; साथ ही जिनकी मजबूत डंठले अनाज के पके दानों के भार को संभाल सके। ऐसे पौधों के बीजों को संभालकर रखा जाता है ताकि फिर से उगाने के लिए उनके गुण सुरक्षित रह सके। उन्हीं जानवरों को आगे प्रजनन के लिए चुना जाता है, जो आमतौर पर अहिंसक होते हैं। इसलिए हम देखते हैं कि पाले गए जानवर तथा कृषि के लिए अपनाए गए पौथे, जंगली जानवरों तथा पौथों से धीरे-धीरे भिन्न होते गए। मिसाल के तौर पर जंगली जानवरों की तुलना में पालतू जानवरों के दाँत और सींग छोटे होते हैं। इन दाँतों को देखो। इनमें से कौन-सा जंगली सूअर का है और कौन-सा पालतू सूअर का? बसने की प्रक्रिया पूरी दुनिया में धीरे-धीरे चलती रही। यह करीब १२,००० साल पहले शुरू हुई। वास्तव में आज हम जो भोजन करते हैं वो इसी बसने की प्रक्रिया की वजह से है। कृषि के लिए अपनाई गई सबसे प्राचीन फसलों में गेहू तथा जौ आते हैं, उसी तरह सबसे पहले पालतू बनाए गए जानवरों में कुछ के बाद भेड़-बकरी आते हैं।
Image summary: यह एक वास्तविक वस्तु की तस्वीर है। इस चित्र में दो अलग-अलग आकार के दांतों के समूह दिखाए गए हैं जो एक साथ जुड़े हुए हैं। यह स्पष्ट है कि दाईं ओर का समूह बाईं ओर के समूह की तुलना में काफी बड़ा और अधिक विकसित है, जिससे उनके आकार के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर का पता चलता है।
अनाज के उपयोग
Image summary: यह एक सूचनात्मक चित्र है। इस चित्र में एक बोरी में रखे अनाज को दिखाया गया है और उसके साथ अनाज के विभिन्न उपयोगों की सूची दी गई है। इस चित्र से यह निष्कर्ष निकलता है कि अनाज का उपयोग बीज, खाद्य सामग्री, उपहार और भंडारण जैसे कई महत्वपूर्ण उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है।
खाद के रूप में उपहार के रूप में भंडारण के लिए

एक नवीन जीवन-शैली

तुम किसी पौथे के बीज को बो कर देखो, तुम पाओंगी कि इसे विकसित होने में कुछ वक्त लगा है। इसमें कुछ दिन, महीने या फिर साल तक लग सकता है। इसलिए जब लोग पौथे उगाने लगे तो उनकी देखभाल के लिए उन्हें एक ही जगह पर लंबे समय तक रहना पड़ा था। बीज बोने से लेकर फसलों के पकने तक, पौथे की सिंचाई करने, खरपतवार हटाने, जानवरी और चिडियों से उनकी सुरक्षा करने जैसे बहुत-से काम शामिल थे। कटई के बाद, अनाज का उपयोग बहुत संभाल कर करना पड़ता था। अनाज को भोजन और बीज, दोनों ही रूपों में बचा कर रखना आवश्यक था, इसलिए लोगों को इसके भेदारण की बात सोचनी पड़ी। बहुत-से इलाकों में लोगों ने मिहद्वी के बड़े-बड़े बर्तन बनाए, टोकिरियाँ बुनी या फिर जमीन में गड्ढा खोदा। क्या तुम्हे लगता है कि शिकारी या भोजन-संग्रह करने वाले बर्तन बनाते और उनका प्रयोग करते होंगे? अपने जवाब का कारण बताओ।

जानवर : चलते-फिरते 'खाद-भंडार'

जानवर बच्चे देते हैं जिससे उनकी संख्या बढ़ती है। अगर जानवर्ों की देखभाल की जाएं तो उनकी संख्या तो बढ़ती हो है। यश ही उनसे दूध भी प्राप्त हो सकता है जो भोजन का एक अच्छा स्ोत है। यही नहीं जानवर्ों से हमें मांस भी मिलता है। दूसरे शब्दों में, पशु-पालन भोजन के 'भेदारण' का एक तरीका है। भोजन के अतिरिक्त जानवें रों से और क्या-क्या मिल सकता है? आज जानवें रों का उपयोग किस लिए होता है?

आओ, आर्भिभक कृषकों और पशुपालकों के बारे में पता करें?

मानचित २ (पृष्ठ संख्या 14) देखो। क्या तुम्हे कई नीले वर्ग दिख रहे हैं? पता है, इनमें से प्रत्येक बिंदु उस जगह को दर्शाता है, जहाँ पुरातत्त्वविदों को शुरुआती कृषकों और पशुपालकों के होने के साध्य मिले हैं। ये पूरे उपमहाद्रिप में पाए गए हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण पश्चिमोत्तर क्षेत्र में, आधुनिक कشمीर में, और पूर्वी तथा दक्षिण भारत में पाए गए हैं। वास्तव में ये निर्देश स्थान कृषको और पशुपालको की बस्तियाँ थीं या नहीं, इसे जाँचने के लिए वैशानिक खुदाई में मिले पौधों और पशुओं की हिडुयों के नमनों का अध्ययन करते हैं। इनमें से सबसे रोचक जले हुए अनाज के दानों के अवशेष हैं। ऐसा लगता है कि ये गलती से या फिर जानबूझ कर जलाए गए होंगे। वैशानिक इन अनाज के दानों की पहचान कर सकते हैं। इस तरह हमें पता चलता है कि इस उपमहाद्रिप के विभिन्न भागों में बहुत सारी फ्रांसल उगाई जाती रही होंगी। वैशानिक विभिन्न जानवरों की हिडुयों की भी पहचान कर सकते हैं। नीचे की तालिका से तुम यह जान सकती हो कि कहाँ-कहाँ अनाजों और पालतू जानवरों की हिडुयों के अवशेष मिले हैं।
Table summary: यह तालिका विभिन्न पुरास्थलों से प्राप्त अनाज और पशु अवशेषों के वितरण को दर्शाती है। इसमें यह स्पष्ट है कि अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में खेती की जाने वाली फसलों और पाले गए पशुओं की विविधता रही है, जिसमें मुख्य रूप से गेहूँ, जौ, चावल और बाजरा जैसे अनाज तथा मवेशी, भेड़ और बकरी जैसे जानवरों के प्रमाण मिलते हैं।

स्थानी जीवन की ओर

पुरातत्त्वविदों को कुछ पुरात्त्वलों पर झोपिड्यों और घरों के निशान मिले हैं। जैसे कि बुर्जेहोंम (वर्तमान कश्मीर में) के लोग गड़े के नीचे घर बनाते थे जिन्हें गत्वास कहा जाता है। इनमें उत्तरने के लिए सीडियों होती थी। इससे उन्हें ठंक के मौसम में सुरक्षा मिलती होगी। पुरात्त्वविदों को झोपिड्यों के अंदर और बाहर दोनों ही स्थानों पर आग जलाने की जगहें मिली हैं। ऐसा लगता है कि लोग मौसम के अनुसार घर के अंदर या बाहर खाना पकाते होंगे।
एक गतिवास का चित्र बनाओ।
बहुत सारी जगहों से पत्थर के औजार भी मिले हैं। इनमें से कई ऐसे हैं, जो पुरापाषाणयुगीन उपकरणों से भिन्न हैं। इसीलिए इन्हें नवपाषाण युग का माना गया है। इनमें वे औजार भी हैं, जिनकी धार को और अधिक पैना करने के लिए उन पर पॉलिस चढ़ाई जाती थी। ओखली और मूसल का प्रयोग अनाज तथा वनस्पतियों से प्राप्त अन्य चीजों को पीसने के लिए किया जाता था। आज हजारों साल बाद भी ओखली और मूसल का प्रयोग अनाज पीसने के लिए किया जाता है। उसी तरह प्राचीन प्रस्तरयुगीन औजारों का निर्माण और प्रयोग लगातार होता रहा। कुछ औजार हिडुयों से भी बनाए जाते थे। को रखने के लिए किया जाता था। धीरे-धीरे लोग बर्तनों का प्रयोग खाना बनाने के लिए भी करने लगे। चावल, गेहू तथा दलहन जैसे अनाज अब आहार का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए थे। इसके साथ-साथ अब लोग कपड़े भी बुने लगे थे। इसके लिए कपासे जैसे आवश्यक पौधे उगाए जा सकते थे। क्या ये परिवर्तन हर जगह एक साथ ही आ गए होंगे? ऐसी बात नहीं है। एक तरफ जहाँ कई जगहों पर स्प्री-पुरुष शिकार और भोजन-संग्रह करने का काम करते रहे थे वहीं अन्य लोगों ने हजारों सालों के दरमयान धीरे-धीरे खेती और पशुपालन को अपना लिया। बहुत जगह लोग मौसम के முताबिक बदल-बदल कर अपनी जीविका चलाया करते थे।
Image summary: यह चित्र विभिन्न पुरातात्विक कलाकृतियों का एक संग्रह है। इसमें पत्थर के बने प्राचीन औजार दिखाए गए हैं जो आकार और बनावट में एक-दूसरे से भिन्न हैं। इन औजारों की बनावट से यह निष्कर्ष निकलता है कि इन्हें विशिष्ट कार्यों के लिए तराशा गया था, जहाँ कुछ औजार नुकीले और लंबे हैं जबकि अन्य छोटे और मोटे हैं, जो आदिमानव द्वारा उपयोग की जाने वाली विविध तकनीकों को दर्शाते हैं।

अन्य रीति-रिवॉज

पुरातत्त्वविद बहुत स्पष्ट रूप से इस बारे में कुछ नहीं कह सकते। विद्वानों ने ऐसे किसानों का अध्ययन किया है। इनमें प्राय: कृषक और पशुपालक समूह में रहते हैं जिन्हें जनजाति कहते हैं। विद्वानों ने पाया है कि ये लोग कुछ ऐसे रीति-रिवाजों को मानते हैं, जो संभवत: पहले से ही प्रचिलित रहे हैं।

जनवआति

Image summary: यह एक वस्तु की तस्वीर है। इसमें मिट्टी से बना एक प्राचीन बर्तन दिखाया गया है जिसका आकार गोल है और ऊपर का हिस्सा संकरा है। इस बर्तन की बनावट और सतह को देखकर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यह काफी पुराना है और संभवतः किसी पुरातात्विक स्थल से प्राप्त हुआ है।
पाय: जनजाति के लोग छोटी-छोटी बस्तियाँ में रहते हैं। ज्यादातर परिवार एक-दूसरे से संबंधित होते हैं और इस तरह के परिवारों के समूह मिलकर जनजाति का निर्माण करते हैं।
• जनजاتی के सदस्य शिकार, भोजन-संग्रह, खेती, पशुपालन और मछली पकड़ने जैसे पेशे अपनाते हैं। अक्सर महीलाएँ खेती का सारा काम करती हैं। इसमें जमीन तैयार कर बीज बोने, पौधे की देखभाल करने से लेकर फसल काटने तक का काम शामिल है। बच्चे पौधों की देखभाल करते हैं और चिडियों और जानवर्ग को दूर भगते हैं ताकके वै पौधों और फसलों को नुकसान न पहुचाएं। महीलाएं फसल दावकर अनाज कूटती-पीसटी है। पुरष आमतौर पर पशुओं के बड़े-बड़े झुण्डों को चराते हैं जबकि बच्चे छोटे हुएंडो को। यहाँ जानवरों की सफाई तथा दूध निकालने का काम स्ली-पुरष दोनों मिलकर करते हैं। उसी तरह दोनों मिलकर बर्तन बनाने, टोकियाँ मुने, ओजार तथा झोपिड्यां बनाने का काम भी साथ-साथ करते हैं। गना, नाच और घरों की सजावट भी उनकी जिंदगी का एक अहम हिस्सा है।
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• कुछ व्यक्तियों को नेता मान लिया जाता है। वे अनुभवी वृद्ध व्यक्ति, नौजवान योद्धा या फिर पुरोहित हो सकते हैं। व्यस्क महिलाओं को भी उनके जान तथा अनुभव के लिए विशिष्ट सम्मान दिया जाता है।
• जनजतियों की सांस्कृतिक-परमराएँ बहुत समृद्ध तथा विविष्ट होती हैं। इनमें उनकी भाषाएँ, संगीत, कहानियाँ तथा चित्रकारी भी शामिल हैं। उनके अपने देवी-देवता होते हैं।
• जमीन, जंगल, घास के मैदान तथा पानी पूरे कुनबे की समचित मानी जाती है जिनका उपयोग सभी एक साथ करते हैं। इनमें गरिब और अमीर के बीच कोई खास अंतर नहीं होता। इसलिए जनजारीय समाज अन्य समाजों से भिन्न होते हैं। इन अन्य समाजों के बारे में तुम आगे पढ़ोगी।
पुरुषों द्वारा किए जाने वाले कामों की एक सूची बनाओ। महीलाएँ क्या-क्या काम करती हैं? कौन-से ऐसे काम हैं, जो स्पी-पुरुष दोनों करते हैं?
गाँव
गाँवों की यह विशेषता है कि वहाँ रहने वाले अधिकांश लोग भोजन उत्पादन में लगे होते हैं।

सूक्ष्म-निरीक्षण

(क) मेहरग्ग्द में जीवन-मृत्यु

मानचित्र 2 (पृष्ठ 14) में महाराष्ट्र दूढ़ो। यह इरान जाने वाले सबसे महत्वपूर्ण रास्ते, बोलन दर के पास एक हराभरा समतल स्थान है। महरगद॑ संभवत: वह स्थान है, जहाँ के स्त्री-पुरुषों ने, इस इलाके में सबसे पहले जौ, गेहूँ उगाना और भेड़-बकरी पालना सीखा। यहाँ खुदाई में सबसे पहले के सतर्मे से पुरातत्त्वविदों को विभिन्न प्रकार के जानवरों की हिडुयाँ मिलीं। इनमें हिरण तथा सूअर जैसे जंगली जानवरों की हिडुयां भी शामिल हैं। उसके बाद के सत्रों से भेড় और बकरियों की हिडुयां ज्यादा मिली हैं। उसके ऊपर ज्यादातर मवेशियों की ही हिदुयां मिली हैं, इससे ऐसा लगता है कि ये लोग मवेशियों को पालने लगे थे मेहरागढ़ में इसके अलावा चौकोर तथा आयताकार घरों के अवशेष भी मिले हैं। प्रत्येक घर में चार या उससे ज्यादा कमरे हैं, जिनमें से कुछ संभवत: भंदरण के काम आते होंगे।

पहले और बाद के स्तर

जब पुरातत्त्वविद् किसी जगह की खुदाई करते हैं तो वे कैसे समझते हैं कि कौन-से स्तर पहले के हैं और कौन-से बाद के? इस चित्र को देखो। मान लो लोगों ने सबसे पहले समतल भूमि (ستर 4) पर रहना शुरू किया। आमतौर पर लोग जहाँ रहते हैं, घर टूटने पर दुबारा वहीं घर बना लेते हैं। टूट-फूटे सामान और कूड़ा-करकट भी घरों के आस-पास जमा होते रहते हैं। इन कारणों से बस्ति की जमीन धीरे-धीरे ऊँचा होती रहती है और फिर सैकड़ों सालों के बाद वहाँ एक टीला बन जाता है। इसलिए जब टीले की खुदाई की जाती है, तो उसका सबसे निचला स्तर सबसे पुराना होता है और उसके बाद के स्तर, बाद के युगों के होते हैं। यही ऊपरी तथा निचली तहं आमतौर पर सतों के रूप में जानी जाती हैं। सत्र 2 और 3 को देखो। कौन-सा ज्यादा पुराना है? मत्यु के बाद सामान्यतया मृतक के सगे संबंधी उसके प्रति सम्मान जतते हैं। लोगों की आस्था है कि मृत्यु के बाद भी जीवन होता है। इसीलिए कब्रों में मृतकों के साथ कुछ सामान भी रखे जाते थे। महरग्ग्ल में ऐसी कई कर्बों मिली हैं। एक कब्र में एक मृतक के साथ एक बकरी को भी दफनाया गया था। संभवत: इसे परलोक में मृतक के खाने के लिए रखा गया होगा। मेहरगद की कब्रा का चित्र क्या तुम बकरी के कंकाल को पहचान सकते हो? मैहरगढ़ के घर का चित्र। मेहरगढ़ के घर शायद ऐसे दिखते हों। तुम जिस घर में रहते हो, उसके साथ इस घर की क्या समानता है?
Image summary: यह एक रेखाचित्र है। यह चित्र एक पहाड़ी या टीले की आंतरिक संरचना को दर्शाता है जिसमें विभिन्न स्तरों या परतों को क्रमांकित किया गया है। इस चित्र से यह निष्कर्ष निकलता है कि संरचना कई अलग-अलग स्तरों से बनी है, जहाँ ऊपरी परत सबसे छोटी है और निचली परतें अधिक विस्तृत क्षेत्र में फैली हुई हैं।
Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में मेहरगढ़ की एक कब्र के भीतर पाए गए विभिन्न कंकालों को दर्शाया गया है, जिसमें मानव और पशु अवशेषों का मिश्रण दिखाई देता है। इस चित्र से यह निष्कर्ष निकलता है कि प्राचीन समय में शवों के साथ जानवरों को दफनाने की परंपरा थी, जो उस समय की सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताओं को दर्शाता है।
Image summary: यह एक त्रिविमीय रेखाचित्र है। यह चित्र एक प्राचीन संरचना के आंतरिक विन्यास को दर्शाता है जिसमें कई छोटे कमरे और विभाजित क्षेत्र बने हुए हैं। इस संरचना के लेआउट से यह निष्कर्ष निकलता है कि इसका उपयोग आवासीय या भंडारण उद्देश्यों के लिए किया जाता था, जहाँ स्थान का कुशलतापूर्वक विभाजन किया गया है।
29 ■ उपयोगी शब्द कृषक पशुपालक नवपाषाण युग बर्तन जनजति गाँव घर कब्र

(ख) दाओंजली हेडिंग

मानचित 2 (पृष्ठ 14) में दाओजली हेडिंग दूढ़ों। यह पुरास्थल चीन और म्यांमार की ओर जाने वाले रास्ते में ब्रह्मपुत्र की घाटी की एक पहाड़ी पर है। यहाँ खरल और मूसल जैसे पथरों के उपकरण मिले हैं। इससे पता चलता है कि यहाँ लोग भोजन के लिए अनाज उगाते थे। साथ ही यहाँ से जेडाइट पत्थर भी मिला है। संभवत: यह पत्थर चीन से आया होगा। इसके अतिरिक्त इस पुरास्थल से काष्ठाश्म (अति प्राचीन लकड़ी, जो सखह होकर पत्थर बन गई है) के अंजार और बर्तन भी मिले हैं।
अन्यत्र
एटलस में तुर्की दूढ़ों। नवपाषाण युग के सबसे प्रसिद्ध पुरासथलों में एक चताल ह्यूक तुकी में है। यहाँ दूर-दराज स्थानों से कई चीजें लाई जाती थीं और उनका उपयोग किया जाता था। जैसे सीरिया से लाया गया चकमक पत्थर, लाल सागर की कौडियाँ तथा भूमध्य सागर की सीपियां। ध्यान रहे कि उस समय तक पिष्टे वाले बाहन का विकास नहीं हुआ था। लोग सामान खुद या जानवरों की पीठ पर लादेकर ले जाया करते थे। बताओ कौडियों तथा सीपियों का क्या उपयोग होता होगा?
कल्पना करो
अगर तुम्हारे पास जमीन का एक छोटा-सा टुकड़ा हो तो तुम उसमें कौन-सी फसल उगाओगी। बीज कहाँ से मिलोगे? और तुम उन्हें कैसे बोओंगी? अपने पौधां की देखभाल तुम कैसे करोगी? और कैसे यह समझोगी कि अब फसल काटने लायक हो गई है?
Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में एक लड़की को दिखाया गया है जो ध्यानपूर्वक एक किताब पढ़ रही है। इस चित्र से यह निष्कर्ष निकलता है कि लड़की पढ़ने की गतिविधि में पूरी तरह से लीन और प्रसन्न है।
1. खेती करने वाले लोग एक ही स्थान पर लंबे समय तक क्यां रहते थे?
2. पृष्ठ 25 की तालिका को देखो। नेइनुओ अगर चावल खाना चाहती है, तो उसे किन स्थानों पर जाना चाहिए।
3. पुरातत्त्वविद् ऐसा क्यों मानते हैं कि महरग्द के लोग पहले केवल शिकारी थे, और बाद में उनके लिए पशुपालन ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया?
4. सही या गलत बताओ।
(क) हल्लूर में ज्वार-बाजरा मिला है।
(ख) बुज़िहोम में लोग आयताकार घरों में रहते थे।
(ग) चिरांद कश्मीर का एक पुरासथल है।
(घ) जेडाइट, जो दाओजली होडिंग में मिला है, चीन से लाया गया होगा।
आओं चर्नी करें
5. कृषकों-पशुपालकों का जीवन आखेटक-खाद संग्राहकों के जीवन से कितना भिन्न था, तीन अंतर बताओ।
6. पृष्ठ 25 की तालिका में दिए गए जानवरों की एक सूची बनाओ और यह भी बताओ कि इनका उपयोग किस रूप में किया जाता था।
आओ करके देखें
7. तुम जिन अनाजों को खाते हो उनकी एक सूची बनाओ।
Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में दो बच्चे दिखाए गए हैं जो आपस में बातचीत करते हुए चल रहे हैं और उनमें से एक ने स्कूल बैग पहना हुआ है। चित्र से यह निष्कर्ष निकलता है कि बच्चे खुश हैं और संभवतः स्कूल जा रहे हैं या स्कूल से वापस आ रहे हैं।
Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में एक व्यक्ति को दिखाया गया है जो सोच में डूबा हुआ है और उसने अपना हाथ अपनी ठुड्डी और गाल पर रखा हुआ है। व्यक्ति के चेहरे के हाव-भाव और उसकी नजरें यह दर्शाती हैं कि वह किसी गहरी दुविधा में है या किसी समस्या का समाधान खोजने का प्रयास कर रहा है।
8. प्रश्न 7 के उत्तर में लिखे अनाजों को क्या तुम स्वयं उगाते हो? अगर हाँ, तो एक तालिका बनाकर उसकी खेती की विभिन्न अवस्थाओं को दिखाओ। अगर नहीं, तो एक तालिका बनाकर दिखाओ कि ये अनाज किसान से लेकर तुम्हारे पास तक कैसे पहुंचे।
- बसने की प्रक्रिया का आरंभ (लगभग 12,000 साल पहले)
- मोहराग्द में बस्ती का आरंभ (लगभग 8000 साल पहले)

अध्याय 4

आरंभिक नगर

Image summary: यह एक तस्वीर है। इस चित्र में दो लड़के दिखाई दे रहे हैं जिन्होंने अपने सिर पर पगड़ी पहनी हुई है और वे सीधे कैमरे की ओर देख रहे हैं। तस्वीर से यह निष्कर्ष निकलता है कि दोनों व्यक्ति एक ही सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से संबंधित हैं और उनके पहनावे से उनकी विशिष्ट पहचान झलकती है।
पुराने भवन का संरक्षण
जसपाल और हरप्रित अपने घर के पास की गली में क्रिकेट खेल रहे थे। उन्होंने देखा कि कुछ लोग उस खंदहर घर की तारीफ कर रहे थे, जिसे गली के बच्चे भुतहा घर कहा करते थे। एक ने कहा, 'इसकी वास्तुकला को देखो!' 'क्या आपने कहीं लकड़ी पर इतनी सुन्दर नककाशी देखी है?' दूसरी महीला ने कहा, 'हमें मंत्री जी को पत्र लिखकर कहना चाहिए कि वह इस खूबसूरत घर को सुरक्षित रखने के लिए इसकी मरममत कराने की व्यवस्था करें।' यह सब सुनकर जस्पाल और हरप्रित सोचने लगे, कि इस पुराने खंडहर से लोगों का इतना लगाव क्या हो सकता है?
हड़णा की कहानी
அகச்வர புருரணி ஏமார்த அபனி கஹனி ஐவாதி ஹி ஞஞிஷ 150 சால பஹலெ ஐவ பஹவம ஞஞலி ஹி ஞஞிஷ ஐவ ஞஞிஷ ஞஞலி ஹி ஞஞிஷ ஐவ ஞஞிஷ ஞஞலி ஹி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலி ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞஞிஷ ஞஞலi ஞ उसके बाद लगभग 80 साल पहले पुरातत्त्वविदों ने इस स्थल को दूढ़ा और तब पता चला कि यह खंडहर उपमहाद्रिप के सबसे पुराने शहर्ों में से एक है। चूंकि इस नगर की खोज सबसे पहले हुई थी, इसीलिए बाद में मिलने वाले इस तरह के सभी पुरासथलों में जो इमारतें और चौड़ाई मिली उन्हें हड्णता सभ्यता की इमारतें कहा गया। इन शहरों का निर्माण लगभग 4700 साल पहले हुआ था। प्राय: पुरानी इमारतो को तोड़कर उनकी जगह नए भवन बनाए जाते है। क्या तुम्हे लगता है कि पुरानी इमारतो को सुरक्षित रखना चाहिए?

इन नगरों की विशेषता क्या थी?

इन नगरों में से कई को दो या उससे ज्यादा हिस्सों में विभाजित किया गया था। प्राय: पश्चिमी भाग छोटा था लेकिन ऊँचाई पर बना था और पूर्व हिस्सा बड़ा था लेकिन यह निचले इलाके में था। ऊँचाई वाले भाग को पुरातत्त्विदो ने नगर-दुर्ग कहा है और निचले हिस्से को निचला-नगर कहा है। दोनों हिस्सों কী চারদীভার্থীয় পকি ইটে কী বনাই জাতি খী। ইসকী ইট ইতনী অবস্থী পকি থী কি হজার সালী বাদ আজ তক অনকী দীভর্জ বৃদ্ধি রহী। দীভার বনানে কে লিপ ইটে কী চিনাই ইস তরহ করতে খে জিসসে কি দীভার্থি বুঝ মজবুত রই। कुछ नगरों के नगर-दुर्ग में कुछ खास इमारतें बनाई गई थीं। मिसाल के तौर पर मोहनजोदड़ों में खास तलाबा बनाया गया था, जिसे पुरातत्त्वविदों ने महान स्नागार कहा है। इस तलाबा को बनाने में डेंट और प्लास्टर का इस्तेमाल किया गया था। इसमें पानी का रिसाव रोकने के लिए प्लास्टर के ऊपर चारकोल की परत चढ़ाई गई थी। इस सरोवर में दो तरफ से उतरने के लिए सीढ़ियाँ बनाई गई थीं, और चारों ओर कमरे बनाए गए थे। इसमें भरने के लिए पानी कुएँ से निकाला जाता था, उपयोग के बाद इस खाली कर दिया जाता था। शायद यहाँ विशिष्ट नागरिक विशेष अवसरों पर स्नान किया करते थे। कालिबणा और लोथल जैसे अन्य नगरों में अग्निकुण्ड मिले हैं, जहाँ संभवत: यह किए जाते होंगे। हड़पा, मोहनजोदडो और लोथल जैसे कुछ नगरों में बड़े-बड़े भंडार-गृह मिले हैं। ये नगर आधुनिक पाकिस्तान के पंजाब और सिंह प्रांतौर, भारत के गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और पंजाब प्रातों में मिले हैं। इन सभी स्थलों से पुरातल्विदों को अनोखी वस्तुएँ मिली हैं : जैसे मिट्टी के लाल बर्तन जिन पर कालरंग के चित्र बने थे, पत्थर के बाट, मुहर्त, मनके, ताँबे के उपकरण और पत्थर के लंबे ब्लेड आदि।
Figure 3 summary: यह एक मानचित्र है। इस चित्र में भारतीय उपमहाद्वीप के शुरुआती नगरों और प्रमुख नदियों के स्थान दर्शाए गए हैं, जिसमें सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के किनारे बसे विभिन्न प्राचीन शहरों को चिह्नित किया गया है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि प्राचीन सभ्यता के नगर मुख्य रूप से नदी घाटियों के समीप स्थित थे, जो यह दर्शाता है कि जल की उपलब्धता इन शुरुआती बस्तियों के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थी।
हृद्वा के नगरों में इटो की चिनाई
Image summary: यह एक वास्तविक स्थल की तस्वीर है। इस चित्र में एक प्राचीन सभ्यता के अवशेष दिखाए गए हैं, जिसमें ईंटों से बना एक बड़ा आयताकार जलाशय और उसके चारों ओर की संरचनाएं शामिल हैं। इस स्थल की बनावट से यह निष्कर्ष निकलता है कि उस समय के लोग उन्नत नगर नियोजन और जल प्रबंधन प्रणाली से परिचित थे, जो उनकी संगठित सामाजिक संरचना को दर्शाता है।

भवन, नाले और सड्कें

इन नगरों के घर आमतौर पर एक या दो मंजिलों होते थे। घर के आगन के चारों ओर कमरे बनाए जाते थे। अधिकांश घरों में एक अलग स्नानघर होता था, और कुछ घरों में कुएँ भी होते थे। कई नगरों में ढके हुए नाले थे। इन्हें सावधानी से सीधी लाइन में बनाया जाता था। हर नाली में हल्की ढलाने होती थी तिकी पानी आसानी से बह सके। अक्सर घरों की नारलियों को सड़कों की नारलियों से जोड़ दिया जाता था, जो बाद में बड़े नालों में मिल जाती थी। नाली के ढके होने के कारण इनमें जगह-जगह पर मनोहाल बनाए गए थे, जिनके जिरए इनकी देखभाल और सफाई की जा सके। घर, नाले और सडकों का निर्माण योजनाबद्ध तरीके से एक साथ ही किया जाता था। यहाँ पर विगित घरों और पिछले अध्याय में विगित घरों में तुम्हे क्या अंतर दिखाई देता है? कोई दो अंतर बताओ।
Image summary: यह एक पुरातात्विक स्थल की तस्वीर है। इस चित्र में ईंटों से बनी एक प्राचीन संरचना को दिखाया गया है जो सीढ़ीदार आकार में ऊपर की ओर जाती है, जिसके पास एक व्यक्ति और माप के लिए एक पैमाना रखा हुआ है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यह एक व्यवस्थित निर्माण कार्य था और इसकी ऊंचाई और बनावट को समझने के लिए वैज्ञानिक तरीके से खुदाई की गई है।

नगरिय जीवन

हृद्यांक के नगरों में बड़ी हलचल रहा करती होगी। यहाँ पर ऐसे लोग रहते हैं, जो नगर की खास इमारतें बनाने की योजना में जुटे रहते थे। ये संभवत: यहाँ के शासक थे। यह भी संभव है, कि ये शासक लोगों को भेड़ कर दूर-दूर से धातु, बहुमूल्य पत्थर और अन्य उपयोगी चीजें मंगावते थे। शायद शासक लोग खूबसूत मनकों तथा सोने-चौँदी से बने आभूषणों जैसी कीमती चीजों को अपने पास रखते होंगे। इन नगरों में लिपिक भी होते थे, जो मुहारें पर तो लिखते ही थे, और शायद अन्य चीजों पर भी लिखते होंगे, जो बच नहीं पाई हैं। इसके अलावा नगरों में शिलेपकार स्त्री-पुरुष भी रहते थे जो अपने घरों या किसी उद्योग-स्थल पर तरह-तरह की चीज़ बनाते हैं। लोग लंबी यात्राएँ भी करते थे, और वहाँ से उपयोगी वस्तुएँ लाते थे, और साथ ही लाते थे सुदूर देशों की किस-कहिनिया। मिट्री से बने कई खिलौने भी मिले हैं, जिनसे बच्चे खेलते होंगे। नगर में रहने वाले लोगों की एक सूची बनाओ। क्या इनमें से कुछ ऐसे लोग हैं, जो महाराष्ट्र जैसे गाँवों मरहते थे? सबसे ऊपर: मोहनजोद्यो की एक सड़क और उसमें बना लाला। ऊपर: एक कुओं। बाई और नीचे: हड़ण का एक मुहरी इस मुहर के ऊपर के चिह एक खास लिपि में है। उपमहारूप में पाए गए लेखन का यह प्राचीनतम उदाहरण है। विद्यानों ने इसे पढ़ने की कोशिश की है, लेकिन अभी तक यह पता नहीं चल पाया है कि इसका अर्थ क्या है। दाईं ओर नीचे: पकी मिट्टी के विलेती 35 ■ ऊपर: पत्थर के बाट देखो। कितने ध्यान से और उपयुक्त तरीकों से इन बाटों को बनाया गया है। इन्हें चर्टी पत्थर से बनाया गया था। इन्हें शायद बहुमूल्य पत्थर और धातुओं को तैलने के लिए बनाया गया होगा। मध्य में बाॉए मनके। इनमें से कई कान्रीलियन पत्थरों से बनाए गए थे। पत्थरों को काट और तराशकर मनके बनाए गए। इनके बीच छोड़ किए गाए थे ताकी धागा डालकर माला बनाई जाए। मध्य में दारें पत्थर के धारदार फलक नीचे दाएं: कढ़ाईदार वस्त्र। एक महत्वपूर्ण व्यक्ति की पत्थर से बनी मूर्ति जो मोहनजोदड़ों से मिली थी। इसमें उसे कढ़ाईदार वस्त्र पहने दिखाया गया है।
Image summary: यह एक प्राचीन नक्काशीदार पत्थर या टैबलेट की छवि है। इस चित्र में एक पशु की आकृति बनी हुई है जिसके ऊपर कुछ प्राचीन लिपियाँ या प्रतीक अंकित हैं और पशु के सामने एक पात्र जैसी वस्तु दिखाई दे रही है। इस आकृति से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह किसी प्राचीन सभ्यता की कलाकृति है जिसमें लेखन कला और पशु चित्रण के माध्यम से उस समय की संस्कृति और धार्मिक या सामाजिक मान्यताओं को दर्शाया गया है।
Image summary: यह एक ऐतिहासिक स्थल की तस्वीर है। इस चित्र में ईंटों से बनी प्राचीन दीवारें और एक लंबी संकरी नाली जैसी संरचना दिखाई दे रही है, जो एक व्यवस्थित शहरी नियोजन को दर्शाती है। इस दृश्य से यह निष्कर्ष निकलता है कि उस समय के लोग जल निकासी प्रणाली और निर्माण कला में अत्यधिक कुशल थे, जिससे एक उन्नत सभ्यता का प्रमाण मिलता है।
Image summary: यह एक वास्तविक स्थल की तस्वीर है। इसमें पत्थरों से बना एक गोलाकार कुआं दिखाया गया है जो एक प्राचीन संरचना का हिस्सा प्रतीत होता है। तस्वीर से यह निष्कर्ष निकलता है कि पुराने समय में जल संचयन के लिए पत्थर की चिनाई का उपयोग करके गहरे कुओं का निर्माण किया जाता था, जो तत्कालीन इंजीनियरिंग कौशल को दर्शाता है।
Image summary: यह चित्र प्राचीन मिट्टी की मूर्तियों का एक संग्रह है। इसमें विभिन्न पशुओं की आकृतियाँ दिखाई गई हैं जो मिट्टी से बनी हैं और जिनमें जानवरों के शारीरिक लक्षणों को दर्शाया गया है। इन मूर्तियों की बनावट से यह निष्कर्ष निकलता है कि उस समय के लोग पशुपालन से जुड़े थे और मिट्टी की कलाकृतियाँ बनाने में कुशल थे।
Image summary: यह एक वास्तविक चित्र है। इस चित्र में दो सफेद रंग के घनाकार ठोस पदार्थ दिखाए गए हैं। चित्र से यह निष्कर्ष निकलता है कि दोनों वस्तुओं का आकार एक जैसा है लेकिन उनके परिमाण में अंतर है, जिसमें एक वस्तु दूसरी की तुलना में काफी बड़ी है।

नगर और नए शिल्प

आओ अब कुछ ऐसी चीजों के बारे में अध्ययन करें जो हृद्या के नगरों से प्राप्त हुई हैं। पुरातत्त्वविदों को जो चीजें वहाँ मिली हैं, उनमें अधिकतर पत्थर, शंख, ताँबे, काँसे, सोने और चॉँदी जैसी धातुओं से बनाई गई थी। ताँबे और काँसे से औरार, हथियार, गहने और बर्तन बनाए जाते थे। सोने और चॉँदी से गहने और बर्तन बनाए जाते थे। यहाँ मिली सबसे आकर्षक वस्तुओं में मनके, बाट और फलक है। हृद्याया सभ्यता के लोग पथर की मुहर्त बनाते थे। इन आयताकार (पृष्ठ 35) मुहर्त पर सामान्यतः जानवरों के चित्र मिलते हैं। हृद्याया सभ्यता के लोग काले रंग से डिजाइन किए हुए खूबसूरत लाल मिट्टी के बर्तन बनाते थे। देखो पृष्ठ 6। अध्याय 3 में तुमने जिन गाँवों के बारे में पढ़ा क्या वहाँ भी धातु का उपयोग होता था? क्या वे पत्थर के बाट बनाते थे? सంभवत: 7000 साल पहले महाराष्ट्र में कपासकी खेती होती थी। मोहनजोदड़ों से कपड़े के टुकड़ों के अवशेष चौँकी के एक फूलदान के ढकने तथा कुछ अन्य ताँबे की वस्तुओं से चिपके हुए मिले हैं। पकी मिढ़ी तथा फ्रेयंस से बनी तकलियाँ सूत कराई का संकेत देती हैं। इनमें से अधिकांश वस्तुओं का निर्माण विशेषज्ञों ने किया था। विशेषज्ञ उसे कहते हैं, जो किसी खास चीज को बनाने के लिए खास प्रशिक्षण लेता है जैसे - पत्थर तराशना, मनके चमकाना या फिर मुहर्दों पर पच्चीकारी करना, आदि। पृष्ठ 36 पर चित्र देखो कि मूर्ति का चेहरा कितने आकर्षक हंग से बनाया गया और उसकी दाढ़ी कितनी अच्छी तरह दशाई गई है। यह किसी विशेषज्ञ मूर्तिकार का ही काम हो सकता है। हर व्यक्ति विशेषज्ञ नहीं हो सकता था। हमें यह पता नहीं है कि क्या सिर्फ पुरुष ही ऐसे कामों में प्रशिक्षण हासिल करते थे, या फिर केवल महिलाएँ ही। शायद कुछ महीलाएँ और पुरुष दोनों ही इस काम में दक्ष थे।
Image summary: यह चित्र प्राचीन कलाकृतियों और आभूषणों का एक संग्रह है। इसमें विभिन्न प्रकार के हार, कंगन और नुकीली हड्डियों या दांतों जैसी वस्तुएं दिखाई गई हैं। इन वस्तुओं की बनावट और स्वरूप से यह निष्कर्ष निकलता है कि ये प्राचीन समय के लोगों द्वारा सजावट और शिकार या सुरक्षा के लिए उपयोग किए जाते थे, जो उस समय की सांस्कृतिक और सामाजिक जीवनशैली को दर्शाते हैं।
Image summary: यह चित्र एक प्राचीन मूर्ति का है। इसमें एक दाढ़ी वाले व्यक्ति के ऊपरी शरीर को दर्शाया गया है, जिसने एक अलंकृत वस्त्र पहना हुआ है जिस पर फूलों जैसी आकृतियाँ बनी हुई हैं। इस मूर्ति की बनावट और शैली से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह किसी विशिष्ट ऐतिहासिक काल की कलाकृति है, जो उस समय की वेशभूषा और सौंदर्यबोध को प्रदर्शित करती है।
फ्रेयंस
पत्थर और शंख प्राकृतिक तौर पर पाए जाते हैं, लेकिन फ्रेयंस को कृत्रिम रूप से तैयार किया जाता है। बालू या स्फटिक पत्थरों के चूर्ण को गोंद में मिलाकर उनसे वस्तुएँ बनाई जाती थीं। उसके बाद उन वस्तुओं पर एक चिकनी परत चढ़ाई जाती थी। इस चिकनी परत के रंग प्रायः नीले या हल्के समुद्रों से होते थे। फ्रेयंस से मनके, चूडियाँ, बाले और छोटे बर्तन बनाए जाते थे।

कच्चे माला की खोज में

Image summary: यह एक वास्तविक वस्तु की तस्वीर है। इस चित्र में एक प्राचीन और क्षरित अवशेष दिखाया गया है जो किसी जैविक संरचना या जीवाश्म जैसा प्रतीत होता है। इसकी बनावट अनियमित है और सतह खुरदरी है, जिससे यह संकेत मिलता है कि यह वस्तु समय के साथ काफी घिस चुकी है या खनिज जमाव के कारण बदल गई है।
कच्चा माल उन पदार्थों को कहते हैं जो या तो प्राकृतिक रूप से मिलते हैं या फिर किसान या पशुपालक उनका उत्पादन करते हैं जैसे लकड़ी या धातुओं के अयसक प्राकृतिक रूप से उपलब्ध करने माल हैं। इनसे फिर कई तरह की चीजें बनाई जाती हैं। मिसाल के तौर पर किसानों द्वारा पैदा किए गए कपास को कच्चा माल कहते हैं, जिससे बाद में कताई-बुनाई करके कपड़ा तैयार किया जाता है। हड़णा में लोगों को कई चीजें वहीं मिलती थीं, लेकिन ताँबा, लोहा, सोना, चौदी और बहुमूल्य पत्थरों जैसे पदार्थों का वे दूर-दूर से आयात करते थे। चीजों को एक जगह से दूसरी जगह कैसे ले जाया जाता था? इन चिट्रों को देखो। एक खिलोना है, और दूसरी एक मुहरा क्या तुम बता सकते हो, कि हड़णा के लोग यातायात के लिए किन साधनों का प्रयोग करते थे? पिछले अध्यायों में क्या तुमको पहिंच वाले वाहनों की जानकारी दी गई है? बच्चों का खिलोना—हल। आज हल चलाने वाले ज्यादातर किसान पुरुष होते हैं। हमें जाते नहीं है कि क्या हड़णா में भी यही प्रथा थी। हृद्या के लोग ताँबे का आयात सम्भवत: आज के राजस्थान से करते थे। यहाँ तक कि पश्चिम एशियाई देश ओमान से भी ताँबे का आयात किया जाता था। काँसा बनाने के लिए ताँबे के साथ मिलाई जाने वाली धातु तिन का आयात आधुनिक इरान और अफगानिस्तान से किया जाता था। सोने का आयात आधुनिक कर्नाटक और बहुमूल्य पत्थर का आयात गुजरात, इरान और अफगानिस्तान से किया जाता था।
Image summary: यह चित्र एक भौतिक वस्तु या मॉडल का है। यह एक प्राचीन कृषि उपकरण, संभवतः एक रेक या घास इकट्ठा करने वाली गाड़ी का लघु रूप है, जिसमें पहिए और ऊपर की ओर निकली हुई कई छड़ें लगी हैं। इस मॉडल से यह निष्कर्ष निकलता है कि पुराने समय में खेती के कार्यों को आसान बनाने के लिए इस तरह के सरल यांत्रिक उपकरणों का उपयोग किया जाता था, जो सामग्री को खींचने और एकत्रित करने में सहायक होते थे।
Image summary: यह एक पुरातात्विक वस्तु की तस्वीर है। इस चित्र में एक प्राचीन धातु का उपकरण दिखाया गया है जिसका आकार मुड़ा हुआ और नुकीला है। इस वस्तु की बनावट से यह निष्कर्ष निकलता है कि इसका उपयोग प्राचीन काल में किसी विशिष्ट कार्य या हथियार के रूप में किया जाता होगा, जो उस समय की तकनीकी क्षमता और शिल्प कौशल को दर्शाता है।
Image summary: यह एक प्राचीन नक्काशीदार कलाकृति है। इस आकृति में एक नाव को दर्शाया गया है जिसके ऊपर कुछ आकृतियाँ और संरचनाएँ बनी हुई हैं। इस कलाकृति से यह निष्कर्ष निकलता है कि उस समय के समाज में जल परिवहन का महत्व था और यह उनकी कलात्मक शैली और समुद्री संस्कृति को प्रदर्शित करता है।

नगरों में रहने वालों के लिए भोजन

लोग नगरों के अलावा गाँवों में भी रहते थे। वे अनाज उगाते थे और जानवर पालते थे। किसान और चरवाह ही शहर्षों में रहने वाले शासकों, लेखकों और दस्तकारों को खाने के सामान देते थे। पौधों के अवशेषों से पता चलता है कि हड़प्या के लोग गेहू, जौ, दालं, मटर, धान, तिल और सरसों उगाते थे। जमीन की जुताई के लिए हल का प्रयोग एक नई बात थी। हड़णा काल के हल तो नहीं बच पाए हैं, क्योंकि वे प्राय: लकड़ी से बनाए जाते थे, लेकिन हल के आकार के खिलले मिले हैं। इस क्षेत्र में बारिश कम होती है, इसलिए सिंचार्थ के लिए लोगों ने कुछ तरीकों अपनाए हैं। संभवत: पानी का संचय किया जाता होगा और जस्ताएँ पड़ने पर उससे फ़लरूप की सिंचार्थ की जाती होगी। हृदृ�ा के लोग गाय, भौंस, भेড় और बकिरियाँ पालते थे। बस्तियों के आस-पास तालाब और चारागाह होते थे। लेकिन सूखे महिनों में मवेशियों के झुंडों को चारा-पानी की तलाश में दूर-दूर तक ले जाया जाता था। वे बेर जैसे फलों को इकटा करते थे, मधिलियाँ पकड़ते थे, और हिरण जैसे जानवरों का शिकार भी करते थे।

गुजरात में हड़णकालािन नगर का सूक्ष्म-निरीक्षण

कच्छ के इलाके में खिद्र बेत के किनारे धौलावीरा नगर बसा था। वहाँ साफ पानी मिलता था और जमीन उपजाऊ थी। जहाँ हड़पा सभ्यता के कई नगर दो भागों में विभक्त थे वहीं धौलावीरा नगर को तीन भागों में बाँटा गया था। इसके हर हिस्से के चारों ओर पत्थर की ऊँची-ऊँची दीवार बनाई गई थी। इसके अंदर जाने के लिए बड़े-बड़े प्रवेश-दूसरे थे। इस नगर में एक खुला मैदान भी था, जहाँ सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे। यहाँ मिले कुछ अवशेषों में हड़पा लिपि के बड़े-बड़े अक्षरों को पत्थरों में खुदा पाया गया है। इन अभिलेखों को संभवत: लकड़ी में जड़ा गया था। यह एक अनोखा अवशेष है, क्योंकि आमतौर पर हड़पा के लेख मुहुर जैसी छोटी वस्तुओं पर पाए जाते हैं। गुजरात की खम्भता की खाड़ी में मिलने वाली साबरमती की एक उपनदी के किनारे बसा लोथल नगर ऐसे स्थान पर बसा था, जहाँ कीमती पत्थर जैसा कच्चा माल आसानी से मिल जाता था। यह पत्थरों, शंखों और धातुओं से बनाई गई चीजों का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। इस नगर में एक भंडार गृह भी था। इस भंडार गृह से कई मुहें और मुद्रान का मुहरबंदी (नीली मिट्टी पर दबाने से बनी उनकी छाप) मिले हैं।
लोथल का बन्दरगाह।
यह बड़ा तालाब लोथल का बन्दरगाह रहा होगा, जहाँ समुद्र के रास्ते आने वाली नावं रक्ती थी। संभवत: यहाँ पर माल चढ़ाया-उतार जाता होगा। यहाँ पर एक इमारत मिली है, जहाँ संभवत: मनके बनाने का काम होता था। पत्थर के टुकड़े, अक्षबने मनके, मनके बनाने वाले उपकरण और तैयार मनके भी यहाँ मिले हैं।
Image summary: यह एक वास्तविक स्थल की तस्वीर है। इस चित्र में ईंटों से बनी प्राचीन संरचनाओं के अवशेष दिखाए गए हैं जो एक बड़े जल निकाय या तालाब के किनारे स्थित हैं। यह दृश्य दर्शाता है कि प्राचीन समय में जल प्रबंधन के लिए ईंटों का उपयोग करके मजबूत ढाँचे बनाए जाते थे और यह स्थल किसी पुरानी सभ्यता के उन्नत वास्तुशिल्प और जल संचयन प्रणाली की उपस्थिति का संकेत देता है।
Image summary: यह एक वस्तु की तस्वीर है। यह चित्र एक प्राचीन मिट्टी की खंडित कलाकृति या मोहर को दर्शाता है जिसकी सतह खुरदरी और असमान है। इस वस्तु के विश्लेषण से पता चलता है कि यह समय के साथ काफी घिस चुकी है और इसके मूल आकार का केवल एक हिस्सा ही शेष बचा है, जो प्राचीन सभ्यता की निर्माण कला और सामग्री के क्षरण को प्रदर्शित करता है।
मुद्रा ( मुहर) और मुद्रिकन या मुहरबंदी
मुहारों का प्रयोग सामान से भरे उन डिबॉं या थैलों को चिंहित करने के लिए किया जाता होगा, जिन्हें एक जगह से दूसरी जगह भेजा जाता था। थैले को बंद करने के बाद उनके मुहानों पर गिली मिट्टी पोत कर उन पर मुहर लगाई जाती थी। मुहर की छाप को मुहरबन्दी कहते हैं। अगर यह छाप टूटी हुई नहीं होती थी, तो यह साबित हो जाता था, कि सामान के साथ छेड़-छाड़ नहीं हुई है। आज भी मुहर का प्रयोग होता है। पता लगाओ कि मुहरी का उपयोग किसलिए किया जाता है।

सभ्यता के अंत का रहस्य

लगभग 3900 साल पहले एक बड़ा बदलाव देखने को मिलता है। अचानक लोगों ने इन नगरों को छोड़ दिया। लेखन, मुहार और बातों का प्रयोग बंद हो गया। दूर-दूर से कच्चे माल का आयात काफी कम हो गया। मोहनजोदड़ों में सड़कों पर कचरे के ढेर बनने लगे। जलनिकास प्रणाली नष्ट हो गई और सड़कों पर ही झुगतीनुमा घर बनाए जाने लगे। यह सब क्यों हुआ? कुछ पता नहीं। कुछ विद्यानों का कहना है, कि नदियाँ सूख गई थीं। अन्य का कहना है, कि जंगलों का विनाश हो गया था। इसका कारण ये हो सकता है, कि इंटें पकाने के लिए ईधन की ज़रूरत पड़ती थी। इसके अलावा मवैशियों के बड़े-बड़े झुड़ों से चारगाह और घास वाले मैदान समाप्त हो गए होंगे। कुछ इलाकों में बाढ़ आ गई। लेकिन इन कारणों से यह स्पष्ट नहीं हो पाता है कि सभी नगरों का अंत कैसे हो गया। क्योंकि बाढ़ और नदियों के सूखने का असर कुछ ही इलाकों में हुआ होगा। ऐसा लगता है, कि शासकों का नियंत्रण समाप्त हो गया। जो भी हुआ हो, परिवर्तन का असर बिल्कुल साफ दिखाई देता है। आधुनिक पाकिस्तान के सिंध और पंजाब की बस्तियाँ उजड़ गई थीं। कई लोग पूर्व और दक्षिण के इलाकों में नई और छोटी बस्तियां में जाकर बस गए। इसके लगभग 1400 साल बाद नए नगरों का विकास हुआ। इनके बारे में तुम अध्याय 6 और 9 में पढ़ोगे।
अन्यत्र
अपने एट्लस में मिस्र दूढ़ों। नील नदी के आसपास वाले इलाकों को छोड़कर मिस्र का अधिकांश भाग रोगस्थान है। लगभग 5000 साल पहले मिश्र में शासन करने वाले राजाओं ने सोना, चौँदी, हाथीदौत, लकड़ी और हीरे-जवाहरात लाने के लिए अपनी सेनाएँ दूर-दूर तक भेजी। इन्होंने बड़े-बड़े मकबरे बनवाए जाने 'पिरामिड' राजाओं के मरने पर उनके शब्दों को इन्हीं प्रिमिडों में दफनाकर सुरक्षित रखा जाता था। इन शब्दों को ममी कहा जाता है। उनके शब्दों के साथ और भी अनेक चीज़ों दफनायी जाती थीं। इनमें खादान, पेय, वस्त्र, गहने, बर्तन, वादयंत्र, हिथियार और जानवर शामिल हैं। कभी-कभी शब्दों के साथ उनके सेवक और सेविकाओं को भी दर्जना दिया जाता था। दुनिया के इतिहास में शांको दर्जनाने की परंपरा को देखते हुए मिस्र में सबसे ज्यादा धन-दौलत खर्च किया जाता था। क्या तुम्हे लगता है, कि मरने के बाद इन राजाओं को इन चीजों की ज़रूरत पड़ी होगी? तुम अपने माता-पिता के साथ 4000 साल पहले लोथल से मोहनजोद्ड़ो की यात्रा कर रहे हों। यह बताओ कि तुम यात्रा कैसे करोगे, तुम्हारे माता-पिता यात्रा के लिए अपने साथ क्या-क्या ले जाएंगे? और मोहनजोदड़ो में तुम क्या देखोगे? उपयोगी शब्द नगर नगरदुर्ग शासक लिपिक मुहर शालपकार धातु विशेषज्ञ कच्चा माल हल सिंचাই
Image summary: यह एक वास्तविक तस्वीर है। इस चित्र में रेगिस्तानी इलाके में स्थित प्राचीन मिस्र के विशाल पिरामिडों को दर्शाया गया है। यह दृश्य प्राचीन वास्तुकला की भव्यता और रेगिस्तानी परिदृश्य की विशालता को प्रकट करता है, जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि ये संरचनाएं ऐतिहासिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण और इंजीनियरिंग का उत्कृष्ट नमूना हैं।
कुछ महत्वपूर्ण तिथियाँ
- मैहरग्द में कपास की खेती (लगभग 7000 साल पहले)
- नगरों का आरंभ (लगभग 4700 साल पहले)
- ▶ हड़पा के नगरों के अंत की शुरुआत (लगभग 3900 साल पहले)
- अन्य नगरों का विकास (लगभग 2500 साल पहले)
Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में एक लड़की को दिखाया गया है जो बैठकर एक किताब पढ़ रही है। इस चित्र से यह निष्कर्ष निकलता है कि लड़की पढ़ने की गतिविधि में लीन है और वह शिक्षा या ज्ञान प्राप्त करने के प्रति उत्सुक है।
1. पुरातत्त्विद्वों को कैसे जात हुआ कि हृद्या सभ्यता के दौरान कपड़े का उपयोग होता था?
2. निम्नलिखित का सुमेल करो : ताँबा गुजरात सोना अफ़गानिस्तान टिंन राजस्थान बहुमूल्य पत्थर कर्नाटक
3. हृद्वा के लोगों के लिए धातुएँ, लेखन, पहिहा और हल क्या महत्वपूर्ण थे?
आओं चर्नी करें
Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में दो व्यक्ति एक साथ चलते हुए और आपस में बातचीत करते हुए दिखाई दे रहे हैं, जिनमें से एक ने पीठ पर बस्ता टांगा हुआ है। उनके चेहरे के हाव-भाव से यह निष्कर्ष निकलता है कि वे खुश हैं और उनके बीच एक मैत्रीपूर्ण संबंध है।
4. इस अध्याय में पकी मिट्टी (टेराकोटा) से बने सभी खिलती की सूची बनाओ। इनमें से कौन-से खिलती बच्चों को ज्यादा पसंद आए होंगे?
5. हृद्या के लोगों की भोजन सामग्री की सूची बनाओ। आज इनमें से तुम क्या-क्या खाते हो? निशान लगाकर बताओ।
6. हृद्या के किसानों और पशुपालकों का जीवन क्या उन किसानों से भिन्न था, जिनके बारे में तुमने पिछले अध्याय में पढ़ा है? अपने उत्तर में इसका कारण बताओ।
आओ करके देखें
Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इसमें एक व्यक्ति को दिखाया गया है जिसने अपने हाथों को अपने चेहरे और ठुड्डी पर रखा हुआ है और उसकी नजरें ऊपर की ओर हैं। व्यक्ति की शारीरिक मुद्रा और चेहरे के हाव-भाव यह दर्शाते हैं कि वह किसी गहरी सोच में है या किसी समस्या का समाधान खोजने का प्रयास कर रहा है।
7. अपने शहर या गाँव की तीन महत्त्वपूर्ण इमारतो का ब्बोरा दो। क्या वे बस्ती के महत्त्वपूर्ण इलाके में बनी है। इन इमारतो का उपयोग किसलिए किया जाता है?
8. तुम्हारे इलाके में क्या कोई पुरानी इमारत है? यह पता करो कि वह कितनी पुरानी है और उनकी देखभाल कौन करता है।

अध्याय 5

क्या बताती है हमें कियाबे और कब्रे

पुस्तकालय में मेरी
जैसे ही घंటి बजी शिशक ने छात्रों को अपने साथ आने को कहा। आज वे पहली बार पुस्तकालय जा रहे थे। मेरी ने देखा कि पुस्तकालय उसकी कक्षा से काफी बड़ा था और वहाँ कियाबो से भरे कई रैक थे। कोने में एक अलमारी थी जो मोटी-मोटी कियाबाँ से भरी थी। मेरी को एक अलमारी खोलने की कोशिश करते देख शिशक ने कहा, "उस अलमारी में अलग-अलग धर्मों से जुड़ी हुई महत्वपूर्ण कियाबे हैं। क्या तुम्हे मालूम है कि हमारे पास वेदों का भी एक संग्रह है?" मेरी सोचने लगी। "वेद क्या है?" चलो पता लगाए।

दुनिया के प्राचीनतम ग्रहों में एक

शायद तुमने वेदों के बारे में सुना होगा। वेद चार हैं - ऋगवेद, सामवेद, यजुवेद तथा अथर्ववेद। सबसे पुराना वेद है, ऋगवेद जिसकी रचना लगभग ३५०० साल पहले हुई। ऋगवेद में एक हजार से ज्यादा प्रार्थनाएँ हैं जिन्हें, सूकत कहा गया है। सूकत का मतलब है, अच्छी तरह से बोला गया। ये विभिन्न देवी-देवताओं की स्तुति में रचे गए हैं। इनमें से तीन देवता बहुत महलपूर्ण हैं : अग्नि, इन्द्र और सोम। अग्नि आग के देवता, इन्द्र युद्ध के देवता हैं और सोम एक पौधा है, जिससे एक खास पेय बनाया जाता था। वेदिक प्रार्थनाओं की रचना ऋषियों ने की थी। आचार्य विद्याधियों को इन्हें अक्षरों, शब्दों और वाक्यों में बाँटकर, संखर पाठ द्वारा कंठस्थ करवाते थे। अधिकांश सूक्ति के रचियता, सीखने और सिखाने वाले पुरुष थे। कुछ प्रार्थनाओं की रचना महिलाओं ने भी की थी। ऋत्वेद की भाषा प्राक्सरकृत या वैदिक संस्कृत कहलाती है। तुम स्कूल में जो সংकृत पढ़ती हो उससे यह भाषा थोड़ी भिन्न है।
Image summary: यह एक वास्तविक तस्वीर है। इस चित्र में एक छोटे बच्चे का चेहरा दिखाया गया है जिसने चेक वाली शर्ट पहनी हुई है और उसके बाल छोटे और घने हैं। बच्चे के चेहरे के भाव शांत हैं और वह सीधे कैमरे की ओर देख रहा है, जिससे उसकी मासूमियत और सहजता का पता चलता है।

संस्कृत और अन्य भाषाएँ

संस्कृतं भाषा भारोपीय (भारत—यूरोपीय) भाषा-परिवार का हिस्सा है। भारत की कई भाषाएँ - असमिया, गुजराति, हिंदी, कश्मीरी और सिंधी, एशियाई भाषाएं जैसे फ़ारसी तथा यूरोप की बहुत-सी भाषाएँ जैसे - अंग्रेजी, फ्रांसीसी, जर्मन, यूनानी, इतालवी, स्पैनिश आदि इसी परिवार से जुड़ी हुई हैं। उन्हें एक भाषा-परिवार इसलिए कहा जाता है क्योंकि आरंभ में उनमें कई शब्द एक जैसे थे। उदाहरण के लिए 'मातृ' (संस्कृत), माँ (हिंदी) और 'मदर' (अंग्रेजी) शब्द को देखो। क्या तुम्हे इनमें कोई समानता नजर आती है? उपमहाद्रिप में दूसरे भाषा-परिवारों की भी भाषाएँ बोली जाती हैं। उदाहरण के लिए पूर्वोत्तर प्रदेशों में तिब्बत-बर्मी परिवार की भाषाएँ बोली जाती हैं। तिम्बर, तेलुगुं, कनड्ज और मलयालम, द्रिवड्भाषा-परिवार की भाषाएं हैं। जबकि द्वारखंड और मध्य भारत के कई हिस्सों में बोली जाने वाली भाषाएं ऑस्ट्रो-एशियाटिक परिवार से जुड़ी हैं। उन भाषाओं की सूची बनाओ जिनके बारे में तुमने सुन रखा है। उनके भाषा-परिवारों को पहचानने की कोशिश करो। हम जिन किताबों को पढ़ते हैं वे लिखी और छापी गई हैं। ऋगवेद का उच्चारण किया जाता था और श्रवण किया जाता था न कि पढ़ा जाता था। रचना के कई सिदियों बाद इसे पहली बार लिखा गया। इसे छापने का काम तो मुश्कल से दो सौ साल पहले हुआ।

इतिहासकार ऋगवेद का अध्ययन कैसे करते हैं?

इतिहासकार, पुरातत्त्ववेत्ताओं की तरह ही अतीत के बारे में जानकारी इकल्वी करते हैं। लेकिन भूतिक अवशेषों के अलावा वे लिखित स्रोतों का भी उपयोग करते हैं। चलो देखते हैं कि वे खगवद् का अध्ययन कैसे करते हैं। ऋत्वेद के कुछ सूत वात्याप के रूप में है। विश्वामित्र नामक ऋषि और देवियों के रूप में पूजित दो नदियों (व्यास और सतलुज) के बीच यह संवाद एक ऐसे ही सूत का अंश है। इन दोनों नदियों को मानचित 1 (पृष्ठ 2) में खोजें तथा फिर पढ़ा 5: 50

विश्वामित्र और नदियाँ

ऋत्वेद की पाण्डुलिप का एक पन्ना। भूर्ण वृश की छाल पर लिखी यह पाण्डुलिप कश्मीर में पार्श्व गई थी। लगभग १५० वर्ष पहले ऋत्वेद को सबसे पहली बार छापने के लिए इसका उपयोग किया गया था। इसी पाण्डुलिप को देखकर अंग्रेजी अनुवाद तैयार हुआ। यह पाण्डुलिप पुणे, महाराष्ट्र के एक पुस्तकालय में सुरक्षित है। विश्वामित्र — हे नदियों, अपने बछड़ों को चोटती हुई दो दमकती गायों की तरह, दो फुर्तीले घोड़ों की चाल से पहाड़ों से नीचे आओ। इन्द द्वारा दी हुई शक्ति से स्फूर्त तुम रथों की गति से सागर की ओर बह रही हो। तुम जल से परिपूर्ण हो और एक-दूसरे से मिल जाना चाहती हो। निद्याँ – जल से परिपूर्ण हम देवताओं के बनाए रास्ते पर चलती हैं। एक बार निकलने पर हमें रोका नहीं जा सकता। हे ऋषि, तुम हमसे प्रार्थना क्यों कर रहे हो? विश्वामित्र — हे बहनों, मुझ गायक की प्रार्थना सुनो। मैं रथों और गिडियों सहित बहुत दूर से आया हूँ। कृपा करके अपने जल को हमारे रथों और गिडियों की धुरियों के ऊपर न उठाओ तिके हम आसानी से उस पार जा सके। निद्याँ – हम तुम्हारी प्रार्थना सुनेंगे, जिससे तुम सब सुरक्षित उस पार जा सको। इतिहासकार यह बताते हैं कि यह प्रार्थना उस क्षेत्र में रची गई होगी जहाँ ये नदियाँ बहती हैं। वे यह भी सुझाते हैं कि जिस समाज में नखि रहते थे वहाँ घोड़ों और गायों को बहुत महत्व दिया जाता था। इसीलिए नदियों की तुलना घोड़ों और गायों से की गई है। क्या तुम्हे लगता है कि रथ भी महत्वपूर्ण थे? अपने जवाब के लिए कारण बताओ। प्रार्थना की पंक्तियाँ को दुबारा पढ़कर यह बताओ कि उनमें परिवहन के लिए किन-किन साधनों का उल्लेख है। ऋत्वेद की प्रार्थनाओं में अन्य दूसरी नदियों खासकर सरसवती, सिंभु और उसकी सहायक नदियों का भी ज़िक है। गंगा और यमुना का उल्लेख सिर्फ एक बार हुआ है। मानचित 1 को देखो और ऐसी पाँच नदियों की सूची बनाओ जिनके नाम ऋगवेद में नहीं हैं।
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मवेशी, घोड़े और रथ

ग्रहवेंद्र में मलेशिया, बच्चों (खासकर पुत्रों) और घोड़ों की प्राप्ति के लिए अनेक प्रार्थनाएँ हैं। घोड़ों को लड़ाई में स्थितिचन के काम में लाया जाता था। इन लड़ाईयों में मलेशिया जीत कर लाए जाते थे। लड़ाईयाँ वैसे जमीन के लिए भी लड़ाई जाती थीं जहाँ अच्छे चारगाह हों या जहाँ पर जौ जैसी जल्दी तैयार हो जाने वाली फ़सलों को उपजाया जा सकता हो। कुछ लड़ाईयां पानी के खोतों और लोगों को बंदी बनाने के लिए भी लड़ाई जाती थीं। युद्ध में जीते गए धन का कुछ भाग सरदार रख लेते थे तथा कुछ हिस्सा पुरोहित को दिया जाता था। शेष धन आम लोगों में बाँट दिया जाता था। कुछ धन यह करने के लिए भी प्रयुक्त होता था। यह की आग में आहित दी जाती थी। ये आहुतियाँ देवी-देवताओं को दी जाती थीं। घी, अनाज और कभी-कभी जानवरों की भी आहति दी जाती थी। अधिकांश पुरुष इन युद्धों में भाग लेते थे। कोई स्थायी सेना नहीं होती थी, लेकिन लोग सभीआँ में मिलते-जुलते थे और युद्ध व शाति के विषय में सलाह-मशविरा करते थे। वहाँ ये ऐसे लोगों को अपना सरदार चुनते थे जो बहादुर और कुशल योद्धा हों।

लोगों की विशेषता बताने वाले शब्द

लोगों का বর্গकरण काम, भाषा, परिवार या समुदाय, निवास स्थान या सांस्कृतिक परंपरा के आधार पर किया जाता रहा है। ऋगवेद में लोगों की विशेषता बताने वाले कुछ शब्दों को देखो। ऐसे दो समूह हैं जिनका বর্গकरण काम के आधार पर किया गया है। पुरोहित जिन्हें कभी-कभी ब्राह्मण कहा जाता था तरह-तरह के यज और अनुष्ठान करते थे। दूसरे लोग थे - राजा। ये राजा वैसे नहीं थे जिनके बारे में तुम बाद में पढ़ोगी। ये न तो बड़ी राजधानियों और महलों में रहते थे, न इनके पास सेना थी, न ही ये कर वसूलते थे। प्राय: राजा की मृत्यु के बाद उसका बेटा अपने आप ही शासक नहीं बन जाता था। पिछले अनुभाग को एक बार फिर पढ़ो और यह पता लगाने की कोशिश करो कि राजा क्या करते थे। जनता या पूरे समुदाय के लिए दो शब्दों का इस्तेमाल होता था। एक था जन जिसका प्रयोग हिंदी व अन्य भाषाओं में आज भी होता है। दूसरा था विश्ि जिससे वैश्य शब्द निकला है। इस विषय पर तुम अध्याय 6 में विस्तार से पढ़ोगी। ऋत्वेद में विश्व और जनों के नाम मिलते हैं। इसलिए हमं पुष्-जन या विश्व, भरत-जन या विश्व, यदु-जन या विश्व जैसे कई उल्लेख मिलते हैं।
तुम्हे इनमें से कोई नाम जाना-पहचाना लगता है?
जिन लोगों ने इन प्रार्थनाओं की रचना की वे कभी-कभी खुद को आरंभ करने के तहले अपने विरोधियों को दास या दस्य कहते थे। दर्यु वे लोग थे जो यज नहीं करते थे और शायद दूसरी भाषाएँ बोलते थे। बाद के समय में दास (स्लींग: दासी) शब्द का मतलब गुलाम हो गया। दास वे स्टी और पुरुष होते थे जिन्हें युद्ध में बंदी बनाया जाता था। उन्हें उनके मालिक की जायदाद माना जाता था। जो भी काम मालिक चाहते थे उन्हें वह सब करना पड़ता था। जिस युग में उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिम में ऋत्वेद की रचना हो रही थी उसी समय दूसरी जगहों पर एक अलग तरह का विकास हो रहा था। देखो, वहाँ क्या हो रहा था।

खামोश प्रहरी— कहानी महापाषाणो की

अगले पृष्ठ के चित्रों को देखो।
ये शिलाखण्ड महापाषाण (महा : बड़ा, पाषाण : पत्थर) नाम से जाने जाते हैं। ये पत्थर दफन करने की जगह पर लोगों द्वारा बड़े करिने से लगाए गए थे। महापाषाण कब्रे बनाने की प्रथा लगभग 3000 साल पहले शुरू हुई। यह प्रथा दककन, दिशाण भारत, उत्तर-पूर्वी भारत और कشمीर में प्रचिलित थी। कुछ महत्वपूर्ण महापाषाण पुरासथल मानचित 2 में दिखाए गए हैं। कुछ महापाषाण जमीन के ऊपर ही दिख जाते हैं। कुछ महापाषाण जमीन के भीतर भी होते हैं। ऊपर: इस तरह के महापाषाणको ताबूत शवाधान (सस्द) कहा जाता है। यहाँ दिखाए गए सिस्ट में एक पोर्ट-होल (बड़ा सुराख) है जो शायद पत्थरों से बने हुए कमरे में जाने का रास्ता था। कई बार पुरातत्त्वविदों को गोलाकार सजाए हुए पत्थर मिलते हैं। कई बार अकेला खड़ा हुआ पत्थर मिलता है। ये ही एकमात्र प्रमाण हैं जो जमीन के नीचे कब्रों को दर्शित हैं। महापाषाणों के निर्माण के लिए लोगों को कई तरह के काम करने पड़ते थे। हमने जो कार्यों की सूची बनाई है उन्हें क्रमबद्ध करो। गड्हे खोदना, शिलाखंडों को दो कर लाना, बड़े पत्थरों को तराशना और मरे हुए को दफनाना। इन सब कब्रो में कुछ समानताएँ हैं। सामान्यतः मृतकों को खास किसके मिट्टी के बर्तीनों के साथ दफनाया जाता था जिन्हें काले-लाल मिट्टी के बर्तीनों (ब्लीक एण्ड रेड वेयर) के नाम से जाना जाता है। इनके साथ ही मिले हैं लोहे के औजार और हिथियार, घोड़ों के कंकाल और सामान तथा पत्थर और सोने के गहने। महापाषाण कब्रो से मिले लोहे के सामान
Image summary: यह एक पुरातात्विक स्थल की तस्वीर है। इस चित्र में पत्थरों से बनी एक संरचना दिखाई दे रही है, जिसमें बीच में एक आयताकार गड्ढा या कक्ष है और उसके चारों ओर छोटे पत्थरों की एक परत है, जबकि बाहरी घेरे में बड़े और गोल पत्थरों का उपयोग किया गया है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यह एक प्राचीन मानव निर्मित ढांचा है, जिसे संभवतः किसी विशेष उद्देश्य या अनुष्ठान के लिए व्यवस्थित रूप से बनाया गया था।
Image summary: यह एक वस्तु की तस्वीर है। इस चित्र में एक धातु की प्राचीन वस्तु दिखाई दे रही है जिसमें एक गोलाकार हिस्सा और एक लंबा सीधा सिरा है, साथ ही उसके पास एक छोटी छड़ जैसी आकृति रखी है। इस वस्तु की बनावट और आकार से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह किसी पुराने समय के आभूषण या उपकरण का हिस्सा हो सकता है।
Image summary: यह एक वास्तविक वस्तुओं की तस्वीर है। इसमें अलग-अलग आकार की दो प्राचीन चप्पलें दिखाई गई हैं, जिनमें ऊपर की ओर पट्टियाँ बंधी हुई हैं। इन वस्तुओं की बनावट और आकार से यह निष्कर्ष निकलता है कि ये प्राचीन काल के फुटवियर हैं, जिनमें एक चप्पल दूसरी की तुलना में अधिक लंबी है, जो संभवतः अलग-अलग व्यक्तियों के लिए या पैर के अलग हिस्सों के लिए बनाई गई थीं।
Image summary: यह एक फोटोग्राफ है। इस चित्र में एक प्राचीन और जंग लगा हुआ खंजर या चाकू दिखाया गया है, जिसका ब्लेड खुरदरा है और हत्था अलग बनावट का है। ब्लेड की स्थिति से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह वस्तु काफी पुरानी है और लंबे समय तक क्षरण का शिकार रही है, जबकि इसका हत्था अभी भी अपनी मूल आकृति को कुछ हद तक बनाए हुए है।

लोगों की सामाजिक असमानताओं के बारे में पता करना

पुरातत्त्वविद्य यह मानते हैं कि कंकाल के साथ पार्श्व गई चीज़ों मेरे हुए व्यक्ति की ही रही होगी। कभी-कभी एक कब्रा की तुलना में दूसरी कब्रा में ज्यादा चीज़ों मिलती हैं। मानचित्र २ पर (पृष्ठ १४) ब्रह्मगिर को खोजो। यहाँ एक व्यक्ति की कब्रा में ३३ सोने के मनके और शंख पाए गए हैं। दूसरे कंकालों के पास सिर्फ कुछ मिट्टी के बर्तन ही पाए गए। यह दर्शनाएं गए लोगों की सामाजिक स्थिति में भिन्नता को दर्शाता है। कुछ लोग अभीर थे तो कुछ लोग गरीब, कुछ लोग सरदार थे तो दूसरे अनुयायी।

क्या कुछ कबराहे खास परिवारों के लिए थीं?

कभी-कभी महापाषाणों में एक से अधिक कंकाल मिले हैं। वे यह दर्शित है कि शायद एक ही परिवार के लोगों को एक ही स्थान पर अलग-अलग समय पर दक्षनाया गया था। बाद में मरने वाले लोगों को पोर्ट-होल के रास्ते कब्रों में लाकर दक्षनाया जाता था। ऐसे स्थान पर गोलाकार लगाए गए पत्थर या चट्टान चिहों का काम करते थे, जहाँ लोग आवश्यकतानुसार शवों को दक्षाने दुबारा आ सकते थे।

इनामगाँव के एक विशिष्ट व्यक्ति की कब

मानचित 2 में (पृष्ठ 14) इनामगाँव को खोजो। यह भीमा की सहायक नदी घोड़ के किनारे एक जगह है। इस जगह पर 3600 से 2700 साल पहले लोग रहते थे। यहाँ वयस्क लोगों को प्राय: गड़े में सीधा लिटा कर दफनाया जाता था। उनका सिर उत्तर की ओर होता था। कई बार उन्हें घर के अंदर ही दफनाया जाता था। ऐसे बर्तन जिनमें शायद खाना और पानी हों, दफनाए गए शव के पास रख दिए जाते थे। एक आदमी को पाँच कमरों वाले मकान के आँगन में, चार पैरों वाले मिट्टी के एक बड़े से संदूक में दफनाया गया था। बस्ति के बीच में बसा यह घर गाँव के सबसे बड़े घरों में एक था। इस घर में एक अनाज का गोदम भी था। शव के पैर मुड़े हुए थे। क्या तुम्हे लगता है कि यह किसी सरदार का शव था? अपने जवाब का कारण बताओ।

क्या बताते हैं हमें कंकालों के अध्ययन

छोटे आकार के आधार पर एक बच्चे के कंकाल को आसानी से पहचाना जा सकता है। लेकिन एक बच्चे और बच्चे के कंकाल के बीच कोई बड़ा फर्क नहीं होता। क्या हम यह पता लगा सकते है कि कंकाल किसी पुरुष का था या स्ली का? कभी-कभी लोग कंकाल के साथ मिले सामानों के आधार पर इसका अंदाजा लगात हैं। उदाहरण के लिए यदि कंकाल के साथ गहने मिलते हैं तो कई बार उसे महीला का कंकाल मान लिया जाता है। लेकिन ऐसी समझ के साथ समस्याएँ हैं। अक्सर पुरुष भी आभूषण पहनते थे। कंकाल का लिंग पहचाने का बेहतर तरीका उसकी हिंदीसमें की जाँच है। चूंकि महीलाएँ बच्चों को जन्म देती हैं इसलिए उनका कित-प्रदेश या कुल्ला पुरंषों से ज्यादा बड़ा होता है। ये समझ कंकालों के आधुनिक अध्ययन पर आधारित है। आज से लगभग 2000 साल पहले चरक नाम के प्रसिद्ध वैध हुए थे। उन्होंने चिकित्सा शास्त्र पर चरक संहिता नाम की किताब लिखी। वे कहते हैं कि मनुष्य के शरीर में 360 हिच्छाய் होती हैं। यह आधुनिक शरीर रचना विज्ञान की 206 हिस्सों से काफी ज्यादा हैं। सम्भवत: चरक ने अपनी गणती में दाँत, हिस्स्यों के जोड़ और कार्ट्लेज को जोड़कर यह संख्या बताई थी। तुम्हारे अनुसार शरीर के बारे में उन्होंने इतनी विस्तृत जानकारी कैसे इकटूदा की होगी?

इनामगाँव के लोगों के काम-धर्म

इनामगाँव में पुरातत्त्वविदों को गेहू, जौ, चावल, दाल, बाजरा, मटर और तिल के बीज मिले हैं। कई जानवरों की हिडुयाँ भी मिले हैं। कई हिडुयां पर काटने के निशान से यह अंदाजा होता है कि लोग इन्हें खाते होंगे। गाय, बैल, भौंस, बकरी, भेड़, कुता, घोड़ा, गधा, सूअर, साँभर, चितकबरा हिरण, कृष्ण-मृग, खरहा, नेवला, चिडिया, घिड्याल, कहुआ, केकड़ा और मछली की हिडुयां भी पार्इ गई हैं। ऐसे साध्य मिले हैं कि बेर, आँवला, जामुन, खजूर और कई तरह की रसभरियाँ एकत्र की जाती थीं। इस प्रमाण के आधार पर इनामगाँव में लोगों के काम-धर्षी की एक सूची बनाओ।

अन्यत्र

एट्लस में चीन को देखो। लगभग 3500 साल पहले हम यहाँ की लेखन कला के सबसे पुराने उदाहरण पाते हैं। यह जानवरों की हिंदीयों पर लिखा गया था। इन्हें भविष्यवाणी करने वाली हिंदीयों कहा जाता है, क्योंकि यह मान्यता थी कि ये भविष्य बताती हैं। राजा लोग लिपिकारों से इन हिंदीयों पर सवाल लिखवाते थे – क्या वे युद्ध जीतेंगे? क्या फ्रांसल अच्छी होंगी? क्या उन्हें पुत्र होंगे? फिर इन हिंदीयों को आग में डाल दिया जाता था जहाँ इनमें गर्मी से चटक कर दारें पड़ जाती थी। भविष्यवंकता इन दारों को बड़े ध्यान से देखकर भविष्यवाणी करने की कोशिश करते थे। जैसा शायद तुम भी सोच रही होगी ये भविष्यवंकता कभी-कभी गलती भी करते थे। ये राजा शहर्ों में महल बनाकर रहते थे। उन्होंने बेशुमार दौलत इकट्रसी कर ली थी जिनमें बड़े-बड़े नक्काशी किए हुए कॉंस के बर्तन शामिल थे। लेकिन वे लोहें का इस्तेमाल करना नहीं जानते थे। खरबवेद के राजा और इन राजाओं के बीच कोई एक फ़र्क बताओ। तुम 3000 वर्ष पहले के इनामगाँव में रहती हो। पिछली रात सरदार की मृत्यु हो गई। आज, तुम्हारे माता-पिता द्रफन की तैयारी कर रहे हैं। यह बताते हुए सारे दृश्य का वर्णन करे कि अंतिम संस्कार के लिए कैसे भोजन तैयार किया जा रहा है। तुम्हें क्या लगता है, खाने में क्या दिया जाएगा?
Image summary: यह चित्र एक प्राचीन शिलालेख है। इसमें एक पत्थर की सतह पर उकेरी गई पुरानी लिपि के कई स्तंभ दिखाई दे रहे हैं, जिनमें विभिन्न प्रतीकों और अक्षरों का उपयोग किया गया है। यह दर्शाता है कि यह किसी प्राचीन सभ्यता का लिखित दस्तावेज़ है, जिसका उपयोग उस समय के महत्वपूर्ण संदेशों या रिकॉर्ड्स को सुरक्षित रखने के लिए किया गया होगा।
उपयोगी शब्द
- वेदों की रचना का प्रार्थ (लगभग 3500 साल पहले)
- महापाषाणों के निर्माण की शुरुआत (लगभग 3000 साल पहले)
- इनामगाँव में कृषकों का निवास (3600 से 2700 साल पहले)
- ▶ चरक (लगभग 2000 साल पहले)
1. निम्नलिखित को सुमेल करो :
- सूक्त सजाएं गए पत्थर
- रथ अनुष्ठान
- यह अच्छी तरह से बोला गया
- दास महापाषाण युद्ध में प्रयोग किया जाता था गुलाम
2. वाक्यों को पूरा करो
- (क) _____ के लिए दासों का इस्लामल किया जाता था।
- (ख) ___ में महापाषाण पाए जाते हैं।
- (ग) जमीन पर गोले में लगाए गए पत्थर या चट्टान ___ का काम करते थे।
- (घ) पोर्ट-होल का इस्तेमाल ___ के लिए होता था।
- (ड) इनामगाँव के लोग ___ खाते थे।

आओ चर्चि करें

3. आज हम जो किताबे पढ़ते हैं वे जगवैद से कैसे भिन्न हैं?
Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में एक लड़का और एक लड़की को एक साथ चलते हुए और आपस में बातचीत करते हुए दिखाया गया है, जिसमें लड़की ने अपनी पीठ पर एक बस्ता टांगा हुआ है। इस चित्र से यह निष्कर्ष निकलता है कि दोनों मित्र या सहपाठी हैं जो खुशी-खुशी स्कूल जा रहे हैं या स्कूल से वापस लौट रहे हैं।
4. पुरातत्त्विक कब्जा में दृश्यताएँ गए लोगों के बीच सामाजिक अंतर का पता कैसे लगाते हैं?
5. एक राजा का जीवन दास या दासी के जीवन से कैसे भिन्न होता था?

आओ करके देखें

6. पता करो कि तुम्हारे विद्यालय के पुस्तकालय में धर्म के विषय पर कियाबे हैं या नहीं। उस संग्रह से किन्हीं पाँच पुस्तकों के नाम बताओ।
7. एक याद की हुई कविता या गीत लिखो। तुमने उस कविता या गीत को सुनकर याद किया था या पढ़कर?
8. ऋत्वेद में लोगों का वर्गिकरण उनके कार्य या उनकी भाषा के आधार पर किया जाता है। नीचे की तालिका में तुम छ: परिचित लोगों के नाम भरो। इनमें तीन पुरुष और तीन महीला होने चाहिए। प्रत्येक का पेशा और भाषा लिखो। क्या तुम उस विवरण में कुछ और जोड़ना चाहोगी?
Table summary: यह तालिका पूरी तरह से खाली है और इसमें कोई डेटा उपलब्ध नहीं है।
क्या बताती है हमें किताबे और कब्रे

अध्याय 6

राज्य, राजा और एक प्राचीन गणराज्य

Image summary: यह एक तस्वीर है। इस चित्र में एक लड़का बैठा हुआ है जिसने स्कूल की वर्दी पहनी हुई है और वह सोच में डूबा हुआ प्रतीत हो रहा है। लड़के की शारीरिक मुद्रा और चेहरे के हाव-भाव से यह निष्कर्ष निकलता है कि वह किसी गंभीर विषय पर विचार कर रहा है या उलझन में है।

चुनाव का दिन

जब शंकरन उठा तो उसने देखा कि उसके नाना-नानी वोट डालने जा रहे थे। दरअसल वे चुनाव कंद पर सबसे पहले पहुँचना चाहते थे। शंकरन जानना चाहता था कि आधির वे इतने उत्साहित क्यां थे। उसके नानाजी ने उसे जल्दी मंसमझाने की कोशिश की और कहा, "आज हम अपने शास्कों का चुनाव करने जा रहे हैं। "

कुछ लोग शासक कैसे बने?

लगभग पचास वर्षों से हम अपने शासकों का चुनाव मतदान के जिर्प करते आ रहे हैं। लेकिन बहुत पहले लोग शासक कैसे बनते थे? हमने अध्याय 5 में यह पढ़ा है कि कुछ राजा संभवत: जन यानी लोगों द्वारा चुने जाते थे। परन्तु करीब 3000 साल पहले राजा बनने की इस प्रक्रिया में कुछ परिवर्तन दिखाई दिए। कुछ लोग बड़े-बड़े यहाँ को आयोजित कर राजा के रूप में प्रतिष्ठित हो गए। अरखमेध यज एक ऐसा ही आयोजन था। इसमें एक घोड़े को राजा के लोगों की देखरेख में स्वतंत्र विचरण के लिए छोड़ दिया जाता था। इस घोड़े को किसी दूसरे राजा ने रोका तो उसे वहाँ अरखमेध यज करने वाले राजा से लड़ाई करनी पड़ती थी। अगर उन्होंने घोड़े को जाने दिया तो इसका मतलब यह होता था कि अरखमेध यज करने वाला राजा उनसे ज्यादा शक्तिशाली था। इसके बाद उन राजाओं को यज में आमितित किया जाता था। यह यज विशिष्ट पुरोहितों द्वारा सम्पन्न किया जाता था। इसके लिए उन्हें उपहारों से सम्मानित किया जाता था। अरखमेध यज करने वाला राजा बहुत शक्तिशाली माना जाता था। यह में आमितित सभी राजा उसके लिए उपहार लाते थे। इन सभी आयोजनों में राजा का मुख्य स्थान होता था। उसे राजर्शहासन या बाघ की खाल के एक विशेष आसन पर बिठाया जाता था। युद्ध क्षेत्र में राजा का सारथी ही उसका सहचर होता था। यज़ के अवसर पर वह राजा की विजयों तथा अन्य गुणों का गान करता था। राजा के संगे-संबंधी खासकर उसकी रानियों तथा पुत्रों को भी कई छोटे-छोटे अनुष्ठान करने होते थे। अन्य सारे आमितित राजाओं का काम सिर्फ बैठकर यज की पूरी प्रिकाया को देखना भर था। राजा के ऊपर पुरोहित पवित्र जल के चिंडड़काव के साथ-साथ अन्य कई अनुष्ठान करता था। विश्व अथवा वैश्य जैसे सामान्य लोग उपहार लाते थे। जिन्हें पुरोहित शूद्र मानते थे उन्हें कई अनुष्ठानों में शामिल नहीं किया जाता था। इस यह में उपस्थित होने वालों की एक सूची बनाओ। पेशे के आधार पर वहाँ कौन-कोन से वर्ग शामिल थे?

वर्ण

इस समय उत्तर भारत में, खासकर गंगा-यमुना क्षेत्र में, कई प्रथ रचे गए। ऋगवेद के बाद रचे होने के कारण ये उत्तर-वैदिक ग्रह कहे जाते हैं। इनके अंतर्गत सामवेद, यजुवेद, अथर्ववेद तथा अन्य प्रथ शामिल है। पुरोहितों द्वारा रिचत इन ग्रहों में विभिन्न प्रकार के अनुछान और उनके संपादन की विधियों बताई गई हैं। इनमें सामाजिक नियमों के बारे में भी बताया गया है। उस समय समाज में कई समूह थे जिनमें पुरोहित, योद्धा, कृषक, पशुपालक, व्यापारी, शिलेपकार, प्रेमिक, मछली पकड़ने वाले तथा जंगल में रहने वाले लोग शामिल थे। जहाँ कुछ पुरोहित तथा योंढ़ा वैभवशाली थे, वहीं कुछ कृषक और व्यापारी भी धनवात थे। दूसरी ओर पशुपालक, शिलेपकार, प्रेमिक, मछली पकड़ने वाले, शिकारी तथा भोजन-संग्राहक निर्धन थे। पुरोहितों ने लोगों को चार वर्षों में विभाजित किया, जिन्हें वर्ण कहते हैं। उनके अनुसार प्रत्येक वर्ण के अलग-अलग कार्य निर्धारित थे। पहला वर्ष ब्राह्मणों का था। उनका काम वेदों का अध्ययन-अध्यापन और यह करना था जिनके लिए उन्हें उपहार मिलता था। दूसरा स्थान शास्कों का था, जिन्हें श्रिय कहा जाता था। उनका काम युद्ध करना और लोगों की रक्षा करना था। तीसरे स्थान पर विश्व या वैश्य थे। इनमें कृषक, पशुपालक और व्यापारी आते थे। क्षत्रिय और वैश्य दोनों को ही यह करने का अधिकार प्राप्त था। वर्ण में अतिम स्थान शूद्रों का था। इनका काम अन्य तीनों वर्णों की सेवा करना था। इन्हें कोई अनुष्ठान करने का अधिकार नहीं था। प्राय: औरतों को भी शूद्रों के समान माना गया। मिहलाओं तथा शूद्रों को वेदों के अध्ययन का अधिकार नहीं था।
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पुराहितों के अनुसार सभी वर्णों का निर्धारण जन्म के आधार पर होता था। उदाहरण के तौर पर, ब्राह्मण माता-पिता की संतान ब्राह्मण ही होती थी। बाद में कुछ लोगों को अछूत माना गया। अछूत वर्गों में कुछ शिलेपकार, शिकारी तथा भोजन-संग्राहक शामिल थे। साथ ही इनमें वे लोग भी आते थे, जो शांको दर्शनाने या जलाने का काम करते थे। इन लोगों से संपर्क अपविद्र माना जाता था। कई लोगों ने ब्राह्मणों द्वारा बनायी हुई इस वर्ष-व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया। कुछ राजा स्वयं को पुरोहितों से श्रेष्ठ मानते थे। कुछ लोग जन्म के आधार पर वर्ष-निर्भारण सही नहीं मानते थे। इसके अतिरिक्त कुछ लोग व्यवसाय के आधार पर लोगों के बीच भेदभाव उचित नहीं समझते थे। जबकि कुछ लोग चाहते थे कि अनुछान सम्पन्न करने का अधिकार सबका हो। कई लोगों ने छूआछूत की आलोचना की। इस उपमहाद्वीप के पूर्वोत्तर शेषर जैसे कई इलाकों में सामाजिक-आर्थिक असमानता बहुत कम थी। यहाँ पुरोहितों का प्रभाव भी बहुत सीमित था। लोगों ने वर्ण-व्यवस्था का विरोध क्यों किया? चिन्हित धूसर पात्र। इस तरह के पात्रों में ज्यादातर शालियों और कटोरियाँ ही मिली हैं। ये पात्र बहुत ही पतली सतह के सुद्र और चिकने हैं। शायद इसका प्रयोग खास मौकों पर, महत्वपूर्ण लोगों को भोजन परोसने के लिए किया जाता था।

जनपद

Image summary: यह चित्र एक प्राचीन पुरातात्विक वस्तु की तस्वीर है। इसमें मिट्टी से बना एक गहरा कटोरा या पात्र दिखाया गया है जिसकी बाहरी सतह पर कुछ आकृतियाँ उकेरी गई हैं और इसकी बनावट में कई दरारें दिखाई दे रही हैं। इस पात्र की स्थिति और उस पर बनी कलाकृतियों से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह एक बहुत पुरानी सभ्यता का अवशेष है जिसे समय के साथ जोड़कर पुनर्जीवित किया गया है।
महायशों को करने वाले राजा अब जन के राजा न होकर जनपदों के राजा माने जाने लगे। जनपद का शादिक्ष अर्थ जन के बसने की जगह होता है। कुछ महत्वपूर्ण जनपद मानिच्र 4 (पृष्ठ 57) में दिखाए गए हैं। पुरातत्त्वविदो ने इन जनपदों की कई बित्तयों की खुदाई की है। दिल्ली में पुराना किला, उत्तर प्रदेश में मेरठ के पास हितनापुर और एटा के पास अतर्जीखेड़ा इनमें प्रमुख है। खुदाई से पता चला है कि लोग झोपिड्यों में रहते थे और मवेशियां तथा अन्य जानवर्ग को पालते थे। वे चாவल, गेहू, धान, जो, दालं, गना, तिल तथा सरसों जैसी फसलों उगाते थे। क्या इस सूची में तुम्हे किसी ऐसी फ्रासल का नाम मिला जिसका उल्लेख अध्याय 4 में नहीं है? लोग मिट्टी के बर्तन भी बनाते थे। इनमें कुछ धूसर और कुछ लाल रंग के होते थे। इन पुरास्थलों में कुछ विशेष प्रकार के बर्तन मिले हैं, जिन्हें 'चित्रित-धूसर पात्र' के रूप में जाना जाता है। जैसा कि इनके नाम से ही स्पष्ट है, इन बर्तनों पर चित्रकारी की गई है। ये आमतौर पर सरल रेखाओं तथा ज्यामितीय आकृतियों के रूप में हैं।

महाजनपद

करीब 2500 साल पहले, कुछ जनपद अधिक महत्वपूर्ण हो गए। इन्हें महाजनपद कहा जाने लगा। मानचित 4 में कुछ महाजनपदों को दिखाया गया है। अधिकतर महाजनपदों की एक राजधानी होती थी। कई राजधानियों में किलेबंदी की गई थी अर्थात् इनके चारों ओर लकड़ी, इंट या पत्थर की ऊँची दीवारों बनाई गई थी। ऐसा लगता है कि लोगों ने अन्य राजाओं के आक्रमण से डरकर अपनी सुरक्षा के लिए इन किलों का निर्माण किया। कुछ राजा अपनी राजधानी के चारों ओर विशाल, ऊँची और प्रभावशाली दीवार खड़ी कर अपनी समृद्धि और शिक्षित का प्रदर्शन भी करते थे। इस तरह से किले के अंदर रहने वाले लोगों और उस क्षेत्र पर नियत्रण रखना भी सरल हो जाता है। इस तरह की विशाल दीवार बनाने के लिए व्यापक योजना की आवश्यकता थी और लाखों की संख्या में इति तथा पत्थरों का इतजাম करना पड़ता था। हजारों स्री-पुरुषों तथा बच्चों ने इसके लिए अधिक परिश्रम किया होगा। इनके लिए संसाधनों की आवश्यकता पड़ती होगी। अब राजा सेना रखने लगे थे। सिपिहायी को नियमित वेतन देकर पूरे साल रखा जाता था। कुछ भुगतान संभवत: आहत सिक्कों (पृष्ठ 92 पर चित्र देखो) के रूप में होता था। इन सिक्कों के बारे में तुम अभ्याय 9 में पढ़ोगे। महाजनपदों के राजा क्रगवेद में उल्लोखित राजाओं से किस प्रकार भिन्न थे? दो अंतर बताओ।
Image summary: यह एक ऐतिहासिक स्थल की वास्तविक तस्वीर है। इस चित्र में पत्थरों से बनी एक विशाल सीढ़ीनुमा संरचना दिखाई दे रही है, जिसके पास एक व्यक्ति खड़ा है और बगल में एक ऊँची चट्टानी दीवार है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यह प्राचीन वास्तुकला का एक नमूना है और व्यक्ति की तुलना में संरचना का आकार काफी बड़ा और विस्तृत है।
Figure 4 summary: यह एक मानचित्र है। इसमें प्राचीन भारत के महत्वपूर्ण जनपदों, महाजनपदों और प्रमुख नगरों के साथ-साथ विभिन्न नदियों की भौगोलिक स्थिति को दर्शाया गया है। इस मानचित्र से यह निष्कर्ष निकलता है कि प्राचीन बस्तियां और नगर मुख्य रूप से नदियों के किनारे विकसित हुए थे, जिससे यह स्पष्ट होता है कि जल संसाधनों की उपलब्धता सभ्यता के विकास और व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थी।

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महाजनपदों के राजा विशाल किले बनवते थे और बड़ी सेना रखते थे, इसलिए उन्हें प्रचुर संसाधनों की आवश्यकता होती थी। इसके लिए उन्हें कर्मचारियों की भी आवश्यकता होती थी। अत: महाजनपदों के राजा लोगों द्वारा समय-समय पर लाए गए उपहारों पर निर्भर न रहकर अब नियमित रूप से कर वसूलने लगे।
• फ्रांसलों पर लगाए गए कर सबसे महत्वपूर्ण थे क्योंकि अधिकांश लोग कृषक ही थे। प्राय: उपज का 1/6वां हिस्सा कर के रूप में निर्धारित किया जाता था जिसे भाग कहा जाता था।
• कार्गेगरों के ऊपर भी कर लगाए गए जो प्राय: श्रम के रूप में चुकाए जाते थे। जैसे कि एक बुनकर, लोहर या सुनार को राजा के लिए महीने में एक दिन काम करना पड़ता था।
- पशुपालको को जानवरों या उनके उत्पाद के रूप में कर देना पड़ता था।
- व्यापारियों को सामान खरीदने-बेचने पर भी कर देना पड़ता था।
- आखेटकों तथा संग्राहकों को जंगल से प्राप्त वस्तुएँ देनी होती थीं।
आखेटक तथा खाद्य-संग्राहक राजाओं को क्या देते होंगे?

कृषि में परिवर्तन

इस युग में कृषि के क्षेत्र में दो बड़े परिवर्तन आए। हल के फाल अब लोहे के बनने लगे। अब कठोर जमीन को लकड़ी के फाल की तुलना में लोहे के फाल से आसानी से जोता जा सकता था। इससे फसलों की उपज बढ़ गई। दूसरे, लोगों ने धान के पीछा का रोपण शुरू किया अर्थात् खेतों में बीजंछिड़ककर धान उपजाने के बजाप धान की पीछा तैयार कर उनका रोपण शुरू किया गया। अब पहले की तुलना में बहुत ज्यादा पौधे जीवित रह जाते थे, इसलिए पैदावार भी ज्यादा होने लगी। इसमें कमरतोड़ परिश्रम लगता था। ये काम ज्यादातर दास, दासी तथा भूमिहीन खेतितर मजदूर (कममकार) करते थे। क्या तुम बता सकते हो कि राजा इन परिवर्तनों को प्रोत्साहन क्यों देते होंगे?
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सूक्ष्म-निरोधण

(क) मगध

मानचित 4 (पृष्ठ 57) में मगध दूढों। लगभग दो सौ सालों के भीतर मगध सबसे महत्वपूर्ण जनपद बन गया। गंगा और सोन जैसी नदियाँ मगध से होकर बहती थीं। ये - (क) यातायात, (ख) जल-वितरण और (ग) जमीन को उपजाऊ बनाने के लिए बहुत महत्वपूर्ण थीं। मगध का एक हिस्सा जंगलों से भरा था। इन जंगलों में रहने वाले हाथियों को पकड़ कर और उन्हें प्रिशिक्षा कर सेना के काम में लगया जाता था। यही नहीं, जंगलों से घर, गिडियों, तथा रथ बनाने के लिए लकड़ी मिलती थी। इसके अलावा इस क्षेत्र में लौह अयसक की खदाने हैं। मजबूत औजार और हिथियार बनाने के लिए ये बहुत उपयोगी थे। मगध में दो बहुत ही शिक्षितशाली शासक बिम्बसार तथा अजातसनु (अजातशत्रु) हुए। अन्य जनपदों को जीतने के लिए ये हर संभव साधन अपनाते थे। महापद्मनंद एक और महत्वपूर्ण शासक थे। उन्होंने अपने नियर्तण का क्षेत्र इस उपमहाद्रिप के उत्तर-पश्चिम भाग तक फैला लिया था। बिहार में राजगृह (आधुनिक राजगिरि) कई सालों तक मगध की राजधानी बनी रही। बाद में पटिलपुत्र (आज का पटना) को राजधानी बनाया गया। 2300 साल से भी पहले की बात है, मेसिडोनिया का राजा सिकंदर विश्व-विजय करना चाहता था। पूरी तरह सफल न होने पर भी वह मिश्र और पश्चिम एशिया के कुछ राज्यों को जीतता हुआ भारतीय उपमहाद्वीप में व्यास नदी के किनारे तक पहुँच गया। जब उसने मगध की ओर कूच करना चाहा, तो उसके सिपाहियों ने इंकार कर दिया। वे इस बात से भयभीत थे, कि भारत के शासकों के पास पैदल, रथ और हाथियों की बहुत बड़ी सेना थी। इन सेनाओं और ऋगवेद में उल्लोषित सेनाओं के बीच तुम्हे क्या अंतर दिखता है?

(ख) वर्जि

जैसा कि तुमने ऊपर पढ़ा, मगध एक शिक्षितशाली राज्य बन गया था। उसके नजदीक ही विजय राज्य था, जिसकी राजधानी वैशाली (बिहार) थी। यहाँ एक अलग किसम की शासन-त्यवस्था थी जिसे गण या संघ कहते थे। गण या संघ में कई शासक होते थे। कभी-कभी लोग एक साथ शासन करते थे, जिसमें से प्रत्येक व्यक्ति राजा कहलाता था। ये सभी राजा विभिन्न अनुछानों को एक साथ सम्मान करते थे। सभी और में बैठकर ये बातचीत, बहस और वाद-विवाद के जरिए तक करते थे कि क्या करना है और किस तरह करना है। शुभुओं के आक्रमण से निपटने के लिए वे मिलकर चर्नीए करते थे। सिर्यां, दास तथा कममकार इन सभी और में हिस्सा नहीं ले सकते थे। बुद्ध तथा महावीर (जिनके बारे में तुम अध्याय 7 में पढ़ोंगे) दोनों ही गणया संघ से संबंधित थे। बौद्ध साहित्य में संघ के जीवन का बहुत ही सजीव वर्णन मिलता है।
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गण शब्द का प्रयोग कई सदस्यों वाले समूह के लिए किया जाता है। संघ संघ अर्थात् संगठन या सभा।
विज्ज संघ का यह वर्णन दींघ निकाय से लिया गया है। दींघ निकाय एक प्रसिद्ध बौद्ध ग्रंथ है, जिसमें बुद्धिके कई व्याख्यान दिए गए हैं। इन्हें करीब 2300 साल पहले लिखा गया था।

अजासात् ( अजातशत्रु ) और विज्ञ-संघ

अजतासतु विज्ञ-संघ पर आक्रमण करना चाहते थे। उन्होंने अपने मंत्री वस्सकार को बुद्धि के पास सलाह के लिए भेजा। बुद्ध ने उनसे पूछा कि क्या विज्ञ सभाएँ नियमित रूप से होती हैं तथा उनमें सभी सदस्य उपस्थित होते हैं? जब उन्हें पता चला कि ऐसा होता है, उन्होंने कहा कि विज्ञवासी तब तक उननित करते रहेंगे, जब तक:
• वे पूर्ण और नियमित सभाएँ करते रहेंगे।
• आपस में मिलजुल कर काम करते रहेंगे।
• पारंपरांक नियमों का पालन करते रहेंगे।
• बड़ों का सम्मान, समর্थन और उनकी बातों पर ध्यान देते रहेगी।
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• विज्ञ महिलाओं के साथ जोर-जबरदستی नहीं करेंगे और उन्हें बंधक नहीं बनाएं।
• शहर्त तथा गांवों में चैत्यों का रखरखाव करेंगे।
- विभिन्न मतावलंबी संतों का सम्मान करेंगे और उनके आने या जाने पर कोई रोक नहीं लगाएंगे। विज्ज संघ अन्य महाजनपदों से कैसे भिन्न था? कम से कम तीन अंतर बताओ।
कई शिक्षितोंली राजा इन संघों को जीतना चाहते थे। इसके बावजूद उनका राज्य अब से लगभग १५०० साल पहले तक चलता रहा। उसके बाद गुणत शासकों ने गण और संघ पर विजय प्राप्त कर उन्हें अपने राज्य में शामिल कर लिया। इनके बारे में तुम अध्याय ११ में पढ़ोगे। अपने एट्लस में यूनान और एथ्स को दूढ़ो।

अन्यत्र

लगभग 2500 साल पहले एथेन्स के लोगों ने एक शासन-व्यवस्था की स्थापना की, जिसे प्रजातंत्र या गणितत्र कहते हैं। यह स्वस्था लगभग 200 सालों तक चली। इसमें 30 साल से ऊपर के उन सभी पुरुषों को पूर्ण नागरिकता प्राप्त थी, जो दास नहीं थे। वहाँ एक सभा थी जो महत्वपूर्ण विषयों पर निर्णय लेने के लिए साल भर में कम से कम 40 बार बुलाई जाती थी। इस सभा में सभी नागरिक भाग ले सकते थे। शासन के कई पदों पर नियुक्तियाँ लॉर्डरियों द्वारा की जाती थीं। सभी नागरिकों को सेना और नौसेना में अपनी सेवाएँ देनी होती थी। ऑरतों को नागरिक का दर्ज नहीं मिलता था। व्यापारियों तथा शिलपकारों के रूप में एथेन्स में रहने और काम करने वाले बहुत से विदेशियों को भी नागरिक अधिकार नहीं मिले थे। एथेन्स में खानों, खेतों, घरों और कार्यशालाओं में काम कर रहे दासों को भी नागरिक अधिकार नहीं मिले थे। क्या एन्नेस में वासतव में जनतत्र था? वैशाली के उस सभागर में तुम अंदर झोंक रहे हो जहाँ मगध के राजाओं द्वारा आक्रमण का सामना करने के विषयों पर चर्चा की जा रही है। तुमने क्या सुना?

आओ याद करें

1. सही या गलत बताओ।

Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में एक छोटी लड़की को दिखाया गया है जो ध्यानपूर्वक एक किताब पढ़ रही है। यह चित्र शिक्षा के प्रति रुचि और पढ़ने की आदत के महत्व को दर्शाता है।
(क) अश्वमेध के घोड़े को अपने राज्य से गुजरने की छूट देने वाले राजाओं को यह में आमंत्रित किया जाता था।
(ख) राजा के ऊपर सारथी पवित्र जल का चिढ़काव करता था।
(ग) पुरातत्त्वविदों को जनपदों की बस्तियों में महल मिले हैं।
(घ) चित्रित-धूसर पात्रों में अनाज रखा जाता था।
(ड.) महाजनपदों में बहुत से नगर क्रियांबंद थे।
2. नीचे दिए गए खानों में निम्नलिखित शब्द भरों आखेतक-संग्राहक, कृषक, व्यापारी, शिल्पकार, पशुपालक।
Image summary: यह एक वैचारिक आरेख या फ्लोचार्ट है। इस चित्र के केंद्र में महाजनपद के राजा का उल्लेख है, जिसके चारों ओर कई खाली बॉक्स जुड़े हुए हैं। यह संरचना दर्शाती है कि राजा केंद्रीय सत्ता है और अन्य विभिन्न प्रशासनिक या सामाजिक कारक उससे जुड़े हुए हैं। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि महाजनपद की शासन व्यवस्था में राजा की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण और केंद्रीय थी।

3. समाज के वे कौन-से समूह थे, जो गणों की सभाओं में हिस्सा नहीं ले सकते थे?

Table summary: यह तालिका प्राचीन शासन व्यवस्था, सैन्य संगठन और सामाजिक संरचना से संबंधित महत्वपूर्ण शब्दावली की एक सूची प्रस्तुत करती है।
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नए शासक (लगभग 3000 साल पहले)
महाजनपद (लगभग 3000 साल पहले)
► सिकंदर का आक्रमण, दीघ निकाय का लेखन (लगभग 2300 साल पहले)
► गण या संघ राज्यों का अंत (लगभग 1500 साल पहले)
1. महाजनपद के राजाओं ने क्रिकेट क्यों बनवाए?
2. आज के शासकों के चुनाव की प्रक्रिया जनपदों के चुनाव से किस तरह भिन्न थी?

आओ करके देखें

Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इसमें एक व्यक्ति को दिखाया गया है जो सोचने की मुद्रा में है और उसकी नजरें ऊपर की ओर हैं। व्यक्ति के चेहरे के हाव-भाव और हाथों की स्थिति से यह निष्कर्ष निकलता है कि वह किसी गहरी सोच, दुविधा या विचार प्रक्रिया में लीन है।
3. तुम्हारी पुस्तक के अंत में दिए गए राजनीतिक मानचितर में अपना राज्य दूढ़ों। क्या वहाँ प्राचीन जनपद थे? अगर हाँ, तो उनके नाम लिखो। अगर नहीं, तो अपने राज्य के सबसे नजदीक पड़ने वाले जनपदों के नाम बताओ।
4. प्रश्न 2 के उत्तर में बताए गए समूहों में से कौन-से समूह आज भी कर देते हैं।
5. प्रश्न 3 के उत्तर में बताए गए समूहों में किन-किन को आज मतदान का अधिकार प्राप्त है?

अध्याय 7

नए प्रश्न नए विचार

अनधा निकली सैर पर

अन�धा आज पहली बार अपने विद्यालय की ओर से सैर पर जा रही थी। इसके लिए उसने देर रात पुणे (महाराष्ट्र) से वाराणसी (उत्तर प्रदेश) की ट्रैन पकड़ी। स्टेशन पर अनधा को छोड़ने आई उसकी माँ ने अध्यापिका से कहा, “बच्चों को बुढ़ु के बारे में बताने के साथ-साथ उन्हें सारनाथ दिखाने भी ले जाइएगा।"

बुद्ध की कहानी

बौद्ध धर्म के संस्थापक सिद्धार्थ थे जिन्हें गौतम के नाम से भी जाना जाता है। उनका जन्म लगभग 2500 वर्ष पूर्व हुआ था। यह वह समय था जब लोगों के जीवन में तेजी से परिवर्तन हो रहे थे। जैसा कि तुमने अध्याय 6 में पढ़ा, महाजनपदों के कुछ राजा इस समय बहुत शक्तिशाली हो गए थे। हजारों सालों के बाद फिर से नगर उभर रहे थे। गाँवों के जीवन में भी बदलाव आ रहा था (अध्याय 10 देखो)। बहुत-से विचारक इन परिवर्तनों को समझने का प्रयास कर रहे थे। वे जीवन के सच्चे अर्थ को भी जानना चाह रहे थे। बुद्धिश्य थे तथा 'शाक्य' नामक एक छोटे से गण से संबंधित थे। युवावस्था में ही जान की खोज में उन्होंने घर के सुखों को छोड़ दिया। अनेक वर्षों तक वे भ्रमण करते रहे तथा अन्य विचारकों से मिलकर चर्नी करते रहे। अंततः जान प्राप्त के लिए उन्होंने स्वयं ही रास्ता दूढ़ने का निश्चय किया। इसके लिए उन्होंने बोध गया (बिहार) में एक पीपल के नीचे कई दिनों तक तपस्या की। अंततः उन्हें जान प्राप्त हुआ। इसके बाद से वे बुद्धि के रूप में जाने गए। यहाँ से वे वाराणसी के निकट स्थित सारनाथ गए, जहाँ उन्होंने पहली बार उपदेश दिया। कुशினारा में मृत्यु से पहले का शेष जीवन उन्होंने पैदल ही एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा करने और लोगों को शिक्षा देने में ल्यतीत किया। सारणाथ सूत्व इस इमारत को स्पूट के नाम से जाना जाता है। यहीं पर बुद्ध न अपना सर्वप्रथम उपदेश दिया था। इसी घटना की स्मृति में यहाँ स्पूट का निर्माण किया गया। अध्याय 12 में तुम इन स्तूपों के बारे में और अधिक पढ़ोगे। बुद्ध ने शिंशा दी कि यह जीवन कष्टों और दुर्बों से भरा हुआ है और ऐसा हमारी इच्छा और लालसाओं (जो हमेशा पूरी नहीं हो सकती) के कारण होता है। कभी-कभी हम जो चाहते हैं वह प्रात कर लेने के बाद भी संतुष्ट नहीं होते हैं एवं और अधिक (अथवा अन्य) वस्तुओं को पाने की इच्छा करने लगते हैं। बुद्ध ने इस लिप्सा को तज्ञ (तृणा) कहा है। बुद्ध ने शिंशा दी कि आत्मसंयम अपनाकर हम ऐसी लालसा से मुक्ति पा सकते हैं। उन्होंने लोगों को द्यालु होने तथा मनुष्यों के साथ-साथ जानवरों के जीवन का भी आदर करने की शिंशा दी। वे मानते थे कि हमारे कर्मों के परिणाम, चाहे वे अच्छे हों या बुरे, हमारे वर्तमान जीवन के साथ-साथ बाद के जीवन को भी प्रभावित करते हैं। बुद्धि ने अपनी शिक्षा सामान्य लोगों की प्रकृत भाषा में दी। इससे सामान्य लोग भी उनके संदेश को समझ सके। वेदों की रचना के लिए किस भाषा का प्रयोग हुआ था? बुद्धे ने कहा कि लोग किसी शिंशा को केवल इसलिए नहीं स्वीकार करें कि यह उनका उपदेश है, बल्कि वे उसे अपने विवेक से मापों। आओ देखो, उन्होंने ऐसा किस प्रकार किया।
Image summary: यह एक तस्वीर है। इसमें एक छोटी लड़की दिखाई दे रही है जिसने लंबी चोटियाँ बनाई हुई हैं और एक स्वेटर पहना हुआ है। वह सीढ़ियों के पास खड़ी है और उसके चेहरे पर गंभीर भाव हैं। इस तस्वीर से यह निष्कर्ष निकलता है कि लड़की किसी सोच में डूबी हुई है या शांत मुद्रा में है।
Image summary: यह एक ऐतिहासिक संरचना की तस्वीर है। इस चित्र में एक प्राचीन बौद्ध स्तूप को दर्शाया गया है जो पत्थरों और ईंटों से निर्मित एक विशाल गुंबद के आकार की संरचना है। इस संरचना की बनावट से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह प्राचीन भारतीय वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है और इसका उपयोग धार्मिक या आध्यात्मिक उद्देश्यों के लिए किया जाता था।

किसागोतमी की कहानी

यह बुद्धि के विषय में एक प्रसिद्ध कहानी है। एक समय की बात है किसागोतमी नामक एक स्त्री का पुत्र मर गया। इस बात से वह इतनी दुःखी हुई कि वह अपने बच्चे को गोद में लिए नगर की सड़कों पर धूम-धूम कर लोगों से प्रार्थना करने लगी कि कोई उसके पुत्र को जीवित कर दे। एक भला व्यक्त उसे बुद्धि के पास ले गया। बुद्धि ने कहा, “मुझे एक मुद्रि सरसों के बीज लाकर दो, मै तुम्हारे पुत्र को जीवित कर दूगा"। किसागोतमी बहुत प्रसन्न हुई। पर जैसे ही वह बीज लाने के लिए जाने लगी तभी बुद्धि ने उसे रोका और कहा, “ये बीज एक ऐसे घर से माँग कर लाओ जहाँ किसी की मृत्यु न हुई हो।” किसागोतमी एक दरवाजे से दूसरे दरवाजे गई लेकिन वह जहाँ भी गई उसने पाया कि हर घर में किसी न किसी के पिता, माता, बहन, भाई, पित, पली, बच्चे, चचा, चाची, दादा या दादी की मृत्यु हुई थी। बुद्धि दुःखी माँ को क्या शिक्षा देने का प्रयास कर रहे थे?

उपनिषद्

जिस समय बुद्धि उपदेश दे रहे थे उसी समय या उससे भी थोड़ा पहले दूसरे अन्य चितक भी कितन्य प्रश्नों का उत्तर दूढ़ने का प्रयास कर रहे थे। उनमें से कुछ मृत्यु के बाद के जीवन के बारे में जानना चाहते थे जबकि अन्य यहाँ की उपयोगीता के बारे में जानने को उस्यूक थे। इनमें से अधिकांश चितकों का यह मानना था कि इस विश्व में कुछ तो ऐसा है जो कि स्थायी है और जो मृत्यु के बाद भी बचा रहता है। उन्होंने इसका वर्णन आत्मा तथा ब्रह्मा अथवा सार्वभौम आत्मा के रूप में किया है। वे मानते थे कि अंततः आत्मा तथा ब्रह्मा एक ही है। ऐसे कई विचारों का संकलन उपनिषदों में हुआ है। उपनिषद्उतर वैदिक ग्रंथों का हिस्सा थे। उपनिषद् का शाब्दक अर्थ है 'गुरु के समीप बैठना'। इन ग्रंथों में अध्यापकों और विद्यारथियों के बीच बातचीत का संकलन किया गया है। प्राय: ये विचार सामान्य वारतलाप के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं।

भारतीय दर्शन की छह पদ্धति (षडदर्शन)

संदिग्धों से, भारत द्वारा सत्य की बौद्धिक खोज का प्रतिनिधित्व दर्शन की छ: शाखाओं ने किया। ये वैशेषिक, न्याय, सांख्य, योग, पूर्व मीमांशा और वेदित या उत्तर मीमांशा के नाम से जाने जाते हैं। दर्शन की इन छ: पृष्ठितियों की स्थापना क्रमश: ऋषि कण्ड, गौतम, कपिल, पतंजिल, जैमिनी और व्यास द्वारा की गयी मानी जाती है, जो आज भी देश में बौद्धिक चर्चों को दिशा देते हैं। जर्मन मूल के ब्रिटिश भारतविद फ्रेडरिक मैक्समूलर के अनुसार दर्शन की इन छ: शाखाओं का विकास कई पीडियों के दौरान व्यक्तिगत विचारकों के योगदान से हुआ। यद्यपि ये एक दूसरे से भिन्न दिखते हैं तथापि सत्य की इनकी समझ में आधारभूत तालमेल दिखता है।

बुद्धमान भीखारी

यह वार्तालाप छादोग्य उपनिषद् नामक प्रसिद्ध उपनिषद् की एक कहानी पर आधारित है। शौनक व अभिप्रतारिण नामक दो ऋषि सार्वभौम आत्मा की उपासना करते थे। एक बार ज्योति वे भोजन करने के लिए बैठे, एक भिखारी आया और भोजन माँगने लगा। शौनक ने कहा, “हम तुम्हे कुछ नहीं दे सकते। ” भिखारी ने पूछा, “विदुजजन, आप किसकी उपासना करते हैं?” अभिप्रतारिण ने उत्तर दिया, “सार्वभौम आत्मा की। ” “ओह! इसका मतलब आप यह जानते हैं कि यह सार्वभौम आत्मा सम्पूर्ण विश्व में विधमान है। ” खर्षियों ने कहा, “हाँ, हाँ, हम यह जानते हैं। ” भिखारी ने फिर पूछा, “अगर यह सार्वभौम आत्मा सम्पूर्ण विश्व में विधमान है तो यह मेरे अंदर भी विधमान है। में कौन हूँ? मैं इस विश्व का एक भाग ही तो हूँ। ” “तुम सत्य बोलते हो, युवा ब्राह्मण। ” “इसलिए ऋषियों, मुझे भोजन न देकर आप उस सार्वभौम आत्मा को भोजन देने से मना कर रहे हैं। ” भिखारी की बात की सच्चाई जानकर ऋषियों ने उसे भोजन दे दिया। भिखारी ने भोजन पाने के लिए ऋषियों को किस तरह मनाया? इन चर्चकों में भाग लेने वाले अधिकांशत: पुरुष ब्राह्मण तथा राजा होते थे। कभी-कभी गारंगी जैसी स्त्री-विचारकों का भी उल्लेख मिलता है। विद्वात के लिए प्रसिद्ध गारंगी राजदरबारों में होने वाले बाद-विवाद में भाग लिया करती थी। निर्धन व्यक्त इस तरह के बाद-विवाद में बहुत कम ही हिस्सा लेते थे। इस तरह का एक प्रसिद्ध अपवाद सत्यकाम जाबाल का है। सत्यकाम जाबाल का नाम उसकी दासी माँ के नाम पर पड़ा। सत्यकाम के मन में सत्य जाने की तीब जिन्हासा उत्पन्न हुई। गौतम नामक एक ब्राह्मण ने उन्हें अपने विद्यार्धी के रूप में स्वीकार किया तथा वह अपने समय के स्वाधिक प्रसिद्ध विचारकों में से एक बन गए। उपनिषदों के कई विचारों का विकास बाद में प्रसिद्ध विचारक शंकरराचार्य के द्वारा किया गया जिनके बारे में तुम कक्षा 7 में पढ़ोगी।

थाकरणविद्�पिनि

इस युग में कुछ अन्य विद्वान भी खोज कर रहे थे। उन्हीं प्रसिद्ध विद्वानों में एक पानीपीने ने সংकृत भाषा के व्याकरण की रचना की। उन्होंने स्वर्ग तथा व्यजानों को एक विशेष क्रम में रखकर उनके आधार पर सूत्र की रचना की। ये सूत्र बीजगिंगत के सूत्रों से काफी मिलते-जुलते हैं। इसका प्रयोग कर उन्होंने সংकृत भाषा के प्रयोगों के नियम लघु सूत्रों (लगभग 3000) के रूप में लिखे।

जेन धर्म

इसी युग में अर्थात् लगभग 2500 वर्ष पूर्व जैन धर्म के 24वें तथा अर्तिम तीर्थकर वर्धमान महावीर ने भी अपने विचारों का प्रसार किया। वह विज्ञंसक के लिच्छित कुल के एक शग्रिय राजकुमार थे। इस संघ के विषय में तुमने अध्याय 6 में पढ़ा है। 30 वर्ष की आयु में उन्होंने घर छोड़ दिया और जंगल में रहने लगे। बारह वर्ष तक उन्होंने कितन व एकाकी जीवन स्पतीत किया। इसके बाद उन्हें जान प्राप्त हुआ। उनकी शिक्षा सरल थी। सत्य जानने की इच्छा रखने वाले प्रत्येक स्वीव पुरुष को अपना घर छोड़ देना चाहिए। उन्हें अहिंसा के नियमों का कड़ाई से पालन करना चाहिए अर्थात् किसी भी जीव को न तो कष्ट देना चाहिए और न ही उसकी हत्या करनी चाहिए। महावीर का कहना था, “सभी जीव जीना चाहते हैं। सभी के लिए जीवन प्रिय है। ” महावीर ने अपनी शिक्षा प्राकृत में दी। यही कारण है कि साधारण जन भी उनके तथा उनके अनुचारियों की शिक्षाओं को समझ सके। देश के अलग-अलग हिस्सों में प्राकृत के अलग-अलग रूप प्रचलित थे। प्रचलन क्षेत्र के आधार पर ही उनके अलग-अलग नाम थे जैसे मगध में बोली जाने वाली प्राकृत, मागधी कहलाती थी। जैन नाम से जाने गए महावीर के अनुयायियों को भोजन के लिए भिशमा माँगकर सादा जीवन बिताना होता था। उन्हें पूरी तरह से इमानदार होना पड़ता था तथा चोरी न करने की उन्हें सज्जन हिदायत थी। उन्हें ब्रह्मर्च का पालन करना होता था। पुरुषों को वस्त्रों सहित सब कुछ ल्याग देना पड़ता था।
जैन
जैन शब्द 'जिन' शब्द से निकला है जिसका अर्थ है 'विजेता'। महावीर के लिए 'जिन' शब्द का प्रयोग क्या हुआ? अधिकांश व्यक्तियों के लिए ऐसे कड़े नियमों का पालन करना बहुत कितन था। फिर भी हजारों व्यक्तियों ने इस नई जीवन शैली को जानने और सीखने के लिए अपने घरों को छोड़ दिया। कई अपने घरों पर ही रहे और भिक्षु-शिक्षुवणी बने लोगों को भोजन प्रदान कर उनकी सहायता करते रहे। मुख्यत: व्यापारियों ने जैन धर्म का समर्थन किया । किसानों के लिए इन नियमों का पालन अत्यंत कितन था क्योंकि फ्रासल की रक्षा के लिए उन्हें कीड़-मकौड़ों को मारना पड़ता था। बाद की सदियों में जैन धर्म, उत्तर भारत के कई हिस्सों के साथ-साथ गुजरात, तिमलनाडु और कनर्नटक में भी फैल गया। महावीर तथा उनके अनुयायियों की शिश्षाएँ कई शताब्दियों तक मौखिक रूप में ही रही । वर्तमान रूप में उपलब्ध जैन धर्म की शिश्षाएँ लगभग १५०० वर्ष पूर्व गुजरात में वर्ललभी नामक स्थान पर लिखी गई थी (मानचित 7, पृष्ठ ११३ देखें)।
संघ
महावीर तथा बुद्ध दोनों का ही मानना था कि घर का ल्याग करने पर ही सच्चे जान की प्राप्ति हो सकती है। ऐसे लोगों के लिए उन्होंने संघ नामक संगठन बनाया जहाँ घर का ल्याग करने वाले लोग एक साथ रह सके। সংঘ মে রহনে বলে বৌদ্ধ বিধ্ধুঞ্জীনে কে লিপ বনাগ গণ নিয়ম বিনয্যপত্তক নামক গ্রথ মে মিলতে র্দ্জিত। বিনয্যপত্তক সে হর্মস পতা শুলতা নে কি সর্বম মে পুরোন আর সিব্যায় কে রহনে কী অলগ-অলগ ব্যবস্থা থী। সর্থী ব্যক্তন সর্বম মে প্রবেশ লে সকতে থে। হাল্টিক সর্বম মে প্রবেশ কে লিপ বছরীন কে অপনে মাতা-পিতা সে, দাসের কে অপনে স্বামী সে, রজাতে কে যর্থনা কারণে বলে লোগ্স কে রজাতে সিব্যায়, তথ্য কর্জদারের কে অপনে দেনদারের সে অনুমতি লেনে হোলীখী। ঐক স্থায় কে ইসকে লিপ অপনে পতি সে অনুমতি লেনে হোলী খী। সংঘ মে প্রবেশ লেনে বলে স্ত্রী-পুরুষ বহুত সাদা জীবন জীত খে। বেশনা অধিকাংশ সময় ধ্যান করলে মে বিত্তিত খে আর দিন কে ঐক নিশ্চিত সময় মে বে সাহরো তথ্য গাঁদা মে জাকর বিধ্যা মারুতে থে। যদি কারণ হলে কি উঠে বিশ্বস্ত তথ্য বিশ্বস্তপক্ষ (সাধু-বিশ্বস্তর) কে লিপে প্রাকৃত শব্দ) কথা গয। বে আম লোগুস কে বিশ্বসত দিখে আর সাথে হী ঝে-দুয়ের কে সহায়তা থি করতে थे। किसी तरह की आपसी लड़ाई का निपटारा करने के लिए वे प्राय: बैठके भी किया करते थे। संघ में प्रवेश लेने वालों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, व्यापारी, मजदूर, नाई, गणिकाएँ तथा दास शामिल थे। इनमें से कई लोगों ने बुद्धि की शिक्षाओं के विषय में लिखा तथा कुछ लोगों ने संघ में अपने जीवन के विषय में सुंदर कविताओं की रचना की। पिछले अध्याय में विणित संघ और इस अध्याय में विणित संघ के बीच दो भिन्नताएँ बताओ। क्या इनमें कोई समानताएँ दिखती हैं?

विहार

జేసి తహ బోద్ద భిష్కవు పురే సాల ఏక స్తూన సే దుసరే స్తూన చుమ్మె ఛుప్ ఉపదేశా దియా కరతే తే1 కేవల వఫ్ ఞ్తు యే జవ యాత్రా కరనా కితిన హి జాతా ధా తో వే ఏక స్తూన పర హి నివాస కరతే తే1 ఏసే సమయ ఏ ఏపనే ఒనుయాయి థిరా ఢూన్ ఢం ఒనవాష గా ఐ ఒస్తూని నివాసో ఏ ఒనవాప ఐ ఒనవాష గా ఐ ఒనవాప ఐ ఒనవాష గా ఐ ఒనవాప ఐ ఒనవాష గా ఐ ఒనవాప ఐ ఒనవాష గా ఐ ఒనవాప ఐ ఒనవాష గా ఐ ఒనవాప ఐ ఒనవాష గా ఐ ఒనవాప ఐ ఒనవాష గా ఐ ఒనవాప ఐ ఒనవాష గా ఐ ఒనవాప ఐ ఒనవాష గా ఐ ఒనవాప ఐ ఒనవాష గా ఐ ఒనవాప ఐ ఒనవాష గా ఐ ఒనవాప ఐ ఒనవాష గా ఐ ఒనవాప ఐ ఒనవాష గా ఐ ఒనవాప ఐ ఒనవాష గా ఐ ఒనవాప ఐ ఒనవాష గా ఐ ఒనవాప ఐ ఒనవాష గా ఐ ఒనవాప ఐ ఐ ఒనవాష గా ఐ ఒనవాప ఐ ఐ ఐ जैसे-जैसे समय बीतता गया भिक्षु-भिक्षुविण्यों ने स्वयं तथा उनके समर्थकों ने अधिक स्थायी शरणस्थलों की आवश्यकता का अनुभव किया। तब कई शरणस्थल बनाए गए जिन्हें विहार कहा गया। आरंभिक विहार लकड़ी के बनाए गए तथा बाद में इनके निर्माण में इटों का प्रयोग होने लगा। पश्चिम भारत में विशेषकर कुछ विहार पहाडियों को खोद कर बनाए गए। पहाड़ी को काटकर बनाई गई एक गुफा। यह काल्न (वर्तमान महाराष्ट्र में) स्थित एक गुफा है। भिक्षु-भिक्षुवणी इन शरण स्थलों में रहकर ध्यान किया करते थे।
Image summary: यह एक वास्तविक स्थल की तस्वीर है। इस चित्र में एक विशाल प्राकृतिक चट्टान के नीचे तराशी गई गुफाएं और उनके सामने पानी से भरा एक छोटा जलाशय दिखाया गया है। यह दृश्य दर्शाता है कि प्राचीन समय में मानव ने प्राकृतिक संरचनाओं का उपयोग करके रहने या पूजा के स्थान बनाए थे, जहाँ जल की उपलब्धता ने इन स्थलों के चयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई होगी।
एक बौद्ध ग्रंथ से जात होता है:
जिस तरह महासागरों में मिलने पर नदियों की अलग-अलग पहचान समाप्त हो जाती है टीक उसी तरह बुढ़ के अनुयायी जब भिषुओं की श्रेणी में प्रवेश करते हैं तो वे अपना वर्ण, श्रेणी और परिवार सब ल्याग देते हैं। प्राय: किसी धनी व्यापारी, राजा अथवा भू-स्वामी द्वारा दान में दी गई भूमि पर विहार का निर्माण होता था। स्थानीय व्यक्ति भिक्षु-भिक्षुवின्यों के लिए भोजन, वस्त्र तथा द्वाइियाँ लेकर आते थे जिसके बदले ये भिक्षु और भिक्षुवின लोगों को शिक्षा देते थे। आगे आने वाली शताब्दियों में बौद्ध धर्म उपमहाद्वीप के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ बाहरी क्षेत्रों में भी फैल गया। अभ्याय 10 में तुम इनके बारे में और अधिक पढ़ोगे।

आश्रम-ल्यवस्था

जैन तथा बौद्ध धर्म जिस समय लोकप्रिय हो रहे थे लगभग उसी समय ब्राह्मणों ने आश्रम-च्यवस्था का विकास किया। यहाँ आश्रम शब्द का तात्यय लोगों द्वारा रहने तथा ध्यान करने के लिए प्रयोग में आने वाले स्थान से नहीं है, बल्कि इसका तात्यय जीवन के एक चरण से है। ब्राह्मण, गृह्मश, वानप्रश्त तथा संन्यास नामक चार आश्रमों की व्यवस्था की गई। ब्राहार्य के अंतर्गत ब्राहण, क्षत्रिय तथा वैश्य से यह अपेक्षा की जाती थी कि इस चरण के दौरान वे सादों जीवन बिताकर वेदों का अध्ययन करेंगे। गृहस्थ आश्रम के अंतर्गत उन्हें विवाह कर एक गृहस्थ के रूप में रहना होता था। वानप्रस्थ के अंतर्गत उन्हें जंगल में रहकर साधना करनी थी। अंततः उन्हें सब कुछ ल्यागकर संन्यासी बन जाना था। आश्रम व्यवस्था ने लोगों को अपने जीवन का कुछ हिस्सा ध्यान में लगाने पर बल दिया। प्राय: सिख्यों को वेद पढ़ने की अनुमति नहीं थी और उन्हें अपने पितयों द्वारा पालन किए जाने वाले आश्रमों का ही अनुसरण करना होता था। संघ के जीवन से आश्रमों की यह व्यवस्था किस तरह भिन्न थी? यहाँ किन बाणों का उल्लेख हुआ है? क्या सभी चार बाणों को यह आश्रम व्यवस्था अपनाने की अनुमति थी? एटलस में इंान दूढों। जरथुस्त्र एक इरानी पैगम्बर थे। उनकी शिक्षाओं का संकलन जेन्द-अवेस्ता नामक प्रथ में मिलता है। जेन्द-अवेस्ता की भाषा तथा इसमें विण्त रीति-रिवाज, वेदों की भाषा और रीति-रिवाजों से कार्फी मिलते-जुलते हैं। जरथुस्त्र की मूल शिश्ता का सूत्र है : 'सद्-विचार, सत्-वचन तथा सत्-कार्य। '
'हे ईश्वर! बल, सत्य-प्रधानता एवं सद्विचार प्रदान कीजिए, जिनके जरिए हम शांति बना सके।'
एक हजार से अधिक वर्षों तक जरथुस्वाद इरान का एक प्रमुख धर्म रहा। बाद में कुछ जरथुस्वादी इरान से आकर गुजरात और महाराष्ट के ततिय नगरों में बस गए। वे लोग ही आज के पारिसियों के पूर्वज हैं।

कल्पना करो

तुम लगभग 2500 वर्ष पूर्व के एक उपदेशक को सुनने जाना चाहती हो। वहाँ जाने की अनुमति लेने के लिए तुम अपने माता-पिता को कैसे सहमत करोगी, इसका वर्णन करो।

आओ याद करें

Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में एक लड़की को दिखाया गया है जो ध्यानपूर्वक एक किताब पढ़ रही है। इस चित्र से यह निष्कर्ष निकलता है कि लड़की पढ़ने की गतिविधि में पूरी तरह से लीन है और उसे पढ़ाई में रुचि है।
1. बुद्ध न लोगों तक अपने विचारों का प्रसार करने के लिए किन-किन बातों पर जोर दिया?
2. 'सही' व 'गलत' वाक्य बताओ।
(क) बुद्ध न पशुबलि को बढ़ावा दिया।
(ख) बुद्ध द्वारा प्रथम उपदेश सारनाथ में देने के कारण इस जगह का बहुत महत्व है।
उपयोगी शब्द
- तज्ञ (तृष्णा)
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- प्राकृत
- आत्मा
- ब्रह्म
- उपनिषद्
- जैन
- अहिंसा
- भिन्नखु
- संघ
- विहार
- आप्रम
नए प्रश्न नए विचार
- उपनिषदों के विचारक, जेन महावीर तथा बुद्ध (लगभग 2500 वर्ष पूर्व)
- ▶ जैन ग्रंथों का लेखन (लगभग 1500 वर्ष पूर्व)
- (ग) बुद्धे न शिश्धा दी कि कर्म का हमारे जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
- (घ) बुद्ध ने बौध गया में जान प्राप्त किया।
- (ड) उपनिषदों के विचारकों का मानना था कि आत्मा और ब्रह् वास्तव में एक ही है।
3. उपनिष्ऱदो के विचारक किन प्रश्नों का उत्तर देना चाहते थे?
4. महावीर की प्रमुख शिक्षार्णं क्या थीं?
आओं चर्नी करें
Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में दो बच्चे एक साथ चलते हुए और आपस में बातचीत करते हुए दिखाई दे रहे हैं, जिनमें से एक ने पीठ पर बस्ता टांगा हुआ है। इस चित्र से यह निष्कर्ष निकलता है कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं या स्कूल से वापस आ रहे हैं और उनके बीच मित्रतापूर्ण संबंध हैं।
5. अन्या की माँ क्यां चाहती थी कि उनकी बेटी बुद्धि की कहानी से परिचित हो? तुम्हारा इसके बारे में क्या कहना है?
6. क्या तुम सोचते हो कि दासों के लिए संघ में प्रवेश करना आसान रहा होगा, तक सहित उत्तर दो।
आओ करके देखें
Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में एक व्यक्ति को दिखाया गया है जो अपने चेहरे पर हाथ रखकर ऊपर की ओर देख रहा है। व्यक्ति की शारीरिक मुद्रा और चेहरे के हाव-भाव से यह निष्कर्ष निकलता है कि वह किसी गहरी सोच में है या किसी समस्या का समाधान खोजने का प्रयास कर रहा है।
7. इस अध्याय में उल्लिखित कम से कम पाँच विचारों तथा प्रश्नों की सूची बनाओ। उनमें से किन्हीं तीन का चुनाव कर चर्च करो कि वे आज भी क्यों महत्वपूर्ण हैं?
8. आज दुनिया का ल्याग करने वाले सिख्यों और पुरुषों के बारे में और अधिक जाने का प्रयास करो। ये लोग कहाँ रहते हैं, किस तरीके के कपड़े पहनते हैं तथा क्या खाते हैं? ये दुनिया का ल्याग क्या करते हैं?

अध्याय 8

अशोक: एक अनोखा समाट जिसने युद्ध का त्याग किया

रौशन के रूपए
जन्मदान पर रैशन को दादा जी से कड़क नोट मिले। उसने उन्हें अपने हाथ में दबा रखा था। उसे एक नया सीड़ी ख्रीदने का बहुत मन था लेकिन साथ ही वह बिलकुल नए कड़क नोटों को देखना और छू कर महसूस करना चाहती थी। तभी उसने पाया कि सभी नोटों में दाहिनी तरफ गाँधीजी का मुसकराता चेहरा बना हुआ था और बाई तरफ छोटे-छोटे शेर चिचित तो उसने सोचा 'आविरह यहाँ शेर क्या बने हुए हैं'।

एक बहुत बड़ा राज्य - एक साम्राज्य

हम जिन शेरों के चित्र रुपयों-पैसों पर देखते हैं उनका एक लंबा इतिहास है। उन्हें पत्थरों को काट कर बनाया गया और फिर उन्हें सारनाथ में एक विशाल संक्षेप पर स्थापित किया गया था। (इस विषय में तुमने अध्याय 7 में पढ़ा।) इतिहास के महानतम राजाओं में से एक, अशोक के निर्देश पर इसके जैसे कई स्तंभों और पत्थरों पर अभिलेख उत्कीर्णिकिए गए। इसके पहले कि हम यह जानें कि इन अभिलेखों में क्या लिखा है, यह समझने की कोशिश करें कि उनके राज्य को सामाज्य क्या कहा जाता है। अशोक जिस साम्राज्य पर शासन करते थे उसकी स्थापना उनके दादा चन्द्रगुप्त मौर्य ने लगभग २३०० साल पहले की थी। चाणक्य या कौटिल्य नाम के एक बुद्धिमान व्यक्त ने चन्द्रगुप्त की सहायता की थी। चाणक्य के कई विचार हमें अर्थशास्त्र नाम की किताब में मिलते हैं।
विश
Image summary: यह एक तस्वीर है। इस चित्र में स्कूल की वर्दी पहने हुए बच्चों का एक समूह दिखाया गया है, जिसमें एक छात्रा मुख्य केंद्र में है। इस तस्वीर से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह स्कूली शिक्षा और बच्चों के शैक्षिक वातावरण को दर्शाता है।
Image summary: यह एक ऐतिहासिक मूर्ति की तस्वीर है। इसमें एक आधार पर खड़े चार शेरों को दर्शाया गया है जो पीठ से पीठ सटाकर खड़े हैं, और उनके नीचे एक चक्र तथा विभिन्न पशुओं की आकृतियाँ बनी हुई हैं। यह संरचना शक्ति, साहस और धर्म के प्रसार का प्रतीक है, जहाँ शेर शासन और अधिकार को दर्शाते हैं और चक्र निरंतरता एवं न्याय का प्रतिनिधित्व करता है।
जब एक ही परिवार के कई सदस्य एक के बाद एक राजा बनते हैं तो उन्हें एक ही वंशा का कहा जाता है। मौयं वंशा में तीन महत्वपूर्ण राजा हुए - चन्द्रगुण, उसका बेटा बिन्दुसार और বিन्दुसार का पुत्र अशोक। जिन जगहों पर अशोक के शिलालख मिले हैं उन्हें लाल बिन्दुओं से दिखायी गया है। ये सारे इलाके साम्राज्य के भीतर थे। उन देशों के नाम बताओ जहाँ अशोक के अभिलेख मिले हैं। भारत के कौन-से राज्य मौर्य साम्राज्य से बाहर थे? साम्राज्य में बहुत-से नगर थे। (मानचित्र में उन्हें काले बिन्दुओं से दिखायी गया है। ) इनमें साम्राज्य की राजधानी पारिलपुत्र, उज्जैन और तक्षिशला जैसे नगर प्रमुख थे। तक्षिशला उत्तर-पश्चिम और मध्य एशिया के लिए आने-जाने का मार्ग था। दूसरी तरफ उज्जैन उत्तरी भारत से दक्षिणी भारत जाने वाले रास्ते में पड़ता था। शायद नगरों में व्यापारी, सरकारी अधिकारी और शिलेपकार रहा करते थे। सामाज्य के बहुत बड़े क्षेत्रों में किसानों और पशुपालों के गाँव बसे हुए थे। मध्य भारत जैसे इलाकों में ज्यादातर हिस्सा जंगलों से भरा हुआ था। वहाँ पर लोग फल-फूल का संग्रहण और जानवर्ग का शिकार करके जीविका चलाते थे। सामाज्य के अलग-अलग इलाकों में लोग भिन्न-भिन्न भाषाएँ बोलते थे। वे लोग शायद अलग-अलग प्रकार का भोजन करते थे और यहाँ तक कि अलग-अलग किसम की पोशाक भी पहनते थे।
Figure 5 summary: यह एक मानचित्र है। इसमें मौर्य साम्राज्य के समय के महत्वपूर्ण नगरों और अभिलेखों के पाए जाने वाले स्थानों को दर्शाया गया है। इस मानचित्र से यह निष्कर्ष निकलता है कि मौर्य साम्राज्य का विस्तार बहुत व्यापक था और उनके प्रशासनिक प्रभाव के प्रमाण भारतीय उपमहाद्वीप के विभिन्न हिस्सों, जिनमें उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम शामिल हैं, में बिखरे हुए थे।

राज्य सामाज्य से कैसे भिन्न है?

- चूंकि साम्राज्य राज्यों से बड़े होते हैं और उनकी रक्षा के लिए बड़ी सेनाओं की ज़रूरत होती है, इसीलिए सम्राटों को राजाओं की तुलना में ज्यादा संसाधनों की ज़रूरत होती है।
- इसी कारण उन्हें बड़ी संख्या में कर इकटा करने वाले अधिकारियों की ज़रूरत होती है।

सामान्य का प्रशासन

चूंकि मौर्य साम्राज्य बहुत बड़ा था, इसलिए अलग-अलग हिस्सों पर अलग-अलग ढंग से शासन किया जाता था। पाटिलपुत्र और उसके आस-पास के इलाकों पर समाट का सीधा नियर्तण था। इसका मतलब यह हुआ कि इस इलाकों के गाँवों और शहर्ों के किसानों, पशुपालकों, शिल्पकारों और व्यापारियों से कर इकटु कारने के लिए राजा अधिकारियों की नियुक्ति करता था। जो राजा के आदेशों का उल्लेखन करते थे, अधिकारी उनको सजा भी देते थे। इनमें से कई अधिकारियों को वेतन भी दिया जाता था। संदेशवाहक एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहते थे और राजा के जासूस अधिकारियों के कार्य-कलाप पर नजर रखते थे। इन सबके ऊपर समाट था जो राज-परिवार एवं विरुद्ध मित्रियों की सहायता से सब पर नियंत्रण रखता था। मौर्य साम्राज्य के भीतर कई छोटे क्षेत्र या प्रातः थे। इन पर तक्षिशला या उज्जेन जैसी प्रातिय राजधानियों से शासन किया जाता था। कुछ हद तक पालितपुत्र से इन क्षेत्रों पर नियंत्रण रखा जाता था और अक्सर राजकुमारों को वहाँ का राज्यपाल (गवर्न) बना कर भेजा जाता था। लेकिन ऐसा लगता है कि इन जगहों पर स्थानीय परंपराओं और नियमों को ही माना जाता था। प्रदर्शक केंद्रों के बीच विस्तृत क्षेत्र थे। इनके इलाकों में मौर्य शासक सिर्फ मांगों और नदियों पर नियंत्रण रखने की कोशिश करते थे जो कि आवागमन के लिए महत्वपूर्ण थे। यहाँ से उन्हें जो भी संसाधन कर और भेट के रूप में मिलते थे, उसे इकलु का जाता था। उदाहरण के लिए अर्थशास्त्र में यह लिखा है कि उत्तर-पश्चिम कंबल के लिए और दक्षिण भारत सोने और कीमती पत्थरों के लिए प्रसिद्ध था। संभव है कि संसाधन नजराने के रूप में इकलु किए जाते थे।
नजराना
जहाँ 'कर' नियमित दर्शन से इकट्टुरी किए जाते थे वहीं 'नजराना' अनियमित रूप से जब भी संभव हो, इकटूरी किया जाता था। ऐसे नजराने विविध पदार्थों के रूप में प्राय: ऐसे लोगों से लिए जाते थे जो स्वेच्छा से इसे देते थे।

राजधानी में सप्ताह

मेगस्थनीज, चन्द्रगुप्त के दरबार में पश्चम-एशिया के यूनानी राजा सेल्यूकस निकेटर का राजदूत था। मेगस्थनीज ने जो कुछ देखा उसका विवरण दिया। समाट का, जनता के सामने आने के अवसरों पर शोभायात्रा के रूप में जश्न मनाया जाता है। उन्हें एक सोने की पालकी में ले जाया जाता है। उनके अंगरक्षक सोने और चौँदी से अल्कृत हाथियों पर सवार रहते हैं। कुछ अंगरक्षक पेड़ों को लेकर चलते हैं। इन पेड़ों पर प्रशिक्षित तोती का एक झुण्ड रहता है जो समाट के सिर के चारों तरफ चककर लगाता रहता है। राजा सामान्यतः हिथियारबंद मिहलाओं से घिरे होते हैं। वे हमेशा इस बात से डरे रहते हैं कि कहीं कोई उनकी हत्या करने की कोशिश न करे। उनके खाना खाने के पहले खास नौकर उस खाने को चखते हैं। वे लगातार दो रात एक ही कमरे में नहीं सोते थे। और पारटिलिपुत्र (आधुनिक पटना) के बारे में : यह एक विशाल और खुबबुरुत नगर है। यह एक विशाल प्राचीर से चिरा है जिसमें 570 बुर्ज और 64 द्रار हैं। दो और तीन मंजिल वाले घर, लकड़ी और कच्ची इटों से बने हैं। राजा का महल भी काठ से बना है जिसे पत्थर की नककाशी से अलंकृत किया गया है। यह चारों तरफ से उदानों और चिडियों के लिए बने बसेंगे से चिरा है। राजा द्वारा खाना खाने के पहले खास नौकर उस खाने को क्यां चखते थे? पारटिलपुत्र मोहनजोदडो से किस तरह भिन्न था? (संकेत: अध्याय 4 देखो) और अंत में जंगल वाले इलाके आते थे, वहाँ रहने वाले लोग काफ़ी हद तक स्वतंत्र थे। उनसे यह उममीद की जाति थी कि वे मौर्य पदाधिकारियों को हाथी, लकड़ी, मधु और मोम जैसी चीज़ों लाकर दें।

अशोक - एक अनोखा समाट

अशोक मौयं वंश के सबसे प्रसिद्ध शासक थे। वह ऐसे पहले शासक थे जिन्होंने अभिलेखों द्वारा जनता तक अपने संदेश पहुँचाने की कोशिश की। अशोक के ज्यादातर अभिलेख प्राकृत भाषा और ब्राह्मिक लिपि में हैं।
कर्लिंग युद्ध का वर्णन करता हुआ अशोक का अभिलख
अपने एक अभिलेख में अशोक ने यह बात कही : "राजा बनने के आठ साल बाद मैने कर्लिंग विजय की। लगभग डेढ़ लाख लोग बंदी बना लिए गए। एक लाख से भी ज्यादा लोग मारे गए। इससे मुझे अपार दुःख हुआ। क्यों? जब किसी स्वतंत्र देश को जीता जाता है तो लाखों लोग मारे जाते हैं और बहुत सारे बندی बनाए जाते हैं। इसमें ब्राह्मण और प्रमण भी मारे जाते हैं। जो लोग अपने संगे-सर्बिधियों और मित्रों को बहुत घार करते हैं तथा दासों और मृतकों के प्रति द्यावान होते हैं, वे भी युद्ध में या तो मारे जाते हैं या अपने प्रियजनों को खो देते हैं। इसीलिए मुझे पश्चाताप हो रहा है। अब मैनेधम पालन करने एवं दूसरों को इसकी शिक्षा देने का निश्चय किया है। में मानता हूँ कि धमम के माध्यम से लोगों का दिल जीतना बलपूर्वक विजय पाने से ज्यादा अच्छा है। मैं यह अभिलेख भविष्य के लिए एक संदेश के रूप में इसलिए उलकीएण कर रहा हूँ कि मेरे बाद मेरे बेटे और पोते भी युद्ध न करें। इसके बदले उन्हें यह सोचना चाहिए कि धमन को कैसे बढ़ाया जाए।" कर्लिंग की लड़ाई से युद्ध को लेकर अशोक के विचारों में कैसे परिवर्तन हुआ?
('धम्' संस्कृत शब्द 'धर्म' का प्राकृत रूप है)। उत्कृष्ट पाॉलिश वाले पत्थर की इस मूर्ति को देखो। यह बिहार के रामपुरवा में मिले एक मौर्यकालीन सतंभ का हिस्सा है। अभी इसे राष्ट्रपति भवन में रखा गया है। यह उस समय की मूर्तकला का एक नमूना है।

अशोक का किलिंग युद्ध

कर्िलंग तटवर्ती उड़ीसा का प्राचीन नाम है (मानचிற्त 5, पृष्ट 76 देखो)। अशोक ने कर्िलंग को जीतने के लिए एक युद्ध लड़ा। लेकिन युद्धजनित हिंसा और खून-खराबा देखकर उन्हें युद्ध से वितृणना हो गई। उन्होंने निर्णय लिया कि वे भविष्य में कभी युद्ध नहीं करेंगे।

अशोक का धमन क्या था?

अशोक के धमम में किसी देवता की पूजा अथवा किसी कर्मकांड की आवश्यकता नहीं थी। उन्हें लगता था कि जैसे पिता अपने बच्चों को अच्छे व्यवहार की शिश्ता देते हैं वैसे ही यह उनका कर्तव्य था कि अपनी प्रजा को निदेश दें। वे बुद्धि के उपदेशों से भी प्रेरित हुए थे। ऐसी कई समस्याएँ थीं जिनके लिए उनमें संवेदना थी। उनके साम्राज्य में अलग-अलग धर्मों को मानने वाले लोग थे और इससे कई बार टकराव पैदा हो जाता था। जानवरों की बिल चढ़ाई जाती थी। दासों और नौकरों के साथ क्रूर व्यवहार किया जाता था। इनके अलावा परिवार में व पड़ोसियों के बीच भी झगड़े होते रहते थे। अशोक ने यह महसूस किया कि इन समस्याओं का निदान उनका कर्तव्य है। इसीलिए उन्होंने धम्म-महामात नाम के अधिकारियों की निरुचित की जो जगह-जगह जाकर धम्म की शिक्षा देते थे। इसके अतिरिक्त अशोक ने अपने संदेश कई स्थानों पर शिलाओं और सत्यों पर खुदवा दिए। अधिकारियों को यह निर्देश दिया गया कि वे राजा के संदेश को उन लोगों को पहुंकर सुनाएं जो खुद पहुं नहीं सकते थे। अशोक ने धर्म के विचारों को प्रसारण करने के लिए सीराय, मिस्र, ग्रीस तथा श्री लंका में भी दूत भेजे।
Image summary: यह एक मूर्ति की तस्वीर है। इसमें एक बैल की आकृति को एक नक्काशीदार आधार पर खड़ा दिखाया गया है, जिसमें बैल की शारीरिक बनावट और मांसपेशियों को स्पष्ट रूप से उकेरा गया है। इस कलाकृति से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह प्राचीन काल की शिल्पकारी का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो बैल की शक्ति और भव्यता को प्रदर्शित करता है।
पृष्ठ सं. 84-85 पर दिए गए मानचित 6 में इन क्षेत्रों को पहचाने का प्रयास कीजिए।
उन्होंने सड़के बनवाई, कुएँ खुदवाए और विश्राम-गृह बनवाए। इसके अतिरिक्त उन्होंने मनुष्यों व जानवरों की चिकित्सा की भी व्यवस्था की।

अपनी प्रजा के लिए अशोक के संदेश

लोग विभिन्न अवसरों पर अनुष्ठान करते हैं। उदाहरण के लिए जब वे बीमार होते हैं, जब उनके बच्चों का विवाह होता है, बच्चों के जन्म पर और जब यात्रा शुरू करते हैं, तब वे तरह-तरह के अनुष्ठान करते हैं। ये कर्मकाव्य किसी काम के नहीं इसके बदले यदि लोग दूसरी रीतियों को मानते वह ज्यादा फलदायी होगी। ये अन्य प्रकार की रीतियाँ क्या हैं? ये हैं - अपने दासों और नौकरों के साथ अच्छा व्यवहार करना, बड़ों का आदर करना, सभी जीवों पर द्या करना और ब्राह्मणों तथा प्रमणों को दान देना। अपने धम्म की प्रशंसा या दूसरों के धम्म की निन्दा करना, दोनों ही बातें गलत है। हर किसी को दूसरे धर्म का आदर करना चाहिए। यदि कोई अपने धर्म की बड़ाई और दूसरों के धर्म की बुराई करता है तो वह वास्तव में अपने धर्म को ज्यादा नुकसान पहुँचा रहा है। इसीलिए हर किसी को दूसरे के धर्म के प्रमुख विश्वासों को समझने की कोशिश करते हुए उसका आदर करना चाहिए। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है, “उनके धर्मदेश आज भी हमसे एक ऐसी भाषा में बात करते हैं जिन्हें हम समझ सकते हैं… और जिनसे हम बहुत कुछ सीख सकते हैं।” अशोक ने धम्म के विचारों को दूर-दूर तक फैलाने के लिए उन बातों को बताया जो आपके अनुसार आज भी प्रासिंगक हैं। अशोक के संदेश के उन हिस्सों को बताओ जो आज भी प्रासिंगक हैं। आरंभिक ब्राह्मी देवनागरी (हिंदी) बोंगला
Image summary: यह चित्र एक अक्षर का चित्रण है। इसमें देवनागरी लिपि के पहले स्वर का प्रदर्शन किया गया है। यह दर्शाता है कि यह हिंदी वर्णमाला का प्रारंभिक अक्षर है।
ब्राह्मणी लिপি
आधुनिक भारत की ज्यादातर लिपियाँ पिछले सैकड़ों वर्षों में ब्राह्मिक लिपि से उत्पन्न हुई। यहाँ आप 'अ' अक्षर को अलग-अलग भाषाओं की लिपियों में देख सकते हैं। मलयालम तिमल मौर्य साम्राज्य के उभरने से थोड़ा पहले लगभग 2400 वर्ष पहले, चीन में समाटो ने चीन की दीवार का
Image summary: यह एक प्राकृतिक दृश्य की तस्वीर है। इस चित्र में एक विशाल और लंबी दीवार दिखाई दे रही है जो ऊंचे पहाड़ों और हरी-भरी पहाड़ियों की चोटियों पर बनी हुई है। दीवार के साथ-साथ कुछ सुरक्षा चौकियां या मीनारें भी बनी हुई हैं। इस दृश्य से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह एक प्राचीन रक्षात्मक संरचना है जिसे कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में रणनीतिक सुरक्षा के लिए बनाया गया था।
- उपयोगी शब्द साम्राज्य राजधानी अधिकारी संदेशवाहक प्रत धम्म
निर्माण शुरू किया। इसे बनाने का उद्देश्य उत्तरी सीमा की पशुपालक लोगों से रक्षा करना था। अगले 2000 वर्षों तक इस दीवार का निर्माण कार्य चलता रहे, क्योंकि सामाज्य की सीमाएँ बदलती रही। यह दीवार लगभग 6400 किलोमीटर लंबी है तथा पत्थर और इंट से बनी है। इसकी ऊपरी सतह सड़क जैसी चौड़ी है। इस दीवार को बनाने के लिए हजारों लोगों को काम करना पड़ा। हर 100-200 मीटर की दूरी पर इस पर निगरानी के लिए बुजें बने हुए हैं। पड़ोसी देशों के प्रति अशोक का रवैया चीनी समाटो के रवैये से कैसे भिन्न था?
कल्पना करो
तुम कलिंग में रहती हो और तुम्हारे माँ-बाप को युद्ध में काफी दुख उठाने पड़े हैं। अभी-अभी अशोक के दूत धमम के नए विचारों को लेकर आए हैं। आप अपने माता-पिता और संदेशवाहकों के बीच बातचीत का वर्णन करो।
आओ याद करें
Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में एक छोटी बच्ची को दिखाया गया है जो एकाग्रता के साथ एक किताब पढ़ रही है। इस चित्र से यह निष्कर्ष निकलता है कि बच्ची पढ़ने में रुचि रखती है और वह शिक्षा के प्रति उत्साहित है।
1. मैयं साम्राज्य में विभिन्न काम-धर्षों में लगे हुए लोगों की सूची बनाओ।
2. रिक्त स्थानों को भरो:
(क) जहाँ पर समाटो का सीधा शासन था वहाँ अधिकारी ___ वसूलते थे।
(ख) राजकुमारों को अक्सर प्रतितं में ___ के रूप में भेजा जाता था।
(ग) मौयं शासक आवागमन के लिए महत्वपूर्ण ———— और ———— पर नियंत्रण रखने का प्रयास करते थे।
(घ) प्रदेशों में रहने वाले लोग मौर्य अधिकारियों को ———— दिया करते थे।
3. बताओ कि निम्नलिखित वाक्य सही है या गलत
- (क) उज्जैन उत्तर-पश्चिम की तरफ आवागमन के मार्ग पर था।
- (ख) आधुनिक पाकिस्तान और अफगानिस्तान के इलाके मौर्य साम्राज्य के अंदर थे।
- (ग) चन्द्रगुण के विचार अर्थशास्त्र में लिखे गए हैं।
- (घ) कर्लिंग बंगाल का प्राचीन नाम था।
- (ड) अशोक के ज्यादार अभिलेख ब्राह्मी लिपि में है।
Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में दो छात्र एक साथ चलते हुए और आपस में बातचीत करते हुए दिखाई दे रहे हैं, जिनमें से एक ने पीठ पर बस्ता टांगा हुआ है। यह दृश्य छात्रों के बीच मित्रता और स्कूल जाने की तैयारी या स्कूल से घर लौटने के सुखद अनुभव को दर्शाता है।
आओं चर्नी करें
4. उन समस्याओं की सूची बनाओं जिनका समाधान अशोक धमम द्वारा करना चाहता था। 5. धम्म के प्रचार के लिए अशोक ने किन साधनों का प्रयोग किया?
6. तुम्हारे अनुसार दासों और नौकरों के साथ बुरा व्यवहार क्यों किया जाता होगा? क्या तुम्हे ऐसा लगता है कि समाट के आदेशों से उनकी स्थिति में सुधार हुआ होगा? अपने जवाब के लिए कारण बताओ।
आओ करके देखें
Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में एक व्यक्ति को दिखाया गया है जो सोच विचार की मुद्रा में है और उसकी नजरें ऊपर की ओर हैं। व्यक्ति के चेहरे के हाव-भाव और हाथों की स्थिति से यह निष्कर्ष निकलता है कि वह किसी गहरी सोच में है या किसी समस्या का समाधान खोजने का प्रयास कर रहा है।
7. रेशन को यह बताते हुए कि हमारे रुपये पर शेर क्या दिखाए गए हैं एक पैराग्राफ लिखो। कम से कम एक और चीज का नाम लो जिस पर इन्हीं शेरों के चित्र बने हैं। 8. अगर तुम्हारे पास अपना अभिलेख जारी करने की शिक्षा होती तो तुम कौन-सी चार राजाशाएं देते? मौर्य साम्राज्य की शुरुआत (2300 साल से पहले)
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अशोक: एक अनोखा सम्राट जिसने युद्ध का ल्याग किया मानचित: 6 रेशम मार्ग सहित महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग दि टाइम्स एट्लस ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री (संपा. ज्योफे बाराक्लो) हैमंड इंक, न्यू जर्सी, 1986, पृ. 70-71 पर आधारित कीनी, भारतीय, इरानी, अरबी, यूनानी तथा रोमन व्यापारियों ने इस आदान-प्रदान में भाग लिया। दक्षिण भारत के पत्थर काली मिच्हि तथा अन्य मसालों के नियरित की दृष्टि से महत्वपूर्ण थे। मानचित में पोडुका (दक्षिण भारत में) दूढ़ो। अरिकामेडु का यह रोमन नाम था (अध्याय 9)।

आगे की बात

लगभग 2200 वर्ष पहले मौर्य साम्राज्य का पतन हो गया। इसके स्थान पर, (साथ ही अन्य जगहों पर भी) कई नए राज्यों का उद्य हुआ। पश्चिमोत्तर में तथा उत्तर-भारत के कुछ भागों में करिब एक सौ सालों तक हिन्द-यवन राजाओं का शासन रहा। इनके बाद पश्चिमोत्तर, उत्तर तथा पश्चिमी भारत पर शक नामक मध्य-एशियाई लोगों का शासन स्थापित हुआ। इनमें से कुछ राज्य लगभग 500 वर्षों तक टिके रहे जब तक कि शक शासकों को गुप्त शासकों से पराजय नहीं मिल गई (अध्याय 11)। शकों के बाद कुष्यांों (लगभग 2000 वर्ष पहले) का शासन स्थापित हुआ। अध्याय 10 में तुम कुष्यांको के बारे में और अधिक जानोगे। उत्तर तथा मध्यभारत के कुछ इलाकों में मौर्य सेनानायक पुष्पिमत्र शुंग ने एक राज्य की स्थापना की। शुग्गों के बाद कण्व तथा कुछ और वंशों का शासन तब तक चला जब तक लगभग 1700 वर्ष पहले गुप्त साम्राज्य की स्थापना हुई। हमने देखा कि पश्चिमी भारत के कुछ हिस्सों पर शकों का शासन था। यहाँ पश्चमी भारत तथा मध्य भारत पर शासन कर रहे सातवाहन शासकों के साथ इनके कई युद्ध हुए। लगभग 2100 साल पहले स्थापित सातवाहन राज्य लगभग 400 सालों तक टिका रहा। लगभग 1700 वर्ष पहले मध्य तथा पश्चिमी भारत में वाकाटक वंश का शासन स्थापित हुआ। दक्षिण भारत में, 2200 से 1800 साल पूर्व के बीच चोली, चेरों तथा पाण्ड्यां ने शासन किया। लगभग 1500 साल पहले, पल्लवों और चालुक्यों के दो बड़े राज्यों की स्थापना हुई। इसके अलावा और भी कई राज्य और राजा थे। इनके बारे में हमें उनके सिंककों, पाण्डुलिपियों तथा पुस्तकों से पता चलता है। इन सब के साथ-साथ अनेक ऐसे परिवर्तन भी हो रहे थे, जिनमें सामान्य स्त्री-पुरुषों का महत्वपूर्ण योगदान था। इनमें कृषि का प्रसार, नए शहर्ों का विकास, उद्योग तथा व्यापार में प्रगति थी। व्यापारियों ने एक तरफ जहाँ उपमहाद्रिप के अंदर तथा बाहर जमीन के रास्तो की खोज की, वहीं पश्चम एशिया, पूर्वी अफ्रीका तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया (मानचிற 6 देखो) के समुद्री रास्ते भी खुले। मंदिरों, स्तूपों तथा अन्य इमारतो का निमिण हुआ, किताबें लिखी गई, साथ ही, वैज्ञानिक खोज भी हुई। ये सारी बातें साथ-साथ हो रही थीं। इस पुस्तक के बाकी हिस्सों को पढ़ते हुए तुम इन बातों को ध्यान में रखना।
Image summary: यह एक प्राचीन सिक्के की छवि है। इस सिक्के पर एक व्यक्ति का पार्श्व चित्र अंकित है जिसने सिर पर एक पारंपरिक शिरस्त्राण पहना हुआ है और उसके चारों ओर कुछ प्राचीन लिपि में अक्षर लिखे हुए हैं। यह चित्र उस समय की कलात्मक शैली और शासन व्यवस्था को दर्शाता है, जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यह सिक्का किसी महत्वपूर्ण शासक या योद्धा की याद में जारी किया गया था और यह उस काल की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।
Image summary: यह एक प्राचीन सिक्के की छवि है। इस सिक्के पर एक व्यक्ति की आकृति उकेरी गई है जिसने पारंपरिक वस्त्र पहने हुए हैं और उसके चारों ओर कुछ लिपि या अक्षर लिखे हुए हैं। आकृति की मुद्रा और पहनावा उस समय की सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान को दर्शाता है, जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यह सिक्का किसी विशिष्ट ऐतिहासिक काल और शासन व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है।
Image summary: यह एक प्राचीन सिक्के की तस्वीर है। इस चित्र में सिक्के की सतह पर उकेरी गई कुछ आकृतियाँ और किनारे पर लिखे हुए अक्षर दिखाई दे रहे हैं, जिसमें बीच में एक विशेष प्रतीक बना हुआ है। सिक्के की बनावट और उस पर अंकित प्रतीकों से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह किसी पुराने काल की मुद्रा है जिसका उपयोग व्यापार या पहचान के लिए किया जाता होगा।
Image summary: यह एक प्राचीन मोहर या उत्कीर्णन की छवि है। इसमें एक हाथी की आकृति को दर्शाया गया है जिसके ऊपर कुछ लिपि या प्रतीकात्मक चिह्न अंकित हैं। इस आकृति से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह किसी प्राचीन सभ्यता की कलाकृति है जहाँ हाथियों का महत्व था और लेखन प्रणाली का उपयोग रिकॉर्ड रखने या पहचान के लिए किया जाता था।

अध्याय 9

Figure 6 summary: यह एक मानचित्र है। इस चित्र में प्राचीन काल के महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों को दर्शाया गया है जो एशिया, यूरोप और अफ्रीका के विभिन्न क्षेत्रों को आपस में जोड़ते थे। इसमें चीनी, कुषाण, ईरानी और रोमन शासकों के नियंत्रण वाले मार्गों के साथ-साथ महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों को भी दिखाया गया है। मानचित्र से यह निष्कर्ष निकलता है कि प्राचीन समय में व्यापारिक नेटवर्क अत्यंत विस्तृत था और विभिन्न साम्राज्यों के बीच आर्थिक आदान-प्रदान के लिए भूमि और समुद्र दोनों मार्गों का व्यापक उपयोग किया जाता था। यह दर्शाता है कि व्यापारिक नियंत्रण विभिन्न शक्तिशाली शासकों के बीच विभाजित था और समुद्री मार्ग अंतरराष्ट्रीय वाणिज्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थे।

खुशहाल गाँव और समৃद्ध शहर

लोहर की दुकान पर प्रभाकर
प्रभाकर लोहारों को काम करते देख रहा था। एक छोटी-सी बेंच पर कुलहाड़ी और हंसिया जैसे कुछ अंजीर बेचने के लिए रखे थे। दूसरी ओर भुड़ी जल रही थी। अंजीर बनाने के लिए दो लोग लोहे की एक छोड़ को गरम कर उसे पीट रहे थे। प्रभाकर को ये सब बड़ा मजेदार लग रहा था।

लोहे के औजार और खेती

लोहे का प्रयोग आज एक आम बात है। लोहे की चीज़ं हमारी राजमर्श की जिंदगी का हिस्सा बन गई है। इस उपमहाद्वीप में लोहे का प्रयोग लगभग 3000 साल पहले शुरू हुआ। महापाषाण कब्रों में लोहे के औजार और हिथियार बड़ी संख्या में मिले हैं। इनके बारे में तुम अध्याय 5 में पहुंचके हो। करीब 2500 वर्ष पहले लोहे के औजारों के बढ़ते उपयोग का प्रमाण मिलता है। इनमें जंगलों को साफ करने के लिए कुल्हाडिया और जुताई के लिए हलों के फाल शामिल हैं। अभ्याय 6 में तुमने पढ़ा था कि लोहे के फाल के इस्तेमाल से कृषि उत्पादन बढ़ गया।

कृषि उत्यादन बढ़ाने के लिए उठाए गए अन्य कदम : सिंचार्ण

समृद्ध गाँवों के बिना राजाओं तथा उनके राज्यों का बने रहना मुशिकल था। जिस तरह कृषि के विकास में नए औजार तथा रोपाई (अध्याय 6) महत्वपूर्ण कदम थे, उसी तरह सिंचাই भी काफी उपयोगी साबित हुई। इस समय सिंचাই के लिए नहीं, कुएँ, तालाब तथा कृत्रिम जलाशय बनाए गए। और्जार्स की सूची में इन चिट्रों के नाम चुनो - हंसिया, कुल्हाड़ि, और सँड़सी। लोहे की ऐसी पाँच चीजों की सुचि बनाओ जिनका प्रयोग तुम रोज करते हो। इस चार्ट में तुम्हे सिंचাই से आप परिवर्तन दिखाए गए हैं। खाली स्थानों में सही वाक्य भरो :
Image summary: यह एक तस्वीर है। इस चित्र में स्कूली वर्दी पहने हुए कुछ बच्चे दिखाई दे रहे हैं, जिनमें से एक बच्चा सामने की ओर मुस्कुरा रहा है और उसने अपने हाथों में एक स्लेट पकड़ी हुई है। तस्वीर से यह निष्कर्ष निकलता है कि बच्चे शिक्षा के प्रति उत्साहित हैं और उनके चेहरों पर खुशी और सकारात्मकता का भाव है।
Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में विभिन्न प्रकार के प्राचीन या पारंपरिक उपकरणों को दर्शाया गया है, जिसमें एक चिमटी जैसा उपकरण, एक नुकीला औजार और एक घुमावदार वस्तु शामिल है। इन उपकरणों की बनावट से यह निष्कर्ष निकलता है कि इनका उपयोग विशिष्ट कार्यों जैसे पकड़ने, छेद करने या काटने के लिए किया जाता था, जो इनके कार्यात्मक डिजाइन को दर्शाता है।
• लोगों द्वारा परिश्रम किया गया।
• किसानों को लाभ मिला, क्योंकि अब उत्पादन की अनिश्चितता घटी।
• कर अदा करने के लिए किसानों को उत्पादन बढ़ाना था।
• राजाओं ने सिंचাই की योजना बनाई और धन खर्च किया।
1. राजा को सेना, महल और किले बनवाने के लिए धन चाहिए।
7. कृमि उतपादन बढ़ा।
2. वे किसानों से कर लेते हैं।
4. यह सिंचাই से ही संभव था।
6.
8. राजस्व भी बढ़ा।
गाँवों में कौन रहते थे?
इस उपमहाद्वीप के दक्षिणी तथा उत्तरी हिस्सों के अधिकांश गाँवों में कम से कम तीन तरह के लोग रहते थे। तिमिल क्षेत्र में बड़े भूस्वामियों को వెల్లला, साधारण हलवाहों को उणवार और भूमिहीन मजदूर, दास कईसियार और अदिमई कहलाते थे। देश के उत्तरी हिस्से में, गाँव का प्रधान व्यक्ति ग्राम-भोजक कहलाता था। अक्सर एक ही परिवार के लोग इस पद पर कई पीडियों तक बने रहते थे। यानी कि यह पद आनुविशक था। ग्राम-भोजक के पद पर आमतौर पर गाँव का सबसे बड़ा भू-स्वामी होता था। साधारणता इनकी जमीन पर इनके दास और मजदूर काम करते थे। इसके अतिरिक्त प्रभावशाली होने के कारण प्राय: राजा भी कर वसूलने का काम इंहें ही सौंप देते थे। ये न्यायाधीश का और कभी-कभी पुलिस का काम भी करते थे। ग्रम-भोजकों के अलावा अन्य स्वतंत्र कृषक भी होते थे, जिन्हें गृहपति कहते थे। इनमें ज्यादातर छोटे किसान ही होते थे। इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे स्त्री-पुरुष थे, जिनके पास अपनी जमीन नहीं होती थी। इनमें दास कर्मकार आते थे, जिन्हें दूसरों की जमीन पर काम करके अपनी जीविका चलानी पड़ती थी। अधिकांश गाँवों में लोहार, कुमहार, बढ़ई तथा बुनकर जैसे कुछ शिलेपकार भी होते थे।
प्राचीनतम तमिल रचनाएं
तिमल की प्राचीनतम रचनाओं को संगम साहिल कहते हैं। इनकी रचना करीब 2300 साल पहले की गई। इन्हें संगम इसलिए कहा जाता है क्योंकि मदुरै (देखो मानचित्र 7, पृष्ठ 113) के कवियों के सम्मेलनों में इनका संकलन किया जाता था। गाँव में रहने वालों के जिन तमिल नामों का उल्लेख यहाँ किया गया है, वे संगम साहित्य में पाए जाते हैं।
नगर : क्या कहती है कहानियाँ, यात्रा-विवरण, मूर्तकलाएँ और पुरातत्त्व
तुमने जातकों के बारे में सुना होगा। ये वो कहानियाँ हैं, जो आम लोगों में प्रचलित थीं। बौद्ध भिक्षुओं ने इनका संकलन किया। यहाँ एक जातक कथा दी गई है, जिसमें यह बताया गया है कि एक निर्धन किस तरह धीरे-धीरे धनी बन जाता है।

एक निधन की चतुराई

एक शहर में एक गरीब युवक रहता था। उसके पास एक मरे चूचे के अलावा कुछ नहीं था। उसने उस चूचे को एक सिखके में एक भोजनालय वाले की बिलली के लिए बेच दिया। फिर एक दिन बड़ी जोर की आँधी आई। राजा का बगीचा टूटी टहनियों और पतों से भर गया। उनका माली इसे साफ करने की बात से पेशान हो उठा। युवक ने माली से कहा कि अगर लकिडिया और पते उसे मिल जाएं तो वह बगीचे की सफाई कर सकता है। माली तुरंत मान गया। युवक ने पास खेल रहे बच्चों को यह कह कर इकलुदा कर लिया कि प्रत्येक टहनी और पते के बदले में उन्हें एक-एक मिटाई मिलेगी। देखते ही देखते उन्होंने बगीचे से एक-एक तिनका चुनकर गोट के पास इकलुदा कर दिया। तभी उधर से राजा का कुमार बतनां को पकाने के लिए इँधन की तलाश में गुजरा। उसने पूरे ढेर को खरीद लिया। इस तरह युवक के पास कुछ और पैसे हो गए। अब उस युवक ने एक और योजना बनाई। एक बड़े बर्तन में पानी भरकर वह नगर के द्वार पर गया और वहाँ उसने घास काटने वाले 500 लोगों को पानी पिलाया। खुषा होकर उन लोगों ने कहा, “तुमने हमारे लिए इतना अच्छा काम किया बताओ अब हम तुम्हारे लिए क्या कर सकते हैं?" उसने कहा, “मैं आपको यह तब बताऊँगा जब मुझे आपकी सहायता की ज़रूरत होगी।” उसके बाद उसने एक व्यापारी से दोसरी की। एक दिन उस व्यापारी ने बताया, “कल एक घोड़े का व्यापारी 500 घोड़ों के साथ शहर में आ रहा है।” यह सुनकर उस युवक ने उन घास काटने वाली के पास जाकर कहा, “कृपया, तुम सब एक-एक घास का गठर मुझे दो और अपनी घास तब तक मत बेचो, जब तक मेरी न बिक जाए।” उन्होंने उसे घासों के 500 गत्दर दे दिए। जब घोड़े के व्यापारी को कहीं भी घास न मिली तो उसने इस युवक की घास एक हजार सिंकके में खरीद ली। इस कहानी में आप व्यक्तियों के व्यवसायों की सूची बनाओ। प्रत्येक के लिए यह तय करे कि वे (क) शहर में, (ख) पाँव में, या फिर (ग) शहर तथा गाँव दोनों में रहते थे। घोड़ का व्यापारी शहर में क्या आया होगा? क्या महीलाएँ कहानी में बताए व्यवसायों को अपना सकती थीं? उत्तर के कारण बताओ। प्राचीन नागरों के जीवन के बारे में हमें कुछ अन्य स्रोतों से भी पता चल सकता है। शहर्त, गाँवों या फिर जंगलों के जीवन से जुड़ी घटनाओं को मूर्तिकर कलात्मक ढंग से उकेरते थे। इन मूर्तियों को ऐसी इमारतो की रेलिंग, खंभों या प्रवेश-दूर्दों पर सजाया जाता था जहाँ लोग आते थे। अध्याय 6 में वर्णित अनेक शहर, महाजनपदों की राजधानी थे। जैसा कि तुमने पढ़ा इनमें से कुछ शहर परकोटों से घिरेहोते थे। जैसा कि तुम ऊपर के चित्र में देखे रहे हो, अनेक शहारों में वल्यकूप मिले हैं। ये वल्यकूप गुसलखाने, नाली या कूडेदान के लिए प्रयुक्त होते थे। प्राय: ये वल्यकूप लोगों के घरों में होते थे। महलों, बाजारों या आम घरों के अवशेष बहुत कम मिले हैं। संभवत: लकड़ी, मिट्टी व कच्ची इटों या छपर से बने होने के कारण ये ज्यादा समय तक टिक न पाए हैं। भविष्य में पुरातत्त्विक द्वार की खोज कर सकते हैं। प्राचीन शहर्ों के बारे में वहाँ गए नाविकों तथा यात्रियों के विवरणों द्वारा भी पता चलता है। ऐसा ही एक विस्तृत विवरण किसी अज्ञात यूनानी नाविक का है। जिन-जिन
Image summary: यह एक ऐतिहासिक तस्वीर है। इस चित्र में एक पुरातत्व स्थल को दिखाया गया है जहाँ जमीन के अंदर दबे हुए मिट्टी के बड़े बेलनाकार बर्तनों या कुओं जैसी संरचनाओं की खुदाई की जा रही है। एक व्यक्ति इन संरचनाओं के पास खड़ा होकर खुदाई के कार्य में लगा हुआ है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यह स्थान किसी प्राचीन सभ्यता का हिस्सा रहा होगा जहाँ भंडारण या जल संचयन के लिए ऐसी गहरी संरचनाओं का उपयोग किया जाता था।
Image summary: यह चित्र एक प्राचीन पत्थर की नक्काशीदार कलाकृति है। इसमें विभिन्न स्तरों पर कई मानवीय आकृतियों, हाथियों और घोड़ों के साथ एक विस्तृत दृश्य को दर्शाया गया है, जो संभवतः किसी ऐतिहासिक युद्ध या शाही जुलूस का चित्रण करता है। इस कलाकृति से यह निष्कर्ष निकलता है कि उस समय के समाज में सैन्य शक्ति और भव्यता का अत्यधिक महत्व था, और यह नक्काशी तत्कालीन शिल्प कौशल की उच्च दक्षता और जटिल विवरणों को प्रदर्शित करती है।
बेरिगाजा ( भस्च का युनानी नाम ) की कहानी
बेरिगाजा की संकरी खाड़ी में समुद्र से आने वालों के लिए नाव चला पाना बहुत मुशिकल होता है। राजा के द्वारा नियुक्त कुशल और अनुभवी स्थानीय मतुआरे ही यहाँ जहाज ला सकते थे। बेरिगाजा में शराब, ताँबा, टिन, सीसा, मूगा, पुखराज, कपड़े, सोने और चाँदी के सिक्कों का आयात होता था। हिमालय की जड़ी-बूटियाँ, हाथी-दाँत, गोमेद, कान्रीलियन, सूती कपड़ा, रेशम तथा इंर यहाँ से नियती किए जाते थे। राजा के लिए व्यापारी विशेष उपहार लाते थे। इनमें चाँदी के बर्तन, गायक-किशोर, सुंदर औरतं, अच्छी शराब तथा उल्कृष्ट महीन कपड़े शामिल थे। बेरिंगाजा से आयात और निरयित होने वाली चीजों की सूची बनाओ। दो ऐसी चीज़ी बताओ, जिनका उपयोग हृदृशा युग में नहीं होता था।
आहत सिंकके
आहत सिकके सामाग्यत: आयताकार और कभी-कभी वर्गकार या गोल होते थे। ये या तो धातु की चادر को काटकर या धातु के चपटे गोलाकाओं से बनाये जाते थे। इन सिककों पर कुछ लिखा हुआ नहीं था, बल्कि इन पर कुछ चिन्ह टपप से बनाये जाते थे। इसीलिए ये आहत सिकके कहलाएं। ये सिकके उपमहाद्वीप के लगभग अधिकांश हिस्सों में पाए जाते हैं और इसा की आरंभिक सदियों तक ये प्रचलन में रहे। पतनों पर वह गया, उन सभी के बारे में उसने लिखा है। मानचित 7 (पृष्ठ 113) में भरेच दूढ़ो। अब उसके द्वारा दिए गए वर्णन को पढ़ो।
सिक्खों
पृष्ठ 90 पर दी गई कहानी में तुमने देखा कि किस तरह सिक्कों के आधार पर सम्मित का मूल्योंकान किया गया। पुरातत्त्वविदों को इस युग के हजारों सिक्कों मिले हैं। सबसे पुराने आहत सिक्कों थे, जो करीब 500 साल चले। इसका चित्र नीचे दिया गया है। चौँदी या सोने के सिक्कों पर विभिन्न आकृतियों को आहत कर बनाए जाने के कारण इन्हे आहत सिक्कों कहा जाता था।
Image summary: यह चित्र एक प्राचीन सिक्के की छवि है। इस सिक्के पर विभिन्न प्रतीकात्मक आकृतियाँ उकेरी गई हैं, जिनमें पशुओं की आकृतियाँ और एक केंद्रीय गोलाकार आकृति शामिल है जिसके चारों ओर किरणें जैसी संरचनाएँ बनी हुई हैं। इन प्रतीकों की उपस्थिति यह दर्शाती है कि यह सिक्का किसी विशिष्ट प्राचीन संस्कृति या साम्राज्य का है, जहाँ इन चित्रों का उपयोग धार्मिक, राजकीय या आर्थिक पहचान के लिए किया जाता था।
Image summary: यह एक गोलाकार वस्तु की तस्वीर है। यह चित्र एक प्राचीन सिक्के या धातु के पदक को दर्शाता है जिसकी सतह काफी घिसी हुई और खुरदरी है। इस वस्तु की स्थिति से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह बहुत पुराना है और समय के साथ इसका क्षरण हो गया है, जिससे इस पर अंकित विवरण अब स्पष्ट नहीं रह गए हैं।
विनमय के अन्य साधन
संगम साहित्य की इस छोटी सी कविता को पढ़ो। खेतों के संफ्रेद धान गாडियों पर लादे जा रहे हैं नमक के लिए, लंबे-लंबे रास्ते चौदनी सी सफ्रेद रेत पर परिवार को समेटे कहीं पीछे छूट न जाएं। शहारों से नमक के सौदागरों के यू चले जाने से सिर्फ सनाटा रह जाता है। समुद के किनारे नमक का बहुत ज्यादा उत्पादन होता था। व्यापारी किस चीज से इसका विनिमय करते हैं? वे किस तरह यात्रा कर रहे हैं?
नगर : अनेक गतिविधियों के केंद्र
अक्सर नगर कई कारणों से महत्वपूर्ण हो जाते थे। उदाहरण के लिए मधुरा (मानचित 7, पृष्ठ 113) को देखो। यह 2500 साल से भी ज्यादा समय से एक महत्वपूर्ण नगर रहा है क्योंकि यह यातायात और व्यापार के दो मुख्य रास्तो पर स्थित था। इनमें से एक रास्ता उत्तर-पश्चिम से पूर्व की ओर, दूसरा उत्तर से दिशांक की ओर जाने वाला था। शहर के चारों ओर किलेबंदी थी, इसमें अनेक मंदिर थे। आस-पास के किसान तथा पशुपालक शहर में रहने वालों के लिए भोजन जुटाले थे। मधुरा बेहतरीन मूर्तियाँ बनाने का केंद्र था। लगभग 2000 साल पहले मधुरा कुषाणों की दूसरी राजधानी बनी। इसके बारे में तुम अगले अध्याय में पढ़ोगे। मधुरा एक धार्मिक केंद्र भी रहा है। यहाँ बौद्ध विहार और जैन मंदिर हैं। यह कृष्ण भक्ति का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र था।
उत्तरी कालो चमके पात्र (NBPW)
ᠮ ᠤ ᠮ ᠤ మధురం ప్రస్తావించే తర్వాత, ప్రకారం ప్రారంభించడం ద్వారా, స్వాస్థ్యంగా నిర్వహించడం ద్వారా, ప్రకారం ప్ర मधुरा के लोगों के व्यवसायों की एक सूची बनाओ। एक ऐसे व्यवसाय का नाम बताओ जो हृदयों में नहीं था।
शில்प तथा शিল्पकार
पुरास्थलों से शिल्पों के नमृने मिले हैं। इनमें मिट्टी के बहुत ही पतले और सुदर बर्तन मिले हैं, जिन्हें उतरी काले चमकीले पात्र कहा जाता है क्योंकि ये ज्यादातर उपमहाद्रिप के उतरी भाग में मिले हैं। ध्यान रहे कि अन्य दूसरे शில்पों के अवशेष नहीं बचे होंगे। जैसे कि विभिन्न प्रश्नों से हमें पता चलता है कि कपड़ों का उत्पादन बहुत महत्वपूर्ण था। उत्तर में वाराणसी और दिशांन में मदुरे इसके प्रसिद्ध केंद्र थे। यहाँ स्त्री-पुरुष दोनों काम करते थे। अनेक शिस्पकार तथा व्यापारी अपने-अपने संघ बनाने लगे थे, जिन्हें श्रेणी कहते थे। शिस्पकारों की श्रेणीयों का काम प्रशिक्षण देना, कच्चा माल उपलब्ध कराना तथा तैयार माल का वितरण करना था। जबकि व्यापारियों की श्रेणीयां व्यापार का संचालन करती थी। श्रेणीयां बैकों के रूप में काम करती थीं, जहाँ लोग पैसे जमा रखते थे। इस धन का निवेश लाभ के लिए किया जाता था। उससे मिले लाभ का कुछ हिस्सा जमा करने वाले को लौटा दिया जाता था या फिर मठ आदि धार्मिक संस्थानों को दिया जाता था।
सूत कাতन और बुनने के नियम
ये नियम अर्थात्पत्र के हैं। अभ्याय ४ में अर्थात्पत्र का उल्लेख किया गया है। इसमें वर्णन किया गया है कि किस प्रकार एक विशेष पदाधिकारी की देखेरेख में कारखानों में सूत की कताई और बुनाई की जाती थी। उन, पेड़ों की छाल, कपास, पटुआ तथा सन को तैयार करने के काम में विधवाओं, सक्षम-अक्षम महिलाओं, भिक्षुविनयों, वृद्धा वेशयाओं, राजा की अवकाशप्राप्त दासियों, सेविकाओं और अवकाशप्राप्त देवदासियों को लगाया जा सकता है। इन्हें इनके काम के और गुणवत्ता के अनुसार पारिश्रमिक देना चाहिए। जिन महिलाओं को बाहर निकलने की अनुमति नहीं है, वे अपनी दासियों को भेजकर कच्चे माल को मंगवा सकती हैं और फिर तैयार माल उन्हें भिजवा सकती हैं। वे औरेंत, जो कारखाने तक जा सकती हैं, उन्हें अपना माल कारखाने तक तड़के ले जाना पड़ता था, जहाँ उन्हें परिश्रमिक मिलता था। इस समय माल को अच्छी तरह जाँचने के लिए रोशनी रहती है। अगर निरीक्षक उस औरत की तरफ देखता है या इधर-उधर की बातें करता है, तो उसे सजा मिलनी चाहिए। अगर औरत ने अपना काम पूरा नहीं किया, तो उसे जुमती देना होगा, इसके लिए उसका अंगुटा भी काटा जा सकता है। उन महिलाओं की सूची बनाओ जिन्हें निरीक्षक नियुक्त कर सकता था। क्या काम करने के दौरान महिलाओं को मुश्क्लेलं झेलनी पड़ती थीं?
सूक्षम निरीक्षण : अरिकामेडु
मानचित 7 (पृष्ठ 113) में अमेरिकोमेडु (पुटुच्चेरी में) दूढ़ो। पृष्ठ 96 में रोम के बारे में दी जानकारी पढ़ो। लगभग 2200 से 1900 साल पहले अमेरिकोमेडु एक पतन था, यहाँ दूर-दूर से आए जहाजों से सामान उतारे जाते थे। यहाँ इटों से बना एक दाँचा मिला है जो संभवत: गोदам रहा हो। यहाँ भूमध्य-सागरिये क्षेत्र के एंफोरा जैसे पात्र मिले हैं। इनमें शराब या तेल जैसे तरल पदार्थ रखे जा सकते थे। इनमें दोनों तरफ से पकड़ने के लिए हथे लगे हैं। साथ ही यहाँ 'एरेटाइन' जैसे मुहर लगे लाल-चमकदार बर्तन भी मिले हैं। इन्हें इटली के एक शहर के नाम पर 'एरेटाइन' पात्र के नाम से जाना जाता है। इसे मुहर लगे साँचे पर गिली चिकनी मिट्टी को दबा कर बनाया जाता था। कुछ ऐसे बर्तन भी मिले हैं, जिनका डिजाइन तो रोम का था, किन्तु वे यहीं बनाए जाते थे। यहाँ रोमन लौप, शीशे के बर्तन तथा रल भी मिले हैं। साथ ही छोटे-छोटे कुण्ड मिले हैं, जो संभवतः कपड़ की रमाई के पात्र रहे होंगे। यहाँ पर शींश और अर्थ-बहुमूल्य पत्थरों से मनके बनाने के पयोषत साक्ष्य मिले हैं। रोम के साथ संबंध दर्शनी वाले साक्ष्य की सूची बनाओ। मानचित 6 (पृष्ठ 84) में रोम को दूढ़ा। यह यूरोप के सबसे पुराने शहारों में से एक है। इसका विकास लगभग तभी हुआ, जब गंगा के मैदान के शहर बस रहे थे। रोम एक बहुत बड़े साम्राज्य की राजधानी था। यह यूरोप, उत्तर अफ़्रीका तथा पश्चिम एशिया तक फैला साम्राज्य था। इसके सबसे महत्वपूर्ण शासकों में से एक आर्लिंगट्स ने करिब 2000 साल पहले शासन किया था। उसने कहा था कि रोम इटों का शहर था, जिसे मैंने संगमरमर का बनवाया। आगस्तस और उसके बाद के शासकों ने कई मंदिर तथा महल भी बनवाए। आगस्तस ने बड़े-बड़े संगमेल (एक्लिशिवेटर) बनवाए। इनमें चारों तरफ दर्शकों के बैठने की सीबीएनुमा जगह होती थी। यहाँ लोग विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम देख सकते थे। उन्होंने स्नातकार भी बनवाए जहाँ सिरयों तथा पुरुषों के लिए अलग-अलग समय निर्धारित थे। यहाँ लोग एक-दूसरे से मिलते थे, और आराम करते थे। बड़े-बड़े जलवाही सेतु (एकवाड्क) के जिर्पे शहर के स्नातकारों, फन्वारों तथा गुसलखानों के लिए पानी लाया जाता था। ये बड़े खुले रंगमंडल (एक्लिथियेटर) और जलवाही सेतु इतने दिनों तक कैसे बचे रहे? तुम बेरिगाजा में रहते हो और प तन देखने निकले हो। तुमको क्या-क्या देखने को मिला?
Image summary: यह एक पुरातात्विक अवशेष की तस्वीर है। इस चित्र में पत्थर के एक टुकड़े पर खुदी हुई प्राचीन लिपि या प्रतीकों को दर्शाया गया है। इस साक्ष्य से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह किसी प्राचीन सभ्यता की लेखन कला का नमूना है, जो उस समय के संचार माध्यमों और सांस्कृतिक विकास की ओर संकेत करता है।
Image summary: यह एक ऐतिहासिक शिलालेख की तस्वीर है। इस चित्र में पत्थर के एक टुकड़े पर प्राचीन लिपि में कुछ अक्षर खुदे हुए दिखाई दे रहे हैं। इस साक्ष्य से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह किसी प्राचीन सभ्यता की लेखन प्रणाली का हिस्सा है, जो उस समय के संचार और दस्तावेजीकरण के तरीकों को दर्शाता है।
Image summary: यह एक वास्तविक तस्वीर है। इसमें एक प्राचीन रोमन एक्वाडक्ट या जलसेतु को दिखाया गया है, जो पत्थर के कई मेहराबों वाली एक लंबी और ऊंची संरचना है, जिसके पीछे एक शहर और पहाड़ दिखाई दे रहे हैं। इस तस्वीर से यह निष्कर्ष निकलता है कि प्राचीन काल में जल परिवहन के लिए इंजीनियरिंग का उत्कृष्ट उपयोग किया गया था और यह संरचना अपनी मजबूती के कारण लंबे समय तक सुरक्षित रही है।
आओ याद करें

1. खालि जगहों को भरो :

- (क) तमिल में बड़े भूस्वामी को ___ कहते थे।
Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में एक लड़की को दिखाया गया है जो एकाग्रता के साथ एक किताब पढ़ रही है। चित्र से यह निष्कर्ष निकलता है कि लड़की पढ़ने की गतिविधि में रुचि ले रही है और वह सीखने की प्रक्रिया में व्यस्त है।
- (ख) ग्राम-भोजकों की जमीन पर प्राय: ___ द्वारा खेती की जाती थी।
- (ग) तमिल में हलवाहे को ___ कहते थे।
- (घ) अधिकांश गृहपति ———— भूस्वामी होते थे।
2. ग्राम-भोजकों के काम बताओ। वे शक्तिशाली क्यों थे?
3. गाँवों तथा शहर्ों दोनों में रहने वाले शिलेपकारों की सूची बनाओ।
4. सही जवाब दूढ़ो :
- (क) वल्यकूप का उपयोग
• नहाने के लिए
• कपड़े धोने के लिए
- सिंचार्ह के लिए
• जल निकास के लिए किया जाता था।
- (ख) आहत सिंकके
• चॉँदी
• सोना
• टिन
• हाथी दाँत के बने होते थे।
- लोहा
- गाँव
- सिंचাই
- संगम
- नगर
- वलयकूप
- पतन
- श्रेणी
कुछ महत्वपूर्ण तिथियाँ
उपमहाद्रिप में लोहे के प्रयोग की शुरुआत (करीब 3000 साल पहले)
▶ लोहे के प्रयोग में बढ़ोती, नगर, आहत सिके (करिब 2500 साल पहले)
► संगम साहित्य की रचना की शुरुआत (करीब 2300 साल पहले)
अरिकामेडु का पतन (करीब 2200 तथा 1900 साल पहले)
97 ■ (ग) मधुरा महत्वपूर्ण
● गाँव
पतन
• धार्मिक केंद्र
• जंगल क्षेत्र था।
(ཕ) ཤེས།
• शासकों
• शिस्पकारों
• कृषिकों
पशुपालकों का संघ होता था।
आओं चर्नी करें
Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में दो व्यक्ति एक साथ चलते हुए और आपस में बातचीत करते हुए दिखाई दे रहे हैं, जिनमें से एक ने पीठ पर बस्ता टांगा हुआ है। चित्र से यह निष्कर्ष निकलता है कि दोनों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध हैं और वे संभवतः स्कूल या कॉलेज जा रहे हैं।
5. पृष्ठ 87 पर दिखाए गए लोहे के औजारों में कौन खेती के लिए महत्वपूर्ण होंगे? अन्य औजार किस काम में आते होंगे?
6. अपने शहर की जल निकास व्यवस्था की तुलना तुम उन शहरों की व्यवस्था से करो, जिनके बारे में तुमने पढ़ा है। इनमें तुम्हे क्या-क्या समानताएँ और अंतर दिखाई दिए?
Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में एक व्यक्ति को दिखाया गया है जिसने अपने हाथ अपनी ठुड्डी और गाल पर रखे हुए हैं और उसकी नजरें ऊपर की ओर हैं। व्यक्ति की शारीरिक मुद्रा और चेहरे के हाव-भाव से यह निष्कर्ष निकलता है कि वह किसी गहरी सोच में है या किसी समस्या का समाधान खोजने का प्रयास कर रहा है।
7. अगर तुमने किसी शिस्पकार को काम करते हुए देखा है तो कुछ वाक्यों में उसका वर्णन करो (संकेत : उन्हें कच्चा माल कहाँ से मिलता है, किस तरह के औजारों का प्रयोग करते हैं, तैयार माल का क्या होता है, आदि)
8. अपने शहर या गाँव के लोगों के कार्यों की एक सूची बनाओ। मधुरा में किए जाने वाले कार्यों से ये कितने समान और कितने भिन्न हैं?

अध्याय 10

ब्यापारी, राजा और तीर्थियारी

बाजार में घूमती जागिणी
जिगनी अपने गाँव के मेले की आस लगाए बैटी थी। स्ट्रील के चमकदार बर्तन, रंगिबरंगी प्लास्तक की बािलट्यां, शोख रंगों के फूलों के फ्रेंटों वाले कपड़े, चबी से चलने वाले मजेदार खिलाने उसे बहुत अच्छे लगते थे। इन चीजों को बेचने वाले दुकानदार बसों और टूकों पर आते थे और रात को अपना सामान समेटकर वापस चले जाते थे। जिगनी को हैरानी होती थी कि ये लोग हमेशा इस तरह क्या घूमते रहते हैं। उसकी मां ने बताया कि वे लोग व्यापारी थे। वे चीजों को उन जगहों से खरीदते थे, जहाँ ये बनाए जाते थे और फिर उन्हें मेलों में बेचते थे।
व्यापार और व्यापारियों के बारे में जानकारी
अध्याय 9 में तुमने उत्तर के काले पॉलिसा वाले बर्तनों के बारे में पढ़ा है। ये खूबसूत बर्तन, खास तौर से इनकी कटोरियाँ तथा थालायाँ, इस उपमहाद्रिप के अनेक पुरासथलों से मिले हैं। सवाल उठता है कि इन जगहों पर ये बर्तन कैसे पहुचे होंगे? ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि जहाँ ये बनते थे, वहाँ से व्यापारी इंहें ले जाकर अलग-अलग जगहों पर बेचते थे। दक्षिण भारत सोना, मसाले, खास तौर पर काली मिच्हि तथा कीमति पत्थरों के लिए प्रसिद्ध था। काली मिच्हि की रोमन साम्राज्य में इतनी माँग थी कि इसे 'काले सोने' के नाम से बुलाते थे। व्यापारी इन सामानों को समुद्री जहाजों और सड्कों के रास्ते रोम पहुँचित थे। दक्षिण भारत में ऐसे अनेक रोमन सोने के सिंकके मिले हैं। इससे यह अन्जाजा लगाया जाता है कि उन दिनों रोम के साथ बहुत अच्छा व्यापार चल रहा था। क्या तुम बता सकती हो कि ये सिक्खे भारत कैसे और क्या पहुंचे होंगे?
Image summary: यह एक फोटोग्राफ है। इस चित्र में एक मुस्कुराती हुई छोटी बच्ची दिखाई दे रही है जिसने नीले रंग के कपड़े पहने हुए हैं। बच्ची के चेहरे के हाव-भाव से उसकी खुशी और उत्साह का पता चलता है, जो एक सकारात्मक और प्रसन्न मुद्रा को दर्शाता है।
व्यापार से जुड़ी एक कविता
Table summary: यह तालिका संगम कविताओं के माध्यम से पुहर पतन में होने वाले व्यापार का विवरण देती है, जिसमें विभिन्न दिशाओं और क्षेत्रों से आने वाली विलासिता की वस्तुओं, प्राकृतिक संसाधनों और कृषि उत्पादों की विविधता को दर्शाया गया है।
व्यापारियों ने कई समुद्री रास्ते खोज निकाले। इनमें से कुछ समुद्र के किनारे चलते थे कुछ अरब सागर और बंगाल की खाड़ी पार करते थे। नाविक मानसूनी हवा का फ्रांसदा उठाकर अपनी यात्रा जल्दी पूरी कर लेते थे। वे अफ्रीका या अरब के पूर्वी तट से इस उपमहाद्वीप के पश्चिमी तट पर पहुँचना चाहते थे तो दक्षिणी-पश्चिम मानसून के साथ चलना पसंद करते थे। इन लंबी यात्राओं के लिए मजबूत जहाजों का निर्माण किया जाता था।
समुद्र तटों से लगे राज्य
इस उपमहाद्वीप के दक्षिणी भाग में बड़ा तटीय प्रदेश है। इनमें बहुत-से पहाड़, पत्थार और नदी के मैदान हैं। नदियों के मैदानी इलाकों में काबेरी का मैदान सबसे उपजाऊ है। मैदानी इलाकों तथा तटीय इलाकों के सरदारों और राजाओं के पास धीरे-धीरे काफ़ी सम्पति और शक्ति हो गई। संगम कविताओं में मुवेन्दार की चर्नी मिलती है। यह एक तिमल शब्द है, जिसका अर्थ तीन मुखिया है। इसका प्रयोग तीन शासक परिवारों के मुंखियाओं के लिए किया गया है। ये थे-चोल, चेर तथा पाड्य, (मानचிற 7, पृष्ठ 113) जो करीब 2300 साल पहले दक्षिण भारत में काफी शक्तिशाली माने जाते थे। इन तीनों मुखियाओं के अपने दो-दो सता केंद्र थे। इनमें से एक तटीयं हिस्से में और दूसरा अंदरनी हिस्से में था। इस तरह छह केंद्रों में से दो बहुत महत्वपूर्ण थे। एक चोलो का पतन पुहार या काबेरीपट्टनन, दूसरा पाड्यों की राजधानी मदुरै। ये मुखिया लोगों से नियमित कर के बजाय उपहारों की माँग करते थे। कभी-कभी ये सैनिक अभियानों पर भी निकल पड़ते थे और आस-पास के इलाकों से शुल्क वसूल कर लाते थे। इनमें से कुछ धन वे अपने पास रख लेते थे, बाकी अपने समर्थकों, नाते-रिश्तेदारों, सिपाहियों तथा कवियों के बीच बाँट देते थे। अनेक संगम कवियों ने उन मुखियाओं की प्रशंसा में कविताएँ लिखी हैं जो उन्हें कीमती जवाहरात, सोने, घोड़े, हाथी, रथ या सुरदर कपड़े दिया करते थे। इसके लगभग 200 वर्षों के बाद परिचम भारत (मानचत्र 7, पृष्ठ 113) में सातवाहन नामक राजवंश का प्रभाव बढ़ गया। सातवाहनों का सबसे प्रमुख राजा गौतमी पुत्र श्री सातकर्मी था। उसके बारे में हमें उसकी माँ, गौतमी बलश्री द्वारा दान किए एक अभिलेख से पता चलता है। वह और अन्य सभी सातवाहन शासक दक्षिणாपथ के स्वामी कहे जाते थे। दक्षिणாपथ का शास्त्रिक अर्थ दक्षिण की ओर जाने वाला रास्ता होता है। पूरे दक्षिणी क्षेत्र के लिए भी यही नाम प्रचिलित था। श्री सातकर्मी ने पूर्वी, परिचमी तथा दक्षिणी तद्यों पर अपनी सेनाएँ भेजी। क्या तुम बता सकती हो कि श्री सातकणी तटों पर नियंत्रण क्या करना चाहता था?
रेशम मार्ग की कहानी
कीमती, चमकीले रंग और चिकनी, मुलायम बनावट की वजह से रेशमी कपड़े अधिकांश समाज में बहुमूल्य माने जाते हैं। रेशमी कपड़ा तैयार करना एक जितल प्रक्रिया है। रेशम के कीड़े से कच्चा रेशम निकालकर, सूत कताई होती है, और फिर उससे कपड़ा बुना जाता है। रेशम बनाने की व्यापारी, राजा और तीर्थयात्रा तकनीक का आविष्कार सबसे पहले चीन में करीब 7000 साल पहले हुआ। इस तकनीक को उन्होंने हजारों साल तक बाकी दुनिया से हुपाए रखा। पर चीन से पैदल, घोड़ों या ऊँटों पर कुछ लोग दूर-दूर की जगहों पर जाते थे और अपने साथ रेशमी कपड़े भी ले जाते थे। जिस रास्ते से ये लोग यात्रा करते थे वह रेशम मार्ग (सिलक रुट) के नाम से प्रसिद्ध हो गया। కభి-కభి చీన కే శాసక ే ర్శాం ే షిష్కమి ే షియా కే శాసక ే కొ ుపహర కే తే ే పె శామి కపడే భె టె ే శామ కే బె ే శా मानचित 6 (पृष्ठ 84-85) को देखो। इसमें सिस्लक ऐट तथा उसकी शाखाओं को दिखायी गया है। कुछ शासक इसके बड़े-बड़े हिस्सों पर अपना नियर्तण करना चाहते थे क्योंकि इस रास्ते पर यात्रा कर रहे व्यापारियों से उन्हें कर, शुल्क तथा तोहफों के जिरए लाभ मिलता था। इसके बदले, ये शासक इन व्यापारियों को अपने राज्य से गुजरते वक्त लुटेरों के आक्रमणों से सुरक्षा देते थे। सिलक रूट पर नियंत्रण रखने वाले शासकों में सबसे प्रसिद्ध कुषाण थे। करिब 2000 साल पहले मध्य-एशिया तथा पश्चिमोत्तर भारत पर इनका शासन था। पेशावर और मधुरा इनके दो मुख्य शक्तिशाली केंद्र थे। तक्षिशाला भी इनके ही राज्य का हिस्सा था। इनके शासनकाल में ही सिलक रुट की एक शाखा मध्य-एशिया से होकर सिधु नदी के मुहाने के पतनों तक जाती थी। फिर यहाँ से जहाजों द्वारा देश, पश्चिम की ओर रोमन साम्राज्य तक पहुँचता था। इस उपमहाद्वीप में सबसे पहले सोने के सिखके जारी करने वाले शासकों में कुषाना थे। सिलक रुट पर यात्रा करने वाले व्यापारी इनका उपयोग किया करते थे। सिलक रुट पर गाडियों का उपयोग क्यां कितन होता होगा? चीन से समुद्र के रास्ते भी रेशम का निरयित होता था। मानचित 6 (पृष्ठ 84-85) में इसे दृढ़ो। समुद्र के रास्ते रेशम भेजने में क्या सुविधाएँ और क्या समस्याएं आती होंगी?
बौद्ध धर्म का प्रसार
कुषाणों का सबसे प्रसिद्ध राजा किनिके था। उसने करीब १९०० साल पहले शासन किया। उसने एक बौद्ध परिषद् का गतन किया, जिसमें एकत होकर विद्वान महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श करते थे। बुद्धि की जीवनी बुद्धिचित के रचनाकार कवि अश्वचोष, किनिके के दरबार में रहते थे। अश्वचोष तथा अन्य बौद्ध विद्वानों ने अब সংकृत में लिखना शुरू कर दिया था। इस समय बौद्ध धर्म की एक नई धारा महायான का विकास हुआ। इसकी दो मुख्य विशेषताएँ थीं। पहले, मूर्तियों में बुद्धि की उपस्थिति सिर्फ कुछ सकेतों के माध्यम से दर्शिं जाती थी। मिसाल के तौर पर उनकी निवारण प्राप्त को पीपल के पेड़ की मूर्ति द्वारा दर्शिया जाता था पर अब बुद्धि की प्रतिमाएँ बनाई जाने लगीं। इनमें से अधिकांश मधुरा में, तो कुछ तक्षिला में बनाई जाने लगीं। दूसरा परिवर्तन बोधिसलच में आस्था को लेकर आया। बोधिसलच उन्हें कहते हैं जो जान प्राप्त के बाद एकांत वास करते हुए ध्यान साधना कर सकते थे। लेकिन ऐसा करने के बजाप, वे लोगों को शिक्षा देने और मदद करने के लिए सांसारिक परिवेश में ही रहना ठीक समझने लगे। धीरे-धीरे बोधिसलच की पूजा काफी लोकप्रिय हो गई। और पूरे मध्य एशिया, चीन और बाद में कोरिया तथा जापान तक भी फैल गई। बौद्ध धर्म का प्रसार पश्चिम और दक्षिणी भारत में हुआ, जहाँ बौद्ध भिक्षुओं के रहने के लिए पहाड़ों में दर्जना गुफाएँ खोदी गई। साँची के स्पूप का एक मूर्ति चित्र। यहाँ इस वृक्ष और उसके नीचे के खाली आसन को देखो। मूर्तिकारों ने यह बताने के लिए खुदाई करके यह मूर्ति बनाई कि बुद्धि को जान की प्राप्ति इसी वृद्धि के नीचे बैठकर ध्यान करते हुए हुई। बाए: मधुरा में बनी बुद्धि को एक प्रतिमा का चित्र। दाए: तक्षिला में बनी बुद्धि की प्रतिमा का एक चित्र। इन चित्रों को देखकर बताओ कि इनके बीच क्या-क्या समानताएँ हैं और क्या-क्या भिन्नताएँ हैं? इनमें से कुछ गुफाएँ राजा और रानियों के आदेश पर बनाई गई तो कुछ व्यापारियों तथा कृषकों द्वारा। इनमें से ज्यादातर गुफाएँ पश्चिमी घाट के दर्शकों पास बनाई गई थीं। दक्षिण के शहारों और तटों के समृद्र बंदरगाहों और इन्हें जोड़ने वाली सड़के भी इन्होंने दर्शकों से होकर गुजरती थीं। ऐसा लगता है कि यात्रा करने वाले व्यापारी इन गुफाओं वाले मतों में विश्राम के लिए एकतौर पर बौद्ध धर्म दक्षिण-पूर्व की ओर श्रीलंका, म्यांमार, थाइलैंड तथा इंडोनेशिया सहित दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य भागों में भी फैला। थेरवाद नामक बौद्ध धर्म का आर्धिक रूप इन क्षेत्रों में कहीं अधिक प्रचलित था। पृष्ठ 100 को एक बार फिर पढ़ो। क्या तुम बता सकती हो कि बौद्ध धर्म इन इलाकों में कैसे फैला होगा?
Image summary: यह एक प्राचीन पत्थर की नक्काशी है। इस कलाकृति में एक पवित्र वृक्ष को केंद्र में दिखाया गया है, जिसके नीचे एक वेदी या सिंहासन जैसी संरचना है। वृक्ष के चारों ओर कई मानवीय आकृतियाँ हैं, जिनमें से कुछ प्रार्थना की मुद्रा में खड़े हैं और कुछ ऊपर की ओर हवा में तैरते हुए दिखाई दे रहे हैं। शीर्ष पर कुछ प्राचीन लिपि में लेख अंकित हैं। यह दृश्य किसी धार्मिक अनुष्ठान या आध्यात्मिक घटना को दर्शाता है, जहाँ दिव्य प्राणियों और भक्तों की उपस्थिति एक पवित्र वातावरण का निर्माण कर रही है। यह नक्काशी श्रद्धा और भक्ति के भाव को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करती है।
Image summary: यह एक मूर्ति की तस्वीर है। इसमें एक खड़ी हुई बुद्ध की प्रतिमा को दर्शाया गया है, जिसमें उनका एक हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में उठा हुआ है और उन्होंने पारंपरिक वस्त्र धारण किए हुए हैं। यह प्रतिमा शांति और आध्यात्मिक जागृति का प्रतीक है, जो बुद्ध की शांत मुद्रा और उनके चेहरे के सौम्य भावों से स्पष्ट होता है।
Image summary: यह एक प्राचीन मूर्ति की तस्वीर है। इस चित्र में एक व्यक्ति को ध्यान मुद्रा में बैठे हुए दिखाया गया है, जिन्होंने पारंपरिक वस्त्र धारण किए हुए हैं और उनके सिर के पीछे एक प्रभामंडल है। उनका एक हाथ आशीर्वाद देने की मुद्रा में उठा हुआ है, जो शांति और ज्ञान का प्रतीक है। इस मूर्ति से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह किसी आध्यात्मिक गुरु या बुद्ध की प्रतिमा है, जो गहन शांति, करुणा और आध्यात्मिक जागृति को दर्शाती है।
तिथ्यात्रियों की जिन्मासा
व्यापारी काफ़िलों में तथा जहाजों पर दूर-दूर जाया करते थे। बहुत-से तीर्थयात्री भी उनके साथ यात्रा पर निकल पड़ते थे।
Image summary: यह एक ऐतिहासिक स्थल की तस्वीर है। इस चित्र में एक चट्टान को काटकर बनाया गया प्राचीन बौद्ध चैत्य दिखाया गया है, जिसमें एक विशाल मेहराबदार प्रवेश द्वार है और उसके अंदर एक स्तूप स्थित है। यह संरचना प्राचीन भारतीय वास्तुकला की कुशलता को दर्शाती है, जहाँ प्राकृतिक पहाड़ियों को तराशकर धार्मिक स्थल बनाए गए थे। यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यह स्थान प्राचीन काल में आध्यात्मिक साधना और पूजा का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा होगा।
तीर्थयांरी
तीर्थयात्री वे स्त्री-पुरुष होते हैं, जो प्रार्थना के लिए पवित्र स्थानों की यात्रा किया करते हैं। इसी तरह भारत की यात्रा पर आया चीनी बौद्ध तीर्थयात्री फा-शिएन् काफी प्रसिद्ध है। वह करिब १६०० साल पहले आया। श्वैन تسंग १४०० साल पहले भारत आया और उसके करिब ५० साल बाद इर्तसंग आया। वे सब बुद्ध (अध्याय 7) के जीवन से जुड़ी जगहों और प्रसिद्ध मतों को देखने के लिए भारत आए थे। इनमें से प्रत्येक तीर्थयात्रा ने अपनी यात्रा का वर्णन लिखा। इन्होंने अपनी यात्रा के दौरान आई मुश्क्लों के बारे में भी लिखा। इन यात्राओं में कई वर्ष लग जाया करते थे। जिन देशों और मतों को उन्होंने देखा, उनके बारे में उन्होंने लिखा और उन किताबों के बारे में भी उन्होंने लिखा, जिन्हें वे अपने साथ ले गए थे।
फा-शिएन चीन वापस कैसे लौटा
फा-शिएन ने अपने घर चीन वापस लौटने के लिए अपनी यात्रा बंगाल से शुरू की। वह खापारियों के एक जहाज पर चढ़ा। मुश्कल से वे दो दिन ही चल पाए थे कि एक समुद्री तूफान में फँस गए। खापारी अपने जहाज को डूबने से बचाने के लिए उसमें से अपने माल को फैककर जहाज को हल्का करने की कोशिश करने लगे। फा-शिएन ने भी अपने सामान को तो फैक दिया, पर अपनी उन पाण्डुलिपियों और बुद्ध की मूर्तियों को नहीं फंका, जिन्हें उसने अपनी भारत यात्रा के दौरान संकलित की थी। अंततः तेरह दिनों के बाद आँधी रुकी। उसने समुद्र का वर्णन इस प्रकार किया है : 'समुद असीम है – सूर्य, चौद्र या तारों की गति को देखे बिना यह पता लगा पाना असंभव है कि पूर्व किधर है, या पश्चिम किस दिशा में है। अगर बरसात और अंधेरा हो, तो जहाज को हवा की रख में ले जाने के अलावा और कोई चारा नहीं।' জাवा पहुचने में उसे 90 दिन से भी ज्यादा लगे। वहाँ वह पाँच महीने के लिए रूका। इसके बाद दूसरे व्यापारी जहाज में चटकर वह चीन पहुचा। मानचित 6 (पृष्ठ 84-85) में फा-शिएन द्वारा तय किए गए रास्ते को दूढ़ो। बताओ कि फा-शिएन अपनी पाण्डुलिपियों और मूर्तियों को क्यां नहीं फैकना चाहता था। श्वैन त्संग भू-मार्ग से (उत्तर-पश्चिम और मध्य-एशिया होकर) चीन वापस लौटा। उसने सोने, चाँदी और चंदन की लकड़ी की बनी बुद्धि की मूर्तियाँ तथा 600 से भी ज्यादा पाण्डुलिपियाँ एकत्र की थीं। इन्हें वह 20 घोड़ों पर लादकर ले गया। पर इसमें से 50 पाण्डुलिपियाँ उस समय खो गईं, जब सिंधु नदी पार करते हुए उसकी नाव उलट गई। अपने जीवन का बाकी हिस्सा उसने बनी हुई पाण्डुलिपियां का সংकृत से चीनी अनुवाद करने में लगा दिया।
नालंदा - शिंशा का एक विशिष्ट केंद्र
स्वेन लंसंग तथा अन्य तीर्थ्यात्रियों ने उस समय के सबसे प्रसिद्ध बौद्ध विधा केंद्र नालंदा (बिहार) में अध्ययन किया। उसने नालंदा के बारे में इस प्रकार लिखा है : यहाँ के शिशक योग्यता तथा बुडि में सबसे आगे है। बुडु के उपदेशों का वह पूरी इमानदारी से पालन करते हैं। मत के नियम काफी सज्जन है, जिन्हें सबको मानना पड़ता है। पूरे दिन वाद-विवाद चलते ही रहते हैं। जिससे युवा और वृद्ध दोनों ही एक-दूसरे की मदद करते हैं। विभिन्न शहारों से विद्वान लोग अपनी शंकाएँ दूर करने यहाँ आते हैं। नए आगन्तुकों से पहले द्वारपाल ही कितन प्रश्न पूछते हैं। उन्हें अंदर जाने की अनुमति तभी मिलती है, जब वे द्वारपाल को सही उत्तर दे पाते हैं। दस में से सात-आठ सही उत्तर नहीं दे पाते हैं। श्वेन तसंग नालंदा में क्यों पढ़ना चाहता था, कारण बताओ?
भक्ति की शुरुआत
इन्होंने दोनों देवी-देवताओं की पूजा का चलन भी शुरू हुआ। बाद में हिन्दु धर्म की यह प्रमुख पहचान बन गई। इनमें शिव, विष्णु और दुगि जैसे देवी-देवता शामिल हैं। इन देवी-देवताओं की पूजा भक्ति परम्परा के माध्यम से की जाती थी। भक्ति उस समय काफी लोकप्रिय परम्परा बन गई। किसी देवी या देवता के प्रति प्रदाह को ही भक्ति कहा जाता है। भक्ति का पथ सबके लिए खुला था, चाहे वह धनी हो या गरीब, ऊँची जाती का हो या नीची जाती का, स्ली हो या पुरुष। भिक्षित मार्ग की चर्चि हिन्दुओं के पवित्र ग्रंथ भगवद्गीता में की गई भगवद्गीता महाभारत (अध्याय 12 देखो) का एक हिस्सा है। इसमें भगवान कृष्ण अपने भक्त और मित्र अजुन को सभी धर्मों को छोड़कर उनकी शरण में आने का उपदेश देते हैं। क्योंकि केवल कृष्ण ही अजुन को सारी बुराइयों से मुक्ति दिला सकते हैं। पूजा का यह रूप धीरे-धीरे देश के विभिन्न भागों में फैलने लगा। भक्ति मार्ग अपनाने वाले लोग आंडंबर के साथ पूजा-पाठ करने के बजाप् ईश्वर के प्रति लगन और व्यक्तिगत पूजा पर जोर देते थे। भिक्षण मार्ग अपनाने वालों का यह मानना है कि अगर अपने आराध्य देवी या देवता की सच्चे मन से पूजा की जाए, तो वह उसी रूप में दर्शन देगे, जिसमें भक्त उसे देखना चाहता है। इसलिए आराध्य देवी या देवता मानव के रूप में भी हो सकते हैं या फिर सिंह, पेड़ या अन्य किसी भी रूप में जैसे-जैसे इस विचार को समाज द्वारा स्वीकृतिक मिलती गई, कलाकार, देवी-देवताओं की एक से बढ़कर एक खूबसूत मूर्तियाँ तैयार करने लगे। बराह के रूप में विंणु। एरण, मध्य प्रदेश की यह शानदार मूर्ति विणु के 'वराह' रूप की है। पुराणों (अध्याय 12) के अनुसार जल में डूबी पृथ्वी को बचाने के लिए विणु ने वराह रूप धारण किया था। यहाँ पृथ्वी को एक स्ली के रूप में दर्शाया गया है।
Image summary: यह एक मूर्ति की तस्वीर है। इसमें एक मानव आकृति को दर्शाया गया है जिसने पारंपरिक वस्त्र और आभूषण पहने हुए हैं और वह एक विशेष मुद्रा में खड़ा है। इस आकृति की शारीरिक बनावट और मुद्रा से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह किसी प्राचीन संस्कृति की कलाकृति है जो उस समय की शिल्प कौशल और पहनावे को प्रदर्शित करती है।

भक्ति

भिक्त भज् शब्द से बना है, जिसका अर्थ 'विभाजित करना या हिस्सेदारी' होता है। इसका अर्थ यह है कि भिक्त, भगवान और भक्त के बीच परस्पर एक अंतरंग संबंध है। भिक्त, भगवत् या भगवान के प्रति झुकाव है। भगवत् का एक अर्थ यह भी है-जो अपने ऐव्य तथा सुख को भक्तो के साथ बॉटा है। यानी भक्त या भागवत् अपने देवी-देवता के भग का हिस्सेदार होता है।

एक भवन द्वारा लिखी गई एक कविता

अधिकांश भवित साहित्य हमं यही बताते हैं कि धन, ऐश्वर्य या ऊँचे पद के जिरए कभी ईश्वर से आत्मीयता नहीं बन सकती। करीब १४०० साल पहले शिवभक्त अपार द्वारा तिमल में लिखी एक कविता का यह एक अंशा है। अपपार एक वेल्लाल (अध्याय 9) था। 'नष्ट होते अंगों वाला कुछ रोगी ब्राह्मणों की नजर में निचली जाति का व्यक्ति कूड़ा करकट बटोर कर अपनी जीविका चलाने वाला इंसान, अगर ये लोग भी गंगा को अपनी जटाओं में छिपा लेने वाले शिव के दास बन जाएं, तो मैँ उनकी आराधना करूणा। क्योंकि वे मेरे ईश्वर समान है।' कवि सामाजिक प्रतिष्ठा और भक्ति में किसको ज्यादा महत्व देते हैं? देवी-देवताओं का विशेष सम्मान होता था। इसलिए विशेष जगहों पर ही इनकी मूर्तियों को रखा जाता था। इन स्थानों को ही मंदिर कहते हैं। अध्याय 12 में तुम इन मंदिरों के बारे में पढ़ोगी। भवित परम्परा ने चित्रकला, शिलेपकला और स्थापत्य कला के माध्यम से अधिव्यक्त की प्रेरणा दी है।

ཝིནྡྲ

'हिन्दू' शब्द 'इण्डिया' शब्द की तरह ही सिंभु या इण्डस से निकला है। यह शब्द अरबों तथा इरिनियों द्वारा उन लोगों के लिए उपयोग किया जाता था, जो सिंभु नदी के पूर्व में रहते थे। यही शब्द उनके धार्मिक विश्वास तथा सांस्कृतिक परमराओं के लिए भी प्रयुक्त होता था। करीब 2000 साल पहले पश्चिम एशिया में इंसाई धर्म का उदय हुआ। इसा मसीह का जन्म बेथलेहम में हुआ, जो उस समय रोमन साम्राज्य का हिस्सा था। इसा मसीह ने स्वयं को इस संसार का उद्कारक बताया। उन्होंने दूसरों को प्यार देने और उसी तरह दूसरों पर विश्वास करने का उपदेश दिया, जिस तरह हर व्यक्ति दूसरों से प्यार और विश्वास की उममीद करता है। बाइबिल में इसा मसीह के उपदेश की बातें लिखी हैं। यहाँ इसका एक अंश दिया गया है :
धन्य है वे लोग जो धर्म और न्याय के लिए भूखे घासे रहते हैं,
उनकी कामनाएँ पूरी होगी।
जो दयालु है, वे धन्य हैं, क्योंकि उन्हें द्या मिलेगी।
धन्य है वे जो दिल से पवित्र है,
क्योंकि वे ईश्वर के दर्शन कर सकेंगे।
धन्य है वे जो शांति स्थापित करते हैं,
वही ईश्वर की संतान कहलाएँगे।
इसा मसीह के उपदेश साधारण लोगों को बहुत पसंद आए और धीरे-धीरे यह पश्चिम एशिया, अफ्रीका तथा यूरोप में फैल गए। इसा मसीह की मृत्यु के सौ सालों के अंदर ही भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिम तट पर पहले ईसाई धर्म प्रकारक, पश्चिम एशिया से आए। मानचित 6 (पृष्ठ 84-85) देखो और पता लगाओ कि किस रास्ते से इसाई धर्म प्रचारक भारत आए होंगे? केशल के इसाईयों को 'सिरायिई इसाई' कहा जाता है क्योंकि संभवत: वे पश्चिम एशिया से आए थे, वे विश्व के सबसे पुराने इसाइयों में से हैं।
कल्पना करो
तुम्हारे पास कोई पाण्डुलिपि है, जिसे एक चीनी तीर्थयात्री अपने साथ ले जाना चाहता है। उसके साथ अपनी बातचीत का वर्णन करो।
आओ याद करें
1. निम्नलिखित के उपयुक्त जोड़ बनाओ
- दक्षिणपथ के स्वामी
- मुवैندार
- अरब प्रायद्वीप पर
- बोधिसरव
- श्वेन त्सांग
- बुদ্ধचरित
- महायान बौद्ध धर्म
- सातवाहन शासक
- चின்ने यात्रे
- चोल, चेर, पाड्य
Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में एक लड़की को दिखाया गया है जो ध्यानपूर्वक एक किताब पढ़ रही है। इस चित्र से यह निष्कर्ष निकलता है कि लड़की पढ़ने की गतिविधि में पूरी तरह से लीन है और शिक्षा के प्रति उसकी रुचि है।
उपयोगी शब्द
- ऑपारी
- मुवैन्दार
- रास्ता या मार्ग
- रेश्नम
- कुछাण
- महायान
- बोधिसंख
- थेरवाद
- तिथ्यांत्री
- भक्ति
▶ रेशम बनाने की कला की खोज (लगभग 7000 साल पहले)
▶ चोल, चेर तथा पांड्य (लगभग 2300 साल पूर्व)
► रोमन-साम्राज्य में रेशम की बढ़ती माँग (लगभग 2000 साल पहले)
कुषాण शासक किनछ (लगभग 1900 साल पहले)
► फा-शिएन का भारत आगमन (लगभग 1600 वर्ष पहले)
वेवन तसंग की भारत यात्रा, अंपार की शिव स्तुति की रचना (लगभग 1400 साल पहले)
2. राजा सिंलक स्ट पर अपना नियर्तण क्यांकयम करना चाहते थे?
3. व्यापार तथा व्यापारिक रास्कों के बारे में जानने के लिए इतिहासकार किन-किन साक्ष्यों का उपयोग करते हैं?
4. भक्ति की प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं?
आओं चर्चों करें
5. चीनी तीर्थयात्री भारत क्यों आप? कारण बताओ।
Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में दो बच्चे एक साथ चलते हुए और आपस में बातचीत करते हुए दिखाई दे रहे हैं, जिनमें से एक ने पीठ पर बस्ता टांगा हुआ है। चित्र से यह निष्कर्ष निकलता है कि दोनों बच्चों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध हैं और वे संभवतः स्कूल जा रहे हैं या स्कूल से वापस आ रहे हैं।
6. साधारण लोगों का भक्ति के प्रति आकर्षित होने का कौन-सा कारण होता है?
आओ करके देखें
Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इसमें एक व्यक्ति को दिखाया गया है जो अपने चेहरे पर हाथ रखे हुए ऊपर की ओर देख रहा है। व्यक्ति की शारीरिक मुद्रा और चेहरे के भाव यह दर्शाते हैं कि वह गहरे विचार में है या किसी समस्या का समाधान खोजने का प्रयास कर रहा है।
7. तुम बाजार से क्या-क्या सामान खरीदती हो उनकी एक सूची बनाओ। बताओ कि तुम जिस शहर या गाँव में रहती हो, वहाँ इनमें से कौन-कौन सी चीज़ बनी थी और किन चीजों को व्यापारी बाहर से लाए थे?
8. आज भारत में लोग बहुत तीर्थयात्राएँ करते हैं। उनमें से एक के विषय में पता करो और एक संक्षिप्त विवरण दो। (संकेत : तीर्थयात्रा में स्ली, पुरुष या बच्चों में से कौन जा सकते हैं? इसमें कितना वक्त लगता है? लोग किस तरह यात्रा करते हैं? वे अपनी यात्रा के दौरान क्या-क्या ले जाते हैं? तीर्थ स्थानों पर पहुंचकर वे क्या करते हैं? क्या वे वापस आते समय कुछ लाते हैं?)

अध्याय 11

नए सामाजिक और राज्य

अरविन्द राजा बना

अरविन्द अपने स्कूल में खेले जाने वाले नाटक में राजा की भूमिका अदा करने के लिए चुना गया। उसने सोचा था कि वह शाही वेशभूषा में, मूँहों पर ताव देते हुए, रूपहले कागज में लिपटी तलवार को शान से पकड़कर चलकदमी करेगा। जरा सोचो, उसे कितनी हैरानी हुई जब उसे बताया गया कि उसे बैठकर वीणा भी बजानी होगी और कविता पाठ भी करना होगा। एक संगीतरा जा? कौन हो सकता है वह? अरविन्द सोचने लगा।

क्या बताती है प्रशिस्तियाँ

द्रअसल अरविन्द गुप्तवंश के प्रसिद्ध राजा समुद्रगुप्त की भूमिका अदा करने जा रहा था। समुद्रगुप्त के बारे में हमें इलाहाबाद में अशोक संतभ पर खुदे एक लंबे अभिलेख से पता चलता है। इसकी रचना समुद्रगुप्त के दरबार में कवि व मंत्री रहे हिरषेण द्वारा एक काल्य के रूप में की गई थी। यह एक विशेष किसम का अभिलेख है, जिसे प्रशिस्ति कहते हैं। यह एक সংकृत शब्द है, जिसका अर्थ 'प्रशंसा' होता है। प्रशिस्तियाँ लिखने का प्रचलन पहले भी था। जैसे तुमने अध्याय 10 में गौतमी-पुत्र श्री सातकणी की प्रशिस्ति के बारे में पढ़ा। परन्तु गुणतकाल में इनका महत्व और बढ़ गया।

समुद्रगुणत की प्रशिस्त

आओ देखें, समुद्रगुण की प्रशिस्त हमें क्या बताती है। कवि ने इसमें राजा की एक योद्धा, युद्धों को जीतने वाले राजा, विद्वान तथा एक उल्कृष्ट कवि के रूप में भरपूर प्रशंसा की है। यहाँ तक कि उसे ईश्वर के बराबर बताया गया है। प्रशिस्त में लंबे-लंबे वाक्य दिए गए हैं। यहाँ वैसे ही एक वाक्य का अंशा दिया गया है:
Image summary: यह एक वास्तविक तस्वीर है। इस चित्र में एक मुस्कुराते हुए बच्चे का चेहरा दिखाया गया है। चेहरे की बनावट और दांतों की स्थिति से यह संकेत मिलता है कि बच्चा किसी विशेष आनुवंशिक स्थिति या स्वास्थ्य संबंधी समस्या से प्रभावित हो सकता है।
Image summary: यह एक प्राचीन सिक्के की छवि है। इस सिक्के के केंद्र में एक व्यक्ति की आकृति अंकित है जो एक आसन पर बैठा हुआ है और उसके चारों ओर कुछ लिपिकीय चिह्न या अक्षर खुदे हुए हैं। यह आकृति किसी महत्वपूर्ण शासक या देवता की उपस्थिति को दर्शाती है, जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यह सिक्का किसी विशिष्ट ऐतिहासिक काल की सत्ता, संस्कृति और आर्थिक विनिमय प्रणाली का प्रतिनिधित्व करता है।
Image summary: यह एक प्राचीन सिक्के की छवि है। इस सिक्के पर एक व्यक्ति की आकृति बनी हुई है जो एक सिंहासन पर बैठा है और उसके पास कुछ लिपि या लिखावट अंकित है। इस आकृति और लेखन से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह सिक्का किसी विशिष्ट ऐतिहासिक काल या साम्राज्य की सत्ता और सांस्कृतिक पहचान को दर्शाता है।
योद्या समुद्रगुणत्
जिनका शरीर युद्ध मैदान में कुठारों, कुल्हाडियों, तीरों, भालो, बर्जी, तलवारों, लोहे की गदाओं, नुकिले तीरों तथा अन्य सैकड़ों हधियारों से लगे घावों के दाग से भरे होने के कारण अत्यंत सुरद दिखता है।
यह वर्णन तुम्हे उस राजा के बारे में क्या बताता है? राजा किस प्रकार युद्ध लड़ते थे? अगर तुम मानीकर 7 (पृष्ठ 113) को गौर से देखो तो पाओंगेरिक एक क्षेत्र को हरे रंग से रंगा गया है। तुम्हे पूर्वी समुद्र तट के साथ-साथ एक क्रम में लाल बंदु दिखेंगे। उसी तरह कुछ क्षेत्र बैंगनी और नीले रंग के भी मिलेगी। यह मानचित इस प्रशिस्ति में प्राप्त जानकारियों के आधार पर बनाया गया है। हरिषेण चार विभिन्न प्रकार के राजाओं और उनके प्रति समुद्रगुप्त की नीतियों का वर्णन करते हैं।
1. मानचितमें हरे रंग का क्षेत्र आयर्वितत के उन नौ शासकों का है, जिन्हें समुद्रगुण ने हराकर उनके राज्यों को अपने साम्राज्य में मिला लिया।
2. इसके बाद दक्षिणपथ के बारह शासक आते हैं। इनमें से कुछ की राजधानीयों को दिखाने के लिए मानचित्र पर लाल बंदु दिए गए हैं। इन सबने हार जाने पर समुद्रगुत के सामने समर्पण किया था। समुद्रगुत ने उन्हें फिर से शासन करने की अनुमति दे दी।
3. पड़ोसी देशों का आतंक घेरा बैंगनी रंग से रंगा गया है। इसमें असम, तटीयं बंगाल, नेपाल और उत्तर-पश्चिम के कई गण या संघ (अध्याय 6 याद करो) आते थे। ये समुद्रगुण के लिए उपहार लाते थे, उनकी आज्ञाओं का पालन करते थे तथा उनके दरबार में उपस्थित हुआ करते थे।
4. बाह्य इलाके के शासक, जिन्हें नीले रंग से रंगा गया है संभवत: कुषण तथा शक वंश के थे। इसमें श्रीलंका के शासक भी थे। इन्होंने समुद्रगुण की अधीनता स्वीकार की और अपनी पुत्रियों का विवाह उससे किया।
मानचित में प्रयोग (इलाहाबाद का पुराना नाम), उज्जेन तथा पाटिलपुत्र (पटना) दूढ़ो। ये गुप्त शासन के महत्वपूर्ण केंद्र थे। आयर्वितं तथा दिक्षिणपथ के राज्यों के साथ समुद्रगुत के व्यवहार में क्या अंतर था? क्या इस अंतर के पीछे तुम्हे कोई कारण दिखाई देता है?
Figure 7 summary: यह एक मानचित्र है। इसमें प्राचीन भारत के प्रमुख नगरों और राज्यों के भौगोलिक विस्तार को दर्शाया गया है, जिसमें आंतरिक राज्यों, बाहरी राज्यों और आयावर्त के क्षेत्रों को अलग-अलग चिह्नित किया गया है। इस मानचित्र से यह निष्कर्ष निकलता है कि गुप्त वंश का प्रभाव व्यापक था और उन्होंने कई महत्वपूर्ण नगरों पर विजय प्राप्त की थी, जबकि विभिन्न राज्यों का वितरण भारतीय उपमहाद्वीप के अलग-अलग हिस्सों में फैला हुआ था।

विज्जम संवत्

58 ईसा पूर्व में प्रारंभ होने वाले विकम संवत को परंपरागत रूप से गुप्त राजा चन्द्रगुप्त द्वितीय के नाम से जोड़ा जाता है और ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने शकों पर विजय के प्रतीक के रूप में इस संवत् की स्थापना की तथा विकमादित्य की उपाधि धारण की थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने विकम संवत को भी अपने राष्ट्रीय कैलंडर में ग्रेगोरियन कैलंडर के साथ स्थान दिया है।

वंशावलीयों

अधिकांश प्रशिस्ततांश शासकों के पूर्वजों के बारे में भी बताती है। यह प्रशांत भी समुद्रगुण के प्रिपतामह, पितामह यानी कि परदादा, ददा, पिता और माता के बारे में बताती है। उनकी माँ कुमार देवी, लिच्छि गण की थी और पिता चन्द्रगुण गुणवंश के पहले शासक थे, जिन्होंने महाराजाधिराज जैसी बड़ी उपाधि धारण की। समुद्रगुण ने भी यह उपाधि धारण की। उनके दादा और परदादा का महाराजा के रूप में ही उल्लेख है। इससे यह आभास मिलता है कि धीरे-धीरे इस वंश का महत्व बढ़ता गया। इन उपाधियों को महत्व के हिसाब से सजाओ। राजा, महाराज-अधिराज, महा-राजा। समुद्र गुण के बारे में हमें उनके बाद के शास्त्रों, जैसे उनके बेटे चन्द्रगुण द्वितीय की वंशावली (पूर्वजों की सूची) से भी जानकारी मिलती है। उनके बारे में अभिलेखों तथा सिक्कों से पता चलता है। उन्होंने पश्चिम भारत में सैन्य अभिमान में आतिम शक शास्त्र को परास्त किया। बाद में ऐसा विश्वास किया जाने लगा कि उनका दरबार विद्वानों से भरा था। कवि कालिदास और खगोलशास्त्री आर्यभट्टु उनके दरबार में थे। इनके विषय में और जानकारी अध्याय 12 में मिलेगी।

हर्षवर्ण तथा हर्षचरित

जिस तरह गुण वंश के शासकों के बारे में अभिलेखों तथा सिक्कों से पता चलता है, उसी तरह कुछ अन्य शासकों के बारे में उनकी जीवनी से पता चलता है। ऐसे ही एक राजा हर्षवर्धन थे, जिन्होंने करीब १४०० साल पहले शासन किया। उनके दरबारी कवि बाणभृद्र ने সংकृत में उनकी जीवनी हर्षचिरित लिखी है। इसमें हर्षवर्धन की वंशावली देते हुए उनके राजा बनने तक का वर्णन है। चीनी तीर्थ्यारी श्वेन तसंग, जिनके बारे में तुमने अध्याय १० में पढ़ा है, काफ़ी समय के लिए हर्ष के दरबार में रहे। उन्होंने वहाँ जो कुछ देखा, उसका विस्तृत विवरण दिया है। हर्ष अपने पिता के सबसे बड़े बेटे नहीं थे पर अपने पिता और बड़े भाई की मृत्यु हो जाने पर धानेसर के राजा बने। उनके बहनोंई कनौज (मानचிற 7, पृष्ट 113) के शासक थे। जब बंगाल के शासक ने उन्हें मार डाला, तो हर्ष ने कनौज को अपने अधीन कर लिया और बंगाल पर आक्रमण कर दिया। मगध तथा बंगाल को जीतकर उन्हें पूर्व में जितनी सफलता मिली थी, उतनी सफलता अन्य जगहों पर नहीं मिली। जब उन्होंने नर्मांदा नदी को पार कर दककन की ओर आगे बढ़ने की कोशिश की तब चालुक्य नरेश, पुलकेशिन दितीय ने उन्हें रोक दिया। मानचित 8 (पृष्ठ 136) देखो और सूची बनाओ कि जब हर्षवधन (क) बंगाल तथा (ख) नर्मा तक गए होंगे तो आज के किन-किन राज्यों से गुजरे होंगे?

पललव, चालुक्य और पुलकेशिन द्वितीय की प्रशिस्तियाँ

इस काल में पत्‍ललव और चालुक्य दक्षिण भारत के सबसे महत्त्वपूर्ण राजवंश थे। पत्‍ललवों का राज्य उनकी राजधानी काँचीपुरम के आस-पास के क्षेत्रों से लेकर कावेरी नदी के डेलता तक फैला था, जबकि चालुक्यों का राज्य कृष्णी और तुंगभद्रा नदियों के बीच स्थित था। चालुक्यों की राजधानी ऐहोल थी। यह एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र था (मानचित्र 7, पृष्ठ 113)। धीरे-धीरे यह एक धार्मिक केंद्र भी बन गया जहाँ कई मंदिर थे। पल्लव और चालुक्य एक-दूसरे की सीमाओं का अतिक्रमण करते थे। मुख्य रूप से राजधानियों को निशाना बनाया जाता था जो समृद्ध शहर थे। पुलकेशिन द्रितीय सबसे प्रसिद्ध चालुक्य राजा थे। उनके बारे में हमं उनके दरबारी कवि रविकीति द्वारा रिचत प्रशिस्त से पता चलता है। इसमें उनके पूर्वजों, खासतौर से पिछली चार पीडियों के बारे में बताया गया है। पुलकेशिन द्रितीय को अपने चचा चे यह राज्य मिला था। रविकीर्ति के अनुसार उन्होंने पूर्व तथा पश्चिम दोनों समुद्रतीय इलाकों में अपने अभिमान चलाए। इसके अतिरिक्त उन्होंने हर्ष को भी आगे बढ़ने से रोका। हर्ष का अर्थ 'आन्द' होता है। कवि का कहना है कि इस पराजय के बाद हर्ष अब 'हर्ष' नहीं रहा। पुलकेशन द्वितीय ने पल्लव राजा के ऊपर भी आक्रमण किया, जिसे काँचीपुरम की दीवार के पीछे शरण लेनी पड़ी। पर चालुक्यों की विजय अल्पकालीन थी। लड़ाई से दोनों वंश दुर्बल होते गए। पल्लवों और चालुक्यों को अन्तत: राष्टकूट तथा चोलवंशों ने समाप्त कर दिया। इनके बारे में तुम कक्षा सात में पढ़ोगे। वे कौन-से अन्य शासक थे जो ततों पर अपना नियर्तण करना चाहते थे? (अध्याय 10 देखो)

इन राज्यों का प्रशासन कैसे चलता था?

पहले के राजाओं की तरह इन राजाओं के लिए भूमि कर सबसे महत्वपूर्ण बना रहा। प्रशासन की प्राथमिक इकाई गाँव होते थे। लेकिन धीरे-धीरे कई नए बदलाव आए। राजाओं ने आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक या सैन्य शक्ति रखने वाले लोगों का समर्थन जुटने के लिए कई कदम उठाए। उदाहरण के तौर पर :
- कुछ महत्वपूर्ण प्रशासकीय पद आनुवंशिक बन गए अर्थात् बेटे अपने पिता का पद पाते थे जैसे कि कवि हिरषेण अपने पिता की तरह महादंडनायक अर्थात् मुख्य न्याय अधिकारी थे।
• कभी-कभी, एक ही व्यक्ति कई पदों पर कार्य करता था जैसे कि हरिषेण एक महादंडनायक होने के साथ-साथ कुमारमात्य अर्थात् एक महत्वपूर्ण मंत्री तथा एक संधि-विग्रहिक अर्थात् युद्ध और शांति के विषयों का भी मंत्री था।
• संभवत: वहाँ के स्थानीय प्रशासन में प्रमुख व्यक्तियों का बहुत बोलबाला था। इनमें नगर-फ्रेडी यानी मुख्य बैंकर या शहर का व्यापारी, सार्थवाह यानी व्यापारियों के कार्फ्लेन के नेता, प्रथम-कुलिक अर्थात् मुख्य शाल्पकार तथा कायस्थों यानी लिपिकों के प्रधान जैसे लोग होते थे।
इस तरह की नीतियाँ कुछ हद तक प्रभावशाली होती थीं, पर समय के साथ-साथ इनमें से कुछ व्यक्ति इतने अधिक शक्तिशाली हो जाते थे कि अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लेते थे। सोचकर बताओ कि अफसरों का पद आनुविशक कर देने में क्या-क्या फायद और क्या-क्या नुकसान हो सकते थे?

एक नए प्रकार की सेना

कुछ राजा अभी भी पुराने राजाओं की तरह एक सुसंगित सेना रखते थे, जिसमें हाथी, रथ, घुड़सवार और पैदल सिंपाही होते थे पर इसके साथ-साथ कुछ सेनानायक भी होते थे, जो आवश्यकता पड़ने पर राजा को सैनिक सहायता दिया करते थे। इन सेनानायकों को कोई नियमित वेतन नहीं दिया जाता था। बदले में इनमें से कुछ को भूमिदान दिया जाता था। दी गई भूमि से ये कर वसूलते थे जिससे वे सेना तथा घोड़ों की देखभाल करते थे। साथ ही वे इससे युद्ध के लिए हाथीयार जुटाते थे। इस तरह के व्यक्ति सामतक कहलाते थे। जहाँ कहीं भी शासक दुर्बल होते थे, ये सामतं स्वतंत्र होने की कोशिश करते थे।

दक्षिण के राज्यो में सभाएँ

पललवों के अभिलेखों में कई स्थानीय सभाओं की चर्नी है। इनमें से एक था ब्राह्मण भूस्वामियों का संगठन जिसे सभा कहते थे। ये सभाएँ उप-सिमित्यों के जिर्ण सिंचাই, खेतीबाड़ी से जुड़े विभिन्न काम, सड़क निर्माण, स्थानीय मंदिरों की देखरेख आदि का काम करती थी। जिन इलाकों के भूस्वामी ब्राह्मण नहीं थे वहाँ उर नामक ग्राम सभा के होने की बात कही गई है। नगरम ज्यापारियों के एक संगठन का नाम था। संभवत: इन सभाओं पर धनी तथा शक्तिशाली भूस्वामियों और व्यापारियों का नियंत्रण था। इनमें से बहुत-सी स्थानीय सभाएँ शताब्द्यों तक काम करती रही।

उस जमाने में आम लोग

जनसाधारण के जीवन की थोड़ी बहुत झलक हमें नाटकों तथा कुछ अन्य सोतो से मिलती है। चलो, इसके कुछ उदाहरण देखते हैं। कालदास अपने नाटकों में राज-दरबार के जीवन के चित्रण के लिए प्रसिद्ध है। इन नाटकों में एक रोकक बात यह है कि राजा और अधिकांश ब्राह्मणों को সংकृत बोलते हुए दिखायी गया है जबकि अन्य लोग तथा मिहलाएँ प्राकृत बोलते हुए दिखாए गए हैं। उनका सबसे प्रसिद्ध नाटक अभिशान-शाकुनतलम् दुच्थत नामक एक राजा और शकुनता नाम की एक युवती की प्रेम कहानी है। इस नाटक में एक गरीब मतुआरे के साथ राजकर्मचारियों के दुर्खंवहार की बात कही गई है।
एक मछुआरे को एक अंगूठी मिली
एक मतुआओं को एक कीमती अंगूही मिली। यह अंगूही राजा ने शक्తుला को भेंट की थी, पर दुष्टनावशा उसे एक मछली निगल गई। जब मतुआआ इस अंगूही को लेकर राजमहल पहुँचा तो द्रापाल ने उस पर चोरी का आरोप लगाया और मुख्य पुलिस अधिकारी भी बहुत बुरी तरह से पेश आया। राजा उस अंगूही को देखकर बहुत खुश हुए और उन्होंने मतुआरो को इनाम दिया। पुलिसवाला और द्रापाल मतुआरो से इनाम का कुछ हिस्सा हड़पने के लिए उसके साथ शराबखाने चल पड़े। आज अगर किसी गरीब आदमी को कुछ मिलता है और वह पुलिस में खबर करता है तो क्या उसके साथ इसी तरह का बतिव किया जाएगा? एक प्रसिद्ध व्यक्ति का नाम बताओ, जिसने प्राकृत में उपदेश दिए और एक राजा का नाम बताओ, जिसने प्राकृत में अपने अभिलेख लिखवाए। (अध्याय 7 तथा 8 देखो।) कीनी तीर्धारानी फा-शिएन का ध्यान उन लोगों की दुर्गति पर भी गया, जिन्हें ऊँचे और शिक्षितशाली लोग अह्लूत मानते थे। इन्हें शहर्ों के बाहर रहना पड़ता था। वे लिखते हैं – “अगर इन लोगों को शहर या बाजार के भीतर आना होता था तो सभी को आगाह करने के लिए ये लकड़ी के एक टुकड़े पर चोट करते रहते थे। यह आवाज सुनकर लोग सतर्क होकर अपने को, छू जाने से या किसी भी प्रकार के संपर्क से बचाते थे। ” एक जगह बाणभट द्वारा अभियान पर निकली राजा की सेना का बड़ा सजीव चित्रण किया गया है।
राजा की सेना
राजा बड़ी मात्रा में साजो-सामान लेकर यात्रा करते थे। इनमें हिथ्यारों के अतिरिक्त, रेजमारी के उपयोग में आने वाली चीजें, जैसे बर्तन, असबाब (जिसमें सोने के पायदान भी शामिल थे), खाने-पीने का सामान (बकरी, हिरण, खरगोश, सिंजियाँ, मसाले) आदि, विभिन्न प्रकार की चीजें शामिल होती थीं। ये सारी चीजें डेलेगाडियों पर या केंटों तथा हाथियों जैसे सामान डोने वाले जानवरों की पीठ पर लादकर ले जायी जाती थीं। इस विशाल सेना के साथ-साथ संगीतकार नागड़े, बिगुल तथा तुरही बजाते हुए चलते रहते थे। रास्ते में पड़ने वाले गाँव वालों को उनका सस्कार करना पड़ता था। वे दही, गुड़ तथा फूलों का उपहार लाते थे तथा जानवर्ग को चारा भी देते थे। वे राजा से भी मिलना चाहते थे, तिके अपनी शिकायत या कोई अनुरोध उनके सामने रख सके। पर ये सेनाएँ अपने पीछे विनाश और विध्वंश की निशानी छोड़ जाती थीं। अक्सर गाँव वालों की झोपिड्यां हाथी कुचल डालते थे और व्यापारियों के काफ़ीलों में जुते बैल, इस हलचल भरे माहौल से डरकर भाग खड़े होते थे। बाणभट्र लिखते हैं - "पूरी दुनिया धूल के गर्त में डूब जाती थी।" सेना के साथ ले जাই जाने वाली चीजों की सूची बनाओ। ग्रामवासी राजा के लिए क्या-क्या लेकर आते थे? मानचित 6 (पृष्ठ 84-85) में अरब दूढ़ों। मरभूमि होते हुए भी सदियों से अरब, यातायात का एक बड़ा केंद्र था। दरअसल, अरब व्यापारी तथा नाविकों ने भारत और यूरोप (देखो पृष्ठ सं. 100) के बीच समुद्र व्यापार बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अरब में रहने वाले अन्य लोगों में बेறுइन थे, जो घुमककड़ कबिले होते थे। ये मुख्य रूप से ऊँटों पर आश्रित होते थे, क्योंकि यह एक ऐसा मजबूत जानवर है, जो मरभूमि में भी स्वस्थ रह सकता है। लगभग 1400 साल पहले पैंगमबर मुहम्मद ने अरब में इस्लाम नामक एक नए धर्म की शुरुआत की। इसाईं धर्म की तरह इस्लाम ने भी अल्लाह को सवौपिरी माना है, उनके बाद सभी को समान माना गया है। यहाँ इस्लाम धर्म के पवित्र ग्रंथ कुरान का एक अंशा दिया गया है :
“मुसलमान सिरयों और पुरुषों के लिए, विश्वास रखने वाले सिरयों और पुरुषों के लिए, भक्त सिरयों और पुरुषों के लिए, सच्चे सिरयों और पुरुषों के लिए, धैर्यवान और स्थर मन के सिरयों और पुरुषों के लिए, दान देने वाले सिरयों और पुरुषों के लिए, उपवास रखने वाले सिरयों और पुरुषों के लिए, अपनी पविवर्तता बनाए रखने वाले सिरयों और पुरुषों के लिए, अल्लाह को हमेशா याद करने वाले सिरयों और पुरुषों के लिए-अल्लाह ने इन सब के लिए ही धमा और पुरस्कार रखा है।” अगले सौ सालों के दौरान इस्लाम उत्तरि अफ्रीका, स्पेन, इतना और भारत में फैल गया। अरब नाविक, जो इस उपमहाद्वीप की तटीय बिस्तयों से पहले से ही परिचित थे, अब अपने साथ इस नए धर्म को भी ले आए। अरब के सिराहियों ने करीब १३०० साल पहले सिंध (आज के पाकिस्तान में) को जीत लिया था।
मानचित 6 में उन रास्कों को दूढ़ों जिनसे नाविक तथा सिपाही इस उपमहाद्रिप में आए होंगे। आनुविशक पदाधिकारी ☐ 120
कल्पना करो
हर्षवर्धन की सेना अगले हर्षते तुम्हारे गाँव आने वाली है। तुम्हारे माता-पिता इसके लिए तैयारी कर रहे हैं। वर्णन करो कि वे क्या-क्या बोल रहे हैं और क्या कर रहे हैं।
आओ याद करें
1. सही या गलत बताओ:
Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में एक लड़की को दिखाया गया है जो एकाग्रता के साथ एक किताब पढ़ रही है। चित्र से यह निष्कर्ष निकलता है कि लड़की पढ़ने की गतिविधि में पूरी तरह लीन है और वह शिक्षा या ज्ञान प्राप्त करने के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखती है।
(क) हरिषेण ने गौतमी पुत्र श्री सातकर्मी की प्रशंसा में प्रशंसित लिखी।
(ख) आयिवर्त के शासक समुद्रगुत के लिए भेट लाते थे।
(ग) दक्षिणपथ में बारह शासक थे।
(घ) गुण शास्कों के नियंत्रण में दो महत्वपूर्ण केन्द्र तक्षिशा और मदुरे थे।
(ड) एहोल पललवों की राजधानी थी।
(च) दक्षिण भारत में स्थानीय सभाएँ सदियों तक काम करती रही।
2. ऐसे तीन लेखकों के नाम बताओ, जिन्होंने हर्षवर्धन के बारे में लिखा।
3. इस युग में सैन्य संगठन में क्या बदलाव आए?
4. इस काल की प्रशासनिक व्यवस्था में तुम्हे क्या-क्या नई चीज़े दिखती है?
आओं चर्चों करें
5. तुम्हे क्या लगता है कि समुद्रगुण की भूमिका अदा करने के लिए अरविन्दको क्या-क्या करना पड़ेगा?
6. क्या प्रशिस्तयों को पढ़कर आम लोग समझ लेते होंगे? अपने उत्तर के कारण बताओ।
Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में एक लड़का और एक लड़की को साथ में चलते हुए और बातचीत करते हुए दिखाया गया है, जिसमें लड़की ने अपनी पीठ पर एक बस्ता टांगा हुआ है। इस दृश्य से यह निष्कर्ष निकलता है कि दोनों विद्यार्थी हैं जो संभवतः स्कूल जा रहे हैं या स्कूल से वापस आ रहे हैं और उनके बीच मैत्रीपूर्ण संबंध हैं।
7. अगर तुम्हे अपनी वंशावली बनानी हो, तो तुम उसमें किन लोगों को शामिल करोगे? कितनी पीडियों को तुम इसमें शामिल करना चाहोगे? एक चार्ट बनाओ और उसे भरो।
8. आज युद्ध का असर जनसाधारण पर किस तरह पड़ता है?
Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इसमें एक व्यक्ति को दिखाया गया है जो गहरी सोच में डूबा हुआ है और उसने अपने हाथों को अपने चेहरे और ठुड्डी के पास रखा हुआ है। व्यक्ति के चेहरे के भावों और उसकी शारीरिक मुद्रा से यह निष्कर्ष निकलता है कि वह किसी उलझन में है या किसी समस्या का समाधान खोजने का प्रयास कर रहा है।
- ▶ गुप्त वंश की शुरुआत (1700 साल पहले)
- ▶ हर्षवर्धन का शासन (1400 साल पहले)

अध्याय 12

इमारतें, चिத்्रा तथा किताबें

Image summary: यह एक वास्तविक तस्वीर है। इस चित्र में एक बच्चा दिखाया गया है जो चलने के लिए बैसाखियों का उपयोग कर रहा है। यह दृश्य दर्शाता है कि बच्चा शारीरिक चुनौतियों के बावजूद आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा है, जिससे उसकी दृढ़ इच्छाशक्ति और साहस का पता चलता है।
मकत्सायि और लौह स्तंभ
मस्तसामि आज बहुत खुश था। पिहएदार कुर्सी में बिठाकर उसका भाई उसे कुतुबमीनार दिखाता हुआ प्रसिद्ध लौह स्तंभ के सामने ले आया। धूल भरे, पथरிலे रास्तो से रैम्म के सहारे यहाँ तक आना काफी मुश्कल था। अपने इस अनुभव को मस्तसामि कभी नहीं भूल पाएगा।

धातु विज्ञान

प्राचीन भारतीय धातुवैज्ञानिकों ने विश्व धातुविज्ञान के क्षेत्र में प्रमुख योगदान दिया है। पुरतातिलक खुदाई ने यह दर्शिया है कि हड़णावासी कुशल शिल्पी थे और उन्हें ताँबे के धातुकर्म (धातुशोधन) की जानकारी थी। उन्होंने ताँबे और टिन को मिलाकर कार्सा भी बनाया था। जहाँ हड़णावासी कार्स्य युग से जुड़े थे वहीं उनके उत्तरिधकारी लौह युग से संबद्ध थे। भारत अत्यंत विकसित किसम के लोह का निर्माण करता था — खोटा लोहा, पितवा लोहा, ढलवा लोहा।
Image summary: यह एक वास्तविक वस्तु की तस्वीर है। इसमें एक प्राचीन लोह-स्तंभ दिखाया गया है जो एक ऊंचे और बेलनाकार ढांचे के रूप में खड़ा है और इसके ऊपरी हिस्से पर नक्काशीदार डिजाइन बना हुआ है। यह स्तंभ अपनी मजबूती और टिकाऊपन को दर्शाता है क्योंकि यह लंबे समय तक बाहरी वातावरण में रहने के बावजूद सुरक्षित खड़ा है, जो प्राचीन काल की उन्नत धातु विज्ञान कला का प्रमाण है।

लोह संतभ

महरैली (दिल्ली) में कुतुबमीनार के परिवार में खड़ा यह लौह सतंभ भारतीय शालपकारों की कुशलता का एक अद्भुत उदाहरण है। इसकी ऊँचाई 7.2 मीटर और वजन 3 टन से भी ज्यादा है। इसका निर्माण लगभग 1500 साल पहले हुआ। इसके बनने के समय की जानकारी हमं इस पर खुदे अभिलेख से मिलती है। इसमें 'चन्द्र' नाम के एक शासक का ज़िक्र है जो संभवत: गुप्त वंश (अध्याय 11) के थे। आश्रच्य की बात यह है कि इतने वर्षों के बाद भी इसमें जंग नहीं लगा है।

इटो और पत्थरों की इमारतें

हमारे शिप्पकारों की कुशलता के नमुने स्तूणों जैसी कुछ इमारतो में देखने को मिलते हैं। स्तूण का शास्त्रिक अर्थ टीला होता है हालांकि स्तूण विभिन्न आकार के थे - कभी गोल या लंबे तो कभी बड़े या छोटे। उन सब में एक समानता है। प्राय: सभी स्तूणों के भीतर एक छोटा-सा डिब्बा रखा रहता है। इन डिब्बों में बुद्धि या उनके अनुच्छेदों के शरीर के अवशेष (जैसे दाँत, हुई या राख) या उनके द्वारा प्रयुक्त कोई चीज या कोई कीमती पत्थर अथवा सिंकके रखे रहते हैं। इसे धातु-मंजूषा कहते हैं। प्रारंभिक स्पृथ, धातु-मंजूषा के ऊपर रखा मिट्टी का टीला होता था। बाद में टीलेको इटों से ढक दिया गया और बाद के काल में उस गुम्बदनुमा ढाँचे को तराशे हुए पत्थरों से ढक दिया गया। पाय: स्पूणों के चारों ओर परिक्रमा करने के लिए एक वृताकार पथ बना होता था, जिसे प्रदिशणा पथ कहते हैं। इस रास्ते को रेलिंग से घेर दिया जाता था जिसे वेडिका कहते हैं। वेडिका में प्रवेशदार बने होते थे। रेलिंग तथा तोरण प्राय: मूर्तकला की सुद्र कलाकृतियों से सजे होते थे। मानचित 7 (पृष्ठ 113) में अमरावती दूढ़ों। यहाँ कभी एक भव्य स्पूप हुआ करता था। लगभग 2000 साल पहले इस स्पूप को सजाने के लिए शिलाओं पर चित्र उकेरे गए। कई बार पहाडियों को काट कर बनावती गुफाएँ बनाई जाती थीं। इस तरह की कई गुफाओं को मूर्तियों तथा चित्रों द्वारा सजाया जाता था। इस काल में कुछ आरंभिक हिन्दू मंदिरों का भी निर्माण किया गया। इन मंदिरों में विषणु, शिव तथा दुगि जैसे देवी-देवताओं की पूजा होती थी। मंदिरों का सबसे महत्वपूर्ण भाग गर्भगृहहोता था, जहाँ मुख्य देवी या देवता की मूर्ति को रखा जाता था। इसी स्थान पर पुरोहित धार्मिक अनुष्ठान करते थे और भवत पूजा करते थे। अक्सर गर्भगृह को एक पवित्र स्थान के रूप में दिखाने के लिए, ऊपर: साँची का महान स्पूप (मध्य प्रदेश)। इस तरह के स्तुப்பों का निर्माण कई सौ सालों तक चलता रहा। इस स्पूप में इति का प्रयोग संभवत: अशोक (अध्याय 8) के जमाने का है, जबकि रेलिंग और प्रवेशदार बाद के शासकों के काल में जोड़ गए। बाएं: अमरावती की एक शालपकृति। इस चিতर को देखकर इसका वर्णन करो। 123 इमारतें, चित्र तथा किताबे बाएँ ऊपर: उत्तर प्रदेश के भितरग्व का एक आर्भिंक मंदिर। यह लगभग 1500 साल पहले पकी इंट और पत्थरों से बनाया गया था। दाएँ ऊपर: महाबलिपुरम के एकाष्ठिक मंदिर। इनमें से प्रत्येक मंदिर एक ही विशाल पहाड़ी को तराश कर बनाया गया है। इसीलिए इन्हे एकाशम (monolith) कहा गया है। इटों से बनाए जाने वाले मंदिरों से यह बिलकुल भिन्न होते थे। इट से बनी इमारतो में नीचे से इटों की एक-एक तह जोड़ते हुए उसे ऊपर की ओर ले जाते हैं, जबकि चट्टान तराश कर बनाए जाने वाले मंदिरों को पत्थर काटने वाले ऊपर से नीचे के क्रम में बनाते हैं। इन मंदिरों को बनाते समय पत्थर काटने वालों को किन समस्याओं का सामना करना पड़ता होगा, इसकी सूची बनाओ। दाएं: ऐहोल का दुगि मंदिर। यह लगभग 1400 साल पहले बनाया गया था। 124 हमारे अंततः-1 भितराँவं जैसे मंदिरों में उसके ऊपर काफ़ी ऊँचाई तक निर्माण किया जाता था, जिसे शिखर कहते थे। शिखर निर्माण के कितन कार्य के लिए सावधानी से योजना बनानी पड़ती थी। अधिकतर मंदिरों में मण्डप नाम की एक जगह होती थी। यह एक सभागार होता था, जहाँ लोग इकलुदा होते थे। मानचित 7 (पृष्ठ 113) में महाबिलपुरम और एहोल को दूढ़ो। इन शहरो में पत्थरों से बने कुछ उलकृष्ट मंदिर हैं। उनमें से कुछ यहाँ दिखाए गए हैं।
Image summary: यह एक वास्तुशिल्प चित्रण है। यह चित्र एक प्राचीन बहुमंजिला संरचना को दर्शाता है जिसमें जटिल नक्काशीदार स्तंभ और कई स्तर बने हुए हैं, जो एक पहाड़ी की तलहटी में स्थित प्रतीत होती है। इस संरचना की बनावट से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह एक भव्य धार्मिक या शाही स्मारक है, जो उस समय की उन्नत निर्माण कला और विस्तृत शिल्प कौशल को प्रदर्शित करता है।
Image summary: यह एक गोलाकार नक्काशीदार कलाकृति है। इस चित्र में कई मानवीय आकृतियों और जानवरों को दर्शाया गया है, जिसमें लोग विभिन्न गतिविधियों में व्यस्त दिखाई दे रहे हैं और कुछ पशु भी मौजूद हैं। यह दृश्य एक सामूहिक सामाजिक गतिविधि या किसी प्राचीन घटना का चित्रण प्रतीत होता है, जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यह उस समय की संस्कृति, आपसी मेलजोल और दैनिक जीवन के तौर-तरीकों को प्रदर्शित करता है।
Image summary: यह एक ऐतिहासिक संरचना की तस्वीर है। इस चित्र में एक प्राचीन मंदिर का अवशेष दिखाया गया है जिसमें एक ऊंचा शिखर और एक मुख्य प्रवेश द्वार है। संरचना की बनावट से पता चलता है कि यह समय के साथ काफी जर्जर हो चुकी है, लेकिन फिर भी इसकी भव्यता और वास्तुकला स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यह स्थल किसी प्राचीन सभ्यता की उन्नत निर्माण कला का प्रमाण है और वर्तमान में एक पुरातात्विक अवशेष के रूप में मौजूद है।
Image summary: यह एक वास्तविक दुनिया की तस्वीर है। इस चित्र में प्राचीन पत्थर से तराशे गए मंदिरों का एक समूह दिखाया गया है, जिनमें अलग-अलग आकार की छतें और विस्तृत नक्काशीदार दीवारें हैं। यह दृश्य दर्शाता है कि ये संरचनाएं एक ही चट्टान को काटकर बनाई गई हैं, जो उस समय की उन्नत वास्तुकला और शिल्प कौशल को प्रमाणित करती हैं।
Image summary: यह एक ऐतिहासिक वास्तुशिल्प की तस्वीर है। इसमें एक प्राचीन मंदिर को दर्शाया गया है जिसमें एक गोलाकार आधार, नक्काशीदार स्तंभ और ऊपर की ओर एक शिखर बना हुआ है। मंदिर की बाहरी दीवारों और स्तंभों पर विस्तृत मूर्तियां और कलाकृतियां उकेरी गई हैं। इस संरचना से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह प्राचीन भारतीय मंदिर वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो उस समय की उन्नत शिल्प कौशल और धार्मिक महत्व को प्रदर्शित करता है।
స్టूए तथा मंदिर किस तरह बनाए जाते थे?
స్तूणों तथा मंदिरों को बनाने की प्रश्नका में कई अवस्थाएँ आती हों। इसके लिए काफ़ी धन खर्च होता था। इसलिए आमतौर पर राजा या रानी ही इन्हें बनवाने का निशंचय करते थे। पहला काम, अच्छे किसम के पत्थर दूढ़कर शिलाखंडों को खोदकर निकालना होता था। फिर मंदिर या स्पूच के लिए सोच-विचार कर तय किए गए स्थान पर शिलाखंडों को पहुँचाना होता था। यहाँ पत्थरों को काट-छॉटकर तराशने के बाद खंभों, दीवारों की चौखटों, फ्रेंशो तथा छतों का आकार दिया जाता था। इन सबके तैयार हो जाने पर सही जगहों पर उन्हें लगाना काफ़ी मुश्क्ल का काम था। इस तरह के शानदार दर्दों का निर्माण करने वाले शिलेपकार को सारा खर्च संभवत: राजा-रानी ही देते थे। इसके अतिरिक्त इन स्तूपों या मंदिरों में आने वाले भक्त जो उपहार अपने साथ लाते थे उनसे इमारत की सजावट की जाती थी। जैसे हाथी दाँत का काम करने वाले श्रीमकों के संघ ने साँची के एक अल्कृत प्रवेशदार (तोरण) को बनाने का खर्च दिया था। इनकी सजावट के लिए पैसे देने वालों में व्यापारी, कृषक, माला बनाने वाले, इंत्र बनाने वाले, लोहार-सुनार, नीचे: राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली से एक मूर्ति का चित्र। क्या तुम यहाँ देख पा रहे हो कि किस प्रकार गुफाओं की खुदाई की गई होगी? तथा ऐसे कई स्प्री-पुरुष शामिल थे जिनके नाम खंभों, रिलिंगों तथा दीवारों पर खुदे हैं, इसलिए जब तुम इन स्थानों को देखने जाओ तो याद रखना कि कितने सारे लोगों ने इन्हें बनाने और सजाने में अपना योगदान दिया था। अध्याय 9 के पूछ 91 पर दिए चित्र की तरह तुम भी मंदिरों तथा स्तूपों के निर्माण के दौरान आने वाले विभिन्न चरणों का चित्र बनाओ।
Image summary: यह एक फोटोग्राफ है। इस चित्र में एक प्राचीन चट्टान को काटकर बनाई गई गुफा संरचना दिखाई गई है, जिसमें दो स्तरों पर स्तंभों वाली दीर्घाएं और कई छोटे कक्ष बने हुए हैं। इस संरचना से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह एक उन्नत वास्तुकला का उदाहरण है, जहाँ प्राकृतिक पहाड़ियों को तराश कर रहने या पूजा के लिए व्यवस्थित कमरों और बरामदों का निर्माण किया गया था।
Image summary: यह एक प्राचीन पत्थर की नक्काशी है। इस चित्र में कुछ मानव आकृतियों को दिखाया गया है जो किसी उपकरण का उपयोग करके पत्थर तराशने या निर्माण कार्य में लगे हुए प्रतीत होते हैं। इस चित्रण से यह निष्कर्ष निकलता है कि उस समय के लोग शिल्प कौशल में निपुण थे और वे शारीरिक श्रम के माध्यम से कलाकृतियों का निर्माण करते थे।
Image summary: यह एक प्राचीन भित्ति चित्र है। इस चित्र में एक केंद्रीय पुरुष आकृति को दिखाया गया है जिसने एक ऊंचा मुकुट और गले में माला पहनी हुई है, और वह एक शांत मुद्रा में बैठा है। उसके आस-पास अन्य छोटी आकृतियाँ भी दिखाई दे रही हैं। यह चित्र किसी धार्मिक या शाही व्यक्तित्व के प्रति श्रद्धा और उनकी उच्च सामाजिक स्थिति को दर्शाता है, जहाँ केंद्रीय आकृति की प्रधानता उसके आकार और अलंकारों से स्पष्ट होती है।

चित्रकूटா

मानचित 7 में अंजांको दूढ़ो। यह वह जगह है, जहाँ के पहाड़ों में सैकड़ों सालों के दौरान कई गुफाएँ खोदी गई। इनमें से ज्यादातर बौद्ध भिषुओं के लिए बनाए गए विहार थे। इनमें से कुछ को चिज़ी द्वारा सजाया गया था। यहाँ इनके कुछ उदाहरण दिए गए हैं। गुफाओं के अंदर अंधेरा होने की वजह से, अधिकांश चिच्र मशாலों की रोशनी में बनाए गए थे। इन चित्रों के रंग 1500 साल बाद भी चमकदार हैं। ये रंग पैथो तथा खिनजों से बनाए गए थे। इन महान कृतियों को बनाने वाले कलाकार अज्ञात हैं।

पुस्तकों की दुनिया

इस युग में कई प्रसिद्ध महासागरों की रचना की गई। इन उल्कृत रचनाओं में स्त्री-पुरुषों की वीरगथाएँ तथा देवताओं से जुड़ी कथाएँ हैं। करीब १८०० साल पहले एक प्रसिद्ध तमिल महाकाव्य सिलपविदकारम की रचना इलांगो नामक कवि ने की। इसमें कोवलन् नाम के एक व्यापारी की कहानी है। वह पुहर में रहता था। अपनी पली कनगी की उपेक्षा कर वह एक नर्तरी माधवी से प्रेम करने लगा। बाद में, वह और कनगी पुहर छोड़कर मदुरै चले गए। वहाँ पांड्य राजा के दरबारी जौहरी ने कोवलन् पर चोरी का झूठा आरोप लगाया जिस पर राजा ने उसे प्राणदंड दे दिया। कनगी जो अभी भी उससे प्रेम करती थी, इस अन्याय के कारण दुःख और रोष से भर गई। उसने मदुरै शहर का विनाश कर डाला।
सिलफ़ादिकारम से लिया गया एक वर्णन
यहाँ कवि ने कनंगी के दुःख का इस तरह वर्णन किया है:
“ओ मेरा दु:ख तो देखो, तुम मुझे साँसना तक नहीं दे सकते। क्या यह सही है कि विशुद्ध सोने से भी सुंदर तुम्हारा शरीर बिना धुला, धूल से सना यू ही पड़ा है? यह कहां का न्याय है कि गोधूलित की इस स्वर्णम आभा में फूलमाला से ढके सुन्दर वक्ष:स्थल वाले तुम जमीन पर गिरे पड़े हो। मै अकेली, असहाय और हताश होकर खड़ी हूँ। क्या ईश्वर नहीं है? क्या इस देश में ईश्वर नहीं हैं? पर क्या उस स्थान पर ईश्वर रह सकते हैं जहाँ के राजा की तलवार निर्दोष नवागन्तुक के प्राण ले लेती है? क्या ईश्वर नहीं है? नहीं है?"
एक और तिमल महाकाव्य, मिगमेखलई को करीब १४०० साल पहले सतनार द्वारा लिखा गया। इसमें कोवलन् तथा माधवी की बेटी की कहानी है। ये रचनाएँ कई सिदियों पहले ही खो गई थीं। उनकी पाण्डुलिपियाँ दोबाला लगभग एक सौ साल पहले मिली। अन्य लेखक, जैसे कालिदास (जिनके बारे में तुमने अध्याय 11 में पढ़ा है) সংकृत में लिखते थे।
मेधदूत का एक श्लोक
यहाँ उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना मेघदूत से एक अंश दिया गया है। यहाँ एक विरही प्रेमी बरसात के बादल को अपना संदेशवाहक बनाने की कल्पना करता है। देखो इसमें किस तरह कवि ने बादलों को उतर की ओर ले जाती تذी हवा का वर्णन किया है : "तुम्हारे बौधारों से मुलायम हो उठी मिट्टी की भीनी खुशबू से भरे, हाथियों की सात में बसी जंगली गूलर को पकाने वाली, शीतल ब्यार तुम्हारे साथ धीरे-धीरे बहेगी।" क्या तुम्हे लगता है कि कालदास को प्रकृतिप्रेमी कहा जा सकता है?

पुरानी कहाనిयों का संकलन तथा संरक्षण

हिन्दू धर्म से जुड़ी कई कहिनियाँ जो बहुत पहले से प्रचिलित थीं, इसी काल में लिखी गई। इनमें पुराना भी शामिल है। पुराण का शब्दक अर्थ है प्राचीन या पुराण। पुराणों में विष्णु, शिव, दुर्ग या पार्वती जैसे देवी-देवताओं से जुड़ी कहिनियाँ हैं। इनमें इन देवी-देवताओं की पूजा की विधियों दी गई हैं। इसके अतिरिक्त इनमें संसार की सृष्टि तथा राजाओं के बारे में भी कहिनियां हैं। अधिकतर पुराण सरल संस्कृत श्लोक में लिखे गए हैं, जिससे सब उन्हें सुन और समझ सके। सिख्यों तथा शूद्र जिन्हें वेद पढ़ने की अनुमित नहीं थीं वे भी इसे सुन सकते थे। पुराणों का पाठ पुजारी मंदिरों में किया करते थे जिसे लोग सुनने आते थे। दो সংकृत महाकाव्य महाभारत और रामायण लंबे ऑस से लोकप्रिय रहे हैं। तुममें से भी कुछ बच्चे इन कहानियों से परिचित होंगे। महाभारत कौरवों और पाండवों के बीच युद्ध की कहानी है। इस युद्ध का उदेश्य पुर-वंश की राजधानी हितनापुर की गदि प्राप्त करना था। यह कहानी तो बहुत ही पुरानी है, पर आज इसे हम जिस रूप में जानते हैं, वह करीब १५०० साल पहले लिखी गई। माना जाता है कि पुरानों और महाभारत दोनों को ही व्यास नाम के ऋषि ने संकलित किया था। महाभारत में ही भगवद् गीता भी है, जिसके बारे में तुमने अध्याय १० में पढ़ा था। रामायण की कथा कोसल के राजकुमार राम के बारे में है। उनके पिता ने उन्हें वनवास दे दिया था। वन में उनकी पली सीता का लंका के राजा रावण ने अपहरण कर लिया था। सीता को वापस पाने के लिए राम को लड़ाई लड़नी पड़ी। वे विजयी होकर कोसल की राजधानी अयोध्या लौटे। महाभारत की तरह ही रामायण भी एक प्राचीन कहानी है, जिसे बाद में लिखित रूप दिया गया। সংकृत रामायण के लेखक वाल्मीकि माने जाते हैं। इस उपमहाद्वीप के विभिन्न भागों में महाभारत और रामायण के भिन्न-भिन्न स्पानर लोकप्रिय हैं। इनके आधार पर नाटक, गीत और नृत्य परंपराएँ भी उभरी। पता करो तुम्हारे राज्य में कौन-सा स्पानर प्रचलित है।

आम लोगों द्वारा कहीं जाने वाली कहानियों

आम लोग भी कहानियाँ कहते थे, कविताओं और गीतों की रचना करते थे, गाने गाते थे, नाचते थे और नाटकों को खेलते थे। इनमें से कुछ तो इस समय के आस-पास जातक और पंचतंत्र की कहिनियां के रूप में लिखकर सुरक्षित कर लिया गए। जातक कथाएं तो अक्सर सूपों की रिलींगों तथा अंजा के चित्रों में दर्शायी जाती थीं। इनमें से एक कहानी अगले पृष्ठ पर दी गई है :
बंदर राजा की कहानी
एक समय बंदरों का एक महान राजा हुआ। वह हिमालय पर गंगा के किनारे अपने 80,000 अनुयायियों के साथ रहता था। इन सारे बंदरों को एक खास आम के पेड़ के फल बहुत प्रिय थे। ये आम बड़े मीठे होते थे। इतने स्वादोच आम धरातल पर नहीं उगते थे। एक दिन एक पका हुआ आम गंगा नदी में गिर कर बहते-बहते वाराणसी पहुँच गया। उस वक्त नदी में वहाँ का राजा नहीं रहा था। उसे वह आम मिला, उसे चखकर वह हैरान रह गया। उसने अपने राज्य के जंगलों की देखभाल करने वालों से पूछा कि क्या वे इस आम के पेड़को दूढ़ सकते हैं या नहीं। वे राजा को हिमालय की पहाड़ी पर ले गए। हहाँ पहुंचकर राजा तथा उसके दरबारियों ने खूब्राम खाए। रात में राजा ने देखा कि बंदर भी पके आमों का मजा ले रहे हैं। राजा को यह बात बुरी लगी और उसने उन्हें मार डालने का फैसला किया। बंदरों के राजा ने अपनी प्रजा को बचाने की एक योजना बनाई। उसने आम के पेड़ की टहनियों को तोड़कर, उन्हें आपस में बाँधकर, नदी पर एक पुल बनाया। इसके एक छोर को वह तब तक पकड़े रहा जब तक उसकी सारी प्रजा ने नदी को पार न कर लिया। पर इस प्रयास से वह इतना थक गया कि मरणासन होकर गिर गड़ा। को बचाने की काफी कोशिश की। पर वह सफल न हुआ। बंदर राजा की मृत्यु पर उसे शोक हुआ और राजा ने उसे पूरा सम्मान दिया। मध्यभारत में भरतुत के एक स्टप से मिले एक पत्थर पर उकेरे गए चित्र में इसे दिखायी गया है। क्या तुम बता सकते हो कि इसमें कहानी का कौन-सा हिस्सा दिखाया गया है? यह हिस्सा क्या चुना गया होगा?
Image summary: यह एक गोलाकार नक्काशीदार कलाकृति है। इस चित्र में एक प्राकृतिक दृश्य दिखाया गया है जिसमें कई मानवीय आकृतियाँ और बंदर एक पेड़ के आसपास मौजूद हैं। कुछ बंदर पेड़ की शाखाओं पर चढ़े हुए हैं, जबकि कुछ नीचे जमीन पर इंसानों के साथ बैठे हैं। इस दृश्य से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह मनुष्यों और पशुओं के बीच शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व या किसी पौराणिक कथा के प्रसंग को दर्शाता है, जहाँ प्रकृति और जीव-जंतुओं का गहरा संबंध प्रदर्शित किया गया है।

विज्ञान की पुस्तकें

इसी समय गणितज्ञ तथा खगोलशास्ति आर्यभट्ठ ने संस्कृत में आर्यभट्ठियम नामक पुस्तक लिखी। इसमें उन्होंने लिखा कि दिन और रात पृथ्वी के अपनी धुरी पर चककर काटने की वजह से होते हैं, जबकि लगता है कि रोज सुर्य निकलता है और डूबता है। उन्होंने ग्रहण के बारे में भी एक वैशानिक तर्क दिया। उन्होंने वृत की परिधि को मापने की भी विधि दूढ़ निकाली, जो लगभग उतनी ही सही है, जितनी कि आज प्रयुक्त होने वाली विधि। वराहमिहिर, ब्रह्गुपत और भासकरार्चार्य कुछ अन्य गणितज्ञ और खगोलविता थे जिह्नोंने कई खोड़ों की। इनके बारे में और पता लगाये।
شوئ
अंकों का प्रयोग पहले से होता रहा था, पर अब भारत के गणितज्ञों ने शून्य के लिए एक नए चिह्म का आविषकार किया। गणती की यह पृष्ठित अरबों हारा अपनाई गई और तब यूरोप में भी फैल गई। आज भी यह पूरी दुनिया में प्रयोग की जाती है। रोम के निवासी शून्य का प्रयोग किए बैगर गिनती करते थे। उसके बारे में और भी जानकारी हासिल करने की कोशिश करो।
अन्यत्र
आयुर्वेद
आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान की एक विज्ञात पদ্ধति है जो प्राचीन भारत में विकसित हुई। प्राचीन भारत में आयुर्वेद के दो प्रसिद्ध चिकित्सक थे - चरक (प्रथम - द्वितीय शताब्दी इंस्वी) और सुश्रुत (चौथी शताब्दी ईस्वी)। चरक द्वारा रचित चरकसाहिता औषधिशास्त्र की एक उल्लेखनीय पुस्तक है। अपनी रचना सुश्रुतसिंहता में सुश्रुत ने शल्य चिकित्सा की विधियों का विस्तृत वर्णन किया है। कागज आज हमारे रोजमर्मी की जिन्दगी का हिस्सा बन गया है। जो किताबेह हम पढ़ते हैं वे कागज पर छपी होती है, उसी तरह लिखने के लिए भी हम कागज का ही उपयोग करते हैं। कागज का आविष्कार करीब १०० साल पहले कई लून नाम के व्यक्ति ने चीन में किया। उसने पौधों के रेशों, कपड़ों, रिस्सयों और पेड़ की छालों को पीट-पीट कर लुगदी बनाकर उसे पानी में भिगो दिया। फिर उस लुगदी को दबाकर उसका पानी निचोड़ा और तब सुखा कर कागज बनाया। आज भी हाथ से कागज बनाने के लिए इसी विधि को अपनाया जाता है। कागज बनाने की तकनीक को सदियों तक गुण रखा गया। करिब 1400 साल पहले यह कोरिया तक पहुँची। 131
- स्टूप्
- मंबிரு
- चिकित्सा परीक्षक
- महाराष्ट्र
- कहानी
- पुराण
- गणित
- विशान

कुछ महत्वपूर्ण तिथियाँ

- స్టूप निर्माण की शुरुआत (2300 साल पहले)
- अमरावती (2000 साल पहले)
- ▶ कालिदास (1600 साल पहले)
- लौह सतंभ, भितरगाँव का मंदिर, अजंता की चित्रकारी, आर्यभृद्र (1500 साल पहले)
- ▶ दुर्गों मंदिर (1400 साल पहले)
इसके तुरंत बाद ही यह जापान तक फैल गई। करिब १८०० साल पहले यह बगदाद में पहुँची। फिर बगदाद से यह यूरोप, अफ्रीका और एशिया के अन्य भागों में फैली। इस उपमहाद्वीप में भी कागज की जानकारी बगदाद से ही आई। प्राचीन भारत की पाण्डुलिपियाँ किस चीज पर तैयार की जाती थीं? (संकेत : अध्याय 1)

कल्पना करो

तुम एक मंदिर के मण्डप में बैठे हो। अपने चारों तरफ के दृश्य का वर्णन करो।

आओ याद करें

1. निम्नलिखित का सुमेल करो।

Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में एक लड़की को दिखाया गया है जो ध्यानपूर्वक एक किताब पढ़ रही है। इस चित्र से यह निष्कर्ष निकलता है कि लड़की पढ़ने की गतिविधि में पूरी तरह से लीन है और उसे शिक्षा या अध्ययन में रुचि है।
- స్టूए शिखर मण्डप गर्भगृह प्रदिशाणपथ देवी-देवता की मूर्ति स्थापित करने की जगह टीला स्पूप के चारों तरफ वृताकार पथ मंदिर में लोगों के इकलुह होने की जगह गर्भगृह के ऊपर लंबाई में निर्माण

2. खाली जगहों को भरो:

- (क) ___ एक बड़े गणितश्लो
- (ख) _____ में देवी-देवताओं की कहानियाँ मिलती हैं।
- (ग) _____ को সংकृत रामायण का लेखक माना जाता है।
- (घ) ___ और ___ दो तमिल महासागर हैं।
3. धातुओं के प्रयोग पर जिन अध्यायों में चर्नी हुई है, उनकी सूची बनाओ। धातु से बनी किन-किन चीजों के बारे में चर्नी हुई है या उन्हें दिखायी गया है?
4. पृष्ठ 130 पर लिखी कहानी को पढ़ो। जिन राजाओं के बारे में तुमने अध्यय 6 और 11 में पढ़ा है उनसे यह बंदर राजा कैसे भिन्न या समान था?
5. और भी जानकारी इकड़ी कर किसी महाकाव्य से एक कहानी सुनाओ।

आओ करके देखें

Image summary: यह एक रेखाचित्र है। इस चित्र में एक व्यक्ति को दिखाया गया है जो सोचने की मुद्रा में है, जिसमें उसके हाथ उसके चेहरे के पास हैं और उसकी नजरें ऊपर की ओर हैं। व्यक्ति के चेहरे के हाव-भाव यह दर्शाते हैं कि वह किसी गहरी सोच में है या किसी समस्या का समाधान खोजने का प्रयास कर रहा है।
6. इमारतो तथा स्मारकों को अन्य प्रकार से सक्षम व्यक्तियों (विकलोग) के लिए और अधिक प्रवेश योग्य कैसे बनाया जाए? इसके लिए सुझावों की एक सूची बनाओ।
7. कागज के अधिक से अधिक उपयोगी की एक सूची बनाओ।
8. इस अध्याय में बताए गए स्थानों में से तुम्हे किसी एक को देखने का मौका मिले तो किसे चुनोगे और क्या?

तिथियों पर एक नजर

इस पूरी पुस्तक में हमने वर्ष 2000 को शुरुआती बिंदु के रूप में रखकर घटनाओं/प्रिक्रियाओं के होने की अनुमानित तिथियों की जानकारी दी है। पर अन्य पुस्तकें, जो तुम पढ़ते होंगे, उनमें तिथियों अलग तरह से लिखी होंगी। इस पुस्तक में इन तिथियों के पहले करीब या लगभग लिखा गया है।
► जैसे कि पुरापाषाण युग (अध्याय 2) के लिए तिथियों लाखों वर्ष पहले के रूप में लिखी गई हैं।
► महाराष्ट्र (अध्याय 3) में कृषि तथा पशुपालन की शुरुआत की तिथि लगभग 6000 ईंपू० दी गई है।
▶ हड़णा के नगरों का विकास लगभग 2700 से 1900 ईपूं के बीच
▶ ख्गवेद की रचना का काल लगभग 1500 से 1000 ईपूं के बीच
महाजनपदों तथा गंगा के मैदानी इलाकों में नगरों का विकास तथा उपनिषद, जैनधर्म तथा बौद्धधर्म से जुड़े विचारों का उद्य, लगभग 500 ईंपू
पश्चिमोत्तर में सिकंदर का आक्रमण, लगभग 327-325 ईंपू
▶ चन्द्रगुण मौयं का राजा बनना लगभग 321 ईंपू
▶ अशोक का शासन काल लगभग 272/268 ईंपूं से 231 ईंपूं के बीच
▶ संगम साहित्य की रचना लगभग 300 ईंपू०-300 ईं
▶ किनिके का शासन लगभग 78-100 ई° (?)
▶ गुप्त साम्राज्य की स्थापना लगभग ३२० ई°
▶ वर्ल्डभी की परिषद में जैन साहित्य का संकलन, लगभग 512/521 ई०
▶ हर्षवर्धन का शासन 606-647 ईं
▶ चीनी यात्री ऐवन लसंग का भारत आगमन 630-643 ई
पुलकेशिन 11 का शासन, 609-642 ई
कुछ घटनाओं के लिए, जैसे कि अशोक के शासन की शुरुआत की तिथि के रूप में तुम्हे एक से अधिक तिथियाँ देखने को मिल सकती हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि इतिहासकार इस बात पर एकमत नहीं हो पाए हैं कि सही तिथि क्या है। प्रश्नवाचक चिन्ह के साथ दी गई तिथियाँ इस बात का संकेत करती हैं कि यह तिथियाँ निश्चित नहीं हैं। ☑ 134

अगले साल

अगले साल हमारे अतीत के बारे में तुम और अधिक पढ़ोगे। इसमें तुम अगले हजार साल के इतिहास के बारे में पढ़ोगे, जिसकी शुरुआत आठवीं सही से होगी। इसमें तुम :
► देखोगे कि पाण्डुलिपयों, अभिलेखों तथा पुराताल्वक वस्तुओं, मुख्यतः इमारतों के अवशेषों के अलावा, इतिहास जानने के और भी सोत होते हैं।
नए राजाओं तथा राज्यों के बारे में पढ़ोगे, जिसमें मुगल साम्राज्य शामिल होगा।
స్తापत्य-कला के बारे में और भी जानोगे, जिसमें मंदिरों, मिस्रदो, बगीचों, किलों तथा अन्य इमारतो के बारे में जानकारी होगी।
शहरों के बारे में पढ़ोगे, जिसमें शिल्पकारों, व्यापारियों तथा नगरिय-संस्कृति के विषय में जानकारी होगी।
▶ आखेटक-संग्राहकों, पशुपालकों तथा कृषकों के बारे में पढ़ोगे।
• तुम यह भी पढ़ोगे कि किस प्रकार धार्मिक-आस्थाओं तथा उनके व्यवहारिक स्वरूपों में परिवर्तन आए।
▶ संगीत, कविता तथा अन्य साहित्यिक रचनाओं के लिए किस तरह नई भाषाओं का प्रयोग हुआ।
ये सब पढ़ने के दौरान तुम पाओगे कि इतने सारे नए परिवर्तनों के बावजूद अतीत के साथ सम्पर्क का सूत्र निरంతरी बना रहा। ध्यान दो क्या बदला और क्या अपने पुराने स्वरूप में रह गया।
आप मुख्य दस्तावेज़ के अंत तक पहुँच गए हैं। आगे अतिरिक्त सारांशित सामग्री है
Figure 8 summary: यह एक राजनीतिक मानचित्र है। इस चित्र में भारत के विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की भौगोलिक सीमाओं को दर्शाया गया है, जिसमें पड़ोसी देशों और आसपास के जल निकायों को भी चिह्नित किया गया है। इस मानचित्र से यह निष्कर्ष निकलता है कि भारत एक विशाल देश है जिसमें उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक कई प्रशासनिक प्रभाग फैले हुए हैं, जो इसकी विविध क्षेत्रीय संरचना को प्रदर्शित करते हैं।