Shaheed-E-Azam Ki Jail Notebook

by Bhagat Singh

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Shaheed-E-Azam Ki Jail Notebook

जेल नोट्यूक

Autograph of Mr. B.K. Dull taken on 12th, June 30 in Cell No: 137
Central jail Lohore four days before his foiled departure from this jail.
O'Neget Singh

भारतीय इतिहास का एक दुर्लभ दस्तावेज़ शहीदे आजम भगतसिंह

की जेल नोटबुक
ये दस्तावेजे राहुल फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित किया गया है व प्रगतिशील साहित्य के वितरक जनचेतना द्वारा कम से कम दामों में जनता तक पहुँचाया जा रहा है। अगर आप पीडीएफ की बजाय प्रिंट कॉपी से पहुंना चाहते हैं तो जनचेतना से सम्पर्क कर सकते हैं या फिर अमेजन से खरीद सकते हैं। अमेजन लिंक : amazon dot in dp/8187728922 जनचेतना सम्पर्क : D-68, Niralanagar, Luc- know-226020
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ग्राहींदेआऱ्म की जेल नोटबुक

भगतसिंह द्वारा जेल में (1929-31) अध्ययन के दौरान लिये गये नोट्स और उद्देश्य

अनुवाद विश्वनाथ मिश्र सम्पादन सत्यमवर्मी राहुल फाउंडेशन लखनऊ ISBN 978-81-87728-92-4 मूल्य : 5. 65.00 पहला संस्करण : अप्रैल, 1999 छठा पुनमुर्ण : नवम्बर, 2005 दूसरा संशोधित एवं परिवर्वाइट संस्करण : जनवरी 2009 प्रकाशक : राहुल फुआउंपडेशन
Image summary: यह एक ब्लैक एंड व्हाइट रेखाचित्र है जिसमें एक धातु की जंजीर को बीच से टूटा हुआ दिखाया गया है, जो बंधन के टूटने या स्वतंत्रता का प्रतीक है।
69, बाबा का पुरवा, पेपरमिल रोड, निशातगंज, लखनऊ-226 006 आवरण : रामबाबू टाइपसेटिंग : कम्प्यूटर प्रभाग, राहुल फाउंडेशन मुद्रक : क्रिस्टिव प्रिंटर्स, 628/एस-28, शक्तिनगर, लखनऊ
ঝกিত परिश्रमवि विचारकों और परिश्रममांकर्तकों की पैदावार होती है। दुर्भिय से भारतीय क्रांति का बौद्धिक पक्ष हमेशा दुर्बल रहा है। इस्लाल क्रांति की आवश्यक चीजों और किये गये काम के प्रभाव पर ध्यान नहीं दिया गया। इश्लाल एक क्रान्तिकारी को ऋतयन-मनन को अपनी पवित्र जन्मदेशी बना लेना चाहिए।
Bhagat Singh
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भूमिका

'शहीदेआज्म की जेल नोटबुक' को हिन्दी पाठकों के हाथों में देते हुए हमं मिश्रित अनुभूति हो रही है। इतिहास की इस अनमोल धरोहर को आप तक पहुँचाकर हम गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं, पर साथ ही इसमें हुई देरी की कचोट भी है। भारतीय इतिहास के इस दुर्लभ दस्तावेज़ का महत्व सिर्फ इसकी ऐतिहासिकता में ही नहीं है। भगतिंश के अध्रण सपने को पूरा करने वाली भारतीय क्रान्तिक आज एक ऐसे पड़ाव पर है जहाँ से नये, प्रचण्ड वेग से आगे बढ़ने के लिए इसके सिराहियों को 'इन्कलाब की तलवार को विचारों की सान पर' नयी धार देनी है। यह नोटबुक उन सबके लिए विचारों की रोशनी से दमकता एक प्रेरणापुण है जो इस विरासत को आगे बढ़ाने का जम्बी रखते हैं। आज जब भारतीय क्रिनांटन सामने उपस्थित सवालों-चुनौतियों से जूझ रही है, युवा क्रिकारियों की नयी पीड़ी के कंथों पर रास्ता निकालने और उस पर बढ़ने का कार्यभार है तथा एक नये सर्वारा नवजागरण और प्रबोधन का काम इतिहास के एजेंडे पर है, तो इस नोटबुक को पढ़ते हुए हमारी आँखों के सामने बार-बार उस नौजवान की छिवि उभरती है जो फाँसी के फन्के के साये में बैठकर भारतीय इन्कलाब के रास्ते की सही समझ हिस्सल करने और उसे लोगों तक पहुँचाने के लिए आखिरी पल तक अध्ययन-मनन और लेखन में जुटा रहा। जेल में भगतसिंह ने चार पुस्तकें लिखी थीं। हो सकता है ये नोट्स इन पुस्तकों की तैयारी में लिये गये हों। चारों पाण्डुलिपियाँ आज नष्ट हो चुकी हैं। लेकिन आज भी उनके बारे में न तो कोई प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध है और न ही किसी ने भारतीय इतिहास के इस अंदेरे पक्ष पर शोध करने की ज़रूरत समझी है। नोट बुक के महान ऐतिहासिक महत्त्व और आज इसकी विशेष प्राणिकता को रखीकित करने के लिए हमने आलोक रजन और एल्. वी. मित्रिखின் के दो लेख भी शामिल किये हैं। हम चारोंगे कि आप नोटबुक से पहले इन लेखों को अवश्य पढ़ें। नोटबुक को सही परिशेष और पृष्ठभूमि में समझने में इन लेखों से काफी मदद मिलेगी। भारत के क्रान्तिकारी आन्दोलन के बैचारिक विकास पर हमने भगत सिंह के साथ शिववर्मा का विस्तृत लेख भी शामिल किया है।

नोटबुक की प्रस्तुति के बारे में कुछ बातें

हमारी इच्छा थी कि जहाँ तक सम्भव हो हस्तालिखित नोटबुक की मूल शक्ल बनी रहे, भगतसिंह ने जिस तरीकों से नोट्स लिये हैं उन्हें लगभग उसी ढंग से प्रस्तुत किया जाये। लेकिन किताब की शक्ल में प्रस्तुत करने के लिए कुछ बदलाव करने पड़े हैं। पूरी नोटबुक भगतसिंह के छोटे अक्षरों वाली लिखावट में लिखी गयी है। ज्यादातर नोट्स के भगतसिंह ने छोटे पर सटीक और सारगभींत शीर्षिक दिये हैं। अनेक शीर्षिक हाशिये पर भी दिये गये हैं। कहीं-कहीं कुछ महत्त्वपूर्ण वाक्यों या वाक्यांशों को भी हाशिये में लिखा गया है।
- हमने सभी शीर्षकों तथा हाशिये पर अंकित वाक्यों को टेक्स्ट के साथ ही रखा है पर भगतसिंह द्वारा दिये गये महत्व के अनुसार उन्हें छोटे या बड़े अक्षरों में दिया गया है।
- भगतिसंह द्वारा रेखांकित किये गये हिस्सों को मोटे अक्षरों में दिया गया है।
- भगतिसंह ने कई जगहों पर कुछ हिस्सों पर अतिरिक्त बल देने के लिए बावीं ओर खड़ी लकीर खींची है। इसे पुस्तक में ऐसे ही दिखायी गया है।
नोतबुक में आये अधिकांश सन्दर्भों की जानकारी हमने पाठकों को देने की कोशिश की है, फिर भी कुछ सन्दर्भ अज्ञात रह गये हैं। पाठकों से अनुरोध है कि यदि उन्हें इस बार में जानकारी हो तो हमें बताये। इस सम्बन्ध में हमें श्री भूपेन्द्र हुआ के सम्पादन में 'ఇंडियन बुक कॉनैकल' द्वारा संवर्धित अंग्रेजी में प्रकाशित A Martyr's Notebook से काफ़ी मदद मिले जिसके लिए हम उनका आभाार व्यक्त करते हैं।

अनुक्रम

भगतसिंह की जेल नोटबुक जो शहादत के तिरसठ वर्षों बाद छप सकी

आलोक रंजन ธุรกิจ ฝุงและสี भगतसिंह और उनके सांतियों ने 1928 में 'हिन्दुستان सोशलिस्टरिपबिलकन एसोसिएन्शन' की स्थापना के समय ही समाजवाद को लक्ष्य और सिद्धांत के रूप में स्वीकार कर लिया था, पर कमोबेश 1929 के मध्य तक समाजवाद और मांसवाद के प्रति उनका लगाव भावालमक ही था, बुद्धिसंगत नहीं। भगतसिंह के सदयोगी क्रितकारी शिववर्मा सहित अनेक इतिहासकारों ने इस बात का उल्लेख किया है कि 1929 में गिरणुकारी के बाद एच.एस.आर.ए, के युवा क्रांतिकारियों के एक धर्मे न, और विशेषकर भगतसिंह ने जेल में बड़ी मुश्कलकों से जुटाकर, क्रान्तिकारी साहित्य और मांसवाद का गहन अध्ययन और उस पर विचार-विमर्श किया। इसके परिणामस्वरूप वे अराजकतावादी और मध्यवर्गीय दुस्साहसवाद को छोड़कर तेजी से संवहारा क्रान्तिक शब्दों में आगे बढ़ा। वैव्यिकतक शौर्य एवं बिलदान से जनता को जगाने और आतंकवादी रणनीति द्वारा उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघों का रास्ता छोड़कर उन्होंने अपने अतीत की आलोचना व समाहार किया तथा इस बात पर बल दिया कि क्रान्तिक की मुख्य शिक्षित मजदूर और किसान है, साम्राज्यवाद को केवल संवहारा क्रान्तिक द्वारा ही शिक्षित दी जा सकती है, मुख्यत: पेरोवर क्रान्तिकारियों पर আধারিত সর্বদারা ভর্গ কী ক্রান্তকারী পার্দি কে মার্গদর্শন মে স্থাপক মেহনতক্স জনতা ব মধ্যবর্তী কে জনসম্ভতন বদ্ধা করতে জনদ্বোলন কো মার্গ অপনায়া জানা কাহিং আর যেই কি, ইসকে বোর্ড হী সম্ভব ক্রান্ত দ্বারা সত্য পলটকর সর্বদারা অধিনায়কতর কী স্থাপনা কী জা সকর্তি ঐ। এখন.এস.এ.এ. কে সিদ্ধান্তকারী মে ধগতিসহ সর্বোপরি যে আর উনকী পুরি বিচার-যাত্রা যে 1929 সে মার্শে 1931 তক (যানী ফাঁসী কৃতিতে তক) কে উনকি দস্তাবেজো, লেক্টো, পজী আর বকতলী মে দেখা জা সকতা ৷ খণাটিরহ কে সর্বোত্তম বিচার ফরবেরি 1931 কে দোখা কে উমসসবিদ্যা দস্তাবেজু মে দ্বিতীন কো মিলত নে জো 'ক্রান্তকারী কার্যক্রম কো মসবিদ্যা' নাম সে 'বণাবীর্দিহ আর উনকি সাথিয়ো কে দস্তাবেজু' (স. – জগমোহন সিহ, সমনলাল, রজকমল প্রকাশান, নই দিললী) মে সংকলিত ঈ। भगतसिंह की जेल नोटबुक मिलने के बाद भगतसिंह के चिनातक ल्यकितव की व्यापकता और गहराई पर और अधिक स्पष्ट रेशनी पड़ी है, उनकी विकास की प्रक्रिया समझने में मदद मिले है और यह सच्चाई और अधिक पुष्ट हुई है कि भगतसिंह ने अपने अंतिम दिनों में, सुल्यविस्तृत एवं गहन अभ्ययन के बाद बुद्धिसंगत ढंग से माक्सवाद को अपना मार्गदर्शक सिद्धांत बनाया था। एकबारगी तो यह बात अविश्वसनीय-सी लगती है कि क्रान्तिकारी जीवन और जेल की बीहड कितनाइयों में भगतसिंह ने ब्रिटिश संस्कारिशப் की तमाम दिक्कृतों के बावजूद पुस्तकें जुटाकर इतना गहन और व्यापक अध्ययन कर डाला। महज 23 वर्ष की छोटी-सी उम्र में चिनात का जो धरातल उन्होंने हासिल कर लिया था, वह उनके युगदर्षा युगपुरुष होने का ही प्रमाण था। ऐसे महान चिनातक ही इतिहास की दिशा बदलेने और गति तेज करने का माधा रखते हैं। भगतसिंह की शाहाद भारतीय जनता को आज भी क्षितिज पर अनवरत जलती मशाल की तरह प्रेरणा देती है, पर यह भी सच है कि उनकी फाँसी ने इतिहास की दिशा बदल दी। यह सोचना गूलत नहीं है कि भगतसिंह को 23 वर्ष की अलपायु में यदि फाँसी नहीं हुई होती तो राष्ट्रीय मुखिक संघों का इतिहास और भारतीय सर्वेहारा क्रान्तिक काल का इतिहास शायद कुछ और ही ढंग से लिखा जाता। बहरहाल, इतिहास की उतनी ही दुखद विडम्बना यह भी है कि आज भी इस देश के शिशित लोगों का एक बड़ा हिस्सा भगतसिंह को एक महान वीर तो मानता है, पर यह नहीं जानता कि 23 वर्ष का वह युवा एक महान चिन्तक भी था। राजनीतिक आज़ादी मिलने के पंचास वर्षों बाद भी सम्पूर्ण गाँधी वाढ-मय, नेहूस वाड-मय से लेकर सभी राष्ट्रपतियों के अनुच्छातिक भाषणों के विशदप्रथ तक प्रकाशित होते रहे पर किसी भी सरकार ने भगतसिंह और उनके साधियों के सभी दस्तावेज़ों को अभिलेखागर, पत्र-पत्रिकाओं और व्यक्तिगत संग्रहों से निकालकर छापने की सुध नही ली। চিত্রপুত পত্র-পত্রিকাও। মে প্রকাশিত লেখা, অজয় কুমার ঘোষ, শিব ভার্ম, সোহন সিহ জোশ, জিতেন্দু নাথ সাম্যাল আদি মগতিসহ কে সমকালীন ক্রান্তকারীয় কী বিধিশন পুসতকো-লেখা, মগতিসহ কে অনুজ কী পুসী বিরেন্ড সিদ্ধু কী পুসতকো তথ্য গোপাল তাঁকুর, জী. দেবল, মমখনাথ গুণ, বিপণে চন্দ্র, হর্সরাজ রহবর, কমলেশ মোহন আদি রিচিহ্নসকার্য-লেখকো কে বিধিশন লেখা এব্স পুসতকো সে মগতিসহ কে বিহারক লক্তিত্ব পে রোসনী অবস্থা পছন্টি রহট, পে বহুসব্ধক রিচিহ্নসকার্য আবদী খী ইসেবে বহুত কম হী পরিচিত রহট। মগতিসহ কে কুদ্ধ ঐতিহাসিক ব্যানু-দস্টাবেজো কে সতর কে দশক কে পুর্বাধু মে দিলী সে কুদ্ধ ক্রান্তকারী ভাষাপশ্চি সংস্কৃতিকমিয়ো কী পহল পর প্রকাশিত হোলী ভালী 'মুবিত' পত্রিকা নে প্রকাশিত কিয়। ইসকে বোদ কেই পত্রিকাও। নে আর ক্রান্তকারী গ্রুপে নে পুস্তিকাও। কে স্পুম ম্গলসহ কে শুধু হাড়ে লেখা কো ছাপনে কো কাম কিয়া। মগতিসহ কে সাথী বিভাষণে নে উঠে যুগে যেখানে অর্থাৎ আর হিন্দু মে প্রকাশিত কিয়। सबसे पहले जगमोहन सिंह (भगतसिंह की बहन के पुत्र) और चमनलाल ने भगतसिंह और उनके साधियों के अधिकांश वक्तव्यों, लेखों, पत्रों और दस्तावेज़ों को एक जगह संकलित किया (हालाँकि यह संकलन भी सम्पूर्ण नहीं है) जो 1986 में राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ। इस तथ्य की चर्चा भगतसिंह के कई साधियों और इतिहासविदों ने की है कि जेल में उन्होंने चार और पुस्तकें लिखी थीं : 'आत्मकथा', 'समाजवाद का आदर्श', 'भारत में क्रानितकारी आन्दोलन' तथा 'मृत्यु के दूर पर'। दुभियवश इनकी पाण्डुलिपियाँ आज उपलब्ध नहीं हैं और माना यही जाता है कि वे नष्ट हो चुकी हैं। हालाँकि इनके गायब होने की कहानी भी रहस्यमय है और इसमें भी किसी साजिश से पूरी तरह इन्कार नहीं किया जा सकता। बहरहाल, यह भारतीय इतिहास के सवीधिक दुभियपूर्ण प्रसंगों में से एक है। अब हम भगत सिंह की उस ऐतिहासिक जेल नोटबुक की चर्चा पर आते हैं जो पहली बार 1993 में जयपुर से 'ఇंडियन बुक क्रॉनिकल' से 'A Martyrs Notebook' नाम से प्रकाशित हुई। इसका सम्पादन शृषेन्द्र हुआ ने किया था। इस दायरी के प्रारम्भ में दी गयी परिच्यातमक टिपणी के अनुसार, इसकी हस्तिलिखित/डुप्लोकेटड प्रतिलिपि एक पैकेट के रूप में पहली बार जी.बी. कुमार हुआ (गुरुकुल कांगड़ी, हरिदार के तकलाीन कुलपति) को 1981 में गुरुकुल, इन्द्रस्थ के दौर के समय स्वामी शक्तिवेश से मिले थी। पर इससे भी पहले यह डायरी १९७७ में एल.वी. मितिखान ने फ़्रीदाबाद में रह रहा भगतसिंह के भाई कुलबीर सिंह के पास देखी थी और उसका विस्तृत अध्ययन करके एक लेख लिखा था, जो १९८१ में अंग्रेजी में प्रकाशित उनकी पुस्तक 'Lenin and India' में एक अध्याय के रूप में शामिल किया गया। पुनः 1990 में इस पुस्तक का हिन्दी अनुवाद भी प्रगति प्रकाशन, मास्को से 'लेजिन और भारत' नाम से प्रकाशित हुआ। अब तक इस डायरी के सम्बन्ध में प्राप्त जानकारी को हम यहाँ सिलिसलेवार प्रस्तुत कर रहे हैं।
1968 में भारतीय इतिहासकार जी. देवल ने 'पीपुल्स पाथ' पत्रिका में भगतसिंह पर एक लेख लिखा था जिसमें 200 पनों की एक कापी का ज़िक्र किया गया है। उक्त कापी में पूजीवाद, समाजवाद, राज्य की उत्पति, माक्सवाद, कम्युर्ज्म, धर्म, दर्शन, क्रितयों के इतिहास आदि पर विभिन्न पुस्तकों के अध्ययन के दौरान भगतसिंह द्वारा जेल में लिये गये नोट्स हैं। यह नोट्बुक भगतिसह की फाँसी के बाद उनके परिवार वालों को सौंप दी गयी थी। देवल ने इसे फ्रीदाबाद में रह रहे भगतिसह के छोटे भाई कुलबीर सिंह के पास देखा था और अभ्ययन करके नोट्स लिये थे। अपने लेख में देवल ने इस बात पर जोर दिया कि यह डायरी प्रकाशित की जानी चाहिए, पर ऐसा हुआ नहीं। उक्त डायरी की जानकारी होने पर 1977 में रूसी विद्वान मित्रोखिन भारत आये और कुलबीर सिंह के हवाले से उक्त डायरी के विस्तृत अध्ययन के बाद एक लेख लिखा जो उनकी पुस्तक 'Lenin and India' का एक अध्याय बना। हमं उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 1979 के बाद इतिहास के कई शोधार्थियों ने 404 पूछों की उक्त जेल नोटबुक की एक फुटो प्रतिलिपि तीन मूर्ति भवन स्थित जवाहर लाल नेहरू मेमोरियल मूर्ज्यम व लायब्रेरी में भी देखी-पढ़ी। पर इस पर अलग से कोई शोध निबन्ध कहीं भी प्रकाशित नहीं हुआ। गुरुकुल कांगड़ी के तकलातीन कुलपति जी.बी. कुमार हुजा 1981 में गुरुकुल इन्द्रस्थ (दिल्ली से 20 किलोमीटर दक्षिण तुंगलकाबाद रेलवे स्टेशन के निकट) के दौर पर गये थे। वहाँ संस्था के तकलातीन मुख्य अधिष्ठाता स्वामी शक्तिवंश ने गुरुकुल के 'हॉल आँफ् फेम' के तहखाने में सुरक्षित इस ऐतिहासिक धरोहर की एक हस्तिलिखित/डुप्लीकेटड प्रतिलिपि दिखलायी, जिसे जी.बी. कुमार हुजा ने कुछ दिनों के लिए माँग लिया। बाद में स्वामी शक्तिवंश की हत्या हो गयी और उक्त डायरी (प्रतिलिपि) हुजा जी के पास ही रह गयी।
1989 में भगतसिंह की शादात के दिन 23 मार्च को जयपुर में कुछ बुद्धिजीवियों ने 'हिन्दोस्तानी मंच' का गठन किया। उसी की प्रारम्भक बैठकों में जी.बी. कुमार हुजा ने भगतसिंह की जेल डायरी की जानकारी दी और 'हिन्दोस्तानी मंच' ने इसे प्रकाशित करने का निश्चय किया। 'इण्डयन बुक क्लोनकल' पत्रिका (जयपुर) के समादक भूपेन्द हुजा को इस परियोजना के समादन की जिम्मेदारी दी गयी और 'हिन्दोस्तानी मंच' के महासिच्व सरदार ओबेराय, प्रो. आर.पी. भटनागर और डॉ. आर.सी. भारतीय ने उनके सहयोगी की भूमिका निभायी। दुर्भोग्यवश, अर्थीभाव के कारण यह योजना खटाई में पड़ गयी। इसी दौरान डॉ. आर.सी. भारतीय को उक्त जेल नोटबुक की एक और टाइप की हुई प्रतिलिपि प्राप्त हुई जो एक स्थानीय विद्वान डॉ. प्रकाश चतुवेदी मासको अभिलेखागर से फोटो-प्रतिलिपि कराकर लाये थे। 'मासको प्रति' और 'गुरुकुल प्रति' शब्दश: एक-दूसरे से मिल रहे थे।
1991 में भूपेन्द हुआ ने नोटबुक को किश्तो में अपनी पत्रिका 'एिण्डयन बुक क्रांतिकल' में प्रकाशित करना शुरू किया। भगतिसंह की जेल नोटबुक इस रूप में पहली बार व्यापक पाठक समुदाय तक पहुँची। डॉ. चमनलाल ने भी भूपेन्द हुआ को सूचित किया कि उक्त नोटबुक की एक प्रतिलिपि उन्होंने भी नेहख म्यूजियम लायब्रेरी, नई दिल्ली में देखी थी। इस तरह भूपेन्द हुँजा व उनके सहयोगियों की नजर में उक्त जेल नोटबुक की आधिकारिकता और अधिक पुष्ट हुई। पहली बार 1994 में उक्त জেन नोटबुक 'एंडियन बुक क्लोनकल' की ओर से ही भूपेन्द हुजा और जी.बी. कुमार हुजा (बलभद्र भारतीय) की भूमिकाओं के साथ पुस्तकाकार प्रकाशित हुई। उक्त दोनों भूमिकाओं से भी स्पष्ट है कि जी.बी.कुमार हुजा और भूपेन्द हुजा को इस तथा की जानकारी नहीं थी कि उक्त डायरी की मूल प्रति भागतसिंह के भाई कुलबीर सिंह के पास फ़्रीदाबाद में भी मौजूद है। उन्हें जी. देवल के उस लेख की भी सम्भवत: जानकारी नहीं थी जि-हर्जने सबसे पहले 1968 में यह तथा उर्धाचित किया था, न ही उन्हें मिट्रोखिन का वह लेख (1981) ही मिला था जो उक्त डायरी के विशद अध्ययन के बाद लिखा गया था। बहरहाल, मित्रोखन ने कुलबीर सिंह के पास उपलब्ध नोटबुक/डायरी से लिये गये हवालों पर जो पृष्ट अंकित किये हैं, उन्हें देखने से स्पष्ट हो जाता है कि जी. बी. कुमार हुजा को प्राप्त 'गुरुकुल टेक्स्ट' उक्त मूल डायरी की ही डुप्लोकेट/हस्तिलिखित प्रतिलिपि है। ऐसा सम्भव है कि डॉ. प्रकाश चतुर्वेदी ने डायरी/नोटबुक की जो प्रतिलिपमासको अभिलेखागर में देखी थी, वह मिट्टीखन ही भारत से ले गये हों। या यह भी हो सकता है कि किसी और रूसी विद्वान ने भी डायरी का अध्ययन किया हो। बहरहाल, इन तथ्यों से डायरी की आधिकारिकता ही और अधिक पुष्ट होती है। 'भगतसिंह और उनके साधियों के दस्तावेज़' पुस्तक के सम्पादक-द्रय जगमोहन सिंह और चमनलाल ने भी पुस्तक के दूसरे संस्कारण की भूमिका (23 मार्च '89) में लिखा है : “भगतसिंह की जेल में लिखित 404 पृष्ठों की डायरी, जिसमें महत्त्वपूर्ण राजनीतिक व दार्शनिक नोट्स हैं, अब भी सामान्य पाठकों की पहुँच से बाहर है, हालाँकि इसकी फुटो प्रेमिति तीन मूर्ति स्थित जवाहरलाल नेहस मेमोरियल म्यूजियम व लायब्रेरी में सुरक्षित है। इस पर क्या कहा जा सकता है, पाठक स्वयं ही सोचें।" इस टिपणी से ऐसा लगता है कि जगमोहन सिंह और चमनलाल को भी यह तथ्य जात नहीं था कि भगतिसह की मूल जेल नोटबुक उनके भाई कुलबीर सिंह के पास मौजूद है, जिसका अध्ययन 1968 में जी. देवल ने और 1977 में मिजोरिवन ने किया था। यह विशेष आश्रय की बात इसलिए भी है क्योंकि जगमोहन सिंह भी स्वयं भगतिसह के परिवार के सदस्य हैं। वे भगतिसह की बहन बीबी अमर कोर के पुत्र हैं। भगतिसह के दूसरे भाई कुलतार सिंह की पुरी वीरैन्द सिं-धू ने भी भगतिसह पर दो पुस्तकें लिखी हैं। उन्होंने भी इसका उल्लेख नहीं किया है कि भगतिसह की जेल नोटबुक उनके परिवार के ही एक सदस्य के पास मौजूद है। यदि इन परिवार-जानों को भी यह तथा नहीं पता था तो इस बारे में हमें कुछ नहीं कहना। न ही इसकी अन्तर्काश को जानने में हमारी कोई रिच्छ है। यह सवाल हम यहाँ इसलिए उठा रहे हैं कि यह भारत में इतिहास की एक गम्भीर समस्या है। आजूद भारत की कांग्रेसी सरकार ही नहीं, किसी भी पूजीवादी संसदमाग्री दल से हम यह अपेक्षा नहीं रखते कि उनकी सरकारों भगतसिंह के विचारों को जनता तक पहुँचाने का काम करेगी। उनका बस चलता तो वे भगतिशंह की स्मृति तक को दूमन कर देती। पर यह उनके बस के बाहर की बात है। ஸெவிக் ஸெவிக் ஸெவ गैरजिम्मेदारी के लिए उन इतिहासकारों को भी माफ़ नहीं किया जा सकता जो इतिहास को केवल प्रोफेसरी का जरिया बनाये हुए हैं और इतिहास की बहुमूल्य विरासत को भी जनता तक पहुँचाने की जिन्हें रतीभर चिन्ता नहीं है। और भला क्या हो? वे इतिहास पढ़ाने वाले मुद्रिसे हैं, इतिहास बनाने से उनका भला क्या सरोकार?
जहाँ तक भगतिशक के परिवार के उन सदस्यों का सवाल है, जिम्बीन आजादी के इतने वर्षों बाद तक इतिहास की एक बहुमूल्य धरोहर को पारिवारिक सम्पर्णित करने वाले राख और उस जनता तक पहुँचाने की कोई कोशिश नहीं की; वे भी अपनी इस करनी के चलेते इतिहास में अपना नाम दर्ज करना चुके हैं। बैंस हमारे देश में यह कोई नई बात नहीं है। क्रिकितकारी राजनीति और साहित्य में ऐसे कई उदाहरण हैं कि महान विभूतियों के रक्त-सम्बन्धी उत्तरधिकारी उनसे जुड़े होने के नाते इज्जत तो खूब पा रहे हैं पर उनके आदेशों और सपनों से उन्हें कुछ भी नहीं लेना-देना। उनकी रचना या तो सम्मान-प्रतिष्ठा-सुविधा में है या फिर रायलती की मोटी रक्षा में। भगतिशक हों या राहुल सांकृत्यायन, उनका कुतिल आज पूरे राष्ट्र की, पूरी जनता की या उनके वैचारिक उत्तरधिकारियों की धरोहर न बनकर परिवार-जाना की निजी सम्पति बन गयी है। क्रिकितकारियों के तमाम बेटे-भतीजे-भांजे आज क्रिकितकारियों के रक्त-सम्बन्धी होने के नोते स्वाधिकारी तौर पर जनता से इज्जत पाते हैं और सीना फुलाते हैं। पर उन्हें इस बात में कोई दिलचस्मी नहीं कि क्या उन क्रिकितकारियों के सपने पूरे हुए? इसके विपरीत वे उसी सता से सुविधाएँ लेने और उन्होंने राजनीतिक दलों की राजनीतिक करने तक का काम करते हैं, जिम्बीन क्रिकितकारियों के सपनों के साथ विश्वासधित किया। क्रिकितकारियों के ऐसे वारिस भी क्या अपने महान पूर्वजों के आदेशों का व्यापार नहीं कर रहे हैं?
बहरहाल, 1994 में भूपेन्द हुजा और उनके साधियों ने भगतसिंह की जेल नोटबुक का मूल अंग्रेजी संस्करण छापकर भारत की जनता और क्रिकितकारी आन्दोलन के लिए जो उपयोगी कार्य किया उसे कभी भी भुलाया नहीं सकता। आम जनता को इतिहास की बहुमूल्य धरोहर से परिचित कराने के महत्वपूर्ण कार्यभारों में से यह भी एक है कि भगतसिंह की जेल नोटबुक और उनके तथा उनके साधियों के सभी दस्तावेज़ों को सभी भारतीय भाषाओं में अनूदित करके जन-जन तक पहुँचाया जाये। भगतसिंह की जेल नोटबुक स्कूली कापी की सामान्य साइज (17.50 से.मी. ग 21 से.मी) की पुस्तका है। नोटबुक खोलते ही पहले पेज (राड्रिल पेज) पर अंग्रेजी में लिखा है : “भगतसिंह के लिए/चार सौ चार (404) पूछ...” नीचे एक हस्ताक्षर है और 12.9.29 को तिथि दी गयी है। स्पष्ट है कि यह प्रविष्ट जेल अधिकारियों द्वारा भगतिसंह को कापी देते समय की गयी है। जेल मैनुअल/नियमावली के जानकार जानते होंगे कि जब भी कोई कैदी लिखने के लिए कापी माँगता है तो जेल अधिकारी को कापी के शुरू और अन्त में ऐसा लिखना होता है और कैदी को भी प्राप्त करते समय वहाँ हस्ताक्षर करना होता है। भगतिसंह के हस्ताक्षर (अंग्रेजी में) टाइटिल पेज पर भी मौजूद हैं और १२.9.29 की तिथि के साथ कपी के अन्त में भी। नोटबुक की जो डुप्लिकेटेड/हस्तालिखित प्रतिलिप जी.बी. कुमार हूँ का को गुरुकुल इन्द्रप्रथ में मिले, उसमें नीचे बाये कोने पर अंग्रेजी में यह भी लिखा हुआ था : “प्रतिलिप शहीद भगतिसह के भतीजे अभय कुमार सिंह द्वारा तैयार। ” मूल नोटबुक के पृष्ठ भगतिंश की छोटे अक्षरों वाली लिखाई से भरे हुए हैं। ज्यादा नोट्स अंग्रेजी में लिले गये हैं, लेकिन कहीं-कहीं उर्दू का भी इस्तेमाल किया गया है।

भगतसिंह की जेल नोटबुक : एक महान विचारयारा का दुर्लभ साक्ष्य

एल. वी. मित्रोखिन अकूबर, 1967 में एक वयोवृद्ध भारतीय क्रिकितकारी विजय कुमार सिंहना से मेरी भेट हुई। 1929 में अंग्रेज़ سرकार ने उन्हें उस मुकदमे में सज्जा दिलवायी थी, जो इतिहास में लाहীর षड्यन्व केस के नाम से जाना जाता है। उन दिनों की घटनाओं को याद करते हुए श्री सिंहना ने महान भारतीय क्रिकितकारी भगतसिंह के बारे में बताया, जो फाँसी के तच्छे पर चढ़ने से कुछ घण्टे पहले तक लेजिन की जीवनी पढ़ते रहे थे। कैसा अनुपम इच्छा-बल था उस वीर का! उन अकथनीय परिस्थितियों में, फाँसी से पहले एक पुस्तक पढ़ना! परन्तु लेिन के व्यक्तिव का प्रभाव इतना प्रबल था कि सुदूर औपनिवेशक भारत में मृत्युदण्ड प्राप्त करेंनी उनके जीवन का वर्णन करने वाली पिक्सेलों को यां पढ़ते थे, मानो जीवनदायी सोते से घूट भर रहे हैं॥ ...सुबह का वक्त था। इस दिन भगतसिंह तेईस वर्ष, पाँच महीने और छबीस दिन के हुए थे। लाहोर का एक अख्बार देखते हुए भगतसिंह की नजर हाल ही में छपी लेलिन की जीवनी के बारे में एक लेख पर पड़ी। लेकिन पर एक किताब...वह हर हालत में उसे पढ़ना चाहते थे। भगतसिंह जानते थे कि औपनिवेशक "न्यायालय" अपना फैसला सुना चुका है और उन्हें फाँसी मिलकर रहेगी। ये ऐसे क्षण होते हैं, जब आदमी की सबसे बड़ी इच्छा होती है कि अपने प्रियजनों के अन्तम दर्शन पा ले। 'युगदृष्टा भगतिसंह और उनके मृत्युजय पुरखे' पुस्तक में भारतिसह की भतीजी वीरन्द सिंखु ने उनके अन्तम दिनों का वर्णन इस प्रकार किया है। वह लिखती हैं : “भगतिसंह के लिए लेजिन से अधिक कृरीबी और कौन था? वह अपनी मृत्यु से पहले उनसे मिलने को उतसुक थे और उनके लिए लेजिन की जीवनी पहने का अर्थ लेजिन से मिलना था।” एक विलक्षण क्रिकारी और भारत के राष्ट्रीय नायक भगतसिंह का जीवन, जिन्हें ब्रिटिश औपनिवेशक अधिकारियों ने 1931 में फाँसी दे दी, एक वीर का जीवन था। भारत के अलावा उनके बारे में सोवियत संघ और दूसरे देशों में भी पुस्तकें लिखी गयी हैं। मेरी 'लेजिन के बारे में भारत' में एक पूरा अध्याय 'वह पुस्तक, जो भगतिसंह ने पढ़ी' इस वीर के जेल के जीवन को समर्पित है।² और அவ் டிச சால வாடி முடிசே நயே டிசதாவேஜஂ கே ஹேனே கா பதா சலா, ஜே ஹகாதிசிஷ கே ஹஷிக கூலுவஃரிசிஷ னெ க்புபாபுவஂகக முஷே டிஷவயே஠ டனககா சாஈ பரிவாஏ அபனே ரிஷதெடர சே, ஐசே னெஹஂக ெ ஷாரதிய லேஞி கே ஷவத-ஐவத சாஞ்ஞய கா பரஂதிககஷா, சமஷிஷத சஷமி டிஷதவெஷ ஐவா கரகதா அரெ சஷாஸகர ரவதா ஷ஠ ஏன டிஷதவெஷ ஐவெ ஏக ஐவா பர ஏகாஷப ஷஐதா ஐஷகி கஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷகாஷககஷ ஏஷ ஏஷ ஏஷ ஏஷ ये दस्तावेज़ हैं भगतिसंह की जेल डायरी, उन्होंने जो पुस्तकें पर्दि, उनके सारिश और उद्दरण। इनके अस्तत्व का जान भारतीय पत्र-पत्रिकाओं से हुआ। 1968 में भारतीय इतिहासकार जी. देवल ने 'पीपुल्स पार्थ' पत्रिका के लिए 'शहीद भगतिसंह' लेख लिखा, जिसमें उन्होंने 200 पुस्तकों की एक कारण का ज़िक किया और बताया कि उसमें अनेक विषयों पर भगतिसंह के नोट हैं, जिनसे उनकी रचि की व्यापकता का पता चलता है। कापी में पूंजीवाद, समाजवाद, राज्य की उत्पत्ति, क्युनिस्म, धर्म, समाजविंशान, भारत, फ्रांस की क्रिति, माक्सवाद, सरकार के क्लोप, परिवार और अन्तरराष्ट्रीयतावाद पर नोट हैं। देवल ने ये नोट पढ़े और इस बात पर जोर दिया कि इन्हें प्रकाशित किया जाना चाहिए, हालाँकि उनकी यह इच्छा अभी तक साकार नहीं हो पायी है। यह कापी, जिसके बारे में श्री देवल ने लिखा, क्रान्तिकारी के दूसरे कागूज़ात के साथ जेल अधिकारियों ने 23 मार्च, 1931 को भगतसिंह को फाँसी देने के बाद उनके परिवारवालों को सौंप दी और अब फरीदाबाद में रह रहे उनके भाई कुलबीर सिंह के पास है। इन दस्तावेजों की प्रामाणिकता की न केवल इस तथा से पुंच होती है कि वे क्रांतिकारी के परिवार में सुरक्षित रखे गये हैं; कापी के पृष्ट भगतसिंह की छोटे अक्षरों की लिखारी से भरे हुए हैं, वह अंग्रेजी में लिखते थे, कहीं-कहीं उर्दू का भी इस्तेमाल उन्होंने किया। पृष्ट 68 पर तिथि अंकित है : 12.7.1930 और हस्ताक्षर हैं : 'भगतसिंह'। ये दस्तावेज़ युवा क्रिकारी के समृद्ध आतिमक जीवन पर, आत्म शिक्षा के लिए उनके घोर परिश्रम तथा जेल में केँद के दौरान उनकी विचारधारात्मक खोज पर प्रकाश डालते हैं। इन काग्ज्जों को सरसरी तौर पर देखने पर भी यह पता चलता है कि इनका लेखक प्रखर बुडि का धनी ल्यिकत था, जो सोचने के आदतन डंग को ल्यागने में सफल रहा और जिसने प्रगतिशील पश्चिम चिंतकों के विचारों को आत्मसात किया। इन नोटों में माकर्सवाद में भगतिशह की रिचि ही शायद सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। उनके दुर्दिकणों के इस पहल को ही भारत और दूसरे देशों के बुजुआ इतिहासकार छिपाने का यत करते हैं। अमेरिकी इतिहासकारों जी. डी. ओवरस्ट्रीट और एम्. विण्डिमलर का दावा है कि “ज़्यादातर इस सम्बन्ध के आधार पर ही भारतीय कम्पुनिस्त पार्टी ने भगतसिंह को पार्टी का हिरो दिखाने की कोशिश की है। ”³ भगतसिंह के नोट, जो उन्होंने सिंहषद, सारगर्भित शीर्षकों के साथ लिखे, उनकी व्यक्तिगत भावनाओं को भी प्रतिबिम्बत करते हैं। वह आजांदी के लिए तत्पश्चाद से थे, इसीलिप्त उन्होंने बायरन, चिद्टमैन और वर्ड्सवर्थ की स्वतंत्रता के विषय पर पिक्सेलों अपनी कापी में उतारें। उन्होंने इसने के नाटक, दोस्तोयेल्की का 'अपराध और दण्ड' और हृगो का 'पददिलत' उपन्यास पढ़े । रुसी क्रितकारी वेरा फिंगनर तथा रुसी विद्वान और क्रितकारी न. मोरोजोंव की रचनाओं से जेल जीवन की कितनाइयों के जो उद्दरण उतारे, वे उनकी मनोभावनाओं के अनुरूप थे। उमर ख्यामां की पिक्सेलों भी थीं, जो यह दिखती हैं कि किस प्रकार भगतिसह ने जीवन और मृत्यु के प्रश्नों पर मनन किया, जबकि वे औपनिवेशक अदालत के फैसले की प्रतिक्षा कर रहे थे। भगतिसह ने अपने को मुकदमे के लिए तैयार करने के उदेश्य से कानून का भी अध्ययन किया। जेल में पुस्तकें भगतसिंह की चिन्ता का प्रमुख विषय थी। जुलाई, 1930 में उन्होंने अपने मित्र जयदेव गुप्ता को लिखा : “कृपया लाहীর के द्रارकादास पुस्तकालय के लाइब्रियन से पूछना कि बोस्टेल जेल में कैर्दियां को किताबे भेजी गयी हैं या नहीं। उन्हें कियाबो की बहुत तंगी है। उन्होंने सुखदेव के भाई जयदेव के हाथ सूची भेजी थी, मगर किताबे उन्हें नहीं मिली। अगर सूची खो गयी है, तो जरा लाला फिरोज़चंद से विनती करना कि उसके बदले अपनी पसंद से कुछ रोकके पुस्तकें भेजे दो। इस इतवार को उन्हें कियाबे मिल जानी चाहिए थी। कृपया विनती करना कि किताबे जूजर भेजे दो। ”⁴
16 십짜벌, 1930 초 오렌레 둥둠이 둔 새 십짜 둠이 둠의 십짜 십짜의 십짜 십짜의 십짜은 십짜에 십짜는 십짜의 십짜의 십짜의 십짜의 십짜이 십짜의 십짜의 십짜 लो, जो मैने वहाँ से निकलवायी थीं।" क्रान्तकारी जे. सांताल ने, जो कुछ समय तक भगतिंश के साथ जेल में रहे थे, इस बात पर जोर दिया है कि वह बड़े ध्यान से पढ़ने के लिए पुस्तकें चुने थे, डिकेंस, सिंक्लेयर, वाइल्ड और गोकी उन्हें अधिक पसन्द थे $ ^{5} $
जेल में उन्होंने जिस राजनीतिक और वैज्ञानिक साहित्य की माँग की, उससे उनकी रिच्यों का पता चलता है। जुलाई, 1930 में उन्होंने दूसरे इण्डरनेशनल का पतन और “वामपन्थी” कम्मुनिन्म (“वामपन्थी” कम्मुनिन्म : एक बचकाना मर्ज - प्रत्यशत: ये दोनों पुस्तकों लेलिन की थीं), प. क्रोपोলিকन की 'परस्पर सहायता' तथा माँकर्स की 'फ्रांस में गृहयुद्ध' रचनाएँ मंगवायी। భగత్‌సిథిక కే కుళు నొట ఉంకి జీవనికి కా ఆదర్వికాకృ హి స్వకత ఖ్వ ఖాఖరం ఖి. ఖిజ్వ కా నిమ ఖివ శన: “జవ తక నిమ ఖివ శన, మీ ఒమ్మ ఖి ఖి ఖి ఒక కొౖ ఒఖ ఒఖ ఒఖ ఒఖ स्वतंत्रता के लिए संघों और दूसरों के लिए आत्मबில்दान के विचार हम उनकी दायरी के हर पृष्ट पर पार है। पृष्ट 23 पर भगतसिंह ने टॉमस जैफरसन के ये प्रसिद्ध शब्द लिखे : "आजारी के बिरवे को समय-समय पर देशभक्तो और तानशाहों के खून से ताँजा किया जाना चाहिए। यह कुदरती खाद है। " इतिहास, दर्शन और अथशास्त्र के विभिन्न विद्वानों की पुस्तकों से जो उद्दरण भगतिसिंह ने अपनी दायरी में उतार, वे अथन्त रोचक है। कहना न होगा कि जेले के हालात में वह कोई सुव्यविस्तृत अध्ययन नहीं कर सकते थे, उनके लिए तो बाहर से किताबेष पाना तक मुश्कल था। उनके नोट पढ़ते हुए एक बात की ओर ध्यान जाता है : उन्होंने टेट भारतीय समस्याओं की ओर कहीं कम ध्यान दिया। केवल कुछके बार ही लाला लाजपत राय, বিपिनचन्द्र पाल और मदन मोहन मालवीय जैसे स्वतंत्रता सेनिनियों का उल्लेख किया। एक ब्रिटिश लेखक की पुस्तक में से उन्होंने महत्वा गाँधी का केवल एक उद्दरण उतारा। वर्षों तक अंग्रेज़ी द्वारा भारत के शोधन की विधियों का विश्लेषण और औपनिवेशोंके राज्यतन के निर्रक्षा उपायों का भण्डाकोড় भारतीय देशभक्तो के अध्ययन का परम्परागत विषय रहा था। भगतिसिंह ने केवल दो-तीन बार इसका ज़िक किया है, शायद यह मानते हुए कि इस विषय पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है, कि औपनिवेशोंके दासता से उनके देश को मुक्त कराने की आवश्यकता सबके लिए स्पष्ट और प्रमाणित बात हो गयी है। उस समय उनका ध्यान समाज के विचारों की आम समस्याओं में अधिक था, से वह भारतीय चिन्ताकों की अपेक्षा पश्चिम चिन्ताकों की ओर अधिक उनमुख हुए। जहाँ उनके पूर्ववर्ती - राष्ट्रीय क्रिकारोंकी - भारत को ही विश्व के अन्तरविरोधों का केन्द्र मानते थे, वहीं भगतसिंह संकीर्ण राष्ट्रीयतावादी पूर्वग्रहों से पूरी तरह ऊपर उठ गये थे और यह मानते थे कि भारत की समस्याएँ विश्व के विचारों की परिस्थित में ही हल की जा सकती हैं। जिन लेखकों के उद्देश्य भगतिश्लेह ने अपनी दायरी में उतारें, उनके प्रति उनके रख में पूरी सुरस्गति है। शुरू में वह 18वीं सही की अमेरिकी और फ्रांसीसी क्रितियों तथा विचारकों के प्रति भारतीय क्रांतिकारियों का परमरागत लगाव दर्शित है। उन्होंने लसो, टॉपस पेन, टॉपस जेफरसन और पैट्रिक हेलरी के स्वतंत्रता तथा मानव के जन्मसिद्ध अधिकारों पर विचार नोट किया। पृष्ठ 16 पर उन्होंने पैट्रिक हेलरी का निम्न भावपूर्ण कथन नोट किया : "क्या जिन्दगी इतनी प्यारी और चैन इतना मीता है कि बेडियों और दासता की कीमत पर उन्हें ख्रीदा जाये। शमा करो, सर्वशिक्तमान प्रशु! में नहीं जानता कि वे क्या रास्ता अपनायंमे, मुझे तो बस: 'स्वतंत्रता या मौत' दो। ” தானாளாகி கீறி ஹர்சனா கர்னெ கே லிப்ஞ ஹாரதிசஹ ஷரஹ கி ரகனாஹோ கா ஹி ஹீ, லிலித சாஹதய கா ஷி சஹா லெத ஹ் மார்க் ஷவன கெ னம ஷவ ஹ்ஷே ஹனபனி ஓயரி மே ஓதரே : “ஹ ஏச ஹகா கோ ஹயனக மானத ஹீ ஈகி லோஞோ கி ரகரடன ஓஷயி ஐஈதி ஹீ, லெகிகன ஹம ஷ ஷவன ஹி சிஷஷாயா ஞயா ஹ ஷக ஹுஷஞிஹ லஹஷி வஹ மோத கிதனஹி ஹயனக ஹ, ஐ ஞரஹி ஹ ஹஷாஹி புஹி அஹஷி பர லாஹதி ஹ!"
पूஜிवादी विकास के नियमों को समझने के भागतिसह के प्रयासों को प्रदिशत करती भी बहुत सारी सामग्री है। उन्होंने इस विषय को गम्भीरता से लिया और सांख्यक सामग्रियों का अध्ययन किया। ज्वलत सामाजिक अनतिविरोधों को दिखाते आँकड़ों की ओर उन्होंने सबसे पहले ध्यान दिया। विभिन्न लेखकों से जो उद्हरण उन्होंने लिये, वे सिंहवाँ, किंतु प्रभावोत्तादक हैं। उदाहरण के लिए, वह लिखते हैं कि ब्रिटेन की आवादी का नौवीं हिस्सा वहाँ के आधे उत्पाद को हिथियाता है और इस उत्पाद का केवल सातवाँ हिस्सा दो तिहाँ आवादी के हिस्से में आता है; कि अमेरिका की आवादी का एक प्रतिशत से कम अंश वह धनिक वर्ग है, जिसके पास 67 अरब डालर तक की समर्पित है, जबकि 70 प्रतिशत आवादी सर्वहाराओं की है, जो राष्ट्रीय उत्पाद के केवल चार प्रतिशत पर दावा कर सकती है। बहुत से उद्देश्यों यह दिखாத है कि प्रेमकों के प्रति उनके मन में गहरी सद्भावाना थी और पूर्णवादी व्यवस्था के प्रति उनका रख आलोचनात्मक था। उदाहरणतः, फ़िरिये का एक उद्देश्य उन्होंने नोट किया और उसका शीर्षिक रखा : 'सबके खिलाफ अकेला' : “वर्तमान सामाजिक व्यवस्था एक बेहूदा कार्यत्सन् है, जिसमें समग्र के अंश एक-दूसरे के विपरीत हैं और समग्र के खिलाफ काम करते हैं। हम देखते हैं कि समाज में प्रत्येक वर्ग अपने स्नाथ के कारण दूसरे वागों का अहित चाहता है, हर तरह से व्यक्तिगत हित को जन कल्याण के खिलाफ रखता है" (और आगे यह लिखते हैं कि डॉक्टर का स्नाथ यह है कि समाज में ज्यादा से ज्यादा रोग हों, बैकिल ज्यादा से ज्यादा मुकदमे चाहता है, वासतुकार और बदई चाहते हैं कि मकान जल्, इत्यादि)। इसी भावना में रवीन्नाथ टाक्टर के जापानी विद्याधियों के समक्ष उस भाषण का उद्करण है, जिसमें टाक्टर ने जापान में पैसे के पीछे दौड़ को "मानवजاتی के लिए भयानक खृत्रा" बताया, जो "शक्ति के आदर्श को परिणकार के उपर रखती है"। ये सभी उद्देश्यों दिव्यते हैं कि भगतसिंह पूजीवाद को अस्वीकार करते हैं। इसीलिए उन्होंने यह निष्कर्ष किया : “सवाल यह नहीं है कि वर्तमान संभयाको बदला जाना चाहिए या नहीं, बल्कि यह कि उसे कैसे बदला जायेगा।” भगतसिंह ने पूजிवाद की आलोचना सामाजिक और राजकीय, दोनों व्यवस्थाओं के प्रसंग में की। पृष्ट 46 पर लेसन का नाम पहली बार आया है। यहाँ भगतसिंह ने अमेरिकी समाजवादी मॉरिस हिलखवट की पुस्तक 'मावर्स से लेसन तक' से बुर्जुआ लोकतंत्र के सीमित स्वरूप पर उद्हरण लिया : “पूजौवाद में लोकतंत्र एक सार्विक अमृत लोकतंत्र नहीं था, बल्कि विशिष्ट बुर्जुआ लोकतंत्र, या जैसाकि लेसन ने इसे कहा था, बुर्जुआ वर्ग के लिए लोकतंत्र" आगे वह लिखते हैं : “लोकतंत्र सिद्धान्त: राजनीतिक और कानूनी समानता की व्यवस्था है, किन्तु टोस और ख्यावहारिक रूप में यह झूट है, क्योंकि जब तक आर्थिक सता में भारी असमानता है, तब तक कोई समानता नहीं हो सकती, न राजनीति में और न ही कानून के सामने… पूजौवादी शासन में लोकतंत्र की सारी मशिनरी शासक अलपमत को श्रीक बहुमत की यातनाओं के जरिये सता में बनाये रखने के लिए काम करती है।” भगतसिंह ने बुजुआ व्यवस्था की विचारधारात्मक संरचना की ओर भी ध्यान दिया और इस सिஸ்लिले में बुजुआ समाज में धर्म की भूमिका में रचिती। अपने लिए वह धर्म का प्रश्न हल कर चुके थे, इस समय तक वह एक पकके निरीश्वरवादी बन चुके थे। लेकिन उन्होंने भारतीय समाज में धर्म की भूमिका और स्थान को तथा अपने साधियों, राष्ट्रीय क्रिकितकारियों की विचारधारा पर इसके प्रभाव को समझना चाहा। 'धर्म - स्थापित व्यवस्था का समर्थक : 'दासता' शौषिक से उन्होंने अमेरिका के प्रसिंबटोरियन चर्च की महासभा (1835) के प्रستाव का यह उद्दरण नोट किया कि “दासता को बाईबिल के पुराने और नये धर्मग्रंथों में मान्यता प्राप्त है और ईश्वर की सता उसकी निन्दा नहीं करती।” भगतिसंह आगे लिखते हैं कि उसी वर्ष चालर्स्टन बैपिटस्ट एसोসিएशन ने “अपने दासों के समय का उपयोग करने के मालिकों के अधिकार” की पुष्ट की। इस सिஸ்लिले में भगतसिंह ने इस बात पर जोर दिया कि धर्म ने “पूजौवाद का समर्थन” किया है। ধর্ম কী ঐত্সতই কে কারণেই আর উৎসকে মর্ম কে সমৃদ্ধে কি যেত। যেহ মার্কস কী আর উনমুখ হাপ। পুষ্ঠ 40 পর হম মার্কস কী রচনা 'হেগেল'ে ন্যাচ-দর্শন কী সমালোচনা কো প্রযাস' সে 'ধর্ম'ে করে যেমন মার্কস কে বিচার' সৌরিক কো এক উদ্ধারণে হাপ : “...মনুষ্য ধর্ম কী রচনা করতো হয, ধর্ম মনুষ্য কী রচনা নহী করতো। ...মনুষ্য কো অর্থ হে মনুষ্য কো সঙ্গোর, রজন্য, সমাজ। যহ রজন্য, যহ সমাজ ধর্ম কো, এক বিক্রত বিশ্ববুয়েতিকোণ কো জন্ম দেত হই, কযমিক বে স্বয়ং এক বিক্রত সঙ্গোর হই। ধর্ম ইস সঙ্গোর কো সামান্য সিদ্ধান্ত, অসকা সার-সর্গেহ, সুবোধ রূপ মে উসকা তর্ক হই...ধর্ম কে বিরুদ্ধ সর্বপর পরিশেখন রূপ সে উস সর্সোর কে বিরুদ্ধ সর্বপর হই, জিসকো আধ্যাতিক সনতোধ ধর্ম হই... ধর্ম জনতা কে লিপ অপীম হই। ” উললেখনীয় হই কি পুষ্ঠ 192 পর ধমতিসহ নে অনিম ব্যবসী দোষগুলো হই। सो, अपने नोर्ति में भगतिसह ने पूर्णीवाद के उम्मूलन के पक्ष में टोस तर्क पेश किये। माकर्वाद-लेनिनवाद के संस्थापकों की भाँति वह भी यही मानते थे कि भावी समाज केवल समाजवादी समाज ही हो सकता है। उनके नोर्ति में भावी समाज का कोई विस्तृत विवरण तो नहीं है, किन्तु कुछ विचार यह दिखाते हैं कि वह समाजवाद की धारणा का वैज्ञानिक अर्थ लगாதे थे। उन्होंने भावी समाज के दक्षिणपत्थि सामाजिक-जनवादियों के आदर्श को अस्वीकार किया तथा पूर्णीवाद के स्थान पर समाजवाद लाने की समस्या के प्रति सामाजिक-सुधारवादी रख को भी। उन्होंने पश्चिम के दक्षिणपत्थि समाजवादियों की भरस्सी की और आर. मैकडोनाल्ड को “ब्रिटिश लेबर पार्टी का सामाज्यवादी नेता” कहा (पृष्ठ 13)। पुस्त 52 पर दूसरे इण्डर्नेशनल के नेताओं द्वारा मजदूर वर्ग के ध्वय से की गयी गुदरी के बारे में हिलिकवट की पुस्तक से एक उद्दरण है। जेल में वह पूरी तरह पूर्णीवादी व्यवस्था का तखला पलटने तथा सारी मानवजாति के हित में अर्थव्यवस्था और सारी प्राकृतिक सम्पदा पर नियनार्ण स्थापित करने की ओर लिश्त विश्व समाजवादी क्रिति के विचार में तत्काल रहो। पुष्ट 190 पर उन्होंने लिखा : “समाजवादी व्यवस्था : प्रत्येक से उसकी योग्यता के अनुसार, प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुसार।” भगतिशह समाजवाद में संक्रमण को सर्वहारा के संघों के साथ जोड़ते थे, जो भावी समाज में शासक वर्ग बनेगा। पुष्ट 69 पर 'कम्पुनस्ट पार्टी के घोषणापत्र' का एक उद्गुरण है : “...मजूदर वर्ग की क्रिति का पहला कृदम सर्वहारा वर्ग को उठाकर शासक वर्ष के आसन पर बैठना और जनवाद के लिए होने वाली लड़ाई को जीतना है। “सर्वांशा वर्ग अपना राजनीतिक प्रभुत्व पूजीपति वर्ग से धीरे-धीरे कर सारी पूँजी चीनने के लिए, उत्पादन के सारे औजारों को राज्य, अर्थात शासक वर्ग के रूप में संगठित सर्वहारा वर्ष, के हाथों में केन्द्रिकृत करने के लिए तथा समग्र उत्पादक शक्तियों में यथाशीघ्र वृद्धि के लिए इस्तेमाल करेगा। "10 भगतसिंह ने यह भी इंगित किया कि यदि सर्वहारा का पथप्रदर्शन उसका हरावल दस्ता, उसकी पार्टी, जो सर्वहारा क्रॉनित का अनिवार्य उपकरण है, न कर रही हो, तो कोई क्रॉनित नहीं हो सकती। उन्होंने सर्वहारा गीत 'इणट्रनेशनल' के शब्द अपनी डायरी में उतारें। यह तर्कसंगत ही था कि भगतसिंह क्रिति के आरम्भ के नाते संशस्त्र विद्रोह के प्रश्न पर पहुँचे। ऐसा विद्रोह भारतीय क्रितिकारियों की अनेक पीडियों का लक्ष्य रहा था, परन्तु वे इसे ला पाने में सफल नहीं रहे थे। यही कारण है कि भगतसिंह ने इस विषय पर मांकस्वादि रचनाओं में खास दिलचस्मी ली। उन्होंने एंग्लोस की रचना 'जर्मनी में क्रिति तथा प्रतिक्राति' से लम्बे उद्दरण उत्तर, हालाँकि ऐसा उन्होंने मूल रचना से नहीं, बल्कि एक अन्य पुस्तक से किया था और इसीलिए वह इस भूमन में रहे कि वह मांकस को उद्दृत कर रहे हैं : “पहली चीज - विद्रोह से तब तक खिलवाؤ न करें, जब तक आप उस खेल के परिणामों का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं होते। विद्रोह तो एक ऐसा कलन है, जिसके परिमाण सर्वथा अनिश्चित होते हैं, जिनका मूल्य रोज बदल सकता है। मुकाबले में खड़ी शक्तियों को संगठन, अनुशासन तथा परस्कार गठ प्रतिष्ठा के सारे लाभ उपलब्ध होते हैं। यदि विद्रोही अपने दुश्मनों के खिलाफ और बड़ी ताकृत मैदान में नहीं उतरेंगे, तो वे हार जायेगे और बरबाद हो जायेगे। दूसरी चीज - एक बार विद्रोह शुरू होने पर अधिकतम दृढ़संकल्प के साथ काम करने तथा प्रहार करने की जूफ़रत होती है। प्रतिरक्षा की स्थित प्रत्येक संशस्त्र विद्रोह की मौत हुआ करती है; अपने शुव्य से मुकाबला होने से पहले ही मैदान हाथ से निकल जाता है। "¹¹ इस उद्देश्य में प्रत्येक शब्द विद्रोह के प्रश्न पर भगतर्शक के साधियों के सतहों रखे के खिलाफू तथा कुछ हद तक क्रान्तिकारी गतिविधियों के आरम्भ में स्वयं भगतर्शक के दृष्टिकोण के खिलाफू चेतावनी देता है। कापुरी लम्बे समय तक भारतीय क्रांतिकारियों ने न तो भावी स्वतंत्र भारत में सता के स्वरूप पर और न ही उसकी सरकार की सामाजिक-आर्थिक नीति के प्रश्न पर विचार किया। वे यह सोचते थे कि स्वतंत्रता ही एक “रामबान” होगी। माकर्षवारी साहित्य से प्रभावित होकर भगतसिंह ने इन सभी प्रश्नों में गहरी दिलचस्मी ली। उनके कुछ नोट यह दिखाते हैं कि उन्होंने संवहारा अधिनायकल्व के विचार को स्वीकार कर लिया था। शुरू में उन्होंने एप्लस का यह कथन नोट किया कि विजयी संवहारा को वर्ग-शत्रु को कुचलने के लिए अधिनायकल्व की जूफरत है और इसलिए एक “स्वतंत्र लोक राज्य” की बात करना बेतुका है (पृष्ठ 62)। इसके आगे उन्होंने लेसन की परिभाषा जोड़ी : "अधिनायकत्व प्रत्यक्ष स्पे से हिंसा पर आधारित और किसी भी कानून से न बँधी हुई सता है। “सर्वहारा वर्ग का क्रितकारी अधिनायकत्व सर्वहारा वर्ग द्वारा बुजुआ वर्ग के विरुद्ध हिंसा द्वारा हासिल की जाने वाली और बरकरार रखी जाने वाली सता है, किसी भी कानून से न बँधी हुई सता है।”¹² भगतसिंह के नोर्ट में सर्वेहा अधिनायकत्व के सार पर संशोधनवादि रखों की आलोचना हम पाते हैं। उन्होंने लेिन की रचना 'सर्वहारा क्रित और गदार काउत्सकी' से लम्बे उद्दरण उतारे और लेजिन के इस विचार पर खास ध्यान दिया कि बुंबुआ निन्दक “शुद्ध लोकत्व” के नारे का सहारा लेकर सोवियत सरकार पर अत्याचार का आरोप लगता है : “परन्तु अब चूँकि श्रीक तथा शोषित वर्ग ने साफ़ाज्यवादी युद्ध के कारण विदेशों के अपने भाइयों से कटै रहकर भी इतिहास में पहली बार स्वयं अपनी सोवियतों की स्थापना कर ली है, उन जन समूहों को राजनीतिक निमर्ण के काम में जुटा दिया है, जिनका बुबुआ वर्ग उत्पीड़न करता था, जिन्हें वह कुचलता था और जिन्हें मितमूह बनाता था, अब चूँकि उन्होंने स्वयं एक नये, सर्वहारा राज्य का निर्माण करना आरम्भ कर दिया है, भीषण संघर्ष की जलाको के बीच, गृहयुद्ध की जलाको के बीच शोषकों से मुक्त राज्य के बुनियादि सिद्धानो तो क्परेखा तैयार करनी शुरू कर दी है - इसलिए सारे लुच्चे बुबुआ जन, खून घुसने वालों का पूरा गिराह 'मनमानपेन' का शोर मचाने लगा है और काउंत्सकी भी उन्होंने के स्वर को प्रतिधवित कर रहे हैं!”¹³ सर्वशांत अधినायकल्व को नये समाज के निर्माण का उपकरण मानते हुए भगतसिंह ने ऐसे समाज की स्थापना के पथों की ओर बहुत ध्यान दिया। इस सिलिसले में वह सोवियत रूप से अनुभव और वहाँ कुछ समय पहले हुए क्रांतिकारी पुनर्गत की ओर निरन्तर उन्मुख होने लगे। डायरी के पूछ 36 पर पहली बार “बोल्शेविक रूस” का जिक्र आया है। इसके आगे हाशियों पर विभिन्न लेखों द्वारा रूस पर लिखी गयी पुस्तकों की सूचि है : रेन फुलोप-मिलर की 'बोल्शिक्नम का चेहरा और दमाग', एम्. ओ 'हारा की 'रेशिया', लैसलो लोटन की 'रूसी क्राति', एप्तन कार्लेग्रीन की 'बोल्शिक्नम रूस' और 'मार्सरी, लेनिन तथा क्राति का विशान' (पृष्ठ 191)। इस सूचि में रूस पर वे सभी पुस्तकों नहीं हैं, जिनमें भगतसिंह ने जेल में दिलचस्वी दिखायी थी। जे. सान्याल के अनुसार भगतसिंह ने जाँन रीड की 'दस दिन जब दुनिया हिल उति', गोकी की 'माँ' और स. स्टेप्योक-क्रालांर्सकी की 'रूसी लोकतन का जन्म' भी पढ़ी थी। ¹⁴ जे. सांयाल आगे लिखते हैं : “हालाँकि समाजवाद उनका विशेष विषय था, तथापि उन्होंने 19वीं सही के आरम्भ में रूसी क्रितकारी आन्दोलन की उत्पत्ति से लेकर 1917 की अक्टूबर क्रित तक उसके इतिहास का गहराई से अध्ययन किया। यह माना जाता है कि भारत में बहुत कम लोग ऐसे थे, जिनके इस विषय पर जाने की तुलना भगतसिंह के जाने की जा सकती है। बोलशोविक शासन में स्स में हो रहे आर्थिक प्रयोग में भी उनकी गहरी दिलचर्यी थी।"15 भगतसिंह यह समझते थे कि समाजवादी क्रिति के समुख विराट सृजनतमक कार्ियभार हैं जो इसे बुर्जुआ क्रिति से अलग करते है। निम्न उद्दरण में इस भेद पर जोर दिया गया है : “बुर्जुआ क्रिति आमतौर पर सता पाने के साथ समाप्त हो जाती है। सर्वहारा क्रिति के लिए सता पाना एक शुरुआत ही है; सता पा लेने पर उसका उपयोग पुरानी अर्थव्यवस्था का कायाकालप करने और नयी अर्थव्यवस्था गठित करने के लिए किया जाता है।” (पृष्ठ 120)
क्रांति के मांकर्वादी सिद्धांत का स्वयं ही स्वतंत्र रूप में अध्ययन करते हुए भगतसिंह ने उसके सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व पहचाने। उन्होंने पुरानी राजकीय मशीनी को तोड़ने और नयी मशीनी बनाने की आवश्यकता पर लेजिन के विचार नोट किये और यह इंगित किया कि आनतिक कार्यों के अलावा समाजवादी क्रिति के सामने अनतरराष्ट्रीय कार्यभार भी होते हैं, क्योंकि विश्व क्रान्तिक के बिना किसी एक देश में कम्पुनर्स्ति शासन खुले से मुक्त नहीं हो सकता, क्योंकि अन्तरराष्ट्रीय पूर्णवीदारी हस्तक्षण का खुतरा उसके सिर पर सदा मैंड्राता रहगा (पूर्ण 120)। भारतीय क्रांतिकारी हरावल के, जिसका जनसाधारण के साथ पहले कोई सम्पर्क नहीं रहा, प्रतिनिधि के नाते भगतिसंह द्वारा लेजिन के इस विचार को स्वीकार किया जाना एक बहुत बड़ी बात थी कि जनता पर पार्टी का प्रभाव बहुत महत्त्वपूर्ण है। पृष्ठ 121 पर उनके नोट लेजिन के इस विचार को प्रतिबिम्बित करते हैं कि सर्वहारा को आबादी के बड़े भाग को अपने पक्ष में लाना होता है और साथ ही वर्ग-सहयोग की वकालत करने वाले बुंबुआ और दुटपूर्णिया तर्कों के प्रेमिका पर प्रभाव को मिटाना होता है। इस तरह हम देखते हैं कि जेल में थोड़े समय में ही भगतसिंह ने माक्सविदी शिक्षा के प्रमुख सिद्धांतों को समझ लिया और आत्मसात कर लिया। उनके जीवन का ऐसे क्षण में खासद अन्त हो गया, जबकि वह माक्सवाद के जाना का उपयोग करने के लिए तैयार हो गये थे। परन्तु जेल में उन्होंने जो भगीरथ परिश्रम किया, वह निर्धरक नहीं था। भगतसिंह ने स्वयं जो कुछ जाना-समझा, उसे उन्होंने अपने मित्रों और साधियों तक पहुँचाने की कोशिश की, यह समझते हुए कि भारत में क्रान्तिकारी आन्दोलन के विकास के लिए मांकस्वामी सिद्धांत कितना महत्वपूर्ण है। यह कोई संयोग की बात नहीं कि अपने एक पत्र में उन्होंने अपने को एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं, समाजवादी विचारों का प्रचारक कहा।¹⁶ जेल में भगतसिंह ने अपने क्रान्तिकारी साधियों के साथ ही नहीं, बल्कि गंदर पार्टी के बहुत से सदस्यों के साथ भी सम्पर्क स्थापित किये, जो प्रथम विश्वयुद्ध के दिनों से जेल में बन्द थे। राष्ट्रीय मुखित आन्दोलन की समस्याओं पर उन्होंने ग्रदर पार्टी वालों से लम्बी बातों की। जी. देवल ने ग्रदर पार्टी के सदस्यों के साथ भगतिसह के सम्बन्धों के बारे में एक लेख लिखा है। ¹⁷ जेल में वह गदर पार्टी के एक नेता सोहन सिंह भकना से मिले, जो कालानतर में भारत में कम्युनिस्ट आन्दोलन के एक प्रमुख नेता बने। ¹⁸ भगतसिंह अपने साधियों को सलाह देते थे कि वे मांसस्वाद का अध्ययन करें। उदाहरण के लिए, उन्होंने मांसकी की 'पूजी' के अध्ययन की आवश्यकता पर जोर दिया। जयदेव प्रसाद गुप्त को 24 जुलाई, 1930 को लिखे पत्र में उन्होंने अपने लिए कितबें मंगवायी थी और कहा था कि अपने साधियों के लिए कितबों की सूची पहले भेज चुके हैं और विनती की थी कि उनका यह अनुरोध जल्दी पूरा किया जाये, क्योंकि उन्हें किताबों की सज्जन तंगि है।¹⁹ इस बात के भी प्रमाण मिलते हैं कि जो साथी सौभागयवश जेला जाने से बच गये, उनके साथ भी भगतसिंह ने सम्पर्क बनाये रहे। अपनी कालकोंकी से भी वह 1929 में लाहो में हुई नौजवान भारत सभा की कॉर्पास को एक महत्वपूर्ण संदेश भेजने में सफल रहे। अपनी क्रांतिकारी पुस्तकाओं की, जिनमें 'बम का दर्शन' भी था, पाण्डुलिपियाँ उन्होंने जेला से बाहर भिजवा दीं। फाँसी पर चढ़ने से कुछ दिन पहले ही उन्होंने युवा राजनीतिक कार्यकर्ताओं के नाम अपनी घोषणा लिखी और बाहर भिजवायी, जिसे उनकी अनितम इच्छा और वसीयतनामा कहा जा सकता है। ²⁰* जेल में उन्होंने कुछ पुस्तकें भी लिखीं : 'आत्मकथा', 'समाजवाद का आदर्श' और 'भारत में क्रान्तिकारी आन्दोलन'। दुर्भियवंश, इन पुस्तकों की पाण्डुलिपियाँ नहीं बची रहीं, हालाँकि उनके व्यक्तिगत और राजनीतिक पत्र बचे रहे। इन पत्रों से भगतसिंह के इस आत्ममूल्यांकन की पुंचि होती है कि वह समाजवादी विचारों का प्रकारक है और इस बात की भी कि उ-होने अपने साधियों की मांसर्वादी रखे अपनाने में मदद करने की कोशिश की। सुखदेव को, जिन्हें भगतसिंह के साथ ही फाँसी दी गयी, उनका एक पत्र प्रकाशित हुआ है। इससे इस बात की पुष्ट होती है कि भगतिसिंह इस सच्चाई को समझने लगे थे कि भारत में व्याप परिस्थितियों में समाजवाद एक तर्कसंगत रास्ता है। इससे यह भी पता चलता है कि भगतिसिंह भारत के सामाजिक जीवन पर अपने प्रभाव को समझते थे। उन्होंने लिखा कि अपने साधियों के साथ उन्होंने (राजनीतिक) वातावरण को काफ़ी बदला और वे अपने समय की पैदाइश थे। माक्स का हवालா देते हुए, जिन्होंने, भगत सिंह के शब्दों में, औद्योगिक क्राहित से जन्मी विचारधारा को निरूपित किया, उन्होंने लिखा कि उन्होंने और उनके साधियों ने भारत में समाजवादी और कम्युनिस्ट विचारों की रचना नहीं की है, वे तो काल और परिस्थितियों के प्रभाव का परिणाम हैं। परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि उन्होंने यथाशाकित इन विचारों का प्रचार करने में मदद की है $ ^{21} $
భాగతీశ్వర ఘనం జీవనం కాని భాగం తెలుసుకోవడం ద్వారా, స్వాగతం కాని భాగం తెలుసుక भारत की स्वतंत्रता के अद्यम सेनानी भगतसिंह ने अपना तन-मन देश की आज़ादी के संघों की समस्याओं में तथा राष्ट्रीय क्रिकितकारी संगठनों को सुदृढ़ करने में लगाया। व्यक्तगत आतंक की नीति से उन्होंने पूरी तरह इन-कार कर दिया। उन्होंने सारी पेचीटियायों, अप्रत्याशित मोड़ों और उतार-चढ़ावों के साथ राजनीतिक संघों के महत्त्व को स्वीकार किया और वह इस बात के लिए उत्युक्त थे कि उनके जो साथी जेल जाने से बच गये हैं, वे ठीक ऐसे संघों में जुटेंट 2 फरवरी, 1931 के अपने पत्र में साधियों को यह सलाह देते हुए उन्होंने लेलिन के अनुभव को ध्यान में रखा। इससे पता चलता है कि उन्होंने तत्कालीन भारतीय क्रिकितकारीसे के लिए लाक्षणिक बहुत से “वामपन्थी” दृष्टिकोणों से छुटकारा पा लिया था। उन्हें इस बात का कूशल करने के लिए कि संघों की कुछ मिजुलों में शुरू के साथ बातचीत की जा सकती है, उन्होंने लिखा कि समझौता अपनेआप में कोई बुरी बात नहीं है और अपना उदेश्य पाने में आरम्भ में उसका उपयोग किया जा सकता है। 1905-1907 में दूमा के प्रति लेनिन की नीति का हवाला देते हुए उन्होंने लिखा कि “समझौता” एक ऐसा हिथियार है, जिसका राजनीतिक संघों में इस्तेमाल किया जाना चाहिए, ताकि राष्ट्रीय को थोड़ी देर के लिए आराम मिल सके और वह अपने को आगे के संघों के लिए तैयार कर सके। भगतसिंह ने क्रिकितकारीयों का आहार किया कि वे अपने अतिम लक्ष्य को कभी न धूमें। मई, 1931 में यह पत्र भारतीय प्रेस में छप गया था। इसे प्रकाशित करने वालों में इलाहाबाद का साप्ताहिक 'अभ्युद्य' और पंजाब का 'केसरी' था।²³ इस तरह भारतीय जनता इससे अवगत हो पायी और इसने वह प्रयोजन पूरा किया, जिसके लिए लेखक ने इसे लिखा था। భగత్‌సిశ కి అప్రకాశిత రచనాలో మీ వశ భీష్మికా ధ్యానం దేని యోగ ఖే, జో ఉన్నాయి గద్దర పార్టీ కే లాగా రామశిరంగా కి యోగిపియార్ శ్రదా 'స్వపలొకం' (ద్రిమలేండ) కే లిగ్ల 15 జనవరి, 1931 కో లిగ్లశ్చి శి 1 హ ఘస్తక తో నఖి భవి, లేకొన ఇస్కా భీష్మికా భగత్‌సిశ కి పరివారవాల్లో నే సీభాల్‌కర రశ్చి ఖే హి 24 ఇస్ భీష్మికా కి అనవిస్తు పుస్తక కే విషయ సే కశ్చి ఆధికం చృపాపక ఖే : భగత్‌సిశ ని చనిపితు శుప మీ అపన విచార శ్వకత కరనే కె లిగ్ల త్వా అపన సితియో కొ సలాద దేని కే లిగ్ల ఇస్ అవసర కా లాభ ఊటాయి ཕྱིག་དྲུག་པའི་ཡོད་ཀྱི་ས লালা রামशரণ কী পুস্তক কী চর্চা করতে হুপ భगाதிসহ নে লিখা কি লেখক উহু শব্দ করতোন, জিসে বহু বর্ণাল আর পঁজব কে সের ক্রান্তকারী আন্দোলন কী আধার মানতা ঈ। উঠেই কথা কি বহু লেখক সে সহমত নর্থই, কর্মকি লেখক সঙ্গোর কী প্রযোজনপরক আর অধিধুতবদী হ্যাল্যা করত হজ্ঞক বহু স্বয় ধীতকথাদী ঈ। উঠেই ইথর মে বিশ্বাস আর রহসযদ্বা কে লিপ লেখক কী আলোশন কী, অলগ-অলগ ধর্মী মে সময়জয় বিতনে কে লেখক কে প্রযায়স কে অস্বীকার কিয়া আর ইস প্রশন পর অপনা রখে মার্কস কে শব্দ মে হ্বক কিয়া : “খর্ম জনতা কে লিপ অকুশম ঈ।” লেখক দ্বারা চিত্রিত ধারী সমাজ কা বিশ্লেষণ করতে হুং ধর্মার্টিসহ নে সামাজিক প্রণতি মন্ত্রীপিয়াই সিদ্ধান্তী কী ওপরযোগী ধূমিকা কো স্বীকার কিয়া: “স্টে-সিমী, ফুরির আর রবনট আবেদন আর উঠে সিদ্ধান্তী কে বিনা মার্কস কারী বীজনিক সমাজবাদ নিষ্ক্রিত নর্থী হো সকতা খা!” উঠেই ইস বাত পর জুয়ে দিয়া কি থাবী সমাজ কণ্ঠনিস্ট সমাজ হোগ, জিসকে নির্মাণ কে লিপে হাওয়ার উঠে সাধী প্রযলশীলই ঈ। একাধিক বার বহ সোবিষণ্ণ হুং কে ইতিহাস কী আর উঠে হুং, শারিকি আর বৌদ্ধিক প্রথম কে লিপে সমান পরিশ্রমিক তথ্য জন বিশ্বা কে ধ্বনি में उसकी नीति का उदाहरण दिया। भावी समाज में युद्धों के उम्मूलन की भविष्यवाणी करते हुए उन्होंने लिखा कि सोवियत ऐस को सर्वहारा अधिनायकत का देश होने के कारण पूर्जीवादी समाज से अपनी रक्षा के लिए फौज रखनी पड़ रही है। भगतसिंह की जेल को डायरी और दूसरी सामग्रीयां, जिन पर यहाँ गौर किया गया है, इस युवा क्रिकारी के दृष्टिकोण का विकास दिखती है। साथ ही वे इस लिहाज से भी अमूल्य हैं कि इनमें हमें भगतसिंह की विचारधारातमक खोजों का पता चलता है, हम देखते हैं कि भारतीय राष्ट्रीय क्रिकारियों का माक्सवाद की ओर रूशान था और ने लेनिन तथा अक्टूबर क्रिकित के विचारों से प्रभोवित हुए थे। भगतसिंह तकालीन मध्यवर्गिय नौजवानों की, जो कॉर्पेस के बुजुआ नेताओं से निराश थे, भावनाओं का मूर्त रूप है। इन नौजवानों को भगतसिंह ने यह दिखायी कि उन्हें कौन-सा रास्ता पकड़ना चिह्मए। जब इस क्रानितकारी को फाँसी दे दी गयी, तो उनके उदाहरण का अनुसरण करते हुए क्रानितकारी दलों ने जेल में ही मांसवाद के अध्ययन के लिए पाट्यकर्मांों का प्रबन्ध किया। सोवियत संघ में हो रहे क्रान्तिकारी कायाकल्प तथा पार्टी कार्यकर्ताओं को शिक्षित करने की उसकी विचारधारात्मक और राजनीतिक प्रणाली से भगतसिंह बहुत आकर्षित हुए। वह अक्टूबर क्रान्तिक के अनुभव का प्रत्यक्ष अध्ययन करना चाहते थे और उन्होंने अपने साधियों से ऐसे योग्य उममीदवार चुनने को भी कहा, जिन्हे इस उद्देश्य से मास्को भेजा जा सके। सुविख्यित स्वतंत्रता सेनानी बाबा पृथ्वी सिंह आजाद ने 'लेजिन की धरती में' नामक अपनी पुस्तक में लिखा है :
“उन दिनों भगतसिंह जेल में माक्स्वाद-लेिनवाद का अध्ययन कर रहे थे और उनकी क्रानिकारी दृष्टि को एक नया, अधिक परिपकव आयाम प्राप्त हो रहा था। वह भारत की स्वतंत्रता तथा जनसाधारण की शोषण से मुक्ति की समस्या पर अधिक व्यापक परिशेष्य में पुनर्विचार कर रहे थे। वह भली भाँति जानते थे कि उन्हें फाँसी होगी। परन्तु शहीद होने से पहले वह आश्वस्त हो जाना चाहते थे कि भारत में क्रानिकारी आन्दोलन उस नयी अवस्था में पदार्थण कर ले, जिसकी कல்पना उन्होंने माक्स्वादि सिद्रांतो और सोवियत क्रिति के अध्ययन के आधार पर की थी।”
आगे वह लिखते हैं : “चन्द्रशेखर और धन्वतिर ने मुझसे कहा : सरदार भगत सिंह जेल में मावर्स और लोसन के कमुनिस्त दर्शन का गहरा अध्ययन करते रहे थे और अपने साधियाँ को भी इसकी प्रेरणा देते रहे थे।..उन्होंने ही तुमसे मिलने और तुम्हे इण्डियन सोशलिस्ट रिपोर्ट्स के आर्मी का सदस्य बनाकर सोवियत संघ में अध्ययन के लिए भेजने को कहा था।”²⁵
गिरफ्तारी से पहले भगतसिंह खुद भी सोवियत संघ जाकर समाजवाद के देश को अपनी आँखों से देखना चाहते थे। 'सोवियत संघ में नव मानव' पुस्तक में विजय कुमार सिंहना लिखते हैं :
“उन दिनों ही शोकृत उसमानी, जो कुछ दूसरे लोगों के साथ तीसरे कम्युनस्ट इंटरनेशनल की छटी कार्ग्रेस में भाग लेने के लिए चोरी-डिपे मासको जा रहे थे, कानपुर में मुझसे मिले और अपने साथ चलने को कहा!..मैने भगतसिंह से बात की: हमें लगा कि यह उचित समय नहीं है। हमने तय किया कि हम दोनों कुछ समय बाद मासको जायँगे।”²⁶ दुर्भियवंश, यह योजना कभी साकार नहीं हो पायी। कुलबीर सिंह ने, जिनकी कृपा से मैं उनके बड़े भाई भगतसिंह की जेल डायरी का अध्ययन करे और उसकी नकल उतार सका, उनके जीवन तथा कार्यकलाप पर अड्ढ़ित्य सामग्री जमा की है, जिसका बारिकी से अध्ययन किया जाना चाहिए। उनके विचार में भगतसिंह जेल में कूट भाषा में भी एक डायरी रखते थे, जो अभी तक नहीं मिल पायी है। భగాతిశ్శకం దీర్ఘకం, కులుత్రం శిశు భావికల సంఖ్య శివాలు నుండి నుండి శివాలు విరాజిస్తున్న శివాలు ఉండేవి నుండి నుండి శివా
21 जनवरी, 1930 को लेजिन की पुण्य तिथि पर भगतिसंह और उनके साथी लाल रुमाल गले में बॉँधकर अदालत में आये। कटघरे में पहुँचते ही उन्होंने नारे लगाये : “समाजवादी क्रिति जन्दबाद”, “कम्युनिस्ट इणत्रनेशनल जन्दबाद”, “लेजिन का नाम अमर है”, “जनता जन्दबाद”, “साम्राज्यवाद मुर्दिबाद”। इसके बाद भगतसिंह ने वह तार पढ़ा, जो उन्होंने और उनके साधियों ने तीसरे इणत्रनेशनल को भेजने के लिए अदालत को दिया था। इसमें कहा गया था : लेजिन दिवस पर हम उन सब लोगों का हार्दिक अभिभावान करते हैं, जो महान लेजिन के विचारों को आगे ले जाने के लिए प्रयत्शील हैं। रुस जो महान प्रयोग कर रहा है, उसमें सफलता की कामना हम करते है। हम अनराश्यी मजदूर आदालन की आवाज़ में आवाज़ मिलाते हैं। सर्वहारा की जीत होकर रहेगी, पूजीवाद की हार होगी। सामाज्यवाद मुद्रावाद। भारत में एक ऐसे व्यक्ति से भी मेरी मुलाकृत हुई, जो भगतर्सिंह को फाँसी दिये जाने से कुछ घण्टे पहले ही उनसे मिले थे। यह थे प्राणनाथ मेहता, भगतिर्ह के मित्र और वकील। उन्होंने मुझे बताया :
भगतसिंह की जेल नोटबुक : एक महान विचारयात्रा का दुर्लभ साक्ष्य / “उन दिनों में डायरी रखता था (अपने काम के लिए भी मुझे इसकी ज़ऱरत होती थी)। बदिक्समती से 1947 में पारिशन के वक्त मुझे लाहोंर छोड़ना पड़ा, मेरे काग्ज़ात वहीं रह गये, कुछ पता नहीं उनका क्या हुआ। “बहरहाल डावर्ियाँ तो खो गयी हैं, मगर उन दिनों की घटनाओं ने मेरे दिमाग्र पर इतनी गहरी छाप छोड़ी है कि उसे न वक्त मिटा सका है, न कोई दूसरी घटनाएँ!...
“23 मार्च, 1931 को मुझे वह किताब मिल गयी, जो भगतिसह ने मंगवायी थी। मैं उससे मिलने गया। जेल के गेंट पर मुझे बताया गया कि भगतिसह और उसके दोस्टों ने किसी से भी मिलने से इन्कार कर दिया है। वजह यह थी कि जेल के अधिकारियों ने कृरीबी रिश्तेदारों को छोड़कर और किसी से मिलने पर पाबन्दी लगा दी थी। इसके विरोध में भगतिसिंह और उसके साधियों ने कहा कि वे किसी से भी नहीं मिलोगे। “कुछ करना चाहिए था। मैं जेल के अधिकारियों से मिलने गया। उनमें एक मि. पुरी नेक इन्सान निकला। उसने मुझे सलाह दी कि तीन कैदियों के बकोल के नाते में अर्जि दूं कि मुझे उनकी आधुरी इच्छा लिखने के लिए उनसे मिलना है। फिर उसने मुझे भगतिसह की कालकोंरी में ही उससे मिलने की इज्ञाजत दे दी। थोड़ी देर बाद राजगुरू और सुखदेव को भी वहाँ लाया गया। “उस वक्त मुझे यह पता नहीं था कि लाहार जेल के इन तीन कैरियों से यह मेरी आखरी मुलाकात है, कि दो घण्टे बाद इन्हें फॉसी दे दी जायेगी। “भगतसिंह ने मुझसे पूछा कि में किताब लाया हूँ या नहीं। मैने उसे किताब दी, तो वह बड़ा खुश हुआ। किताब लेते हुए बोला : 'आज रात को ही इसे खुम कर दूगा, इससे पहले कि वे…' उस बेचारे को क्या पता था कि वह किताब आखिर तक कभी नहीं पहुं पायेगा।” मैन प्राणनाथ मेहता से पूछा कि उन्हें उस कित्तब का नाम याद है, जो वह भगतिंश के लिए ले गये थे। उनका जवाब था : "सच पूछें, तो मुझे याद नहीं कि यह लेलिन के बारे में कित्तब थी, या लेनिन की। एक छोटी-सी कित्तब थी। .. अगले दिन जेले के स्नाररी ने मुझे बताया कि जब भगतिंश को लिवाने आये थे, तो वह यह कित्तब पढ़ रहा था। बाद में भगतिंश मेरे लिए जो चीज्ज़ छोड़ गये थे, उनके साथ मुझे वह कित्तब भी मिली। " “शायद उसी सनली ने,” महता ने आगे कहा, “भगतसिंह के रिश्तेदारों को उनके अन्तम क्षणों के बारे में बताया।” वीरேन्द्र सिंख्घु ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि भगतर्सिंह प्राणनाथ मेहता की लायी लेलिन की जीवनी पढ़ रहे थे, जब दरवाजा खुला। दहलीज पर अफ़सर खड़ा था। “'सरदार जी,' उसने कहा। 'फॉसी लगाने का हुक्म आ गया है। तैयार हो जाइये।' “भगतसिंह के दायर हाथ में किताब थी, उससे नजर उठाये बिना ही उन्होंने बायाँ हाथ उठाकर कहा : 'ठहिरये। यहाँ एक क्रिकतकारी दूसरे क्रिकतकारी से मिल रहा है।' "कुछ पंकत्याँ और पढ़कर उन्होंने किताब एक तरफ रख दी और उठ खड़े हुए बोल : 'चंलाए!'" भगतसिंह के क्रिकारी दल में से एक और कमेंट क्रिकारी निकला, जो आगे चलकर भारतीय कम्पुनिलंस्ट पार्टी का महासिच्व बना। यह थे अज्य कुमार घोष। 'भगतसिंह और उनके साथी' नामक पुस्तक में अजय घोष ने लिखा कि भगतसिंह भारत के राजनीतिक क्षितिज पर अल्पांश के लिए एक उल्का पिण्ड की तरह चमके और लुप्त होने से पहले वह लाखों लोगों के लिए एक नये भारत की आत्मा और आशाओं का प्रतीक बन गये, उन लोगों के लिए, जिन्हें मृत्यु का डर नहीं था, जो सामाज्यवादी अंकुश को उत्तर फंकेने और अपने महान देश में एक स्वतंत्र राज्य का भवन खड़ा करने के लिए कृतसंकलप थे। भगतसिंह और उनके साधियों जैसे निडर क्रिक्तकारियों का बिलदान चयई नहीं था। उनके दल के सर्वप्रिंतिनिध इस निजर्ष पर पहुँचे कि मुट्लीभर नौजवान क्रिक्त नहीं ला सकते, कि बड़े धीरज और परिश्रम के साथ जनसाधारण के बीच काम करना चाहिए, लोगों को संघर्ष के लिए संगठित करना चाहिए, टोस कार्यनितियाँ तैयार करना, उन पर अमल करना तथा लोगों को सता के अनिम्म संघर्ष की ओर ले जाना चाहिए।

टिप्राणियाँ

शहीदेआज्म की जेल नोटबुक

भगतसिंह द्वारा जेल में (1929-31)
अध्ययन के दौरान लिये गये नोट्स और उद्देश्य नोटबुक खोलते ही पहले पेज (डाइटिल पेज) पर अंग्रेजी में लिखा है:
"भगतसिंह के लिए
चार सौ चार (404) पूछ…"
नीचे एक हस्ताक्षर है और 12.9.29 को तिथि दी गयी है। स्पष्ट है कि यह प्रविष्ट जेल अधिकारियों द्वारा भगतर्शह को कापी देते समय की गयी है। इसके नीचे भगतसिंह के दो पूरे और दो लघु हस्ताक्षर हैं। पृष्ठ के ऊपरी दायर किनारे पर भी अंग्रेजी में भगतसिंह का नाम लिखा है। (देखें सामने का पृष्ठ)
जेल मैनुअल/नियमावली के जानकार जानते होंगे कि जब भी कोई कैर्दी लिखने के लिए कापी माँगता है तो जेल अधिकारी को कापी के शुरू और अन्त में ऐसा लिखना होता है और कैर्दी को भी प्राप्त करते समय वहाँ हस्ताक्षर करना होता है। भगतसिंह के हस्ताक्षर (अंग्रेज़ी में) टाइटिल पेज पर भी मौजूद हैं और 12.9.29 की तिथि के साथ कापी के अन्त में भी। नोटबुक की जो डुप्लीकेटेड/हस्ताলিखित प्रतिलिपि जी.बी. कुमार हुजा को गुरुकुल इन्द्रप्रस्थ में मिली, उसमें नीचे बाये कोने पर अंग्रेजी में यह भी लिखा हुआ था : “प्रतिलिपि शहीद भगतिंशह के भतीजे अभय कुमार सिंह द्वारा तैयार।” नोटबुक आम स्कूली काँपी के आकार की थी, लगभग
6.75 X 8.50 इंच या 17.50 X 21 सेपटीमीटर।
- सम्पादक For S. Bhagat Singh four hundred + four pages
[404 26]
Lime
1295129
By: Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy 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Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy Icy I क्यू 0 दो गुना दो की घात एक ज़मिन के माप²:
जर्मन 20 हेक्टयर - 50 एकड़ अर्थात 1 हेक्टयर = 2½ एकड़
qσσ 6 (3)
सम्मित से मुंबत – “सम्मित की स्वतंत्रता”...जहाँ तक छोटे पूर्णப்பित और किसान सम्मतिधारकों का सवाल है, “सम्मित से मुंबत” बन गयी। विवाह अपनेआप में, पहले की भाँति ही, वेश्यावृति का कानूनी तौर पर स्वीकृत रूप, औपचारिक आवरण, बना रहा...।
(सोशिल्ज्न, साइनिटिक्फ क एण्ड यूटोपिया)¹ दिमाग्गी गुलामी – “एक शावत सता ने मानवसमाज को वैसा ही रचा, जैसा आज वह है, तथा 'प्रोछतर' और 'सता' के प्रति सम्पेण देवी इच्छा से ही 'निम्नतर' वागों पर लागू किया गया है।” उपदेशक गण, उपदेश मंच और प्रेस की ओर से दिये जाने वाले इस सन्देश ने आदमी के दीमाग्ग को सम्मोहित कर रखा है और यह शोषण के सबसे मजबूत स्तம்பों में से एक है।
4007(4)
( ओरोजन ऑफ द फैमिली में अनुवादक की भूमिका)² एंगेल्स कृत द ओरिजिन ऑफ द फैमिली...
आदिम समाज के इतिहास में एक तर्कसंगत व्यवस्था प्रस्तुत करने का प्रयास सबसे पहले मार्गने के किया।³ वह इसे तीन मुख्य योगों में बॉ�ता है :
1. असंभ्यता, 2. बर्बिता, 3. संभ्यता
1. असंभ्यता पुन: तीन अवस्थाओं में विभाजित :
1. निम्नलर; 2. मध्य; 3. उच्चतर
1. असभ्यता की निम्नतर अवस्था : मानवजित की शौशवावस्था।
1. पेड़ों पर रहना। 2. भोजन था फल, गिरिफल और कन्दमूल। 3. सुसंगत बोली का विकास इस काल की प्रधान उपलब्ध।
2. मध्य अवस्था : 1. आग की खोज। 2. मछली भोजन के रूप में प्रयुक्त। 3. शिकार के लिए पत्थर के औज़ार आविष्कृत। 4. मानव मांसभक्षण अस्तित्व में आ जाता है।¹
3. उच्चतर अवस्था : 1. धनुष और बाण, कुम्हारी नहीं। 2. ग्रामीण बिस्त्यां। 3. घर बनाने में इमारती लकड़ी का इस्तेमाल। 4. कपड़े बृने जाने लगे।
असभ्यता की अवस्था में धनुष और बाण वैसे ही थे, जैसे बর্बरता की अवस्था में लोहे की तलवार, और सभ्यता की अवस्था में आगेयासरा - यानी, प्रभुल के हिथियार।
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2. बव्रता :

1. निम्नतर अवस्था : 1. कुमारों का आरम्भ। पहले लकड़ी के बरतनों पर मिट्टी की पैरेंट चढ़ायी जाती थीं, लेकिन बाद में चलकर मिट्टी के बरतन आविष्कृत कर लिये गये।
2. मानवज़ातियाँ दो स्पष्ट वर्गों में विभाजित :
(i) पूर्वी, जो जानवर पालती थीं और अनाज पैदा करती थीं;
(ii) पश्चिम, जिनके पास सिंफ 'मक्का' था।
2. मध्य अवस्था :
(अ) पश्चिम गोलाद्र : अर्थात अमेरिका में वे खाद-फसलें उगाते थे, (खेती और सिंचाई), और घर बनाने के लिए इट्प पकाते थे।
(ब) पूर्णी : वे दूध और मांस के लिए पशुपालन करती थीं। इस अवस्था में कोई खेती नहीं।
3. उच्चतर अवस्था :
1. कच्चे लोहे को गलाना।
2. दस्तावेज़ लिखने के लिए अक्षर-लिपि का विकास और उसका इस्तेमाल। इस अवस्था में अनेक आविषकार होते हैं। युनानी नायकों का यही काल है।
3. बड़े पैमाने पर मक्का की खेती करने के लिए पशुओं द्वारा लोहे के हल खर्चे जाते हैं।
4. जंगलों की कटई, तथा लोहे की कुल्हाडियाएँ एवं लोहे की कुदालें इस्तेमाल में आने लगीं।
5. महान उपलब्धियों : (i) लोहे के उन्नत औड़ार, (ii) भाधियाँ, (iii) जाना, (iv) कुमार का चாக, (v) तेल और शराब निकालना, (vi) धातुओं की ढलाई, (vii) गाड़ी और रथ (viii) जहाज-निर्माण [पृष्ठ 9 (6)] (ix) कलामक वासु-शालप, (x) शहर और क्लोन का निर्माण, (xi) होमर युग और सम्पूर्ण मिथिशकशास्त्र
इन उपलब्धियों के साथ ही, यूनानी तीसरी अवस्था – “सभ्यता” – में प्रवेश कर जाते हैं। संक्षेप में :
1. असभ्यता : मुख्य तौर पर तैयारशुदा प्राकृतिक उत्पादों के विनियोजन का काल; मानवीय बुद्धि-कुशलता मुख्यतः इस विनियोजन में सहायक सिद्ध होने वाले उपयोगी औज़रां का आविष्कार करती है।
2. बर्बरता : पशुपालन, कृषि एवं मानवीय अभमकर्ति द्वारा प्रकृति की उत्पादकता बढ़ाने के नये-नये तरीकों का जान हासिल करने का काल।
3. संभयता : प्राकृतिक उत्पादों के व्यापकतर उपयोग सीखने का, मैन्युफैकचरंग का, तथा कला का काल।
इस प्रकार, हमें, मानव-विकास की तीन मुख्य अवस्थाओं से आमतौर पर मेल खाते हुए परिवार के तीन मुख्य रूप मिलते हैं :
1. असंभ्यता के काल में : “यूथ विवाह”
2. बंबेता के काल में : युग परिवार
3. সংখ্যা কে কাল মে : একনিষ্ঠ বিবাহ কে সাথ-সাথ স্মিষ্ণার আর বেশ্যাবৃত্তি। যুগম পরিবার আর একনিষ্ঠ বিবাহ কে দরম্যান, বর্ষরো কী উচ্চতর অবস্থা মে, দিয়ে যেওর কে অপর পুরোনে কে সাসান আর বহুপতী-বিভাহ কে প্রবেশ।
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विवाह के दोष

खासतौर से एक दीर्घकालिक लगाव, दस मामलों में से नौ में, व्यभिचार का एक पंक्का प्रशिक्षण स्कूल होता है। (पृष्ठ 91)

समाजवादी क्रिति और विवाह संस्था

अब हम एक ऐसी सामाजिक क्रियां की ओर अग्रसर हो रहे हैं जिसके परिणामस्वरूप एकनिष्ठ विवाह का वर्तमान आर्थिक आधार उतने ही निश्चित रूप से मिट जायेगा, जितने निश्चित रूप से एकनिष्ठ विवाह के अनुपूर्ण का, वैश्यावृत्ति का आर्थिक आधार मिट जायेगा। एकनिष्ठ विवाह की प्रश्न एक व्यक्ति के - और वह भी एक पुरुष के - हाथों में बहुत-सा धन एकत्रित हो जाने के कारण और इस इच्छा के फलस्वरूप उत्पन्न हुई थी कि वह यह धन किसी दूसरे की संतान के लिए नहीं, केवल अपनी संतान के लिए छोड़ जाये। इस उद्देश्य के लिए स्ट्री की एकनिष्ठता आवश्यक थी, पुरुष की नहीं। इसलिए नारी की एकनिष्ठता से पुरुष के खुले या छिपे बहुतलील में कोई बाधा नहीं पड़ती थी। परन्तु आने वाली सामाजिक क्रिया स्थानी दायी द्यादा धन-सम्दा के अधिकतर भाग को - यानी उत्पादन के साधनों को - सामाजिक सम्पति बना देगी और ऐसा करके सम्पति की विरासत के बारे में इस सारी चिन्ता को अल्पतम कर देगी। पर एकनिष्ठ विवाह चूँकि आर्थिक कारणों से उत्पन्न हुआ था, इसलिए क्या इन कारणों के मिट जाने पर वह भी मिट जायेगा? (पृष्ठ 91)¹
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“भर दो घाলা है प्रिय मेरे, जो दूर करे आज विगत के दुख और 'आगत के भय को - कल? - क्यों, कल हो सकता है जो जाऊं सात हजार वर्षों के कल का अतीत।
यहाँ घने गाढ़ के नीचे, साथ में रोटी, मदिरा की सुराही, शायरी की किताब - और तुम गा रही बगल में मेरे इस निजन बीहड़ में! अब तो स्वर्ग बना यह निजन बीहड़ ही!
राज्य : राज्य की पूर्वोपेशा है बल प्रयोग की एक सार्वजनिक सता, जो अपने सदस्यों के सम्पूर्ण निकाय से पृथक हो चुकी हो।

राज्य की उपतिल :

….पुराने ज्ञान में कृषीलों के बीच होने वाले युद्धों द्वारा भ्रष्ट होते हुए नया रूप धारण - जीविकोपार्जन के साथन के रूप में होर, दास और धन-दौलत लूटने के लिए जमीन और पानी के रास्ते से बाकायदा धाव; संक्षेप में, धन-दौलत को दुनिया में सबसे बड़ी चीज़ समझा जाने लगा, उसे प्रशंसा और आदर की दृष्टि से देखा जाने लगा और पुराने गोर्-समाज की संस्थाओं और प्रधानों को भ्रष्ट किया जाने लगा ताकि धन-दौलत को जृबदर्स्सी लूटना उचित ठहराया जा सके। अब केवल एक चीज़ दरकार थी : ऐसी संस्था की, जो न केवल अलग-अलग व्यक्तियों की नयी हासिल की हुई सम्पति को गोर्-खवस्था की पुरानी समुद्रियिक परमराओं से बचा सके, जो निजी स्वामिल को, जिसकी पहले अधिक प्रतिष्ठा नहीं थी, न केवल पवित्र क्रार दे और इस पवित्रता को मानवसमाज का चरम लक्ष्य घोषित कर दे, बल्कि जो सम्पति प्राप्त करने, और इसलिए धन-दौलत को लगातार बढ़ाते रहने के नये और विकसित होते हुए तरीकों पर सार्वजनिक मान्नाटी की मुहर भी लगा दे; ऐसी संस्था की, जो न केवल समाज के नवजात वर्ग-विभाजन को, बल्कि सम्पतिवान वर्ग द्वारा सम्पतिहीन वर्ग के शोषण किये जाने के अधिकार को और सम्पतिहीन वर्ग पर सम्पतिवान वर्ग के शासन को भी स्थायी बना दे। और यह संस्था भी आ पहुँची। राज्य का आविषकार हुआ। एक अच्छी सरकार की परिभाषा : "अच्छी सरकार स्व-शासन का विकल्प कभी नहीं हो सकती।" “हमें यकीन है कि सरकार का केवल एक ही रूप है, चाहे इसे जिस नाम से भी पुकारा जाये, जिसमें अन्तम नियनत्रण जनता के हाथों में होता है।” 핵팁 : “핵팁은
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परोपकारी निर्रुकुशा : माँण्टेयू-चेम्स्फोड्२ ने ब्रिटिश सरकार को एक 'परोपकारी निर्रुकुशा' कहा है और, ब्रिटिश लेबर पार्टी के साम्राज्यवादी नेता, रैम्जे मैक्डोनाल्ड³ के अनुसार “एक 'परोपकारी निर्रुकुशा' द्वारा किसी देश पर शासन करने के सभी प्रयासों में, शासितों को कुचल डाला जाता है। वे व्यवहारशील नागरिक नहीं, आजाकारी प्रजा बन जाते हैं। उनका साहित्य, उनकी कला, उनकी आलोचक अभिभ्यक्ति मर जाती है।” भारत सरकार : भारत के प्रभारी विदेशमन्त्री, आनरेबल एस. माँपटेग्यू ने हाउस ऑफ़ कामस में 1917 में कहा “भारत सरकार, आधुनिक उदेश्यों के लिए किसी भी काम लायक होने की दृष्टि से बेहद जड, बेहद निर्मम, बेहद आदिम, और बेहद दिक्यानूस है। भारत सरकार असमथनीय है।" भारत में ब्रिटिश शासन :
और सबसे अनैतिक प्रणाली - एक राष्ट्र द्वारा दूसरे का शोषण - है।" आजूदी और अंग्रेज़ी लोग "अंग्रेज़ लोग आज़ादी को स्वयं अपनी खूचित ही घाट करते हैं। वे अन्याय की सभी कार्बोडियों से घृणा करते हैं, सिवाय उनके जो वे स्वयं करते हैं। वे ऐसे आजादी-प्रेमी लोग है कि कांगो में दखलअन्दाजी करते हैं, और बेलजयनो पर “शर्म-शर्म” चில்लाते हैं। लेकिन वे भूल जाते हैं कि उनकी एडिया भारत की गरदन पर है।"
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भौड़ का प्रतिशोध

...“अब आइये हम देखें कि कैसे लोग इस ढंग से सजा देने के विचार के कियल हुए।
“वे इसे उन्हीं सरकारों से सीखते हैं जिनके अन्तर्गत वे जी रहे होते हैं, और बदले में वही सज्जा देते हैं जिसको भोगने के वे आदि हो चुके होते हैं। सुली पर टींग सिर, जो बर्षों तक टेम्मल बार के ऊपर लगे रहे, पेरिस में सुली पर टींग जाने वाले सिरों के दूर्य की भयावहता से तनिक भी भिन्न नहीं थे; फिर भी अंग्रेज़्य सरकार ने वही किया। शायद कहा जा सकता है कि इससे आदमी को कोई खास फर्क नहीं पड़ता कि मरने के बाद उसके साथ क्या किया जाता है; लेकिन जीवितों को इससे काफ़ी फर्क पड़ता है, इससे या तो उनकी भावनाएँ विदीण हो जाती हैं या उनके दिल पत्थर हो जाते हैं, और दोनों ही सुर्तों में, यह उन्हें शिशित करता है कि जब सता उनके हाथ में आये तो वे कैसे सजा दे।
“तब कुल्हाड़ी से जड़ पर ही प्रहार करो, और सरकारों को मानवता सिखा दो। ये उनकी खूखार सज्जाएँ ही हैं जो मानवजित को भ्रष्ट करती हैं…। जनसामान्य के सामने प्रदिशित इन क्रूर दृश्यों का प्रभाव संवेदनशीलता को खुम्म करने या प्रतिशोध भड़काने के रूप में सामने आता है, तथा विवेक के बजाय आतंक के
द्वारा लोगों पर शासन करने की इसी निकृष्ट और झूठी धारणा के जरिये वे मिसाल बनते हैं।"
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: مूलات: उससे नहीं, बिलक कई सही पहले स्थापित आर्तिभक्यवस्था से पैदा हुए थे, और इतनी गहराई में जड़ जमा चुके थे कि ख्लम नहीं किये जा सके थे, तथा परजीवियों एवं लुटेरों का गन्दगी से भरा हुआ अस्तबल भी इतने घृणासद रूप से गन्दा था कि एक सम्पूर्ण क्रानित ही उसे साफ़ कर सकती थी। जब कोई काम करना जूखरी हो जाता है, तो उसे दत-चित होकर करना चाहिए, या उसे करने की कोशिश ही नहीं करनी चाहिए...। राजा और राजतन्व दो अलग-अलग भिन्न चीज़ாँ थीं; और पूर्वोक्त (यानी राजा - स.) या उसके सिद्धांतों के ही विरोध में यह विद्रोह हुआ और क्रान्तिक की गयी।
नौ बटा दो के लिए सभी उन्नीस की घात दो प्राकृतिक और नागरिक अधिकार अधिकार मनुष्य ने समाज में प्रवेश इसलिए नहीं किया कि वह पहले से भी बदतर हो जाये, बल्कि इसलिए कि उसके अधिकार पहले से बेहतर ढंग से सुरक्षित हों। उसके प्राकृतिक अधिकार ही उसके सभी नागरिक अधिकारों की आधारशलाह हैं।
- प्राकृतिक अधिकार वे हैं जो मनुष्य के जिने के अधिकार से सम्बन्धित हैं (बौद्धिक-मानसिक आदि)।
- नागरिक अधिकार वे हैं जो मनुष्य के समाज का एक सदस्य होने से सम्बन्धित है। - (पृष्ठ 44)³ राजा की एक व्यक्त करने के भरण-पोषण के लिए, किसी देश के तनखवाह : सार्वजनिक टैक्सो में से, दस लाख स्ट्रींग सालाना देने की बात करना अमानवीय है, जबकि हजारों लोग जो इसमें योगदान करने के लिए मजबूर किये जाते हैं, अभाव से ब्रस्त और बदहाली से जूझरहे हैं। सरकार जेलों और राजमहलों के बीच, या कंगाली और शान-शौकृत के बीच किसी समझती है के रूप में नहीं होती; यह इसलिए नहीं गठित की जाती कि ज़ुक्ततमन्द से उसकी दमड़ी भी लूट ली जाये और खस्ताहालों की दुर्दा और बढ़ा दी जाये।

"मुझे आजादी दो या मौत"

नौ बटा दो गुना दो सौ चार की घात एक
"...मामले को हलका बनाना बेकार है, महाशय। शरिक लोग शासित, शासित चில்ला सकते हैं - लेकिन कोई शासित नहीं है। युद्ध तो वास्तव में शुरू ही हो चुका है। अब अगला डर्शवात जो उत्तर से उठकर...हमारे कानों तक पहुँच रहा है, गुंजायमान हिथ्यायों की टकराहटों का है। हमारे बन्धु-बान्धव तो पहले ही से लड़ाई के मैदान में हैं। हम यहाँ बेकार क्यों खड़े हैं? आखिर शरिक लोग चाहते क्या हैं? वे क्या करेंगे? क्या जीवन इतना प्यारा या शासित इतनी मीटी है कि उसे बेडियों और गुलामी की कीमत पर भी ख्रीद लिया जाये?

मजदूर का अधिकार :

'जो कोई भी कितन्य श्रम से कोई चीज़ पैदा करता है उसे यह बताने के लिए किसी खुदाई पेग्गम की ज़्छरत नहीं कि पैदा की गयी चीज़ पर उसी का अधिकार है।”
900 17 (14)
“लोगों के सिर कलम कर दिये जाने को तो हम भयंकर मानते हैं, पर हमं जीवन-पयंत बरकरार रहने वाली मृत्यु की उस भयंकरता को देखना नहीं सिक्खाया गया है जो ग्रिबी और अत्याचार द्वारा ख्यापक आबादी पर थोप दी गयी है।” - मार्क ट्वेन¹
“...साहित्य के चयन में अराज्कतावादियों और विद्रोह अराज्कतावादियों में दीक्षणे वालों को भी स्थान मिल जाता है; और यदि उसकी कुछ चीज़ पठातक को महज आक्रोश का उद्गार ही लेंगे, तो भी मैं कहना चाहूगा कि इसके लिए साहित्य के समर्पित चयनकर्ता को दोष नहीं देना चाहिए, यहाँ तक कि रचनाकार को भी दोष नहीं देना चाहिए - उसे (यानी पाठक को - स.) को स्वर्ण अपनेआप को ही दोष देना चाहिए, कि उसने उन परिस्थितियों की मौजूदारी में चुपी साध ली है, जिनके चलते उसके देश-समाज के लोग पागालपन और निराशा की चरम सीमा पर जा पहुँचे हैं।”
बूढ़ा मजदूर : “...वह (बेरोजगार बूढ़ा मजदूर) उम्र से, प्रकृति से, और
φ0 18 (15)
“...और हम लोग, जिन्होंने इस काम को अंजाम देने का बिड़ा उठाया, इस दुनिया में कुज़ात ही रहे। एक अन्धि कृस्मत, एक विराट निम्म तन्व ने काट-छॉटकर हमारे अस्तव का दांचा निधिरात कर दिया। हम उस वक्त तिरस्कृत हुए, जब हम सबसे अधिक उपयोगी थे, हम
1. असली नाम सैमुअल लैग्हॉनर् क्लीमेंस (1835-1910) : मशहूर अमेरिकी उपन्यासकार और व्याव्यकार
2. मशहूए अमेरिकी उपन्यासकार और समाजवादी-सुधारक (1878-1968)। क्रौड फ़ॉर्जिस्टर सामाजिक प्रतिरोध के साहित्य का एक अनुता संकलन है जो सिंक्लोयर के सम्पादन में 1915 में प्रकाशित हुआ था। आगे कई पृष्ठों तक के नोट्स इसी पुस्तक से लिले गये हैं।
3. अंग्रेज़ प्रकृतिवादी और उपन्यासकार (1848-1887)

50 / शहरीदुआजम की जेल नोटबुक

उस वक्त दुलकार दिया गया, जब हमारी ज्स्टरत नहीं थी, और हमें उस वक्त भुला दिया गया, जब हमारे ऊपर विपतियों का पहाड़ टूटा हुआ था। हमें बीहड्-बंजर साफ करने के लिए, उसकी सारी आदिम भयंकरताओं को दूर करने के लिए, तथा उसके विश्व-पुरातन अवरोंधों को छिन्न-भिन्न कर डालने के लिए भेज दिया जाता। हम जहाँ भी काम करते, वहाँ एक दिन एक नया शहर जन्म ले लेता; और जब यह जन्म ले ही रहा होता, तब यदि हममें से कोई वहाँ चला जाता, तो उसे 'बिना निश्चित पत का आदमी' कहकर पकड़ लिया जाता और सिरफिरा-आवारा कहकर उस पर मुकदमा चलाया जाता।"
सितंकता : “नैतिकता और धर्म उस व्यक्तिके के लिए महज शब्दभर
है जो आजीविका का जुगाड करने के लिए गन्दे नाले में मछली
मारता है, और जाড় की रात में कड़ाके की शीतलहरी से बचने के लिए सडको पर पीणों के पीछे पनाह लेता है।"
भूख : “शासक के लिए उचित यही है कि उसके शासन में कोई भी आदमी
उण्ड और भूख से पीडित न रहे। आदमी के पास जब जीने के मामूली साधन भी नहीं रहते, तो वह अपने नैतिक सतर को बनाये नहीं रख सकता।"

20019(16)

मुंबिक
अरे मनुष्यो! करते हो गवाँवित्त कि तुम संतति हो मुक्त और वीर पितरों की, पर यदि लेता साँस एक भी दास धरा पर, तो क्या सचमुच तुम हो मुक्त और वीर?
यदि तुमको अहंसासे नहीं जब बेड़ी पीड़ा देती एक भाई को, तो क्या सचमुच तुम नहीं अधम दास जो क्राबिल नहीं मुक्त होने के?
क्या है वह सच्ची मुक्ति, जो तोड़

qσσ 20 (17)

भरे पड़े हैं शुष्य और निम्ल आभा के रल घनेर सागर के गहन अगाध गहर में, खिलते हैं बहुतेरे फूल अनदेखे लज्जारण होते, और लुटा देते अपनी सुगन्ध निर्जन बयार में घात दो आविक्षकार : अब तक यह सवाल क्याम है कि क्या अब तक किये गये सारे के सारे आविक्षकार किसी भी आदमी की रोज्मारी की कड़ी महाकृत भरी जिन्दगी को आसान बना पाये हैं। भीख : “धरती पर उस आदमी से अधिक घृणास्वरूप और
स्वतंत्रता
वे मृत शरीर नवयुवकों के, वे शहीद जो झूल गये फाँसी के फन्दे से - वे दिल जो छलनी हो गये भूरे सीसे से, सर्द और निषन्द जो वे लगते हैं, जीवित हैं और कहीं अबाधित ओज के साथ। वे जीवित हैं अन्य युवा-जन में, ओ राजाओं। वे जीवित हैं अन्य बन्धु-जन में, फिर से तुम्हे चुनौती देने को तैयार। वे पवित्र हो गये मृत्यु से - शिश्ित और समुन्नात।

φσ 21 (18)

दूफ्न न होते आजादी पर मरने वाले पैदा करते हैं मुकित-बीज, फिर और बीज पैदा करने को। जिसे ले जाती दूर हवा और फिर बोती है और जिसे पोषित करते हैं वर्षी जल और हिम। देहमुक्त जो हुई आत्मा उसे न कर सकते विच्छन अस्त्र-शस्त्र अत्याचारी के बल्िक हो अजेय रमती धरती पर, मरमर करती, बितयाती, चौकस करती। मुक्त चितनत : "यदि कोई ऐसी चीज़ हो जो मुक्त चितनत को बरदाशत न कर सके, तो वह भाड में जाये।" “राज्य दृफा हो जाये! में ऐसी क्रान्तिक में भाग लूगा। राज्य की समूची अवधारणा का मूलोच्छेदन कर दो, मुक्त चयन और आतिमक बन्धुता को ही किसी एकता की एकमात्र सर्विधिक महत्वपूर्ण शर्त होने की घोषणा करो, और तभी तुम एक ऐसी आजादी की शुरुआत करोगे जिसकी कोई साந்தकता होगी।"
- हेनिक इम्सन¹, पृष्ठ 273 उत्याड़न : “उत्पोड़न निश्चय ही एक समझदार आदमी को पागल बना देता है।”
- (पृष्ठ 278)²

22 (19)

शहीद : जो आदमी अपने साथी मनुष्यों द्वारा किये जाने वाले अत्याचार का विरोध करने के प्रयास में, अपनी जान पर खेलते हुए, अपनी सारी जिन्दरी निखार कर देता है, वह अत्याचार और अत्याय के सांकरिय और निष्कय समर्थकों की तुलना में एक सनत है, भले ही उसके विरोध से उसकी अपनी जिन्दरी के साथ-साथ अन्य जिन्दीयां भी क्यां न नष्ट हो जाती हैं। ऐसे न्यक्ति पर पहला पत्थर वही मारने का हकदार हो सकता है जिसने कभी कोई पाप न किया हो। (पृष्ठ 287)³ जब तक कोई निचला वर्ग है, मैं उसमें ही हूँ। निचला वर्ग : जब तक कोई अपराधी तत्व है, मै उसमें ही हूँ। जब तक कोई जेल में केंदर है, मैं आजाद नहीं हूँ।
यूजीन बी. डेम्स घात ४ (१४४)
सबके विरुद्ध एक वर्तमान सामाजिक व्यवस्था एक हास्यासपद तत्त्व है, जिसमें सम्पूर्ण के अंश, इस सम्पूर्ण के विरुद्ध एक टकराव में सिक्रय हैं। हम देखते हैं कि समाज का प्रत्येक वर्ग, সার্বনিক হিত কে রখান পর হর তরহ সে, অপনে নিজী হিত কে আগে রখতে হুপ, দুসরে বর্ণা কে দুশ্ণয কী কীমত পর, অপনে হিত কী কামনা করতা হী। বকীল, খ্রাসতীর সে ধনিকো কে বীচ, মুকচমেবাজী আর মুকচমো কী কামনা করতা হই; ডাঁকতর বীমারি কী কামনা করতা হই। (যদি হর কৌই বিনা বীমারি কে মরনে লগে তো যে (ডাঁকতর) বীসে হী বরবাদ হো জযিগে, জেই যদি সোর ইগ্রড বাতনীত সে হল হোন লগে তো (বকীল) হো জযিগে। সীনক লড়াই চাহতা হই, তাকি ডসকে আধে সাথী মর জযি আর ডসকী তরকুণি সুনিশিচত হো জযি; অন্যপেন্ট করানে ভালা কণ্ণ-দকুন কী কামনা করতা হই; ছড়ারের আর জযিগের, অন্যজ কী কীমত দুণীয় যা লিগুদী করতে কিএ, অকাল কাহতে হই, বাস্তকার, বড়ই, রজণীয় আগজনীচ হই, তাকি সৈকউ ঘর জলকর থমম হো জযি আর ডসকী অপনী-অপনী সাব্যাজী আ কারোবার চলতা রই। क्यू सिग्मा 23 ब्रैकेट में 20 - (यह 202)
नया सिद्धांत :
समाज हत्या, व्योभचार या ठीगों को नज़रअन्दाज कर सकता है;
पर वह एक नये सिद्धांत के प्रचार को कभी माफ़ नहीं करता।
- फ्रेडरिक हैरिसन¹ (पृष्ठ 327)
आजादी आजादी के बिरवे का समय-समय पर देशभक्तों और का बिरवा : अत्याचारियों के खून से सींचा जाना आवश्यक है। यही इसकी कुदरती खाद है।
- टॉमस जेफरसन² (पृष्ठ 332)
शिक्षा से शहीद :
अब कोई भले ही यह कहे कि उसने भारी गूलती की, परन्तु यदि उनकी गूलती दस गुना भी अधिक बड़ी होती, तो भी इसे उसकी कुबिनी मानव-सृति पटल से पोंछ ही डालेगी...
གིས་ཁམས་ཕྱོགས་ नहीं थे, भ्रष्ट नहीं थे, खून के प्यासे नहीं थे, संगदिल नहीं थे, अपराधी नहीं थे, और न ही स्वाधी या पागल थे। तब वह क्या चीज़ थी जिसने इतने तीखे और गहरे प्रतिवाद को उकसावा दिया…?
किसी ने भी इस सरल-सौधी बात पर गौर नहीं किया कि मनुष अपनेआप को किसी विरोध के लिए बिना इस विश्वास के एकजुट नहीं करते कि कोई न कोई चीज ऐसी है जिसका उन्हें विरोध करना है और कि किसी भी संगठित समाज में व्यापक विरोध एक ऐसी चीज है जो गहरी छानबीन की दरकार रखती है।

2024(21)

क्रानిटकारी की वसियत
“में अपने दोस्टी से यह भी कहना चाहूगा कि वे मेरे बारे में कम से कम चर्च करेंगे या बिल्कुल ही चर्नी नहीं करेंगे, क्योंकि जब आदमी की तारीफ होने लगती है तो उसे इन्सान के बजाय देवप्रतिमा-सा बना दिया जाता है और यह मानवजित के भविष्य के लिए बहुत बुरी बात है…। सिर्फ कर्मों पर ही गौर करना चाहिए, उन्हीं की तारीफ या निन्दा होनी चाहिए, चाहे वे किसी के द्वारा किये गये हैं। अगर लोगों को इनसे सार्वजिनक हित के लिए प्रेरणा मिलती दिखायी दे, तो वे इनकी तारीफ कर सकते हैं, लेकिन अगर ये सामान्य हित के लिए हािनकर लगें, तो वे इनकी निन्दा भी कर सकते हैं, तिकில் फिर इनकी पुनरावृत्ति न हो सके।
“में चाहूगा कि किसी भी अवसर पर, मेरी कृढ़ के निकट या दूर, किसी भी किसम के राजनीतिक या धार्मिक प्रदर्शन न किये जायं, क्योंकि मैं समझता हूँ कि मेरे हुए के लिए खर्च किये जाने वाले समय का बेहतर इस्तेमाल उन लोगों की जीवन-दशाओं को सुधारने में किया जा सकता है, जिनमें से बहुतों को इसकी भारी आवश्यकता है।”
दान : “मेरे पीछे आओ”, इसा मसोह ने धनी युवक को कहा।
लेकिन अपने स्वास्थ्य में लगे रहना और अपनी कुछ दौलत को दान-कर्म में लगाना तुलनात्मक रूप से आसान था। परोपकार हरेके युग का चलने रहा है। दान ग्रिबी के विद्रोही तेवर को नष्ट कर देता है। अत: परोपकारी धनी आदमी अपने सरीखे दैलतमन्दों का ही हितैषी होता है, और उन्हीं की एहसानमन्दी महसूम करता है; उसके लिए सभ्य समाज के सारे दरावज्य खुले होते हैं। इसीलिए उन्होंने (यानी ईसा मसीह ने - स.) भिश्ता-दान को सामाजिक किया के गहरे घावों की मरहम-पट्टी के रूप में स्वीकार्यता देने से इन्कार कर दिया...। परोपकार को न्याय के एक विकलैप के रूप में उन्होंने कर्तार तैरजीह नहीं दी।
[पृष्ठ 25 (22) पत्र जाओ]
- ดรน ดิชาอริมสุขาพันธุ์ ๑ - ๑ ๒
मुंबक-युद्ध
फैजों की ताकत एक दिखायी देने वाली चीज है सुस्पष्ट, और देश काल में आब्द, लेकिन कोन खोज सकता उस शक्ति की सीमाओं को जिसे एक बहादुर जनता ही प्रकट कर सकती है या चाहे तो, छिपा सकती है - मुक्ति-युद्ध में। भड्क उठे न्यायसंगत प्रतिरोध का - कोई पाँव पीछा नहीं कर सकता, कोई ऑख नहीं देख सकती उस जानलेवा जगह को, यह ताकत चাই तो उड़ान भरे पंख लगाकर प्रचण्ड वायु की भाँति, या सोये मन्द वायु की भाँति अपनी डरावनी गुफाओं में - साल दर साल फैलाती मिट्टी से जनमे इस विचार को - निकट और दूर, नहीं बॉध सकती कोई भी कला - इस सूक्ष्म ताकत का जो फूटती ज़मीन से जलधारा की भाँति, और पा लेती हर कोने में एक होंठ जो इसकी क्दर करे।

2026 (23)

लाड्ट ब्रिगेड का धावा आधा लीग आधा लीग, आधा लीग और, मौत की घाटी में बढ़ चले छ: सौ वीरा। 'बढ़ चले लाइट ब्रिंगेड! भर लो बन्दूको!' वह बोला, मौत की घाटी में बढ़ चले छ: सौ वीरा। 'बेद चले लाइट ब्रिंगेड!' क्या कोई था घबराया? नहीं, गोकि मालूम था सैनिकों को किसी न कर दी थी भारी भूल, उनका काम नहीं था उत्तर देना, उनका काम नहीं था सवाल पूछना, उन्हें था बस लडना और मर जाना मौत की घाटी में बढ़ चले छ: सौ वीरा। तोप उनके दायर बाजू, तोप उनके बायं बाजू, तोप उनके ठीक सामने, दगति और गरजती, गोलाबारी की आँधी में, बढ़ चले निडर वे सीधे मौत के जबड़ों के भीतर,
नर्क के मुँह के भीतर, बढ़ चले छः सौ वीर। चमकाते सब नंगी तलवारों, हवा में जब उनको लहरण काटते जाते तोर्पिचयों को, हमला करते सेना पर, जबकि सारी दुनिया चकराती,
पिल पड़े तोप के धुएँ में बढ़ चले तोड़कर मोचि कजूआक और ह्सरी सिंपाही खाकर तलवार की चोट चिन्न-भिन्न हो जाते। तोप उनके दाये बाजू, तोप उनके बायं बाजू, तोप उनके पीछे से, दगती और गरजती, गोलाबारी की आँधी में, भले गिरे अश्व और नायक फिर भी वे इतना अच्छा जुझे फिर होकर मौत के जबड़ों से लौटे वे नर्क के मुँह से, जो भी थे बचे रह गये छः सौ में से बचे रह गये। कब हो सकता धृमिल उनका यश? अरे वह उनकी विकट चढ़ाई! सारी दुनिया चकराती। आदर, उस हमले को आदर, लाइट ब्रिगेड को! ग्रंघ छः सौ वीरों को।

دل سکتا ہے اس کے زیر اردن کے حملے کے شروع سے غیر ریاضہ کے شروع سے غیر ریاضہ کے شروع سے غیر ریا

ہے ــ یہ دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکیوں سے دھمکاری

नोट : पृष्ठ 27 (24) के अन्त में ये तीन शो'र उर्दू में लिखे हुए हैं। ये किस शायर के हैं, यह स्पष्ट नहीं है। नीचे ये शो'र देवनागरी में प्रस्तुत हैं :
दिल दे तू इस मिज़ाज का परवर्दिगर दे जो गम की घड़ी को भी खुशी से गुजार दे। सजा कर मथ्यत-ए-उममीद नाकामी के फूलों से किसी हमदद न रख दी मेरे टूटे हुए दिल में। छेड़ ना ऐ फ़रिश्ते! तू ज़िके गमे-जानाँ क्यों याद दिलाते हो भूला हुआ अफसान।

qσ 28 (25)

जन्मसिद्ध अधिकार :
हम बेटे हैं उन पितरों के जिन्होंने मात दी थी तछ्तो-ताज और पुरोहितों' के अत्याचार को; उन्होंने दी थी चुनौती मैदान-जंग में और फाँसी के तछ्ते से अपने जन्मसिद्ध अधिकार के लिए - हम भी यही करेंगे!
लक्ष्य की महिमा :
अरे! बेकार की नफ़रत के लिए नहीं, न सम्मान के लिए, न ही अपनी शाबासी के लिए बल्क लक्ष्य की महिमा के लिए, किया जो तुमने, भुलाया नहीं जायेगा।
आत्मा की अमरता :
यदि तुम्हे कभी एक ऐसा आदमी मिल जाये जो अमरता में विश्वास रखता हो, तो बस समझ लो कि अब तुम्हारी कोई भी कामना शेष नहीं रह जायेगी; तुम उसकी सारी की सारी चीज़ ले सकते हो - अगर तुम चाहो तो जीते-जी उसकी खाल उतार सकते हो - और वह इसे एकदम खुशी-खुशी उतार लेने देगा।
स्वाद में अत्ताचारी
एक अत्याचारी शासक के लिए जस्ति है कि वह ज़ाहिरा तौर पर धर्म में असाधारण आस्था दिखाये। जनता एक ऐसे शासक के दुर्यंवहार के प्रति कम सचेत होती है, जिसे वह ईश्वर से डरने वाला और पवित्र मानती है। दूसरे, वह आसानी से उसके विरोध में भी नहीं जाती, क्योंकि उसे विश्वास रहता है कि देवता भी शासक के साथ है।¹

qσσ 29 (26)

सैनिक और चिन्तन :
“यदि मेरे सैनिक सोचना शुक्त कर दें, तब तो उनमें से कोई भी सेना में नहीं रहेगा।"
मरे जो सर्वश्रेष्ठ वीर :
मारे गये हैं सर्वश्रेष्ठ वीर। द्फ़ना दिये गये वे
चुपचाप, एक निजन भूमि में,
कोई ऑसू नहीं बहे उन पर
अजनबी हाथों ने उन्हें पहुँचा दिया कृत्र में,
कोई सलीब नहीं, कोई घेरा नहीं, कोई समाधि-लेख नहीं
जो बता सके उनके गौरवशाली नाम।
घास उग रही है उन पर, एक दुर्बल पती
सुकी हुई, जानती है इस रहस्य को,
बस एकमात्र साक्षी थी उफनती लहरे,
जो प्रचण्ड आघात करती है तट पर,
लेकिन वे प्रचण्ड लहरे भी नहीं ले जा सकती
अलविदा के संदेश
कार्यकार :
उनके सुदूर घर तक।
“तारे नहीं, देश नहीं, काल नहीं, ठहराव नहीं, बदलाव नहीं, नेकी नहीं, बदी नहीं,
बल्कि खामोशी, और एक निष्कर्षता में जो न जीवन की, न मृत्यु की।

qσσ 30 (27)

आरोप-सिद्ध के बाद :
अपनी सजा सुन लेने के तुरंत बाद के धर्मा में सजा के लिए अभिशेषत व्यक्त का दमाग कई मायनों में उस आदमी के दमाग जैसा हो जाता है जो मौत के कणार पर झूल रहा होता है। चुपचाप, और मानो अन्त:प्रिंत होकर, अब वह उन सभी चीजों से विरक्त हो जाता है जिन्हें उसे छोड़ जाना है, और वह, दूढ़भाव से, अपने सामने देखता हुआ, उस सच्चाई के प्रति पूरी तरह सचेत हो जाता है, जो अपरिहारित: चितत होने वाली होती है।
कैदें :
"घुटन होती है इस नीची, गन्दी छत के नीचे;
निचुड़ती जा रही है मेरी ताकत का साल दर साल;
उत्पीडित करते हैं मुझे - यह पथरिला फर्श,
यह लौह-जंजीरों से बँधी मेज
यह खाद, यह कुसी, बँधी हुई जंजीर से
दीवारों के साथ, ताबूत के पत्रों की भाँति,
इस चिरस्थायी, मूक, मुदि खामोशी में
खुद को बस एक लाश ही समझा जा सकता है।"
1. प्रसिद्ध अंग्रेज़ी कवि लॉर्ड बायरन (1788-1824) की इस कविता में जेनेवा श्रील के पास चिलोन के फिले में केँ एक देशभक्त फ्रांस का दो बोनिवार के जेल-जीवन का वर्णन किया गया है।
2. निकोलाई अलेक्सान्द मोरेज़ो (1854-1946) : रुसी क्रांतिकारी, लेखक, कवि और बैशिक; 1880 में लदन में मार्स से मुलाकात और मोनिफेस्टो ऑफ द कम्पुनिस्ट पार्टी के रुसी में अनुवाद का जिम्मा, 1875 से 1878 तक, तथा 1881 से 1905 तक, करीब 25 वर्ष तक जोल की सजा के दौरान, रसायन विज्ञान, भूतिकी, गणित और खगोल विज्ञान पर 28 पुस्तकों के अलावा कविताएँ और कहानियों भी लिखीं। नंगी दीवारों, जेल के ख्यालात, कितने ऑधियारे और उदास हो तुम, कितना मुशकल है कि बन्दी हो निष्फ्य रहना और देखना सपने आजादी के दिनों के।

qσσ 31 (28)

ہے ٹی رینگ کی وشی اور رینگ شروع

1. مہاراج پرچم والی

“हर चीज यहाँ है कितनी खामोश, बेजान, फीकी वहाँ गुजर जाते हैं यों ही, कुछ पता नहीं चलता, हृषते और दिन कटते हैं बड़ी मुश्कल से, देता है सिर्फ बोरियत इनका यह सिलसला। लम्बी केंद से हमारे ख्याल हो जाते हैं मनहूस;
भारీपन महसूस होता है हमारी हड्ड्यों में;
यन्णा की पीड़ा से, लम्बे लगते हैं अन्तहिन चार डग चौड़ी इस कोठरी में। हमें जीना है पूरी तरह अपने हमसफ़र भाइयों के लिए, हमें देना होगा अपना सर्वस्वात्व उनके लिए, और उन्होंने की खाँतार लड़ना होगा बदनसीबी के खिलाफ!
1. मूल में उर्दू में यह शेर'र लिखा हुआ है : तुझे जबह करने की खुशी, मुझे मरने का शोक, मेरी भी मर्जी वही है, जो मेरे सैयाद की है।
आये मुझे आजाद करने :
आखिर लोग आये मुझे आजाद करने;
मैने न पूछा क्यां और न सोचा कहां,
मेरे लिए तो कुल मिलाकर एक ही था,
बँधे रहना या बन्धनमुक्त होना,
मैन निराशा से घार करना सीख लिया था,
और इस तरह अन्तत: जब वे प्रकट हुए,
और उतार डाले मेरे सारे बन्धन
ये भारी दीवार बन चुकी थी मेरे लिए
एक संयास-आश्रम - पूरी तरह अपना।
q50 32 (29)
(द प्रिज़न ऑफ चिलोन)
“और हम सम्मानित किये गये हैं एक मिशन देकर! हमने एक कितन स्कूल पास किया, लेकिन हासिल कर लिया ऊँचा जाना
निर्विसन, जेल, और मुशिकल दिनों की बदौलत हम जान गये हैं और क्रीमत समझते हैं सच्चाई और आजांकी की दुनिया की।" (प्रिज़नर ऑफ़ श्लुसेलबर्ग)¹

एक शिशु की मृत्यु और पीड़ा

'एक बच्चा पैदा हुआ। उसने सचेत तौर पर न तो कोई बुरा काम किया, न अच्छा काम किया। वह बीमार पड़ गया, वह लम्बे समय तक काफ़ी तकलीफेजेलता रहा, तब तक जब तक कि उस असहद वेदना से मर नहीं गया। क्यों? क्या वजह थी? दार्शनिक के लिए यह एक शाश्वत पहली है। '²
2. स्वेत अज्ञात

एक क्रिकारी के दीमाग्ग की बनावट :

“जो व्यक्त कभी भी ईसा मसीह के जीवन से प्रभावित रहते हैं, जिन्होंने एक आदर्श के नाम पर पीड़ा, अपमान और मृत्यु का वरण किया; जिसने उन्हें कभी एक आदर्श तथा उनके जीवन को अनासकत प्रेम की प्रतिमूर्ति माना है - वही उस क्रान्तिकारी के दिमाग् की बनावट को समझ सकता है जिसे सजा दी गयी है, और जनता की आजादी के लिए काम करने के जुम में जीवित ही मकबरे में डाल दिया गया है।” (बेरा एन. फिंगनर)

अधिकार :

अधिकार माँगों नहीं। बढ़कर ले लो। और उन्हें किसी को भी तुम्हे देने मत दो। यदि मुक्त में तुम्हे कोई अधिकार दिया जाता है तो समझो कि उसमें कोई न कोई राज ज्ज़र है। ज्यादा सम्भावना यही है कि किसी ग्लत बात को उलट दिया गया है।
q80 33 (30)

कोई दुश्मन नहीं?

तुम कहते हो, तुम्हारा कोई दुश्मन नहीं?
अफसोस! मेरे दोस्, इस शोखी में दम नहीं,
जो शामिल होता है फ़र्ज़ की लड़ाई में,
जिसे बहादुर लड़ते ही है
उसके दुश्मन होते ही हैं। अगर नहीं है तुम्हारे
तो वह काम ही तुக்க है जो तुमने किया है।
तुमने किसी गदार के कूलहे पर वार नहीं किया है,
तुमने झूठी कसमें खाने वाले होठ से प्याला नहीं कीना है,
तुमने कभी किसी गलती को ठीक नहीं किया है,
तुम कार्य ही बने रहे लड़ाई में।

बाल-श्रम :

गौर्य के बच्चा गौर्य के दाना नहीं चुनाता, चूणा முగ्गி को चुगा नहीं करता, बिलली का बच्चा बिलली के लिए चूहे नहीं मारता - यह महानता तो सिर्फ मनुष्य को नसीब है। हम सबसे बुद्धिमान, सबसे बलवान नस्ल हैं - हम क्राबले तारीफ हैं। एकमात्र जिन्दा प्राणी जो जीता है अपने बच्चों की महत्व पर।
20034(31)

कोई वर्ग नहीं! कोई समझोता नहीं!!

سمازهای شدندان که دیران एक عسای وخت و نهایه، اثر مسخن به، وخ وخت و نهایه، وخ وخت و نهای
ηο 35 (32)

पूजीवाद की बर्बिद्यां

ऑस्ट्रेलिया के बारे में आर्थिक अनुमान, थिओडोर हर्ट्ज़का² (1886) द्वारा :
- प्रत्येक परिवार = 40 वर्ग फुट में 5 कमरों वाला मकान 50 वर्षों तक चलने लायक।³
- मजदूरी की काम करने की उप्र = 16-50 (वर्ष - स.)
- इस प्रकार हमारे पास है 5,000,000 (मजदूर - स.)
- 615,000 मजदूरों का श्रम = श्रम का 12.3 प्रतिशत 22,000,000 लोगों का भोजन पैदा करने के लिए पयरीत है।
- यातायात-परिवहन की श्रम लागत समెत, विलासिताओं हेतु सिर्फ 315,000 = 6.33 प्रतिशत मजदूरों के श्रम की आवश्यकता पड़ती है।
इसका मतलब यह हुआ कि उपलब्ध प्रेम का 20 प्रतिशत ही समूचे महद्रोप के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त है। शेष 80 प्रतिशत समाज की पूजीवादी व्यवस्था के कारण शोषित और बरबाद हो जाता है।
qσσ 36 (33)

जारशाही शासन और बोलशिविक शासन

ब्रैजियर हण्ट $ ^{4} $ का कहना है कि बोलशिवकों ने अपने शासन के पहले चौदह महीनों में, 4500 लोगों को मौत की सजा दी जिनमें से ज्यादातर का जुमं चोरी और सट्टेबாजी था।
1905 की क्रान्तिक के बाद, ज़ार के मन्यी, स्तोलीपिनं ने, बारह महीनों के भीतर ३२,77३ लोगों को मौत की सज्जा दी थी।
900 37 (34)

सामाजिक संस्थाओं का स्थित्व

प्रत्येक पीढ़ी के भूमों में से एक भूम यह है कि वह जिन सामाजिक संस्थाओं के तत्त्व जी रही होती है वे, कुछ खास अर्थ में, “प्राकृतिक”, अपरिवर्तनीय और स्थायी हैं। फिर भी, अनगिनत हजार वर्षों से, सामाजिक संस्थाएँ उत्तरोर पैदा होती रही हैं, विकास करती रही हैं, पतनशील होती रही हैं और समस्यामिक आवश्यकताओं के अनुरूप दूसरी बेहतर संस्थाओं द्वारा क्रमश: विस्थापित की जाती रही है...। तब, सवाल यह नहीं है कि हमारी वर्तमान स्थयता बदलेगी या नहीं, बल्कि यह है कि वह कैसे बदलेगी?
यह, सुविचारित अनुकूलन के जरिये, क्रमश: और चुपचाप एक नया रूप ले सकती है। या, यदि अनुकूलन के बजाय कोई उग प्रतिरोध उत खड़ा होता है, तो यह धमाके के साथ धनसे हो सकती है, और मानवजாित को सामाजिक अराजकता और अन्यवस्था की अवस्था के निचले स्तर से एक नयी स्थयता के निर्माण का कष्टसाध्य कार्ब्धार सौंप सकती है, जिसमें पिछली व्यवस्था की सिर्फ बुराइयों ही नहीं, बल्कि उसकी भौतिक, बौद्धिक और नैतिक उपलब्धियों भी नहीं रहेगी। - पी.आई. डिके ऑफ़ कैप. सिविलाड्ज्शन
q0 38 (35)

पूजीवाद और वாणिज्यवाद :

জাপानी छात्रों की एक सभा में रविन्दनाथ² का भाषण :
জাপান में आपका अपना उद्योग था; वह कितने कर्तवानिष्ट भाव से इमानदार और सच्चा था, इसे आप इसके उत्पादों से - उनकी सतीयाता और तादाद से, छोटी-छोटी चीजों के प्रति उनके ध्यान देने से जान सकते हैं, जिन पर शायद ही कोई टीका-टिपणी की जा सके। परन्तु आपकी भूमि पर झूट की एक लहर दुनिया के उस भाग से बहरकर आ चुकी है जहाँ व्यापार सिर्फ व्यापार है और इमानदारी को सिर्फ सबसे अच्छी नीति माना जाता है। क्या आपको कभी शर्मा नहीं महसूम होती, जब आप उन व्यापारिक विज्ञानों को देखते हैं, जो सिर्फ समूचे शहरी क्षेत्र को ही झूट और अतिशयोत्यां से नहीं पाट रहे हैं, बल्कि उन हरित शेखों पर भी धावा बोलते जा रहे हैं, जहाँ किसान इमान्दारी से महतत करते हैं, और उन पर्वत-शिखरों को भी अपने हमले का निशाना बनाते जा रहे हैं, जो भौं के प्रथम निम्न प्रकाश का स्वागत करते हैं?...। अपनी भेदी सजावटों की बर्बता के साथ यह विनिज्यवाद समूची मानवता के लिए एक भयानक महिविपदा है, क्योंकि यह प्रवीणात के ऊपर ताकत के आदर्श का आरोपण कर रहा है। यह अपनी नन बेशमी के साथ अपने में ही मगन रहने के चलन को गौरवान्वित कर रहा है। इसकी हरकते हिंसक हैं, और इसका शोर-शराब केसुरा और कर्केश है। यह अपने ही सर्वाश की ओर बढ़ रहा है, क्योंकि यह उसी मानवता को कुचल कर विकृत कर रहा है...जिस पर यह स्वयं खड़ा है। [पृष्ठ 39 (36) पर जारी] यह आनन्द की कृमित पर धन पैदा करने की कड़ी मशकक्त में लगा हुआ है...। यूरोप की वर्तमान संख्या की मुख्य महलाकांशा यही है कि शैतान पर उसी का एकछत्र अधिकार हो।

पूजीवादी समाज

"राजनीतिक अर्थशास्त्र की सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि हर कोई यथासम्भव कम से कम लिया करके व्यक्तिगत सम्पदा प्राप्त कर लेना चाहता है।"
qσσ 40 (37)

धर्म के बारे में काल्पनिकमासरों का दृष्टिकोण

مनुष धर्म को बनाता है; धर्म முनुष को नहीं बनाता। धर्म वास्तव में, मनुष की ही आत्मचेतना और आत्मभावना है, जिसने या तो अधिक तक अपनेआप को पायी नहीं है, या (यदि अपनेआप को पायी भी है तो) अपनेआप को फिर से खो दिया है। लेकिन आदमी कोई ऐसी अमृत सता नहीं है जो दुनिया से बाहर कहीं पालथी मारे बैती हुई हो। मनुष की दुनिया मनुष्यों, राज्य, समाज की दुनिया है। यह राज्य, यह समाज धर्म पैदा करता है, एक उलटी विश्व चेतना पैदा करता है, क्योंकि ये खुद एक उलटी दुनिया है। धर्म इसी दुनिया का एक सामान्यीकृत सिद्धांत है, इसका विश्वकोशिय सार-संग्रह है, एक लोकप्रिय रूप में इसका तक है...। इसलिए धर्म के विरुद्ध संघों उस दुनिया के विरुद्ध एक प्रत्यक्ष अभियान है जिसकी आलोक सुगन्ध धर्म है। [पृष्ठ 41 (38) पर जारी] धर्म उपगीडित प्राणी की आहह, एक हदयहीन दुनिया का अहंसास है, ठीक वैसे ही जैसेकि यह आत्महीन दशाओं की आत्मा है। यह जनता के लिए अफीम है। लोग वास्तव में तब तक सुखी नहीं हो सकते जब तक कि वे धर्म का उम्मूलन कर, इसके मिथ्या सुख से निजात नहीं पा लेते। यह अपेक्षा कि लोग इस मरीचिका से अपनेआप को स्वयं अपनी ही दशा की खाँतिर मुक्त करें, यह अपेक्षा है कि वे उस दशा का ही ल्याग करें जिसे इस मरीचिका की ज़रूरत होती है। आलोचना का हिथ्यार हिथ्यारों की आलोचना का स्थान नहीं ले सकता। भौतिक शिकत्यों को निश्चित रूप से भौतिक शिकत्यों द्वारा ही उखाड़ फंका जाना चाहिए; लेकिन सिद्धांत भी जब जनसमुदायों में रच-बस जाता है, तो एक भौतिक शिकत बन जाता है।¹
900 42 (39)

क्रान्त यूटोपियाई नहीं

एक आमूल परिवर्तनवादी क्रिति, यानी मानवजित की आम मुक्ति, जर्मनी के लिए कोई यूटोपियाई स्वाज नहीं है; यूटोपियाई तो एक आंशिक, एक विशुद्ध राजनीतिक क्रिति की धारणा होती है, जो (पूजीवादी व्यवस्था की - स.) इमारत के खम्भों को खड़ा छोड देगी²
"महान इसलिए महान है क्योंकि
हम घुटनों पर है
आओ उठ खड़ हो!
20043(40)

राज्य के बारे में हर्बर्ट स्पेसर $ ^{4} $ का दृष्टिकोण :

“भले ही यह सच हो या न हो कि मनुष निष्कलंक पैदा हुआ और पाप में सन गया, लेकिन यह निश्चित रूप से सच है कि सरकार का जन्म आक्रमकता से और आक्रमकता के द्वारा हुआ।”
1. कार्ल मार्सर्, होगल के न्याय-दर्शन की समालोचना का प्रयास से उद्दृत
2. वहीं
3. मूल में ये पंक्तियाँ पूछ पर तिरछे लिखी हुई हैं
4. हर्बेंट स्पेसर (1820-1903) : अंग्रेज़ दार्शनिक; महत्त्वपूर्ण कृतियाँ : द फ्रिसपल्स ऑफ साइकोलाजी और फस्ट्र प्रिंसिपल्स मनुष्य और मनुष्यजाति :
“मै एक मनुष्य है,
और उन सभी चीजों से मेरा सरोकार है जो मनुष्य-जாति को प्रभावित करती है।"

इंग्लेण्ड की स्थिति की समीक्षा :

“அக்டேஸ் லேகே, ஏங்கெல்ஸ் மேலே சிந்தியாது தவறாக அக்கேடீஸ் ஹி ஹே சகலிதி, ஐவ தக அகஜதாயோ அமம நதி ஹே ஜாரதி, அரே ஐவ தக சகஜன லோகே கெ சாத துஐன லோக ஓபி ஹெ ரதே ஹே ஏ ஐகிஷ ஹம லூஃித கஹதஹ, கிசக அஷிககா ஏகெ ஹமசே மஹன ஹ? கிசக அஷகா பர வெ ஏகெ க்ஷிவல ஹெ ஹு? வெ கயோ ஹம ஹு-டசச வனயே ஹு ஹ? அகர ஹம சமஹி ஏக ஹ ஹா ஹம ஹஷா ஹகா ஹகஷகஷகஷக ஹகஷகஷ
400 44 (41)

क्रान्त और वर्ग

สारे ค เสร ทีม ทีม काँपते। ने कहा है, “सच कहा जाये तो मजदूर वर्ग एक वर्ग होता ही नहीं, बल्कि वह तो समाज के निकाय का संघटक होता है।” लेकिन मजदूर वर्ष का वक्त, यानी सभी लोगों के एक हो जाने का वक्त अभी भी नहीं आया है।
400 45 (42)
- “वर्ल्ड हिस्टी फॉर वर्कर्स” पृष्ठ 47, अल्फ्रेड बार्डन कृत²
सर हेनरी मेन³ ने कहा है :
“इंग्लेण्ड की अधिकांश भूमि वक्कीलों की गूलती से इसके वर्तमान स्वामीयों के हाथ में चली गयी है - जिन गूलतियों के परिणामस्वरूप छोटे-छोटे अपराधियों को भी फाँसी की सजा दे दी गयी।”
“कानून मुजिरम करार कर देता है उस पुरुष या स्ट्री को
जो चुराते हैं आम आदमी की मुगियाँ,
लेकिन छोड़ देता है बड़े अपराधियों को
जो चुरा लेते हैं मुगिया से आम आदमी को ही।"4
20046(43)

জনত্ব

জনতন, স্টেডনিক তোর পর, রাজনীতিক ওর কুনুণী সমানতা কী এক প্রণালী ঈ। লেকিন তোর আর ল্যাবহারিক কার্বাই মে, যহ মিথ্যা ঈ, কয্যাক কাই সমানতা তব তক নর্থী হো সকর্তা, যর্থ তক কি রানীতিক মে আর কুনুং কে সমধখন নর্থী, জব তক কি আধিক শিকিতম মে অসমানতা মুখে ব্যবহারকার রহণী; জব তক কি সলাধারী বর্ণা মজুয়ে কে রোজার পর, দেশ কে প্রস আর স্কুলী পর তথ্য জনমত তীব্র করণে আধিব্যক্তি করেন কে সখী সাধনী পর অপনা অধিকার জগমযে রঙগো, জব তক কি যহ সথী প্রশিক্ষিত সার্ভসিক কার্বাকারী নিকায়ী পর অপনা একাধিকার বনধে রঙগো, আর শুধু নর্থী কে প্রথমত করতে লিপ বৈশুধারণ ধন বৃদ্ধ করত পরেখা, জব তক কি কানুন সলাধারী বর্ণ द्वारा बनाये जाते रहे और अदालतों में इसी वर्ग के सदस्य अध्यक्षता करते रहे हैं, जब तक वैकिल प्राइवेट प्रैक्टशनर बने रहे हैं और अपनी विधि विशेषज्ञता का कौशल सबसे अधिक फ़ीस देने वाले को बेचते रहे हैं, तथा अदालती कार्बोई तकनीकी और महर्गी बनी रहेगी, तब तक कानून के समक्ष यह नाममात्र की समानता भी एक खोखला मज़ाकुं ही बनी रहेगी। एक पूर्णवादी व्यवस्था में, जनतन्व की पूरी मशिनरी बहुसंख्यक मजदूर वर्ग को पीडित कर, सताधारी अल्पसंख्यक वर्ग को सता में बनाये रखने का काम करती है, और जब बुजुआ सरकार को जनतान्विक संस्थाओं से खृत्रा महसूस होता है, तब ऐसी संस्थाओं को अक्सर बड़ी बेरहमी के साथ कुचल दिया जाता है।
“फ्रांम मावर्स टु लेिनन”
जनतन “हरेक वर्ग या पार्टी से सम्बन्धित हरेक व्यक्ति के लिए समान अधिकार और सभी राजनीतिक अधिकारों में भागीदारी” सुनिश्चित नहीं करता (काउंसर्दी)। यह तो मौजूद आर्थिक असमानताओं के लिए खुले राजनीतिक और कानूनी खेल की अनुमति देता है...। इस प्रकार पूर्णवाद के अन्तर्गत जनतन समामय, अमृत जनतन नहीं, बिलक विशिष्ट बुजुआ जनतन...या जैसाकि लेसन ने इसका नाम दिया है - बुजुआ बर्ग के लिए जनतन होता है²
460 47 (44)
क्रानित शब्द की परिभाषा
“క్రాంతి కి అవచారంగా కొద్దు శాంధ్ర కి పురితోషాలు స్వాధ్యానం కాదు” అనేది స్వాధ్యానం విద్యార్థులు కావాలి. కాదు శాంధ్ర కి నిర్ణయం కాదు. కాదు శాంధ్ర కి నిర్ణయం కాదు. కాదు శాంధ్ర కి నిర్ణయం కాదు. కాదు శాంధ్ర కి నిర్ణయం కాదు. కాదు శాంధ్ర కి నిర్
को टिकाये रखने वाली उत्पादन-प्रणाली को खुत करने के अलावा और किसी मक्सद के लिए नहीं करेगा।"
- संयुक्त राज्य अमेरिका के बारे में कुछ तथा और आंकड़े² 5 आदमी 1000 लोगों के लिए रोटी पैदा कर सकते हैं 1 आदमी 250 लोगों के लिए सूती कपड़ा पैदा (कर सकता) है 1 आदमी 300 लोगों के लिए कुनी कपड़ा पैदा कर सकता है 1 आदमी 1000 लोगों के लिए बूट और जूते पैदा कर सकता है - आयरन होला³ (पृष्ठ 78,
- 15,000,000 लोग बेपनाह गरुरी (में) जी रहे हैं जो अपनी श्रम-दक्षता को भी बनाये नहीं रख सकते। 3,000,000 बाल-श्रमक।
पुनश्च: इंग्लेण्ड युद्ध-पूर्व अनुमान (!) इंग्लेण्ड का कुल उत्पादन £ 2000,000,000 (प्रतिवर्ष) विदेशी निवेशों से लाभ £ 200,000,000 £ 2200,000,000 जनसंख्या के 1/9 वं भाग ने ले लिया ½ = £ 1100,000,000 जनसंख्या के 2/9 वं भाग ने ले लिया शेष = £ 1100,000,000 का 1/3 अर्थात = £ 300,000,000 (विवरण का बाकी हिस्सा फटा हुआ - स. …)
1. कार्ल काउंसको (1854-1938) : जर्मन सामाजिक-जनवादि आन्दोलन तथा दूसरे इणत्रनेशनल के एक नेता। शुरू में माक्सवादी थे पर बाद में माक्सवाद के साथ गूदारी की और मजदूर आन्दोलन में मौजूद एक अवसरवादी प्रवृति (काउंस்கीवाद) के सिद्धांतकार बन गये।
2. यह तथा नीचे आया इंग्लैण्ड सम्बन्धी शीर्षिक मोटे अक्षरों में लिखे हुए है।
3. जैक (जाॅन) ग्रिफ्थ लण्डन (1876-1916) का उपन्यास आयरन होल, जो 1908 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में पूजीवाद के रक्तपिपासु और दमनकारी चिरत्र तथा इसके विरूद मजदूरों के संघर्ष का अत्यन्त प्रभावशाली चित्रण है।
4. सोत का पता नहीं
400 48 (45)
पटरनेशनल¹ उठ जाग प्रताड़ित धरती के उठ जाग भूख के बन्दी न्याय की बजती रणभेरी, एक बेहतर दुनिया जन्म। अब बाँध सके ना हमको परमरा की बेड़ी अरे! उठो! गुलामो जागो! अब करनी नहीं गुलामी!
अब नयी नींव पर बनेगी दुनिया, हम अब तक रहे न कुछ भी, अब सब कुछ होंगे। (टेक)
यह है अतिम संघर्ष आओ होले अविकल कल मानवजित बनेगी इण्टनैशनल। देखो उनको जो बैठे हैं महिमामण्डित रैलों, ख्ानों, धरती के राजा!
श्रम को ही रहे लूटेये ये बस इसके सिवा किया क्या है?
दफन हैं जनता की महतत के फल कुछ की मजबूत तिजोरियों में;
देना होगा इसे वापस है यह जनता का हक। (वही टेक)
एकजुट हों कार्बब्रानो-खेतों के महततकश पार्टी हम सबकी जो काम करें;
यह धरती है हमारी, जनता की, यहाँ न जगह कामचोर की, हमारे मांस पर हुए हैं कितने मोटे?
लेकिन यदि ये घृणित शिकारी पक्षी, हमारे आसमान से एक सुबह हो जायें गायब सूरज की आभा तब भी बनी रहेगी।
(वही टेक फिर)
मासईजेज़
ओ महतत के बेटो, जागो, गौरव हासिल करो!
सुनो, सुनो, वे कोटि-कोटि आवाजेंं कि तुम जागो, बच्चे, बीवी, और पुरातन पितर तुम्हारे, देखो तुम उनके औसू, और सुनो तुम उनकी चीखे!
क्या घृणित निर्कुश शासक करते रहे शरारत ले भाड़ के टट्टू, और गुण्डों के जत्थे - करते रहे धरा को सनवस्त और वीरान जबकि शांति और आजादी का बहता रहे खून? (कोरस)
आओ शस्त्र सँभालें, पिक्सब्रू हो जायें खेत सीचते उनके खू से आगे बढ़ते जायं बेपनाह ऐयाशि और शान-शोकृत की जुरंत करते है अधम अतृप्त निर्कृति, स्वर्ण और सता की उनकी भुख अपरिमित भोगते और बेचते धूप-हवा भी;
हम दोते उनका भार बन के लदू घोड़ वे कहें कि उनके दास उन्हे देवता मानें, लेकिन इन्सान से बढ़कर और कौन है?
फिर वे कब तक टिके रहेंगे, कब तक मार्गे हमको? (फिर वही कोरस)
अरे आजादी! मानव क्या त्याग सकेगा तुमको, अनुभव कर लेने के बाद तुम्हारी दिलकश लौ को?
क्या रोक सकंकी तुमको तहखांनों के फाटक और सलाखं या क्या कोडे बॉध सकेगे तेरे उदात जीवट को?
लम्बे ऑसें से बिलख रही है दुनिया, चला रहे हैं झूठ की कटार निर्कुश, लेकिन आजादी है तलवार और दाल हमारी, और च्यथे है उनकी सारी कलाकारी। (फिर वही कोरस)
qσσ 50 (47)
अवसरवाद का जन्म
कानून के दायरे में रहकर काम करने की सम्भावना ने ही दूसरे इण्डरनेशनल के समय में मजदूर पार्टीयों के भीतर अवसरवाद को जन्म दिया।
गैर-कानूनी काम :
“किसी देश में जहाँ बुजुआ वर्ग या प्रतिक्रान्तकारी सामाजिक जनवाद सता में है, कम्मुनिस्ट पार्टी को अपने कानूनी और गैर-कानूनी कामों के बीच एक तालमेल रखना अवश्य सीख लेना चाहिए, तथा कानूनी काम को हमेशा और निश्चित रूप से गैर-कानूनी पार्टी के प्रभावी नियनरण में ही रहना चाहिए।
दूसरे इण्डरनेशनल के लक्ष्य के साथ विश्वासधात :
समाजवाद और प्रभम के इस विराट संगठन को ऐसी शास्त्रकालीन गतिविधियों के लिए अनुकूलित कर दिया गया, और जब संकट आया, तो बहुत से नेता और जनसमुदायों के भारी हिस्से अपनेआप को इस नयी स्थिति के अनुरूप बनाने में असमर्थ हो गये…। यही वह अपरिहार्य स्थिति है जो बहुत हद तक दूसरे इणट्रनेशनल के विश्वासঘात का कारण है।
“द सिनिकस वई बुक” (1906)³
एमब्रेस प्रियर्स लिखता है :
1. लेसन की पुस्तक, द्वितीय इंडरनेशनल का पतन
2. निकोलाई हवानोविच बुखारिन (1888-1938) - ह्स्सी सामाजिक-जनवादी मजूदर पार्टी के सदस्य। राज्य, सर्वहारा अधिनायकत्व, राष्ट्रीयताओं के आत्मनिर्णय के अधिकार तथा ऐसे ही अन्य प्रश्नों पर लेलिन विरोधी दृष्टिकोण अपनाते रहे। अक्टूबर समाजवादी क्रिति के बाद बार-बार लेलिनवादी पार्टी नीति का विरोध किया। 1937 में अपनी पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण पार्टी से निकाले गये।
3. व्यंग्यাতमक परिभाषाओं की पुस्तक, जो बाद में डेविल्स डिकशनरी के नाम से प्रकाशित हुई। एम्ब्रोस बियर्स (1842-1914) अमेरिकी पत्रकार, कथाकार और व्यंग्यकार थे। “ग्रेप शाॉट् - (संशा) - एक तक जिसे भविष्य अमेरिकी समाजवाद की माँगों के जवाब में तैयार कर रहा है।”
q80 51 (48)
धर्म, स्थापित व्यवस्था का समर्थक :
दासता :
1835 में, प्रिंस्बटोरियन चर्च की जनरल असेम्बली ने प्रస్ताव पारित किया कि : “दासता पुराने और नये दोनों ही टेस्टमोण्टो में स्वीकृत है, और इसे ईश्वरिय सता ने वर्जित नहीं किया है।” द चालस्टन बैच्छेस्ट एसोসিएशन ने 1835 में निम्नलिखित फ़रमान जारी किया :
“मालकों द्वारा अपने गुलामों के समय का इस्तेमाल करने के अधिकार को सभी चीजों के सृष्टा ने स्पष्टतः मान्यता दे रखी है, जो अपनी मर्जी से जिसे भी चीज पर चोहे सम्मित का अधिकार लागू कर सकता है।”
वर्जीनिया के मेथोडिस्ट कॉलेज के एक प्रेफेसर रेवरण्ड ऐ. डी. साइमन, डॉक्टर ऑफ डिवाइनिटी, ने लिखा :
“होली रिट (इसाई धर्मशास्त्र - स.) के अवतरणों में साफ़ तौर पर गुलामों के ऊपर सम्मल्योधिकार और इस अधिकार से सम्बन्धित रोजगारी की बातों का उल्लेख किया गया है। तब, कुल मिलाकर, बात यही है, चाहे हम स्वयं श्वर द्वारा स्थापित यहूदी नीति को देखें, या सभी योगों में मानवजित के एक समान विचार और व्यवहार को ले, या न्यू टेस्टमोपेंट और नैतिक नियम के विधि-निषेध सम्बन्धी निर्देशों को देखें; हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि दासता अनेतिक नहीं है। जब यह बात सिंदर हो चुकी है कि अफ़्रीकी दास कानूनी तौर पर ख्रीदकर बँधुआ बनाये जाते थे, तब उनके बच्चों को बंधुआ बनाकर रखने की बात भी अपरिहार्यित: सिंदर ही हो जाती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि अमेरिका में जो दासता मौजूद है, उसकी स्थापना सही थी।”
पूजीवाद का समर्थन :
हेनरी वॉन डाईक² "एस्टे इन एप्लीकेशन" (1905) में लिखता है :
“बाड़िबल की शिश्धा है कि ईश्वर दुनिया का मालिक है। वह अपनी शुभंकर इच्छा से, सामान्य नियमों के अनुरूप, प्रत्येक आदमी को उसका भाग देता है।”
संयुक्त राज्य अमेरिका के बारे में आँकड़े :
- सैन्य-संख्या 50,000 थी अब यह 300,000 है।
धनकुबेरों के पास 67 अरब की सम्पादा है। व्यवसायों में लगे कुल व्यक्तियों में से केवल 9/10 प्रतिशत ही धनिकतन् में शामिल हैं। फिर भी उनके पास कुल सम्पादों का 70 प्रतिशत है। लवसायों में लगे कुल व्यक्तियों में से
29 प्रतिशत मध्यम वर्ष से सम्बन्धित हैं उनके पास कुल सम्पदा का 25 प्रतिशत है = 24 अरब ल्यवसायों में लगे लोगों में से शेष 70 प्रतिशत सर्वहारा वर्ग से सम्बन्धित हैं और उनके पास कुल सम्पदा का सिर्फ 4 प्रतिशत अर्थात 4 अरब है।
- लूसியन सैनियल के अनुसार, 1900 में व्यवसाय में लगे कुल लोगों में से = 250,251 धनिकतनॅ से सम्बन्धित थे = 8,429,845 मध्यम वर्ष से सम्बन्धित थे = 20,395,137 सर्वहारा वर्ष से सम्बन्धित थे।
रायफ्लेन् :
“तुम कहते हो कि संसद और राजकीय पदों पर तुम्हारा बहुमत होगा, लेकिन 'तुम्हारे पास रायफ्लें कितनी है? क्या तुम्हे मालूम है कि पय्यात सीसा तुम्हे कहाँसे मिल सकता है? जहाँ तक बाहूर्द की बात है, रासायनिक मिश्रण, यानिक मिश्रणों से बेहतर होते हैं, ये बात मेरी मान लो।”
सता...¹ एक समाजवादी नेता ने धनिकतन् की एक मीटिंग को सम्बोधित किया और उन पर समाज के कुप्रबन्ध का दोष लगाया और इस प्रकार पीडित मानवता के सममुख उपस्थित सभी विकरालताओं और दुःख-तकलीफ्जों की सारी की सारी जिम्मेदारी उन्होंने पर शोध दी। बाद में एक पूर्णीपित (मि. विकसन) उठ खड़ा हुआ और उसे इस प्रकार सम्बोधित किया :²
“इस पर हमारा जवाब यह है। हमारे पास तुम्हारे ऊपर बराबंद करने के लिए शब्द नहीं हैं। जब तुम अपने गर्वीले मजबूत हाथ हमारे महलों और वैभव की ओर बढ़ाओंमे, तब हम तुम्हे दिखा देगे कि हमारी क्या ताकत है। बमगोलो की गड्गदाहट और मशीनानों की तडतडहाट से हम अपना जवाब देगे। हम तुम क्रितवादियों को अपनी एडियों तले पीस डालोगे, और तुम्हारे चेहरों को कुचल डालोगे। यह दुनिया हमारी है। हम इसके मालिक हैं और यह हमारी ही रैगेगी। जहाँ तक प्रम की बात है, यह तो जब से इतिहास शुरू हुआ तभी से धूल चटाता रहेंगे, और मैंने इतिहास को ठीक से पढ़ा है। और यह तब तक धूल चटाता रहेगा जब तक हमारे और हमारे उत्तरिधकारियों के हाथ में सता रैगेगी।
“एक शब्द है – सता। यह सभी शब्दों का राजा है। ईश्वर नहीं, धन-वैभव नहीं, बल्कि सता। अपनी ज्ञान पर रख लो और तब तक रखे रहो जब तक कि यह उसे झनझाने न लगे।”
“मुझे उत्तर मिल गया”, अनष्ट (उस समाजवादी नेता)³ ने निर्वाचार भाव से कहा। “एकमात्र यही उत्तर दिया भी जा सकता था। सता। हम मजूदर वर्ण के लोग इसी का तो प्रचार करते हैं। हम जानते हैं और अपने कटु अनुभव से भलीभाँति जानते हैं, कि सत्य की, न्याय की, मानवता की, कोई भी अपने कभी तुम्हे छू नहीं सकती। तुम्हारे दिल भी तुम्हारी उन एडिटों की तरह ही कठोर हैं जिनसे तुम ग्रीबीं के चेहरे कुचलते हो। इसीलिए तो हमने सता का प्रचार किया है। लेकिन, चुनाव के दिन हमारे मतपत्रों की ताकृत तुमसे तुम्हारी सरकार धीन ले जायेगी…।”
“अगर चुनाव के दिन तुम्हे बहुमत, भारी बहुमत मिल ही जाये, तो भी उससे क्या फर्क पड़ने वाला है”, मि. विकसन तपाक से बोला। “मान लो यदि मतपोटिकाओं में तुम्हारी जीत के बावजूद हम तुम्हे सता सौंपने से इंकार कर दें तो?" [पृष्ठ 54 (51) पर जारी]
“हमने उस पर भी सोच रखा है”, अनेंस्ट ने जवाब दिया। “और इसका जवाब हम तुर्दें गोलियों से देंगे। सता, तुम्हीं ने इस शब्दों का राजा कहा है। बहुत अच्छा! सता, देखेंगे इसे। और जिस दिन हम चुनाव में विजय हिसल कर लोगे, और तुम हमारी इस सबैधानिक और शनिपूर्ण ढंग से हिसल की गयी सता को हमें सीपने से इंकार कर दोगे, तो तुम्हारे इस सवाल के जवाब में कि हम क्या करेंगे – उस दिन, मैं बता दूँ कि हम तुम्हे इसका जवाब देंगे, हम बमगोली की गड्गडाहट और मशीनानगों की तड्तदाहट से अपना जवाब देंगे।
“तुम हमसे बच नहीं सकते। यह सही है कि तुमने इतिहास को ठीक से पढ़ा है। यह सही है कि श्रम इतिहास के आरम्भ से ही धूल चाटता आ रहा है। और यह भी सही है कि जब तक तुम्हारे और तुम्हारे उसराधिकारियों के हाथ में सता रहेगी, तब तक श्रम धूल ही चोटाता रहेगा। मैं तुमसे सहमत हूँ। तुमने जो कुछ कहा है उन सारी बातों से मैं सहमत हूँ। सता ही निर्णयिक होगी, जैसा कि हमशा होता आया है; यही तो वहाँ का संघ में है। जैसे तुम्हारे वर्ग ने पुराने सामन्ती तन्य को घस्त किया, ठीक वैसे ही मेरा वर्ग, मजूदर वर्ग, तुम्हारे वर्ग को घस्त कर डालोगा। अगर तुम अपने प्राणविक्रान और अपने समाज विज्ञान को भी उतती ही स्वेच्छता से पढ़ा, जितनी स्वेच्छता से तुम इतिहास पढ़ते हो, तो तुम देखोंगे कि मैंने जिसे हश रूका करे कि क्या है वह अपरिहार्य है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इसमें एक वर्ष लगेगा, दस वर्ष लगेगा या हजार वर्ष लगेगा - यह तय है कि तुम्हारा वर्ग मिट्टी में मिल जायेगा। और यह सता के जरिये ही होगा। हम महत्वकश इस शब्द को इतना रट चुके हैं कि हमारे दिमाग् इससे झनझना रहे हैं। सता। यह एक राजोचित शब्द है।” - जैक लगडन कृत आयरन होल (पृष्ठ 88)
क्यू सिग्मा 55 ब्रैकेट में 52
1. स्पेत का पता नहीं
Figure 1 summary: आंकड़े 1, 1922 से 1926 के बीच इंग्लैण्ड में बेरोजगारी के आंकड़ों को दर्शाता है। यह 1922 में 11 लाख 35 हजार की संख्या से शुरू होकर 1926 तक 12 लाख 50 हजार से 15 लाख के बीच पहुँचने वाली वृद्धि को स्पष्ट करता है, जो उस अवधि में आर्थिक स्थिति के उतार-चढ़ाव को उजागर करता है।
अंग्रेज़ मजदूर नेताओं का विश्वासधात
1911 से 1913 तक के वर्ष आमतौर पर खदान मजूदर, रेलकमिয়ों और परिवहन मजदूरी के बेमिसाल वर्ग-संघकों का समय था। अगस्त 1911 में, रेलवे की राष्ट्रीय, दूसरे शब्दों में, आम हड़ताल, फूट पड़ी थी। उन दिनों ब्रिटेन के ऊपर क्रान्तिक की एक क्षुदली छाया मँडरा रही थी। लेकिन नेतागள ने इस आन्दोलन को पंगु कर डालने के लिए अपनी पूरी ताकृत लगा दी। उनका इरादा “देशभिक्त” का था; यह हरकत अगादिर की उस घटना के समय की जा रही थी, जिसने जर्मनी के साथ युद्ध का खत्रा उपस्थित कर दिया था। जैसाकि आज भलीभाँति मालूम है, प्रधानमननी ने मजदूर-नेताओं को एक गुप्त बैठक में बुलाया और उनसे पितृभूमि की रक्षा की अपनी की। और नेताओं ने, बुर्जुआ वर्ग को मजबूत करने के लिए अपने बूतेभर सब कुछ दिया, और इस प्रकार सामाज्यवादी नरसंहार के लिए रास्ता साफ़ किया।
400 56 (53)
विश्वासधात :
(पृष्ठ 3) ह्वेयर इज् ब्रिटेन गोईंग?¹ ऑस्ट्रेलिया केवल 1920, यानी 'काले शुकवार' के बाद ही, आन्दोलन सीमाओं में वापस लौटा, जब खानकमियों, रेलकमियों और परिवहनकमियों के त्रिपक्षीय संश्रय के नेताओं ने आम हड़ताल के साथ विश्वासघात कर दिया।
सुधार के लिए क्रान्तिक का खतरना ज़्फ़ररी है :
नौ बटा दो की घात तीन ...ब्रिटिश बुजुआ वर्ग ने यह समझ लिया था कि ऐसे उपाय (सुधार) के जरिये क्रान्तिक को टाला जा सकता है। अत: इससे निष्कर्ष निकलता है कि सुधारों तक

1. ग्रास्की की कृति ह्वेयर इज़ ब्रिटेन गोईंग?

2. โลมอิน วาลัสต์ : ลิยง ดรีเดิงิชิง วาลส์กี (1879-1940) - ลีโพนพาด ซี ซีอิง ฟิงซ์กี (1879-1940) - ลีโพนพาด ซี ซีอิ को भी लागू करवाने के लिए, सिर्फ धीरे-धीरे काम करते रहने का सिद्धांत पयोत्तनीह है, और कि क्रिति का एक वास्तविक खतरना ज्सरी है।
सामाजिक एकता :
(पृष्ठ 29)¹ ...ऐसा हो सकता है कि एक बार जब हम एक ऐसे विशेषधिकारप्राप्त वर्ष के सफाये के लिए उठ खड़े हों, जो रंगमंच से हटना न चाहता हो, तब वर्ग-संघों की बुनियादी अन्तवंस्तु, उसी में निहित प्रतीत हो। लेकिन नहीं। मैकडोनाल्ड² सामाजिक एकता की चेतना “जागृत” करना चाहते हैं। पर किसकी? मजदूर वर्ग की एकता तो बुजुआ वर्ग के विरुद्ध संघ में उसकी आनत्रिक सुसम्बद्धता की अभिभयिकत होती है।
मैकडोनाल्ड जिस सामाजिक एकता का उपदेश देते हैं, वह शोषकों के साथ शोषितों की एकता, या दूसरे शब्दों में, शोषण को बनाये रखने के अलावा और कुछ नहीं है।³
क्रानित एक आफ़त :
“रुस की क्रिति ने” मैकडोनाल्ड के कथनानुसार, “हमें बड़ा सबक सिखया। इसने दिखा दिया कि क्रिति एक बरबादी और विपदा के सिवाय और कुछ नहीं है।” [पृष्ठ 57 (54) पर जारी]
फ्रांस तो विपदा को ही जन्म देती है लेकिन ब्रिटिश जनत्वर ने तो सामाज्यवादी युद्ध को जन्म दे दिया...जिसकी बरबमी की तुलना क्रान्तिक की विपदाओं से तो निश्चित तौर पर तनिक भी नहीं की जा सकती। फिर भी, जिसकातान ने ज़राशाही, कुलीनत्वर और बुर्बुआ वर्ग को उखाड़ फंका, चर्च को हिला कर रख दिया, १३ करोड़ लोगों के एक राष्ट्र या राष्ट्रीं के एक समूचे कुल में, एक नये जीवन का संचार किया, उसके सामने यह घोषणा करने के लिए कि - क्रान्तिक एक विपदा के सिवाय और कुछ नहीं है - ऐसे ही बहरे कानों और निर्लज जैहोरी की जूज़रत है।
नौ बटा दो फाई चौंसठ की घात चार
शान्तपूणं?
कब और कहां सताधारी वर्ग ने शास्त्रपूर्ण मतदान के जरिये कभी सता और सम्पति साँपी है - और वह भी, खासतौर से ब्रिटिश बुजुआ वर्ग ने, जो सिद्यां से दुनियाभर में लूटपाट करता आया है? (पृष्ठ 66)¹
समाजवाद का लक्ष्य : शాहत
यह एकदम निर्विवाद सच्चाई है कि समाजवाद का लक्ष्य, सर्वप्रथम रूप से, ताक्त के सबसे भोड और खूनी रूपों को खतम करना है, और फिर उसके बाद उसके और छिपे रूपों को भी खतम करना है। (पृष्ठ 80)
विश्व क्रित का लक्ष्य :
1. पूजीवाद को उखाड़ फेकना
2. मानवता की सेवा के लिए प्रकृति का नियంతण करना। बुखारिन ने इसे ऐसे ही परिभाषित किया।
qσσ 58 (55)
आदमी और मशिनरी
द युनाइटेड स्टेट्स ब्यूरो ऑफ लंबर का कहना है :
- मशीन पर काम करके एक आदमी 1 घण्टा 34 निमत में पिनों का 12 पौंड का पैकेट तैयार कर सकता है।
- अगर आदमी मशीन पर नहीं, बल्कि सिर्फ औज़ारों से काम करे तो उतने ही काम में 140 घन्दा 55 मिनट का समय लगेगा।
(अनुपात – 1.34 : 140.55 भिनट)
- मशीन पर काम करके 100 जोड़े जूते बनाने में 234 घ. 25 मिनट लगते हैं। - हाथ से इसमें 1,831 घण्टे 40 मिनट लगेगी।
- मशीन पर काम करने पर श्रम की लागत $ 69.55 आती है।
- हाथ से...$ 457.79 आती है।
- मशौनी श्रम द्वारा 500 गज चारखानेदार कपड़ा तैयार करने में 73 घण्टे लगते हैं।
- हाथ के श्री द्वारा, इसमें 5,844 घण्टे लगते हैं।
- मशौनी श्रम द्वारा 100 पौंण्ड सिलाई का सूती धागा 39 घण्टों में तैयार होता है।
- हाथ से इसमें 2,895 घण्टे लगते हैं।

1. वही

पुनश्च: कृषि :
- एक भला-चर्मा आदमी हँसुआ से एक एकड़ फ़सल एक दिन (12 घं.) में काट सकता है। - एक मशीन उसी काम को 20 निमत में कर देती है। - छः आदमी मूसल से 60 लीटर गेईू की मंजड़ाई आधे घपटे में कर सकते हैं। - एक मशीन उतने ही समय में 12 गुना अधिक काम कर सकती है। “मशिनी के इस्तेमाल से मानव-श्रम की प्रभावकारिता में होने वाली बढ़ोति...राई के मामले में 150 प्रतिशत से लेकर जौ के मामले में 2,244 प्रतिशत तक हो जाती है...।"
400 59 (56)
सं.रा.अ. और उसकी आबादी की सम्पदा : अठारह सौ पचास से उन्नीस सौ बारह का वर्ग मशीन अपनी प्रकृति में सामाजिक है, जैसे कि और्जार व्यक्तिगत था।³
हमें खराब कपड़ा दो, लेकिन हमें बेहतर आदमी दो”, एमरसन की घात चार का कहना है।
“सुखण्डी रोग से मरते शिशुओं की प्राण-रक्षा करो, फिर उसके बाद कपड़ा न्यागर को तरजीह दो।” पृष्ठ 81 $ ^{5} $
आदमी को मशीन पर कुबर्न नहीं किया जा सकता। मशीन को निश्चय ही मानवजாति की सेवा में लगना चाहिए, जबकि अभी ही इस औद्योगिक व्यवस्था में मानवजாति के ऊपर भारी कहरर बरपा होने का खुत्रा मँडराने लगा है।
Table 2 summary: 1850 से 1912 तक कुल संपत्ति और प्रति व्यक्ति संपत्ति में निरंतर वृद्धि हुई है। 1850 में कुल संपत्ति 7 अरब 13 करोड़ 57 लाख 80 हजार डॉलर थी, जो 1912 तक बढ़कर 187 अरब 13 करोड़ 90 लाख 71 हजार डॉलर हो गई। इसी अवधि में जनसंख्या 2 करोड़ 31 लाख 91 हजार 876 से बढ़कर 9 करोड़ 54 लाख 5 हजार 30 हो गई, और प्रति व्यक्ति संपत्ति 308 डॉलर से बढ़कर 1,965 डॉलर तक पहुंच गई। यह वृद्धि मुख्य रूप से मशीनरी के बढ़ते इस्तेमाल का परिणाम है।
q00 60 (57)
आदमी और मशिनरी :
सी. नैनफोर्ड हेण्डरसन अपनी कृत "रे डे" में लिखता है :
यह उद्योग की संस्था, जो सभी संस्थाओं में सबसे पुरानी है, मानवजित को चीजों की निरंकुशता से मुक्त करने की गरज से संगठित और विकसित हुई, लेकिन अब यह स्वयं उससे बड़ी निरंकुशता बन चुकी है, जो विशाल आबादी को गुलामों की दशाओं में - ऐसे गुलामों की दशाओं में धकेलती जा रही है जो लम्बे और थका देने वाले घण्टों तक काम करते हुए, टेरो चीजें पैदा करते रहने के लिए अभिशिष्ट है, जबकि वे जो चीजें पैदा करते हैं, खुद उन्हीं के अभाव से नस्त रहने के लिए विवश है।
आदमी मशिनरी के लिए नहीं है :
आदमी ने इस्लात और आग के संयोग से जो चीज़ पैदा की है और जिसे मशीन कहा है, उसे निश्चय ही हमेशा मनुष्य का स्वामी नहीं, बल्कि सेवक ही रहना चाहिए। न तो मशीन और न ही मशीन के मालिक को मानवजित पर शासन करने का अधिकार है। पृष्ठ 88
साम्राज्यवाद :
सामाज्यवाद विकास के उस चरण का पूर्णवाद है जिसमें इज़रोदारियों और वितीय पूर्णी ने एक प्रभुतवकारी प्रभाव हासिल कर लिया है, नियित-पूर्णी भारी महत्व प्राप्त कर चुकी है, अनतरराष्ट्रीय ट्रस्टों ने दुनिया का बैटवारा करना शुरू कर दिया है, और सबसे बड़े पूर्णीवादी देशों ने पृथ्वी के समूचे भूगोলিক क्षेत्रफल का आपस में बेंटवारा पूरा कर लिया है।" - लेिन²
qσσ 61 (58)
अधिनायकत्व:
अध्यायकलव एक सता है जो सीधे ताकत पर आधारित होती है, और किसी कानून से नहीं बँधी होती। सर्वशांत वर्ग का क्रितकारी अधिनायकलव एक ऐसी सता है जो बुजुआ वर्ग के विरुद्ध और उसके ऊपर, सर्वशांत वर्ग द्वारा ताकृत की बदौलत लागू की जाती है, और जो किसी कानून से नहीं बँधी होती।
फ्रांसकी अभिनायकल :
फ्रांस एक कार्बोडिकी है जिसके तहत आबादी का एक तकका दूसरे तकको पर रायफलों, संगीतों, बन्दूको और ऐसे ही अन्य अत्यन्त सतावादी उपायों के जरिये, अपनी इच्छा आरोपित करता है। और जो पक्ष विजयी होता है वह अपना शासन आवश्यक रूप से, उस भय के जरिये स्थापित करता है, जिसे उसके हथियार प्रतिक्रियावादियों में उत्पन्न करते हैं। यदि पेरिस के कम्पन ने बुंबुआ वर्ग के खिलाफ़ हथियारबन्द जनता पर भरवासा नहीं किया होता, तो क्या वह अपनेआप को चौबीस घपटे से भी अधिक कूण्यता रख सका होता? इसके विपरीत, क्या हमारी यह आलोचना जायज़ नहीं है कि कम्पन ने इस सता का बहुत ही कम इस्लामल किया?
बुजुआ जनतन्तर :
बुजुआ जनतन्, सामगतवाद की तुलना में, एक महान ऐतिहासिक प्रगति होने के बावजूद, एक बहुत ही सीमित, बहुत ही पाखण्डपूर्ण संस्था, धनिकों के लिए एक स्वर्ग और शोषितों एवं गरुषों के लिए एक जाल और छलावे के अलावा न तो कुछ है, और न ही हो सकता है।
qσσ 62 (59)
प्रम का शोधन और राज्य :
"सिर्फ प्राचीन और सामन्ती ही नहीं, बल्कि आज का प्रतिनिधि राज्य भी पूजी द्वारा उजरती प्रभे के शोषण का एक उपकरण ही है।"
अधिनायकत्व:
___
“웹춤 잔잣 식칭” एक 잔잣새책이 잔잣새책에 잔잣새책을 잔잣새책에 잔잣새책의 잔잣새책을 잔잣새책에 잔잣새책의 잔잣새책에 잔잣새책을 잔잣새책에 잔잣새책에 잔잣새책을 잔잣새책에 잔잣새책에 잔잣새책을 잔잣새책에 잔잣새책에 잔잣새책을 잔잣새책에 잔잣새책에 잔잣새책에 잔잣새책을 잔잣새책에 잔잣새책에 잔잣새책에
अधीर आदर्शवादी :
अधीर आदर्शवादी के लिए - और बिना कुछ अधीरता के शायद ही आदमी प्रभावी सिंदद हो सके - यह लगभग तय बात है कि दुनिया को खुशहाल बनाने की कोशिश में उसे अपने विरोधियों की घृणा का पात्र बनना होगा और निराश भी होना पड़ सकता है।
qσ 63 (60)
नैता :
काल्शिन्धरो, "कोई भी समय बरबाद न हुआ होता", यदि कोई महान आदमी मिल जाता जो काफ़ी समझार और नेक होता, जिसमें इनकी समझदारी होती कि वह सही-सही जान ले कि वक्त का तकाणा क्या है; जिसमें इतना पराक्रम होता कि वक्त के लिहाज से सही रास्ते पर नेतृत्व कर सकता, तब तो इनकी बदौलत कोई भी समय मुकत का समय हो सकता था।
स्वेच्छाचारिता :
काउंसकी ने “प्रोलितारियत डिक्टेटरशिप” शीर्षक से एक पुस्तका लिखी, जिसमें उसने बोलशिवकों द्वारा बुजुआ वर्ग के लोगों को वोट देने के अधिकार से विचित किये जाने की निन्दा की। इस पर लेिन न এपनी “प्रोलितारियन रिवॉल्यूशन” : (पृष्ठ 77) में लिखा :
“책책장위원회의 중요한 책을 찾아보았다!”한국어회의회 शून चूसने वालों के सभी गिरोह काउत्सकी के सुर में सुर मिलाकर, स्वेच्चाचारिता की चीख-पुकार मचाने लगे हैं!
पार्वती :
लेकिन यह स्पष्ट हो चुका है कि जब तक क्रॉनित का नेतुल करने के लिए एक संक्षम पार्टी न हो, तब तक कोई क्रॉनित सम्भव नहीं हो सकती।
सर्वशांत क्रियां के लिए पार्टी एक अपरिहार्य उपकरण है। q sigma sigma 65 (62)
Image summary: यह एक हस्तलिखित हस्ताक्षर और तारीख की छवि है। इसमें एक तिरछी रेखा के ऊपर 'Joe Gulla' नाम लिखा है और उसके नीचे '12/7/80' तारीख अंकित है।
उसके (मेहनतकश, आदमी के) लिए कानून, नैतकता, धर्म ये सब उसके (सर्वहारा के) लिए नाना बुजुआ पूर्वाग्रह मात्र है, जिनकी आड़ में इतने ही बुजुआ स्वार्थ घात लगाये रहते हैं।
Image summary: यह एक हस्तलिखित नोट या हस्ताक्षर है जिसमें 'Julia' नाम और '12 July '80' तारीख लिखी हुई है।
Autograph of Mr. B.K. Dulla taken on 12th, June 20 in Cell. No: 137
Central jail, Kibane four days before his final departure from this jail.
Magnet Smith నోటకుం 66 (63) హీ 67 (64) హీ 68 (65) హీ 69 (66) హీ 60 (67) హీ 61 (68) హీ 62 (69) హీ 63 (60) హీ 64 (61) హీ 65 (62) హీ 66 (63) హీ 67 (68) హీ 69 (60) హీ 61 (62) హీ 63 (62) హీ 64 (62) హీ 65 (62) హీ 66 (62) హీ 67 (62) హీ 68 (62) హీ 69 (62) హీ 60 (62) హీ 61 (62) హీ 63 (62) హీ 64 (62) హీ 65 (62) హీ 66 (62) హీ 67 (62) హీ 68 (62) హీ 60 (62) హీ 61 (62) హీ 63 (62) హీ 64 (62) హీ 65 (62) హీ 66 (62) హీ 67 (62) హీ 68 (62) హీ 60 (62) హీ 61 (62) హీ 63 (62) హీ 64 (62) హీ 65 (62) హీ 66 (62) హీ 67 (62) హీ 68 (62) హీ 60 (62) హీ 61 (62) హీ 63 (62) హీ 64 (62) హీ
q00 69 (66)
कम्प्युनिस्टो का लक्ष्य
“कम्प्युनस्ट अपने दृष्टिकोण और लक्ष्य विधिपाने से घृणा करते हैं। वे खुले तौर पर एलान करते हैं कि उनका लक्ष्य सिर्फ समस्त मौजूदा सामाजिक दशाओं को बलपूर्वक उखाड़ फंकेने के द्वारा ही हिंसल हो सकता है। शासक वर्गों को कम्प्युनस्ट क्रांति के भय से कॉपने दो। सर्वहाराओं के पास अपनी बेडियों के सिवाय खोने के लिए कुछ नहीं है। जीतने के लिए उनके सामने सारी दुनिया है। दिनिया के मजदरो. एक हो!¹
कम्युनिस्ट क्रॉनित का लक्ष्य
“हम ऊपर देखे चुके हैं, कि मजदूर वर्ग की क्रिया में पहला कृदम, संवहारा वर्ग को उठाकर शासक वर्ग की स्थिति में लाना है, जनवाद की लड़ाई को जीतना है। संवहारा अपने राजनीतिक प्रभुल का प्रयोग बुजुआ वर्ग से धीरे-धीरे करके सारी पूर्णी धीने, उत्पादन के सभी उपकरणों को राज्य के, अर्थात शासक वर्ग के रूप में संगठित संवहारा वर्ष के हाथों में केन्द्रीकृत करने तथा उत्पादक शिक्षितयों की समस्या में यथासंभीर वृद्धि करने के लिए करेगा।”
qσσ 70 (67)
काल्मी मावर्स की गुलतियाँ निकालना :
…और यह निश्चित मालूम पड़ता है कि व्रासकी मानो उससे सम्बन्धित थे जिसे जर्मन “असली राजनीति” का स्कूल कहा करते थे, और किसी भी विचारधारा के प्रति एकदम उतना ही मास्स थे जितना कि বিस्मार्क। और, इसीलिए, यह देखकर कुतूहल होता है कि व्रासकी भी इतने क्रियाति करती हैं कि कह सकें कि मास्स ने एक गूलती की थी; बल्कि वह एक या अधिक पूर्ण अधिनरूप है के काम में - अर्थात यह सिद्ध करने में लगाना जूहरी समझते हैं कि पवित्र पुस्तकों में जो कुछ कहा गया है, उसका अर्थ उससे एकदम भिन्न है।
जनता की आवाज् :
हमें जितनी सरकारों के बारे में जानकारी है, वे सबके सब मुख्य रूप से, जनता के प्रति उदासीन रहकर ही शासन करती रही हैं, वे हमेशा ही देश के राजनीतिक रूप से सचेत इस या उस तबके की, अल्पसंख्यक सरकारों ही रही हैं। लेकिन जब यह दैत्य (यानी जनता – स.) जाग जायेगा, तो उसी की मज़ी लागू होगी, लेकिन सबसे बड़ी बात है कि यह समय से जोगेगा या नहीं।
qσσ 71 (68)
भूमिका ¹ लेकिन ने जुलाई, 1917 में लिखा, “यह अक्सर होता है कि जब घटनाएँ अचानक मोड़ ले लेती हैं, तो एक अग्नि पार्टी भी कुछ समय तक के लिए इस नयी परिस्थिति के साथ अपनी सुर्यागति नहीं बना पानी। वह वे ही पुराने जुम्ले दुहराती रहती है, जो इस नयी परिस्थिति में अर्थहीन हो चुके होते हैं, तथा जिस अनुपात में घटनाओं में 'अप्रत्याशित' परिवर्तन हो चुका होता है, उसी अनुपात में उनकी अर्थवया भी 'अप्रत्याशित रूप से' खुम हो चुकी होती है।
रणकोशल और रणनीति :
जैसे युद्ध में, बैसे ही राजनीति में भी, रणकौशल का अर्थ है अलग-अलग कार्वाई का संचालन करने की कला; रणनीति का अर्थ है विजय पाने की, अर्थात सता पर वास्तविक कृष्णा करने की कला।
प्रचार और कार्वाई :
और जब संवहारा वर्ग की पार्टी तैयारी से, यानी प्रचार और संगठन एवं आन्दोलन से, आगे बढ़कर सता के लिए वास्तविक संबंध में उत्तरती है और बुजुआ वर्ग के विरूद्ध एक वास्तविक जन-विद्रोह को अंजाम देने लगती है, तब एक अत्यन्त अचानक बदलाव घाटित होता है। ऐसे में पार्टी के भीतर ऐसे तत्व जो दृढ़सकल्प नहीं रखते, या संदेहशील, या समझौतावादी, या कायर होते हैं - वे जन-विद्रोह का विरोध करने लगते हैं, अपने विरोध को उचित ठहाने के लिए सैद्रांतिक दलिलि खोजने लगते हैं, और उन्हें ये दलिलि, अपने कल के विरोधियों के बीच, एकदम पके-पकाये तौर पर, मिल भी जाती हैं।
400 72 (69)
“अब ज़ऱरत इस बात कि है कि हम अपनेआप को पुराने फ़ामूलों से नहीं, बल्कि नयी वास्तविकताओं से निर्देशित करें।”
वह हमेशा ही भविष्य के लिए अतीत से लड़ते रहे। ...लेकिन एक क्षण ऐसा आता है जब सोचने की यह आदत, कि दुश्मन अधिक बलवान है, विजय के लिए मुख्य बाधा बन जाती है। ...लेकिन ऐसी परिस्थितियों में हरके पार्टी के पास अपना लेसन तो होगा नहीं। ...महत्वपूर्ण क्षण को गाँब देने का क्या मतलब होता है?...
रणकौशलों की सारी कला इसी में है, कि जब परिस्थितियों का संयोग सर्विधिक अनुकूल हो तो उस धारण के अनुरूप कार्वाई की जाये…। परिस्थितियों ने ऐसा ही संयोग उपस्थित किया था और लेजिन ने कहा था कि संकट को किसी न किसी पक्ष में हल करना जरूरी है। लेजिन ने बार-बार कहा, 'अभी या कभी नहीं'।
400 73 (70)
एक क्रॉनिकारी पार्टी की ताकत्व एक निश्चित सीमा तक बढ़ती है, लेकिन उसके बाद इसका उल्ता भी हो सकता है...¹⁶ “हचिकिनान अपराध है”...अकटूबर की शुरुआत में...(लेिन ने)...लिखा,
“सोवियतों की कार्ग्रेस का इन्जार करना औपचारिकताओं का एक बचकना खेलखेलना है, औपचारिकताओं के साथ एक अपमानजनक खेल खेलना है, यह क्रितके साथ विश्वासघात करना है।”
उपयुक्त क्षण :
राजनीत में समय एक महत्वपूर्ण कारण है, और युद्ध एवं क्रान्तिक में तो यह हजारों गुना अधिक महत्वपूर्ण है। चीज़ जो आज की जा सकती हैं, कल नहीं की जा सकती। हिथியार लेकर उठ खड़े होना, दुश्मन को पराजित करना, सता पर कृष्णों करना, आज सम्भव हो सकता है, और कल असम्भव हो सकता है। लेकिन आप कह सकते हैं कि सता पर कृष्णों करने का मतलब तो इतिहास की धारा को बदल डालना होता है, और क्या यह सम्भव है कि एक ऐसी चीज़ महज 24 घण्टे की देरी पर निभर हो? हैं, जब सशस्त्र जन-विद्रोह की घड़ी आ जाती है, तब घटनाएँ राजनीतिके लम्बे पैमानों से नहीं, बल्कि युद्ध के छोटे पैमानों से नापी जाती हैं। इसमें कुछेक हपते, कुछेक दिन, या यहाँ तक कि कभी-कभी एक दिन की देरी का मतलब क्रान्तिक का परित्याग हो सकती है, घुटने टेक देना हो सकता है। राजनीतिक चालबाजी, खासतौर से क्रानित में, हमेशा खतरनाक होती है। आप दुश्मन को धोखा दे सकते हैं, लेकिन इससे आपके पीछे चलने वाले जनसमुदाय दिगभ्रित हो सकते हैं।
400 74 (71)
हैचिकचाहट :
नेताओं की ओर से दिखायी जाने वाली, और उनके अनुयाियों द्वारा महसूस की जाने वाली हिचिकचापहट राजनीति में आमतौर पर नुकसानदेह साबित होती है, और सशस्त्र जन-विद्रोह की स्थिति में तो यह एक घातक खतरा है।
ཕུཿཧཱ
...“युद्ध युद्ध है”, चाहे जो भी हो, इसमें कोई हिचिकचहट या वक्त की बरबादी नहीं होनी चाहिए।
अक्षम नेता :
…ऐसे नेताओं की दो क्रिसमें हैं जो पार्टी को ऐसे वक्त पीछे खींचने की रूशान रखते हैं, जब उसे सबसे तेज गति से आगे बढ़ने की ज़रूरत होती है। एक क्रिसम ऐसे नेताओं की है जिनकी प्रवृत्ति क्रिति के रास्ते में हमेशा ही बेपनाह कितनाइयाँ और बाधाएँ देखने की होती है, और जो उन्हें देखकर – सचेत या अचेतन तौर पर – उनसे बचने की इच्छा रखते हैं। ये माकर्सवाद को तोड़-मरोड़कर इस रूप में व्याव्यातिय करने लगते हैं कि क्रितिकारी कार्बोडिकी असम्भव है। दूसरे किसम के नेता महज सतही आन्दोलनकर्तिभर होते हैं। वे जब तक बाधाओं से टकराकर अपना सिर नहीं फोड़ लेते, तब तक उन्हें कभी बाधाएं नजर ही नहीं आती। वे समझते हैं कि बस भाषण झाड़ कर ही वास्तविक कितनाइयों से निजात पा लोगों के प्रत्येक चीज को अति आशावाद के साथ देखते हैं, और जब सचमुच कुछ करने को होता है, तब ठीक उसी वक्त पाला बदल लेते हैं।
q अनंत घात 80 की घात 1 पृष्ठ सं. 75 से 100 नोटबुक की हमं उपलब्ध हुई प्रति में नहीं थे। ♀♂ 101 (74)
समाजशास्त्र² मूल्य : अगली पृष्ठां १०१ (७४) है। - सम्पादक
“1 པ་བསམས་པ་ = ཆ། ལོ་ཆེའི་ཆུ་མཐོར་ཡིན། ཡང་མཆོད་པ་ལ། ཡང་མཆོད་པ་ཡིན། ཡང་མཆོད་པ་ཡིན། ཡང་མཆོད་
कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि उस प्रमशकित के खर्च किये जाने की विधि क्या रही है। अब ये सारी चीजें हमं बताती हैं कि उपर्युक्त उत्पादों के उत्पादन में मानव-प्रमख्यर्च किया गया है, यानी कि उनमें प्रभ ही मूर्तिमान हुआ है। जब हम इस सामाजिक पदार्थ यानी प्रभ को उसके अलग-अलग स्पष्ट मूर्तिमान रूपो में देखते हैं, तो सर्वसाधारण के लिए, वे ही 'मूल्य' कहलाते हैं। ✓ कानून¹ : मावर्स - “पूँजी”, अंग्रेजी अनुवाद (पृष्ठ 3,4,5)
“बहरहाल, समाज कानून पर नहीं आधारित होता है। यह तो एक कानूनी गलप है। इसके विपरीत, कानून को अवश्य ही समाज पर आधारित होना चाहिए। इसे निश्चय ही समाज के लिए और आवश्यकताओं की अभियक्ति होना चाहिए, और इसे आधारित होने उलादन की खेच्छाचारिता के बजाय, उत्पादन की सामाजिक और निरपबाद रूप से भूतिक उत्पादन-प्रणाली से नि:सूत होना चाहिए। इस समय मेरे हाथ में नेपालीयन संहिता है, लेकिन इसने आधुनिक नागरिक समाज को नहीं पैदा किया है। 18वीं सही में जन्म और 19वीं सही में विकसित हुआ समाज इस सीहिता में सिर्फ एक कानूनी अभियक्ति के रूप में निहित है। जब यह सामाजिक दशाओं के अनुरूप नहीं रह जायेगा, तब यह महज रही कागुज का पुलन्दा ही सिद्ध होगा...। जीवन की बदलती दशाओं के साथ-साथ कानून भी निश्चित तौर पर बदलते रहे हैं। परन्तु सामाजिक विकास की नयी आवश्यकताओं और अपेक्षाओं को दरिकार कर (युग की पुकार के लिहाज से) पुराने कानून को बनाये रखना, दरअसल, सर्वसाधारण के होत के विपरीत कानूनी खास होती की पाखण्डपूर्ण हिमायत के अलावा और कुछ नहीं है। ” माक्स (कोलेन की जूरी अदालत में)²
√ जनसमुदाय :
“जनता एक ऐसे भारी-भरकम और पंचमेल जानवर की भाँति होती है, जो अपनी ही ताकृत से अनिष्ठाहरहता है और इसीलिए बोझ दोते हुए कोडे-डपेड खाता रहता है। यह उस फतने बच्चे द्वारा भी हाँक लिया जाता है, जिसे वह जब चाहे धकके मारकर फंक सकता है। लेकिन यह उस बच्चे से डरता है और इसीलिए यह उसकी सारी सनकों और मनबहिकियों को शेलता रहता है, और कभी महसूस नहीं करता कि वह बच्चा खुद उससे कितना डरता है...। अद्भुत है! लोग खुद अपने ही हाथों से अपनेआप को फाँसी दे देते हैं और खुद ही जेले चले जाते हैं तथा खुद ही अपने ऊपर युद्ध और मौत का कहार बरपा कर लेते हैं। किसलिए? बस एक दमड़ी के लिए, जो उन्हीं तमाम दमडियों में से एक होती है जिन्हें वे खुद ही राजाको दे चुके होते हैं। जबकि धरती और आकाश के बीच जो कुछ है सब तो उनका ही है, लेकिन वे इसे नहीं जानते और अगर उन्हें कोई यह बता दे तो वे उस आदमी को गिराकर मार डालेंगे।
ईटा 102 ब्रैकेट में 75 “मावर्सवाद बनाम समाजवाद” (1908-12) तोमास्से कैमानेला¹ वह एक-एक करके माक्सं के सारे सिद्धांतों की आलोचना करते हैं और इन सभी को खारीर करते हैं :
1. मूल्य का सिद्धांत
2. इतिहास की आर्थिक खासया
3. सम्पदा का थोडे से हाथों, अर्थात पूजीपतियों के हाथों में संकेन्द्रण, मध्यम वर्ग का पूरी तरह खाला और संवहारा वर्ग की बाढ़
4. बढ़ती गरुरीकी का सिद्धांत, जिसकी परिणति के तौर पर
5. आधुनिक राज्य और सामाजिक व्यवस्था का अपरिहार्य संकट।
वह निष्कर्ष निकालते हैं कि माकर्सवाद सिर्फ इन्होंी मूलभूत सिद्धांतों पर आधारित है, और उन्हें एक-एक करके खारीज करते हुए, निष्कर्ष के तौर पर कहते हैं कि क्रान्त के जल्दी फूट पड़ने की سारी धुँबली आशंकाएँ अभी तक निमूल ही साबत हुई हैं। मध्यम वर्ग घट नहीं, बल्कि बढ़ रहा है। धनी वर्ग संख्या में बढ़ रहा है, तथा उत्पादन और उपभोग की प्रणाली भी परिस्थितियों के अनुसार बदल रही है, अत: मजदूरों की दशा में सुधार करके किसी भी प्रकार के संघों को टाला जा सकता है। सामाजिक अस्थिनात का कारण बढ़ती ग्रीरी नहीं, बल्कि औद्योगिक केन्द्रों पर ग्रीब वागों का संकेन्द्रण है, जिसके नाते वर्ग-चेतना पैदा हो रही है। इसलिए यह सब चिल्ल-पॉं है।
q00 103 (76)
लेस मिजरबல்स की भूमिका
জব তক কানুন আঁর পরমণা কী বদীলত এক ঐসী সামাজিক অধোগিত মৌজুত রেগি জিসমেস স্বণত্য কে ষীতর নর্ক নির্মিত হতে রেইগে আঁর দ্বীয নিয়তি কে সাথানভীয নিয়তি কা উলদ্ধাব হোতা রেগিগা, জব তক ইস যুগ কী তীন সমস্যাঁ গুণিবি কে কারণ মনুষ্য কী দুটি, ধুষ্ব কে কারণ নারী কী অধোগিত, আঁর অঙ্গানতা কে কারণ বর্ষবোষী কী অশকতা – হল নর্থি হেটির, জব তক কুচু ষেরি মে সামাজিক শুচন মৌজুত রেগি - ভুয়ে লাব্দো মেনি, তথ্য এক আঁর খী ল্যাপক দুটিকোণ সে – জব তক ইস ধরণী পর অঙ্গানতা আঁর বদহালী বরুকার রহেগি, তব তক ঐসী কিতাবে অর্থাৎ নর্থি সিদ্ধ হোগী।
"विक्रर हूगो"²
“न्यायाधीश (अपने फैसले से) जो कष्ट पहुँचता है, यदि वह स्वयं उसके प्रति निष्ठुर हो, तो वह न्याय करने का अधिकार खो बैठता है।”
“रविन्दनाथ ठाकुर”3
“लेकिन अप्रतिरोधी शाहदत जो कर पाने में असफल रह जाती है, उसे न्यापिथ्र्य और प्रतिरोधी शक्ति कर डालती है, तथा अत्याचारी को और अधिक हानि पहुँचाने में नाकाम कर देती है।”⁴
“핵मान허리 허어”은 벌어 머리 놓이기 위한 핵이 허리를 밀어 놓아 머리를 밀어 놓아 밀어 허리를 밀어 놓아 밀어 허리를
q50 104 (77)
सभी विधि-निमिता अपराधियों के रूप में परिभाषित :
आदिकाल से लेकर लाइकरग्स², सोलोन³, मोहम्मद⁴, नेपालिन⁵, आदि तक मनुष्यों के लिए जितने भी विधि-निर्माता और शासक हुए हैं वे सब के सब अपराधी रहे हैं, क्योंकि नये कानूनी का विधान करके, स्वाभाविक तौर पर, उन्होंने उन पुराने कानूनी को भंग किया, जिन्हें समाज प्रद्वारूवंक मानता आ रहा था और जो पूर्वजों से विरासत में मिले हुए थे।
(पृष्ठ 205) अपराध और दण्ड - दंस्तायंककी 6
बर्क $ ^{7} $ का कहना है, “एक सच्चा राजनीतिज्ञ, हमेशा इस बात पर सोचता रहता है कि कैसे वह अपने देश में मौजूद संसाधनों से ज्यादा से ज्यादा अर्जित करे।”

200105(78)

कानून :
1. कानून का प्राविधान
2. कानून का इतिहास
3. कानून-विधान का विशान
{ 1. सैड्रांतिक 2. सामान्य }
1. विश्लेषणात्मक
2. ऐतिहासिक
3. नीतिशास्त्रीय
(i) दर्शन
विधिशास्त्र विधिशास्त्र जिस रूप में वह मौजूद है। जिस रूप में उसका विकास हुआ। जैसा उसे होता चाहिए। विधि के विज्ञान के लिए आधार प्रदान करना।
1. विश्लेषणोत्तमक विधिशास्त्र कानून के प्रथम सिद्धान्त की व्याख्या करता है। इसकी विषय-वस्तु है :
(अ) नागरिक कानून की अवधारणा
(ब) नागरिक और अन्य कानूनी के बीच सम्बन्ध
(स) विविध संघटक विचार जो कानून की धारणा, जैसे राज्य, सम्प्रभुता और न्याय-प्रशासन का संघटन करते हैं।
(द) कानून के कानूनी स्ोत और विधि निर्माण का सिद्धांत आदि।
(य) कानून के वैज्ञानिक वर्गिकरण।
(र) कानूनी अधिकार
(न) कानूनी (नागरिक और फैजदारी) दायितक का सिद्धांत
(v) अन्य कानूनी अवधारणाएँ।

ηο 106 (79)

2. ऐतिहासिक विधिशास्त्र कानून, कानूनी अवधारणाओं की उत्पत्ति और विकास को निर्धारित करने वाले सामान्य सिद्धांतों का अध्ययन करता है। यह इतिहास है। 3. नीतिशास्त्रीय विधिशास्त्र : यह कानून के सम्बन्ध में न्याय के सिद्धांत से सम्बन्धित है।
कानून और न्याय :
कानून के नीतिशास्त्रीय निहिताथॉं की पूर्ण अवहेलना विश्लेषणात्मक विधिशास्त्र को एक बेजान प्रणाली में तब्दिल कर सकती है। इंग्लेपड में :
दो भिन्न-भिन्न शब्द “कानून” और “न्याय” लगातार इस बात को याद दिलाते रहते हैं कि ये दोनों एक ही चीज नहीं बल्कि दो भिन्न चीजें हैं। लेकिन इनके इस्तेमाल में इन दोनों के बीच मौजूद वास्तविक और घनिष्ठ सम्बन्ध अक्सर आँख-ओंशल हो जाया करता है। और महत्वपूर्ण में :
[रेचट : राइट (अधिकार) = डॉर्ट : लॉ (कानून)]
महाद्रिपीय भाषा-शैली "कानून" और "अधिकार" के बीच के फ़र्क को चिपाती है, जबकि अंग्रेजी भाषा-शैली उनके बीच के सम्बन्ध को चिपाती है।

పోట 107 (80)

कानून :
“हम उस किसी भी किसम के नियम या सिद्धांत को कानून नाम दे देते हैं, जिसके द्वारा कार्बोडिया निर्धारित की जाती हैं।”
“कानून अपने सर्वाधिक सामान्य अर्थ में कार्बोडिक सम्बन्धी नियम को विशिष्टिकृत करता है, और यह सभी प्रकार की कार्बोडिक पर बिना भेदभाव के, लागू होता है, चाहे वे तर्परक हों या तर्कहिन, जीवधारी से सम्बन्धित हों, या निर्जिव से। इसीलिए हम गति के, गुरुलाकर्षण के, प्रकाश के, भूतिकी के, प्रकृति के और राष्ट्री के नियमों की बात करते हैं"।

कानूनों के प्रकार

1. अनिवाय कानून
2. भौतिक नियम या वैज्ञानिक कानून
3. प्राकृतिक या नैतिक कानून
4. प्रचलित कानून
5. परम्परागत कानून
6. खावहारिक या तकनीकी कानून
7. अன்றराष्ट्रीय कानून
8. नागरिक कानून या राज्य का कानून

φθ 108 (81)

अनिवार्य कानून की अनुज़ति - 1. सजा, युद्ध आदि
1. अनिवार्य कानून का अर्थ है कार्वाई का नियम, जो किसी ऐसी सता द्वारा लोगों पर लागू किया जाता है जो इसका अनुपालन बलपूर्वक करवा लेती है।
'कानून एक आदेश है जो व्यक्ति या व्यक्तियों को एक निश्चित आचरण करने के लिए विवश करता है'
समाज की प्रत्यक्ष नैतिकता भी अनिवार्य कानूनों के दायरे में आती है। हॉर्स का दृष्टिकोण :
मनुष्य और हिथியार ही कानूनी की शिक्षा और सम्बल है।
2. भूमितक कानুন चल रही कार्वाइयों की अभभ्यक्ति है। (नैतिक कानুন या विवेक का कानুন कार्वाइयों की इस रूप में अभभ्यक्ति है, जैसी वे होनी चाहिए)।
3. प्राकृतिक या नैतिक कानून का अर्थ है प्राकृतिक रूप से सही या गलत के सिद्धांत - यानी सभी सही कार्बोडियों समेत प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत।
न्याय के दो प्रकार हैं - प्रत्यक्ष और प्राकृतिक। प्राकृतिक न्याय वह न्याय है जो वास्तव में और सचमुच हो। प्रत्यक्ष न्याय न्याय का वह रूप है जिस रूप में उसे समझा जाता है, स्वीकार किया जाता है, और अभिव्यक्त किया जाता है।

ησο 109 (82)

4. प्रचलित कानून : ऐसा कोई भी नियम या नियमों की प्रणाली है जिस पर लोग अपने आचरण के नियमन के लिए सहमत होते हैं। सहमत होने वाले पक्षी की सहमत ही कानून है।
5. परम्परागत कानून : मनुष्यों द्वारा वास्तव में की जाने वाली कार्बोडिया का कोई भी नियम - जो स्वैच्छक कार्बोडिया की किसी वास्तविक समस्त का की अभियक्ति है। परम्परा उन लोगों का कानून है जो इसे मानते हैं।
6. खावहारिक या तकनीकी कूनान्न : इसमें ऐसे नियम आते हैं जो खावहारिक उदेश्य की प्राप्त के लिए होते हैं। खेलों में, 'प्रचलित कानून' और 'खावहारिक कानুন' दोनों ही आते हैं, जिनमें पहले प्रकार के कानूनों के अन्तर्गत वे नियम आते हैं जिन पर खिलाडियों की सहमित होती है, और दूसरे प्रकार के कानूनों के अन्तर्गत वे नियम आते हैं, जो खेल को सफल बनाते हैं, या खेल को सफलतापूर्वक चलाने के लिए होते हैं।
7. अनतरराष्ट्रीय कानুন : इसमें वे नियम आते हैं जो सम्प्रभुतासम्पन राज्यों के आपसी सम्बन्धों एवं एक-दूसरे के प्रति आचरण का नियमन करते हैं।
(i) एक्सप्रेस कानুন (सिनधियाँ आदि)
(ii) अन्तिहित कानুন (परम्परागत)
पुन: दो प्रकार में विभाजित :
(i) सामान्य कानून (सभी राष्ट्रीं के बीच)
(ii) विशिष्ट कानून (दो या अधिक राष्ट्र विशेष के बीच)
8. नागरिक कानून : राज्य या देश का कानून, जो न्यायिक अदालत में प्रयुक्त होता है।

ηο 110 (83)

राजनीतिक जुम् : हम विधि-निर्माताओं के भारी समुदाय की इस सोच से सहमत हैं कि, भले ही, आमतौर पर उस व्यक्त पर कड़ी कार्बोर्ड नहीं की जानी चाहिए, जो ऐसी मुजिरमाना साजिश में शामिल रहा हो, जिस साजिश को अंजाम नहीं दिया गया हो, फिर भी राज्य के खिलाफ किये गये बड़े जुमों के सिஸ்लेले में इस नियम का एक अपवाद ज़्लर रखा जाना चाहिए, कारण कि राज्य के
ซีขนาจคุยโหยวเคยจะสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสูงมาสัตกาจ มีชื่อว่า หัวใจ มีชื่อว่า หัวใจ มีชื่อว่า หัวใจ มีชื่อว่า หัวใจ มีชื่อว่า หัวใจ มีชื่อว่า หัวใจ มีชื่อว่า หัวใจ มีชื่อว่า หัวใจ มีชื่อว่า หัวใจ มีชื่อว่า หัวใจ มีชื่อว่า หัวใจ มีชื่อว่า หัวใจ มีชื่อว่า หัวใจ มีชื่อว่า หัวใจ มีชื่อว่า หัวใจ มีชื่อว่า หัวใน ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีวิต ชีริกาจ มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีวิต มีชีริกาจ มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มีชีริกาดรีก มี ♀60 111 (84)
सजा :
स्वजन जो प्राणदण्ड का कारण बना : जब मासेज ने सपना देखा कि उसने डायोनीसयस² का गला काट दिया है, तब निरंकुश शासक ने उसे प्राणदण्ड दे दिया, जिसके पीछे उसकी दलील यह थी कि यदि उसने दिन में ऐसा सोचा नहोता तो रात में यह सपना कदपि नहीं देखता। प्रापदणद और डैक्को का कानून : डैक्को³ के कानून में लगभग सभी प्रकार के जुमों, जैसे मामूली चोरी से लेकर धर्म-द्रोह और हत्या तक के लिए एक समान मौत की सजा का विधान था, और कहा जाता है कि इसका एकमात्र स्मष्टिकरण जो डैक्को ने दिया था, वह यह कि छोटे-मोटे जुमों की तो यही सजा होनी चाहिए और बड़े जुमों के लिए इसे बड़ी सजा वह सोच नहीं सका। सजा को बहुतेरे दशिनिकों ने एक आवश्यक बुराई माना है। राज्य और मनुष्य : राज्य अपनेआप में कोई लक्ष्य नहीं है, और मनुष्य कानून या राज्य के लिए नहीं, बल्कि ये ही मनुष्य के लिए होते हैं।

φθ 112 (85)

न्याय : राज्य की भीतिक ताकतं के जरिये एक राजनीतिक समुदाय के भीतर अधिकार बनाये रखना। इसने उस व्यक्तिगत प्रतिशोध का स्थान ले लिया है, जब लोग ग्लतियों का प्रतिशोध स्वयं या अपने बन्धु-बान्धवों के सहयोग से ले लिया करते थे। उन दिनों, 'जिसकी लाही उसकी भौंस' का सिद्धांत काम करता था।
दिवानी और फ़ोजदारी न्याय :
नागरिक न्याय अधिकार लागू करता है। फैजदारी न्याय ग्लतियों के लिए सजा देता है। एक आदमी अपने बकाये का, या उससे गूलत ढंग से दबा ली गयी सम्पति को फिर से वापस पाने का दावा करता है। यह दीवानी (न्याय का मामला) है। फ़ैजदारी के मामले में, प्रतिवादी पर गूलत करने का आरोप लगा होता है। अदालत इस मुल्जम को कर्तव्य की अवहेलना के जुर्म में तथा अधिकार के उल्लाहन के जुर्म में, सज्जा देती है, जिसमें यदि हत्या का जुर्म है तो फाँसी और यदि चोरी का जुर्म है तो जेल की सज्जा देती है। [पृष्ठ ११३ (४८) पर जारी]
दिवानी और फैजदारी, दोनों ही प्रकार की कार्बोड में, गूलती की शिकायत दर्ज की जाती है।
- दिवानी (कार्वाई) में अधिकार का दावा किया जाता है,
- फ़ैज़दारी (कार्वाई) में गूलती का आरोप लगाया जाता है।
- दिवानी न्याय का सरोकार, प्राथमिक तौर पर, वादी और उसके अधिकारों से होता है,
- फ़ैज़दारी (न्याय) का प्रतिवादी और उस पर लगे आरोप से।
फ़ैज़दारी न्याय के उद्देश्य
यह तटस्थ 'अपराधकर्ताओं' जैसे राजनीतिक व्यक्तियों के मामलों में उपयोगी नहीं हो सकती। यह उनके लिए एक बुरा सौदा सिद्ध हो सकती है।
1. निवारक : कानून का प्रमुख उदेश्य दोषी व्यक्ति को एक नजीर बनाना और उस जैसे बाकी सभी व्यक्तियों को एक चेतावनी देना है। यह प्रत्येक अपराध को “अपराधकर्ता की एक दुभीवना” सिद्ध करता है। (इरादर का बदलाव)
2. निरோधक : दूसरे मामले में, यह निरोधक या अयोग्य सिद्ध करने वाला है। इसका विशेष उद्देश्य अपराधकर्ति को नाकाम कर उसे पुनः गूलत काम करने से रोकना है।
प्रणवदण्ड का औचितल : हम हत्यारों को फाँसी महज इसीलिप् नहीं देते कि यह दूसरों को (हत्या करने से) विरत करती है, बल्लक उसी कारण से, जिसे कारण से हम, उदाहरण के लिए, साँप को मार डालते हैं, क्योंकि हमारे लिए यही बेहतर है कि वे इस दुनिया में रहने के बजाय इससे बाहर हो जायँ।
3. सुधारात्मक : अपराध चित्र के ऊपर इरादों के प्रभाव से किये जाते हैं, और वे या तो इरादों के बदलाव से या चित्र के बदलाव से रोक जा सकते हैं।
निवारक सजा पहले मामले में दी जाती है, (कुछ शब्द अस्पष्ट - स.)
जबकि सुधारात्मक (सजा) दूसरे मामले में दी जाती है।

♀50 114 (87)

“सुधारात्मक सिद्धान्त” के पैरोकार सज्जन के सिद्ध उर्दर्भ रूपी की हिमायत करते हैं, जो अपराधी की शिक्षा और उसे अनुशासित करने के लिए उपयोगी होते हैं, और बाकी उन सभी (सजाओं) को अमान्य तहराते हैं जो लाभकारी तौर पर सिद्ध निवारक या अयोग्यकारी (होती हैं)। उनकी दृष्टि में मूल्य कोई उपयुक्त सज्नहरी हैं, 'हमें अपने अपराधियों का इलाज करना चाहिए, उनकी हत्या नहीं।' पिताई और अन्य शारीरिक सज्नाए बर्बेता की निशानी कहकर निन्दित की जाती है। वे ऐसी सजाओं को सजा भोगने वाले और सजा देने वाले दोनों को ही नीचे गिराने वाली और क्रूर मानते हैं।
कड़ी सजा का नतीजा। अपराधियों का खत्तरनाक और दुसराहसिक वर्ग पैदा हो जाता है।

4. प्रतिकारात्मक सज्जा :

राज्य की बलप्रयोग की कार्बोडिकी जितनी सक्षम होती है, वह सभी सामान्य मनुष्यों को खतरनाक रास्ता (पर जाने) से रोकने में उतनी ही सफल होती है, लेकिन कानून तोड़ने वालों में अधिक पतन का अनुपात भी उतना ही अधिक होता है। सर्वाधिक भयावह सिद्धांत! ऐसी सोच रखने वाले लोग वास्तव में प्राचीन और सभ्यतापूर्व कालों की बंबर मन:स्थितियों के हिमायती होते हैं।¹ यह प्रतिशोध या बदले की उस नैसरिक प्रवृत्ति को तुष्ट करती है, जो सिर्फ ग्लती का शिकार हुए व्यक्ति में ही नहीं मौजूद रहती, बल्कि व्यापक पैमाने पर समाज में उसके प्रति हमददी के रूप में भी मौजूद रहती है। इस दृष्टिकोण के अनुसार, यह सही और उचित है कि बुराई का बदला बुराई से लिया जाये। आँख के बदले आँख और दाँत के बदले दाँत प्राकृतिक न्याय का एक सीधा और अपनेआप में पूर्ण नियम माना जाता है। सज्जा खुद में एक मकसद बन जाती है।

q50 115 (88)

सजा एक बुराई :
सजा अपनेआप में ही एक बुराई है, और इसे सिर्फ एक महतर उद्देश्य की प्राप्ति के साधन के तौर पर ही उचित ठहराया जा सकता है। लेकिन प्रतिकारात्मक सिद्धांत के समर्थक इस ढंग से दलिल देते हैं : "दोष धन सजा बराबर निदोष्ता।"
“उसने न्याय के कानून का जिस गूलती द्वारा उल्लाघन किया है, उससे उसके ऊपर एक खग आयद हो गया है। अत: न्याय का तकारा है कि वह खग चुका दिया जाये…सजा का पहला उदेश्य भंग किये गये कानून को तुष्ट करना है।”
Peine forte et dure : यातना देकर मौत...जिसका फैसला निम्नलिखित रूप में दिया गया :
“​কি তুর্মুই ফিরে উঠে ম্যাক বোর্ডে যেমন বোর্ডে যেমন বোর্ডে যেম
यह सजा स्ट्री-पुरुष दोनों को समान रूप से उन सभी प्रकार के जुमों के लिए दी गयी जो गैर-मामूली नहीं थे

♀♂ 116 (89)

विदेशी अधीनात्:
जनतन का एक विदेशी जनता के ऊपर एक जनतन की कार्वाइयां प्रभुत और जितनी झपट्टामार और निर्मम होती हैं, उतनी और किसी विदेशी राष्ट्र : भी शासन की नहीं होती।
विवाह :
डॉ. टैंगोर³ का मानना है कि आदिम युगों से लेकर आज तक विवाह की प्रणाली सिर्फ़ भारत में ही बल्कि सारी दुनिया में स्ली और पुरुष के सच्चे मिलन के रास्ते में एक बाधा ही बनी हुई है, जोकि केवल तथी सम्भव है जब समाज इतना संक्षम हो जाये कि वह स्ली को, घर में रचनात्मक कार्य करने से रोके बगैर, उसकी विशिष्ट प्रतिभा को रचनात्मक कार्य में लगाने के लिए एक व्यापक श्रमुहेया कर सके।

q_{00} 117 (90)

नागरिक और मनुष्य :
स्माट्वासी पेడार्टीज् तीन सौ की परिषद में दागिबले के लिए उपस्थित हुआ, परन्तु उसे वापस कर दिया गया; वह इस खुशी में चला गया कि 300 स्माट्वासी उससे बेहतर तो थे। मैं समझता हूँ कि इसमें सन्देह की कोई गुजाइश नहीं कि वह सच्चा था, वह एक सच्चा नागरिक था। एक स्पार्टीवासी माँ के पाँच बेटे सेना में थे। एक दास आया। कॉपते हुए उसने समाचार पूछा। "तुम्हारे पाँचों बेटे मार डाले गये।" "तुच्छ दास, क्या तुमसे मैने यह पूछा था?"
“हमने विजय हिसल कर ली है”। वह देवताओं को धन्यवाद देने के लिए दौड़ि-दौड़ि मंदिर चली गयी। वह एक सच्ची नागरिक थी। जीवन और शिश्ता :
ลอก সির্ফี สุพรินี มีสินค้า 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุด 100 ชุมลดา 100 ชุด 100 ชุมลดา 100 ชุมลดา 100 ชุมลดา 10 उसे मौत से बचने के बजाय जिन की शिक्षा दो! जीवन साँस लेना नहीं बल्कि कर्म है। अपनी इन्द्रियों का, अपने दिमाग् का, अपनी शमताओं का, और अपने अस्तित्व को चेतन बनाये रखने वाले प्रत्येक भाग का इसेमाल करना है। जीवन का अर्थ उप्र की लम्बाई में कम, जीने के बेहतर हंग में अधिक है। एक आदमी सौ वर्ष जिन के बाद कृत्र में जा सकता है, लेकिन उसका जीना निरथिक भी हो सकता है। अच्छा होता कि वह जवानी में ही मर गया होता। ईटा एच ओ 118 ब्रैकेट में 91 सतः सत्य कोई खुजाना नहीं प्रदान करता, और जनता कोई राजदूत या प्रोफेसर का जुमீ और मुज़िरम :
“…பக்தி-பகையை தாராளப்படித் தருகிற காரணம், கூறுகளும் கூறுகின்றன. இது சமயத்தைப் பொறுத்தமட்டில், பகத்சிங்கின் கருத்துகள் பற்றிய பேச்சை, அவர் கேட்கவேண்டியது போன்ற பேச்சுக்கும், பகத்சிங்கின் சொந்த நிலைகளைக் கவனித்திடும் கூறுகள், அவர்கள் கூறுகின்றன. கிளிசி முஃரிசிசம் கோ சுஃழுஷர சகணித ஷி ஷாஷகஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷி ஷ

♀♂ 119 (92)

इखा बनाम सन्तुष्ट!
यदि एक चेतन प्राणी की शिकत्याँ उसकी इच्छाओं के बराबर होती तो वह पूरी तरह सुखी होता…। लेकिन सिर्फ अपनी इच्छाओं को सीमित करना ही कफी नहीं है, क्योंकि यदि वे हमारी शिकत्यां से कम है, तब तो हमारी शक्ताओं का एक अंश यों ही बेकार चला जायेगा, और तब हम अपने पूरे अस्तित्व का आनन्द भी नहीं ले पायेंगे। इसी तरह, अपनी शिकतयों का महज विस्तार भी प्यापत नहीं है, क्योंकि यदि हमारी इच्छाएँ भी बढ़ जायें, तब तो हम और अधिक दुखी हो हो जायेंगे। सच्चा सुख तो अपनी इच्छाओं और अपनी शिकतयों के बीच के अंतर को घटते जाने में निहित है।

第100页 120页 (93)

"बुजुआ क्रित का जन्म अपनी पूर्ववर्ती शासन-व्यवस्था में पहले से मौजूद परिस्थित से होता है।
“बुजुआ क्रित आमतौर पर सता पर कंबजे के साथ ही खृतम हो जाती है। लेकिन सर्वशां क्रांति के लिए सता पर कंबजा तो महज एक शुरुआतभर है, सता, जब कंबजे में आ जाती है, तब वह पुरानी अर्थव्यवस्था के रुपातरण और एक नयी अर्थव्यवस्था के संगठन के लिए एक उतोलक के रूप में इस्तेमाल की जाती है।”
फाई 2 0 की घात 1
“अभी भी दो भारी-भरकम और अत्यन्त दुःकर कार्यभार बाकी हैं - (एक देश - यानी लस - में मौजूदா शासन-व्यवस्था को उखाड़ फंकने के बाद भी)।
“सबसे पहला कार्यभार है आनत्रिक संगठन।
“दूसरी महत्वपूर्ण समस्या विश्व क्रानित की… – अनतरराष्ट्रीय समस्याओं को हल करने की, विश्व क्रानित को आगे बढ़ाने की है (जिसके हल किये बिना कम्युनिस्ट शासन-व्यवस्था अनतरराष्ट्रीय पूजौवाद के ख्तरे के विरुद्ध सुरक्षित नहीं रह सकती।)

ηθο 121 (94)

21-22²
1. यदि सर्वहारा को आबादी के बहुमत को अपने पक्ष में करना है तो उसके लिए सबसे पहले ज्यूरी है कि वह बुजुआ वर्ग को उखाड़ फेंके और राज्य सता पर क्बूजा करे।
2. दूसरे, उसे पुराने राज्य उपकरण को तोड़कर सोवियत सता स्थापित करना, और एक झटके में उस प्रभाव को खतम कर देना जरूरी है, जिसे बर्ज़ा का वर्ग और वर्ग-सहयोग के निम्न बुजुआवगीय समर्थक महत्वकश (गैर-सर्वहारा) जनसमुदायों के ऊपर डालते रहते हैं।
3. तीसरे, सर्वशांक वर्ग के लिए आवश्यक है कि वह उस प्रभाव को पूरी तरह और अनित रूप से नष्ट कर दे, जिसे बुजुआ वर्ग और निम्न-बुजुआ समझावादी बहुसंख्यक महत्वका (गैर-सर्वशांक) जनसमुदायों के ऊपर डालते रहते हैं। यह शोषकों की कीमत पर इन समुदायों की आर्थिक आवश्यकताओं के क्रान्तिकारी तुष्टकरण के द्वारा किया जाना चाहिए।
₽23
“सर्वशांत अधिनायकत्व का मतलब है जनसमुदायों का कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा मार्गदर्शन और निर्देशन। यद्यप पार्टी काफ़ी प्रभाव या नियन्तरण रखे हुए है, फिर भी इतना ही सब कुछ नहीं है। अपने मार्गदर्शन के अलावा, जनसमुदायों की 'इच्छा' भी किसी उदेश्य विशेष की प्राप्ति के लिए आवश्यक होती है।
“हमें यह स्माइक करना होगा कि मजदूरों के व्यापक समुदायों का वर्ग-चेतन अल्पसंख्या द्वारा नेतुल और मार्गदर्शन आवश्यक है। और यह पार्टी ही हो सकती है। पार्टी के पास पार्टी को सर्वहारा मजदूरों के साथ जोड़ने के लिए 'ट्रेड यूनियन' हैं...राजनीतिक क्षेत्र में सभी महततकश जनसमुदायों को इससे जोड़ने के लिए सोवियत हैं। [पृष्ठ 122 (95) पर जारी]
आर्थिक क्षेत्र में खासतौर से किसान समुदायों को जोड़ने के लिए 'कोआपरोटिव' हैं, उदियमान पीढ़ी के बीच से कम्पुनिस्टों को प्रशिक्षित करने के लिए 'युवा लीग' है। अन्तत: पार्टी स्वयं ही सर्वहारा अधिनायकत्व के अन्तर्गत एक अन्य मार्गदर्शक शक्ति है।”²
♀60 123 (96)
आंकड़े : आमदिनियों में असमानता उत्पादन :
युद्ध पूर्व यूनाइटेड किंगडम का (इंग्लेण्ड)
வாபீக்க உற்பாட்டின் கா மான ரஷா : £ 2000,000,000 विदेशी निवेशों से लाभ £ 200,000,000 ยักษ์ £ 2200,000,000
1. और 2. लेनिन की रचनाओं से
वितरण :
कुल आबादी के 1/9 अर्थात, पूजौपित या बुजुआ ने ले लिया
{ न्यूतम वार्शिक औसत आय £ 160 कुल उत्पादन का 1/2 अर्थात £ 1100,000,000 कुल आबादी के 2/9 अर्थात् निम्न बुजुआ वर्षे नं शेष आधे का 1/3 या कुल का 1/6 ले लिया अर्थात् £ 300,000,000
{ ओसत आय £ 160 प्रतिवर्ष से कम आबादी के 2/3 अर्थात शारीरिक {अौसत आय £ 60 वार्षिक प्रभ करने वाले या सर्वहारा को बाकी मिला £ 800,00,000 संयुक्त राज्य अमेरिका : 1890 में कुल उत्पादन का 40 प्रतिशत (उत्पादन के) साधनों के मालिकों को मिला कुल उत्पादन का 60 प्रतिशत सभी मजदूरों को दिया गया।¹

q00 124 (97)

जीवन का उद्देश्य
“जीवन का उदेश्य मन को नियक्तित करना नहीं बल्क उसका सुसंगत विकास करना है, मरने के बाद मोक्ष प्राप्त करना नहीं, बल्क इस संसार में ही उसका सबோतम इस्तेमाल करना है, केवल ध्यान में ही नहीं, बल्क दैनिक जीवन के यथार्थ अनुभव में भी सत्य, शिव और सुन्दर का सांशालकार करना है, सामाजिक प्रगति कुछेके की उनली पर नहीं, बल्क बहुतों की समृद्रि पर निर्भर करती है, और आत्मिक जनतन या सार्वभौमिक प्रातुल केवल तभी प्राप्त किया जा सकता है, जब सामाजिक-राजनीतिक और औद्योगिक जीवन में अवसर की समानता हो"¹²
नोटबुक में पृष्ठ सं. 125 से 164 नहीं है। हमें उपलब्ध प्रति में पृष्ठ (११) के बाद पृष्ठ (100) है। - सम्पादक

qσσ 165 (100)

राज्य का विज्ञान
प्राचीन राज्य व्यवस्था : रोम¹ और स्मार्ट,² अरस्सू³ और एल्टोग : राज्य के प्रति ल्यक्ति की मातहती इन प्राचीन राज्य व्यवस्थाओं, स्मार्ट और रोम की प्रमुख विशेषता थी। लेलास में, या रोम में, नागरिक को बस थोड़े से निजी अधिकार प्राप्त थे। उसका आचरण काफ़ी हद तक सार्वजनिक संसरिशप के अधीन था, और उसका धर्म राज्यसता द्वारा लागू किया गया होता था। एकमात्र स्च्বে नागरिक और सम्प्रभुतासम्पन्न निकाय के सदस्य विशेषाधिकार प्राप्त कुलीन वर्षों के मुक्त लोग होते थे, जिनके लिए शारीरिक श्रम दास किया करते थे, जिनके पास कोई नागरिक अधिकार न थे।
सुकरात :
सुकरात' को यह दलिल देते हुए प्रस्तुत किया जाता है कि जो कोई भी नागरिक राज्य में पहुँचने के बाद, यदि स्वेच्छा से एक नगर में रहने लगे, तो उस सरकार की मातहती स्वीकार करनी चाहिए, भले ही उसे इसके कानून अनुचित क्यां न लगें, तदनुसार ही, इस आधार पर कि यदि वह जेल से फ़रार होकर भाग जाये, तो राज्य के साथ उसका क्रार भंग हो जायेगा, वह एक अनुचित सजा के लागू होने का भी इतजार करते रहने के लिए तैयार रहे।
प्लेटो : ( सामाजिक समझोता )
वह समाज और राज्य की उत्पत्ति को पारस्कारिक आवश्यकताओं में देखता है, क्योंकि मनुष अलग-अलग रहकर अपनी बहुविध आवश्यकताओं को तुष्ट करने में असमर्थ होते हैं। वह एक क्रिसम के आदर्शकृत स्माटि का चित्रण करते हुए कहता है, “एक आदर्श राज्य में, दार्शनिकों को शासन करना चाहिए, और नागरिकों के निकाय को इस कुलीन तन्ना या सर्वप्रिंटों की सरकार के प्रति निश्चित रूप से आजाकारी होना चाहिए।" वह नागरिकों के सचेत प्रशिक्षण और शिक्षा पर जोर देता है।

अरस्तू :

งพุทธศักราช 44 ใด 100 ปี 198 “राज्य का बीज परिवार या कुटुम्ब में होता है। कई कुटुम्बों के संयुक्त होने से ग्राम समुदाय की उपतित हुई है (जिसके) सदस्य पितृसतात्मक सरकार के अधीन होते हैं। “कई गाँवों को मिलाकर राज्य का निर्माण हुआ, जो एक प्राकृतिक, स्वतंत्र, और आत्मनिथ्र संगठन था। "लेकिन जहाँ कुटुम्ब एक व्यक्तिव द्वारा शासित होता है, वहीं संवैधानिक सरकारों में व्यक्ति स्वतंत्र और अपने शासकों के समान होते हैं। “प्राकृतिक सामाजिक मैत्री और परस्पर लाभ से एकता गितत होती है। मनुष्य अपने स्वभाव से एक राजनीतिक (सामाजिक) प्राणी है। “राज एक संश्रय से कहीं अधिक है, जिससे व्यक्त जुड़ सकते हैं या बिना कोई फर्क पड़े छोड़ सकते हैं, लेकिन स्वतंत्र या नागरिकतारहित मनुष अविश्वसनीय, असभ्य, और एक नागरिक से भिन्न कोई चीज होता है।

पलोटन:

ऐलेटो ने एक ऐसे निकाय के रूप में राज्य की इस अवधारणा का पूर्वनमान किया था जिसके सदस्य एक सर्वमान्य लक्ष्य के लिए सामंजस्यपूर्ण ढंग से संयुक्त हों। अरस्तू :
अरस्सू का मानना था कि जहाँ स्वतंत्रता और समानता हो, वहाँ बारी-बारी से शासन और अधीनीकरण हो, लेकिन सबसे अच्छा यही है कि यदि सम्भव हो तो, वे ही व्यक्त हमेशा शासन करते रहे। ऐलेटो के साम्यवाद के विरोध में उसकी दलील बाकायदा नियम निर्धारित निजी सममित के पक्ष में थी, जिसके पीछे उसका विचार यह था कि राज्य में सिर्फ एक नैतिक एकता ही सम्भव या वांछनीय है। (सरकारों के प्रकार)
उसने सरकारों को राजतनां, कुलीनतनां और गणतनां तथा क्रमश: उनके विकृत रूपों, जैसे निरंकुश तनां, अल्पतनां और जनतनां में वर्गिकृत किया, जिसका आधार यह था कि इनमें सवोंच सता एक या कुछ या कई के हाथों में होती है, और इनका उदेश्य सामान्य हित या शासकों का निजी हित होता है तथा इनमें स्वतंत्रता, सम्पाद, संस्कृत और कुलीनता को भी तवज्जो दी जाती है। प्रत्येक राज्य व्यवस्था के तीन अंग होते हैं : (1) विमशर्तमक (2) कार्योत्तम और (3) न्यायिक निकाया। नागरिकता का निर्धारण न तो निवास से होता है न ही कानूनी अधिकार रखने से, बल्कि न्यायिक सता और सरकारी कामकाज में भागीदारी से होता है। नैतिकता का एक निश्चित स्तर प्राप्त करके कईयों को शासन करना चाहिए, क्योंकि अलग-अलग व्यक्तिगत तौर पर कम योग्य होने के बावजूद, वे सिममिलित रूप से, कुछके चुनिन्दा व्यक्तियों से कहीं अधिक चतुर और अधिक सदगुणसम्मन होते हैं। लेकिन सारी विमशात्मक और न्यायिक कार्यवाहियों को सँभालने के बावजूद, उन्हें उच्चतम कार्योत्तमक पदों से बाहर ही रखना चाहिए। सबसे अच्छी राज्यवस्था वह है जिसमें बहुत धनी और बहुत ग्रीब के बीच का मध्यम वर्ग सरकार चलाये, कारण कि इस वரி का जीवन सबसे स्थायी होता है तथा यह सबसे विवेकसम्मत, और साथ ही सर्वधानीक कार्यवाही में सबसे सशम भी होता है। [पृष्ठ 167 (102) पर जारी] वस्तुत: इसी के लिए यह कहा जाता है कि समप्रभुता को नागरिकों की बहुत संख्या में निहित होना चाहिए, जिसमें बेशक दास नहीं आते। जनतन्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मामले में समानता पर एकमत होते हैं, जिसका निहिताथ्य यह है कि सभी नागरिक, राज्य के पदों पर आसीन होने या चुने जाने के लिए, तथा हरेके सब पर और सभी हरेके पर शासन करने के लिए अह्य होते हैं। अरस्सू भी, फ्लेटो की भाँति ही जनतन्व को सरकार का एक विकृत रूप मानता था, और कहता था कि यह अन्य किसी प्रकार के राज्यों की अपेक्षा बड़े राज्यों के लिए अधिक उपयुक्त है। स्टेइकवादी : सिनकवादी :
एपीक्यूरसवादी : एपीकयूरस¹ का कहना था, "न्याय स्वयं में कुछ नहीं है, यह बस परस्पर नुकसान रोकने के लिए (न्याय के आधार के तौर पर) समझोते की एक तरकीबभर है। स्टोड्क : (वाद)
दर्शनिक जेजो (340-260 ई.पூ.)¹ का एक शिष्य, जिसने एन्नेस के 'स्तोआ पाँडकलाइट' (पेण्टेड पोर्च) नामक बर्गिचे में अपनी दर्शनिक शाखा का शिक्षण-संस्थान खोला। बाद में कैटो द यंगर², सेनेका³, माक्यूस ऑरिलियस⁴ रोमन स्टोइकवादी हुए। स्टोइक शब्द का शास्त्रिक अर्थ है : 'वह व्यक्त जो सुख या दुख के प्रति विरक्त हों' स्टेइकवाद पुराने दर्शन की एक शाखा है, जो जीवन और कर्तव्य के प्रति अपने दृष्टिकोण में एपीकयूरसवाद का प्रबल विरोधी है; और सुख या दुख के प्रति उदासीन है।

सिनीकाव्ाद :

दार्शनिकों का एक सम्प्रदाय जिसकी स्थापना एशंस के एण्टीथेनीज् (जन्म 444 ई.पु.) ने की थी, जिसकी अभिलाक्षणिक विशिष्टता धन-दौलत, कला, विज्ञान और आमोद-प्रमोद के विरूद्य एक प्रकट घृणा के रूप में थी। इन्हें सिनिक इनके रुखे व्यवहार के कारण कहा जाता है। सिनिकवाद कभी-कभी मानव-स्वभाव के प्रति तिरस्कार भावना के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है।

एपीक्यूरसवादी :

एपीक्युरूस (341-270 ई.पூ.) एक यूनानी दार्शनिक था, जिसकी शिक्षा थी कि सुख ही असली चिज़ है। एपीक्यूरसवादी उसे कहा जाता है जो खाओ-पीओ और मौज-मस्ति में विश्वास करता है।
ησο 168 (103)

रामन राज्य-व्यवस्था

रोमनों ने राजनीतिक सिद्धांत में कम ही ऐसा इज्ञाफ़ा किया गया जिसका प्रत्यक्ष महत्व हो, लेकिन एक घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित विभाग, यानी विधिशास्त्र में - उन्होंने गहरी रचि வாலா और मूल्यवान योगदान किया। गणितनं के अन्तगत, “नागरिक कानून” (जस-सिविक)
जस-सिविक के अतिरिक्त, जस-जेणटयम (राष्टे के कानून) नाम से जस-जेणटयम देरों नियम और सिद्रित अस्तत्व में आ चुके थे, जो इतालवीं कबीलों के बीच प्रचिलित सामान्य विशेषताओं को प्रतिबिम्बत करते थे। महान रोमन ज्यूरीस-कन्सल्ट्स (कानून-विशान के विशेषज्ञ)
जस नेचुर्हेस्टेडिकवादियों के विचार से प्रेरणा लेकर) धीरे-धीरे प्रकृति के कानून (जस नेचुरेल) को जस-जोर्णटयम के समक्षप मानने लगे। उनकी शिक्षा थी कि यह कानून देवीय और शाश्वत था, और कि यह किन्हीं विशिष्ट राज्यों के कानूनों से अपनी भगवता और वैधता में कहीं अधिक श्रेष्ठ था। प्राकृतिक कानून को वास्तव में अस्तवमान माना जाता था, और इसे नागरिक कानून से सम्बद्ध समझा जाता था। एण्टिनियाई काल¹ में, जब रोमन कानून अपना चरम विकास कर चुका था और स्टोइकवादी सिद्धांत सर्वाधिक प्रभावी हो चुके थे, तब विधिवेताओं ने राजनीतिक सिद्धांतों के रूप में नहीं, बल्कि न्यायशास्त्रिय रूप से, यह सिद्धांत सूत्रबद्ध किया कि :
“सारे मनुष्य जन्मजात स्वतंत्र होते हैं।”
और कि प्रकृति के कानून से, “सारे मनुष्य समान होते हैं” - जिसका निहिताथ यह था कि भले ही नागरिक कानून में वर्ग-भेद की मान्यता थी, प्रकृति के कानून के समक्ष समूची मानवजாति बराबर थी।

रामन राज्य व्यवस्था में सामाजिक समझोता :

यद्यपि रोमन विधिवेताओं ने नागरिक समाज की उत्पत्ति के तौर पर किसी समझोंते को स्वीकार नहीं किया था फिर भी स्वीकृत अधिकारों और दायितलों को एक किलपत, लेकिन ग्र-मौजूद समझोंते से निगमित करने की एक रुझान मौजूद थी। सम्प्रभुता के मामले में, नागरिक कोमिटिया ट्रूब्यूरा¹ में एकत्र होकर, गणतानके स्वर्णम दिनों में, सवॉच्व सता के रूप में काम करते थे। साम्राज्य के अन्तर्गत, सम्प्रभु सता समाट में निहित थी, और बाद के ज्यूरीस कंसल्ट्स के अनुसार, जनता लेकस रिजिया² के अनुसार, सवॉचक कमान प्रत्येक समाट को, उसके शासन के शुरू होते ही, सौंप देती थी, और इस प्रकार शासन करने और कानून बनाने के अपने सारे अधिकार उसे सौंप देती थी।
♀♂ 169 (104)

मध्य युग

(टॉमस एक्वनास)
టొమ్మన एक्लिब्रिमेट : (1226-1274) के बारे में कहा जाता है कि वह मध्य युग के राजनीतिक सिद्धांत का प्रमुख प्रवर्तक था। उसने, रोमन विधिवंत्रताओं का अनुसरण करते हुए, एक प्राकृतिक कानूनी को मानता है, जिसके सिद्धांत मानवीय विवेक में देवीय रूप से निविध किये गये (माने गये - स.) और इसके साथ ही उसने उन प्रत्यक्ष कानूनीको भी मानता है, जो भिन्न-भिन्न राज्यों में भिन्न-भिन्न हुआ करते थे। उसका कहना था कि कानून बनाने वाली सता, जोकि सम्प्रभुता की अनिवार्य विशेषता होती है, सामान्य कल्याण की दिशा में निर्देशित होनी चाहिए, और कि इस उदेश्य की प्राप्त के लिए, इसे बहुसंख्यक जनता या उसके प्रतिनिधि, राजा, से सम्बद्ध होना चाहिए। उसे राजा, कुलीनों, और जनता की मिली-जुली सरकार संवोतम प्रतित होती थी जिसमें संबोच सता के रूप में पोप हो।
पाटुआ का मार्सिलो^4
(1328 में निधन)

समझोते की धारणा

अपनी कृत 'डिफेन्सर पैसिस' में पादुआ के मार्सिलिओ ने लोकाधारित सम्प्रभुता के सिद्धांत की हिमायत की, और लौकिक सता के प्रति उन पोपवादी पाखण्डों का विरोध किया, जो फाल्सो डिक्रिटल्स पर आधारित थे।
( जनता की सम्प्रभाता)
चूंकि मनुष्य ने नागरिक जीवन अपने पारस्कारिक हित के लिए अपनाया इसलिए कानून भी नागरिक के निकाय द्वारा ही बनाये जाने चाहिए; कानून जब तक उन लोगों द्वारा नहीं बनाये जाते, जिनके हित इनसे सीधे प्रभाषित होते हैं और जिन्हें पता होता है कि उनकी आवश्यकताएँ क्या हैं, तब तक न तो वे संवोधनकहं जा सकते हैं, और न ही उनका तत्परा से पालन किया जा सकता है। उसने दावे के साथ कहा कि कानून बनाने वाली सना जनता में निहित होती है, और कि विधायिका का काम कार्यपालिका का गठन करना है, लेकिन वह उसे भी परिवर्तित या रूद कर सकती है।

पुनजिगरण - सुधार!!

पुनजंगरण में, जाने के सभी क्षेत्र जागरूक हो उठे और जो लोकबद्ध दर्शन हजारों वर्षों से धर्मशास्त्र की चাকरी करता आ रहा था, अब उसका स्थान प्रकृति और मनुष्य के एक नये दर्शन ने ले लिया, जो अधिक उदार, अधिक गहरा, और अधिक बोधगम्य था। बेकन¹ ने मनुष को अधभूतवाद से प्रकृति और यथार्थ की ओर लौटने का आहार किया। दर्शन की शुरुआत निशचय ही सार्वभौमिक सन्देहवाद से होनी चाहिए। लेकिन जल्द ही यह तथ्य असनिर्गध पाया जाता है : मनुष्य में चितनशील सिद्धांत का अस्तत्व। चेतना का अस्तत्व!

कार्तिवादी दर्शन

सुधार काल में आत्मगत सच्चाई पर विश्वास और व्यक्त की सता का जिसेज़-शोर के साथ आहार किया गया वही कार्तवादी दर्शन का आधार बना। कार्तवादी - फ्रांसीसी दार्शनिक रेने द कार्ति² (1596-1650) और उसके दर्शन से सम्बन्धित।
qσσ 170 (105)

न्या युग

सुधार-काल के बाद, पोप की सता चरमरा गयी, तथा शासक और जनता दोनों के दमाग आज़ादी की लहर में तरंगाियत हो चले। लेकिन एक उहापोह की स्थिति भी पैदा हो गयी। इस नयी स्थिति से निपटने के लिए बहुतेरे चिन्तकों ने राज्य के सवाल पर सोचना शुरू कर दिया। चिन्तन की विभिन्न शाखाएँ उठ खड़ी हुई। पैकियावेली :
मैकियावेली - इस मशहूर इतालवी राजनीतिक विचारक ने सरकार के गणतानिक रूप को संबोतम माना, लेकिन सरकार के इस रूप के स्थानीव पर सदह होने के कारण, उसने एक सशक्त राजतनातमक शासन को सुरक्षित रखने के सिद्धांतों का भी निरूपण किया, और इसी नाते उसने “द प्रिन्स” की रचना की। एक केन्द्रीकृत सरकार की उसकी हिमायत का यूरोप के राजनीतिक सिद्धांत और व्यवहार पर भारी प्रभाव पड़ा। मैकियावेली सम्भवत: पहला लेखक था जिसने एकदम धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण से “राजनीति” पर विचार किया।

अन्य विचारक

करार और समझोता

अन्य विचारकों में से ज्यादातर ने क्रार या समझौते के सिद्धान्त का समर्थन किया। रोमन कानून में (करार) व्यक्तियों के बीच एक सहमति का नतीजा हुआ करता था और इसका दायरा समझौते से छोटा हुआ करता था, जबकि समझौता क्रार के साथ-साथ एक बाध्यकारी दायित्व भी होता था। ऐसे विचारकों के दो अलग-अलग सम्प्रदाय थे। पहले प्रकार का सम्प्रदाय ईश्वर और मनुष्य के बीच करार की यहूदी धारणा पर आधारित सिद्धान्त का प्रतिपादन करता था, जो समझौते की रोमन धारणा से सम्पूर्त था। यह सरकार और जनता के बीच एक अলিखित समझौते का प्रतिपादन करता था। दूसरा या आधुनिक प्रकार का सम्प्रदाय व्यक्तियों के बीच एक क्रार के जरिये राजनीतिक समाज की संस्थाबढ़ता से सम्बन्धित है। चिन्तन की इस शाखा के प्रमुख विचारक हूकर¹, हाँ॰स², लॉक³ और ल्सो⁴ हुए हैं। लोक-स्वतंत्रता के हिमायती
हूँकिनांत5
1. विण्डिस्प कोण्ठा टाईनैन्स $ ^{6} $ (1576) हूबुजनांत लैगुएत्त की रचना। इसमें दलिल दी गयी थी कि राजा अपनी सता जनता की इच्छा से प्राप्त करे, और कि यदि राजा कानूनी के परिपालन में उस क्रार को भंग करे जो उसके और जनता के बीच संयुक्त रूप से राजशाही की स्थापना के समय किया गया होता है, तब जनता भी राजनिष्ठा से मुक्त हो जायेगी।
बुकानन घात 7 :
2. बुकानन का भी यही कहना था कि राजा और जनता एक पैक्ट के तहत वचनबद्ध होते हैं, और कि यदि राजा इसे भंग कर दे, तो वह अपने अधिकार भी खो बैठता है। जेसूइट¹ :
3. यहाँ तक कि जेसुडट बेलामिन² और मारिएना³ की भी यही दलिल थी कि राजा अपनी सता जनता से प्राप्त करे; परन्तु पोप के अधीन रहे।
राजा जेम्स प्रथम $ ^{4} $ (1609) : जेम्स प्रथम ने इस सिद्धांत को, 1609 में, संसद में एक वक्तव्य देते हुए यह कहकर स्वीकार किया कि “एक स्थापित राज्य का हरके न्यापिथ्र्य राजा यह देखने के लिए बाभ्य है कि उसकी सरकार के गठन में, जनता के साथ उसके कानूनी के तहत जो पैंट किया जाता है वह जनता को स्वीकारी थी हो।”
कनवंशन पार्लियामेणट (1688) : कनवंशन पार्लियामेणट ने 1688 में घोषित किया कि जेम्स द्रितीय $ ^{5} $ को “राजा और जनता के बीच मूल समझौते को तोड़कर संविधान को उलटने की कोशिश करने के कारण सिंहासन खाली कर देना पड़ा।”
बोదेंॅ (1586)8 : आधुनिक काल के पहले सम्पूर्ण राजनीतिक दार्शनिक और 'रिपिब्लक' (1577 और 1586) के लेखक, बोदिन का कहना है कि “समझौता नहीं, बल्क ताकृत से गणराज्य की उपतित हुई है।” आदिकालीन पितृसतात्मक सरकारों को जीत करके उखाड़ फंका गया, और इस प्रकार, प्राकृतिक स्वतंत्रता का अन्त हो गया। उसके विचार से, "सम्प्रभुता नागरिकों के ऊपर सर्वोंच्च सता है।" वह मानता था कि "सम्प्रभुता स्वतंत्र, अविभाज्य, स्थायी, अहस्तानरणीय और निरपेक्ष सता" है। उसने सम्प्रभुता की अपनी धारणा और उस समय की मौजूद राजशक्ति के बीच घालमेल कर दिया।
- अलतूसियस (1557-1638)¹: वह स्पष्ट रूप से यह कहने के लिए जाना जाता है कि सम्प्रभुता एकमात्र जनता में ही निहित होती है। राजा सिर्फ उसका मिजस्टेट या प्रशासकभर होता है, और कि समुदाय का सम्प्रभुता का अधिकार अहஸ்தानरणीय होता है।
- ग्रोतियस (1625)²: अपनी कृत "डि ज्यूरे बेली एट पेरिस" (1628) में ग्रोतियस कहता है कि मनुष्य में एक शास्त्रित्रिय और खवितस्त समाज की प्रबल इच्छा होती है। लेकिन वह अ-प्रतिरोध का सिद्धान्त विकसित करता है, और इस बात से इंकार करता है कि लोग हमेशा और हर जगह सम्प्रभुता सम्पन्न होते हैं अथवा यह कि सारी सरकारों शास्त्रों के लिए गितत होती हैं। सम्प्रभुता या तो विजय से आती है या सहमति से, लेकिन वह इस धारणा पर जोरे देता है कि सम्प्रभुता अविभाज्य सता है।
- हुंकर : वह अपनी कुति 'एक्लोसियस्टिकल पालिति' - खण्ड 1 (1592-3) में प्रकृति की एक ऐसी मौलिक दशा को स्वीकार करता है जिसमें सभी मनुष्य बराबर थे और किसी भी कानून के मातहत नहीं थे। मानवोचित गिरिमा के अनुकूल जीवन की इच्छा और एककाकीपन के प्रति अर्चिने ने उन्हें 'राजनीतिक समाजी' में एकबद्ध होने के लिए प्रेरित किया। 'प्राकृतिक सड़मान' और एक साथ जीवन जीने की उनकी एकबद्धता के तौर-तरीकों पर प्रत्यक्ष या गुप्त सहमित से चलने वाली व्यवस्था ही वर्तमान 'राजनीतिक समाजी' के दो बुनियारी आधार बने। इनमें से दूसरे आधार को ही हम “सामान्य हित के कानून” कहते हैं।
q sigma sigma 172 bracket mein 107

राज्य की उपनित

सम्प्रभुता :
विद्यायी सत्ता का कार्यपालिका पर भी नियन्तरण
'सभी आपसी शिकायतों, क्षतियों और ग्लतियों को दूर करने के लिए एकमात्र तरीका किसी किसम की सरकार, या सर्वमान्य न्यायकर्ता की व्यवस्था करना ही था।'
वह इस बात पर अरस्सू से सहमत था कि सरकार की उपतिल राजतन से हुई। लेकिन वह यह भी कहता है कि 'कानून सिर्फ भलाई की शिक्षा ही नहीं देते, बल्कि एक बाध्यकारी शिक्त भी रखते हैं, जो शासितों की सहमति से प्राप्त होती है, और जो या तो व्यक्तगत तौर पर या प्रतिनिधियों के माफ़ात प्रदर्शित होती है।'
“कानून, चाहे जिस किसी भी किसम के मनुष्यों के लिए हों, वे उनकी सहमति से ही उपलब्ध (अर्थात वैध) होते हैं।"
"वे कानून कानून नहीं हैं जो जनता के अनुमोदन से नहीं बनाये गये होते हैं।" "जनता की सम्प्रभाता"
इस प्रकार उसने स्पष्ट तौर पर कहा कि सम्प्रभाता या कानून-निम्बीरी सता अन्त: जनता में ही निहित होती है।
1620:
- मेफ्लावर (1620) पर सवार "पिलिग्रम फादर्स"¹ की मशहूर घोषणा : "ईखर को साक्षी मानकर हम सब मिलकर एक दूसरे क्रार की घोषणा करते हैं और अपनेआप को एक नागरिक राजनीतिक निकाय के रूप में संयुक्त करते हैं।"
1647:
- इंग्लेण्ड की जनता का क्रार : एक और महाहरू प्यूरिटन² दस्तावेज़, जो आमीई आँफ द पारिलयामेणट ( 1647 ) से नि:सृत हुआ, सोच की इसी प्रवृत्ति का संकेत देता है।
मिलने³
1649 (जन्म की समयी)4 अपनी कृत “टैन्योर ऑफ़ क्रिंग्स एण्ड मैजिस्ट्रेट्स” (1649) में वह भी ऐसे ही सिद्धांतों का प्रतिपादन करता है। वह दावे के साथ कहता है कि “सभी मनुष प्राकृतिक रूप से स्वतन ही पैदा हुए थे।” वे एक “सामान्य संघ के रूप में एक-दूसरे के साथ बँधने के लिए इसलिए सहमत हुए कि वे एक-दूसरे को शक्ति पहुँचाने से बच सके तथा एक साथ मिलकर उस किसी भी चीज़ से अपना बचाव कर सके जो गडबड़ी पैदा करने वाली हो या इस तरह की सहमित के खिलाफ पड़ती हो। इसी की बदेलत करंबे, नगर और राज्य अस्तत्व में आये। तब आत्मरक्षा और संरक्षण की यह आधिकारिक सता जो बुनियादि तौर पर उनमें से प्रत्येक के भीतर तथा संयुक्त रूप से सबमें निहित थी, डिटिटियॉं और किमशनरों के रूप में राजाओं और मिजस्ट्रेत्तों को सौंप दी गयी।" “راజాओं और मिजिस्ट्रों की सता और कुछ भी नहीं है, सिवाय इसके कि यह सिस्फ़ा उंहें जनता द्वारा सबकी भलाई के विश्वास के साथ प्रदानित, हस्तान्तिर और सौंपी गयी सता है, जो अभी भी बुनियादी तौर पर उसी में (यानी जनता में - स.) निहित होती है और जो उसके प्राकृतिक जन्मसिद्ध अधिकार का उल्लांचन किये बैग्र इनी नहीं जा सकती। अत: राष्ट्र राजाओं को चुन या हटा सकते हैं, स्वतंत्र-जनमा முनुष्यों के महज इस अधिकार और स्वतंत्रता के आधार पर कि वे किनसे शास्त्र होना सर्वोत्तम समझते हैं।”
q50 173 (108)

राजாओं के देवी अधिकारों का सिद्धांत

पितृसंतात्मक सिद्धान्त

इसी युग में जहाँ बहुतरे विचारक 'जनता की समप्रभुता' के इन सिद्धांतों का इस प्रकार प्रतिपादन करने में लगे हुए थे, वहीं दूसरे सिद्धांतकार भी थे, जो यह साबित करने की कोशिश कर रहे थे कि राज्य वृहदाकार परिवार ही हैं, जिनमें एक कुटुट्य के मुखिया की पैतुक सता, ज्येष्ठता क्रम की वंशपरमरा में पूर्ववर्ती समप्रभु शासक के उस प्रतिनिधि को हस्तान्तिरत कर दी जाती है जो किसी राष्ट्र पर शासन करने में संक्षम सिद्ध हो सके। इसीलिए राजशाही को एक अजेय अधिकार पर आधारित माना गया, और राजा को केवल ईश्वर के प्रति ही उत्तरदायी ठहराया गया। इसे ही “राजाओं का दैवी अधिकार” कहा गया। इसे ही “पितृसत्त्यक सिद्धान्त” कहा गया।

टॉमस हांस :

1642-1650-1651 में लिखी गयी अपनी विविध रचनाओं में उसने सम्पूर्ण शासक की असीमित सता के सिद्धांत को जनता के आरंभिक क्रार के विरोधी सिद्धांत के साथ संयुक्त कर दिया। परन्तु निर्कुशतावाद - मूक आज्ञाकारिता - के
1. यह स्पष्ट नहीं है कि भगतसिंह किसी पुस्तक से उद्देश्य नोट कर रहे थे या ये उनकी अपनी रिपोर्टयां हैं। प्रति होंबस की पक्षधरता धर्मशास्त्रীয় न होकर, धर्मनिरपेक्ष और तर्कसंगत थी। वह समुदाय (पूरी समिष्ट) के सुख को सरकार का महान लक्ष्य मानता था।
(मनुष्य एक असामाजिक प्राणी)
هئ்بس کا رشن سینىکوادی है। उसکے अनुसार, முनुष्य کے منویں شباطیانک سُوہے ہیں اسے نئی संस्थان اور سوچ کی دشاہ میں ہی निर्దిष्ट होتے ہیں اور وہ उनकी प्राप्ت کو اطلاع اور کوई उदेशی نئی رجت کا اثاث ہے۔ முனུپے شباط سے اسامائیک ہے। वह कहتا है, "پ्राگریتک अवस्थا میں, হرےک आद्می अपने जैسے سوہدات رحت کا ہی، اور হرےک کا जीवन खڑے گے، اسکے کا ہی، اسے سوہدات، پنہبائٹ اور اسے خلیک ہوتا ہے।" इस प्रकार کے जीवन کا ہی بھی उसे राजनीتیک एकتاً مں بُدھنہ کے लिए विवशा کرتا ہے।
( लगातार खत्तरा उन्हे राज्य गठित करने पर विवश करता है!)
चूंकि महज पैंक्ट काम नहीं देता, इसलिए 'एक सवोंच्व सर्बमान्य सता'-"सरकार" की स्थापना
(“जीत” या “अधिग्रहण” और “संस्थाबद्धता” सभी राज्यों के एकमात्र आधार)
समाज की स्थापना “अधिग्रहण” अर्थात जीत द्वारा या “संस्थाबद्धता” द्वारा, मसलन, पारस्सरिक समझोते या क्रार द्वारा, होती है। इस प्रकार, एक बार जब सम्प्रभु सता क्यायम हो जाती है, तब सभी को इसका आज्ञाकारी होना आवश्यक हो जाता है। इससे विद्रोह करने वाले किसी भी व्यक्त को ख्तम कर दिया जाना चाहिए। उसे तबाह कर दिया जाना चाहिए।
( समप्रभु शांसक की असीमित सना!)
वह¹ विधाधिका, न्यापालिका और कार्यपालिका के सारे के सारे अधिकार सम्प्रभु शासक के हवाले कर देता है। वह लिखता है, “प्रभावो होने के लिए सम्प्रभु सता को निश्चय ही असीमित, अहस्तानरणीय और अविभाज्य होना चाहिए। बेशक असीमित सता गड्बिड्यों को जन्म दे सकती है, लेकिन सबसे इसका बुरा से बुरा रूप भी उतना बुरा नहीं है जितना कि गृहयुद्ध या अराजकता।
2007.174 (109)
उसके विचार से राजशாही, कुलीनतन्, या जनतन् में सता को लेकर कोई अन्यर्ा नहीं है। सामान्य शास्त्र और सुरक्षा की दिशा में इनकी उपलब्धियों इनके द्वारा शास्त्र जनता या लोगों की आजाकारिता पर निर्भर करती है। फिर भी वह 'राजशाही' को ही अधिक पसंन्द करता है। उसके विचार से 'सीमित राजशाही' ही सर्वोत्तम है। लेकिन वह इस बात पर भी जोरे देता है कि समप्रभु शास्त्र को निश्चय ही धार्मिक के साथ-साथ नागरिक मामलों का भी नियमन करना चाहिए, और यह तजबीज भी करनी चाहिए कि कौन से सिद्धान्त शास्त्र-ल्यवस्था बनाये रखने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं। इस प्रकार, वह सम्प्रमुता के एक स्पष्ट और वैध सिद्धांत की हिमायत तो करता है, लेकिन इसके साथ ही वह राजा या सम्प्रभु शांसक पैदा करने के लिए सामाजिक समझोते की कल्पना को भी बरकरार रखता है।

सिपनोजा¹ : (1677)

(मनुष्य की असमाजिकता)
अपनी कुति ट्रैक्टెट्स पॉर्लीटिकस (1677), में वह मानता है कि शुरू-शुरू में मनुष्यों का सभी चीज़ों पर समान अधिकार था, इसलिए प्राकृतिक अवस्था युद्ध की अवस्था था। मनुष्यों ने अपने विवेक से प्रेरित होकर अपनी शिक्षायों को नागरिक सरकार की स्थापना के लिए संयुक्त किया। चूँकि मनुष्यों के पास निर्कृति स्थान थी, इसलिए इस प्रकार स्थापित सम्प्रभु स्तान भी निर्कृति स्थान ही थी। उसके विचार से 'अधिकार' और 'सता' एक समान है। अत: स्तान से लैस होकर सम्प्रभु शासक को सारे के सारे अधिकार स्वयमेव प्राप्त हो जाते हैं। इस प्रकार, वह 'निर्कृतिशा्वाद' का समर्थन करता है।

पुफ़नेडोर² :

(लाँ आँफ नैचर एण्ड नेशस 1672)³ उसके विचार से, मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, जो परिवार और शान्तमय जीवन की ओर स्वाभाविक रूझाने रखता है। - एक आदमी द्वारा दूसरे आदमी को पहुँचायी जा सकने वाली क्षतियों का अनुभव ही नागरिक सरकार की प्रेरणा देता है, जो इस प्रकार गतित होती है : 1. एक कामनवेलथ गठित करने हेतु कुछ लोगों के बीच एक सर्वसम्मत आपसी क्रूर द्वारा, २. बहुमत के इस प्रस्ताव द्वारा कि अनुकशासक को सता पर आसीन किया जाये, ३. सरकार और जनता के बीच इस क्रूर द्वारा कि सरकार शासन करे और जनता विधिसम्मत आदेशों का पालन करे।
q00 175 (110)

लाॉक :

(नागरिक सरकार के दो सिद्धांत-1690)
"किसी भी मनुष्य को शासन करने का प्राकृतिक अधिकार नहीं होता।"
वह प्राकृतिक अवस्था का – यानी शासनाधिकार और प्रभुत्व के मामले में स्वतंत्रता और समानता वाली एक ऐसी अवस्था का चिन्हण करता है जो सिर्फ प्राकृतिक कानून या विवेक के ही अधीन रहे, जो लोगों को एक-दूसरे के जीवन, स्वास्थ्य, आजादी और स्वामील अधिकारों के मामले में नुकसान पहुँचाने से रोकेते हैं। निषेध या क्षतिपूर्ति के रूप में सजा देने का अधिकार प्रत्येक व्यक्त करे हाथ में होता है।
प्राकृतिक अवस्था!
“प्राकृतिक अवस्था वास्तव में वह है जिसमें लोग आपस में फैसला करने के अधिकार के साथ, बिना किसी एक सर्वमान्य शासक के, विवेक के अनुसार एक साथ रहते हैं।”
निजी सम्पति!
“प्रत्येक व्यक्ति का यह प्राकृतिक अधिकार है कि वह अपने पास सम्पति रखे और प्राकृतिक सामग्री पर अपने निजी श्रम से प्राप्त उत्पाद पर भी अपना अधिकार रखे। एक आदमी जितनी अधिक भूमि को जोत, बो, सुधार सकता है और खेती-बाड़ी के काम में ला सकता है तथा उससे प्राप्त जितनी पैदावार इस्तेमाल में ला सकता है, वह सब उसी की सम्पति हैं।
सम्पति और नागरिक समाज!
उसके अनुसार "सम्मित" "नागरिक समाज" की पूर्ववर्ती है।
नागरिक समाज की उपतिल!
लेकिन ऐसा लगता है कि लोगों को किसी प्रकार का खुतरा और भय रहता था, और इसीलिए, उन्होंने नागरिक स्वतंत्रता के पक्ष में, अपनी प्राकृतिक स्वतंत्रता को तिलानजिल दे दी। संक्षेप में, आवश्यकता, सहुलियत और रुझाने ने लोगों को समाज में बँधने के लिए विवश किया।
नागरिक समाज की परिभाषा!
जो लोग एक निकाय में गठित हो चुके होते हैं, और जिनके पास एक ऐसा सर्वाग्न्य स्थापित कानून और न्यायधिकरण होता है जिसमें अपने की जा सके तथा जिसे आपसी विवादों को निपटाने एवं दोषी को दिण्डत करने का अधिकार हो, वे एक नागरिक समाज में होते हैं।
सहमति :
दूसरों पर विजय सरकार का 'सोत' नहीं है। सहमति ही किसी भी वैध सरकार का स्ोत थी, और हो सकती है। कानून-निर्मिति सभा लोगों के जीवन, स्वतंत्रता और समचित के ऊपर पूर्णतः मनमाना अधिकार नहीं रखती, क्योंकि इसके पास सिर्फ वही संयुक्त अधिकार होता है जो समाज के गठन से पहले अलग-अलग सदस्यों के पास हुआ करता था, और जिसे उन्होंने अपने विशेष और सीमित उद्देश्यों के लिए सौंप दिया है।
कानून :
“कानून का उद्देश्य स्वतंत्रता को खुम करना या रोकना नहीं, बल्कि उसे सुरक्षित करना और विस्तृत करना है।”
विधियों का :
विधियों का कुछ निश्चित उद्देश्यों के लिए सिर्फ एक न्यासधारी सताभर है, जो यदि इसमें न्यस्त किये गये विश्वास को खर्जित करे, तो जनता द्वारा भंग या परिवर्तित की जा सकती है।
जनता की संरक्षण परि सम्रभुता!
इस प्रकार सवोच्च सता या सवोपिर सम्प्रभुता हमेशा जन-समुदाय के पास ही रहती है, परन्तु वह इसका इस्तेमाल तब तक नहीं करता, जब तक कि संरकार भंग नहीं हो जाती।
विधियों का और कार्यपालिका
निजी हितो पर सामान्य हित की बिल रोकने के लिए, यह जरूरी है कि विधायिका और कार्यपालिका की सताएँ अलग-अलग हाथों में रहें, और कार्यपालिका विधায়को के मातहत रहे। जहाँ ये दोनों सताएँ एक ही निरंकुश राजा में निहित होती हैं, वहाँ कोई नागरिक सरकार नहीं होती, क्योंकि राजा और उसकी जनता के बीच कोई सर्वामान्य न्यायिक सता नहीं होती। स्वतंत्र समाजों में राज्यों के भिन्न-भिन्न रूप हैं, जनतत्र¹, अल्पतत्र, या निविचित राजतत्र तथा मिश्रित रूपों वाली व्यवस्थाएँ।
'क्रान्त का अधिकार'!
“जब सरकार समझते के प्रति अपना दायित्व पूरा करने – यानी व्यक्तगत अधिकारों का संरक्षण करने – में विफल हो जाती है तो क्रित न्यायसंगत बन जाती है।
समानता
फ्लो:
कसो¹ कोई भी आदमी इतना अधिक धनी नहीं होना चाहिए कि वह दूसरे को खरीद सके, और न ही कोई आदमी इतना अधिक ग़रीब होना चाहिए कि वह अपनेआप को बेचने के लिए मजबूर हो जाये। भारी असमानताएँ निरंकुशता के लिए रास्ता तैयार करती हैं।
सम्पति और नागरिक समाज :
जिस पहले आदमी ने ज़मीन के एक टुकड़े को घेरकर यह कहने को सोचा होगा कि 'यह मेरा है', तथा जिसे अपनी बात पर विश्वास करने वाले सीधे-सादे लोग मिल गये होंगे, वही नागरिक समाज का असली संस्थापक था। अगर किसी ने इस धोखेबाज़ी का परदिशाश कर दिया होता, और यह एलान कर दिया होता कि यह धरती किसी की समपति नहीं है और कि इसके फल सबके हैं, तब मानवज़ाति को इतने युद्ध, अपराध और सन्तास नहीं खेलने पड़े होते।
♀60 177 (112)
"जो आदमी ध्यान करता है वह दुराचारी प्राणी है।"
नागरिक कानून :
कमजोरों के उत्याइन और सबकी असुरशा की ओर इशारा कर धनिकों ने बड़ी चालकी से न्याय और शासित के नियम निरुचित किये, तिके उनके द्वारा सबके स्वामीतवों की गारणती रहे, और कानूनों को लागू करने के लिए एक सवोच्छ शासक की स्थापना की। निर्देशांको की उच्चत्व में तैलित द्वारों से प्रारूपीय हों गयीं, जिससे गरीबों को नयी बेडियाएं पहुंचती हैं और धनियों को नयी ताकृत प्रदान कर दी, प्राकृतिक स्वतंत्रता को अन्तम रूप से खुच्छ कर दिया, और शोधे से महत्वपूर्ण हों गयीं के लाभ के लिए, हमलेशा-हमलेशा के लिए सम्पन्न और असमानता का कानूनी निर्धारित कर दिया, एक चलाकी भरी लूट को एक अंटल अधिकार में तब्दिल कर दिया, और इस प्रकार आइन्दा के लिए सारी मानवजित को प्रम, दासता, और दुर्गति का शिकार बना दिया।²
पुनश्च: असमानताएँ
लेकिन यह बात पूरी तरह प्राकृतिक कानून के खिलाफ है कि मुट्लीभर लोग तो बेशुमार दौलत गटकते रहे, जबकि विशाल भूखी आबादी जीवन की ज्स्सी चीजों के लिए भी तरसती रहे।³
♡♡ 178 (113)
उसकी रचनाओं का हृश
एमिली और सोशल काण्ड्टैकट दोनों ही 1762 में प्रकाशित हुई, पहली को पेरिस में जलाया गया, रुसो बमुशिकल गिरफ्तार होते-होते बचा, फिर दोनों किताबों को सार्वजनिक तौर पर, जेनोआ में, उसकी जन्मस्थली में, जलाया गया, जहाँ उसे कहीं अधिक शोहरत मिलने की उममीद थी।
राजा की सम्प्रभुता से जनता की सम्प्रभुता की ओर
ऐसों एकता और केन्द्रीकरण की फ्रांसीसी धारणाओं को बनाये रखता है; जबकि सत्रवीं सही में राज्य (या सम्प्रभुता) को राजशक्ति के साथ गड्डमड्ड कर दिया गया था। 18वें सही में रुस्सो के प्रभाव से यह जनता में निहित समझी जाने लगी।
अनुवाच्य
अनुबन्ध के जरिये लोग नागरिक स्वतंत्रता और नैतिक स्वतंत्रता के लिए प्राकृतिक स्वतंत्रता का प्रतिदान करते हैं।¹
प्रथम स्वामीलव का अधिकार
सम्पति का अधिकार :
इसका औचित्य इन दशाओं पर निर्भर करता है :
- (अ) कि ज़मीन गैर-आबाद है, (ब) कि एक आदमी सिर्फ उतने ही रकवे पर कृब्जा करता है जितना कि उसके गुज़ारे के लिए ज़रूरी हो; (स) कि वह इस पर महज खोखली औपचारिकता के जरिये नहीं, बल्कि महतत और खेती-बाड़ी करने के नाते दखल रखता है²
♀♂ 179 (114)
धर्म :
स्वेसो धर्म को भी सम्प्रभु शासक की निरंकुशता के अधीन रखता है। भूमिका³ :
मैं इस बात की जाँच करना चाहता हूँ कि क्या, आज लोग जैसे हैं और जैसे कानून बनाये जा सकते हैं, उनको मदनजर रखते हुए, यह सम्भव है कि नागरिक मामलों के प्रशासन हेतु कुछ न्यायसंगत और निश्चित नियम स्थापित किये जायें...। ...मुझसे पूछा जा सकता है कि क्या में कोई राजा या विधि निमिता हुँ जो में राजनीति पर लिखता हूँ। मेरा उत्तर है कि मैँ नहीं हूँ। अगर मैं वैसा होता, तो यह कहने में समय नष्ट नहीं करता कि क्या किया जाना चाहिए, बल्कि उसे कर डालता या खामोश रहता। मनुष्य जन्म से स्वतंत्र होता है लेकिन हर जगह बेड़ियों में जकड़ दिया जाता है।
गुलामी के जुवे को बलपूर्वक उतार फेंकना!
में कहना चाहूगा कि जब तक लोग आशापालन के लिए मजबूर किये जाते हैं और वे आशापालन करते रहे, अच्छा है; लेकिन वे जितनी जल्दी इस जुवे को उतार फेंक सके और उतार फेंकेते है, तो वह और भी अच्छा है; कारण कि, यदि लोग अपनी आजाूरी फिर उसी अधिकार (अर्थात ताकृत) से वापस लेते हैं जिस अधिकार से यह उनसे छैनी गयी होती है, तो या तो उनका ऐसा करना न्यासंगत है, या उनसे इसे छिने लिये जाने का कोई औचित्य नहीं था

q00 180 (115)

ताकृत :
“สา, วี ฌิทส ๑ ๒ ๒ ๒ ๒ “सता” दास अपनी बेडियों में सब कुछ खो देते हैं, यहाँ तक कि उनसे निजात पाने की इच्छा भी!¹
सबसे ताकतवर का अधिकार
“सताधिकारियों का आशापालन करो। यदि इसका मतलब ताकत के आगे झुकना है, तो यह आदेश अच्छा तो है लेकिन गैर-ज़्छरी है; मेरा कहना है कि इसका कभी उल्लाहन नहीं होगा।”²
दासता का अधिकार
“क्या तब पराधीन जन अपनी अस्मताओं का इस शर्त पर ल्याग कर दे कि उनकी सम्मति भी ले ली जाये? मैं समझ नहीं पाता कि उनके लिए क्या शेष रह जायेगा?
“कहा जा सकता है कि நிர்க்ஷுशாசாக அப்பனே ஷாசிஸ்தேர் கெ லிங் நாளிர்க ஷாசித ஷுனிஷிசுவத கர்தா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேகககா ஹி ஷேககா ஹி ஷேகககா ஹி ஷேகககா ஹி ஷேகககா ஹி ஷேகககா ஹி ஷேகககா ஹி ஷேகககா ஹி ஷேகககா ஹி ஷ
“यह कहना, कि एक आदमी अपनेआप को बिना किसी एवज में यों ही सौंप देता है, एकदम विहियात और अकल्पनीय बात है।”
इस तरह की बात, चाहे एक आदमी दूसरे आदमी को सम्बोधित करके कहे या राष्ट्र को सम्बोधित करके कहे, हमेशा मूर्खतापूर्ण ही कहीं जायेगी :
“में पूरी तरह से तुम्हारी कीमत पर और पूरी तरह से अपने लाभ के लिए तुमसे एक समझौता करता हूँ, और मैं इसे तब तक लागू किये रखूगा, जब तक मैं चाहूगा, और तुम भी इसे तब तक लागू किये रखोगे जब तक मैं चाहूगा।”³
समानता :
यदि तुम राज्य को स्थानीय प्रदान करना चाहते हो, तो इन दो चरम अवस्थाओं को, जहाँ तक सम्भव हो सके, क़रीब लाओ : न तो धनकों को बरदाश करो, न ही भिखारियों को। ये दोनों ही स्थिततां, जो स्वाभाविक तौर पर एक-दूसरे से अविभाज्य हैं, सामान्य हित के लिए समान रूप से सांघातिक हैं : एक वर्ग से निरंकुश पैदा होते हैं, तो दूसरे वर्ग से, निरंकुशता के समर्थक : हमेशा इन्हीं दोनों के बीच सार्वजिनक स्वतंत्रता का व्यापार चलता रहता है : एक ख्रीदता है, दूसरा बेचता है।

q50 182 (117)

“ओलावृष्टि कुछेक क्षेत्रों को बरबाद कर डालती है, पर इससे अकाल बिरले ही पड़ता है। दो-फसाद और गृह्युद्ध सदारत करने वाले लोगों को काफ़ी चौका देते हैं; फिर भी वे राष्ट्री को लिए कोई वास्तविक संकट नहीं पैदा करते, जब तक इस बात को लेकर विवाद चलता है कि कौन उन पर निर्कृश शासन करे। उनकी वास्तविक समुद्रि या विपदाएं तो उनकी स्थायी स्थितियों से पैदा होती हैं। जब सब कुछ जुबे तले कुचल कर रख दिया जाता है, तभी सब कुछ नष्ट हो जाता है; तभी ये शासक, इसीनान से सब कुछ नष्ट करने के बाद, एक मुर्दि ख्यामोशी पैदा कर देते हैं, जिसे वे शासित कहते हैं।”

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फ्रांसीसी क्रान्ति³ : पृष्ठ 176 की घात 2 अमेरिका : अमेरिकी स्वतंत्रता-संग्राम का फ्रांस की स्थिति पर भारी प्रभाव पड़ा। (1776)
डेवस :
'राजा' के नाम पर काम करने वाले कोर्ट या मनिंचमण्डल ने मनमाने ढंग से टेक्सो के फ़रमान तैयार किये और उसे पारिल्यामेणट $ ^{4} $ में इन्दराज किये जाने के लिए भेज दिया, क्योंकि जब तक पारिल्यामेणट उनका इन्दराज नहीं कर लेती, तब तक वे लागू नहीं हो सकते थे। कोर्ट का दावा था कि पारिलियामेणट की सता को एत्राज़ का कारण बताने के अलावा और कोई अधिकार न था, जबकि वह (यानी कोर्ट या मनिन्मण्डल) अपने पास यह फैसला करने का अधिकार सुरक्षित रखे हुए था कि कारण वाजिब है या गैर-वाजिब, और कि तदनुसार ही वह अपनी मज़ी से चाहे तो फरमान वापस ले ले या बाकायदा उसे आधिकारिक तौर पर इन्दराज किये जाने का आदेश जारी कर दे। दूसरी तरफ, पारिलियामेणट का दावा था कि उसके पास इन्कार कर देने का अधिकार था। मनो एम. कैलोन¹ को मुद्रा चाहिए थी। वह टेक्सों के मामले में पारिल्यामेणट के कड़े रखे से परिचित था। उसने “असेम्बली ऑफ नोटेबलस”² आहृत की (1787)। यह स्टेट्स-जनरल नहीं थी, जोकि चुनी जाती थी, बल्कि इसके सभी सदस्य राजा द्वारा मनोनीत किये गये थे और इसमें कुल 141 सदस्य थे। तब भी वह बहुमत का समर्थन हासिल न कर सका। तब उसने इसे 7 कमोटियों में विभक्त कर दिया। प्रत्येक कमोटी में 20 सदस्य थे। हरके सवाल कमोटियों में बहुमत से और असेम्बली में कमोटियों के बहुमत से तय किया जाता था। उसने किन्हीं चार या प्रत्येक कमोटी में 11 ऐसे सदस्य रखने की कोशिश की, जिन पर वह विश्वास कर सकता था। लेकिन उसकी ये युक्तियाँ भी असफल रहां।

950 184 (119)

एम. द लफ़ातएँ एक दूसरी कमोटी का उपाध्यक्ष था। उसने एम. कैलोन पर
1. चालर्स अलेकसान्द द कैलोन (1734-1802), फ्रांसीसी राजनीतिज्ञ, जो नवम्बर 1783 में वितमन्जी बना।
2. — أسمهبلى أوْف نوتويتس : راحب كما خجانا شالي هونى كهكاران، فيتاموني كهلون شاهي خجانه كه ليلف كرۇج لونها چاوتا شا، رفنقت باليماهمت نه يس مذوره نهي كيها، تب نسنه راجا كو سلاه د فيك آطانరిك سياماشولكوكه كو خلطم كر دياك ياوه أهو نوتويتس يانعي كولبوني أهوك بادريشي ركبك نسلا لقا دياهي، يسك هلغ كولبوني كي شما (اسمهبلي أوْف نوتويتس) جنانه ري 1787 م يسك حياي غيي مي كولبوني نه أهو كي شما فيه كي شما في هونى كي شما كي شما في هونى
3. स्टेट्स जनरल: यह कुलीन वर्ष, पादरी वर्ष और बुजुआ वर्ष से चुने गये प्रतिनिधियों की एक सभा थी।
4. மாநிலங்கள் ட லுஈயுதா (1757-1834) : அமெரிக்கி ஈவத-வா சாஞ்பாம் ஓ ஞ ஃ ஈ ஞ ஈ ஈ க் கா ஈ ஈ ஈ ஈ ஈ ஐ ஐ दो मिलियन लाइवर में शाही ज़मीन बेच डालने का आरोप लगाया। इसे उसने लिखित रूप में भी पेश किया। उसके कुछ ही समय बाद, एम. कैलोन को बरख़ास्त कर दिया गया। तालूस का आर्किबशप प्रधानमन्त्री और वितमन्त्री नियुक्त हुआ। उसने पारिल्यामेणट के समक्ष दो प्रकार के टेक्सों का प्रस्ताव रखा - स्ताम टैक्स और एक किसम का भूमि टैक्स। इस पर पारिल्यामेणट ने जवाब दिया, कि राष्ट्र अब तक जिस तरह के राजस्व की हिमायत करता आरहा है, उसके साथ टेक्सों की चर्चा उनमें कटैती करने के अलावा और किसी भी उदेश्य से नहीं करनी चाहिए, और उन दोनों ही प्रशांतों को उठाकर रही की टोकरों में फेंक दिया। तब उन्हें वसिंह बुलाया गया, जहाँ राजा ने 'ए बेड ऑफ़ जिस्टस' नाम से एक विशेष बैठक की और उन प्रशांतों का इदराज कर लिया। पालियामेणट पेरिस लौट गयी। वहाँ एक अधिवेशन किया। वसिंह में की गयी प्रत्येक कार्यवाही को गैर-कानूनी क्रार देते हुए, इन्दराज को रह कर देने का आदेश दिया। तब सबको 'लेटर डि कैशेंस' नामक शाही फरमान जारी हुआ और सभी को निवर्षित कर दिया गया। फिर बाद में उन्हें वापस बुला गया। और फिर वे ही फरमान उनके सामने रखे गये। [पूछ 185 (120) पर जारी]
फिर स्टेट्स जनरल की बैठक बुलाने का सवाल उठा। राजा ने इसके लिए पालियामेणट से बादा किया। लेकिन मनिजमंडल ने विरोध किया, और एक 'फुल कोर्ट' गितत करने का नया प्रसाव रखा। लेकिन इसका दो आधारों पर विरोध हुआ: पहला यह कि सैड्दितक आधार पर सरकार को स्वयं को बदलने का कोई अधिकार नहीं था। इस तरह की नज़्रीर नुकसानदेह होगी। दूसरा विरोध स्वरूप को लेकर था, इसके विरोध में यह दलिल दी गयी कि यह एक विस्तारित मनिजमंडल के अलावा और कुछ न होता। अत: पारिलियामेणट ने इस प्रसात व को तुकरा दिया। तब उसे सशस्त्र सेनाओं से घेर लिया गया। कई दिनों तक यह घेरेबन्दी चलती रही। फिर भी पारिलियामेणट अपनी बात पर अड़ी रही। तब उसके कई सदस्यों को गिरफ्तार करके अलग-अलग जेलां में भेज दिया गया। इसका विरोध-प्रदर्शन करने के लिए ब्रिटेनी से एक प्रतिनिधमण्डल आया। उसके सदस्यों को बारंती (जेल) भेज दिया गया। 'असెम्बली ऑफ नोटेबलस' फिर बुलायी गयी, और स्टेट्स जनरल की बैठक बुलाने के लिए फिर वहीं तरीका अपनाने का फैसला किया गया, जो 1614 में अपनाया गया था। पार्वतीयमोष्ट ने तय किया कि इसके लिए कुल 1200 सदस्यों में से 600 साधारण जनता से, 300 पादरी वर्ष से, और 300 कुलीन वर्ष से चुने जाने चाहिए। स्टेट्स जनरल¹ की बैठक मई 1789 में हुई। कुलीन वर्ग और पादरी वर्ष के प्रतिनिधि दो अलग-अलग कक्षों में बैठे।

qσσ 186 (121)

திச்சிற்றி ஞ்ஞிபி. யா சாஞாஞ ஐனதா கெ ஞிசிஞிஷயி ஞெ பாஞிஷ ஞிஷ ஞிஷ ஞிஷ

qσσ 187 (122)

तेनस कोर्ट की शपथ
कुलीन वर्ष और पार्वती वर्ष के दुरुष्ट तत्काल राष्ट्रीय अসেम्बली को उखाड़ फैकना चाहते थे। उन्होंने मनि्तमण्डल के साथ मिलकर षड्य्नज रचा। राष्ट्र के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में ही कक्ष का दरवाज़ा बन्द कर दिया गया और उस पर अंगरक्षक सेना का पहरा बैठा दिया गया। तब वे एक टैनिस कोर्ट की ओर बढ़ गये, और वहाँ सबने मिलकर शपथ खाया। कि जब तक वे एक संविधान की स्थापना नहीं कर लेते, तब तक अलग नहीं होंगे।
বাस्तีย²
दूसरे दिन कक्ष का दरवाजा उनके लिए फिर खोल दिया गया। लेकिन चुपके-चुपके 30 हजार की फैज पेरिस को घेरने के लिए खाना की जा चुकी थी। पेरिस की निहतथी भीड़ ने बास्तिय पर धावा बोल दिया, बास्तीय का पतन हो गया। वसिई¹ :

14 जुलाई 1789

5 अक्टूबर 1789 - हजारों स्ली-पुरुष राष्ट्रीय प्रतीक के प्रति अंगारक्षक सेना द्वारा किये गये गुस्ताखी भरे व्यवहार का बदला लेने के लिए वसिंह की ओर कूच कर गये। इसे वसिंह अभिमान के नाम से जाना जाता है। उसके बाद घेटी घटनाओं के फलस्वरूप राजा को पेरिस लाया गया।

ηο 188 (123)

प्रत्येक राष्ट्र का विवेक जब जाग जाता है, तो वह अपने सभी उदेश्यों के लिए पयरीत सिद्ध होता है। (पृष्ठ 112, राष्ट्रस औफ मैन)²
चूंकि हर काल में सरकार का स्वरूप पूरी तरह से राष्ट्र की इच्छा का ही मामला रहा है, यानी कि अगर उसने राजतनाततक स्वरूप चुना, तो ऐसा करने का उसे अधिकार था; और उसके बाद अगर उसने गणतानिकक होना पसंद किया, तो उसका अधिकार था कि वह गणतानिक हो, और राजा से यह कहने कि “अब तुम्हारे लिए हमारे पास कोई गुंजाइश नहीं है।”

2001 189 (124)

राजा:
यदि कहीं कोई ऐसा आदमी हो जो अन्य सबसे लोकोंतर रूप में इतना अधिक बुद्धिमान हो कि राष्ट्र के संचालन के लिए उसकी बुद्धि जरूरी हो, तब तो राजशारी का कुछ औचित्य माना जा सकता है, लेकिन जब हम किसी देश पर नजर दौड़ाते हैं और देखते हैं कि कैसे उसका हरेके हिस्सा अपने मामलों की सूखबूझ रखता
1. वसिंह : पेरिस से कुछ दूर स्थित वसिंह के महलों में राजा और उसके मिनियों का ठिकाना था जहाँ से वे सेना के सहारे क्रिति को दबाने की कोशिश कर रहे थे। 5 अक्टूबर 1789 को हजारों लोगों ने वसिंह पर धावा बोला और राजा लुई चौदहवें, रानी मेरी अन्यायनेत तथा उनके अम्लके को बन्दी बनाकर पेरिस ले आये।
2. टॉमस पैन की रचना राइट्स ऑफ मैन से (देखें पूछे १४ (११) का सन्दर्भ ३)
3. प्रथम अर्ल आँफ सेलबोर्न राउंडेल पापर (1812-1895) या उसका पुत्र द्रोतीय अर्ल आँफ सेलबोर्न विलियम वालडग्रेव पापर (1859-1942)। दोनों ही ब्रिटिश संसद के सदस्य थे।
पेन और सेलबोर्न के उद्देश्य मोटे अक्षरों में पेज पर तिरछे लिखे हुए हैं। है; और जब हम पूरी दुनिया पर नजर दौड़ाते हैं और देखते हैं कि इसमें रहने वाले सभी मनुष्यों में से राजाओं का ही वंश ऐसा है जो अपनी धमता में सबसे नगण्य है, तब हमारी बुद्धि इस सवाल पर चकराने लगती है कि - आध्वर इन लोगों को क्यों बरकर रखा गया है?
अपमानकर्ति :
“यदि टैकसों के जुलमो-सितम को ख्तम करने की गरज से राजशाही और हरेके किसम की वंशानुगत सरकार की धोखाधड़ी और छल-कपट से भरी टैकस-नीति का भण्डाकोড় करना – असहाय बच्चों की शिंशा तथा बूढ़ों एवं मुसीबत के मारे लोगों की सहायता की योजनाएँ प्रसातवित करना – युद्ध के धृणित चलन को ख्तम करना – सार्वभौमिक शास्त्र, सभ्यता और वाणज्य को प्रोत्साहित करना – और राजनीतिक अन्धविश्वास की बेडियों को तोड़ डालना, तथा अधोगित के शिकार मनुष्य को उसकी वाजिब गिरमा तक उठाना – यदि ये सब चीज़ अपमानजनक है, तो मुझे एक अपमानकर्ता का जीवन जीने दो, और मेरी कृत्र पर “अपमानकर्ता” का नाम खुदवा देना।” $ xi^{2} $

q80 190 (125)

लेकिन जब स्थान नहीं बल्कि सिद्धांत कर्म को ऊर्जिस्वत करने वाला कारण बन जाता है, तो मैं देखता हूँ कि आदमी हर जगह एक ही जैसा हो जाता है।³
मृत्यु :
यदि हम अमर होते तो बहुत दुखी होते, इसमें कोई शक नहीं कि मरना कितनहै, पर यह सोचना मधुर लगता है कि हम हमेशा जीते ही नहीं रहेगी।^{4}
समाजवादी व्यवस्था :
(पृष्ठ 45, एमिली)
“प्रत्येक से उसकी योग्यता के अनुसार, प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुसार।”⁵

साहसकता क्रिति में सफलता की जान है। ___○___

दानों¹ का कहना था, “कार्वाई, कार्वाई। सता पहले, बहस बाद में”² _____

♀60 191 (126)

1. फंस एण्ड माइण्ड आफ़क बोलशिविज्म
ले. रेन फुलप-मिलर
2. रिशिया
ले. माకిव-ओ'हारा
3. रिशियन रिवॉल्यूशन
फ़्लेमिंग प्रोडक्शन के लिए
ले. लैसलॉट लोटन (मैकमिलन)
4. बोल्शोवस्त्र रिशिया
ले. एपटन कार्ग्रीन
5. लिटरेचर एण्ड रिवोल्यूशन - व्राल்கी
6. मावर्स-लेजिन एण्ड साइस आफ़क रिवोल्यूशन ले. एण्डन कार्लग्रीन
1917-27
“बोल्शोंकों का दर्शन एकदम, आक्रामक रूप से भूनितवादी है, जिसकी एक मुक्तियाँ विशेषता को उनके कर्दार से कर्दार दुश्मनों तक को स्वीकार करना पड़गा, और वह यह कि उनमें किसी भी प्रकार के विश्रम का पूरी तरह अभाव है।
वे अपने संस्थापक के इस विश्वास पर पूरी दृढ़ता से क्याम हैं कि “प्रत्येक चीज को प्राकृतिक नियमों द्वारा या, एक संकीण्तर अर्थ में कहें तो, भूतिक्रिया विशान (फिज़ाओंलीजी) द्वारा व्याख्यायित किया जा सकता है।"
- पृष्ठ 30 माक्सर् ने कहा है, "दार्शनिकों ने, इस दुनिया की महज तरह-तरह से व्याख्या की है, दरअसल महत्वपूर्ण बात तो इसे बदलने की है।"¹

ηθο 192 (127)

धर्म और समाजवाद
“धर्म मानवता के लिए अफ़्रीम है”, मावर्स का कहना था।² “สวี เกอ ซิร ซิร उनके (यानी भूतकवादियों के - स.) अनुसार, (पृष्ठ बत्तीस, बुष्खारिन) की घात चार आरम्भ में थी प्रकृति; उससे जीवन; और जीवन से चिन्तन और वे सारी अभिभ्यक्तियाँ, जिन्हें हम मानिसक या नैतिक परिघटनाएँ कहते हैं। आत्मा जैसी कोई चीज़ है ही नहीं, और मनःचेतना पदार्थ की, एक खास ढंग से संगठित, एक क्रिया के अलावा और कुछ नहीं है।¹

ηο 193 (128)

आम बगावत के बारे में माक्सरी का दृष्टिकोण
पहली बात :
(पृष्ठ)33
“अगर आम बगावत को उसके कड़वे अंजाम तक ले जाने (अर्थात – उसके सारे परिणामों को खेलने) का दृढ़संकल्प न हो, तो उसके साथ खेलो मत। आम बगावत एक ऐसा समीकरण है जिसके मान बहुत अनिश्चित होते हैं, जो हर दिन बदल सकते हैं। इसमें जिन शक्तियों का विरोध किया जाना होता है उनके पास संगठन, अनुशासन और परम्परागत सता की सारी अनुकूल स्थितया होती हैं।
“अगर आम बगावत करने वाले अपने शत्रुओं के खिलाफ़ भारी ताकत नहीं जुता पायें, तो वे कुचल डाले और नष्ट कर दिये जायेंगे।
दूसरी बात :
“यदि आम बग्गवत एक बार शुलह हो गयी, तो यह आवश्यक है कि पूरे संकलप के साथ कार्बोरीय की जाये और आक्रमक रख्य अड्ित्यार किया जाये। रक्षात्मक रख्य हरेक सशस्व आम बग्गवत की मौत साबित होता है; यह दुश्मन से जोर-आजमाईश करने से पहले ही तबाह हो जाता है। दुश्मन को उसी वक्त हकका-बकका कर डालना आवश्यक है जब उसके सैनिक अभी बिखरे हुए हों, और हर रोज नयी-नयी सफलताएँ हासिल करना जरूरी है, चाहे वे कितनी भी छोटी क्यां न हों। पहली सफलता से बढ़े मनोबल को बनाये रखना जरूरी है। डाँवाडोल तलों को आम बग्गवत के पक्ष में लामबन्द करना जरूरी है, जो हमेशா ही ताकतवर के पीछे हो लेते हैं, और हमेशा अधिक सुरक्षित पक्ष तलाशते रहते हैं... एक शब्द में दानों - अब तक की जानकारी में क्रिकतकारी नीति के सबसे बड़े विशारद - के इन शब्दों के अनुसार कार्बोरीय करो : साहसिकता... साहसिकता...और एक बार फिर साहसिकता!"²
1. वहीं
नोटबुक में अगली लिखावट पृष्ठ 273 (130) पर है। पृष्ट 194 से पृष्ट 272 तक सादे हैं। पीछे भी ऐसे ही सादे पृष्ट या अनराल आये हैं। हो सकता है कि भगतिसंह ने अपनी 404 पुष्ठों की नोटबुक में अपने अध्ययन के विभिन्न विषयों के अनुसार अलग-अलग हिस्से निर्धारित किया है। यहाँ खुम ह्पु हिस्से में पृष्ठ 165 (100) में 193 (128) तक उनके नोट्स राज्य के विज्ञान पर - स्वतंत्रता और सम्प्रमुता की अवधारणाओं और उनके विकास पर, तथा उनकी निरन्तरता में फ़्ग्सीसी क्रित और सोवियत प्रयोग पर कोंद्रित रहे। अगले हिस्से में विभिन्न विविध विषयों पर उनकी टिपिणियाँ और पुस्तकों के अवतारण दर्ज हैं। लेकिन इन सबमें एक सामान्य सूत्र यह है कि ज्यादातर तत्कालीन भारतीय स्थितियों और अन्य सम्बन्धित मुद्दों के बारे में हैं। - स.

η50 273 (130)

“…kya ︸tung ︸tuh ︸chahahah ︸ho ︸kic ︸kich ︸ अगर आज सरकार आकर मुझसे कहे कि, "स्वराज लो", तो मैं इस उपहार के लिए धन्याद तो दे दूगा, पर उस चीज को स्वीकार नहीं करूणा जिसे मैनें स्वयं अपने हाथों से अर्जित नहीं किया है...। "कोई भी सता जो हमारे विरुद्ध जाती है, उसे हम बरबस अपनी मज़ी के आगे डुकने के लिए मजबूर करेंगे। "...बुनियादी चीज़ सरकार की गिरमा है। [पृष्ठ 274 (131) पर जारी]
“क्या सामाज्य के भीतर स्व-शासन का होना वास्तव में एक व्याधिकारि आदर्श हो सकता है? इसका मतलब क्या होगा? इसका मतलब या तो हमारा कोई स्व-शासन नहीं होगा, या इंलेण्ड का हमारे ऊपर कोई वास्तविक आधिपय नहीं होगा। क्या हम स्व-शासन के मात्र छायाभास से ही सन्तुष्ट हो लेंगे? अगर नहीं तो क्या इंलेण्ड हमारे ऊपर अपने मात्र छायाभासी आधिपय से ही सन्तुष्ट हो लेगा? दोनों ही दशाओं में, इंलेण्ड एक छायाभासी आधिपयभर से ही सन्तुष्ट नहीं हो सकता, और हम भी मात्र छायाभासी स्व-शासन से सन्तुष्ट होने से इंकार करते हैं। और इसीलिए भारत में स्व-शासन और इंग्लैण्ड के उस पर आधिपय के बीच ऐसी परिस्थितियों में कोई समझाता सम्भव नहीं है…। यदि स्व-शासन -वास्तविक - हो, तो सिर्फ भारत में ही नहीं, बिलक स्वयं ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर इंग्लैण्ड की स्थिति क्या होगी? स्व-शासन का मतलब है स्वयं टेकस लगाने का अधिकार, इसका मतलब है अपना नियन्वण, इसका मतलब है अपनी जनता को विदेशी नियति पर संरक्षणतत्तिक और निष्ठात्तिक चुर्ती लगाने का अधिकार। जिसे धन हमको खुद टेकस लगाने का अधिकार मिल जायेगा, उस धन हम क्या करेंगे? तब हम औद्योगिक बायकाट के इस कितन काम में लगने की कोशिश नहीं करेंगे। बिलक वही करेंगे जो हरके राष्ट्र करता आया है। आज हम जिन परिस्थितियों में जी रहे हैं, उनके मदनजर हम मैनबेचैस्टर से आने वाले कपड़े के एक-एक इंच पर, और लीड्स से आने वाली एक-एक ब्लेड या छुरी पर, भारी निषेधितक और संरक्षणतत्तिक चुर्ती लगा देंगे। हम अपने देश में एक भी अंग्रेज़ी को घुसने की अनुमति नहीं देगे। आज जिस तरह ब्रिटिश पूर्णौ भारतीय संसाधनों के विकास के नाम पर यहाँ लगी हुई है, उसकी हम कर्ताई अनुमति नहीं दी गे। हम ब्रिटिश पूर्णौ पितयों को देश की खानाज सम्पदा की खुदाई करने और उस अपने देश उठा ले जाने का कोई अधिकार नहीं दैनगे। [पृष्ठ 275 (132) पर जारी] हम विदेशी पूर्णी की ज़्ज़रत होगी। पर इसके लिए हम पूरी दुनिया के खुले बाजारों से विदेशी कर्ज लेने की दरखलास करेंगे, और कर्ज की वापसी के लिए भारतीय सरकार, भारतीय राष्ट्र की साध्व की गारंवती देंगे…। और आज जिस तरह से इंलेण्ड के वापसीव्यक हित सिद्ध हो रहे हैं, तब, जनता के स्व-शासन की दशा में, नहीं सिद्ध होंगे, भले ही यह सरकार साम्राज्य के अधीन ही क्या न རྗེ། ལོ་རིག འབྲས་ཀྱི་ཡིག་གི ཡིག ཡིག ཡ
“अगर साम्राज्य के भीतर सचमुच हमारी अपनी सरकार हो जाये, अगर 30 करोड़ लोगों को वही स्वतंत्रता मिल जाये जो साम्राज्य को हासिल है, तब तो ब्रिटिश साम्राज्य रह ही नहीं जायेगा। भारतीय साम्राज्य हो जायेगा…।”

q0 276 (133)

हिन्दू सभ्यता :
হর্মস ঐসা লগ সকতা ই কি অপনে কই পধীস কী দুটি সে যহ এক ঈসা লগধনগ অকলপনীয়-সা সমুদ্রবয় ই জিসমে ঝক তরুণ আধ্যাতিকম খাববদ হই তে দুটি তরুণ স্থলু ধীতকবদ খিই, ঝক তরুণ ইদ্রযনিগ্রহ হই তে দুটি তরুণ ইদ্রযিলিসা খিই, ঝক তরুণ যহ মানবীয় আসা কে বীসবক আলমা কে সাথে একাকার করেন কা দর্শনগা দাবা করতই হখা মনুষ্য কে দীষিত্যা মই আর দীষিত্যা কে মনুষ্য মই সমাহিত করতই, তে দুটি তরুণ বহ হত্যা কর দেন বলা নিরাশাবাদ খিই জিসকে তত্র যহ ওপেদা দইই কি জীবন অপনেআপ মই দুবিদযী প্রতিটি के अलावा और कुछ नहीं है और कि इससे मुंक्ति का एवं सभी बुराइयों के अन्त का, एकमात्र उपाय अस्तवहिन हो जाने में ही है।
शिंशा नीति :
भारत में पश्चिम शिक्षा को चालू करने का मूल मतल्य नौजवान भारतीयों की एक अच्छी-खासी संख्या को प्रशिक्षित करना था, तिक्र सरकारी दृष्टरों में मातहती पदों को अंग्रेजी बोलने वाले देशज लोगों से भरा जा सके।

q80 277 (134)

ब्रिटिश नैकरशाही के अत्याचार के खिलाफ़ अपनेआप को राजनीतिक आन्दोलन में डॉर्ज देने वाले कितने पश्चिम शिक्षाप्राप्त भारतीयों ने अपने देशवासियों को उनकी सामाजिक बुराइयों की नृशंसा से मुक्त करने के लिए कभी ऑँगुली उठायी है? उनमें से कितने ऐसे हैं जो स्वयं इससे मुक्त हैं, या, यदि मुक्त भी हैं, तो क्या उनमें अपने विचार के अनुसार आचरण करने का साहस भी है?

q00 278 (135)

किसी भारतीय संसद की कல்पना करना कितन है!
भारतीय राष्ट्रीय कार्ग्रेस लगभग शुरू से ही एक संसद की कार्यशैली अभिज्यारकर चुकी थी। परन्तु भारत में संसद की न तो कोई गुजाइश थी, और न है कारण फ़िल्म के बीच तक ब्रिटिश शासन एक वास्तविकता बना रहेगा, तब तक भारतीय सरकार, जैसा कि लॉर्ड मोसली ने साफ्तौर पर कहा है, एक निरंकुश तत्त्व ही हो सकता है - जो भले ही कल्याणकारी हो और भारतीय विचारों के साथ पूरी सहानुभूति रखे, फिर भी एक निरंकुशतत्त्व होगा।
○___
कांग्रेस का उद्देश्य या लक्ष्य :
“भारतीय राष्ट्रीय कार्ग्रेस का उद्देश्य भारतीय जनता को सरकार की एक ऐसी प्रणाली उपलब्ध कराना है जो ठीक वैसी ही हो जैसी कि ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत स्व-शासित देश चला रहे हैं, जिसमें वे साम्राज्य के अधिकारों और दायित्वों में बराबर के भागीदार हैं।”

q80 276 (136)

स्वतंत्र भारत का संविधान¹
और कोई नहीं, बल्कि स्वयं (भारत) माँ ही यह तय करेंगी और कर सकती है कि एक बार जब वह अपनी अभिस्ता पा लेती है और आजूद हो जाती है तो इस क्रान्तिक के सम्पन्न हो जाने के बाद वह अपने जीवन के मार्ग-दर्शन के लिए कौन-सा सिविधान अपनायेगी...। बिना विस्तार में गये, हम इतना कह सकते हैं कि भारतीय राष्ट्र की इमपीरियल सरकार का मुंबिया राष्ट्रपति बनेगा या राजा, यह इस पर निर्भर करता है कि यह क्रान्तिक स्वयं को कैसे आगे बढ़ती है...। माँ का आजूद होना, उसका अखण्ड और एक होना, तथा उसकी इच्छा का संवोपिरे रहना जरूरी है। उसके बाद ही वह अपनी इच्छा ज़िहिर कर सकती है कि वह अपने सिर पर राजसी मुकुट धारण करे या अपनी पविच काया को गणतानिक परिधान से आविष्टत करे।
पर मत भूलो है राजाओं! कि तुम्हारे कृत्यों और अकृत्यों का कड़ा हिसाब लिया जायेगा, और नया जन्म पायी हुई जनता तुम्हारे साथ तुम्हारे ही ढंग से हिसाब चुकता करने में नहीं चूकेगी। हर कोई जो जनता के साथ सिक्रय रूप से विश्वासधात करेगा, अपने पुरखों का तिरस्कार करेगा, और माँ के चिंलाफ़ा जाकर अपने खून को गंदा करेगा...उसे कुचल कर धूल और गर्द में मिला दिया जायेगा...। क्या तुम्हे हमारे इस कठोर संकल्प पर शुबहா है? अगर है, तो सुन लो नाम धीगरा' का और चुप कर जाओ। उस शहीद का नाम लेकर कहते हैं कि अरे भारतीय राजाओं, इन शब्दों पर गम्भीरता से और गहराई से सोचे। जैसी मज़ी हो करो, लेकिन तुम वही पाओगे जो बोओगे। कुन लो कि तुम राष्ट्र के संस्थापकों में पहला बनगे या राष्ट्र के अत्याचारियों में आविद्रि।
अछूत : पृष्ठ 196, इण्डियन अनैरस्ट
“तय करो, औ भारतीय शासकों"²
___
राजनीतिक दृष्टिकोण से भारतीय आबादी के लाखों-लाख लोगों का अपने शासकों की आस्था के अनुरूप धर्मांतरण ऐसी सम्भावनाओं के द्वार खोल देगा किमें उनका विस्तारपूर्वक वर्णन करने की ज़रूरत नहीं महसूस करता।
○ varphi 184 की घात 3

q00 280 (137)

हत्या निय यज्ञ¹
สৌน มี มุขา บุคคล มี มนุษย์ มี มนุษย์ มี มนุษย์ มี अपनाया, जिसने सोने की मुद्रा पाने की लालच में पूर्वजों के नाम को कलिकत किया - आज उस दुराचारी को तुमने भारत की इस पवित्र धरती से मिटा दिया है। नरेन गोसाई' से लेकर तिलत चक्रवर्ती तक सभी उस कमीने जालासाज् शम्स-उल-आलम की जालासाज्यों और यातना के फलस्वरूप सरकारी गवाह बन गये थे। अगर तुमने नरपिशाचों के इस मददगर की छुट्टी नहीं कर दी होती, तो क्या भारत के लिए कोई उममीद बची रह जाती?
कई लोग यह चीख-पुकार मचा रहे हैं कि विद्रोह करना महापाप है। लेकिन विद्रोह है क्या? क्या भारत में कोई ऐसी चीज हैं, जिसके खिलाफ विद्रोह किया जाए? क्या एक फिरंगी को भारत का राजा माना जा सकता है, जिसके स्पर्धमात्र से, जिसकी महज परछाई पड़ जाने से ही हिन्दी अपना शुद्धिकरण करने के लिए बाध्य हो जाते हैं?
ये महज पश्चमी लुटेरें हैं जो भारत को लूट रहे हैं...। उन्हें निकाल बाहर करो, हे भारत के सपूतो! बे तुम्हे जहाँ कहीं भी मिलें, उन पर और उनके साथी जासूसों और खुफिया एजेंटों पर कोई रहम मत करो। पिछले वर्ष, अकेले बंगाल में ही १७ लाख लोग बुखार, चेचक, हैजा, प्लेग और दूसरी बीमारियों से मर गये। तुम अपनेआप को भागयशाली समझो कि तुम बच गये, लेकिन याद रखो कि कल तुम भी प्लेग और हैजा की चपेट में आ सकते हो। क्या तुम्हारे लिए बेहतर नहीं होगा कि तुम बहादुर्को की मौत मरो?
জব রইজর কারণে যদি বিখ্যান হবে, তোড়া জাগাবে, কি কথা ইস রুমের বোল্টে মধ্যে কে দিয়ে দিয়ে দিয়ে করত পরত, কেইন কে দিয়ে দিয়ে করত পরত, কেইন কে দিয়ে দিয়ে করত পরত, ক
(पृष्ठ 342, नोर्स्) आई.यू.³
“भारत में कुल मतदाना 62,00,000 अर्थात भारत की कुल आबादी का 2½ प्रतिशत हैं जिसमे वे शेख शामिल नहीं, जिन पर 1919 का कानून नहीं लागू होता था।”

q80 283 (140) $ ^{2} $

इण्डिया ऑल्ड एण्ड न्यू : शिरोल वी.
194 आई. औ. ऐन.¹
“ब्रिटिश लोग यह जान लें कि यदि वे न्याय नहीं करना चाहते, तो यह प्रत्येक भारतीय का परम कर्तव्य बन जायेगा कि इस साम्राज्य को नष्ट कर दे।”
देहात और शहर का सवाल
कुछ सरकारी बुद्धिमा इस रूप में दिखायी गयी थी कि भूगोলিক स्थिति पर बिना ध्यान दिये, दूर-दराज के शहारों को एक निर्विचन क्षेत्र में रख दिया गया था, ताकि ऐसे शहीरा व्यक्तियों को, जोकि (सरकार के) न चाहते हुए भी अधिक विकसित राजनीतिक दृष्टिकोण पा चुके थे, उन देहाली निर्विचन क्षेत्रों से उम्मीदवार बनने से रोका जा सके, जिनमें यदि उपयुक्त व्यवस्था न की गयी होती तो कई एक छोटे शहर भी स्वाभाविक तौर पर शामिल हो जाते। यह एक आधुरी कोशिश थी जो इस विश्वास पर आधारित थी कि पंजाब की आबादी को बकरियों और भेড়ों के रूप में विभाजित किया जा सकता था, जिसमें बकरिया' विश्वासधाति' शहीरी लोग तथा भेড়' विश्वासपात्र' किसान समुदाय के लोग माने गये थे। खालिस का लेज़ 1892 में स्थापित हुआ

2020 284 (141)

भारत जैसा मैने इसे जाना¹ एक 'महात्मा' का रास्ता सचमुच कितन है, और यह आश्रयरूपकन नहीं है कि गाँधी ने हाल ही में इस उपाधि को - और इसकी जिम्मेदारियों को ल्याग देने की कोशिश की है। भारत में उनका प्रभाव निरन्तर घटता जा रहा है, फिर भी उनका संयासी का बाना और महान नैतिक सच्चाइयों के रूप में उनके द्वारा अथनत कुशलता से निरन्तित किये जाने वाले अस्पष्ट और अज्ञावहारिक तोलेस्तोय मार्को सिद्धांत बहुतेरे लोगों को साथक लगने का प्रभर देते हैं तथा भावुक इंलेण्ड के दुबल मन वाले तथा फ्रांस के कुछ तर्कशील लोग भी इसी प्रभम में हैं, जो पूर्व से एक नयी रोशनी की उममीद लगाये हुए हैं। पृष्ठ 65
भेदिया:
आयरिश षड्यन्जों में जो घृणित लेकिन उपयोगी वर्ग आमतौर पर (भेदियों की - स.) आपूर्ति किया करता था, वह जडमूल से क्यों सूच गया, इसके मुख्य कारणों में से में समझता हूँ एक तो यही रहा है कि सताधारी अपने भेदिये को छिपाने और बचाने में असफल रहे (जैसे जेम्स कैरी के मामले में, जबकि उसी ने क्रांतिकारियों के अभ्येद्य गिराह का रहस्याध्वाटन किया था और उसी के साध्य पर ब्रैडी, फिट्ज़हरबर्ट और मुलेन को फीनिकस पार्क की दो हत्याओं, अभित चौफ़ सकेटरी और अण्डरसेक्टెरी की हत्याओं के बदले फाँसी पर चढ़ा दिया गया। उस भेदिये की एक नौजवान क्रान्तिकारी औ डॉनल ने, डरबन में, दिन-दहाड़ गोली मारकर हत्या कर दी।³) गो कि हत्या करने वाला पकड़ा गया। महायुद्ध से पहले और उसके दौरान, पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर के रूप में, मेरा कोई क्रिकारिक प्ड्यनों से पाला पड़ा, जिनका पर्दफाश करने में भेदियों की जाति ने एक बड़ी भूमिका अदा की, और हमारी सतकता इतनी मुकमल रही कि एक भी मामले में किसी भी भेदिये पर कोई आँच नहीं आयी।

q00 285 (142)

मैं समझ सकता हूँ कि अपनी नीचताभरी चालबाजी, असामान्य अहमनयता, दुर्विभसिन्ध रचने की अपनी जन्मजात रखान, और अर्चिकर तथ्यों पर पर्दा डालने की धमता से पूरी तरह लैस भारतीय षड्यन्�कारी कैसे इस माहौल में आराम से काम करते थे।
आयंसमाज:
༢༠༣༡ 187 इण्डिया ऐंड आई निउ इट² واستفان مذکور از آزمایشات پذیرش می برای نقشه به شکل زیر اشیای بسیار متنوع است. از همین مناطق این اشیای به شکل نمایش می‌دهد که در شکل زیر اشیای بسیار متنوع است. از همین مناطق این اشیای به شکل نمایش به شکل زیر اشیای بسیار متنوع است. از همین مناطق این اشیای به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش می‌دهد که در شکل زیر اشیای بسیار متنوع است. از همین مناطق این اشیای به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل نمایش به شکل 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و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به شکل نمایزی و نرژیسی به 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भी 1907 से लेकर आज तक हिन्दुओं की एक बड़ी आबादी जो राजद्रोह और दूसरे राजनीतिक अभियोगों के तहत दिण्डत होती रही है, वह इस समाज की ही सदस्य रही है। q50 286 (143) पृष्ठ 184, वहीं भारत के बारे में सांख्यकीय आंकड़े :
इंग्लेण्ड और वर्लस में 4/5 आबादी शहर्ों में रहती है।
- शहरी जीवन का मानक वहाँ से शुरू होता है जब 1000 लोग एक साथ रहने लगते हैं। केवल तभी नगरपालिका की ओर से जलनिकास, रेशानी और पानी की आपूर्ति की ल्यवस्था की जा सकती है। भारत (ब्रिटिश) कुल 244,000,000 में से 226,000,000 लोग गाँवों में रहते हैं।
इंलेण्ड - सामान्य समयों में मुहैया करता है भारत देता है
58 % (आबादि का - स.) उद्योग को
8 % कृषि को
71 % कृषि को
12 % उद्योग को
5 % व्यापार को
2 % घरेलू सेवाओं को
1) % स्वतन पेशों को
1) % सेना समेत, सरकारी सेवा को।
- पूरे भारत में ३१ करोड़ ५० लाख लोगों में से २२ करोड़ ६० लाख लोग भूमि पर आश्रित हैं।
- उनमें से 20 करोड़ 80 लाख लोग सीधे कृषि पर जीते या आश्रित हैं। (मॉन्टफ़ोर्ड रिपोर्ट)¹

༢༠ 288 (144)

कुल क्षेत्रफल - 1,800,000 वर्ग मिल ग्रेट ब्रिटेन से 20 गुना बड़ा
- 700,000 वर्गील या 1/3 से अधिक राज्यों के अधीन है। भारतीय राज्यों की संख्या 600 है।
- बर्मी फ्रांस से बड़ा है। महास और बम्बई (प्रात), अलग-अलग इटली से बड़े हैं। भारत की कुल जनसंख्या (1921 की जनगणा) -
318, 942, 000 अर्थात कुल मानवजित का 1/5
- 247,000,000 आबादि ब्रिटिश भारत में और
71,900,000 राज्यों में है।
25 लाख लोग अंग्रेजी पढ़ना जानते हैं - प्रति एक हजार पुरुषों में से 16 और प्रति हजार सिखों में से 2
देशी भाषाओं की कुल संख्या 222 है
गाँवों की कुल संख्या 500,000¹

q80 288 (145)

स्वेज नहरे 1869 में खुली। उस समय भारत का कुल निरंभित था :
5. 80 крой = £ 80,000,000
1926-27 और उसके पहले के दो वर्षों में इसका औसत था :
5. 350 करोड, अर्थात लगभग £ 262,500,000 कुल जनसंख्या = 31 करोड़ 90 लाख जिसमें से 3 करोड़ 20 लाख 50 हजार अर्थात 10.2 प्रतिशत लोग कृस्बों और शाहरों (शहरी क्षेत्र) में रहते हैं, जबकि इंग्लेण्ड में यह 79 % है।¹ और काम का सबसे कितन हिस्सा होगा झुगंगी-झोंपिडियों में रहने वालों के दमाग में कुछ बेहतरी की इच्छा को बिठाना।
22 साइमन रिपोर्ट² भगत सिंह के लघु हस्ताक्षर दिनांक 12.9.1929

परिशिष्ट - एक

फ़िलिपीन्स आंशिक रूप से बेचांकि विकास

( चापेकर बन्धुओं से भगतसिंह तक )
शिव वर्म स्वाधीनता संग्राम में क्रांतिकारियों के प्रवेश की घोषणा करने वाला पहला धमाका 1897 में पूरा में चापेकर बन्धुओं ने किया था। पूरा शाहर में उन दिनों एलंग जॉर्ज पर था। ऐण्ड नाम के एक अंग्रेज़ी को वहाँ एलंग किमशनर बनाकर भेजा गया। वह बड़ा ही ज़ालिम और तानाशाह क्रम का आदमी था। उसने प्लेग से प्रभासित मकानों को बिना कोई अपवाद खूर्ती कराये जाने का हुकम जारी कर दिया। जहाँ तक उस हुकम का सवाल है उसमें कोई गूलत बात नहीं थी। लेकिन जिस तरह रेंगेन ने इस हुकम पर अमल करवाया, उससे वह अलोकोरिय हो गया। लोगों को उनके घरों से निकाला गया और उन्हें कपड़े, बरतन आदि तक ले जाने का समय नहीं दिया गया।
4 मई, 1897 को लोकमान्य तिलक ने अपने पत्र केसरी में एक लेख लिखकर न सिंफ नीचे के अफसरों पर बल्कि खुद सरकार पर इल्ज़ाम लगाया कि वह जान-बूझकर जनता का उत्पीड़न कर रही है। उन्होंने रैण्ड को निरंकुश बतलाया और सरकार पर “दमन का सहारा लेने” का आरोप लगाया। फिर आया शिवाजी समारोह। इस अवसर पर, 12 जून, 1897 को एक सार्वजनिक सभा में अध्यक्ष पद से बोलते हुए तिलक ने कहा : "क्या शिवाजी ने अफजुल खाँ को मारकर कोई पाप किया था? इस प्रश्न का उत्तर महाभारत में मिल सकता है। गीता में श्रीमन कृष्ण ने अपने गुरुओं और बान्धवों तक को मारने का उपदेश दिया है। उनके अनुसार अगर कोई व्यक्ति निष्काम भाव से कर्म करता है तो वह किसी भी तरह पाप का भागी नहीं बनता है। श्री शिवाजी ने अपने उदर-पूर्ति के लिए कुछ नहीं किया था। बहुत ही नेक इरादे के साथ, दूसरों की भलाई के लिए उन्होंने अफजुल खाँ का वध किया। अगर चोर हमारे घर में घुस आयं और हमारे अंदर उनको बाहर निकालने की ताकृत न हो तो हमें बेहించकर दरावाँ बंद करके उनको जिन्धा जला देना चाहिए। ईश्वर ने हिन्दुस्तान के राज्य का पट्टा त्राए-पत्र पर लिखकर विदेशियों को तो नहीं दिया है। शिवाजी महाराज ने उनको अपनी जन्मभूमि से बाहर खिले हुए की कोशिश की। ऐसा करके उन्होंने दूसरों की वस्तु हड़पने का पाप नहीं किया। कुएँ के मेढ़क की तरह अपनी दृष्टि को संकुचित मत करो, ताजीराते-हिन्द की कैरें से बाहर निकलो, श्रीमद्भगवद्वीता के अथन्त उच्च वातावरण में पहुँचो और महान व्यक्तियों के कार्यों पर विचार करो। "¹ और 22 जून को चापेकर भाइयों ने रेण्ड व एवस्ट को मार दिया। इस तरह, ऊपरी तौर पर देखने से यही लगता है कि चापेकर भाइयों के कार्य के तालकालिक प्रेरक तत्व रेण्ड की निरंकुशा और तिलक का भाषण थे। लेकिन यह सिर्फ अर्दसल है। दरअसल, चापेकर बन्धुओं के विचार महामारी फैलने या रेण्ड के पूना आने से बहुत पहले से ही एक शक्ल अभिख्यार करने लगे थे।
1894 में ही चापेकर भाइयों ने पूना में शारीरिक और सैनिक प्रशिक्षण के लिए 'हिन्दु धर्म अवरोध निवारण सिमित' क्याम कर रखी थी कि जिसे हिन्दु संरक्षणी सिमित भी कहा जाता था। यह सिमित हर साल नियमपूर्वक शिवाजी व गणपति समारोह आयोजित करती थी। इन समारोहों में चापेकर भाइयों द्वारा पढ़े जाने वाले श्लोकों से उनकी भावना का पता चलता है। जनता से तलवार उठाने का आग्रह करते हुए 'शिवाजी श्लोक' कहता है :
“भाঁদ की तरह शिवाजी की कहानी दुहराने-मात्र से स्वाधीनता प्राप्त नहीं की जा सकती। आवश्यकता इसकी है कि शिवाजी और बाड़ी की तरह तेजी के साथ काम किये जायें। आज हर भले आदमी को तलवार और डाल पकड़नी चाहिए - यह जानते हुए कि हमें राष्ट्रीय संग्राम के युद्धस्वर में जीवन का जोखिस उठाना होगा। हम धरती पर उन दुश्मनों का खूत बहा देगे जो हमारे धर्म का विनाश कर रहे हैं। हम तो मारकर मर जायेगे, लेकिन तुम औरतों की तरह सिर्फ कहानियों सुनाते रहेगो। ”² 'গণপতি রুলো' তে 'শিভাজী রুলো'' সে ধী জ্যাদা ড্গ খা। গী আঁর ধর্ম কী রখা কে লিপ তত বছট হেন ক আছন করত হুপ ইসমই হিনুডো সে কথা গযা ই: “অফসেস, তুম গুলামী কী জিদগী পর শর্মমন্দা নইি হো; জাবো, আলমহলয কর লো। উড়! যে কমইন কসাইয়ট কী তরহ গ্যাব আর বচছদট কো মার রহে; উহে (গো কে) ইস সকত সে মুকত করআও; মত লইকন অজইজ কে মলকর; নুপুসক হোকর ধরণী পর বোড় ন বনো। ইস দেখ কে হিন্দুস্তান কথা জাতা হই; অজইজ খলা কিস তরহ যই আজ কর রহে ই?³ इस तरह हम देखते हैं कि चापेकर बन्धु और उनके सहयोगी मुख्यत: तीब्र धार्मिक भावनाओं से उपरोक्त थे और उनका दृष्टिकोण घोर कट्टरपथी था। सम्भवत: इसी कारण से वे ब्रिटिश विरोधी ही नहीं, मुस्लिम विरोधी भी थे। চাপের বনধুর্জাতে কি দোষখিত্বে হিন্দুত গ্রহণ আধারিত খোঁ। বৈশিষ্ট্য ধর্ম আরগে কি রখা কে লিখে অর্থজাতে কে বাহরু ধণিশা কাহতে খোঁ। রুড কি হত্যা থি ঐক্সেল ব্যক্তি কে প্রতি অনকি গহিতে নকচর কি নতীকা খোঁ। আপনের দমন আর নিরক্তিশতা কি কার্বোজযুগে কে কারণ পুরি জনতা কি ঘূণা কি পাত্র বনগা খোঁ। जहाँ तक उनको प्रेरित करने वाले दूसरे कारणों का सवाल है, इसका कोई सुबूत नहीं मिलता कि वे 1857 के भारतीय स्वाधीनता संग्राम से या फ्रांसीसी व इतालवी क्रितियों से प्रभावित रहे हों। इन तमाम सीमाओं के बावजूद मुकदमे के दौरान या बाद में, चौपेकर भाइयों ने जिस वीरता, साहस और आत्मबिलदान की भावना का परिचय दिया उसके महत्व को किसी भी तरह कम करके आँका नहीं जा सकता। सर ऊँचा किये हुए तीनों भाइयों ने फाँसी के फनेद को चूमा। गुलामी और आजादी की समस्याओं के प्रति यह धार्मिक दृष्टिकोण चापेकर भाइयों तक ही सीमित नहीं था। सावरकर बन्धु भी धार्मिक रहे...बंगाल के क्रांतिकारियों ने भी धर्म के सहारे लोगों को उभाड़ा था। इस वाक्य से शायद यह गूलतफहमी हो कि वे धर्म को न मानते थे केवल उभाड़ने का काम उससे लेते थे, इसलिए यह कह देना ज़्फ़री है कि वे स्वयं धर्म के कर्दार मानने वाले थे $ ^{4} $
1902 में कलकता में क्रायम अनुरशीलन समित की कार्यप्रणाली का वर्णन करते हुए तारिणीशंकर चकवर्ती लिखते हैं : “क्रांतिकारी कार्य के लिए जो इस समित में आते थे, उनको दो बाँगों में बाँटा जाता था। धर्म में जिनकी आस्था थी उनको एक बर्ग और धर्म-विशेष में, जिन्हें आस्था नहीं थी परन्तु क्रितकारी कार्यों में विशेष निष्ता थी, ऐसी लड़कों को दूसरे बर्ग में रखा जाता था।” “धर्म के प्रति जो प्रदावान थे वे इस बर्गी (मानिकतल्ला बागान - स.) में रहते थे…ये ही लड़के प्रथम कोटि के क्रितकारी समझे जाते थे"¹⁵ उस समय बंगाल के क्रिक्तकारियों का बहुमत बर्किमचन्द्र चटर्जी और स्वामी विवेकानन्द से बेहद प्रभावीत था। “अनुशीलन सिमिति के सदस्यों को हिन्दू ग्रथी, खासकर गीता को बहुत ध्यान से पढ़ना पड़ता था।” “बकिमचन्द्र चटर्जी और स्वामी विवेकानन्द की बौद्धिक परमरा में पले-बढ़े बंगाल के बीसवीं सही के पहले दशक के ये क्रितकारी धार्मिक उपादानों और कर्मकाउंडों से तथा प्राचीन व तालकालिक हिन्दुल के पौराणिक उपराख्यानों, प्रतीकों, गीतों और नारों से प्रेरणा ग्रहण करते थे।”7 इस तरह, क्रान्तिकारी आन्दोलन के पहले चरण (1897-1913) के क्रान्तिकारी आमतौर पर हिन्दु धर्म के प्रति आस्थावन थे और उससे प्रेरणा ग्रहण करते थे। यह कोई आकस्मिक बात नहीं थी। इसके ऐतिहासिक कारण थे। पिछली सही के आठवें दशक में तरंग भारत के दिल्ों को एक नयी भावना मध्य रही थी। शिशित युवक राजनीतिक दृष्टिकोण से सोचने लगे थे। एक नयी क्रस्म का राष्ट्रवाद जन्म ले रहा था। यह नया राष्ट्रवाद पुराने राजनीतिवाद के मुक़ाबले जनाद संजीदा, ज्यादा खुले दमाग् वाला था। यह इस विचार से लैस और प्रेरित था कि पूरे राष्ट्रीय जीवन का पुनःस्थान आवश्यक है। भारतीय मानस किस सीमा तक आन्दोलित हो उठा था, इसका अनुमान इसी तथा से लगगा जा सकता है कि सभी बेहतरीन सोच के लोगों की नयी भावनाएँ और विचार धर्म से अनुप्रिणात थे। पुराने देवताओं की जगह घृणा और रक्त के नये देवताओं की पूजा होने लगी थी। इस सीमा तक, धर्म की एक सकारात्मक भूमिका अवस्था थी। लेकिन इसका एक नकारात्मक पहलू भी था। इस दौर में बाल संगठनों तिलांक, বিपनचन्द् पाल, ब्रह् बान्धव उपाध्याय और अरिबन्ध चौष जैसे सभी जुझाڪा राष्ट्रीय नेता राजनीति को धर्म के रोग में रेंग रहे थे। इस तरह अचेतन रूप में ही सही, उन्होंने सामप्रदायिक राजनीति के विषवृक्ष लगाये। गाँधी और उनके अनुवादियों ने इस परमरा को आगे बढ़ाया और अन्त तक उससे चिपके रहे, जबकि क्रान्तिकारियों ने 1914 में ही, जब उनका आन्दोलन दूसरे चरण में प्रवेश कर रहा था, इसे छोड़कर धर्मनिरपेक्षता को अपना लिया था। धर्म और राजनीति का यह तालमेल तब से आज तक लगाता हमारे सार्वजिनिक जीवन को तबाह करता रहा है, और अब तो इसके कारण हमारी राष्ट्रीय एकता का दाँचा ही चरमरता नजर आ रहा है। हालाँकि महाराष्ट्र के चापेकर बन्धु और बंगाल के पहले दशक के क्रिकितकारी, दोनों प्राचीन भारतीय संस्कृति से प्रेरणा ग्रहण करते थे लेकिन दोनों के बीच एक मांक का अनतर भी है।
30 ऑपरेशन, 1908 को क्रिस्टिங्सफोर्ड की बर्ग्धी पर एक बम आकर गिरा जिससे दो महिलाओं की मृत्यु हो गयी। इस घटना पर टिपपी करते हुए २२ जून के केसरी में लोकमान्य तिलक ने लिखा : “1897 की हत्या और बंगाल के बमकाण्ड के बीच काफ़ी अनतर है। जहाँ तक दिलोरी और कार्य को कुशलतापूर्विक सम्मन करने का सवाल है, चापेकर भाइयों का दर्जा बंगाल की बम पार्टी के सदस्यों से जाँचा है। लेकिन अगर साध्य और साधन के नजरिये से देखें तो बंगालियों की ज्यादा तारीफ करनी होगी...वर्ष 1897 में पूरा निवासी प्लेग के समय के दमन के शिकार थे, और उस दमन से उत्पन्न उटेजन का कोई श्रुद्ध राजनीतिक चरित्र नहीं था। यह शासन-प्रणाली ही ख्रावर है और जब तक अधिकारियों को डॉट्सट्रेडकर व्यक्तिगत रूप से आतंकित नहीं किया जाता, तब तक वे व्यवस्था को बदलने पर तैयार नहीं होंगे - ऐसा कोई महत्वपूर्ण प्रश्न चौपकर भाइयों के सामने नहीं था। उनका कर्म फ्लेग के बाद जारी दमन के, यानी एक विशेष कार्य के खिलाफ था। निश्चय ही बंगाल की बम पार्टी की दृष्टि एक ज्यादा व्यापक पटल पर थी जिसे बंगाल के विभाजन ने उभारा था।"9 इत्या ही नहीं, बंगाल के क्रान्तिकारी धर्म को बहुत उ्यादा महत्व देते थे, इस तथय के बावजूद आन्दोलन के अन्तम लक्ष्य की दृष्टि से कहें तो, 1902 में ही उन्होंने एक बहुत महत्वपूर्ण घोषणा की थी। इसी वर्ष बंगाल के क्रान्तिकारीयं ने अपने को 'अनुशीलन सिमित' नाम की एक पार्टी के रूप में संगठित किया था। सिमित की स्थापना के समय जारी घोषणापत्र में कहा गया था : “अनुशीलन की कल्पना के समाज में अनपद, ग्रीब लोग नहीं होंगे, कायर, दुष्ट लोग नहीं होंगे और अखरव्य लोग भी नहीं होंगे। ऐसे समाज के निर्माण के लिए सभी प्रकार की विषमताओं को समाप्त करना होगा। विषमता के बीच मानव की मानवता विकसित नहीं हो सकती। मानव समाज से धन की विषमता, सामाजिक विषमता, सामप्रदायिक विषमता और प्रदर्शक विषमता दूर कर सभी मनुष्यों में समानता लानी होगी। केवल राष्ट्रीय सरकार द्वारा ही ऐसा किया जाना सम्भव है। पराधीनता की दशा में अनुशीलन के स्वाद के समाज की स्थापना सम्भव नहीं है, इसीलिए अनुशीलन पराधीना के विरुद्ध विद्रोही की घोषणा करती है। अनुशीलन भारत की पूर्ण स्वतंत्रता चाहती है। "¹⁰ अनुशीलन सिमित की यह घोषणा निश्चय ही आगे की तरफ एक बहुत बड़ा कृदम था। यहाँ पर बंगाल के क्रान्तिकारी 1897 के पूना केन्द्र से आगे हैं। चापेकर बन्धु विदेशियों से नफ़रत तो करते थे मगर वे खुद क्या चाहते हैं इसके बारे में स्पष्ट नहीं थे। यह बात बंगाल के क्रान्तिकारियों के साथ नहीं थी। ये लोग मुस्लिम विरोधी भी नहीं थे, हालाँकि वे धार्मिक लोग थे और हिन्दू ग्रंथों से प्रेरणा प्राप्त करते थे। इसके विपरीत इस दौर के पंजाब के क्रिकितकारी आरम्भ से ही साम्प्रदायिकता के दोष से मुक्त थे। सरदार अजीत सिंह, लालचन्द 'फूलक', सूफी अम्बा प्रसाद, लाला हरदयाल और उनके सभी सहयोगी धर्मनिरपेक्ष थे। धर्म उनके लिए एक निजी मामला था। शताब्दी के पहले दशक के क्रांतिकारी जिन सोर्तों से प्रेरणा प्रहण कर रहे थे उनमें धर्म के अलावा एक था 1857 का भारत का पहला स्वाधीनता संग्राम। "इस विषय पर 1907 या 1908 में लन्दन में लिखी गयी वीर सावरकर की पुस्तक ने अपनी तमाम अपपरीतताओं के बावजूद, जो उस दौर में और उस समय के हालात में स्वाधिविक थी, बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इस विषय पर ब्रिटिश साम्राज्यवाली लेखकों द्वारा फैलाये गये लाखों तथा उनके झुटे ऐतिहासिक लेखन की धिज्यों उड़ाकर इस पुस्तक ने बहुत बड़ा काम किया। इसने बातों को सही तौर पर सामने रखा। इस किताब पर ब्रिटिश शासकों ने फ़ौरन प्रतिबन्ध लगा दिया, लेकिन फिर भी यह महतत से और गुप्त रूप से तैयार की गयी पाण्डुलिपि के रूप में भारत के उस समय के क्रिकतिकारियों के बीच घूमती रही।"¹¹ वास्तविकता यह है कि 1857 का जन-विद्रोह पूरे स्वाधीनता संग्राम के दौरान सभी स्वाधीनता सेनানিयों के लिए प्रेरणा का स्वातंत्र बना रहा। शताब्दी के पहले दशक में क्रिक्नकारियों के लिए प्रेरणा का दूसरा स्पेत था फ्रांसीसी, इतालवी और रूसी क्रिकनकारियों की कहिनयां।
आन्दोलन के पहले चरण की कमजोरियाँ और सीमाएँ
आन्दोलन के पहले चरण के दौरान पूना और बंगाल के क्रिकतकारियों की पहली कमजुरी थी उनका हिन्दू पूर्वग्रह। इस पूर्वग्रह ने मुस्लिम जनता को आन्दोलन से दूर रखा। हालाँकि बंगाल के क्रिकतकारी मुस्लिम विरोधी नहीं थे, लेकिन मुस्लिम जनता से कार्यकर्ति भरती करने का कोई गम्भीर प्रयास उन्होंने कभी नहीं किया। इस कथन के कुछ अपवाद यहाँ-वहाँ मिल सकते हैं। लेकिन अपवाद कभी नियम नहीं बनते। आन्दोलन के दायरे को सीमित करने वाली दूसरी कमजुरी थी जनता के साथ जीवन सम्बन्धों का न होना। स्वदेशी आन्दोलन के तीन या चार सालों को छोड़कर, जब बंगाल के क्रानितकारी जनता के बीच गये और लोगों को सिक्रय होने के लिए प्रोत्साहित किया, आमतौर पर क्रानितकारी व्यक्तिगत क्रियाशीलता में विश्वास रखते थे, जिसे सरकार आतंकवाद के गूलत नाम से पुकारती थी। जनता इन क्रानितकारियों के आत्मबलिदान, निर्भिकता और साहस की प्रशंसा तो करती थी लेकिन अपनी रोजमर्मी की समस्याओं के साथ उनकी कार्बोडियों को जोड़ सकेन में असमर्थ रहती थी। ऐसी स्थिति में सामाज्यवादियों के लिए क्रानितकारियों का दमन कर सकना और भी आसान हो जाता था। आन्दोलन की तीसरी सीमा थी उसके कार्यकर्ताओं का वर्ण-चिरा क्रिकारकी आन्दोलन के कार्यकर्ताओं का एक बड़ा बहुमत निम्न-मध्यम वर्ष से सम्बन्धित था। इस चरण में यह एकदम स्वाधाविक था। यह वही दौर था जबकि नई पीड़ी विदेशी शासन से पूर्ण मुक्ति का दावा करने लगी थी। यह पीड़ी खुद को 'वयरस्क' समझने लगी थी। नीजवान तबके में बेचैनी थी मगर पुराना नेतुलब होम रुल के लिए प्रसादों और प्रार्थनापत्रों से आगे बढ़ने को तैयार न था। लेकिन शिशित नैजवान एक नयी दुनिया पाने के लिए अपना सब लुथ देने पर आमादा था। नैजवानों का विश्वास था कि वे जुझाऊँ सशसत्र संघों के जरिये देश को आजूद करना सकते हैं। इसके लिए वे अपना जीवन तक होम कर देने को तैयार थे। मध्यम वर्ग स्वभाव से ही व्यक्तवादी होता है। यह एक शक्तिशाली सहयोगी हो सकता है। अगर यह डूजीपित वर्ग की तरफ जाता है तो प्रतिक्रियावाद का वाहक हो जाता है। अगर यह मजदूर वर्ग के साथ खड़ा होता है तो, स्वयं नेतुल प्रदान कर सकने की शमता न होते हुए भी, एक क्रानिकारी शक्ति बन जाता है। इसकी स्वतंत्र कार्बोडियाएं प्रायः व्यक्तिगत कार्बोडियायों का रूप ले लेती हैं। जिस दौर की बात हम कर रहे हैं उस समय स्वाधीनात के लिए जनादोलन खड़ा कर सकने में न तो पूर्णीपित वर्ग समर्थ था और न मजदूर वर्ग ही। इस चुनोती का सामना अपने सपनों को साकार करने के लिए सबकुछ कुबीन कर देने को तैयार इन मध्यमवगिय नौजवानों ने स्वभावतः अपने ढंग से किया जो आरम्भ में व्यक्तिगत कार्बोडियायों का ही रूप ले सकती थी। यह सीमा एक ऐतिहासिक प्रक्रिया की उपज थी। गुलामी की अपमानजनक स्थिति के सामने समर्पण करने से बेहतर होता है चोट करना और नष्ट हो जाना। किसी न किसी को पहली चोट करनी ही पड़ती है। पहली चोट का कोई नतीजा नहीं निकलता और पहली चोट करने वाले ज्यादातर नष्ट हो जाते हैं। लेकिन उनकी कृबिनियाँ कभी बेकार नहीं जातीं। झरना बढ़कर गरजता हुआ दिया बन जाता है, चिनगारी ज्वालामुखी बनीती है, व्यक्ति समष्टि से एकाकार हो जाता है। पुरानी व्यवस्था की जगह एक नयी व्यवस्था आती है, और सपना एक हकौक्त का रूप ले लेता है। क्रानियाँ इसी तर्ज पर आगे बढ़ती हैं। भारत का क्रानिकारी आन्दोलन भी ठीक इसी तर्ज पर आगे बढ़ा। “भारतीय क्रिकारियायों ने, अकल्पनीय कितनाइयों के बीच भी, आधुनिक युग की सबसे बड़ी सामाज्यवादी-उपनिवेशवादी ताकत का चुनोती देने की जुर्त की। इतना ही नहीं, उस युग के क्रिकारिये शूरवीरों - चापेकर भाइयों, खुदीराम, कनाईलाल और मदनलाल धींगा ने अपने आत्मबलिदान और शाहदत के माध्यम से अपने ऊँबते हुए देशवासियों को जगया और उन्हें राष्ट्रीय स्वाधीनता तथा अपने जन्मसिद्ध जनवादी राजनीतिक अधिकारों के उच्च विचारों से भी परिचित कराया। क्रिकारिये आन्दोलन, ऐतिहासिक रूप से, अपने हंग का वह पहला आन्दोलन था जिसने राष्ट्रीय स्वाधीनता और सम्प्रभुता के लिए भारत के संघों के राजनीतिक उदेश्य के रूप में पूर्ण स्वाधीनता तथा ब्रिटिश सामाज्य से हर तरह के राजनीतिक सम्बन्ध-विच्छेत के लक्ष्य को जनता के सामने रखा। ठीक इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर उन्होंने विदेशी सामाजी शासन के विरुद्ध संगठित हधियारबन्द संघों के लिए जनता का आहार किया। “वे शुरू से ही भारतीय जनता के लिए पूर्ण राष्ट्रीय प्रभुस्ता और लोकतानिंक स्वतंत्रता के लिए अनवरत संघर्ष करते रहे और उस लक्ष्य से कभी डिगे नहीं। “उनकी शादातों ने उनके प्रति जनता की प्रशंसा को उभारकर विदेशी साम्राज्यवादी शासन के प्रति उसकी नफ़रत को और भी तीख़ा बनाया और उसके संघर्षील साहस को और भी ऊँचा उठाया।”¹²
गंदर पाटी की स्थापना
ऑस्ट्रेलिया में ब्रिटिश कोलंबिया के एक राजनीतिक दल है। क्योंकि के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद दक्षिणी महासागर के बाद इस शताब्दी के पहले दशक में भारत छोड़कर जाने वाले क्रिकारियों को अंग्रेज़ सरकार के हाथों में पड़ने से बचने के लिए एक देश से दूसरे देश तक भटकना पड़ता था। अन्त में, उनमें से कइয়ों ने अमेरिका में बसने और उस देश को अपने कार्य का आधार-क्षेत्र बनाने का फ़ैसला किया। इनमें प्रमुख थे - तारकनाथ दास, शैलेन्द्र चोष, चन्द्र चकवर्ती, नन्दलाल कार, बसनकुमार राय, सारंगधर दास, सुधीन्दनाथ बोस तथा जी.डी. कुमार। पहले दशक के अंत तक लाला हरदयाल भी उनसे आ मिले। इन लोगों ने अमेरिका और कनाडा में बसे भारतीय प्रवासियों से सम्पर्क किया, धन संग्रह किया, अख्बार निकाले, और कई जगहों पर गुण संस्थाएँ क्याम की। तारकनाथ दास ने फ्रீ हिन्दुستان नाम से अख्बार निकाला और अमेरिका में रह रहे भारतीय छात्रों तथा भारतीय प्रवासियों के लिए व्याख्यान देते रहे। वे संमिति नाम की एक गुप्त संस्था के प्रधान भी थे। इस संस्था के अन्य सदस्य थे - शैलेन्द्रनाथ बोस, सारंगधर दास, जी.डी. कुमार, लस्कर और ग्रीन नामक एक अमेरिकी। रामनाथ पुरी ने 1908 में ओकलेण्ड में 'हिन्दुستان एसोসিएन्' नाम की एक संस्था क्याय की, और सर्वर्लार ऑफ फ्रेंडिस नाम से एक अख्वार निकाला। ये इस अख्वार के माध्यम से अंग्रेज़ी को भारत से खर्देई जाने की वकालत करते रहे। जी.डी. कुमार ने वैक्वर से स्वदेशी सेवक नामक अख्वार निकाला। वे वहाँ की एक गुप्त संस्था के सदस्य भी थे। इस संस्था के सदस्य रहीम और सुन्दर सिंह भी थे। सुन्दर सिंह आररन नाम के एक अख्वार का सम्पादन भी करते थे और उसके जरिये लगातार ब्रिटिश-विरोधी प्रचार चलाते थे। रहीम और आत्माराम वैकूबर में 'यूनाइटेड इण्डिया लीग' का गठन किया। লালা हरद्याल 1911 में अमेरिका पहुँचे और वहाँ स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हो गये। सैन फ्रांसिकको में 'हिन्दुस्तानी स्ट्रूडेण्ट्रस एसोसिएशन' नाम की एक संस्था उन्होंने गितत की। 1913 में एस्टोरिया की 'हिन्दुस्तानी एस्ोसिएशन' का गठन हुआ। करीम बृष्भा, नवाब खान, बलवन्त सिंह, मुश्रिराम, केंसर सिंह और कर्तिर सिंह सराभा इसके सदस्य थे। टाक्टरदास और उनके मित्रों ने सेपट जॉन में रहने वाले भारतीयों की एक संस्था गितत की। 1913 में शिकागो में 'हिन्दुस्तानी एस्ोसिएशन ऑफ् दि युनाइटेड स्ट्रेट्स ऑफ् अमेरिका' का गठन हुआ। ³ লালা হরদ্যাল নে মহসুস কিয়া কি সম্ভবত রাজ অমেরিকা কে বিধিমন হিস্টােম মে কার্বত ইন সম্ভবতী কী গতিবিধিয়ো কো সমনতম আবশ্যক হে। অত: উহউন কনাড আর অমেরিকা মে রহনে বলে শারতীয় ক্রান্তিকারিয়ো কী এক মীটিগ বুলোবী। ইস মীটিগ মে 'হিন্দুসানী এসোসিএশান আঁষ্ণ দুইসিফিক কোস্ট' নাম কি এক সংখ্যা কে গতন কা ফ্রিসলা লিয়া গযন। বাবা সোহন সিহ থকনা আর ল্যাল হরদ্যাল ইসকে ক্রমশ: অধ্যব্ধ আর সিছব যুনে গবে। ল্যাল হরদ্যাল নীকরী সে ইসটীফ দ্কের অপনা পুরা সময় এসোসিএশান কে কাম মে লগানে লগে। मार्च 1913 में एसोসিएशन ने सैन फ्रांसिक्को से गंदर नाम से एक अख्बार निकालने का फैसला किया। उसके बाद एसोসিएशन का नाम भी बदलकर 'गंदर' पार्टी कर दिया गया।
आगे की तरफ एक बड़ा कदम
1913 में ग्रदर पार्टी का गठन क्रिकितकारी आन्दोलन के विकास की दिशा में एक बहुत बड़ा एवं महत्वपूर्ण कृदम था। इसने राजनीति को धर्म से मुक्त किया और धर्मनिरपेक्षता को अपनाया। धर्म को निजी मामला घोषित कर दिया गया। अज्बार गृदर ने हिन्द-पुसलमान दोनों का आहारन किया कि वे आर्थिक मसलों पर ज्यादा ध्यान दे क्योंकि उनका दोनों के जीवन पर एक जैसा प्रभाव पड़ता है। एलग से हिन्दू और मुसलमान दोनों ही मर रहे हैं। अकाल पड़ने पर अनन् से दोनों ही विचित रहते हैं। पगर के लिए जोर-जबरदस्ति दोनों पर की जाती है और दोनों को ही अत्यधिक ऊँची दरों पर भू-राजस्व तथा जल-कर देना पड़ता है। समस्या हिन्दू बनाम मुसलमान की नहीं बिलक भारतीय बनाम अंग्रेज़ு शोषकों की है। हिन्दु-मुस्लिम एकता को इतना मजबूत बनाया जाना चाहिए कि कोई उसे तोड़ न सके। ¹⁴ गंदर पार्टी “धर्मनिरपेक्षता में विश्वास करती थी और टोस हिन्दु-मुस्लिम एकता की तरफदार थी। वह छूत और अछूत के भेदभाव को भी नहीं मानती थी। भारत की एकता और भारत के स्वाधीनता-संग्राम के लिए एकता, यही उसे प्रेरित करने वाले प्रमुख सिद्धांत थे।"¹⁵ इस मामले में गंदर पार्टी उस समय के भारतीय नेताओं से मिलों आगे थी। सोहन सिंह जोश के अनुसार, “गंदर के क्रिकितकारी राजनीतिक-सामाजिक सुधार के सवालों पर अपने सम्सामियकों से आगे थे।"¹⁶
14 มิถุน, 1914 คือ กุมร มี ปรภัฏิสินทรัศน์ ๑ ๑ ๑ ๑ لாலو هرద్యాల నె, జొ అపనేలాప కొ ఆరాజకటావాది కళా కరతే ఓ, ఐక బార కఠా ఘా ఘి స్వామి ఘోర సేవక కె బిచ కభి కౌఢి సమానతా నఖి ఘోర సకతి, ఘోర ఘి ఘి దోంలో ముసలమాన ఘో, ఘి ఘి, ఘి ఘి, ఘి ఘి ఘి ఘి ఘ हिन्दुस्तानियों के बीच सामप्रदायिक सद्भाव बढ़ाने को गंदर पार्टी ने अपना एक उदेश्य बनाया। युगांतर आश्रम नाम के गंदर पार्टी के दप्टर में सवर्ण हिन्दू, अछूत, मुसलमान और सिख, सभी जमा होते और साथ-साथ भोजन करते थे। ধর্ম জব राजनीতি के साथ ঘুলিমিল जाता है। তৈহ এক শ্চাতক বিশ্ব বন জাটা হে জো রাড়ু কে জীবন্ত অর্থাৎ কে ধিরে-ধিরে নত্চ করতা রহতা হে, খাই কে খাই সে লড়াতা হে, জনতা কে হীসলে পত করতা হে, তরকী দুটি কে ধুঁধলা বনাতা হে, অসলী দুশমন কি পছনান কর পানা মুশিকল কর দিতো হে, জনতা কি জুদ্ধা মন:রিখিত কে কমজের করতা হে, অরই ইস তরহ রাড়ু কে সাম্রাজ্যবাদী সিজিশা কে আক্রমণকারী যেজনআঁ কো ল্যাচার শিকার বনা দিতো হে। খারত মইন কে সবসে পহলে গৃহর কে ক্রান্তকারীয় নে মহসুস কিয়া। উর্দানী দিলেই কে সাথে এলান কিয়া কি ভে ইস জহর কে অপনি রজনীতি সে দুর হী রষ্টেগে। অরৈ উর্দানী জো কথা ভেসা হী কিয়া খী। ধারণীয় রজনীতি মইন হে তরকী পহলী মহল অপলম্বিখ থী। गंदर के क्रांतिकारियों की दूसरी महान उपलब्धि थी, उनका अन्तरराष्ठिय द्विष्टकोण। “गंदर का आन्दोलन एक अन्तरराष्ठिय आन्दोलन था। उसकी शाब्दாएं मलाया, शंचाई, इण्डोनेशिया, इस्ट इण्डोज़, फिलीपींस, जापान, मनीला, न्यूज़ीलेण्ड, हांगकांग, सिंगापुर, फिजी, बमि और दूसरे देशों में कार्यरत थी। गुरर पार्टी के उद्देश्यों के प्रति इण्डिस्ट्रेलव करेंगे ऑफ द वर्ल्ड (आई.डब्लू.डब्लू.) की बहुत हमदर्दी थी...वे (गंदर के क्रान्तिकारी) सभी देशों की आजादी के तरफदार थे। "¹⁹ कई कवियों की लिखी हुई कविताओं के संग्रह गंदर दी गूज में एक कवी कहता है : “भाइयो, चीन के खिलाफ जंग में न लडो। भारत, चीन और तुकी के अवाम आपस में भाई है। दुश्मन को इसकी इजाज़त नहीं दी जानी चाहिए कि वह इस भाईचारे को तहस-नहस कर सके।”²० वैकूवर में 1911 में एक संस्था क्याम हुई थी जिसका उदेश्य था बाकी दुनिया के साथ भारतीय राष्ट्र के स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के सम्बन्ध क्याम करना। लाला हरद्याल ने भी कई बार अपने भाषणों में यह चौषणा की थी कि वे केवल भारत में ही नहीं बिलक हर उस देश में क्रान्तित चाहते हैं जहाँ गुलामी और शोषण मौजूद है।²¹ गंदर के क्रिक्तकारियों के प्रचार का एक प्रमुख अंग था दुनिया की प्रेमिक यूनियनों के नाम अप्रील जारी करना। उन्होंने पूरी दुनिया के जनसाधारण से अप्रील की कि वे सामाजी निजাম को उखाड़ फंकेने के लिए एकजुट हों॥²²
विचारधारा और कार्यक्रम
गंदर पार्टी ब्रिटिश शासन की विरोधी थी और उसका उदेश्य था सशस्त्र संघों के जरिये भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त करके यहाँ अमेरिकी हंग का प्रजातन स्थापित करना। उसका विश्वास था कि प्रसावों, प्रतिनिध-मण्डली और प्राधना-पर्जों से हमें कुछ मिलने वाला नहीं है। अंग्रेज़ शासकों के सामने नरमदलीय नेताओं का नाचना भी वे पसंद नहीं करते थे। जिस गणतः की बात वे करते थे उसमें किसी तरह के राजा की नहीं, बल्कि एक चुने हुए राष्ट्रपति की गुजाइश थी। भारत की आजादी हासिल करने के लिए गंदर पार्टी व्यक्तिगत कार्बोडियों पर उतना निर्भर नहीं करती थी जितना इस बात पर कि सेना में प्रचार करके सैनिकों को विद्रोह के लिए प्रतिस्पष्ट किया जाये। उन्होंने सैनिकों से अपने की कि के विद्रोह के लिए उठ खड़े हों। गंदर के क्रिकारियों का वर्ग-चिरिर भी पहले के क्रिकारियों से भिन्न था। पुराने क्रिकारी मुख्यत: निम्न-मध्यम वर्ष के कुछ शिशित लोग थे जबकि गंदर पार्टी के अधिकांश सदस्य किसान से मजदूर बने लोग थे, और इसलिए उन्होंने विद्रोह के लिए किसानों से भी उठ खड़े होने की अपील की।
दो कमजोरियाँ
गंदर पार्टी की स्थापना अमेरिका में हुई थी जहाँ लोगों को कुछ नागरिक स्वाधீनताएँ और अभिभ्यक्ति की आजादी हासिल थी जबकि उस समय भारत में ये चीज़ नहीं थी। वहाँ गंदर के नेता खुलकर अपनी योजनाओं, इरादों और कार्यक्रम पर बहस करते और उन पर लेख लिखते थे। इस तरह ब्रिटिश सामाज्यवादियों को उनकी योजनाओं की पूरी-पूरी जानकारी रहती थी और वे गंदर के क्रानितकारियों की गतिविधियों से पैदा हो सकने वाली हर स्थित से निपटने को तैयार थे। गंदर के नेताओं और कार्यकर्ताओं की इस अंगोपनीयता की बहुत बड़ी कीमत पार्टी को चुकानी पड़ी। दूसरी प्रमुख कमजोरी उनका यह प्रामक विश्वास था कि एक सामाज्यवादी शक्ति उनको दूसरी सामाज्यवादी शक्ति के चंगुल से आजाद कराने में इमानदारी के साथ सहायता करेगी। उनके दिमाग् में यह बात साफ़ नहीं थी कि जर्मन हो या ब्रिटिश या कोई और – सभी सामाज्यवादी शक्तियों की प्रावित एक जैसी होती है। जब पहला विश्वयुक्त आरम्भ हुआ तब गंदर पार्टी और दूसरे क्रांतिकारियों ने नारा दिया कि "ब्रिटेन की முச்சीबत हमारे लिए सुनहरा अवसर है," और कि "दुश्मन का दुर्भय दोसट होता है"। इस विश्वास के साथ उन्होंने जर्मनी के कैरैस से सहायता के लिए सम्पर्क किया। केसर के प्रतिनिधियों से बातचीत के दौरान स्वाधीन भारत की भावी व्यवस्था से सम्बन्धित कुछ शर्तें भी उन्होंने रखने की कोशिश की। मगर इस नुवंटे पर कैरेंस का जवाब हमेशा अस्पत रहा। उसकी दिलचस्या जंग के दौरान ब्रिटेन के खिलाफ़ गंदर पार्टी के क्रांतिकारियों का अधिक से अधिक इस्तेमाल कर सकेन तक ही सीमित थी। उसके अपने जंगी उद्देश्य थे – ब्रिटेन और फ्रांस से अधिक से अधिक उपनिवेश डीनना। इस तरह गंदर के क्रांतिकारी सामाज्यवाद की वास्तविक प्रकृति से एकदम अनजान थे। वास्तविक और स्थानी मुक्ति के लिए गुलाम देशों को पूरी सामाज्यवादी व्यवस्था से लड़ाई लड़ती होगी। – यह बात रूस में अक्टूबर (नई प्रणाली में नवम्बर) 1917 की क्रान्तिक के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट हुई।
महान अक्टूबर क्रॉनिय और उसका प्रभाव
1917 คі акटۇر بىن ساميازيدي كريات ميان بنت كي شاتحا يحتنا هشي دس ني هشي شايازيدي كريات مي ني شاتحا كي مي شاتحا كي مي شاتحا كي مي شاتحا كي مي شاتحا विश्वव्यापी साम्राज्यवाद-विरोधी संग्राम का अंग होने के नाते भारत का स्वाधीनाता संग्राम भी इससे अंछूता नहीं रहा। उसके दृष्टिकोण में भी एक फैलाव आया और महसूस किया गया कि आर्थिक और सामाजिक समानताओं के बिना आज़ादी का कोई अर्थ नहीं होगा। अक्टूबर क्रान्तिक और यूरोप तथा एशिया में सामाज्यवाद-विरोधी क्रान्तिक की लहर ने, और साथ ही प्रथम विश्वयुद्ध के उपरान्त भारतीय जनता के क्रान्तिक की तरफ बढ़ते कृदमों ने ब्रिटिश सामाज्यवादियों को चौकना कर दिया था। उन्होंने अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए दोतरफ़ा नीति अपनायी। एक तरफ तो उन्होंने मॉण्टेयु-चेम्सफ़ोर्ड सुधारों का दकोसला खड़ा करके नरमपत्थि राष्ट्रीय नेताओं का समर्थन प्राप्त करने की कोशिश की और दूसरी तरफ राजद्रोह के मामलों की जानतीं बनने करने और क्रान्तिकारियों के दमन के उपाय सुझाने के लिए न्यायमूती रोलट की अध्यक्षता में एक कमैटी नियुक्त की। इस कर्मोरी की सिफ़ारीश्न बड़ी ही पार्वाविक थी। उसने साधारण राजनीतिक गतिविधियों तक को राजद्रोह क्रूर दे दिया था। रोलट कर्मोरी की दमनकारी सिफ़ारीश्नों के विरोध में गॉर्डीजी ने एक दिन आम हड़ताल का आहार किया। इस आहारों के अप्रत्योशित प्रभाव हुए और जनता अपना क्रोध व्यक्त करने के लिए एकजुट होकर सामने आ गयी। यह सरकार के लिए ही नहीं, हमारे नेताओं के लिए भी एक नयी बात थी। अंग्रेज़ी ने भारतीयों को सबक सिखाने का निश्चय किया और 13 अप्रैल, 1919 को जिलियावला बाग में इस निश्चय को अमली रूप भी दे दिया गया। इसके बाद तो जनता में गुरुसे की लहर दौड़ गयी और पंजाब के लगभग सभी शहर्ति में लोग सड़कों पर निकल आये। सरकार ने उसे संगठित विद्रोह की संख्या दी। लेकिन वास्तव में गॉर्डीजी भी इस सबके लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने एलान किया कि एक दिन की आम हृदताल का नारा देकर उन्होंने भयंकर भूल की थी। उन्होंने लोगों से आन्दोलन बंद करने और सुधारों पर अमल करने का अनुरोध किया। सितम्बर, 1920 में ललाला लाजपत राय ने कॉर्प्रेस को आगाह करते हुए कहा था कि जनता शुब्ध एवं पेशान है और कुछ कर गुज़रते हैं मुझ में है। उन्होंने कॉर्प्रेस से यह भी कहा कि अगर जनता के इस गुसले को सही रास्ते पर न डाला गया तो वह अपना रास्ता अपनायेगी जो देश के लिए अहिंतकर होगा। "इस तथ्य की ओर से आँखें बन्द करने से कोई लाभ नहीं होगा कि हम क्रान्तिकारी युग से होकर गुज़र रहे हैं" उन्होंने एलान किया और कहा, "प्रकृति से और परम्परा से हम क्रान्तियों को पसंद नहीं करते हैं। "²³ कॉर्प्रेस ने नागरिक अधिवेशन में लाला जी की उस चेतாவनी पर भी विचार किया और गॉर्बीजी को निर्देश दिया गया कि वे स्वराज्य के लिए असहयोग आदोलन आरम्भ करें। आन्दोलन शुक्र करने से पहले महत्वा दी बंगाल गये और कुछ क्रान्तिकारी नेताओं से मिलकर उनसे एक साल کا समय माँगा और कहा कि अगर वे एक साल के अंदर स्वराज्य न प्राप्त करते हैं तो क्रिकारियों को अपने रास्ते पर चलने की पुरी छूट होगी। क्रांतिकारी नेताओं ने गीधीजी की बात मान ली। सत्याग्रह आन्दोलन श्रुत हुआ। देखते-देखते वह सारे देश में फैल गया और गाँवों की छोटी-छोटी डी्�पिड्यों तक में 'स्वराज्य' शब्द गूजने लगा। आदोलन में भाग लेने के लिए गॉँधीजी ने जो भी रोकथाम की शर्त लगाई थीं उन सबको भी तोड़कर किसान पूरे जोशे के साथ आन्दोलन में कूட்ட पड़ा। “सरकार परेशान और घबरायी हुई थीं, उसके हाथ-पैर फूलने लगे थे। यदि सरकार की चौमुखी अवसा की छूत शहारों से चलकर करोड़ों किसानों तक पहुँच जाती है तो अंग्रेजी हुकूमत के पास बचत के लिए कोई चारा नहीं रह जायेगा; तीस करोड़ जनता के विद्रोह की खौलती हुई हाँडी से उनकी सारी तोपे और हवाई जहाज भी उन्हें बचा नहीं सकेंगे। ”²४ गॉधीजी भी खुश नहीं थे और उतने ही घबराये हुए थे। वे आन्दोलन वापस लेने के लिए किसी अवसर की प्रतिशा में थे और फरवरी, 1922 में चौरी-चौरा की घटना से उन्हें यह अवसर मिल गया। बजाय इसके कि वे उस घटना का स्वागत करते और जनता से उसी प्रकार की हजारों और घटनाओं की माँग़ करते, उन्होंने किसी से सलाह लिये बग्रौ चुपचाप आन्दोलन वापस ले लिया और राजनीति से अलग हो गये। इस पृष्ठभूमि में क्रिकारियों ने, जिन्होंने गॉधीजी के कहने पर हिथायर रख दिये थे, अपने को संगठित करके फिर से हिथायर उठाने का फैसला किया।
हिन्दुستان रिपोर्ट्सन एसोসিएन्
สชที วคาทิสนิยมการยอดเยี่ยม (อัตราส่วนสะดือ) มีความสุขส่งส่ง ซึกะสุปกรรม 1923 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1924 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1925 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1926 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1927 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1928 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1929 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1930 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1931 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1932 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1933 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1934 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1935 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1936 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1937 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1938 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1939 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1940 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1941 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1942 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1943 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1944 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1945 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1946 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1947 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1948 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1949 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1950 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1951 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1952 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1953 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1954 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1955 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1956 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1957 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1958 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1959 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1960 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1961 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1962 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1963 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1964 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1965 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1966 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1967 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1968 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1969 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1970 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1971 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1972 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1973 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1974 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1975 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1976 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1977 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1978 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1979 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1980 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1981 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1982 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1983 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1984 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1985 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1986 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1987 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1988 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1989 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1990 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1991 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1992 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1993 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1994 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1995 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1996 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1997 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1998 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 1999 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2000 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2001 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2002 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2003 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2004 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2005 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2006 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2007 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2008 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2009 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2010 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2011 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2012 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2013 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2014 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2015 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2016 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2017 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2018 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2019 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2020 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2021 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2022 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2023 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2024 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2025 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2026 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2027 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2028 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2029 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2030 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2031 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2032 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2033 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2034 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2035 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2036 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2037 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2038 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2039 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2040 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2041 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2042 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2043 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2044 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2045 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2046 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2047 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2048 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2049 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2050 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2051 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2052 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2053 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2054 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2055 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2056 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2057 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2058 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2059 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2060 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2061 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2062 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2063 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2064 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2065 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2066 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2067 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2068 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2069 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2070 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2071 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2072 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2073 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2074 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2075 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2076 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2077 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2078 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2079 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2080 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2081 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2082 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2083 มีความสุขส่งส่ง ซีกะสุปกรรม 2084 มีความสุขส่งส “राजनीति के क्षेत्र में क्रिकारी पार्टी का तालकालिक उदेश्य संगठित सशस्त्र क्रान्त द्वारा भारत के संयुक्त राज्यों का एक संघीय गणराज्य (फेडरल रिपोर्बिलक ऑफ यूनाइटेड स्ट्रेट्स ऑफ इण्डिया) स्थापित करना है। इस गणराज्य के अनिम्म संविधान का निर्माण एवं घोषणा तब होगी जब सम्पूर्ण भारत के प्रतिनिधि अपने निर्णयों को लागू करने में संक्षम होंगे। लेकिन इस गणराज्य का मूलभूत सिद्धांत सार्वजिनक मताधिकार पर और शोषण पर आधारित ऐसी समस्त व्यवस्थाओं की समाप्त पर आधारित होगा जो मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को सम्भव बनाती हैं। इस गणराज्य में मतदाताओं को, यदि वे चाहें तो, प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार होगा, अन्यथा प्रजातन एक मखौल बनकर रह जायेगा।" घोषणापत्र में कहा गया था कि “यह क्रान्तिकारी पार्टी इन अर्थों में राष्ट्रीय न होकर अन्तरराष्ट्रीय है कि इसका अर्तिम उदेश्य विश्व में मेल एवं सामजस्य स्थापित करना है। यह विभिन्न राष्ट्रीय और राज्यों के बीच प्रतिद्रुष्टता के बजाय सहयोग चाहती है; और इन अर्थों में वह भारत के उज्जवल अतीत के महान क्षिषियों एवं आज के बोलशिविक रूस का अनुसरण करेगी।”²⁵ घोषणापत्र में सामप्रदियक समस्या के बारे में, जनता के आर्थिक एवं सामाजिक हितों के सवाल पर और कार्ग्रेस तथा अन्य राजनीतिक पार्टीयों के बारे में क्रितकारियों के दृष्टिकोण को स्पष्ट किया गया था। इन सभी सवालों पर चौंपनापत्र का दृष्टिकोण निश्चित रूप से अतीत का दामन छोड़कर समाजवाद का और सोवियत को 'विजयी समाजवाद' का पहला देश' कहकर उसका स्वागत करता है। उसमें हमें राष्ट्रीय आजूदी के लिए चलने वाले आनदालों के अनराराद्वी चरित्र की समझ भी देखने को मिलती है। हालाँकि यह समझ अभी बहुत साफ नहीं है। स्वतंत्र भारत की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था कैसी होगी, घोषणापत्र में उस पर भी प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है और इस उदेश्य की पूर्ति के लिए मजदूरी और किसानों को संगठित करने की आवश्यकता को भी स्वीकार किया गया है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि चोषणापत्र का लेखक मांसवादी था या उसने वैज्ञानिक समाजवाद के सारतव्य को आलमसात कर लिया था। उसका झुकाव खासतौर पर ईश्वर और रहस्यवाद की ओर है। घोषणापत्र के अनुसार, “पार्टी का उदेश्य सल्य को प्रस्थापित करना और उसका प्रचार करना है। विश्व न माया है न ध्रम कि उसकी तरफ से आँख बंद कर ली जाये और उसकी उपेक्षा की जाये। वह एक अविभाज्य आत्मा का प्रकट स्वरूप है, आत्मा जो शक्ति, जान और सौंदर्य का सवोच्छ उर्दगम है। ” लेखक मांसवाद के आर्थिक पक्ष को स्वीकार करता है, जो काकोरी से पहले के क्रांतिकारियों के मुक्राबले निश्चय ही एक आगे बढ़ा हुआ कृदम है। लेकिन जहाँ तक मांसवाद के दर्शनिक पक्ष का सवाल है, लेखक भूतिकत्वाद को न मानकर भगवान और धैर्य पर अडिग रहता है। आगे चलकर सांयाल जी स्वयं लिखते हैं : “कम्पुनिस्ट दर्शन में इतिहास के भूतिकत्वाद विश्लेषण का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। और इतिहास की भूतिकत्वादी व्याख्या में वर्ग-संघर्ष की अवधारणा शुरू से आखिर तक लगातार मौजूद है… में आज भी इन सिद्धांतों को स्वीकार नहीं कर पायी हुँ…। "²६ एक और महत्वपूर्ण मुदा जिस पर उनका कमयुनिज्म से मतभेद था, वह था सर्वशांत वर्ष के तुरंत ही अवस्था में आगे पहुंच गए थे। उसके बाद एक दिन आगे की शताब्दी हुई थी। "सिक्फ़ मेंध्यम वर्ग के नौजवान ही नेत्त्व प्रदान करने की शिक्षा करेंगे। अंज्ज़ादर और किसान क्रान्तिकारी सेना के सिराही का काम करेंगे। "²⁷ शचीদ্नाथ सान्याल और उनके समय के अन्य क्रान्तिकारियों की सैक्षातिक मानताओं का सत्योन्ध्र नारायण मजूमदार ने अपनी पुस्तक इन सर्च औफ् ए रिवॉल्यूशनरी आईडियोलोजी एण्ड रिवॉल्यूशनरी प्रोग्राम में संक्षेप में बड़ा अच्छा खुलासा प्रस्तुत किया है। दोनों दस्तावेज़ों (क्रांतिकारी और सिवियान) पर टिपणी करते हुए उन्होंने लिखा है : “ये दोनों दस्तावेज़ उन क्रान्तिकारियों की सोच का प्रतिनिधित्व करते हैं जो उन दोनों सायववाद की तरफ आकर्षित हो रहे थे।”²८ इसके बाद दोनों दस्तावेज़ों की विशिष्टताओं का उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं : “इन दोनों दस्तावेज़ों की विशिष्टताएँ हैं – (क) समाजवाद की विजय-पताका फहराने वाले पहले देश के रूप में बोलशैविक रुस के प्रति और सायववाद के प्रति स्पष्ट शुक्राव; (ख) राष्ट्रीय मुखित के लिए क्रान्तिक काल मे अनतरराष्ट्रीय चरित को समझने की शुरुआत, हालाँकि यह समझ अभी बहुत साफ नहीं थी; (ग) स्वतंत्र भारत की सामाजिक तथा आर्थिक व्यवस्था की रूपरेखा तैयार करने की कोशिश; (घ) मजूदूरी और किसानों को संगठित करने के लिए कृत-संकल्प होना;
- (घ) मजदूरों और किसानों को संगठित करने के लिए कृत-संकल्प होना; (ड) पार्टी में जनवादी-केन्द्रीयता के सिद्धांत का प्रवेश।"²⁹
దోనిం ద్వాటేజ్థి కీ కమజోరియో కొ మజుదార నే ఇస ప్రకార గినియా ఓ: “(క) సామవాద కే ప్రిత శుకావ అవశ్య శా, లేకిన అభి తక సామవాద కే అచయన కా టెస ఛాధార ుసే నిర్మి నిమా థ; (థ) రాద్రియ మికుట-సంచర్భ మీ మజుదూ ఏర కిసానో కి భుమికా కే వాస్తవిక మహ్వ కొ స్పౌడ థ థ స నిర్మి సమధా గా థ; (గ) చోషపాపక కా లేఖక ఏ భిత ధామిక రహస్యవాద కే భావ ఏ స్త థ; (థ) చోషపాపక య శమి ఏ భిత ధామిక రహస్య శా కి ఏ శాస్త్రవాద కా మికుట-సంచర్భ మీ కు ఏ శాస్త్రవాద కా ఏ శాస్త్రవాద కా ఏ శాస్త్రవాద కా ఏ శాస్త్రవాద కా ఏ శా बंगाल में भी उसी दिशा में विकास हो रहा था। वहाँ अनुशीलन और युगानर के कई नेताओं ने सोवियत रूस तथा कम्पुनिज्म में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी थी। लेकिन यह दिलचस्पी साम्यवाद के अध्ययन पर या अक्टूबर क्रित और उसकी विशिष्टता की ठीक समझ पर आधारित नहीं थी। वे सोवियत यूरिनयन और कोमिंगस्टन को “हधियार तथा अन्य प्रकार की सहायता, मसलन बम बनाने की शिक्षा आदि, प्राप्त करने के एक सम्भवित स्दोत के रूप में देखते थे। लेकिन जब उन्हें पता चला कि सोवियत यूनियन और कम्प्युनिस्ट इण्डनैशलन दोनों ही जनता से अलग किसी प्रकार की सहस्रगतिविधियों को प्रोसाहन नहीं देते हैं तो उनकी दिलचस्सी ठुण्डी पड़ गयी।”³¹ उस समय, अर्थात तीसरे दशक के उत्तरार्द में भारतवर्ष में कम्मुनिस्ट विचारधारा जनप्रिय हो रही थी। अक्टूबर क्रान्त और ह्स के खिलाफ साम्राज्यवादी हस्तक्षण की पराजय के अलावा इस बदलाव के कुछ अन्य कारण भी थे। जैसे : (क) पेशावर और कानपुर के बोलशिविक षड्यन्त्र केस; (ख) देश के कई भागों में किसानों के जुझाला संघंघ; (ग) मजदूदों की देश्यापी बड़ी-बड़ी हटताल (घ) मजदूर-किसान पार्टी का गतन; (ड) देश के विभिन्न कम्मुनिस्ट यूपों को मिलाकर एक अंचिल भारतीय पार्टी के गतन का प्रयास। राष्ट्रीय तथा अन्तरराष्ट्रीय पैमाने पर घटित इन घटनाओं से प्रभாவित होकर अनुशीलन के कुछ कार्यकर्ति पार्टी से अलग होकर कम्मुनिस्ट आन्दोलन में चले गये। अनुशीलन में उनका अच्छा सम्मान था और क्रान्तिकारी युवकों में सायवाद को जनप्रिय बनाने में उन लोगों की काफ़ी हद तक महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।
हिन्दुستان समाजवादी प्रजातন্ত्र संघ का गठन
संयुक्त प्राంత (अब उत्तर प्रदेश) में 1925 में क्रांतिकारी पार्टी के प्राय: सभी प्रमुख नेता काकोरी षड्यन्न केस के सिஸ்लिले में पकड़कर जेल में बन्द कर दिये गये थे। इससे हिन्दुستان प्रजात्व संघ के संगठन को बहुत बड़ा धकका लगा। केवल चन्द्रशेखर आजूद और कृदनदलाल गुप्त ही पुलिस के चंगुल से बचकर निकल पाये थे। इनके अतिरिक्त बाहर जो साधी रह गये थे वे सब दूसरी पिक्सेल के सिपाही थे। पार्टी को फिर से संगीत करने का दायित्य इन्हीं दूसरी पिक्सेल के साधियों पर पड़ा। उस समय अर्थात 1925 में कुछ क्रांतिकारी लाहर में सिक्रिय थे और कुछ कानपुर में फिर से काम आरम्भ करने का प्रयास कर रहे थे। सैदातिक दृष्टिकोण से उस समय तक इन दोनों केन्द्रों के साधियों के दीमाग्साफ नहीं थे। हाँ, एक सही सिद्धांत की तलाश अवश्य आरम्भ हो गयी थी। इस दिशा में दोनों केन्द्रों के साधियों को योग्य मार्गदर्शक भी मिल गये थे। इस समय (1925-26) लाहீर के साथी, खासकर भगतर्सिंह और सुखदेव, रूसी अराजकतावादी बाकुनिन से प्रभावित थे। भगतिसिंह को अराजकतावाद से समाजवाद की ओर लाने का श्रय दो व्यक्तियों को है - कामरेड सोहन सिंह जोशे जो अब हमारे बीच में नहीं हैं और लाला छबीलदास। जोश एक मशहूर कम्पुनस्द नेता और किरती नाम की पंजाबी मांसिक पत्रिका के समादक थे। वे भगतसिंह से विभिन्न विषयों पर बातचीत करते और उन्हें किरती में लिखने के लिए प्रतिसाहित करते थे। लाला छबौलदास 'तिलक स्कूल ऑफ़ पोलिटिक्स', जो नेशनल कॉलेज के नाम से भी प्रसिद्ध था, के प्रधानचार्य थे। वे नौजवान क्रांतिकारियों को बतलाते रहते थे कि क्या पड़ें और कैसे पढ़ें। भगवतीचरण वोहरा का समाजवाद की तरफ आरम्भ से ही रूझान था। सोहन सिंह जोश का सारा मार्ग-दर्शन और लाला छबौलदास के किताबों के बारे में सारे सुझाव पुस्तकों के अभाव में ल्यथ ही रह जाते। इस आवश्यकता को कुछ हद तक पूरा किया लाला लाजपत राय की 'द्रकादास लाइब्रेरी' ने। इस पुस्तकालय में राजनीति-सम्बन्धी पुस्तकों का अच्छा संग्रह था जिनमें मांसर्वादी और सोवियत ऋत्र पर ऐसी पुस्तकें भी शामिल थीं जिन्हें सरकार ने जूब नहीं किया था। लाहীর के क्रांतिकारियों ने उस पुस्तकालय से पूरा लाभ उठाया। उस काम में उन्हें पुस्तकालय के अध्यक्ष और क्रांतिकारियों के हमदर्द श्री राजाराम शास्त्री (अब स्वर्गिय) से काफ़ी सहायता मिलती थी। पुस्तकें प्राप्त करने का एक और भी سोर्स था रामकृष्ण एण्ड सन्स नाम की किताबों की एक दूकान। यह दूकान अनारकली बाजार में थी और उसके पास इंलेण्ड से ज्वलशुदा पुस्तकें मंगवान की अच्छी ल्यवस्था थी। पंजाब के क्रांतिकारियों ने, खासकर भगतसिंह और भगवतीचरण वोहरा ने, इन सुविधाओं से पूरा लाभ उठाया। श्री राजाराम शास्त्री ने एक बार इन पंकित्यों के लेखक से कहा था कि भगतसिंह वस्तुत: पुस्तकों को पढ़ता नहीं निगलता था, लेकिन फिर भी उसकी जान की पिंपासा सदा अनुबहरी ही रहती थी। भगतिसिंह पुस्तकों का अध्ययन करता, नोट्स बनाता, अपने साधियों से उन पर विचार-विमर्श करता, अपनी समझ को नये जान की कसोटी पर आत्मालोचनात्मक ढंग से परखने का प्रयास करता और इस प्रक्रिया में अपनी समझ में जो-जो ग्लतियाँ दिखलायी पड़तीं उन्हें सुधारने की कोशिश करता। इन सब बातों ने पंजाब ग्रुप को तेजी के साथ आगे बढ़ने में मदद की। परिणामस्वरूप 1928 के आरम्भ में उन्होंने अराजकतावाद को छोड़कर समाजवाद को ध्येय के रूप में स्वीकार कर लिया। इसका यह मतलब नहीं कि उन्होंने माकर्सवाद को पूरी तरह से समझ लिया था। अतीत के प्रभाव से अभी पूरी तरह छुटकारा नहीं मिल पाया था। कानपुर के साथी भी ठीक उसी दिशा में आगे बढ़ रहे थे, हालाँकि उनकी आगे बढ़ने की गति में वह तेजी नहीं थी जो लाहेंर के साधियों में थी। कानपुर में राधामोहन गोकुलजी, सत्यभक्त और मौलाना हसरत मोहानी अपने को कम्युनिस्ट कहते थे। इनमें से राधामोहन जी का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उनके पास पुस्तकों का अच्छा संग्रह था। अध्ययनशील न्यक्ति होने के साथ ही वे एक सहका लेखक भी थे। 1927 में उन्होंने एक पुस्तक लिखी थी - कम्प्युन्म क्या है? सरल और सीधी-सादि भाषा में इस पुस्तक के माध्यम से उन्होंने हिन्दी के पाठकों के सामने क्युनिस्ट सिद्धांत के प्रमुख मुहों को प्रस्तुत किया था। इन पंक्तियों के लेखक को भी क्युनिस्म का पहला सबक राधमोहन जी से ही मिला था। राधमाहन जी कर्दार नास्तिक थे। ईश्वर, धर्म, अन्धविश्वास आदि पर उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं में काफ़ी कुछ लिखा था। उनका यह रूप देखकर हिन्दी के उपन्यास-सम्राट प्रेमचन्द्र ने उन्हें 'आधुनिक चारोंक' कहकर पुकारा था। सल्यभक्त का क्युनिंजम अध्यात्मवादी रोग का था और मৌलाना हासरत मोहानी के विचार क्युनिंजम और इस्लाम की विचार्य है के बाद जरूरीत्य के बावजूद सोविवत रुस् और सायवाद को हिन्दी भाषा-भाषी जनता के बीच जनप्रिय बनाने में इन तीनों की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता। कानपुर के युवा क्लोनकारियों ने समाजवाद की प्रथम दीक्षा इन्हीं महानुभावों से प्राप्त की थी। शोकत उस्मानी भी विजयकुमार सिंहना के माध्यम से कानपुर गुप् के सम्यर्क में थे, लेकिन हम लोगों को उनसे किसी प्रकार का सैद़ातिक मार्गदर्शन नहीं मिल सका था। श्री गणेशार्कर विधाधीं से भी, जो कानपुर की बहुत बड़ी महाद्र हस्ती थे, क्रांतिकारियों को हर तरह की सहायता मिलती रहती थी। वे राजनीतिक अध्ययन और जनता के बीच काम पर विशेष रूप से बल देते थे। इस सबके परिणामस्वरूप कानपुर के साधियों का झुकाव भी समाजवाद की तरफ हो गया था। लेकिन यह झुकाव बुद्धिसंगत होने के बजाय भावातमक अधिक था। उस समय तक कानपुर गुण चन्दशेखर आजूद और कुन्दनलाल गुण से सम्पर्क स्थापित कर चुका था। ये दोनों साधी काकोरी पड्यन्न केस में फ़रार घोषित किये जा चुके थे। यह थी पृष्ठभूमि, जब 1928 के आरम्भ में भगतसिंह ने विभिन्न दलों को मिलाकर क्रिक्तकारियों का एक अविस्तृत भारतीय संगठन बनाने का विचार अपने साधियों के सामने रखा। उनके प्रसातव इस प्रकार थे : (क) समय आ गया है कि हम समाजवाद को साहस के साथ अपना अभितम लक्ष्य घोषित करें; (ख) पार्वती का नाम तदनुसार बदला जाना चाहिए तक लोग जान सके कि हमारा अभितम लक्ष्य क्या है; (ग) हमने सिर्फ उन्हीं कामों को हाथ में लेना चाहिए जिनका सीधा सम्बन्ध जनता की ज़रुरता और भावनाओं से हो सकता है, और हमें मामूली पुलिस अधिकारियों अथवा भेदियों को मारने में अपनी शिक्षित और समय का अपव्यव नहीं करना चाहिए; (घ) धन के लिए हमें सरकारी खुज्जन पर ही हाथ डालना चाहिए और यथासम्भव निजी घरों पर कार्वाई नहीं करनी चाहिए; और (ड) सामहिक नेतल के सिद्धांत का कड़ड़ से पालन करना चाहिए। भगतसिंह ने इन सब मुद्रों पर लाहोंर और कानपुर के अपने साधियों के साथ विचार-विमर्श किया और चन्द्रशेखर आजाद तथा कुन्दनलाल की सहमति भी लेली। इसके बाद यह तय किया गया कि विभिन्न प्रांत्रों के प्रतिनिधियों की एक बैठक 8 और 9 सितम्बर, 1928 को दिल्ली में आयोजित की जाये। पाँच प्रांत्रों के प्रतिनिधियों को इसके लिए आमनित किया गया, लेकिन इनमें से चार प्राంతों ने ही अपनी स्वीकृति दी। बंगाल को मीটিंग में भाग लेने के लिए हम राजी नहीं कर पाये। इस सम्बन्ध में एस्.एन. मजूमदार ने लिखा है कि "हिन्दुستان रिपोर्ट्सन एस्सोसिएशन के बंगाल के प्रतिनिधियों ने मीटिंग में भाग नहीं लिया क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि वे आतंकवाद तथा हिंसा के खिलाफ थे" यह सही नहीं है। पार्टी की ओर से स्वयं मुझे ही अगस्त 1928 के अंतम सप्ताह में कलकता भेजा गया था तातक बंगाल के साधियों के साथ प्रसातों पर बातचीत करके उन्हें दिल्ली मीटिंग में आने के लिए आमिनित किया जा सके। सम्पर्क मिला था वाराणसी के एक तारापद भट्टार्चाय से। कलकते में मेरा परिचय जिन सज्जन से कराया गया उनके बारे में कहा गया कि वे अभी-अभी जेल से छूटकर आये हैं। देखने से वे बुर्जुर्ग लगते थे, उनका शरीर मोटा और খुलथुला था और उनका स्वाद बड़ा ही अर्जिचकर था। उनकी बातचीत और हाव-भाव से मुझे यह समझने में देरी नहीं लगी कि मैं जिस व्यक्ति से मिल रहा हूँ, वह तानाशाही प्रवृत्त वाला एक दम्मी एवं बड़ा अहंकारी व्यक्ति है। चार-पाँच नौजवान लड़के जो बराबर वहाँ मौजूद रहे, उन्हें सुशील दा कहकर सम्बोधित करते थे। मैने जैसे ही उनके कमरे में प्रवेश किया वैसे ही उन्होंने यूपी. युप को काकोरी काण्ड के लिए डाटना-फटकारना शुरू कर दिया, "तुम लोगों ने यह काम हम लोगों से पूछे ब्ग्रेर क्या किया? और अब सारा संगठन चौपट कर देने के बाद हमसे सहाया माँगने आने से क्या फायदा?" मैने उनसे कहा कि मैने आपसे कोई सहाया माँगने नहीं आया हूँ बल्कि कुछ मुझे पर बातचीत करने और आपको दिल्ली मीटिंग के लिए आमिनित करने आया हूँ इसके बाद मैने एक-एक करके सभी प्रसातों के बारे में उन्हें बतलाया और उनसे दिल्ली मीटिंग में भाग लेने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि वे अपनी शर्तों पर ही मीटिंग में भाग ले सकेंगे और मुझसे यह आस्वासन माँगा कि उनकी शर्तें मान ली जायेगी। उनकी शर्तें इस प्रकार थीं : (क) कि हम लोग समाजवाद या क्युनिज्म से कोई सरोकार नहीं रखेंगे; (ख) कि पार्टी का नाम नहीं बदला जायेगा; (ग) कि हम सरकार से सिंह भिड़ा देने वाले काकोरी जैसे काम भविष्य में हमसे पूछे बंगर नहीं किये जायेंगे; (घ) कि केन्द्रीय कमेटी जैसी कोई चीज नहीं होगी और हम लोगों को केवल उन्होंने के माध्यम से बंगाल के मातहत रहकर काम करना होगा; (ड) कि हम लोगों को अपनी गतिविधियाँ सिर्फ संगठन बनाने, हथियार और पैसा जमा करने तक ही सीमित रखनी होगी; (च) कि पैसे के लिए सिर्फ अराजनीतिक कामों की ही इज्ञात होगी। मैंने उन्हें इस बात पर राजा करने की कोशिश की कि वे बगेर किसी प्रकार की शर्त लगाये खुले दिल से मीटिंग में आयं और सभी बातों पर बहस में हिस्सा लें। उन्होंने मेरी बात मानने से साफ इंकार कर दिया। चूँकि उनकी सभी शर्त हमारे प्रसादों से बिलकुल भिन्न थीं इसलिए मैन विनमत्रतापूर्वक उनकी शर्त मानने से इंकार कर दिया। इन कारणों से दिल्ली मीटिंग बंगाल के साधियों की अनुपस्थिति में ही करनी पड़ी।

दिल्ली मीटिंग और उसके बाद

आठ सितम्बर, 1928 को मौटिंग में भाग लेने के लिए चार प्राकों का प्रतिनिधित्व करने वाले कुल मिलाकर दस साधी कोटला फिरोज्जांश में जमा हुए थे। इनमें दो बिहार से, दो पंजाब से, एक राजस्थान से और पाँच संयुक्त प्रात (अब उत्तर प्रदेश) से थे। यूणी. के पाँच साधियों में से भी दो ने मीটিंग में बैठने से इंकार कर दिया क्योंकि बाकी साधियों ने उनकी कुछ शर्तें नहीं मारीं। इस प्रकार केवल आठ साधियों ने ही बातचीत में भाग लिया। आज्जाद को सुरक्षा की दृष्टि से दिल्ली नहीं लाया गया था। लेकिन उनसे सभी मुझे पर पूर्वस्वीकृति प्राप्त कर ली गयी थी। मौटिंग में दो दिन की बहस के बाद भगतसिंह द्वारा रखे गये सभी प्रशावों को दो के खिलाफ़्छ छः के बहुमत से स्वीकार कर लिया गया। फण्नीदनाथ चौष और मनमोहन बनजी (दोनों बाहर से) ने समाजवाद को पार्टी के अतिम लक्ष्य के रूप में अपनाये जाने और पार्टी का नाम बदलने के प्रशाव का विरोध किया। आगे चलकर जब दिसम्बर 1928 में भगतसिंह कलकता गये और जैलोक्य चक्रवर्ती तथा प्रतुल गாगुली, जो उस समय तक जेंल से छूटकर बाहर आ चुके थे, से मिले तो उन्होंने बताया कि दिल्ली मौटिंग के लिए बंगाल को आमर्जित करने जो साधी पहले आये थे, उनको दुभियवश एक गूलत आदमी से मिला दिया गया था। भगतसिंह ने दोनों नेताओं को दिल्ली के फैसला से अवगत कराया और सभी मुझे पर उनकी सहमति भी प्राप्त कर ली। वे हममें से कुछ साधियों को बम बनाने का प्रशिक्षण देने के लिए यतीन्दनाथ दास को आगरा भेजने के लिए भी सहमत हो गये।
1928 के आठ-आठ हम लोगों ने समाजवाद को सिद्धान्त के रूप में स्वीकार कर लिया था, लेकिन अमल में हम पर अतीत का साया अब भी हावी था। फिर भी यह कहना गुलत होगा कि साण्डर्स वध और केन्द्रीय असेम्बली में बम फैंकेन के पीछे भगतिंश की किसी प्रकार की मानिसक कुण्ठा या निराशा काम कर रही थी, जैसा कि एस.एन. मजूमदार ने साबित करने की कोशिश की है। वे लिखते हैं : “फ्रेलोक्य चकवर्ती ने उन्हें (भगतिसंह को) पाँच हजार की एक युवा वालिंगट्यर वाहिनी संगठित करने की सलाह दी, जैसीकि कोग्रिस के कलकता अधिवेशन के समय (दिसम्बर 1928) संगठित की गयी थी। चक्रवर्ती ने आगे लिखा है कि भगतसिंह ने उनकी सलाह पर अमल करने की कोशिश की लेकिन असफल रहा। इसने उसके दीमाग् मं कुण्ठा और निराशा को जन्म दिया और कुछ सनसनीख्छ ज काम की आनिवार्य आवश्यकता के बारे में उसके विश्वास को और पक्का कर दिया। शीघ्र ही उसके बाद असेम्बली में बम फंकेने की घटना हुई। "³² यह सारी कहानी तथ्यों से मेल नहीं खाती है। पहली बात तो यह कि भगतिशने के कभी कोई बड़ा राजनीतिक कृदम पार्टी की केन्द्रीय कमेटी को विश्वास में लिये बगैर नहीं उठाया। पाँच हजार नौजवानों की एक वालिंगट्यर सेना गितत करने का प्रश्न कभी भी केन्द्रीय सिमिति के सामने बहस के लिए नहीं आया। दूसरी बात यह कि इस प्रकार की किसी वालिंगट्यर सेना का विचार हवा में पुल बॉँधने जैसा विचार था। चार-पाँच दिनों के लिए थैलियों के सहारे खुलेतोर पर पाँच हजार की वालिंगट्यर सेना (कोग्रेस द्वारा - स.) खड़ी कर लेना एक बात थी, लेकिन गुप्त क्रितकारी काम के लिए राजनीतिक तौर पर सजग, प्रश्नक्षित और अनुशासित नौजवानों की इतनी बड़ी सेना कुछ महीनों में खड़ी कर लेना सम्भव भी नहीं था। यहाँ यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि भगतिशक कलकते से जनवरी 1929 के पहले सप्ताह में वापस आये। फ़रवरी में जब यतीब्दनाथ दास आगरा आये तो हममें से हर कोई किसी नकिसी रूप में बम फैक्टरी स्थापित करने के काम में व्यस्त हो गया था। फिर मेरठ की गिरफ्तारियों से पहले फरवरी के अंत में आगरा में ही असेम्बली में बम फंकेन का फैसला लिया गया। ऐसी स्थिति में भगतिशक का वैलोक्य बाबू की सलाह पर अमल करने का प्रयास करना, विफल होना, निराशा और पसती का शिकार होना आदि का प्रश्न नहीं उठता था। इस प्रकार की असफलता, निराशा, कुण्ठा आदि की मनगह्नता बातों से असेम्बली में बम फंकेन के काम का राजनीतिक महत्व ही समाप्त हो जाता है और वह एक ल्यक्ति की कुण्ठा और निराशा का परिणाम-मात्र रह जाता है। ऐसी ही हानिकारक और असेम्बली में बम फैकेंने के महत्व को कम करने वाली कहानी ममथनाथ गुप्त ने दी है। सुखदेव राज (शहीद सुखदेव नहीं - स.), जो 1928 और '29 के पूर्वर्दरी में कहीं भी तस्वीरें में नहीं था, द्वारा प्रसादित एक सौ फ़्रीसरी मनगदत कहानी को आधार बनाकर गुप्त जी ने कहा है कि पार्वती असेम्बली में बम फैकेंने के लिए सुखदेव तथा बटुकेश्वर दत को भेजने के पक्ष में थी। लेकिन भगतसिंह के प्रति व्यक्तगत इर्धारों के कारण उसने भगतसिंह को बी.के. दत के साथ जाने के लिए मजबूर कर दिया। चन्द्रशेखर आजूद और दूसरे लोग निकल आने के पक्ष में थे। लेकिन भगतसिंह इसके लिए राजी नहीं हुए। उनका तक तक कि जनता को जगाने के लिए उच्चतम बिलदान की आवश्यकता है $ ^{33} $ यहाँ पर यह कहना ही गलत है कि अসেम्बली में बम फंकेन के लिए सुखदेव को चुना गया था। आगे में केन्द्रीय कमेटी की पहले दिन की मौर्तिग में जो दो नाम तय हुए थे, वे थे बटुकेखर दत और विजयकुमार सिंह। इस काम के लिए किसी भी स्तर पर सुखदेव का नाम कमेटी में विचारार्थ नहीं आया। हमारे सामने विचार-विमर्श का मुख्य विषय राजनीति था न कि च्यक्तिगत इच्छा या वैरभाव, जो सौभाग्यवश उस समय हमारे बीच में नहीं था। इसमें सन्देह नहीं कि अসেम्बली में बम फंकेन के लिए विजयकुमार सिंह के स्थान पर भगतसिंह को भेजने के लिए सुुखदेव पूरी तरह उत्तरदायी था। उसने यह इसलिए किया क्योंकि वह इர்मानदारी के साथ विश्वास करता था कि भगतसिंह के अलावा और किसी के जाने से काम का राजनीतिक उद्देश्य पूरा नहीं होगा। जहाँ तक उच्चतम बिलदान का सवाल है, क्रान्तिकारी आन्दोलन में बिलदान की कमी नहीं रही (और हर बिलदान उच्चतम होता है)। ऐसा नहीं था कि भगतसिंह एक निराश एवं विफल मनोरथ नौजवान था, जिसने असेम्बली में बम फंककर आत्महत्या करने का एक आसान रास्ता निकाल लिया था।

असెम्बली में बम फैकने का फैसला कैसे और कब लिया गया?

гадзіўя микта-сяркіс ю ідіதிас м етігее драка ю агіпам ви, трасах 1928-30 ю врв, вде ей міжплурці тіі уі міжплур іі аж аж міжплур міжі тіі не міжплур міжі до врв, трасах 1928-30 ю врв, трасах до драка ю агіпам ви, трасах 1928-30 ю врв, трасах до драка ю агіпам ви, трасах 1928-30 ю врв, трасах до драка ю а - मौजूदा संस्थाओं के प्रति एक प्रश्नवाचक और चुनौती भरी जिशसा। उस मानिसक तूफान का आम रख स्पष्ट था। लेकिन वह अभी एक हलकी ब्यार थी - स्वयं अपने से अनिभाड़ा।"³४ अंग्रेज़ सामाज्यवादियों को इस सबसे चिन्ता हुई और उन्होंने आदूलान को प्रारम्भ में ही कुचल देने का फैसला किया। अधिकारी कितने घबराये हुए थे और सरकार का दमाग्ग किस तरह काम कर रहा था, यह देखने के लिए एक मिसाल ही पयित होगी। गुणचर ब्यूरो के निदेशक सर डेविड पैट्रिक ने 'भारत में कम्मुनिंग' पर अपनी रिपोर्ट में, जिसे उन्होंने 1929 में तैयार किया था, 'बोल्शैलिक अभिशाप' के स्वरूप का नीचे लखे शब्दों में वर्णन किया है : “सन् 1920 में तीसरी इण्डनैशनल ने अपनी दूसरी कोग्रिस में जो थींसिस पास की थी उसमें सर सेसिल केए ने भारत के खिलाफ एक सुनिश्चित पड्यन्न के कीटाणुओं को ठीक ही पहचाना था। उस शीसिस में कहा गया था, 'उपनिवेशों और अर्द-उपनिवेशों के दोश दुर्घा आन्द्रालन वस्तुगत दृष्टिकोण से और बुनियादि तौर पर क्रान्तिकारी संघर्ष है, और इसलिए वह विश्व-क्रान्तिकारी संघर्ष का हिस्सा है। ' इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता कि ग्रेट ब्रिटेन ने बोल्शैलिक हमले का मुख्य प्रहार अपने ऊपर लिया है...क्योंकि वह विश्व-क्रान्तिक, जिसे बोल्शैलिक लोग अपनी अनीतम सफलता के लिए जूसरी शर्त मानते हैं, के खिलाफ मुख्य फिल्मों में से एक है। बोल्शैलिकों का यह विश्वास है कि ब्रिटिश सामाज्य में भारत सबसे कमजोर बिन्दु है। और वे इसे धार्मिक विश्वास के रूप में दिल में संजाये हुए हैं कि जब तक भारत आजूद नहीं हो जाता तब तक इस इंलेण्ड के अभिशाप से मुक्त नहीं हो सकेगा। ³³ जे. क्रोर ने, जो उस समय भारत सरकार के होम मेम्बर थे, कहा था कि एक व्यवस्थित समाज के लिए कम्पुनिकम के सिद्धांत और अमल से अधिक विश्वतक और कोई चीज नहीं हो सकती।³⁶ कम्पुर्नجم, बाँये बाजू की शिकतयों और श्रमिक वर्ग के आन्दोलन को कुचलने के लिए सरकार ने केन्द्रीय असेमबली में दो बिल पेश करने का फैसला किया - पब्लक सेपुटी बिल और ट्रेड डिस्यूट्स बिल। पहला बिल उन लोगों के खिलाफूथा जो ब्रिटिश-भारत या किसी भारतीय राजாவों के निवासी नहीं थे। पहले बिल में गवर्नर जनरल को यह अधिकार दिया गया था कि वह अंग्रेज़ या अन्य विदेशी कम्पुर्नस्ट को भारत से निकाल दें। दूसरे बिल का उदेश्य मजदूरी के ट्रेड यूनियन अधिकारों की कटैटी करना था। असెम्बली में पूरे विरोध पक्ष ने, जनता ने और प्रेस ने दोनों बिलों का जमकर विरोध किया। इस चौमुखी विरोध को नजरअदाज़ करते हुए सरकार ने 6 सितम्बर, 1928 को पबिलक सेफ्टी बिल असेम्बली में पेश किया। २४ सितम्बर को सदन ने उसे नामजूर कर दिया। जनवरी 1929 में कुछ फेर-बदल के साथ सरकार ने उसे फिर अসেम्बली के सामने रखा।³⁷ जिस समय समाचारப்பत्रों में यह खुबर छपी कि सरकार ने बिल को असेमंबली में फिर से पेश करने का फ़ैसला कर लिया है उस समय भगतसिंह आगे में था। समाचार पर उसकी जो प्रतिक्रिया हुई वह बड़ी तीखी थी। उसने कहा कि सरकार के इस मनमानेपन के खिलाफ प्रतिवाद के रूप में कुछ न कुछ ज़रूर करना चाहिए। वह लाहীর गया, सुखदेव के साथ अपने प्रसादों पर बात की, वापस आया, केन्द्रीय कमेटी की बैठक बुलायी और उसके सामने अपने प्रसाद रहे। संक्षेप में उसके प्रसाव इस प्रकार थे : (1) पार्टी को असेमंबली में बम फैककर सरकार के इस सज्जन एवं हटी रखेय का विरोध करना चिहप; (2) इस काम को करने के लिए जो साधी तैनात किये जायँ वै काम के बाद भागने की कोशिश करने के बजाय वहीं आत्मसमर्पण कर दे और केस के दौरान अदालत को पार्टी के उद्देश्यों के प्रकार के लिए मंच के तौर पर इस्तेमाल करें; और (3) इस फैसले को कार्यनिवत करने के लिए एक और साधी के साथ उसे स्वयं जाने की अनुमति दी जायें। भगतसिंह के पहले दो सुझावों का केन्द्रीय कमैटी के सभी सदस्यों ने स्वागत किया। लेकिन उसका तीसरा सुझाव किसी ने भी नहीं माना। यह मीटिंग आगे में हुई थी और पहले दिन सुखदेव उसमें उपस्थित नहीं था। वह दूसरे दिन आया। सुखदेव के आ जाने पर भगतसिंह को बल मिला और काफ़ी बहस के बाद अत में कमेटी ने भगतसिंह का तीसरा प्रशाव भी मान लिया। दूसरा बिल (ट्रेल डिस्प्यूट बिल) असेम्बली में 4 सितम्बर, 1928 को पेश किया गया था। सदन ने उसे सेलेक्ट कमैटी के पास भेज दिया। वहाँ से कुछ फेर-बदल के साथ उसे 2 अप्रैल, 1929 को बहस के लिए असेम्बली के सामने फिर लाया गया। सदन ने 8 अप्रैल को 38 के खिलाफ़ कुछ वोर्टो से उसे पास कर दिया। जैसे ही अध्यक्ष महोदय वोर्टिंग का परिणाम चोषित करने के लिए उठे वैसे ही भगतसिंह और बटुकेश्वर दत ने दर्शक दीर्घी से असेम्बली भवन में बम फंके और नारे लगाने के साथ-साथ परचे भी गिराये, जिनमें बम फंकेन के राजनीतिक उदेश्य को स्पष्ट किया गया था। यह परंचा उसी दिन हिन्दुستان टाइम्स के सद्योकालीन परिशिष्ट में प्रकाशित हो गया था। यह हमें क्रिकितकारी आन्दोलन के एक छोटे दौर में पहुँचा देता है, जिसका जिक्र लोग कभी-कभी आतंकवादी-साम्यवाद या टेरो-कम्पुनिक्ज के नाम से करते हैं।

टैरो-कम्युनिंज्म या आतंकवादी-साम्यवाद

लाहীর तथा कानपुर के क्रान्तिकारियों ने 1926-27 से ही समाजवाद की ओर बढ़ना शुरू कर दिया था। आठ-नौ सितम्बर 1928 की दिल्ली मीटिंग में हालाँकि سماجవاد को سিদ্ধানت के रूप में और سماجవادی سماج की स्थापना को अन्तम उदेश्य के रूप में স্வीकार कर लिया गया था, अमल में हम लोग उसी पुराने व्यक्तिवादी टंग के कामों में ही लगे रहे। हम मजदूरों, किसानों, युवकों और मध्यवर्ग के बुद्धिवीक्षों को संगठित करने की बात तो करते थे लेकिन पंजाब में नौजवान भारत सभी के गठन को छोड़कर और कहीं भी संजीदगि के साथ उस दिशा में कुम्दन उठाने की कोशिश नहीं की गयी। उस मायने में हमारी वैज्ञानिक समाजवाद अर्थात माकर्सवाद की समझ अधकचरी थी। माकर्सवाद अमल को सिद्धान्त से अलग करने की इजाजूत नहीं देता, यह बात हम समझ नहीं पाये थे और यह कि उसमें व्यक्तिगत कामों के लिए कोई स्थान नहीं है। हम हिसात्मक गतिविधियों को, जिसमें जूलियम सरकारी अधिकारियों की हत्या और छुटटुट विद्रोह शामिल थे, मजदूरों, किसानों, युवकों और विद्याधियों के जन-संगठन बनाने के काम में मिलाना चाहते थे। लेकिन अमल में हमारा जोर्ज हिंसात्मक गतिविधियों और सशस्त्र कामों की तैयारी तक ही सीमित रहा। हमारा विश्वास था कि लोगों को नींद से जगाने के लिए और सरकारी दमन का जवाब देने के लिए यह सब आवश्यक है। कार्गेन के कलकता अधिवेशन के अवसर पर दिसम्बर, 1928 में भगतसिंह ने का. सोहन सिंह जोश से कहा था, “हम आपकी पार्टी के कामों से और उसके कार्यक्रम से सौ फ़िसदी सहमत हैं, लेकिन कभी-कभी ऐसे भी क्षण आते हैं जब जनता में विश्वास की भावना जागृत करने के लिए दुश्मन के प्रहार का सशस्त्र कामों द्वारा तत्काल जवाब देना आवश्यक हो जाता है। ”³४ उस समय हमारे दमाग् इसी तरह काम कर रहे थे। हमारी समझ में निहित अन्तरविरोध का अपना तक धा। मजदूरों-किसानों को संगठित करने का हमारा फैसला केवल एक पवित्र इरादा बनकर ही रह गया। हमारी शक्ति का अधिकारी हिस्सा प्रतिशोधतमक कामों को संगठित करने में ही ज्यादा हुआ। हमारी गूलत समझ को ठीक करने का एक प्रयास तीसरे इणत्रनेशनल ने किया था। यह प्रयास विदेश में गोित भारत की कम्मुनिस्ट पार्टी द्वारा “राष्ट्रीवियों से अपील” के ज़रिये किया गया था। यह अपील 15 दिसम्बर, 1924 के बैनगांडे के परिशोध में प्रकाशित हुई थी। अपील में क्रिकितकारियों के बारे में कहा गया था :
“กูบท สมาชิก ฌิทิยา यह तो और भी नाममांकन है कि थोड़े से सरकारी अफसरों को मारकर या ब्रिटिश पालियामेणट से बहुत से सुधार पास करवाकर देश की आज़ादी हासिल की जा सके। ये दोनों उपाय समान रूप से प्राणहीन हैं, क्योंकि इनमें से कोई भी बुराई की जड़ पर चोट नहीं करता। दोनों ही राजनीतिक भूल हैं। लेकिन आतंकवादियों को 'क्रानिकारी अपराधी' कहना निपट मूर्खता है, क्योंकि 'सर्वधानिकतावादी' निश्चित रूप से गैर-क्रानिकारी हैं और निर्णयक घड़ी आते ही वे प्रतिक्रियावाली हो जायेंगे। "³९ उसी लेख में दूसरी जगह पर क्रान्तिक की सही-सही परिभाषा दे दी गयी थी :
“క్రాంతి కూ ఏ? భారత కే రాద్రీయ హిలకోని ఏ ఐక కుబ్బి స్థానా భారతా భిని ఖి ఖి ఐఐ ఐ ఐ ఐ สนุ 1925 มี ยาก หมุนิสต เทวรัทธิสุขาที 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 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1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซึก 1 ซเลิล 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 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1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 1 दुर्भियवंश इनमें से कोई भी दस्तावेज़ उस समय हमें नहीं मिला और हमं अपने अनुभवों के सहारे ही आगे बढ़ना पड़ा। व्यक्तिगत कामों का दायरा बहुत सीमित है यह समझने में हमें तीन साल लग गये। हम क्दम-ब-कृदम समाजवाद की तरफ बढ़ रहे थे। गिरफ्तारी के बाद जेल में काफ़ी समय मिला, पढ़ने के लिए काफ़ी सामग्री मिली, आपस में बहस करने और अपने अतीत पर संजीदगी से सोचने का काफ़ी मौका मिला और तब कहीं जाकर हम सही नतीجه पर पहुँच पाये। इसका यह मतलब नहीं कि जिस दौर की समीक्षा की जा रही है उसमें सकारात्मक कुछ था ही नहीं। उसकी कमजोरियों के साथ ही उसके कुछ सकारात्मक और मजबूत पहलू भी थे। में अपनी और अपने साधियों की समझ की खास कियेमें पर रोशनी डाल चुका हूँ। संक्षेप में फिर से दोहरा दूँ, पहली बात तो यह कि हमारा कमजुज्म को स्लीकार करना माकस्वाद के सही अध्ययन पर आधारित नहीं था। दूसरी कमजोरी थी मजदूरों और किसानों को संगठित करने और जवाबी आतंकवाद के बीच तालमेल बित्लाने की अव्यावहारिकता को न समझ पाना। इन सारी कমিयों और सीमाओं के बावजूद इस थे डोर्ज समय चलने वाले चरिते दौर के खाते में कुछ बहुत महल्पपूर्ण उपलब्धियों भी हैं। लाहீर की 'नौजवान भारत सभा का चोषणापत्र' (1928), असेम्बली बम केस के दौरान भगतसिंह और बटुकेश्वर दत् द्वारा अदालत के सामने दिया गया बयान (1929), कॉर्पेस के लाहीर अधिवेशन के समय बौँधा गया 'हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातःन संघ का चोषणापत्र' (दिसम्बर 1929) और 'बम का दर्शन' (जनवरी 1930) उस युग के सर्वप्रिंट प्रतिनिधि दस्तावेज़ हैं। इन दस्तावेज़ों के आधार पर हम कह सकते हैं कि 'हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातःन संघ' (हिसप्त्र) का पहला आगे बढ़ा हुआ कृदम था माकसवाद को सिद्धांत के रूप में और समाजवाद को अनितम उद्देश्य के रूप में स्वीकार करना। बंगाल में भी आन्दोलन का रुख यही था, हालाँकि गति अपेक्षाकृत धीमी थी। जिस समय हिस्सप्रस ने समाजवाद को डंके की चोट पर अपना अनितम उद्देश्य घोषित कर दिया था, उस समय बंगाल के लगभग सभी क्रान्तिकारी दल और प्रमुख पार्टीयां इस सवाल पर अनिश्चितता की स्थिति में थे। समाजवाद को ध्ये के रूप में स्वीकार करने के अलावा इस दौर के क्रान्तिकारी मनुष्य द्वारा मनुष्य के और एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र के शोषण से मुक्त वर्हिन समाज के पक्ष में थे। उन्होंने एलान किया कि उनकी लड़ाई सिर्फ ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफू ही नहीं है, बल्कि विश्व सामाज्यवादी व्यवस्था के खिलाफू है। उनके दिल्ों में सोवियत यूनियन के प्रति प्रगाॅड आदर और अपनापन था। उनका विश्वास था कि क्रान्तिक के बाद जो सरकार बनेगी उसका रूप एक प्रकार की सर्वहारा वर्ग की तानाशाही का होगा। उन्होंने ईश्वर, धर्म और रहस्यवाद से पूरी तरह खुटकारा पा लिया था। वे धर्मनिरपेक्षता में विश्वास करते थे और उनका दृष्टिकोण घोर साम्राजिकतावाद विरोधी था। असेम्बली बमकाण्ड के बाद हिन्दुستان समाजवादी प्रजातत्र संघ के अधिकांश साथी गिरफ्तार कर लिये गये। उन्होंने अपने मुकदमे की सुनवाई के दौरान अपने दृष्टिकोण को प्रचारित करने, समाजवाद के विचारों को लोकप्रिय बनाने और क्रान्तिकारी पार्टी के उद्देश्यों तथा प्रयोजनों को जनता के सामने रखने के लिए अदालत का मंच के रूप में जमकर इस्तेमाल किया। उनकी यह रणनीति कृपमायब हुई। इसके बारे में एस.एन. मजूमदार ने लिखा है : "हिन्दुस्तान सोशिलस्ट रिपिब्लकन एसोसिएशन की तमाम ग्लतियों और कमजोरियों के बावजूद समूचे राष्ट्रीय आन्दोलन में और तरह क्रानितकारियों को साम्यबाद की ओर आकारित करने में इस पार्टी के योगदान की उपेक्षा नहीं की जा सकती है।"42 जी.एस. देओंल के अनुसार, “कानितकारी आन्दोलन का कार्यक्षित चাই जितना सीमित रहा हो उसने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की गति को एक दूसरी धारा के माध्यम से और तेज किया। बेशक यह कहा जा सकता है कि उनके (भगतसिंह और उनके साधियों के - शि.व.) कार्यकलापों ने भारतीय राष्ट्रीय कार्ग्रेस के लिए दिसम्बर 1929 के लाहोए अधिवेश में पूर्ण स्वतंत्रता की माँग करने और पूर्ण स्वराज्य का प्रसाव पास करने का पथ प्रशस्त किया। "43 देओंल के अनुसार क्रांतिकारियों के कार्यकलापों और संघों ने देश में अत्यन्त विस्फोटक स्थिति पैदा कर दी थी, जिसके कारण कार्णेस 1930 का असहयोग आन्दोलन शुरू करने के लिए मजबूर हो गयी थी। “यह आन्दोलन भगतसिंह और उनके साधियों के उग आन्दोलन के विकलप के रूप में शुक्र किया गया था। इस मत की पुष्ट महत्वा गाँधी द्वारा 2 मार्च, 1930 को वायसराय को लिखे गये एक पत्र के इस अंश से होती है : 'हिसावादी पार्टी अपनी जगह बनाती जा रही है और उसने अपने अस्तित्व का अहसास करना शुरू कर दिया है। ' उन्होंने आगे स्पष्ट किया था कि वे जिस तरह का अहिंसक आन्दोलन शुरू करना चाहते हैं, उससे न सिर्फ ब्रिटिश हुकूमत की हिंसक शक्ति का बल्कि उभरते हुए हिंसावादी दल की संगठित हिंसक शक्तियों का भी प्रतिरोध किया जा सकेगा। *44

वैज्ञानिक समाजवाद की ओर

'हिन्दुستان समाजवादी प्रजातन्य संघ' के अधिकांश प्रमुख नेता 1929 के मध्य तक गिरफ्तार करके जेलां में बंद कर दिये गये थे, जहाँ उन्हें पढ़ने और विचार-विमर्श करने का भरपूर मौका मिला। इससे उनके अंदर जो नयी समझ पैदा हुई थी, उसके आधार पर उन्होंने अपने पूरे अंतीत को, खासकर वैविकतक कार्यकलापों और शौर्य प्रदर्शन के आदर्श को नये सिर से जाँचा-परखा और अपनी अब तक की कार्यप्रणाली को छोड़कर समाजवादी क्रिति का रास्ता अपनाने का निशचय किया। गहन अध्ययन और बोस्टल जेला में दूसरे साधियों से लम्बे विचार-विमर्श के बाद भगतिसिंह इस निर्णय पर पहुंचे कि यहाँ-वहाँ कुछ भेदियां और सरकारी अफ्सरों की वैयक्तिक हत्याओं से लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो सकती है। भगतसिंह ने 19 अक्टूबर, 1929 को पंजाब स्पूटेग्द्स की कार्ग्रेस के नाम एक सन्देश भेजा था जिसमें उन्होंने कहा था – “आज हम नौजवानों को बम और पिस्टोल अपनाने के लिए नहीं कह सकते।...इन्हें औद्योगिक शेत्रों की गन्दी बिस्तयों में और गाँवों के टूटे-फुटे झोंपड़ों में रहने वाले करोड़ों लोगों को जगाना है।”
2 फरवरी, 1931 को उन्होंने 'युवा राजनीतिक कार्यकर्तिओं के नाम' एक अपनेलितखी थी जिसमें उन्होंने जनसाधारण के बीच काम करने के महत्व को बारम्बार रेखांकित किया था। उन्होंने कहा था, “गाँवों और कार्यज्ञानों में किसान और मजदूर ही असली क्रान्तिकारी सैनिक हैं।” इसी अपने में भगत सिंह ने बलपूर्वक इस बात से इंकार किया था कि वे आतंकवादी है। उनका कहना था, “मैन एक आतंकवादी की तरह काम किया है। लेकिन मैन आतंकवादी नहीं हूँ। में तो ऐसा क्रान्तिकारी हुए जिसके पास एक लम्बा कार्यक्रम और उसके बोर में सुनिश्चित विचार होते हैं। मैन पूरी ताकत के साथ बताना चाहता हूँ कि मैन आतंकवादी नहीं हूँ और कभी था भी नहीं, कदाचित उन कुछ दिनों को छोड़कर जब मैन अपने क्रान्तिकारी जीवन की शुरुआत कर रहा था। मुझे विश्वास है कि हम ऐसे तरीकों से कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकते हैं। ” उन्होंने नीजवान राजनीतिक कार्यकर्ताओं को सलाह दी कि वे माक्स और लेनिन का अध्ययन करें, उनकी शिक्षा को अपना मार्गदर्शक बनायें, जनता के बीच जाये, मजूदों, किसानों और शिशित मध्यवर्गिय नौजवानों के बीच काम करे, उन्हें राजनीतिक दृष्टि से शिशित करें, उनमें वर्ग-चेतना उत्पन्न करे, उन्हें यूनिया में संगठित करें, आदि। उन्होंने नवयुवकों से यह भी कहा कि यह सारा काम तब तक सम्भव नहीं है जब तक जनता की एक अपनी पार्टी न हो। वे किस तरह की पार्टी चाहते थे इसका खुलासा करते हुए उन्होंने लिखा था, “हमें पेशेवर क्रान्तिकारियों की जूसरत है – यह शब्द लेनिन को बहुत प्रिय था – पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की, जिनकी क्रान्तिके से सिवा और कोई आकांशा न हो, और न जीवन का कोई दूसरा लक्ष्य हो। ऐसे कार्यकर्ता जितनी बड़ी संख्या में एक पार्टी के रूप में संगठित होंगे, उननी ही तुम्हारी सफलता की सम्भावनाएँ बढ़ जायेंगी। ”
उन्होंने आगे कहा :
“त्वविस्तृत दंग से आगे बढ़ने के लिए आपको जिसकी सबसे अधिक आवश्यकता है, वह है एक पार्टी जिसके पास जिस टाइप के कार्यकर्ताओं का ऊपर ज़िक किया जा चुका है वैसे कार्यकर्ता हैं - ऐसे कार्यकर्ता जिनके दमाग साफ हैं और समस्याओं की तीखी पकड़ हो और पहल करने और तुरंत फैसला लेने की शमता हो। इस पार्टी का अनुशासन बहुत कठोर होगा और यह जूसरी नहीं है कि वह भूमिगत पार्टी हो, बल्कि भूमिगत नहीं होती चाहिए... पार्टी को अपने काम की शुरुआत अवाम के बीच प्रचार से करनी चाहिए। किसानों और मजदूरों को संगठित करने और उनकी सिक्रय सहानुभूत प्राप्त करने के लिए यह बहुत ज़रूरी है। इस पार्टी को कम्पुनिस्ट पार्टी का नाम दिया जा सकता है।" यहाँ भगतिसंह खुल्लम-खुल्ला माक्सवाद, साम्यवाद और एक साम्यवादी पार्टी की वकालत करते दिखायी देते हैं।

क्रानित की परिभाषा

ཆའི་རྒྱལ་ས་ཆེན་པོའི་ཆོས་རྒྱལ་མཚན།་ཆོས་ར سمازجாவد کی دشیا में भगতিंशح کی వేచారిక प्रगति کی స్పుతار బहुత తేజృ 1 ఉండిన 1924 से 1928 కే బీచ విభిన్న విషయో కా విస్తుత అభ్యయన కియా శా1 లాలా లాజపత రయ కి ధ్రాకాదాశ లాథిబ్రే కె పుస్తకాలయాభ్యశ రాజారామ శాస్త్రి కె అనుసార ఉం దీన్లో భగవత్‌శివ వస్తుట: “కిటాబో కొ నిగలా కరతా శా1” 3 ునకే ప్రియ విషయ 3 శె స్తీ క్రాస్తీ, సోవితయ 3 శం, 3 ఖావర్లేషండ, 3 ఖావర్లేషండ, 3

इंखर और धर्म के बारे में

इश्वर, धर्म तथा रहस्यवाद पर भगतिसह के विचारों के बारे में कुछ शब्द कहे बगेर यह भूमिका अधूरी रह जायेगी। यह इसलिए भी ज्यूरी है कि आज हर तरह के प्रतिक्रियावादी, लुदिवादी और सामप्रदियकतावादी लोग भगतिसह तथा चन्द्रिखर आजाद के नाम और यश को अपनी निज की राजनीति और विचारधारा के पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं। अपनेआप को नास्तिक बताते हुए "भगतसिंह ने शुरू के क्रांतिकारियों के तरीकों और दृष्टिकोण के लिए पूरा सम्मान प्रदर्शित किया है और उनकी धार्मिकता के सोतों की पड़ताल की है। वे संकेत करते हैं कि अपने स्वयं के राजनीतिक कार्यों की वैज्ञानिक समझ के अभाव में उन क्रांतिकारियों को अपनी आध्यात्मिकता की रक्षा करने, वैखिकतक प्रलोभनों के विरुद्ध संघों करने, अवसाद से उबरे, भूतिक सुखों और अपने परिवारों तथा जीवन तक को ल्यागने की सामर्थ्य जुटाने के लिए विवेकहीन विश्वासों एवं रहस्यवादिता की आवश्यकता थी। एक व्यक्ति जब निरन्तर अपने जीवन को जोर्जिसमें डालने और दूसरे सारे बिलदान करने के लिए तत्पर होता है तो उसे प्रेरणा के गहरे सोत की आवश्यकता होती है। शुरू के क्रांतिकारी, आतंकवादियों की यह अनिवार्य आवश्यकता रहस्यवाद और धर्म से पूरी होती थी। लेकिन उन लोगों को ऐसे सोतों से प्रेरणा लेने की ज़रूरत नहीं रह गयी थी जो अपने कामों की प्रकृति को समझते थे, जो क्रांतिकारी विचारधारा की दिशा में आगे बढ़ चुके थे, जो कृतिम आध्यात्मिकता की बैसाबी लगाये बिना अन्याय के विरुद्ध संघों कर सकते थे, जो स्वर्ग और मोक्ष के प्रतिभन और आवश्यकता के बिना ही विश्वास के साथ और निर्भिक भाव से फाँसी के तत्त्व पर चढ़ सकते थे, जो दिलतों की मुखित और स्वतंत्रता के पक्ष में इसलिए लड़े क्योंकि लड़ने के अलावा और कोई रास्ता ही न था। "46 அசெம்வல்லி வமகளாஏட்க கெ கெசவ கெளி அபனில கெ கெஏஏன லாஹே ஹைகெரெட மஂ ஞயன ஂதெ ஹுப ஞமஞதிஷெ ஞெவஞக ஞெஞுஞெஞு ஞெஞுஞெஞு ஞெஞுஞெஞு ஞெஞுஞெஞு ஞெஞுஞெ भगतसिंह स्वीकार करते थे कि "ईश्वर में कमजोर आदमी को ज़बरदस्त आश्वासन और सहारा मिलता है और विश्वास उसकी कितनाइयों को आसान ही नहीं बल्कि सुखकर भी बना देता है।" वे यह भी जानते थे कि "आँधी और तूफान में अपने पाँबों पर खड़े रहना कोई बच्चों का खेल नहीं है।" लेकिन वे सहारे के लिए किसी भी बनावती अंग के विचार को दृढ़तापूर्वक अस्वीकार करते थे। वे कहते थे, "अपनी नियति का सामना करने के लिए मुझे किसी नशे की जूफ़रत नहीं है।" उन्होंने एलान किया था कि "जो आदमी अपने पाँवों पर खड़े होने की कोशिश करता है और यथार्थवादी हो जाता है, उसे धार्मिक विश्वास को एक तरफ रखकर, जिन-जिन मुसीबेतों और दुखों में परिस्थितियों ने उसे डाल दिया है, उनका एक मई की तरह बहादुरी के साथ सामना करना होगा।" इश्वर, धार्मिक विश्वास और धर्म को यह तिलாजिल भगतिशह के लिए न तो आकस्मिक थी और न ही उनके अभिमान या अहं का परिणाम थी। उन्होंने बहुत पहले 1926 में ईश्वर की सता को अस्वीकार कर दिया था। उन्हीं के शब्दों में, “1926 के अंत तक मुझे इस बात पर यकीन हो गया था कि सृष्टि का निर्माण, व्यवस्थापन और नियनन्ना करने वाली किसी संवर्शिकतमान परम सता के अस्तत्व का सिद्धान्त एकदम निराधार है।”

भावाना कभी नहीं मरती

वह जुलाई, 1930 का अनित रविवार था। भगतसिंह लाहरे सेटूर्ल जेल से हमें मिलने के लिए बोर्टेल जेल आये थे। वे इस तर्क पर सरकार से यह सुविधा हासिल करने में क्लामयाब हो गये थे कि उन्हें दूसरे अभियुक्ति के साथ बचाव के तरीकों पर बातचीत करनी है। तो उस दिन हम किसी राजनीतिक विषय पर बहस कर रहे थे कि बातों का रख्य फैसले की तरफ मुझ गया, जिसका हम सबको बेसबी से इतजार था। मजूका-मजूका में हम एक-दूसरे के खिलाफ फैसले सुनाने लगे, सिर्फ राजगुरु और भगतसिंह को इन फैसलों से बरी रखा गया। हम जानते थे कि उन्हें फॉसी पर लटकाया जायेगा। "और राजगुरु और मेरा फैसला? क्या आप लोग हमं बरी कर रहे हैं?"
मुस्कुराते हुए भगतसिंह ने पूछा। किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। "असलियत को स्वीकार करते डर लगता है?" धीमे स्तर में उन्होंने पूछा। चुपी छाई रही। हमारी चुपी पर उन्होंने ठहका लगाया और बोले, "हमें गरदन से फाँसी के फनेंदे से तब तक लटकाया जाये जब तक कि हम मर न जायें। यह है असलियत। मैं इसे जानता हूँ। तुम भी जानते हो। फिर इसकी तरफ से आँखें क्यों बन्द करते हो?"
अब तक भगतसिंह अपने रंग में आ चुके थे। वे बहुत धीमे स्वर में बोल रहे थे। यही उनका तरीका था। सुनने वालों को लगता था कि वे उन्हें फुसलाने की कोशिश कर रहे हैं। चில்लाकर बोलना उनकी आदत नहीं थी। यही शायद उनकी शक्ति भी थी। वे अपने स्वाभाविक अन्वाज में बोलते रहे, "देशभक्ति के लिए यह सवॉच पुरस्कार है, और मुझे गर्भ है कि में यह पुरस्कार पाने जा रहा हूँ। वे सोचते हैं कि मेरे पार्श्व शरीर को नष्ट करके वे इस देश में सुरक्षित रह जायेगी। यह उनकी भूल है। वे मुझे मार सकते हैं, लेकिन मेरे विचारों को नहीं मार सकते। वे मेरे शरीर को कुचल सकते हैं, लेकिन मेरी भावनाओं को नहीं कुचल संकंगे। ब्रिटिश हुकूमत के सिर पर मेरे विचार उस समय तक एक अभिशाप की तरह मैंडरोंत रहे गे जब तक वे यहाँ से भागने के लिए मजबूर न हो जायें। " भगतसिंह पूरे आवेश में बोल रहे थे। कुछ समय के लिए हम लोग भूल गये कि जो आदमी हमारे सामने बैठा है वह हमारा सहयोगी है। वे बोलते जा रहे थे:“लेकिन यह तस्वीरें का सिर्फ एक पहलू है। दूसरा पहलू भी उतना ही उज्जवल है। ब्रिटिश हुक्मत के लिए मरा हुआ भगतसिंह जीवित भगतिसिंह से ज्यादा खुतरनाक होगा। मुझे फाँसी हो जाने के बाद मेरे क्रानितकारी विचारों की सुगन्ध होमारे इस मनोहर देश के बातालरण में व्याप हो जायेगी। वह नौजवानों को मदहोश करेगी और वे आजूरी और क्रानित के लिए पागल हो उठेगी। नौजवानों का यह पागलपन ही ब्रिटिश साम्राज्यवादियों को विनाश के कणार पर पहुँचा देगा। यह मेरा दृढ़ विश्वास है। मै बेसब्री के साथ उस दिन का इतजार कर रहा हूँ जब मुझे देश के लिए मेरी सेवाओं और जनता के लिए मेरे प्रेम का सर्वच्च पुरस्कार मिलेगा। " भगत सिंह की भविष्यवानों एक साल के अंदर ही सच साबित हुई। उनका नाम मौत को चुनोती देने वाले साहस, बिलदान, देशभक्ति और संकल्पशीलता का प्रतीक बन गया। समाजवादी समाज की स्थापना का उनका सपना शिशित युवकों का सपना बन गया और 'इन्कलाब जिन्बाद' का उनका नारा समूचे राष्ट्र का युद्धाद हो गया।
1930-32 में जनता एक होकर उठ खड़ी हुई। करागरगार, कोई और लातियों के प्रहार उसके मनोबल को तोड़ नहीं सको। यही भावना, इससे भी ऊँचे स्तर पर, 'भारत छोड़ो' आन्दोलन के दौरान दिखायी दी थी। भगतिशक का नाम होतीं पर और उनका नारा अपने झण्ठों पर लिये हुए किशोरी और बच्चों ने गोलीयों का सामना इस तरह किया मानो वे मक्खन की बनी हुई हों। पूरा राष्ट्र पगल हो उठा था। और फिर आया 1945-46 का दौर जब विश्व ने एक सर्वथा नये भारत को करवेंट बदलते देखा। मजूदर, किसान, छात्र, नवयुवक, नौसेना, शलसेना, वायुसेना और पुलिस तक – सब कड़ा प्रहार करने के लिए आतुर थे। निष्काल प्रतिरोध की जाह सफ्रिय जवाबी हमले ने ले ली। बलिदान और यातनाओं को सहन करने की जो भावना 1930-31 तक थोड़े से नौजवानों तक सीमित थी, अब समूची जनता में दिखायी दे रही थी। विद्रोह की भावना ने पूरे राष्ट्र को अपनी गिरिपुत्र में जकड़ लिया था। भगतिसिंह ने टीक हो तो कहा था, “भावना कभी नहीं मरती। ” और उस समय भी वह मरी नहीं थी।

सन्दर्भ

1. Quoted in the Sedition Committee (Rowlatt) Report 1919, p. 3
2. वहीं, पृष्ठ 2
3. वहीं, पृष्ठ 2
4. मनमथनाथ गुप्त : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का इतिहास, दूसरा संस्करण, 1960, पृष्ठ 44
5. तारिणी शंकर चकवर्ती : भारत में सशस्त्र क्रान्तिक की भूमिका, क्रान्तिकारी प्रकाशन, मिज़ापुर, पृष्ठ 142
6. Budhadeva Bhattacharya (ed.), Freedom Struggle & Anushilan Samiti, p. 48
7. वहीं, पूछ 68
8. J. C. Car: Political Troubles in India 1907-1917, Preface, 1973, p. XIII
9. Quoted in Sedition Committee Report, p. 7
10. तारिणी शंकर चकवती : पृष्ठ 93
11. G. Adhikari: Challenge, PPH, New Delhi, Jan. 1984, p. 3
12. Tridib Chaudhary: Freedom Struggle and Anushilan Samiti, Introduction, p. XVI-XVII
13. अमेरिका के भारतीय क्रांतिकारियों की गतिविधियों के बारे में अधिकतर सामग्री एल्.पी. माथुर की पुस्तक Indian Revolutionary Movement in United States of America से ली है। यह पुस्तक एस. चॉाद एण्ड क., नयी दिल्ली से 1970 में प्रकाशित हुई थी।
14. Paraphrased from Ghadar Weekly, Vol. 1, No. 3 (Dec. 30, 1913) by Sohan Singh Josh, Hindustan Ghadar Party, A Short History, p. 160
15. वहीं, पृष्ठ 189
16. वहीं, पृष्ठ 175
17. वहीं, पृष्ठ 192
18. वहीं, पृष्ठ 177
19. वहीं, पृष्ठ 193
20. वहीं, पृष्ठ 193
21. L.P. Mathur, op. Cit., p. 23
22. वहीं, पृष्ठ 29
23. Presidential Address to Special (Calcutta) Session of the Indian National Congress, September 1920. Quoted by R.P. Dutt; India Today, p. 280
24. वहीं, पुस्तक 284
25. दिखிய परिशिष्ट न. 1
26. शचीन्दनाथ सांयाल की पुस्तक बन्दी जीवन से विश्वविमत्र उपाध्याय द्वारा शचीन्दनाथ सांयाल और उनका युग में उद्दृत, पृष्ठ 195
27. বই, পৃষ্ঠ 156
28. S.N. Mazumdar: In Search of a Revolutionary Theory and a Revolutionary Program. p. 178
29. वहीं, पृष्ठ 177
30. वहीं, पृष्ठ 178
31. वहीं, पृष्ठ 154
32. वहीं, पुस्तक 181-2
33. ฝรั่ง, ฯจั
34. Jawaharlal Nehru: An Autobiography, John Lane, The Bodley Head, London, 1936, p. 164-5
35. Quoted by Pratima Ghosh, Meerut Conspiracy Case & the Left-Wing in India, p. 47
36. वहीं, पृष्ठ 53
37. यह बिल सदन में बहस के लिए २१ मार्च को ऐसा किया गया। लेकिन अध्यक्ष ने उसे २ अप्रैल, 1929 तक के लिए स्थित कर दिया। २ अप्रैल को उन्होंने निर्णय किया कि चूँकि बिल का आधार और मेरत षड्यनल केस में अभिभुक्लोकों के खिलाफ लगाये गये अभियोग एक जैसे है, इस स्थित में बिल पर जो बहस होगी उससे अधिकुर्कों के बचाव पर असर पड़ेगा। इन कारणों से उन्होंने बिल पर बहस की अनुमित नहीं दी। ४ अप्रैल को भारत सरकार ने उसे फिर सदन के सामने पेश किया और बहस की अनुमित मौरी। ११ अप्रैल को अध्यक्ष ने सरकार की अपनी दुकरा दी और अपना निर्णय बरकराए रखा। १३ अप्रैल को वायसराय ने उसे अध्ययोदेश के रूप में लागू कर दिया।
38. Quoted by G. Adhikari in an article in Mainstream, April 29, 1981
39. G. Adhikari (ed.): Documents of the History of the Communist Party of India, Vol. II, p. 443
40. वहीं, पृष्ठ 442
41. वहीं, पूछ 473
42. S.N. Mazumdar, op. Cit. p. 176
43. G. S. Deol, Sardar Bhagat Singh
44. वहीं, पृष्ठ 113
45. B मेरे प्रिय जयदेव!

परिशिष्ट - दो

जयदेव के नाम पत्र

कृपया निम्नलिखित कियां द्रारकनाथ पुस्तकालय से मेरे नाम पर जारी करवाकर शनिचरवार को कुलबीर के हाथ भेज देना :
- मैटीरियेलिज्म : कार्ल लीबेन्बत
- हाईमैन फाइट - बी. रसेल
- सोवियट्स एट వर्क
- कोलेस ऑफ़ सेक्रिण्ड इण्डरनेशनल
- लैफ्ट விंग कम्प्युनिन्म
- म्यूचुअल एण्ड फ्रंस क्रोपोटिकन
- फील्ड्स फेक्टिंग एण्ड वर्कशाप्स
- सिसिल वार इन फ्रांस : माक्स
- लैण्ड रिवॉल्यूशन इन एशिया, और
- अपटन सिंकलের की 'स्माइ'
कृपया यदि हो सके तो मुझे एक और किताबे भेजने का प्रबन्ध करना, जिसका नाम 'थ्योரி आँफ' हिस्सेटिकल मैटिरियेल्लुम : बुधबिरि' है। (यह पंजाब पबिलक लाइब्रेरी से मिल जायेगी)। और पुस्तकालयाध्यक्ष से यह मालूम करना कि कुछ किताबे क्या बोस्टेल जेल में भेजी गयी हैं? उन्हें कियाबो की बहुत जूफ़रत है। उन्होंने सुखदेव के भाई जयदेव के हाथों एक सूची भेजी थी, लेकिन उनको अभी तक कियाबे नहीं मिली। अगर उनके (पुस्तकालय) पास कोई सूची न हो तो कृपया लाला फिरोजचन्द से जानकारी ले लेना और उनकी पसंद के अनुसार कुछ रोक कितब भेज देना। इस रिव्वार जब मैं वहाँ जाऊँ तो उनके पास कियाबे पहुँची हुई होनी चाहिए। कृपया यह काम किसी भी हालत में कर देना। इसके साथ ही डालिंग की 'पंजाब पेजेण्ड्ती इन प्रासपैरिति एण्ड डेंट' और इसी तरह की एक-दो अन्य किताबें किसान समस्या पर डॉ. आलम के लिए भेज देना। आशा है तुम इन कष्टों को ज्यादा महसूस न करोगे। भविष्य के लिए तुम्हे यकीन दिलाता हूँ कि तुम्हे कभी भी कोई कष्ट न दूगा। सभी मित्रों को मेरी याद कहना और लज्जावती जी को मेरी ओर से अभिवादन। उममीद है कि अगर दत की बहन आयीं तो वे मुझसे मुलाकूत करने का कष्ट करेंगी। आदर के साथ, भगत सिंह सुधरी हुई राजनीतिक संस्थाप्य, पूँजी और ध्रम के बीच समझौता कराने वाली परिषेद, परोपकार और विशेषोधिकार जो पूँजीपतियों की खैरतां के अलावा और कुछ नहीं हैं—इनमें से कोई भी चीज उस सवाल का जवाब नहीं दे सकती जो मंदिरों, सला के सिंहासनों और संसदों को कंपकंपा रहा है। जो लोग देब-कुचले हैं, और जो उनकी पीठ पर सवार होकर आगे बढ़े हुए हैं, अब इन दोनों के बीच कोई अमन-चैन नहीं रह सकता। अब वर्गों का सिर्फ अन्त ही हो सकता है। जबतक पहले न्याय न हो, तब तक सद्भावना की बात करना अनगर प्रलाप है, और जबतक इस दुनिया का निर्माण करने वालों का अपनी महनत पर अधिकार न हो तब तक न्याय की बात करना बेकार है।
(नेटबुक से) बेहतर जिन्हारी का रास्ता बेहतर किताबों से होकर जाता है!
जनचेतना सम्पूर्ण सूचीपत्र २०२१
Image summary: यह एक रेखाचित्र है जिसमें एक किताब दिखाई गई है जिसके पन्नों के बीच से पेड़ की जड़ें या शाखाएं बाहर निकल रही हैं, जो ज्ञान और प्रकृति के बीच के संबंध को दर्शाती हैं।

हम हैं सपनों के हरकारे हम हैं विचारों के डाకిये

आम लोगों के लिए जरूरी है वे किताबे जो उनकी जिन्दगी की घुटन और मुक्ति के स्वादों तक पहुँचती है विचार जैसे कि बाहद की देरी तक आग की चिगारी। घर-घर तक चिगारी चिटकाने वाला तेज हवा का झोंका बन जाना होगा जिन्दगी और आने वाले दिनों का सच बतलाने वाली किताबों को जन-जन तक पहुँचाना होगा। तीन दशक से भी पहले प्राग्शील, जनपक्षधर साहित्य को जन-जन तक पहुँचाने की मुहिम की एक छोटी-सी शुरूआत हुई, बड़े मंखु के साथ। एक छोटी-सी दुकान और फुटपாथों पर, मुहूल में और द्युर्णों के सामने छोटी-छोटी प्रशर्षियों लगाने वाले तथा साहिकलों पर, टेल्मार, ड�ोंलों में भवन पर-चरकितावं पहुँचाने वाले सम्पर्णत अवैतिकन वालिगतयर्को की टीम - शुरूआत बस यहाँ से हुई। आज यह बैचारिक अभियान उत्तर भारत के दर्जों शाहிறது और गाँवों तक फैल चुका है। अपने प्रदर्शनी वाहनों के माध्यम से भी जनचेतना कई राज्यों के सुदुरु कोनों तक हिन्दी, पंजाबी, मराही और अंग्रेजी साहित्य एवं कला-सामयी के साथ सपने और विचार लेकर जा रही है, जीवन-संरक्ष-सूजन-प्रगति का नारा लेकर जा रही है। यह अपने ढंग का एक अनुठा प्रयास है। एक भी बैतिक स्टाफ के बिना, समर्पित वालिंगटयरों और विभिन्न सहयोगी जनसंगठनों के कार्यकर्ताओं के बूते पर यह प्रोजेंट आगे बढ़ रहा है। आइए, आप सभी इस मुहिम में हमारे सहयात्री बिनए।

सम्पूर्ण सूचीपत्र

परिकल्पना प्रकाशन

उपस्थापि
महासागर
अंतोंन चेख्व

कहानियाँ

कविताएँ

नयी 1. कोन देखता है कौन दिखता/लालटू 150.00
नयी 2. अनिश्चय के गहरे धुएँ में/ निम्मा गर्ग 100.00
3. जब मैं जड़ों के बीच रहता हूँ/ पाब्लो नेस्दा 60.00
4. आँखें दुनिया की तरफ देखती हैं/ लॉसटन ह्यूज 60.00
5. इकहतर कविताएँ और तीस छोटी कहानियाँ - बेटोलेंट ब्रैष्ट (मूल जर्मन से अनुवाद : मोहन थपिलियाल) 130.00 (ब्रैष्ट के दुर्लभ चित्रों और स्केचों से सज्जन)
6. उम्मीद-ए-सहर की बात सुनो (फेज अहमद फेज के संसमरण और चुनिंदा शायरी, सम्पादक: शकिल सिदूकी)
7. माओ ले-तुड की कविताएँ (राजनीतिक पृष्ठभूमि सहित विसृत टिपिणियाँ एवं अनुवाद : सत्यबत) 20.00
8. मध्यवर्ग का शोकगीत/ हान्स माளनुस एन्नेससबगिर 30.00
9. जेल डायरी/हो ची मिह 40.00
10. ओस की बूँद और लाल गुलाब/ होसे मारिया सिंसो 25.00
11. इनतृकादा : फिलसतीनी कविताएँ स. रामकृष्ण पाण्डेय 100.00
12. लोहू और इस्मात से फूटता गुलाब : फ़िल्शतीनी कविताएँ (दृक्षाणी संकलन) A Rose Breaking Out of Steel and Blood (Palestinian Poems)
Table summary: यह तालिका पुस्तकों के नाम, उनके लेखकों और उनकी कीमतों की सूची प्रस्तुत करती है। इसमें क्रम संख्या 35 से 41 तक की प्रविष्टियां शामिल हैं। उदाहरण के लिए, विमल कुमार की पुस्तक यह मुँबीडा किसका है की कीमत 50.00 है, किपलेश भोज की यह जो वक्त है 60.00 की है, नरेश चन्द्रकर की बहुत नमं चदर थी जल से बुनी 60.00 की है, और प्रमोद कुमार की इस ढलान पर 90.00 की है। इसके अतिरिक्त, शैलेय की पुस्तक तो की कीमत 75.00 है, जबकि राजेश सकलानी की पुस्तक और नेपाली कविताएँ संग्रह की कीमत 100.00 है। पानी है तो फुटैगो पुस्तक के लिए कोई मूल्य दर्ज नहीं है।

নাटक

संस्मरण

1. लेव तोल्स्तोय : शब्द-चित्र/मक्तिसम गोकी 20.00

स्त्री-विमर्श

1. दुर्ग द्रार पर दस्तक (स्ली प्रश्न पर लेख)/कालायनी 130.00

ज्वलता प्रश्न

वर्णय

नौजवानों के लिए विशेष

1. जय जीवन! (लेख, भाषाएं और पत्र)/निकोलई ऑस्ट्रोस्को वैचारिकी
1. माओवादी अर्थशास्त्र और समाजवाद का भविष्य/रेमण्ड लोट्टा 25.00

साहित्य-विमर्श

1. उपनास और जनसमुदाय/रैलफ फ़ॉक्स 75.00
2. लेखनकला और रचनाकौशल/गोर्ग, फेदिन, मयाकोल्क्सी, अ. तोलसतोय ....
3. दर्शन, साहित्य और आलोचना/बिलंस्की, हर्जन, चेनीशोत्सकी, दोब्राल्युबोव 65.00
4. सृजन-प्रक्रिया और शील्य के बारे में/मकसम गोर्की 40.00
5. माक्सवाद और भाषाविज्ञान की समस्याएं/स्तालिन 20.00

नयी पीड़ी के निर्माण के लिए

1. एक पुस्तक माता-पिता के लिए/अंतम मकारको
2. मेरा हृदय बच्चों के लिए/वसिली सुखोम्लीनकी

सृजन परिप्रदेश पुस्तिका श्रवला

1. एक नये सर्वहारा पुनज़ागरण और प्रबोधन के वैचारिक-सांस्कृतिक कार्यभार काल्यायनी, सत्यम 25.00

आहान पुस्तिका श्रवला

1. रेम, परम्परा और विद्रोह/काल्यायनी 50.00

राहुल फाउंडेशन

नौजवानों के लिए विशेष

1. नौजवानों से दो बातें/ पीटर क्रोपोटिकन 15.00
2. क्रान्तिकारी कार्यक्रम का मसविदा/ भगतिंशह 15.00
3. में नासितक क्यों हूँ और 'ड्रिमलैण्ड' की भूमिका/भगतिशह 15.00

कान्तकारियों के दस्तावेज़

1. भगतिसंह और उनके साधियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़ स. सत्यम 350.00
2. शहीदआजम की जेल नोटबुक भगतसिंह 100.00
3. विचारों की सान पर/भगति सिंह 50.00

कातिलकारियों के विचारों और जीवन पर

1. बहरों को सुनाने के लिए एस. इरूफान हबीब (भगतसिंह और उनके साधियों की विचारधारा और कार्यक्रम)
2. क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास/शिव वर्मा 25.00
3. भगतिसंह और उनके साधियों की विचारधारा और राजनीति/बिपन चन्द्र 25.00

महतवपूर्ण और विचारोतेजक संकलन

1. उममीद एक जिन्दा शब्द है ''दायितबोध' के महत्तपूर्ण सम्पादकीय लेखों का संकलन) 75.00 2. एन्जरीओ : एक खत्तरनाक सामाज्यवादी कुचक्र 3. डब्क्यूएसाएफ : सामाज्यवाद का नया ट्रोजन हाँर्स 80.00 50.00

ज्वलन्त प्रश्न

1. 'जாति' प्रश्न के समाधान के लिए बुद्ध काफ़ी नहीं, अभेदकर भी काफ़ी नहीं, माक्सर ज़रुरी हैं / रंगनायकमा
2. जाति और वर्ग : एक माक्सर्वाடி दृष्टिकोण / रंगनायकमा 100.00

दायितवबोध पुस्तिका श्रवला

1. अनश्वर हैं सर्वहारा संघषों की अग्निशिखाएं/दीपायन बोस 30.00
2. समाजवाद की समस्याएं, पूजीवादी पुनस्थिपना और महान संवहारा सांस्कृतिक क्रानित/शिश्रकाश 30.00
3. क्यों माओवाद?/शिश्रकाश 20.00
4. बुजुआ वर्ग के ऊपर सर्वतोमुखी अधिनायकत्व लागू करने के बारे में/चाढ़ चुन-चियाओं 5.00
5. भारतीय कृषि में पूजीवादी विकास/सुखविन्दर 35.00

आहान पुस्तिका श्रवला

1. छात्र-नौजवान नयी शुफ़आत कहां से करें?
2. आरक्षण : पक्ष, विपक्ष और तीसरा पक्ष
4. क्रान्तिकारी छात्र-युवआ अन्दोलन 25.00
20.00 5. भ्रष्टाचार और उसके समाधान का सवाल सोचने के लिए कुछ मुझे 50.00
3. आतंकवाद के बारे में : विश्वम और यथाथि 20.00
20.00 6. माक्सवाद-लेननवाद और राष्ट्रीय प्रश्न (एक बहस)/शिवानी, अभिनाव 150.00

बिगुल पुस्तिका श्रवला

1. कम्पुनिस्ट पार्टी का संगठन और उसका दाँचा/लेजिन 20.00
2. मकड़ा और मक्खी/विलहेल म्लीनोज्छा 5.00
3. ट्रेडयूनियन काम के जनवादी तरीकों/सोर्गि रोस्तोवस्की
4. मई दिवस का इतिहास/ अलेकजेंण्डर ट्रैक्टनबर्ग 10.00
5. पेरिस कम्प्यून की अमर कहानी 20.00
6. अक्टूबर क्रान्तिकी मशाल 15.00
7. जंगलनामा : एक राजनीतिक समीक्षा/डॉ. दर्शन खेड़ी 10.00
8. लाभकारी मूल्य, लागत मूल्य, मध्यम किसान और छोटे पैमाने के माल उत्पादन के बारे में माक्सवादी दृष्टिकोण : एक बहस
9. संशोधनवाद के बारे में 10.00
10. शिक्षागो के शहीद मज्दुर नेताओं की कहानी/हावर्ड फ़ास्ट 20.00
11. मजदूर आन्दोलन में नयी शुक्रात के लिए 20.00
12. मजदूर नायक, क्रिकारि योढ़ा 15.00
13. चोर, భక్త और विलासी नेताशாही ....
14. बोलते आँकड़े, चिख़ती सच्चाइयाँ ...
15. राजधानी के मेहनतकश : एक अध्ययन/अभिनेव 30.00
16. फ्रांसीवाद क्या है और इससे कैसे लड़े?/अभिभव 120.00
17. नेपाली क्रियांत : इतिहास, वर्तमान परिस्थिति और आगे के रास्ते से जुड़ी कुछ बातें, कुछ विचार/ आलोक रंजन 55.00
18. कैसा है यह लोकतंत्र और यह संविधान किनकी सेवा करता है आलोक रंजन/आनन्द सिंह 150.00
19. तीन कृषि विधेयक और मजदूर वर्ग का नजरिया/अभिनव 40.00

मजदूरी का इंக்लाबी मासिक अख्बार

Image summary: यह एक ब्लैक एंड व्हाइट रेखाचित्र है जिसमें सबसे ऊपर बड़े अक्षरों में 'मजदूर बिगुल' लिखा है। नीचे की ओर कई लोगों के मुट्ठी बंद हाथ हवा में उठे हुए दिखाई दे रहे हैं, जो विरोध या एकजुटता का प्रतीक हैं। बीच में एक पोस्टर पकड़ा हुआ है जिस पर 'दुनिया के मजदूरों एक हो!' का नारा लिखा है।
एक प्रति : 5 रुपये
( डाक च्यय सिंहत )
सम्पादकीय कार्यालय
69 ए-1, बाबा का पुरखा, पेपर मिल रोड निशातगंज, लखनक-226006 फोन : 0522-4108495 इमेल : bigulakhbar@gmail.com

माक्सरीनद

34. माओ ले-तुड की रचनाएँ : प्रतिनिधि चयन (एक खण्ड में) ...
35. कम्पुनिस्ट जीवनशैली और कार्यशैली के बारे में/माओ ऐसे-तुड
36. सोवियत अर्थशास्त्र की आलोचना/ माओ ऐसे-तुड

नयी

37. दर्शन विषयक पाँच निवंश/ माओ ऐ-तुड 70.00
38. कला-साहित्य विषयक एक भाषाएं और पाँच दस्तावेज़/माओं से-तुड 15.00

अन्य माकस्वीदाई साहित्य

1. दर्शन कोई रहस्य नहीं (जब किसानों ने अपने अध्ययन को व्यवहार में उतारा) 50.00
2. राजनीतिक अर्थशास्त्र, माक्सर्वादी अध्ययन पाठचक्रम 300.00
3. खुश्चेव झूता था/ग्रोवर फर 300.00
4. राजनीतिक अर्थशास्त्र के मूलभूत सिद्धांत (दो खण्डों में) (दि शंघाई टेक्स्टबुक ऑफ पोलिटिकल इकोनॉमी) 160.00
5. पेरिस कम्प्यून की शिक्षाएँ (सच्चा) एलोक्रेण्डर ट्रैक्टनबर्ग 10.00
6. कम्पुनिल सट पार्टी का घोषणापत्र/ डी. रियाजानोंव (विस्तृत व्याख्यातमक टिपिणियों सिंहित)
39. माओ ले-तुड की रचनाओं के उद्दरण 50.00
7. दृन्दालमक भूतिकवाद/ डेविड गेस्ट
8. इतिहास ने जब करवट बदली/ विलियम हिन्दन 25.00
9. दृन्दालमक भौतिकवाद/ वी. अदरालस्की 50.00
10. अक्टूबर क्रिकित और लेज़न अलबर्ट रिस विलियम्स (महत्वपूर्ण नयी सामग्री और अनेक नये दुर्लभ चित्रों से सज्जन परिवर्णित संस्कारण)
11. सोवियत संघ में पूजीवाद की पुनस्थिपना/मार्दिन निकोलस 50.00

राहुल साहित्य

परम्परा का स्मरण

जीवनी और संसदरण

বিবিধ

Rahul Foundation

Marxist Classics

V. I. Lenin

30. One Step Forward, Two Steps Back
31. The State and Revolution 80.00
32. On the Dictatorship of Proletariat, Questions and Answers 50.00
33. On the Dictatorship of the Proletariat: Selected Expositions 10.00

Plekhanov

34. Fundamental Problems of Marxism

J. Stalin

35. Marxism and Problems of Linguistics 25.00
36. Anarchism or Socialism? 60.00
37. Economic Problems of Socialism in the USSR
1. Political Economy, Marxist Study Courses (Prepared by the British Communist Party in the 1930s) 375.00
2. Fundamentals of Political Economy (The Shanghai Textbook) 150.00
4. Socialism and Ethics/ Howard Selsam
5. What Is Philosophy? (A Marxist Introduction)/Howard Selsam 100.00
38. On Organisation ___ 15.00
39. The Foundations of Leninism 70.00
40. The Essential Stalin ... Major Theoretical Writings 1905–52 (Edited and with an Introduction by Bruce Franklin)

Lenin and Stalin

41. On the Party ___ 30.00

Mao Tse-Tung

42. Five Essays on Philosophy 80.00
43. A Critique of Soviet Economics 70.00
44. On Literature and Art ___ 80.00
45. Selected Readings from the Works of Mao Tse-tung

Other Marxism

3. Reader in Marxist Philosophy/ Howard Selsam & Harry Martel ...
46. Quotations from the Writings of Mao Tse-tung
6. Reader's Guide to Marxist Classics/Maurice Cornforth 70.00
7. From Marx to Mao Tse-tung 120.00
8. Capitalism and After 100.00
9. The Human Essence 80.00
10. Mao Tse-tung's Immortal Contributions/Bob Avakian
11. A Basic Understanding of the Communist Party (Written during the GPCR in China) 150.00
12. The Lessons of the Paris Communel/Alexander Trachtenberg (Illustrated) 15.00
13. Subversive Interventions (An Anthology) Abhinav Sinha 500.00

Biographies & Reminiscences

1. Reminiscences of Marx and Engels (Collection)
2. Karl Marx And Frederick Engels: An Introduction to their Lives and Work/David Riazanov 150.00
3. Joseph Stalin: A Political Biography by The Marx-Engels-Lenin Institute 80.00

Problems of Socialism

1. How Capitalism was Restored in the Soviet Union, And What This Means for the World Struggle Red Papers 7 175.00
2. Preface of Class Struggles in the USSR/Charles Bettelheim 30.00
3. Nepalese Revolution: History, Present Situation and Some Points, Some Thoughts on the Road Ahead Alok Ranjan 75.00
4. Problems of Socialism, Capitalist Restoration and the Great Proletarian Cultural Revolution Shashi Prakash 40.00

On the Cultural Revolution

1. Hundred Day War: The Cultural Revolution At Tsinghua University William Hinton
2. The Cultural Revolution at Peking University/Victor Nee with Don Layman 30.00
3. Mao Tse-tung's Last Great Battle Raymond Lotta 25.00
4. Turning Point in China William Hinton 50.00
5. Cultural Revolution and Industrial Organization in China Charles Bettelheim 55.00
6. They Made Revolution Within the Revolution / Iris Hunter 50.00

On Socialist Construction

1. Away With All Pests: An English Surgeon in People's China: 1954–1969 Joshua S. Horn
2. Serve The People: Observations on Medicine in the People's Republic of China / Victor W. Sidel and Ruth Sidel
3. Philosophy is No Mystery (Peasants Put Their Study to Work)

On the Caste Question

1. On the Caste Question: Towards a Marxist Understanding Abhinav Sinha 200.00
2. Caste and Class: A Marxist Viewpoint / Ranganayakamma 60.00

Dayitvabodh Reprint Series

1. Immortal are the Flames of Proletarian Struggles / Deepayan Bose 30.00
2. Problems of Socialism, Capitalist Restoration and the Great Proletarian Cultural Revolution / Shashi Prakash 40.00
3. Why Maoism? / Shashi Prakash ___ 25.00

Ahwan Reprint Series

1. Where Should Students and Youth Make a New Beginning? 20.00
2. Reservation: Support, Opposition and Our Position ___ 20.00
3. On Terrorism : Illusion and Reality / Alok Ranjan 20.00
“The books that help you most are those which make you think the most. The hardest way of learning is that of easy reading; but a great book that comes from a great thinker is a ship of thought, deep freighted with truth and beauty.”

Bigul Reprint Series

1. Still Ablaze is the Torch of October Revolution 30.00
2. Nepalese Revolution History, Present Situation and Some Points, Some Thoughts on the Road Ahead / Alok Ranjan 75.00

Women Question

1. The Emancipation of Women / V. I. Lenin 100.00
2. Breaking All Tradition's Chains: Revolutionary Communism and Women's Liberation / Mary Lou Greenberg 50.00

Miscellaneous

1. Probabilities of the Quantum World / Daniel Danin
2. An Appeal to the Young / Peter Kropotkin 20.00

The Anvil

A Journal of Marxist Theory
Editorial Office
69 A-1, Baba ka Purwa
Paper Mill Road, Nishatgunj, Lucknow 226 006, India

अरविन्द स्मृति न्यास के प्रकाशन

1. इक्कीसवीं सही में भारत का मजदूर आन्दोलन: निरन्तरता और परिवर्तन, दिशा और सम्भावनाएं, समस्याएं और चुनौतियाँ (द्वितीय अरविन्द स्मृति संगोछी के आलेख) 40.00
2. भारत में जनवादी अधिकार आन्दोलन: दिशा, समस्याएँ और चुनौतियाँ (तृतीय अरिविन्द स्मृति संगोष्टी के आलेख) 80.00
3. जாति प्रश्न और माक्सवाद (चतुर्थ अरविन्द स्मृति संगोष्टि के आलेख)

Publications From Arvind Memorial Trust

1. Working Class Movement in the Twenty-First Century: Continuity and Change, Orientation and Possibilities, Problems and Challenges (Papers presented in the Second Arvind Memorial Seminar) 40.0
2. Democratic Rights Movement in India: Orientation, Problems and Challenges (Papers presented in the Third Arvind Memorial Seminar) 80.00
3. Caste Question and Marxism (Papers presented in the Fourth Arvind Memorial Seminar) 200.00

जनचेतना इन पुस्तकों की भी मुख्य वितरक है

1. बच्चों के लिए अर्थशास्त्र (माक्सर् की 'पूजी' पर आधारित पाठ)/रंगनायकमा 120.00
2. घरेलू काम और बाहरी काम/रंगनायकमा 40.00
3. For the Solution of the 'Caste' Question, Buddha is not enough, Ambedkar is not enough either, Marx is a must/Ranganayakamma 100.00
4. Economics for Children [Lessons based on Marx's 'Capital']/Ranganayakamma 150.00
5. Household Work and Outside Work 60.00
Image summary: यह एक सरल रेखा चित्र है जिसमें एक बच्चा जमीन पर बैठकर ध्यानपूर्वक एक किताब पढ़ रहा है।

अनुराग ट्रस्ट

दो महत्वपूर्ण पत्रिकाएँ दिशा सन्धान

माक्सवादी सैटब्रिंक शोध और विमर्श का मंच सम्पादक: काल्यायनी / सत्यम एक प्रति : 100 रुपये, आजीवन: 5000 रुपये वार्षिक (4 अंक) : 400 रुपये (100 ॥. रिज़. बुकपोस्ट व्य अतिरिक्त)

ཀ་དྷི་པ་༠

मौडिया, संस्कृति और समाज पर केन्द्रत्व समादक: काल्यायनी / सत्यम एक प्रति : 40 रुपये आजीवन: 3000 रुपये வாழ்க (4 अंक) : 160 रुपये (100 ॥. रजि. बुक पोस्ट व्य अतिरिक्त)
सम्पादकीय कार्यालय :
69 ऐ-1, बाबा का पुरवा, पेपर मिल रोड, निशातंगज, लखनक-226006 फोन: 9936650658, 8853093555 वेबसाइट : dishasandhaan dot in इमेल: dishasandhaan@gmail.com वेबसाइट : naandipath dot in इमेल: naandipath@gmail.com
Image summary: यह एक पत्रिका का कवर पेज है जिसका शीर्षक 'आह्वान' है और यह 'क्रांतिकारी छात्र-युवाओं का आह्वान' के रूप में पहचाना गया है। कवर पर 'फासीवाद विरोधी विशेषांक' लिखा हुआ है, जो इसके विषय को दर्शाता है। इसमें एक मुट्ठी का ग्राफिक है जो संघर्ष या प्रतिरोध का प्रतीक है।

मुख्यतकாमी छात्रों-युवाओं का आह्ान सम्पादकीय कार्यालय

बी-100, मुकुन्द विहार, करावल नगर, दिल्ली-110094 इमेल : ahwan@ahwanmag.com, ahwan.editor@gmail.com वेबसाइट : ahwanmag dot com फेसबुक : facebook dot com URL

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• भगतसिंह और उनके साधियों का सम्पूर्ण उपलब्ध साहित्य
• मकसम गोर्की की पुस्तकों का सबसे बड़ा संग्रह
• भारतीय इतिहास के अत्यन्त महत्वपूर्ण क्रिकितकारी दस्तावेज़
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• दिमाग़ की विड्धिकियां खोलने और कल्पना की उड़ानों को पंख देने वाला
बाल-साहित्य
• प्रगतिशील क्रिकितकारी पत्र-पत्रिकाएँ
• सुन्दर, सुखिपपूर्ण, प्रेरक पास्टर और कार्ड
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• साहित्यक व क्रान्तिकारी उद्देश्यों-चित्रों वाली टीशर्ट, कैलेण्डर, बुकमार्क, डायरी आदि...
ऐसा साहित्य जो सपने देखने और भविष्य-निर्माण के लिए प्रेरित करता है! (हिन्दी, अंग्रेजी, पंजाबी और मराதி में)
किताबें नहीं,
हम आने वाले कल के सपने लेकर आये हैं
किताबें नहीं,
हम असली इनंसान की तरह
जिन का संकल्प लेकर आये है
परिकल्पना प्रकाशन, राहुल फाउंडेशन, अनुराग दृष्ट, अरिबंद स्मृति न्यास और ऐरण प्रकाशन की पुस्तकों की 'जनचेतना' मुख्य वितरक है। ये प्रकाशन पाँच स्वोत्त - सरकार, राजनीतिक पार्टीयों, कॉर्पोरेट घरानों, बहुराधीय निगमों और देर्शी-विदेशी फुनिंग एजेंसियों से किसी भी प्रकार का अनुदान या वित्नीय सहायता लिये बिना जनता से जुटाये गये संसाधनों के आधार पर आज के दौर के लिए जुज़ली व महत्वपूर्ण साहित्य बेहद सस्ती दरों पर उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

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